बलौदा बाजार

मिशन परसाभदेर: ऐतिहासिक स्थल के अवशेषों से जुड़ी जानकारी
30-Dec-2025 4:12 PM
मिशन परसाभदेर: ऐतिहासिक स्थल  के अवशेषों से जुड़ी जानकारी

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बलौदाबाजार, 30 दिसंबर। बलौदाबाजार जिला ऐतिहासिक, पौराणिक, धार्मिक और पुरातात्विक स्थलों के लिए जाना जाता है। जिला मुख्यालय के समीप स्थित ग्राम मिशन परसाभदेर को भी ऐसे स्थलों में शामिल किया जाता है।

स्थानीय जानकारी के अनुसार, ग्राम मिशन परसाभदेर की स्थापना लगभग वर्ष 1890 के आसपास कोलकाता से आए मिशनरियों द्वारा की गई थी। बताया जाता है कि उस समय यहां विश्राम गृह, स्कूल, अस्पताल और चर्च का निर्माण किया गया था। वर्तमान में विश्राम गृह का ढांचा मौजूद है, जबकि अन्य संरचनाएं समय के साथ नष्ट हो चुकी हैं। गांव में कुछ पुराने वृक्ष और विधवा आश्रम के अवशेष भी देखे जा सकते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, नगर से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गांव को जर्मन नागरिक डॉक्टर हंगेस्टाइन ने वर्ष 1890 से 1895 के बीच बसाया था। बताया गया कि उस समय यह क्षेत्र वन क्षेत्र जैसा था और आवागमन के लिए पगडंडी मार्ग ही उपलब्ध था। गांव प्रारंभ से ही अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्र रहा है।

ग्राम के ईसाई परिवारों के वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि डॉ. हंगेस्टाइन ने लगभग चार हजार रुपये के चांदी के सिक्कों के माध्यम से यह भूमि खरीदी थी। इसके बाद यहां विश्राम गृह, स्कूल और अस्पताल का निर्माण कराया गया। स्थानीय लोगों के अनुसार, अकाल के समय डॉक्टर हंगेस्टाइन और उनके साथियों द्वारा पीडि़तों और अनाथों की सहायता की गई, जिसके बाद अन्य क्षेत्रों से भी मसीह समाज के लोग यहां आकर बसे। ग्रामीणों के अनुसार, समय के साथ नई पीढ़ी का शहरी क्षेत्रों की ओर रुझान बढ़ा, जिससे वर्तमान में गांव में सीमित संख्या में ही परिवार निवास कर रहे हैं।

 चर्च और जल संरचनाओं से जुड़ी जानकारी

स्थानीय मसीह समाज के लोगों के अनुसार, क्षेत्र का पहला चर्च डॉक्टर हंगेस्टाइन द्वारा स्थापित किया गया था, जिसे सेटल्यूक चर्च के नाम से जाना जाता था। यह चर्च जबलपुर डायसिस से संबद्ध बताया जाता है और रायपुर जिले के मसीह समाज के लोगों के लिए भी आस्था का केंद्र रहा है।

ग्रामीणों ने बताया कि चर्च के सामने एक कुआं खुदवाया गया था, इसके अलावा बस्ती क्षेत्र में दो अन्य कुएं और एक तालाब का निर्माण कराया गया था। चर्च के सामने स्थित कुआं लगभग 30 से 40 फीट गहरा बताया जाता है और ग्रामीणों के अनुसार वह वर्षभर जलयुक्त रहता है। बताया गया कि विश्राम गृह में कई कक्ष थे, जहां बाद में अंग्रेज अधिकारी भी ठहरते थे। विधवा आश्रम, अस्पताल, स्कूल और चर्च के अवशेष अब खंडहर की स्थिति में हैं और कई संरचनाओं के निशान भी शेष नहीं हैं।

 

भूमि और संरचनाओं से जुड़े वर्तमान हालात

स्थानीय लोगों का कहना है कि समय के साथ मिशन और चर्च की भूमि पर अतिक्रमण हुआ है, जिससे मूल परिसर का क्षेत्रफल कम हो गया है। पूर्व में चर्च परिसर एक परकोटे से घिरा हुआ था, जो अब मौजूद नहीं है। बाद में पुराने चर्च के क्षतिग्रस्त होने के बाद नया चर्च निर्मित किया गया। मसीह समाज के वरिष्ठ सदस्यों के अनुसार, पुराने चर्च में कांसे का एक घंटा था, जो बाद में क्षतिग्रस्त हो गया और वर्तमान में उसका ढांचा ही शेष है। उन्होंने यह भी बताया कि डॉक्टर हंगेस्टाइन के बाद फ्रांसीसी नागरिक श्री मायर ने यहां सेवा दी थी और उनसे जुड़े लोगों की कब्रें आज भी कब्रिस्तान में मौजूद हैं।

स्थानीय जानकारी के अनुसार, ग्राम का नाम आसपास मौजूद परसा वृक्षों के समूह के आधार पर परसाभदेर पड़ा।


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