बलरामपुर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बलरामपुर/रामानुजगंज, 21 जनवरी। बलरामपुर जिले के रामानुजगंज में एक किसान का वीडियो सोशल मीडिया पर फैलने के बाद जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा शुरू हुई है। वीडियो में किसान अपने पिता के इलाज के लिए समय पर बैंक से राशि नहीं निकाल पाने की बात कहता नजर आ रहा है। मामले के सामने आने के बाद पत्रकार द्वारा बैंक प्रबंधन से संपर्क कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली गई।
वीडियो में दिखाई दे रहे किसान की पहचान उमेश यादव के रूप में हुई है। उमेश यादव ने बताया कि उनके पिता जोगी यादव किडनी की बीमारी से पीडि़त हैं और उनका इलाज चल रहा है। इलाज के लिए राशि की आवश्यकता होने पर उन्होंने जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, रामानुजगंज शाखा में चेकबुक के लिए आवेदन किया था, लेकिन समय पर चेकबुक जारी नहीं होने के कारण उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा।
उमेश यादव का कहना है कि चेकबुक के लिए कई बार आवेदन किया गया, लेकिन आवेदन निरस्त कर दिया गया, जिससे इलाज के लिए आवश्यक राशि समय पर नहीं मिल सकी। उनका यह भी कहना है कि पिता को इलाज के लिए रांची ले जाना था, जिसके लिए बड़ी राशि की आवश्यकता थी।
इस संबंध में जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, रामानुजगंज शाखा के शाखा प्रबंधक लल्लू राम यादव ने बताया कि चेकबुक के लिए आवेदन 30 दिसंबर 2025 को प्राप्त हुआ था। आवेदन की जांच के दौरान यह पाया गया कि आवेदन पत्र पर किए गए हस्ताक्षर खाताधारक जोगी यादव के बैंक रिकॉर्ड में उपलब्ध हस्ताक्षर से मेल नहीं खा रहे थे। बाद में जब जोगी यादव से स्वयं हस्ताक्षर कराए गए, तो दोनों हस्ताक्षरों में अंतर पाया गया।
शाखा प्रबंधक के अनुसार, जोगी यादव बीमारी के कारण स्वयं हस्ताक्षर करने की स्थिति में नहीं थे, जिससे हस्ताक्षर सत्यापन को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ। उन्होंने कहा कि बैंक नियमों के अनुसार हस्ताक्षर में असमानता की स्थिति में चेकबुक जारी नहीं की जा सकती।
हालांकि, खाताधारक की स्थिति को देखते हुए मानवीय आधार पर बाद में चेकबुक जारी की गई। साथ ही, इलाज में असुविधा न हो, इसके लिए बीच-बीच में आंशिक रूप से चार बार भुगतान भी किया गया।
बैंक प्रबंधन की ओर से कहा गया है कि सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार की गईं, जबकि खाताधारक पक्ष का कहना है कि यदि चेकबुक समय पर मिल जाती, तो इलाज में आने वाली कठिनाइयों से बचा जा सकता था।
फिलहाल चेकबुक जारी होने के बाद स्थिति सामान्य बताई जा रही है। यह मामला सहकारी बैंकों की प्रक्रियाओं और जरूरतमंद खाताधारकों के मामलों में नियमों एवं मानवीय पक्ष के संतुलन को लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है।


