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छानबीन समिति के समक्ष हाजिर नहीं हुए
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 3 अक्टूबर। पूर्व विधायक अमित जोगी का जाति प्रमाण पत्र निरस्त हो सकता है। बताया गया कि जाति प्रमाण पत्र फर्जी होने की शिकायत पर अमित को जिला स्तरीय छानबीन समिति ने तलब किया था, लेकिन वे एक भी बार समिति के समक्ष हाजिर नहीं हुए। कहा जा रहा है कि छानबीन समिति एक तरफा फैसला ले सकती है।
अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित मरवाही विधानसभा सीट के लिए नामांकन दाखिले की प्रक्रिया 9 तारीख से शुरू होगी। जोगी पार्टी ने पूर्व विधायक अमित जोगी को प्रत्याशी घोषित किया है। मगर उनकी जाति प्रमाण पत्र की वैद्यता को चुनौती देने से अमित की मुश्किलें बढ़ गई हैं। सामाजिक कार्यकर्ता संत कुमार नेताम और भाजपा नेत्री समीरा पैकरा ने अमित जोगी के जाति प्रमाण पत्र को फर्जी करार दिया है, और कहा कि अमित जोगी के पिता पूर्व सीएम अजीत जोगी के जाति प्रमाण पत्र को राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने फर्जी करार दिया था। उन्हें आदिवासी नहीं माना था। ऐसे में अमित भी आदिवासी नहीं हो सकते हैं।
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही कलेक्टर डोमन सिंह ने अमित की जाति प्रमाण पत्र के शिकायत की जांच के लिए जिला स्तरीय छानबीन समिति बनाई है। छानबीन समिति के अध्यक्ष एडिशनल कलेक्टर अजीत बसंत हैं। समिति ने अमित जोगी को अपना पक्ष रखने के लिए चार बार नोटिस जारी किया था। आखिरी बार 30 सितंबर को नोटिस जारी किया गया। मगर अमित समिति के समक्ष उपस्थित नहीं हुए। अमित ने समिति के गठन को ही चुनौती दी है, और राज्यपाल से इसकी शिकायत की है। साथ ही साथ वे हाईकोर्ट भी गए हैं।
दूसरी तरफ, सरकार ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र की शिकायतों की जांच के लिए एक्ट में संशोधन किया है, और कलेक्टर को भी अधिकार दिया है। जिसके आधार पर कलेक्टर जाति प्रमाण पत्र की जांच पर निर्णय ले सकते हैं। एक्ट में यह भी प्रावधान है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र की शिकायत की जांच के लिए नोटिस का 15 दिनों के भीतर कोई जवाब नहीं देने पर समिति एक तरफा कार्रवाई कर सकती है। माना जा रहा है कि अमित जोगी के प्रकरण में भी जिले की छानबीन समिति जल्द ही कार्रवाई कर सकती है, और उनके जाति प्रमाण पत्र को निरस्त किया जा सकता है। यह फैसला अगले कुछ दिनों में होने की संभावना जताई जा रही है।
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)| सरकार की तरफ से हजारों की संख्या में लोगों और एमएसएमई लोन लेने वालों के लिए एक राहत की खबर का ऐलान किया गया है। केंद्र द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में यह सूचित किया गया है कि छह महीने की लोन मोरेटोरियम अवधि के दौरान दो करोड़ रुपये तक के ऋण पर ब्याज पर ब्याज की छूट दी जाएगी। हलफनामे में इस बात का जिक्र किया गया है कि अब चक्रवृद्धि ब्याज पर छूट की भार का वहन सरकार द्वारा किया जाएगा।
केंद्र ने कहा, "संभावित सभी विकल्पों पर सावधानीपूर्वक विचार किए जाने के बाद सरकार ने छोटे कर्जदारों की मदद करने की पंरपरा बनाए रखी है। इन दो करोड़ रुपये तक के ऋणों की श्रेणियों में एमएसएमई ऋण, शैक्षिक, आवास, उपभोक्ता, ऑटो, क्रेडिट कार्ड बकाया, उपभोग, व्यक्तिगत और पेशेवर ऋण शामिल हैं, जिन पर लागू चक्रवृद्धि ब्याज को माफ करने का फैसला लिया गया है।"
केंद्र ने कहा कि जमाकर्ताओं पर वित्तीय बोझ और उनकी कुल निवल संपत्ति को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किए बिना बैंकों के लिए चक्रवृद्धि ब्याज पर छूट के बोझ का वहन किया जाना संभव नहीं होगा और ऐसा जनता के हित में भी नहीं होगा।
हलफनामे में कहा गया : सरकार ने फैसला लिया है कि लोन मोरेटोरियम अवधि के दौरान चक्रवृद्धि ब्याज की छूट पर राहत उधारकर्ताओं की सबसे कमजोर श्रेणी तक सीमित होगी।
विशेषज्ञों की एक समिति संग विचार-विमर्श करने के बाद केंद्र ने इस ओर अपना रुख बदला है।
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)| कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने शनिवार को स्पष्ट कर दिया कि वह किसी भी कीमत पर मंगलवार को मारी गई हाथरस की लड़की के परिवार से मिलेंगी। टाटा सफारी गाड़ी में राहुल गांधी के साथ यहां कांग्रेस मुख्यालय छोड़ने के बाद उन्होंने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, मैं किसी भी कीमत पर हाथरस का दौरा करूंगी, भले ही पुलिस हमें अनुमति न दे।
प्रियंका ने खुद टाटा सफारी गाड़ी चलाई, जिसमें उनके भाई और पूर्व कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी आगे की सीट पर उनके साथ बैठे दिखे।
दोनों नेताओं के साथ, शशि थरूर सहित दर्जनों कांग्रेस सांसद भी हाथरस जा रहे हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, यह एक भयानक घटना है और हमें लड़की के प्रति अपना सम्मान दिखाना होगा। जो कुछ भी हुआ है, इस देश में इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता।
हाथरस में कांग्रेस नेताओं के दौरे की योजना के बाद, उत्तर प्रदेश पुलिस ने यहां दिल्ली-नोएडा-डायरेक्टवे (डीएनडी) पर पर्याप्त व्यवस्था की है।
सुबह से ही कांग्रेस नेताओं को उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने से रोकने के लिए भारी पुलिस तैनाती की गई है।
प्रियंका गांधी शुक्रवार को सामूहिक दुष्कर्म पीड़िता की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर गईं।
दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में मंगलवार को हाथरस की दुष्कर्म पीड़िता जिंदगी से जंग हार गई थी।
प्रियंका ने कहा है कि पीड़िता के परिवार को इस समय अकेले महसूस नहीं करना चाहिए।
राहुल गांधी गुरुवार को भी हाथरस के लिए निकले थे, मगर उन्हें बीच में ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने रोक दिया था। गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) में यमुना एक्सप्रेस-वे पर उस समय हाई वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला था और राहुल को रोकने के दौरान पुलिस के साथ ही हल्की धक्का-मुक्की में राहुल जमीन पर जा गिरे थे।
राहुल को अन्य कांग्रेस नेताओं के साथ हिरासत में लिया गया था, जिसके कुछ देर बाद उन्हें छोड़ दिया गया। अन्य कांग्रेस के खिलाफ महामारी रोग अधिनियम के तहत मामला भी दर्ज किया गया।
विवेक मिश्रा
1970 के राष्ट्रीय किसान आयोग की सिफारिशों को पांच दशक बीत चुके हैं और किसान अब भी अपने उत्पादों के उचित और लाभकारी मूल्यों से दूर है। 2018 में किसानों का आय डबल करने का सुझाव देने वाली दलवई समिति की रिपोर्ट के मुताबिक देश का 40 फीसदी सरप्लस अनाज पैदा करने वाले 85 फीसदी छोटे और सीमांत किसान अपनी उपज का लागत नहीं निकाल पाते हैं। अनाज और फल मंडियों से किसानों की दूरी, परिवहन व्यवस्था का अभाव और बिचौलियों के भंवर में फंसे किसान अपने गांव की दहलीज पर लगने वाले दुनिया के सबसे लोकतांत्रिक साप्ताहिक बाजारों का लाभ नहीं उठा सके हैं।
सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 में कुल 22 हजार ग्रामीण हाट में से 4600 हाट बाजारों को विकसित करने व ई-नाम जैसे प्लेटफॉर्म से जोडऩे का ऐलान किया था लेकिन सरकार के दावे के मुताबिक 4600 में से अभी तक महज एक फीसदी ग्रामीण बाजार पर ही काम हो पाया है। जबकि कुल 22 हजार ग्रामीण हाट में उसकी विशेषता, उपयोगिता और जरूरत को ध्यान में रखने वाली प्रश्नावली के साथ महज 11 हजार ग्रामीण हाट का ही सर्वे किया जा सका है।
17 वीं लोकसभा (2019-2020) कृषि मंत्रालय की स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सरकार की ओर से 6 लाख गांवों में महज 4600 ग्रामीण हाट को विकसित करने की योजना बेहद कम है। कम से कम एक पंचायत में एक साप्ताहिक ग्रामीण हाट विकसित होना चाहिए। मंडी के बजाए साप्ताहिक ग्रामीण हाट किसानों के लिए बेहतर वैकल्पिक माध्यम बन सकते हैं। इसलिए इन ग्रामीण हाट बाजारों में भंडारण, शौचालय और अन्य सुविधाएं भी की जानी चाहिए।
सरकार ने 17 वीं लोकसभा की केंद्रीय कृषि मंत्रालय की स्थायी समिति को अपने जवाब में बताया है कि डीएमआई सभी राज्यों में सर्वे कर रहा है। ग्रामीण हाट की संरचना, सुविधाओं और व्यवस्थाओं की जमीनी जानकारी जुटाई जा रही है। अब तक 11,000 ग्रामीण हाट की पहचान की गई है। इसके परिणाम केंद्रीय ग्रामीण मंत्रालय को दिए जा रहे हैं ताकि वह एजीएनआरईजीएस के तहत ग्रामीण हाट की आधारभूत संरचना को विकसित करने के लिए मदद करे। इसके अलावा सर्वे का इस्तेमाल एग्री मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (एएमआईएफ) विकसित करने के लिए भी किया जा रहा है। इसकी मंजूरी मिलते ही इसे बांटा जाएगा। साथ ही एक करोड़ रुपये डीएमआई को सर्वे के लिए दिए गए हैं।
केंद्र सरकार ने 2018-19 के बजट में 22000 ग्रामीण कृषि मंडी (ग्राम्स) और 585 कृषि उपज मंडी समितियों (एपीएमसी) में कृषि विपणन अवसंरचना के विकास और उन्नयन के लिए 2000 करोड़ रुपये के कार्पस के साथ कृषि-मंडी अवसरंचना कोष की स्थापना करने की घोषणा की थी। साथ ही कहा था कि चरणबद्ध तरीके से वर्षवार 22000 ग्राम्य हाटों को उन्नत कृषि मंडी के तौर पर विकसित किया जाएगा, ताकि किसानों की आय को दोगुना करने में मदद मिलेगी। हालांकि दो वर्षों बीत चुके हैं और अब तक सिर्फ 476 कृषि मंडियों को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून योजना के तहत अपग्रेड करने का दावा किया गया है
नाबार्ड के वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर डाउन टू अर्थ को बताया कि ग्रामीण हाट को अपग्रेड करने के साथ ही कृषि मंडी को फॉर्मर्स प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (एफपीओ) और ऑनलाइन ई-नाम से जोडऩे की कवायद को लेकर गाइडलाइन बनाने पर काम चल रहा है। यदि सरकार कोई नीतिगत बदलाव नहीं लेती है तो यह प्रयास किए जाएंगे। क्योंकि राज्य और केंद्र के बीच अभी कई पेचीदगी हैं। इसलिए अभी तक कोई नीतिगत फैसला नहीं लिया जा सका है।
राज्य प्रस्ताव के जरिए मांगेगे तो केंद्र देगा फंड
सरकार ने ग्रामीण कृषि मंडियों और कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) बाजारों में कृषि विपणन बुनियादी ढांचे के विकास और उन्नयन के लिए राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के साथ 2000 करोड़ रुपये के कार्पस राशि से कृषि-मंडी अवसंरचना कोष (एएमआईएफ) को मंजूरी दी है और राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों (यूटी) को योजना के दिशानिर्देशों को परिचालित किया है। हालांकि यह राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों की ओर से एक मांग संचालित योजना है, इसलिए निधि का कोई राज्यवार और वर्षवार आबंटन नहीं होता है। भारत सरकार ने राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों से एएमआईएफ के तहत सहायता प्राप्त करने के लिए प्रस्ताव देने को कहा है।
केंद्रीय कृषि मंत्रालय की स्थायी समिति ने ‘कृषि बाजार की भूमिका और साप्ताहिक ग्रामीण हाट’ की सिफारिश व कार्रवाई की हालिया रिपोर्ट में अपनी सिफारिश में कहा था कि समिति चाहती है कि केंद्र राज्य सरकारों से बातचीत करके ग्रामीण हाट को एपीएमसी एक्ट के दायरे से बाहर रखे। स्थायी समिति ने इस बात पर हैरानी भी जताई थी कि ग्रामीण हाटों के निंयत्रण, प्रबंधन और सुविधाओं आदि के बारे में कोई केंद्रीय और राज्य स्तरीय एजेंसी सूचना या जानकारी नहीं रखती हैं।
वहीं, बाद में राज्यों की ओर से केंद्रीय कृषि मंत्रालय की स्थायी समिति को बताया गया था कि 22941 एग्रीकल्चर मार्केट हैं जो कि एपीएमसी, पंचायती राज व अन्य एजेंसियों के अधीन हैं। वहीं, इस सूचना को एग्रीकल्चर, को-ऑपरेशन एंड फार्मर्स वेलफेयर की प्रशासनिक ईकाई डॉयरेक्टोरेट ऑफ मार्केटिंग इन्सपेक्शन (डीएमआई) ने आधा-अधूरा बताते हुए कहा था कि ग्रामीण हाट का जमीनी सर्वे जारी है। हालांकि हाट को लेकर पहले नियमित सूचनाओं को जुटाने में ध्यान नहीं रखा गया।
हाट दुनिया के सबसे लोकतांत्रिक बाजार
देश के छह लाख गांवों में छोटे उत्पादक हाट बाजारों में एक वर्ष में 25 लाख बार अपनी दुकाने लगाते हैं। हाट स्थानीय पारिस्थितिकी पर टिकती है और सीजनल उत्पादों की खरीद-फरोख्त होती है। हाट को चलाने के लिए कोई संस्थागत तंत्र नहीं है सिर्फ खरीदने और बेचने वाले वहां जुटते हैं। सबसे मुफीद बात यह है कि यह सबसे छोटे उत्पादकों के लिए भी है। यदि किचन गार्डेन में भी सब्जियां उगाई हैं और उसे कोई बेचना चाहता है तो वह गांवों के इन हाट बाजारों में बेच सकता है। निजीकरण अपने चरम पर है, गांव के बाजार भी अब इससे अछूते नहीं है। लोग राशन की दुकानों की जगह तय कर रहे हैं लेकिन हाट बहुउद्देशीय मकसद वाली खरीदारी का अनुभव देता है और सफलतापूर्वक निजीकरण के खतरे से लड़ता है। यह एक ऐसी अवधारणा पर बसा बाजार है जो अवसरों में काफी एकसमान है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से यह खुदरा लोकतंत्र काफी आगे है। यह दुर्भाग्यपूर्ण हैे कि हाट को उतना महत्व नहीं मिला जो सरकार और नीतियों का ध्यान खींच सके। यदि ऐसा होता है तो छोटे और सीमांत किसानों को भी ग्रामीण हाट नया भविष्य दिखा पाएंगे। (डाऊन टू अर्थ)
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)| भारत में कोरोना से हुई मौतों की संख्या एक लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। वहीं देश में सामने आए पॉजिटिव मामलों की संख्या शनिवार को 64 लाख के पार पहुंच गई। यह जानकारी स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों से मिली।
देश में पहली बार मामला दर्ज होने के बाद इस निशान को पार करने में मात्र 204 दिन लगे। गौरतलब है कि 13 मार्च को एक 76 वर्षीय व्यक्ति ने संक्रमण के कारण दम तोड़ दिया था, जो देश में कोरोना से हुई मौत का पहला ममाला था।

नए आंकड़ों के अनुसार, भारत में 24 घंटे में 79,476 नए कोरोनावायरस मामले सामने आए हैं, वहीं इसी अवधि में और 1,069 मौत दर्ज की गईं। इनके साथ देश में मृत्यु की संख्या 1,00,842 और संक्रमण के कुल मामलों की संख्या 64,73,544 तक बढ़ गई। इससे ठीक एक महीने पहले भारत में 67,376 मौतें दर्ज की गई थीं।

दर्ज किए गए कुल मामलों में वर्तमान में 9,44,996 मामले सक्रिय हैं, वहीं 54,27,706 को ठीक होने के बाद छुट्टी दी जा चुकी है।
स्वास्थ्य विभाग और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में रिकवरी दर 83.84 प्रतिशत के उच्च स्तर पर है, जबकि मृत्यु दर घटकर 1.56 प्रतिशत पर आ गई है।

महाराष्ट्र कुल 14,16,513 मामलों के साथ सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है, इसमें 37,480 मौतें भी शामिल हैं। इसके बाद आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और दिल्ली का स्थान है।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में शुक्रवार को एक ही दिन में 11,32,675 सैंपल के टेस्ट किए गए, अब तक कुल 7,78,50,403 सैंपल की जांच हो चुकी है।
डीडीयू नगर 9, बोरियाखुर्द 7, एम्स 5, जिले से 342
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 3 अक्टूबर। राजधानी रायपुर-आसपास की बस्तियों-कॉलोनियों से बीती रात में 342 पॉजिटिव मिले। इसमें डीडीयू नगर से 9, बोरियाखुर्द से 7, पुलिस लाइन से 6, एम्स व देवेंद्र नगर से 5-5 मरीज शामिल है। ये सभी मरीज आसपास के अस्पतालों में भर्ती कराए जा रहे हैं।
जिन जगहों से कोरोना मरीज मिले हैं, उसकी सूची निम्नानुसार है-कटोरा तालाब, मठपारा (3), संतोषी नगर (3 लोग), सुंदर नगर, कमल विहार (3 लोग), इंदिरा कॉलोनी-मंदिरहसौद, जवाहर नगर, तेलीबांधा (6 लोग), विधानसभा रोड, सुमीत लैंडस्कैप, सेल्स टैक्स कॉलोनी, सिविल लाइन 2, कचना, खम्हारडीह, कबीर नगर (5 लोग), सड्डू 2, देवपुरी, जनता कॉलोनी, वीआईपी रोड, सदरबाजार, भाठागांव (3 लोग), डुमरतराई, श्रीनारायणा हॉस्पिटल, वीवाय हॉस्पिटल, अमलीडीह (3), मोवा (3 लोग), बिरगांव (4 लोग), पुरानी बस्ती, शिवानंद नगर (3 लोग), हीरापुर (4 लोग), एम्स (5 लोग), टाटीबंध, मोहबाबाजार (3 लोग), डीडीयू नगर (9 लोग), नहरपारा, शंकर नगर (4 लोग), बजरंग नगर, तिल्दा (15 लोग), गुरूद्वारा, श्याम नगर, खरोरा 2, अवंति विहार, धरसींवा (10 लोग), दुर्गा चौक, अविनाश कैपिटल सिटी, दलदल सिवनी (3 लोग), बैरनबाजार, देवेंद्र नगर (5 लोग), सिलतरा, प्रेम नगर-मोवा, रोहणीपुरम, कोटा, डीडी नगर, मंगलबाजार, लक्ष्मी नगर, सिंघ भगत सिंग चौक, सन्यासी पारा, सिलतरा, आरंग (5 लोग), छोटा अशोक नगर, पुलिस लाइन (6 लोग), राजेंद्र नगर (2), न्यू पंचशील नगर, सांई नगर-जेल रोड, फाफाडीह, ब्राम्हणपारा, लोधीपारा, संजय नगर, उरकुरा, न्यू लक्ष्मी नगर, फूल चौक, आदर्श नगर, टिकरापारा (4 लोग), चंगोराभाठा (7 लोग), वॉलफोर्ड हाइट्स, काशीराम नगर, डब्ल्यूआरएस कॉलोनी, प्रेम नगर, श्रीराम नगर, महादेवघाट, गुरूनानक वार्ड, महावीर नगर, कैलाश नगर, बस्तीपारा-दोंदेकला, शक्ति नगर, गोकुल नगर, पचपेड़ी नाका (4 लोग), अमर चौक, नगर निगम (3 लोग), एनआईटी कैंपस सर्वोदय कॉलोनी, गोकुल नगर, कुशालपुर, कुरूद, परसदा (3), नवापारा (7 लोग), पिरौद 2, धमधा, चंपारण, कुरूद, दुर्गा विहार कॉलोनी (4 लोग), लक्ष्मी विहार कॉलोनी, रामसागरपारा, पंडरी, आमानाका-कुकुरबेड़ा, यादवपारा, परशुलडीह, नरदहा, भनपुरी, एकता नगर, वीर सांवरकर नगर (4 लोग), पार्वती नगर, कैलाशपुरी (3 लोग), बोरियाखुर्द (7 लोग), चौरसिया कॉलोनी, अवधियापारा, प्रोफेसर कॉलोनी।
मौतें-1002, एक्टिव-29693, डिस्चार्ज-88095
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 3 अक्टूबर। प्रदेश में कोरोना मरीज एक लाख 19 हजार आसपास पहुंच गए हैं। बीती रात मिले 2 हजार 637 नए पॉजिटिव के साथ इनकी संख्या बढक़र 1 लाख 18 हजार 790 हो गई है। इसमें से 1002 मरीजों की मौत हो गई है। 29 हजार 693 एक्टिव हैं और इनका एम्स समेत अलग-अलग अस्पतालों में इलाज चल रहा है। 88 हजार 95 मरीज ठीक होकर अपने घर लौट गए हैं। सैंपलों की जांच जारी है।
राजधानी रायपुर समेत प्रदेश में कोरोना का कहर जारी है। हालांकि इसके आंकड़े पहले से कुछ कम हो गए हैं। बुलेटिन के मुताबिक बीती रात 8 बजे 2 हजार 637 नए पॉजिटिव सामने आए। इसमें रायपुर जिले से सबसे अधिक 395 मरीज रहे। दुर्ग, रायगढ़ व जांजगीर-चांपा जिले से क्रमश: 362, 218 व 200 मरीज सामने आए। नांदगांव जिले से 152, बालोद से 81, बेमेतरा-19, कबीरधाम-43, धमतरी-36, बलौदाबाजार-117, महासमुंद-59, गरियाबंद-57, बिलासपुर-158, कोरबा-179, मुंगेली-37, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही-0, सरगुजा-52, कोरिया-35, सूरजपुर-50, बलरामपुर-14, जशपुर-8, बस्तर-83, कोंडागांव-43, दंतेवाड़ा-90, सुकमा-46, कांकेर-27, नारायणपुर-19, बीजापुर से 55 व अन्य राज्य से 2 मरीज शामिल हैं। ये सभी मरीज आसपास के कोरोना अस्पतालों में भर्ती कराए जा रहे हैं। इनके संपर्क में आने वालों की पहचान की जा रही है।
दूसरी तरफ कल 5 लोगों की मौत हो गई। इसमें 2 की मौत कोरोना से और 3 की मौत अन्य गंभीर बीमारियों के साथ कोरोना से हुई है। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग को रायपुर, नांदगांव, बलौदाबाजार, दुर्ग, मुंगेली, सरगुजा व नारायणपुर जिले के अस्पतालों से पूर्व में हुई 11 और मौतों की जानकारी मिली है। इसमें 4 की कोरोना और 7 की अन्य गंभीर बीमारियों के साथ कोरोना से मौत हुई है। इस तरह कल 16 लोगों की मौत दर्ज की गई है। स्वास्थ्य अफसरों का कहना है कि राजधानी रायपुर समेत प्रदेश में कोरोना संक्रमण बना हुआ है और अभी ढाई हजार के आसपास नए पॉजिटिव सामने आ रहे हैं। ऐसे में हम सभी को लगातार अलर्ट रहने की जरूरत है।
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को हिमाचल प्रदेश के रोहतांग में दुनिया की सबसे लंबी सुरंग 'अटल टनल' का उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री ने इस दौरान बताया कि कैसे अटल टनल के काम में तेजी लाकर 26 साल के काम को छह साल में पूरा किया गया। उन्होंने उद्घाटन के दिन को ऐतिहासिक बताया। कहा कि आज सिर्फ अटल जी का ही सपना पूरा नहीं हुआ है, बल्कि हिमाचल प्रदेश के करोड़ों लोगों का दशकों पुराना इंतजार खत्म हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि साल 2002 में अटल जी ने इस टनल के लिए अप्रोच रोड का शिलान्यास किया था। अटल जी की सरकार जाने के बाद, जैसे इस काम को भी भुला दिया गया। हालात ये थे कि साल 2013-14 तक टनल के लिए सिर्फ 1300 मीटर का काम हो पाया था। एक्सपर्ट बताते हैं कि जिस रफ्तार से 2014 में अटल टनल का काम हो रहा था, अगर उसी रफ्तार से काम चला होता तो ये सुरंग साल 2040 में जाकर पूरा हो पाती।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "आपकी आज जो उम्र है, उसमें 20 वर्ष और जोड़ लीजिए, तब जाकर लोगों के जीवन में ये दिन आता, उनका सपना पूरा होता। जब विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ना हो, जब देश के लोगों के विकास की प्रबल इच्छा हो, तो रफ्तार बढ़ानी ही पड़ती है।"
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "अटल टनल के काम में भी 2014 के बाद, अभूतपूर्व तेजी लाई गई। नतीजा ये हुआ कि जहां हर साल पहले 300 मीटर सुरंग बन रही थी, उसकी गति बढ़कर 1400 मीटर प्रति वर्ष हो गई। सिर्फ 6 साल में हमने 26 साल का काम पूरा कर लिया।"
प्रधानमंत्री ने कहा कि इस टनल से मनाली और केलांग के बीच की दूरी 3-4 घंटे कम हो ही जाएगी। उन्होंने कहा, "पहाड़ के भाई-बहन समझ सकते हैं कि पहाड़ पर 3-4 घंटे की दूरी कम होने का मतलब क्या होता है। हमेशा से यहां के इंफ्रास्ट्रक्च र को बेहतर बनाने की मांग उठती रही है। लेकिन लंबे समय तक हमारे यहां बॉर्डर से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्च र के प्रोजेक्ट या तो प्लानिंग की स्टेज से बाहर ही नहीं निकल पाए या जो निकले वो अटक गए, लटक गए, भटक गए।"
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "लोकार्पण की चकाचौंध में वे लोग पीछे रह जाते हैं, जिनके परिश्रम से यह सब संभव हुआ। इस महान यज्ञ में अपना पसीना बहाने वाले अपनी जान जोखिम में डालने वाले मेहनतकश जवानों, इंजीनियरों, मजदूर भाई-बहनों को आदरपूर्वक नमन करता हूं।"
ललित मौर्य
हाल ही में छपे एक नए शोध से पता चला है कि देश में जो गरीब तबका पीडीएस से बाहर है उस वर्ग के बच्चों में कुपोषण की दर सबसे ज्यादा है.
किसी देश का भविष्य कैसा होगा, यह उसके बच्चों के भविष्य पर निर्भर होता है। लेकिन जब विकास का आधार ही कुपोषित हो तो सोचिये वह देश के भविष्य में कितना योगदान देगा। क्या होगा, जब देश के लगभग 58 फीसदी नौनिहालों (6 से 23 माह के बच्चों) को पूरा आहार ही न मिलता हो और जब 79 फीसदी के भोजन में विविधता की कमी हो। कैसे पूरे होंगे, उनके सपने जब लगभग 94 फीसदी के भोजन में विकास के लिए जरुरी पोषक तत्व ही न हो। यह दुखद और चिंताजनक आंकड़ें भारत सरकार द्वारा किये गए राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (2016 - 18) में सामने आये थे।
वहीं पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया, आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रेशन की ओर से 18 सितंबर 2019 को कुपोषण पर जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में देश में कम वजन वाले बच्चों के जन्म की दर 21.4 फीसदी थी। जबकि जिन बच्चों का विकास नहीं हो रहा है, उनकी संख्या 39.3 फीसदी, जल्दी थक जाने वाले बच्चों की संख्या 15.7 फीसदी, कम वजनी बच्चों की संख्या 32.7 फीसदी, अनीमिया पीड़ित बच्चों की संख्या 59.7 फीसदी, 15 से 49 साल की अनीमिया पीड़ित महिलाओं की संख्या 59.7 फीसदी और अधिक वजनी बच्चों की संख्या 11.5 फीसदी पाई गई थी।
पांच साल की उम्र से छोटे हर तीन में से दो बच्चों की मौत का कारण है कुपोषण
हालांकि पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के कुल मामलों में 1990 के मुकाबले 2017 में कमी आई है। 1990 में यह दर 2336 प्रति एक लाख थी, जो 2017 में 801 पर पहुंच गई है, लेकिन कुपोषण से होने वाली मौतों के मामले में मामूली सा अंतर आया है। 1990 में यह दर 70.4 फीसदी थी जोकि 2017 में 2.2 फीसदी घटकर, 68.2 पर ही पहुंच पाई है। यह चिंता का एक बड़ा विषय है, क्योंकि इससे पता चलता है कि पिछले सालों में किए जा रहे अनगिनत प्रयासों के बावजूद देश में कुपोषण का खतरा कम नहीं हुआ है।
लाखों बच्चों को मजदूर बना देगा कोरोनावायरस
इससे निपटने के लिए समय-समय पर अनगिनत सरकारी योजनाएं चलाई गई हैं। जिससे इस बीमारी को समाज से दूर किया जा सके। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) ऐसी ही एक पहल थी, जिसका लक्ष्य देश के गरीब तबके को सस्ती दर पर भोजन मुहैया कराना था। देश में पीडीएस सबसे बड़ी कल्याणकारी योजना है, जो गरीब परिवारों को रियायती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराती है।
जर्नल बीएमसी में छपे इस शोध में यह जानने का प्रयास किया गया है सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) गरीब तबके के बच्चों में स्टंटिंग और कुपोषण की समस्या को हल करने में कितनी कामयाब हुई है। शोध से पता चला है कि देश में जो गरीब तबका पीडीएस से बाहर है उस वर्ग के बच्चों में कुपोषण की दर सबसे ज्यादा है। यह शोध राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण -4 (एनएफएचएस -4) के आंकड़ों पर आधारित है।
जिसमें गरीबी, कुपोषण और पीडीएस के बीच के सम्बन्ध को समझने के लिए सभी परिवारों को चार वर्गों में बांटा गया है। पहला वह वर्ग है जिसे वास्तविक गरीब कहा गया है जो आर्थिक रूप से गरीब है और जिनके पास बीपीएल कार्ड है। दूसरा वह वर्ग है जो गरीब तो है पर उसके पास बीपीएल कार्ड नहीं है। तीसरा वह वर्ग है जो आर्थिक रूप से समृद्ध है इसके बावजूद उसके पास बीपीएल कार्ड है। चौथा वह वर्ग है जो न तो गरीब है न ही उसके पास योजनाओं का लाभ उठाने के लिए बीपीएल कार्ड है।
शोध से प्राप्त नतीजों के अनुसार वह वर्ग जो वास्तविकता में गरीब है और जिसके पास बीपीएल कार्ड भी है उसके और दूसरा वर्ग जो गरीब है पर उसके पास बीपीएल कार्ड नहीं है उस वर्ग के करीब आधे बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। वहीं दूसरी ओर जो वर्ग आर्थिक रूप से समृद्ध है और जिसके पास बीपीएल कार्ड है उसके करीब 40 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। जबकि आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग जिसके पास कार्ड नहीं है उसके करीब एक तिहाई से कम बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।
यही वजह है कि इस शोध में जो वर्ग आज भी पीडीएस योजना का लाभ नहीं उठा पा रहा है उसे भी इसमें शामिल किए जाने की सिफारिश की गई है। साथ ही भारत में कुपोषण की समस्या को दूर करने के लिए पीडीएस में शामिल खाद्यान्नों की गुणवत्ता में सुधार करने की भी बात कही गई है। वहीं मिलने वाले राशन की मात्रा को भी बढ़ाने की मांग की गई है। जिससे जितना जल्द हो सके इस देश को कुपोषण मुक्त किया जा सके। (downtoearth.org.in)
दिव्या निधि
घनी आबादी वाले डेल्टा, जहां नदियां समुद्र से मिलती हैं, विशेष रूप से गर्म-मौसम के कारण भयानक बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं
लगभग पिछले 7 हजार वर्षों से हम नदी के तटों (डेल्टा) के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं। ज्यादातर सभ्यताएं नदी के तटों के आसपास विकसित हुई, क्योंकि नदी और समुद्र की उपजाऊ मिट्टी, प्रचुर मात्रा में खाद्य पदार्थों को अर्जित करने में सहायक है। साथ ही, नदी अथवा समुद्र के माध्यम से आसान परिवहन ने शहरी अर्थव्यवस्था और जीवन शैली को बढ़ावा दिया, लेकिन यह परिस्थिति आज बहुत बदल गई है।
शोधकर्ताओं ने कहा है कि नदी के निचले इलाकों में रहने वाले 30 करोड़ से अधिक लोग उष्णकटिबंधीय तूफान के कारण आने वाली बाढ़ की चपेट में आएंगे। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ये तूफान और अधिक घातक और विनाशकारी हो सकते हैं। इस तरह की बाढ़ का सामना ज्यादातर गरीब देश करेंगे।
बाढ़ के मैदानों में रहने वाले लोगों का जीवन सदी में आने वाले चक्रवातों की वजह से बुरी तरह प्रभावित होता हैं। इन चक्रवातों से हवाओं की गति 350 किलोमीटर (200 मील) प्रति घंटे और हर दिन एक मीटर (40 इंच) से अधिक बारिश हो सकती है। यह रिपोर्ट नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुई है।
गर्म महासागरों और वायुमंडल में अधिक नमी का मतलब है कि ये शक्तिशाली तूफान अधिक लगातार आ सकते हैं। ऐसे तूफान आएंगे कि शायद ही कभी अतीत में क्षेत्र में रहने वाले लोगों ने उनकी भयानक शक्ति को देखा हो।
घनी आबादी वाले डेल्टा, जहां नदियां समुद्र से मिलती हैं, विशेष रूप से गर्म-मौसम के कारण भयानक बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। इस तरह के शक्तिशाली तूफान गर्मियों में दुनिया भर के प्रमुख महासागरों में आते हैं और फिर टकरा जाते हैं।
समुद्र के जल स्तर में वृद्धि के लिए इंसान हैं जिम्मेवार
ऐसे में, नीति निर्माताओं को न केवल बढ़ते तापमान को धीमा करने के तरीकों के बारे में पता लगाना चाहिए, बल्कि पहले से ही जलवायु प्रभावों के लिए तैयार रहना चाहिए। हालांकि अब तक दुनिया के चक्रवातों से नदी के तटों (डेल्टा) में रहने वाली आबादी कितनी और किस तरह प्रभावित होगी, इसका सटीक रूप से पता नहीं था, जिससे इनसे निपटने के लिए आगे की योजना बनाना मुश्किल हो गया।
इंडियाना विश्वविद्यालय के एक भू-विज्ञानी डगलस एडमंड्स ने कहा, हम जिस बड़े सवाल का जवाब ढूढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, वह यह है कि लोग नदी के तट (डेल्टा) पर किस तरह रहते हैं और तट की बाढ़ उन्हें किस तरह प्रभावित करती है।
यह पता लगाने के लिए एडमंड्स और उनके सहयोगियों ने दुनिया भर के 2174 तटों (डेल्टा) के बारे में पता लगाया। और हिसाब लगाया कि 39.9 करोड़ लोग तटों की सीमाओं के अंदर रहते हैं। उनमें से 1 करोड़ लोग विकासशील और कम विकसित देशों के हैं।
तीन-चौथाई से अधिक लोग केवल 10 नदी घाटियों में निवास करते हैं, जिनमें गंगा-ब्रह्मपुत्र शामिल हैं। 10.5 करोड़ लोग गंगा-ब्रह्मपुत्र और 4.5 करोड़ लोग नील नदी के डेल्टा में रहते हैं। डेल्टा शोधकर्ताओं ने पता लगाया कि पृथ्वी के द्रव्यमान का केवल 0.5 प्रतिशत भूमि पर कब्जा है, लेकिन यह ग्रह में रहने वाले लोगों की आबादी का लगभग पांच प्रतिशत का घर हैं।
एडमंड ने कहा कि हमें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि 100 साल के उष्णकटिबंधीय चक्रवात बाढ़ के मैदानों में रहने वाले लोगों की बड़ी संख्या वाले अधिकांश तटों (डेल्टा) का तलछट (सेडीमेंट) समाप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। उन्होंने कहा कि यह बढ़ते समुद्र स्तर और बड़े तूफानों के कारण हो रहा है, जो बहुत बुरी खबर है।
जब समुद्र का स्तर बढ़ जाता है, तो डेल्टा का आकार सिकुड़ने या तलछट से खाली जगह भर जाती है। लेकिन अधिकांश गाद और तलछट जो कभी कृषि भूमि को समृद्ध करते थे और समुद्र के ज्वार की वृद्धि के खिलाफ प्राकृतिक तौर पर सुरक्षा करते थे, अब लगभग सभी प्रमुख नदी प्रणालियों में बांधों के निर्माण से यह सब अवरुद्ध हो गया है।
एडमंड ने कहा इसका मतलब है कि तलछट के जमा होने से प्राकृतिक तरीके से समस्या का समाधान संभव नहीं है, यह देखते हुए कि समाधान के लिए अक्सर अन्य सामग्री द्वारा जगह को भर दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार जकार्ता का एक तिहाई हिस्सा, 3 करोड़ लोगों के घर सन 2050 तक डूब सकते हैं। एडमंड ने कहा कि तटीय बाढ़ से निपटने के लिए इस मामले में एकमात्र विकल्प जटिल इंजीनियरिंग उपाय है। (downtoearth.org.in)
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
रायपुर, 3 अक्टूबर। आखिरकार दस महीने बाद भाजपा पार्षद दल के नेता के रूप में सीनियर पार्षद सूर्यकांत राठौर का नाम घोषित कर दिया गया है। पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की राय पर राठौर को दोबारा नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी दी गई है।
रायपुर नगर निगम के सामान्य सभा की बैठक होनी है। सभापति प्रमोद दुबे ने नेता प्रतिपक्ष का नाम देने के लिए कहा था, लेकिन भाजपा पार्षदों में एक राय नहीं बन पा रही थी। पूर्व मंत्री राजेश मूणत, मीनल चौबे को पार्षद दल का नेता बनाना चाहते थे, जबकि सांसद सुनील सोनी सूर्यकांत राठौर को ही जिम्मेदारी देना चाहते थे।
खींचतान के चलते पिछले दस महीने से नेता प्रतिपक्ष का नाम तय नहीं हो पा रहा था। नगर निगम पार्षद दल में कांग्रेस का बहुमत है। पार्टी संगठन के हस्तक्षेप के बाद पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को नेता प्रतिपक्ष तय करने की जिम्मेदारी सौंपी गई और उनकी राय पर सूर्यकांत राठौर नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। राठौर दूसरी बार नेता प्रतिपक्ष बने है।
गांधी, 21वीं सदी का पर्यावरणविद -4
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर डाउन टू अर्थ द्वारा श्रृखंला प्रकाशित की जा रही है। इस कड़ी में प्रस्तुत है प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर गांधी का दृष्टिकोण
- John S Moolakkattu
दुनिया भर में पर्यावरणीय आंदोलन चल रहे हैं। ये आंदोलन बड़े पैमाने पर औद्योगिक उद्यमों और पूंजीवादी समाज के मूल्यों की आलोचना करने में लगे हुए हैं। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, दुनिया भर में जागरुकता भी बढ़ रही है। लोग अब यह महसूस करने लगे हैं कि जलवायु परिवर्तन का ज्यादातर दुष्प्रभाव ग्लोबल साउथ (एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरेबियाई, आदि देशों के निम्न-मध्य आय वर्ग वाले लोग) में रहने वाले गरीबों पर पड़ेगा। पर्यावरणीय आंदोलनों का सीधा संबंध गांधी या गांधीवाद से नहीं है। हालांकि, इस आंदोलन में जिन तरीकों को अपनाया जाता है और जो बहस होती है, उसमें अक्सर गांधीवादी तत्व शामिल होते हैं। एक उदाहरण मैक्सिको का जापातिस्ता विद्रोह है। ये विद्रोह सरकारी बलों के साथ हुए हिंसक टकराव के बाद, नागरिक प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। समाज को संगठित करने का इसका वैकल्पिक मॉडल स्वायत्तता, भागीदारी और सरकारी कार्यालय को सत्ता स्रोत के मुकाबले सेवा प्रदाता के रूप में देखने के सिद्धांतों पर आधारित है। जाहिर है, ये सिद्धांत गांधीवादी विचार से प्रेरित हैं।
भारत में अधिकांश पर्यावरणीय आंदोलन विकास के उन प्रतिमानों के जवाब में उभरकर सामने आए, जिसे देश ने आजादी के बाद अपनाया था। ये सभी आंदोलन आजीविका, भूमि, जल और पारिस्थितिक सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर केंद्रित हैं। इन आंदोलनों को लेकर उल्लेखनीय बात यह है कि इनमें से कई ने गांधीवादी तरीके अपनाए हैं। जैसे, सविनय अवज्ञा, तटीय रेत में खुद को दफना लेना, जल सत्याग्रह, लंबी पैदल यात्रा, भूख हड़ताल, राजनीतिक और सामुदायिक नेताओं की भागीदारी, अधिकारियों के पास आवेदन भेजना, वैज्ञानिकों और सरकारी अधिकारियों के साथ बातचीत और सर्वसम्मति बनाने के लिए ऑल पार्टी बैठकों का आयोजन। इस तरह के आंदोलनों के कई नेता सामाजिक परिवर्तन पर गांधी और उनके दृष्टिकोण से प्रेरित थे। पर्यावरणीय आंदोलन अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लोगों की प्रतिक्रिया के रूप में उभर कर सामने आए। लोग मिट्टी, पानी और वन जैसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए आगे आए। आर्थिक वैश्वीकरण के बाद, जिसमें कॉरपोरेट्स द्वारा अत्यधिक खनन कार्य किया जा रहा है, ऐसे आंदोलनों की तीव्रता बढ़ी। पश्चिम में शहरी मध्य वर्ग पर्यावरण आंदोलनों का नेतृत्व करता है। लेकिन भारत में ऐसे आंदोलन में शामिल लोग गरीब होते हैं और उनकी लड़ाई अस्तित्व और आजीविका के मुद्दों पर केंद्रित होती है। हालांकि, इस तरह के आंदोलनों के समर्थन में प्राय: समाज के सभी वर्ग के लोग भी आगे आते हैं।
गांधी को अक्सर एक पर्यावरणविद माना जाता रहा है, हालांकि उन्होंने कभी भी पारिस्थितिकी और पर्यावरण जैसे शब्दों का उपयोग नहीं किया। ब्रिटिश काल में भी जंगल सत्याग्रह आम थे। हालांकि, हमारे पास ऐसे सबूत नहीं हैं, जिससे यह बताया जा सके कि क्या गांधी वाकई ऐसे आंदोलनों को लेकर चिंतित थे? पारिस्थितिकी विज्ञानी अर्ने नेस ने अपने पारिस्थितिकी सिद्धांतों को विकसित करने से पहले गांधी का अध्ययन किया था। गांधी ने कभी भी विकास शब्द का इस्तेमाल नहीं किया और उनके जीवन दृष्टिकोण में कार्बन पदचिह्न का स्थान बहुत ही कम था। उपभोक्तावाद के बजाय बुनियादी जरूरतों को सर्वोच्चता मिली, जो कइयों की नजर में प्रगति का प्रतीक है। यह एक गैर-भौतिकवादी और गैर-शोषक विश्वदृष्टि पर आधारित है, जो मनुष्य और प्रकृति के बीच परस्पर आश्रित संबंध को दर्शाती है। गांधी का स्वदेशी विचार भी प्रकृति के खिलाफ आक्रामक हुए बिना, स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों के उपयोग का सुझाव देता है। उन्होंने आधुनिक सभ्यता, औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की निंदा की। गांधी ने कृषि और कुटीर उद्योगों पर आधारित एक ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था का आह्वान किया। भारत के लिए गांधी की दृष्टि प्राकृतिक संसाधनों के समझदारी भरे उपयोग पर आधारित है, न कि प्रकृति, जंगलों, नदियों की सुंदरता के विनाश पर। उनका प्रसिद्ध कथन “पृथ्वी के पास सभी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन हर किसी के लालच को नहीं” दुनिया भर के पर्यावरणीय आंदोलनों के लिए एक उपयोगी नारा है। पर्यावरण से संबंधित गांधीवादी विचारों को उनके शिष्य जेसी कुमारप्पा के काम में और अधिक गहराई से देखा जा सकता है।
पर्यावरणीय आंदोलनों के रूप में हमने चिपको आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन और साइलेंट वैली आंदोलन देखा है। चिपको आंदोलन को विशेष रूप से अपने गांधीवादी जुड़ाव के लिए जाना जाता है। गांधी से अधिक, गांधी की शिष्या मीरा बहन और सरला बहन ने चिपको आंदोलन के नेताओं को प्रभावित किया था। इसी तरह, गांधीवादी विचार, उपयुक्त तकनीक और राजनीतिक-आर्थिक शक्ति का समान इस्तेमाल नर्मदा अभियान में देखा गया। जहां चिपको आंदोलन में स्थानीय समुदाय, महिलाएं और स्थानीय कार्यकर्ता शामिल थे, वहीं नर्मदा बचाओ आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों की मदद से आदिवासी लोग कर रहे थे। बाबा आमटे और मेधा पाटकर जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेताओं ने साफ कहा है कि उन्हें मुख्य रूप से गांधी से प्रेरणा मिली है।
साइलेंट वैली बांध का विरोध उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों की सुरक्षा, पारिस्थितिक संतुलन और विनाशकारी विकास के विरोध जैसे विषयों पर आधारित था। इस आंदोलन का अहिंसक चरित्र भी उल्लेखनीय था। वंदना शिवा गांधीवादी पर्यावरणवाद के सबसे प्रमुख पैरोकारों में से एक हैं। उन्होंने एक भौतिक विज्ञानी और एक पर्यावरणविद (ईको-फेमिनिस्ट) के रूप में स्थिरता, आत्मनिर्णय, महिलाओं के अधिकारों और पर्यावरण न्याय के लिए काम किया है। उन्होंने जैव विविधता और बीज संप्रभुता की रक्षा के लिए नवधान्या नाम से एक नव-गांधीवादी पर्यावरण आंदोलन शुरू किया है। उन्होंने बीज सत्याग्रह की अवधारणा को गांधीवादी सत्याग्रह के नए रूप में लोकप्रिय बनाया है।
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कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के खिलाफ हुए आंदोलन ने भी अहिंसक दृष्टिकोण को अपनाया। एसपी उदयकुमार इस आंदोलन के नेता थे। वह मशहूर परमाणु-विरोधी कार्यकर्ता और शांति शोधकर्ता हैं। चिल्का में हुए प्रदर्शन में प्रदर्शनकारी झील के स्वामित्व, आजीविका के खात्मे, कॉर्पोरेट द्वारा संसाधनों के व्यावसयिक उपयोग को लेकर सवाल उठा रहे थे। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में मछुआरों की भी भागीदारी देखी गई थी। राष्ट्रीय मिसाइल परीक्षण रेंज (नेशनल मिसाइल टेस्टिंग रेंज) के खिलाफ बालीपाल आंदोलन में भी प्रतिरोध के लिए अहिंसक रास्ता अपनाया गया था। लोगों ने सरकार के साथ असहयोग करने का फैसला किया। ग्रामीणों ने सरकार को कर और ऋण देने से इनकार कर दिया और कला को विरोध की अभिव्यक्ति के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित उस निर्णय प्रक्रिया को चुनौती दी, जो स्थानीय विनाश की कीमत पर राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को प्राथमिकता देती है। प्लाचीमाडा आंदोलन में भी गांधीवादियों ने अन्य वैचारिक धाराओं के लोगों के साथ काम किया। सभी जगह एक बात आम थी और वो यह कि स्थानीय संसाधनों के उपयोग को लेकर जनता के पास आत्मनिर्णय का अधिकार हो और इस मामले में पंचायती राज संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण व सर्वोपरि हो।
अंत में कहा जा सकता है कि देश के पर्यावरणीय आंदोलनों में एक गांधीवादी विचार समाहित है। जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ता गया, ये विचार उसमें समाहित होता चला गया। हालांकि, इस तरह के आंदोलनों को मूलत: जनसंघर्ष से ही प्रेरणा मिलती रही है। अस्तित्व और आजीविका की रक्षा के लिए होने वाले जनसंघर्ष ने ही आंदोलनों को बनाया, बढ़ाया है। दूसरा, कई आंदोलनों के नेताओं ने गांधी और उनके तरीकों को अपनाने की बात स्वीकारी है। तीसरी बात, आंदोलनों के लिए विदेशी फंडिंग की बजाय खुद के संसाधनों पर उनकी निर्भरता भी गांधीवादी दृष्टिकोण को दर्शाती है। चौथा, आंदोलन के दौरान होने वाली अर्थव्यवस्था और राजनीति से संबंधित बहस का चरित्र भी गांधीवादी था।
हम कह सकते हैं कि स्थानीय संप्रभुता और आजीविका संरक्षण, वैकल्पिक विकास, स्वदेशी ज्ञान को मान्यता, पंचायती राज संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण भूमिका के साथ विकेंद्रीकरण और आत्मनिर्भरता जैसी अवधारणाओं के निर्माण के लिए अक्सर पर्यावरणीय आंदोलनों में वामपंथ और गांधीवादी विचारों का मिश्रण समाहित होता है। पर्यावरण संकट की भयावहता को देखते हुए, भारत और दुनिया भर में यह स्वीकार किया जाने लगा है कि केवल राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में आमूलचूल परिवर्तन से ही हम इस मुद्दे का हल निकाल सकेंगे। ये मूल्यों में बदलाव को न्यायसंगत बनाता है। आज अत्यधिक उपभोग के बजाय, गुणवत्तापूर्ण जीवन पर केंद्रित एक उत्तर-भौतिकवादी समाज की तलाश है, जो गांधीवादी विचार से प्रेरित है। कुछ हद तक यह हिंदू पारिस्थितिक दृष्टि भी दर्शाता है। इन सभी आंदोलनों में प्रभावित गरीबों की स्वयं संगठित होने की क्षमता पर भी जोर दिया गया था।
(लेखक सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ केरल के डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशन में प्रोफेसर हैं। वह गांधी शांति प्रतिष्ठान से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका “गांधी मार्ग” के संपादक भी हैं)(downtoearth)
गांधी, 21वीं सदी का पर्यावरणविद -3
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर डाउन टू अर्थ द्वारा श्रृखंला प्रकाशित की जा रही है। इस कड़ी में प्रस्तुत है पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर गांधी दर्शन पर विशेष लेख
- Sasikala AS
भारत के हालिया बौद्धिक इतिहास में संभवत: गांधी ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी बातों का सबसे गलत अर्थ निकाला गया है और उन्हें गलत समझा गया। वह एक ही समय पर परिवर्तनवादी और रूढ़ीवादी दोनों थे जिन्होंने स्वतंत्रता और त्याग पर गहराई से चिंतन किया और लिखा। वह एक भविष्यवक्ता थे जिनका इस बात को लेकर दृष्टिकोण स्पष्ट था कि त्याग के जरिए आजादी किस तरह हासिल की जाएगी। इसी के साथ वह एक रणनीतिज्ञ भी थे जिनमें अहिंसा और सत्याग्रह की शक्ति से पूरे िवश्व को झकझोर देने की क्षमता थी। पिछले कुछ दशकों के दौरान शिक्षा जगत, खासतौर पर पर्यावरण और सतत विकास से संबंधित क्षेत्रों में हमें पारिस्थितिकी से जुड़ी समस्याओं का समाधान करने के लिए गांधीवादी सिद्धांतों के संबंध में गंभीर अध्ययन देखने को मिलते हैं।
20वीं सदी की शुरुआत दुनियाभर में पर्यावरण को लेकर जागरुकता से हुई थी। प्रत्येक आंदोलन के अलग राजनीतिक विचार और सक्रियता थी, तथापि इन सभी आंदोलनों को आपस में जोड़ने वाली कड़ी अहिंसा और सत्याग्रह की गांधीवादी विचारधारा थी। रामचंद्र गुहा जैसे इतिहासकार भारतीय पर्यावरण आंदोलनों पर तीन अलग-अलग विचारधाराओं का प्रभाव देखते हैं अर्थात आंदोलनकारी गांधीवादी, पर्यावरणविद मार्क्सवादी और वैकल्पिक प्रौद्योगिकीविद। इन आंदोलनों ने प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल की गांधीवादी विरासत को आगे बढ़ाया है।
जैसा कि हम जानते हैं, पर्यावरण सुरक्षा गांधीवादी कार्यक्रमों का प्रत्यक्ष एजेंडा नहीं था। लेकिन उनके अधिकांश विचारों को सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण से जोड़ा जा सकता है। हरित क्रांति, गहन पर्यावरण आंदोलन आदि ने गांधीवादी विचारधारा के प्रति कृतज्ञता स्वीकार की। आश्रम संकल्प (जिन्हें गांधीजी के ग्यारह संकल्पों के रूप में जाना जाता है) ही वे सिद्धांत हैं जिन्होंने गांधी की पर्यावरण संबंधी विचारधारा की नींव रखी थी। ये ग्यारह सिद्धांत हैं, सच्चाई (जिसे गांधी ने ईश्वर के बराबर माना), अहिंसा (पूरे ब्रह्मांड पर लागू है), संग्रह का निषेध (जिससे निजी संपत्ति और पारिस्थितिकी के नुकसान में भी कमी आ सकती है), चोरी न करना (किसी भी संसाधन का अधिक इस्तेमाल दूसरों से चोरी के समान है), परिश्रम करना (शारीरिक परिश्रम और इसकी सुंदरता), ब्रह्मचर्य (सनातन सत्य ब्रह्म की ओर अग्रसर होना), निर्भय होना, स्वाद पर नियंत्रण (शाकाहारी बनना और इसका महत्व), छुआछूत को मिटाना, स्वदेशी (आर्थिक और पारिस्थितिकीय स्वावलंबन) और सर्वधर्म समभाव (धार्मिक सहिष्णुता)। अहिंसा, चोरी न करना, संग्रह का निषेध, परिश्रम करना, स्वाद पर नियंत्रण और स्वदेशी जैसे सिद्धांतों का पर्यावरण को बचाने में व्यापक इस्तेमाल किया जा सकता है।
गांधीवादी पर्यावरणशास्त्र का दूसरा पहलू उनके रचनात्मक कार्यक्रम हैं। गांधी ने इन कार्यक्रमों को किसी भी सामाजिक कार्य का आधार माना है। उन्होंने बेहतर भारत के निर्माण के लिए अट्ठारह रचनात्मक कार्यक्रमों की परिकल्पना की और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के लिए इनका पालन करना अनिवार्य बनाया। चाहे परिस्थितियां कठिन ही क्यों न हों। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक और आर्थिक समानता, सामाजिक कुरीतियां समाप्त करना, महिलाओं का कल्याण, सभी के लिए शिक्षा के अवसर और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना था। बाद में गांधी की आध्यात्मिक विरासत को आगे ले जाने वाले विनोबा भावे ने गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों में तीन और कार्यक्रम जोड़ दिए। विनोबा भावे द्वारा शामिल किए गए तीन सिद्धांतों में से एक सिद्धांत मशहूर “मवेशी संरक्षण” आंदोलन है, लेकिन गांधी ने अपने लेखों में यह स्पष्ट किया है कि “यह गाय बचाने के लिए मुस्लिम को मारना धार्मिक व्यवहार के विपरीत है।” गाय बचाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों के बीच होने वाली लड़ाई को देखने के बाद उन्होंने यह भी कहा कि “हमें यह शपथ लेनी चाहिए कि गाय को बचाते समय हम मुसलमानों के प्रति द्वेष नहीं रखेंगे और उनसे नाराज नहीं होंगे।” यदि हम आजादी के बाद इन रचनात्मक कार्यक्रमों पर उचित ध्यान देते तो भारत की आर्थिक और पारिस्थितिकीय स्थिति अलग होती।
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हरित गांधीवादी के नाम से विख्यात जेसी कुमारप्पा वह व्यक्ति हैं जिन्होंने गांधी के आर्थिक विचारों को गांधीवादी अर्थशास्त्र का रूप दिया। जहां एक ओर परंपरागत अर्थशास्त्र बड़े पैमाने पर उत्पादन और लाभ अधिकतम करने पर जोर देता है, वहीं दूसरी ओर गांधीवादी अर्थशास्त्र छोटे पैमाने पर उत्पादन और पर्यावरण को बनाए रखने पर बल देता है। जहां परंपरागत अर्थशास्त्र पूंजी गहन है, वहीं गांधीवादी अर्थशास्त्र श्रम गहन है। कुमारप्पा ने गांधी के अर्थव्यवस्था संबंधी विचारों को मातृ अर्थव्यवस्था या सेवा अर्थव्यवस्था के समान माना है क्योंकि यह सभी के लिए आर्थिक समानता को बढ़ावा देते हैं।
21वीं सदी का ध्यान सतत विकास पर है। सतत विकास का अर्थ भावी पीढ़ियों की क्षमताओं को नुकसान पहुंचाए बिना वर्तमान पीढ़ी का विकास करना है। यद्यपि गांधी सतत विकास की अवधारणा से अपरिचित थे, तथापि उनके रचनात्मक कार्यक्रम प्रकृति और प्राकृतिक वातावरण को नुकसान पहुंचाए बिना ऐसे विकास का प्रथम खाका खींचते हैं। सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की परिकल्पना के बाद गांधी गरीबी, असमानता और अन्याय से मुक्त समाज का सपना देते हैं। गांधी इसे सर्वोदय समाज कहते हैं जहां गरीब से गरीब आदमी का विकास सुनिश्चित हो सके। सर्वोदय की अवधारणा उन्होंने जॉन रस्किन से ली थी जिसके जरिए गांधी ने समाज को वर्ग, जाति और लैंगिक विभाजनों से मुक्त करने की कोशिश की। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में मशहूर फीनिक्स बस्ती में इस अवधारणा का प्रयोग किया और उनके सभी आश्रम इसकी व्यवहारिक प्रयोगशाला थे। दुर्भाग्यवश सर्वोदय के उद्देश्य अर्थात व्यक्तिगत स्वतंत्रता, स्वावलंबन, धार्मिक सौहार्द, आर्थिक समानता और परिश्रम का सम्मान लोकतंत्र में अब भी सपना है।
यद्यपि परंपरागत धार्मिक विचारों का पुनर्निर्माण आधुनिक समाज की प्रमुख विशेषता है तथापि धार्मिक संघर्ष वर्तमान विश्व के लिए कोई नई चीज नहीं है। हाल के अध्ययन दर्शाते हैं कि धार्मिक दृष्टि से असहिष्णु देशों की सूची में भारत का चौथा स्थान है। सभी धर्मों के सकारात्मक तत्वों को समझना और धार्मिक सीखों का सम्मिलन आज के समय की जरूरत है। गांधी के आश्रम संकल्प सर्वधर्म समभाव सभी धर्मों की समानता को बढ़ावा देते हैं। गांधी ने समझाया कि आत्मा तो एक ही है लेकिन वह कई शरीरों में चेतना का संचार करती है। हम शरीर कम नहीं कर सकते, फिर भी आत्मा की एकता को स्वीकार करते हैं। पेड़ का भी एक ही तना होता है लेकिन उसकी कई सारी शाखाएं और पत्तियां होती हैं, इसी तरह एक ही धर्म सत्य है लेकिन जैसे-जैसे वह मनुष्य रूपी माध्यम से गुजरता है, उसके कई रूप हो जाते हैं।
विश्व शांति सतत विकास के अहम घटकों में एक है। पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए शांति का होना अनिवार्य है और आमतौर पर इसे “युद्ध से मुक्ति और न्याय की उपस्थिति” के रूप में परिभाषित किया जाता है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया एक और परमाणु विस्फोट और विनाश से डरी हुई है। यदि ऐसा होता है तो पूरी मानवता का खात्मा हो सकता है। गहन पारिस्थितिकी के जनक अर्ने नेस एक ऐसी असैन्य सुरक्षा व्यवस्था का विचार प्रस्तुत करते हैं जो केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही संभव है। उनके अनुसार, प्रतिस्पर्धी और अनुचित विश्व में हम तब तक असैन्य सुरक्षा व्यवस्था के बारे में नहीं सोच सकते जब तक हम लोगों को युद्ध और सैन्य अभियानों के दुष्प्रभावों के बारे में शिक्षित नहीं करते। नेस असैन्य सुरक्षा की प्रभावी तकनीकों के रूप में अहिंसात्मक विरोध के गांधीवादी सिद्धांत का सुझाव देते हैं। संक्षेप में कहें तो गांधी के पर्यावरणीय और आर्थिक सिद्धांतों को एक वाक्य में परिभाषित नहीं किया जा सकता। यह उनकी अपनी सामान्य जीवनशैली से शुरू होता है और उन सिद्धांतों से होकर गुजरता है जो उन्होंने अपने जीवन में अपनाए। यह रचनात्मक कार्यक्रमों और सर्वोदय विचारधारा पर आधारित नए विश्व के उनके दृष्टिकोण से शुरू होकर असैन्य, अहिंसात्मक सुरक्षा पर खत्म होता है जो आज की जरूरत है।
(लेखक विशाखापट्टनम स्थित गीतम विश्वविद्यालय के गांधी अध्ययन केंद्र में सहायक प्रोफेसर हैं)(downtoearth)
गांधी, 21वीं सदी का पर्यावरणविद -2
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर डाउन टू अर्थ की ओर से एक श्रृखंला प्रकाशित की जा रही है। इस कड़ी में प्रस्तुत है गांधी और टैगोर के विचारों की प्रासंगिकता पर विशेष लेख
- Ashim Srivastava
आधुनिक राजनीति विचार और व्यवहार में दूरियां बढ़ने से मौसम बदलने, तापमान बढ़ने, नदी सूखने, पेड़ कटने, प्रजातियों की विलुप्ति अथवा संसाधनों के खत्म होने का राजनीतिक विचारधारा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। दूसरी बड़ी कमी प्रकृति और मानव स्वभाव पर गहरा संदेह है। आमतौर पर सभी लोग सोचते हैं कि प्रकृति सामान्यत: और मानव स्वभाव विशेषत: संदेहजनक है। विचारकों ने इस तथ्य पर विश्वास प्रकट किया है जिनमें शारलेमेन से लेकर चर्चिल तक और फ्रांसिस बेकन से लेकर फ्रायड तक शामिल हैं। ऐसे में विख्यात नैतिकतावादी इमैनुएल कांट की कही पंक्ति याद आती है, “मानवता की टेढ़ी लकड़ी से कभी कोई सीधी चीज नहीं बनी है।” (दूसरी ओर इन विचारों के बीच अपवाद भी दिखाई देते हैं जो आमतौर पर औपचारिक राजनीतिक विचारों के बाहर होते हैं। उदाहरण के लिए, आइंस्टाइन की टिप्पणी “ईश्वर सूक्ष्म है, लेकिन वह बुरा चाहने वाला नहीं है” प्रसिद्ध है। वहीं आइंस्टाइन से बहुत पहले, थॉमस ब्राउन ने लिखा था, “सभी चीजें कृत्रिम हैं लेकिन प्रकृति ईश्वर की कला है।”)
क्या हम आधुनिक राजनीतिक विचारों की दिशा से हटकर कुछ सोच सकते हैं? एक साधारण किंतु प्रभावी मामले पर विचार करते हैं जो आजादी का आधुनिक विचार है। आइजिया बर्लिन के बाद से यह आम राय उभरकर आई कि आजादी फायदे और नुकसान का खेल है जिसका नियम है कि हमारा फायदा तुम्हारे नुकसान की कीमत पर ही हो सकता है। अब तक स्वतंत्रता को आजादी से जोड़कर देखा जाता रहा है। कुल मिलाकर यह मान सकते हैं कि यह ताकत का दूसरा रूप है जो फायदे-नुकसान के समीकरण में सामान्य-सी बात है।
संभवत: आज के समय में बेशक यह सार्वभौमिक सत्य न हो लेकिन व्यापक रूप से स्वीकृत सत्य अवश्य है। मान लीजिए हम किसी किसान के घर जाते हैं और उसे उसके ही घर में बंधक बनाकर उसके खेतों पर कब्जा कर लेते हैं। हम शक्तिशाली हैं और वह शक्तिहीन है। हम खुद को शक्तिशाली राष्ट्र की तरह खुद को स्वतंत्र मान लेते हैं। लेकिन क्या किसी पर वर्चस्व स्थापित करना स्वतंत्रता है? क्या वास्तव में दोनों में से कोई भी पक्ष स्वतंत्र है? क्या हमें इस बात की चिंता नहीं होगी कि अगर किसान आजाद हो गया तो वह हमारे साथ क्या करेगा? एक ओर किसान शारीरिक रूप से बंधक है तो दूसरी ओर हम मानसिक रूप से बंधक बन जाते हैं। वर्चस्व की मूल भावना के कारण सभी पक्ष अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं।
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इस उदाहरण में सभी को स्वतंत्र करने का मतलब है किसान को आजादी दे देना। इस हिसाब से स्वतंत्रता खतरनाक चीज है। इससे हमारी जिंदगी खतरे में पड़ सकती है। बारीकी से देखें तो स्वतंत्रता आजादी के बिल्कुल विपरीत है जो यह साबित करता है कि यह स्वयं बढ़ने वाली घटना है। मेरी ताकत की कीमत तुम्हारी ताकत है। लेकिन स्वतंत्रता का मूल तत्व यह नहीं है। यह सामने वाले की स्वतंत्रता के साथ बढ़ती है। लोग इस बहस को आगे बढ़ाते हुए कह सकते हैं कि अपनी आजादी दूसरों पर थोपना है तो स्वतंत्रता दूसरे की मर्जी को अपनाना है। आश्चर्यजनक रूप से, आज के आधुनिक उदार विश्व में स्वतंत्रता और आजादी के वर्चस्ववादी विचारों के विपरीत, यह विषय जितना भ्रामक है उतना ही स्पष्ट भी है। रबींद्रनाथ टैगोर ने इस तथ्य को सहजता से स्वीकार किया था। साधना नामक उनके कम पढ़े गए लेखों में उन्होंने लिखा “एक मां बच्चों की सेवा में जीवन गुजार देती है, ऐसे में असली स्वतंत्रता काम करने से आजादी नहीं, बल्कि काम करने की आजादी है जो प्यार से किए गए काम से ही मिलती है।” आमतौर पर कितनी बार हम प्यार से की गई सेवा को सीधे स्वतंत्रता से जोड़कर देखते हैं? निश्चित तौर पर लोकतंत्र में जनता से जुड़े मामलों में प्यार को महत्व नहीं दिया जाता। यही कारण है कि स्वराज को लोकतंत्र का पर्याय मानना खतरनाक हो सकता है।
गांधी ने हिंद स्वराज में संसद को गुलामी का प्रतीक कहा है। इससे हमें स्वराज के मूल भाव का पता चलता है। गांधी ने हिंद स्वराज में स्वराज की परिकल्पना “स्व-शासन” के रूप में की है। लेकिन बारीकी से देखने पर गांधी और टैगोर दोनों स्पष्ट थे कि स्वराज को केवल साम्राज्यवाद के विरुद्ध आजादी की लड़ाई से जोड़कर देखा नहीं जा सकता। इसमें केवल साम्राज्यवादी ताकत को उखाड़ कर फेंकना शामिल नहीं है। स्व-शासन समाज की नि:स्वार्थ सेवा की आध्यात्मिक क्रिया का राजनीतिक और मानसिक प्रतिफल है। गांधी ने सर्वोदय की बात की जिसका मतलब बहुसंख्यक का कल्याण नहीं है बल्कि प्रत्येक व्यक्ति में जागरुकता का सृजन और कल्याण है। इस प्रकार जो व्यक्ति समाज के लिए कुछ नहीं करता, वह अपनी स्वतंत्रता खो देता है। चाहे फिर वह आधुनिक उदार विचारधारा से प्रभावित असत्य का प्रचार कर बदले में आजादी हासिल ही क्यों न कर ले।
टैगोर ने साधना में बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि स्वतंत्रता अधिकार (अहंकार की तुष्टि) से ज्यादा प्रेम के निकट है। यह ऐसा तथ्य है जो आधुनिक उदार विचारधारा में कहीं नहीं मिलता। टैगोर निश्चित रूप से देशभक्त थे, लेकिन उन्होंने राष्ट्रवाद के विचार को पूरी तरह नकार दिया था। उनके विचार में यह समाज की नि:स्वार्थ सेवा के विपरीत केवल सामूहिक अहंकार का प्रदर्शन है। यही नि:स्वार्थ सेवा मानव स्वतंत्रता की अप्रत्यक्ष गारंटी है। उनके समय के कई स्वतंत्रता सेनानी स्वराज की प्रसिद्ध परिभाषा समझते थे। उन्होंने अपने और गांधी के करीबी रहे चार्ल्स एंड्रयूज को इस बारे जो कुछ लिखा वह इस प्रकार है, “स्वराज क्या है?”
यह माया है। यह कोहरा है जो छंट जाएगा और आत्मा पर कोई निशान भी नहीं छोड़ेगा। हालांकि हम पश्चिम द्वारा सिखाए गए शब्दजाल में फंस सकते हैं फिर भी स्वराज हमारा विषय नहीं है। हमारी लड़ाई आध्यात्मिक है, मानव जाति के लिए है। हमें मानव को उस जाल से मुक्त कराना है जो उसने अपने चारों तरफ बुन रखा है और यह जाल है राष्ट्रीय अहंकार के संगठनों का। इस चिड़िया को यह समझाना होगा कि आसमान की स्वतंत्रता और उसकी ऊंचाई उसके घोंसले से ज्यादा है। यदि हम ताकतवर, हथियारबंद और अमीर समाज का त्याग करके दुनिया को अनश्वर आत्मा की शक्ति से अवगत कराएं तो सद्भावना का भक्षण करने वाले दानव का खयाली महल ढह जाएगा और व्यक्ति को अपना स्वराज मिल जाएगा।”
वह लिखते हैं, “हम पूर्व में रहने वाले भूखे, गरीब, फटेहाल लोग समस्त मानवता की स्वतंत्रता हासिल करके रहेंगे। हमारी भाषा में राष्ट्र का कोई मतलब नहीं है। अगर हम दूसरों से यह शब्द उधार लेंगे तो वह हमारे लिए कभी उपयुक्त नहीं होगा। यदि हम ईश्वर के साथ मिलकर काम करें तो हमें कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता। मैं पश्चिमी मुल्कों में घूमा हूं, लेकिन मैं इसके मोहजाल में नहीं फंसा।
यह अंधेरे के हंगामे हमारे लिए नहीं हैं। हमारे लिए तो सुनहरी, उजली सुबह है।”
गांधी और टैगोर आधुनिक युग में विशेष महत्व रखते हैं जो यह समझते थे कि स्वतंत्रता मानवता के लिए आध्यात्मिक और पर्यावरणीय क्षमता रखती है। यह आजादी की तरह नहीं है जिसका राजनीतिक दृष्टिकोण है। इसमें उनके विचार को आधुनिक धारणाओं से अलग संपूर्ण ब्रह्मांड के रूप में देखना चाहिए जिसमें प्रकृति मानवता की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की मूक दर्शक बन गई है। टैगोर एक के बाद एक कहानी पर जोर देते हैं जिसका मूल भाव यह है कि मानव की स्वतंत्रता के लिए प्रकृति से निकटता अनिवार्य है। अगर इस तथ्य को दरकिनार कर दिया जाए तो पर्यावरण से दूरी, जो आधुनिक विश्व को अपनी चपेट में ले रही है, मानवता को उस स्वतंत्रता से दूर कर देगी जो हर व्यक्ति के लिए जरूरी है।
गांधी ब्रिटिश राज के उतने विरोधी नहीं थे, जितना वह भारत में आधुनिक साम्राज्यवाद के अनुचित प्रभाव के विरोधी थे। उन्होंने हिंद स्वराज में लिखा है “भारत को अंग्रेजों के पैरों तले नहीं बल्कि आधुनिक सभ्यता के नीचे कुचला जा रहा है।” देश इस दानव के बोझ से दबा जा रहा है। गांधी ने “अंग्रेजों के बिना अंग्रेजी राज” पर चेतावनी देते हुए कहा था कि अब भी इससे बचने का मौका है लेकिन दिन-ब-दिन राह कठिन होती जाएगी। यह मान लेना मूर्खता होगी कि एक भारतीय शासन अमेरिकी शासन से बेहतर होगा। दरिद्र भारत स्वतंत्र हो सकता है, लेकिन अनैतिकता से समृद्ध हुए भारत के लिए अपनी स्वतंत्रता हासिल करना मुश्किल होगा... पैसा व्यक्ति को असहाय बना देता है।
ऐसा प्रतीत होता है कि सहज ज्ञान आज के विश्व की संचालन शक्तियों के बीच अलग-थलग पड़ गया है। “बिना अमेरिकियों के अमेरिकी राज” आज की हकीकत बन गई है। इस बेचैन विश्व में कॉर्पोरेट तंत्र (निगरानी पूंजीवाद का कॉर्पोरेट अधिनायकवाद) ने लोकतंत्र का मुखौटा पहन रखा है। इस व्यवस्था में केवल कुछ शक्तिशाली लोग ही मुकाबला कर पाते हैं और बाकी को मुकाबले से बाहर कर दिया जाता है। इन सब कारणों से गांधी और टैगोर का जीवन और विचार पहले से अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। उनकी दूरदर्शिता का ही नतीजा है कि उन्होंने प्राकृतिक स्वराज का खाका पहले ही खींच लिया था। जल्द ही यह रूपरेखा भारत ही नहीं बल्कि पूरी मानवता की रक्षा के लिए पारिस्थितिकीय अनिवार्यता साबित हो सकती है।(downtoearth)
गांधी, 21वीं सदी का पर्यावरणविद -1
गांधी ने टिकाऊ विकास शब्दावली गढ़े जाने से आधी सदी से अधिक समय पहले ही पर्यावरणीय संकट की आशंका जाहिर कर दी थी
- Rajni Bakshi
2007 में ब्रिटिश अर्थशास्त्री निकोलस स्टर्न जलवायु संकट पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत को लेकर व्यापारियों को सचेत करने मुंबई आए थे। स्टर्न के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें उन्होंने भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों में से एक महिंद्रा समूह के चेयरमैन आनंद महिंद्रा के साथ मंच साझा किया। स्टर्न की गंभीर भविष्यवाणियों के जवाब में महिंद्रा ने सबसे पहले बताया कि महात्मा गांधी 70 साल से भी ज्यादा समय पहले जान गए थे कि अगर पूरी दुनिया पश्चिमी देशों की तरह रहने लगी, तो इसके लिए एक धरती पर्याप्त नहीं होगी। महिंद्रा ने एक कहानी सुनाई, जो उन्होंने गोवा के किसी गांव में सुनी थी।
एक समय वह गांव सबसे स्वादिष्ट तरबूज उगाने के लिए मशहूर था। यहां एक रिवाज था कि बच्चे किसी भी खेत से मुफ्त में तरबूज खा सकते थे। इसके बदले में उन्हें बस इतना करना होता था कि वे सबसे स्वादिष्ट तरबूज के बीज को बचाएं और उसे उत्पादक को दे दें। किसान तब केवल उसी तरबूज के बीज बोते थे, जो बच्चों को सबसे मीठे और स्वादिष्ट लगते थे। गांव के कुछ लोगों ने फैसला किया कि जब उन्हें इन बढ़िया तरबूजों की इतनी अच्छी कीमत मिल रही है, तो भला बच्चों को मुफ्त में देकर “बर्बाद” क्यों किया जाए। फिर जैसे-जैसे बच्चों को मुफ्त तरबूज देने का रिवाज कम होता गया, वैसे-वैसे उनकी गुणवत्ता में कमी आने लगी। जल्द गांव में अच्छे तरबूजों की पैदावार बंद हो गई।
कुछ लोग इसे एक ऐसी कोरी कहानी के रूप में देख सकते हैं, जो झूठी अर्थव्यवस्था के संकटों को दिखाती है। दरअसल, बच्चों को मुफ्त में तरबूज देने को “बर्बादी” मानना एक गलती थी, जबकि असल मायनों में वह गुणवत्ता नियंत्रण के लिहाज से एक अहम निवेश था। समुदाय ने बच्चों के तरबूज के आनंद को “अमूल्य” माना होता तो क्या होता?
अमूल्य पर ध्यान केंद्रित करना ही महात्मा गांधी का महत्वपूर्ण व आज का सबसे जरूरी नजरिया है। यहां अमूल्य से मतलब दुर्लभ और महंगी चीजों से नहीं है, जो किसी की पहुंच से बाहर हो। इसका मतलब यह है कि इसे बाजार के किसी भी रूप से बाहर रखा गया है, जिसे कमोडिटी में नहीं बदला जा सकता है और न ही आपूर्ति और मांग के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। “अमूल्य” की धारणा पर जोर देना कई समकालीन पर्यावरण कार्यकर्ताओं को सहज-ज्ञान के विपरीत लग सकता है। पिछले कुछ दशकों में पारिस्थितिकी प्रणालियों के मूल्यांकन के लिए बहुत-सी कोशिशें की गई हैं। इसके पीछे यह उम्मीद लगाई जाती रही है कि इससे पारिस्थितिकी प्रणाली सेवाओं को लेकर मानकों में बदलाव होंगे, जिन्हें अर्थशास्त्र मान्यता देता है। इससे उन्हें बचाने में मदद मिलेगी। पारिस्थितिकी प्रणालियों और जैव विविधता के अर्थशास्त्र पर युनाइटेड नेशंस एनवायरमेंट प्रोग्राम (यूएनईपी) की रिपोर्ट के साथ ही ये प्रयास काफी महत्वपूर्ण हैं। वहीं, दूसरी ओर, यह बिल्कुल साफ है कि पर्यावरण संबंधी संकट की कहानी को वास्तविक रूप से उस ढांचे में नहीं ढाला जा सकता है, जिसे अर्थशास्त्र समझता है। नतीजतन, व्यापक जवाब हासिल करने के लिहाज से गांधी महत्वपूर्ण हैं।
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विडंबना यह है कि 2019 में कई लोग पूछेंगे कि यह कैसे हो सकता है? आखिरकार, उन्हें गर्व से यह महसूस कराया गया कि आजादी के बाद भारत ने गांधी के कदमों का पालन नहीं किया, जिसकी वे कल्पना करते थे कि हम सभी चरखा कातने वाले होंगे, केवल दो या तीन सेट कपड़ा पहनकर, सिर्फ लालटेन की मदद से रात गुजारेंगे और इसी तरह रहेंगे। गांधीवादी सादगी का मतलब मुश्किल भरे हालात हैं, इस बात को गलत तरीके से जोड़ा गया है। जबकि विकास की तुलना अधिक मांग और उन्हें पूरा करने के साधनों से की गई है। इस तरह, सेवाग्राम में गांधी की मशहूर मिट्टी की झोपड़ी में आने वाले कई आगंतुक यह जानकर चौंक जाते हैं कि इसके छोटे कमरों में से एक में मालिश की एक मेज है, जो गांधी की प्राकृतिक जीवन शैली का अनिवार्य हिस्सा है। एक फोन बूथ भी है, जिसे ऐसे समय में लगाया गया था, जब फोन एक दुर्लभ लग्जरी माना जाता था। हालांकि, आज गांधी की निजी जीवनशैली को लेकर उनकी पसंद वह बात नहीं है, जो उन्हें हमारी मानवजाति के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बनाती है। बल्कि, इससे भी कहीं अधिक जरूरी इस बात को समझा जाना है कि आखिर गांधी ने “टिकाऊ विकास” शब्दावली गढ़े जाने से आधी सदी से अधिक समय पहले ही पर्यावरणीय संकट की आशंका क्यों जाहिर की थी?
इसकी प्रमुख वजह यह है कि उनका आकलन उनके सिद्धांतों के साथ ही महत्वपूर्ण व ठोस आंकड़ों पर भी आधारित था। ऐसा प्राथमिक तौर पर इसलिए था, क्योंकि उनका आकलन सिर्फ पूरक रूप से नहीं, बल्कि भौतिकवादी आंकड़ों के साथ मुख्य सिद्धांतों पर आधारित था। उन्होंने पहले ही देख लिया था कि आधुनिक उद्योगों की बुनियाद संसाधनों के प्रति लापरवाही व स्वार्थ पर टिकी हुई है। उदाहरण के तौर पर, तरबूज वाली उस कहानी में स्वार्थ या संसाधन दोनों ही थे। पहला कि स्थानीय बच्चे खुले तौर पर अपनी मर्जी से जितना चाहे उतना तरबूज खा सकते थे और वहां टिकाऊ खुशहाली भी थी। इन हितों में बदलाव से अल्पकालिक मौद्रिक लाभ में उछाल आया, लेकिन अंततः उत्पाद और ग्रामीणों के अच्छे हालात, दोनों में ही गिरावट आई। संसाधनों की इस अहमियत को देखते हुए ही गांधी ने बार-बार कहा कि अगर हम सभ्यता की बराबरी तकनीक, सुविधाओं और अत्याधुनिक उपकरणों से ही करते रहे, तो हम खुद अपनी बर्बादी की कहानी लिखने के लिए अभिशप्त होंगे। गांधी के लिए सभ्यता वह है, जो हमें हमारी जिम्मेदारियों की राह दिखाए, हमारे जीवन का उद्देश्य बताए। जीवन के उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करने को ही हिंदू परंपराओं में पुरुषार्थ कहा गया है, जो गांधी के लिए अनमोल था। जबकि, इसके उलट अंतहीन बढ़ती इच्छाओं को उन्होंने अंधी दौड़ कहा है। रबींद्रनाथ टैगोर ने सभ्यता व प्रगति में अंतर को स्पष्ट करते हुए इस अंतर्दृष्टि की व्याख्या की। उन्होंने 1924 में चीन में दिए गए एक व्याख्यान में कहा, “प्रगति का आंतरिक मूल्यों से संबंध नहीं है, बल्कि यह एक बाहरी आकर्षण भर है। जबकि, एक आदर्श सभ्यता के मूल्य हमें अपने दायित्वों को पूरा करने की शक्ति व आनंद देते हैं।”
रोजमर्रा के भौतिक जीवन के संदर्भ में गांधी के शिष्य जेसी कुमारप्पा ने मनुष्यों के सामने मौजूद विकल्पों को परिभाषित किया था। हम या तो एक परजीवी अर्थव्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं या जिसमें मानव जीवन की जरूरतों का सामंजस्य, प्रकृति की जैव प्रणालियों से स्थापित हो सके। वे पूर्णकालिक सत्याग्रही बने और उन्होंने 1940 के दशक की शुरुआत में जेल में रहते हुए अपनी पहली किताब “ऐन इकोनॉमी ऑफ परमानेंस” लिखी।
कुमारप्पा की अंतर्दृष्टि की प्रमुख बात यह थी कि किसी भी चीज का अस्तित्व उसके खुद के लिए नहीं होता है। उन्होंने लिखा है कि अगर आप सूक्ष्मता से ध्यान देंगे तो स्पष्ट होगा, “प्रकृति अपनी सभी इकाइयों के मध्य सामंजस्य व सहयोग को सुनिश्चित करती है, सभी अपने लिए कार्य करते हुए दूसरी इकाइयों को भी अपने साथ लाने के लिए उनकी सहायता करती हैं। जो गतिशील है, वह स्थिर की सहायता करती है, और जिसमें चेतना है, वह जड़ की सहायता करती है।” अगर हम एक-दूसरे पर निर्भरता की शृंखला को तोड़ने वाली हिंसा को रोक सकें, तो हमारे पास एक मजबूत अर्थव्यवस्था होगी। यह जागरुकता कोई दुर्लभ वस्तु नहीं है। यही कारण है कि हमने एक कॉर्पोरेट नेता के संस्मरण से शुरुआत की, जो बच्चों की कहानी और तरबूजों के प्रति उनके आनंद का सम्मान करता है। समस्या इस बात का पता लगाने में है कि इस जागरुकता को कैसे व्यवहारिक तरीके से लागू किया जाए। जैसा कि तरबूज की कहानी से यह साफ होता है कि हम प्रकृति को केवल व्यावसायिक वस्तु मानकर पूंजीकरण करने या केवल पवित्र मान कर उसे अछूता छोड़ देने के किसी द्विपक्षीय विकल्प का सामना नहीं कर रहे हैं। गांधीवाद कोई ऐसी विचारधारा नहीं है, जो एक अंधकारमय भविष्य की राह दिखाती हो। गांधी की सोच और कार्यों से हमें जो सबसे महत्वपूर्ण बात सीखने को मिलती है कि जो वास्तव में मायने रखता है, आखिर उसे कैसे समझा या जाना जाए। इन सबसे बढ़कर, वह हमें अमूल्य बने रहने और विनाशक की बजाय पालक की भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करते हैं।
(रजनी बख्शी “बाजार्स, कंजर्वेशंस एंड फ्रीडम” किताब की लेखिका हैं)(downtoearth)
भारत सहित दुनिया भर में पूंजीवाद को लेकर लगातार बहस जारी है, लेकिन महात्मा गांधी के विचार बिल्कुल साफ थे। ऐसे ही कुछ विषयों पर उनके विचारों को जानने के लिए यह इंटरव्यू पढ़ा जाना चाहिए
महात्मा गांधी 1931 में यूरोप गए थे। लंदन में प्रवास के दौरान पत्रकार चार्ल्स पेट्राश ने उनसे लंबी बातचीत की थी। यह बातचीत उस समय लेबर मंथली पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। बाद में यह फ्रेंच अखबार ला मोंदे में पुनर्मुद्रित हुई। उसी बातचीत के चुनिंदा अंश
आपके विचार से भारतीय राजाओं, भू-स्वामियों, उद्योगपतियों और बैंकरों ने अपनी संपत्ति में कैसे इजाफा किया है?
वर्तमान हालात में जनता का शोषण करके।
क्या ये लोग भारतीय मजदूरों और किसानों के शोषण के बिना अमीर नहीं हो सकते?
हां, कुछ हद तक हो सकते हैं।
क्या इन अमीरों के पास अपनी मेहनत से संपत्ति अर्जित करने वाले साधारण मजदूरों या किसानों से बेहतर जिंदगी जीने का सामाजिक अधिकार है?
(कुछ समय शांत रहने के बाद...…) अधिकार नहीं है। मेरा सामाजिक सिद्धांत कहता है, हालांकि जन्म से सब समान होते हैं, इसलिए सबको समान रूप से अवसर मिलने चाहिए, लेकिन सब में एक समान क्षमताएं नहीं होतीं। प्राकृतिक रूप से यह संभव नहीं है कि सभी का स्तर समान हो। सभी का रंग, विवेक समान नहीं हो सकता। यही वजह है कि प्राकृतिक रूप से हम लोगों में से कुछ दूसरों की अपेक्षा वस्तुओं का लाभ प्राप्त करने में अधिक सक्षम होते हैं। जो लोग अधिक की कामना करते हैं वे अपनी क्षमताओं का इस दिशा में इस्तेमाल करते हैं। अगर वे अपनी क्षमताओं का सबसे बेहतर इस्तेमाल करेंगे तो लोगों के कल्याण के लिए काम कर रहे होंगे। ये लोग “ट्रस्टी” के अलावा कुछ नहीं होंगे। मैं व्यक्ति को बौद्धिकता से अधिक अर्जित करने की इजाजत दूंगा और उसकी योग्यता के आड़े नहीं आऊंगा। लेकिन उसकी बचत का बड़ा हिस्सा लोगों के पास जाना चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे बच्चों को परिवार से मिलता है। वे अपने लाभ के केवल ट्रस्टी हैं, इसके अलावा कुछ नहीं। मुझे भले ही इसमें निराशा हाथ लगे, लेकिन मैं इस आदर्श को दृढ़ता से मानता हूं। मौलिक अधिकारों के घोषणापत्र में इसे समझा जा सकता है।
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अगर किसान और मजदूर राजाओं, जमींदारों, पूंजीपतियों, अपने सहयोगियों और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ क्रांति करते हैं तो आप किसका पक्ष लेंगे? अगर आजाद भारत में इस तरह की क्रांति होती है, भले ही परिस्थितियां कैसी भी हों, तो आपका क्या दृष्टिकोण होगा?
मेरी कोशिश होगी कि अमीर और संपन्न वर्ग को ट्रस्टी में तब्दील करूं जो वे पहले से हैं। वे धन को रख सकते हैं, लेकिन उन्हें उन लोगों के कल्याण के लिए काम करना होगा जिनकी बदौलत उन्होंने संपत्ति अर्जित की है। इसके बदले उन्हें “कमीशन” प्राप्त होगा।
महाराजा और जमींदार अंग्रेजों से मिल गए हैं और आप ऐसे लोगों को “ट्रस्टी” बनाना चाहते हैं। आपकी सच्ची अनुयायी आम जनता है जो महाराजाओं और जमींदारों को अपना दुश्मन मानती है। अगर यह जनता सत्ता हासिल करती है और इस वर्ग को समाप्त करती है तो आपका नजरिया क्या होगा?
वर्तमान समय में जनता जमींदारों और राजाओं को अपना दुश्मन नहीं मानती। यह जरूरी है कि उन्हें बताया जाए कि उनके साथ क्या गलत हुआ है। मैं नहीं चाहूंगा कि जनता पूंजीपतियों को अपने दुश्मन के तौर पर देखे। मैं बताऊंगा कि ऐसा समझकर वे खुद का नुकसान कर रहे हैं। मेरे अनुयायी, लोगों से यह कभी नहीं कहते कि अंग्रेज या जनरल डायर बुरे हैं। वे बताते हैं कि ये लोग व्यवस्था के शिकार हैं और इसीलिए व्यवस्था को नष्ट करना जरूरी है, व्यक्ति को नहीं। इसी तरीके से ब्रिटिश अधिकारी लोगों के बीच बिना कष्ट रह सकते हैं।
अगर आपको व्यवस्था पर चोट करनी हो तो ब्रिटिश पूंजीवाद और भारतीय पूंजीवाद में कोई अंतर नहीं है। ऐसे में आप उन जमींदारों को लगान की अदायगी क्यों नहीं बंद कर देते जो वह आपकी भूमि से लेते हैं? जमींदार व्यवस्था का एक यंत्र भर हैं। उनके खिलाफ आंदोलन करना किसी भी लिहाज से आवश्यक नहीं है, खासकर ऐसे समय में जब ब्रिटिश व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन छिड़ा हो। दोनों के बीच अंतर स्पष्ट करना संभव है। हमने लोगों से कहा है कि जमींदारों को लगान देना बंद कर दें क्योंकि जमींदार यह लगान सरकार को देते हैं। हमारे जमींदारों से अच्छे संबंध हैं।
रबींद्रनाथ टैगोर, बर्नाड शॉ और अन्य दार्शनिकों के अनुसार, रूस में भूस्वामियों, पूंजीपतियों, साहूकारों और सोवियत की व्यवस्था ने जब सरकार की शक्ल ली तो बेहद कम समय में लोगों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां बेहतर हुईं। यह देखा जा रहा है कि क्रांति के समय रूस मुख्य रूप से कृषि पर आधारित था। सांस्कृतिक और धार्मिक नजरिए से देखा जाए जो उसकी स्थिति ठीक वैसी ही थी जैसी आज भारत की है। इस संबंध में आपका दृष्टिकोण क्या है?
पहली बात तो यह कि मैं दूसरों के आधार पर अपना दृष्टिकोण नहीं बनाता। यही वजह है कि मैं रूस के हालात की प्रशंसा करने में असमर्थ हूं। इसके अलावा मैं मानता हूं और सोवियत के नेता खुद कहते हैं कि सोवियत की व्यवस्था ताकत के बल पर स्थापित हुई है। इसलिए मुझे इसकी सफलता पर बड़ा संदेह है।
किसान और मजदूर अपनी किस्मत खुद तय कर सकें, इसके लिए आपकी क्या योजना है?
मेरी वही योजना है जिसकी व्याख्या कांग्रेस द्वारा की गई है। मैं मानता हूं कि इससे मजदूरों और किसानों की स्थिति में सुधार आएगा। वह स्थिति अब तक की श्रेष्ठ स्थिति होगी। मैं मजदूर और किसानों की स्थिति से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हूं। मेरा तात्पर्य असामान्य पुर्नजागरण से है। इसकी कारण उनकी क्षमता प्रभावित रही और वे अन्याय और शोषण को बर्दाश्त करते रहे।
मशीन से आपका क्या मतलब है? क्या चरखा भी मशीन नहीं है? क्या मशीन का इस्तेमाल कामगारों का शोषण नहीं बढ़ाता?
चरखा और इस तरह के अन्य उपकरण साफ तौर पर मशीन हैं। इससे आप मशीन की मेरी परिभाषा को समझ सकते हैं। मैं यह मानता हूं कि मशीनों का गलत इस्तेमाल ही पूरी दुनिया में कामगारों के शोषण की प्रमुख वजह है।
आप लोगों का शोषण खत्म करने की बात कहते हैं जो पूंजीवाद को खत्म करके ही संभव है। क्या आप पूंजीवाद को कुचलना चाहते हैं? अगर ऐसा है तो क्या आप पूंजीपतियों को उनकी संपत्ति से वंचित करना चाहते हैं?
अगर मैं सत्ता में आया तो मैं निश्चित तौर पर पूंजीवाद को खत्म कर दूंगा लेकिन मैं पूंजी को खत्म नहीं करूंगा। और यह तभी संभव है जब मैं पूंजीपतियों को खत्म न करूं। मैं मानता हूं कि पूंजी और श्रम का सामंजस्य संभव है। कुछ मामलों में मैंने इसे सफलतापूर्वक देखा भी है और जो एक मामले में सच है वह सभी मामलों में सच साबित हो सकता है। मैं पूंजी को बुराई के तौर पर नहीं देखता और न ही मैं मशीनी व्यवस्था को बुराई मानता हूं।
(मूल अंग्रेजी साक्षात्कार का अनुवाद भागीरथ ने किया है)(downtoearth)
वाशिंगटन, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)| दुनियाभर में कोरोनोवायरस के कुल मामलों की संख्या 3.44 करोड़ हो गई है जबकि मरने वालों की संख्या बढ़कर 1,026,700 से अधिक हो गई है।
यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) ने अपने नवीनतम अपडेट में बताया कि
शनिवार तक, कुल मामलों की संख्या 34,495,372 रही और मरने वालों की संख्या बढ़कर 1,026,717 हो गई।
सीएसएसई के अनुसार, 7,331,241 मामलों और 208,693 मौतों के साथ अमेरिका दुनिया में इस बीमारी से प्रभावित देशों में शीर्ष पर है।
वहीं, 6,394,068 मामलों के साथ भारत दूसरे स्थान पर है, जबकि देश में 99,773 लोग जान गंवा चुके हैं।
कोरोना मामलों के संदर्भ में अन्य शीर्ष 15 देशों में ब्राजील (4,847,092), रूस (1,188,928), कोलंबिया (841,531), पेरू (818,297), स्पेन (789,932), अर्जेटीना (779,689), मेक्सिको (753,090), दक्षिण अफ्रीका (677,833), फ्रांस (629,431), ब्रिटेन (469,764), चिली (466,590), ईरान (464,596), इराक (372,259) बांग्लादेश (366,383) और सऊदी अरब (335,578) हैं।
कोरोना से मौतों के मामले में 144,680 मौतों के साथ ब्राजील दूसरे स्थान पर है।
वहीं, कोरोना के कारण 10,000 से ज्यादा मौतों वाले अन्य देशों में मेक्सिको (78,492), ब्रिटेन (42,358), इटली (35,941), पेरू (32,535), फ्रांस (32,171), स्पेन (32,086), ईरान (26,567), कोलंबिया (26,397) हैं। रूस (20,981), अर्जेटीना (20,599), दक्षिण अफ्रीका (16,909), चिली (12,867), इक्वाडोर (11,495), इंडोनेशिया (10,972) और बेल्जियम (10,023) हैं।
हाथरस में हुए कथित गैंगरेप मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने फ़ोरेंसिक रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि दलित लड़की से बलात्कार नहीं हुआ था.
यूपी पुलिस के एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) प्रशांत कुमार ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा, "एफ़एसएल (फ़ोरेंसिक साइंस लेबॉरेटरी) रिपोर्ट के अनुसार, विसरा के सैंपल में कोई वीर्य/सीमन या उसका गिरना नहीं पाया गया है. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट कहती है कि हमले के बाद जो ट्रॉमा हुआ उसके कारण मौत हुई है. अधिकारियों के बयान के बावजूद कुछ ग़लत ख़बरें फैलाई जा रही हैं."
उन्होंने कहा, "इससे स्पष्ट होता है कि ग़लत तरीक़े से जातीय तनाव पैदा करने के लिए इस तरह की चीज़ें कराई गईं. पुलिस ने शुरू से इस मामले में त्वरित कार्रवाई की है और आगे की विधिक कार्रवाई की जाएगी."
यूपी पुलिस के इस बयान के बाद उसकी आलोचना हो रही है.
पीड़िता की विसरा रिपोर्ट अभी तक सामने नहीं आई है लेकिन यूपी पुलिस ने बयान में साफ़ कह दिया है कि पीड़िता के साथ बलात्कार नहीं हुआ था.
क्या सिर्फ़ सीमन या वीर्य के निशान पाए जाने से ही भारतीय दंड संहिता में बलात्कार का मामला बनता है? इस रिपोर्ट में हम यही जानने का प्रयास करेंगे.
रेप पर क्या कहता है भारतीय क़ानून?
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में साल 1860 में ही बलात्कार को अपराध मानते हुए इससे जुड़ी धाराओं को शामिल किया गया था. आईपीसी की धारा 375 (1) 'बलात्कार' शब्द को क़ानूनी रूप से परिभाषित करती है.
आईपीसी के तहत अगर कोई पुरुष किसी महिला के साथ उसकी सहमति या जबरन शारीरिक संबंध बनाता है तो वह बलात्कार की श्रेणी में आता है. यहां पर सहमति को भी परिभाषित किया गया है. महिला अगर किसी इच्छा के कारण, मौत या चोट पहुँचाने के डर से भी सहमति दे रही है तो वह भी बलात्कार की श्रेणी में आएगा.
धारा 375 में ही साफ़ किया गया है कि संभोग के दौरान सिर्फ़ पेनिट्रेशन होना ही बलात्कार के लिए काफ़ी माना जाएगा.
अनुच्छेद 376 के तहत बलात्कार मामलों में 10 साल से लेकर आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान है.
2012 में निर्भया गैंगरेप की घटना के बाद भारत के बलात्कार और यौन हिंसा से जुड़े क़ानूनों में बड़े बदलाव हुए, जिसमें बलात्कार और यौन हिंसा की परिभाषा के दायरे को बढ़ाया गया.
जस्टिस जे.एस. वर्मा की सिफ़ारिशों के बाद संसद से 2013 में आपराधिक क़ानून (संशोधन) अधिनियम पारित किया गया. इसके तहत बलात्कार मामलों में मौत की सज़ा का प्रावधान किया गया.
बलात्कार के मामले में अगर पीड़िता की मौत हो जाती है या वह किसी अचेतन अवस्था में चली जाती है तो उसमें अधिकतम मौत की सज़ा का प्रावधान है.
साथ ही इसी क़ानून के बाद किसी महिला का पीछा करने और उसको लगातार घूरने को भी आपराधिक श्रेणी में डाला गया था.
सीमन नहीं पाया गया तो रेप नहीं?
दिल्ली हाईकोर्ट में आपराधिक मामलों के वकील जयंत भट्ट कहते हैं कि बलात्कार साबित करने के लिए महिला के शरीर पर सीमन या वीर्य का होना ज़रूरी नहीं है.
वो कहते हैं, "सीमन या वीर्य शरीर पर पाए जाने को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसले भी हैं, जहां पर न्यायालय ने सीमन होने या न होने को ज़रूरी नहीं माना है. निर्भया गैंगरेप मामले के बाद जो क़ानून में बदलाव हुए उसके बाद रेप की परिभाषा बहुत व्यापक हो चुकी है. अब सिर्फ़ वेजाइनल पेनिट्रेशन (महिला-पुरुष के बीच प्राकृतिक संबंध) को ही रेप नहीं माना जाएगा बल्कि किसी भी तरह के पेनिट्रेशन को धारा 375 और 376 में शामिल कर दिया गया है. इसमें एक उंगली के ज़रिए किया गया पेनिट्रेशन भी शामिल है."
परमिंदर उर्फ़ लड़का पोला बनाम दिल्ली सरकार (2014) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फ़ैसले को सही माना था जिसमें हाईकोर्ट ने कहा था कि सीमन का शरीर पर होना बलात्कार साबित करने के लिए आवश्यक नहीं है.
द इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने हाथरस के एसपी विक्रांत वीर के हवाले से लिखा था कि पीड़िता ने 22 सितंबर को होश में आने के बाद मैजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया था और उसने आरोप लगाया था कि उसका गैंगरेप हुआ है.
हाथरस मामले में बलात्कार हुआ है या नहीं हुआ है, इस पर पोस्टमॉर्टम, एफ़एसएल या विसरा रिपोर्ट को एक बार अलग रख दें और सिर्फ़ पीड़िता के बयान को देखें तो वो कितना मायने रखता है?
इस सवाल पर वकील जयंत भट्ट कहते हैं, "कोई पीड़िता अगर मौत से पहले मैजिस्ट्रेट के सामने आख़िरी बयान देती है तो उसे 'डाइंग डिक्लेरेशन' माना जाता है और ऐसे मामलों में मैंने जितने भी केस लड़े हैं उनमें अधिकतर कोर्ट अंतिम बयान को पीड़िता का सच बयान मानते हैं. ऐसा माना जाता है कि इंसान अपने आख़िरी वक़्त में झूठ नहीं बोलता है और यह बयान इस मामले में सबसे अहम कड़ी साबित होने वाला है."
जयंत भट्ट कहते हैं कि इस मामले को सिर्फ़ गैंगरेप के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि इसमें हत्या का मामला भी शामिल है और इसमें मौत की सज़ा का प्रावधान है.
एफ़एसएल रिपोर्ट के हवाले से यूपी पुलिस ने यह बयान ज़रूर दिया है लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है जिससे यह साबित हो कि उसमें रेप की पुष्टि हुई है या नहीं. हालांकि, बीबीसी हिंदी के फ़ैक्ट चेक से यह पुष्टि हुई है कि बलात्कार के मामले के लिए शरीर पर सीमन या वीर्य पाया जाना ज़रूरी नहीं है.(bbc)
पणजी, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)| पणजी में पांच सितारा होटल के बाहर विरोध प्रदर्शन करने को लेकर पुलिस ने कांग्रेस के उपाध्यक्ष संकल्प अमोनकर सहित करीब एक दर्जन पार्टी कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया है। गौरतलब है कि इसी होटल के बाहर केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्री प्रकाश जावडेकर रात के दौरान ठहरे हुए थे। कार्यकर्ता केंद्रीय मंत्री से मिलने की मांग कर रहे थे।
यह घटना शुक्रवार मध्यरात्रि के ठीक बाद की है। जावडेकर हाल ही में संसद द्वारा पारित किए गए विवादास्पद कृषि बिलों को लेकर किसान समूहों के साथ बैठक करने के लिए गोवा आए हुए हैं।
कांग्रेस वेता गिरीश चोडानकर ने कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को पुलिस द्वारा घेरे जाने और पणजी पुलिस स्टेशन में हिरासत में लेने के बाद ट्वीट किया, "गोवा में जंगल राज। गोवा डीजीपी ने गोवा कांग्रेस के उपाध्यक्ष संकल्प अमोनकर, जाना भंडारी, वरद मडरेल्कर, एडवोकेट अर्चित नाइक, मेघश्याम राउत, सुदीन नाइक और अन्य 10 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। ये सभी प्रकाश जावडेकर से मिलने की मांग कर रहे थे और पणजी के होटल के लॉबी में इंतजार कर रहे थे।"
विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ताओं को पुलिस स्टेशन में ले जाने के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए अमोनकर ने कहा कि जावडेकर से मिलने और महादेई अंतर्राज्यीय नदी जल बंटवारे मुद्दे पर चर्चा करने के लिए औपचारिक अपॉइंमेंट के लिए कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल यहां होटल में पहुंचा था।
अमोनकर ने कहा, "हमें सिर्फ इसलिए गिरफ्तार किया जा रहा है, क्योंकि हम केंद्रीय मंत्री से मिलना चाहते हैं।"
गौरतलब है कि कांग्रेस ने अतीत में आरोप लगाया था कि जावड़ेकर महादेई नदी जल बंटवारे मामले में कर्नाटक का पक्ष ले रहे हैं।
हालांकि पुलिस ने कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को इसलिए गिरफ्तार किया गया, क्योंकि उन्होंने मध्यरात्रि के बाद जावडेकर से मिलने की जिद की। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, "यह सिर्फ कानून और व्यवस्था की स्थिति से बचने के लिए एक एहतियातन गिरफ्तारी थी।"
नई दिल्ली। देश के संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के पड़पोते राजरतन अंबेडकर ने एक वीडियो पोस्ट के जरिए हाथरस कांड की पोल खोलकर रख दी है। राजरतन ने वीडियो में हाथरस के जिला प्रशासन और मेडिकल स्टाफ की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। राजरत्न अंबेडकर ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश में जंगलराज है और हाथरस के पीडि़त परिवार की लड़ाई अंबेडकर परिवार लड़ेगा।
अपने वीडियो पोस्ट में वह यह कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि 'आज सुबह पांच बजे हम हाथरस के लिए निकले। हाथरस के एसपी ने हमें गांव तक जाने से रोका। फिर भी हम वहां सपा-बसपा के प्रदर्शन में शामिल हुए। फिर मेरी यहां पर जिलाधिकारी से एक घंटे तक चर्चा हुई। एफआईआर और मेडिकल की कॉपी हम लोगों ने देखी है। इसलिए मैं यह सच देश और दुनिया के लोगों को बताना चाहता हूं।'
राजरतन आगे कहते हैं कि 'किसी की साइकिल भी गुम हो जाती है तो दो पन्नों की एफआईआर है। पहली बात तो यह बात को अजीब लगती होगी कि जब ब्राह्मणों की बच्ची से बलात्कार होता है तो उसकी पहचान छिपा कर रखते हैं, उसका नाम भी नहीं पता होता है। निर्भया का नाम बताइए मुझे क्या है? लेकिन हमारी बच्ची का पहले दिन से उसकी पहचान बतायी गई कि वह मनीषा वाल्मिकी है, यानि वह वाल्मिकी समुदाय से है बाकि किसी को आंदोलन करने की जरूरत नहीं है।'
'एफआईआर हम लोगों ने देखा सिर्फ चार वाक्यों का एफआईआर है, गैंगरेप केस का सिर्फ चार वाक्यों का एफआईआर लिखा गया है। चार वाक्यों में क्या है मां का नाम, भाई का नाम और मनीषा का नाम लिखा है। ये तीनों रात की साढ़े नौ बजे खेत पर बाजरा काटने गये थे। भाई घर में घास रखने जाता है, फिर जो ठाकुर लड़का है वह मनीषा का गला दबाता है और उतने में मां चिल्लाती है और भाई दौड़ कर आ जाता है और ये ठाकुर लड़का भाग जाता है। बस इतना ही वाकिया एफआईआर में बताया गया है। अब पुलिस की थ्येरी क्या है ये देखिए। पुलिस की थ्येरी है कि उसने सिर्फ गला दबाया था और भाई आ गया तो वह भाग गया, फिर लड़की गिर गई और गिरने के बाद एक ईंट पर गले के पीछे का भाग टकरा गया और जबान बाहर आई और जबान बाहर आने के बाद दांतों के नीचे वह कट गयी।'
'14 सितंबर को यह गैंगरेप होता है, 22 सितंबर को मेडिकल होता है। आठ दिनों के बाद मेडिकल रिपोर्ट की जाती है। मेडिकल रिपोर्ट कहती है कि कहीं भी शरीर पर चोट नहीं है। इसलिए मैने कहा कि लड़की को कुछ हुआ ही नहीं वो अपने आप मर गई। क्योंकि मेडिकल रिपोर्ट कहता है न तो बलात्कार की कोशिश की गई है, खरोंच तक नहीं मेडिकल रिपोर्ट में। जितने भी मेडिकल डॉक्टर्स हैं सारे ठाकुर हैं, खुद डीएम ठाकुर हैं, गुनहगार ठाकुर हैं, सभी लोग यहां पर ठाकुर हैं। इसलिए इनपर कोई बात न आये, इन्होंने मेडिकल रिपोर्ट दूसरे जिले से बनवाई है।'
'आज मैं सुप्रीम कोर्ट के वकील साथ में लेकर गया था। उनकी सारी थ्येरी हमने सुनी और देखिए मेरे पर किस तरह का प्रेशर था। मुझे डीएम कहता है कि आप यहां से घोषणा करो कि रेप हुआ ही नहीं था। इस तरह का दबाव मेरे ऊपर आ सकता है, तो सोचिए पीड़ित परिवार पर कितना होगा। हमको परिवार से मिलने नहीं दिया जा रहा है। गांव को बंद करके रखा हुआ है और कह रहे हैं कि गांव में तनाव है। तो यह तनाव किसने पैदा किया? पूरी पुलिस और मेडिकल स्टाफ इसमें शामिल है।'
'पुलिस प्रशासन इतने निचले स्तर पर गिरी हुई है उत्तर प्रदेश की कि सही में जंगलराज क्या होता है वहां पर जाकर देखलो। यह नैचुरल है कि पीड़ित परिवार यह केस नहीं लड़ेंगे। क्योंकि एक बच्ची को वह गंवा चुके हैं, वह अपने बेटे और बीवी को नहीं गंवाना चाहते हैं। इसलिए उनके ऊपर बहुत प्रेशर है। जब हमने उनसे पूछा कि आपने रात के ढाई बजे उस बच्ची के शव को क्यों जलाया तो कहते हैं कि ये परिवार उस शव को लेकर बार्गेनिंग कर रही थी कि एक लाख दो, दो लाख दो, दस लाख दो और जब फिर जब इनका पच्चीस लाख पर डन हो गया तब शव को जला दिया। ये पुलिस की थ्येरी है।'(sabrangindia)
विचारों की लड़ाई सबसे मारक असरदार लड़ाई है। इसके सामने बड़ी से बड़ी फौज और उसकी जीत बेमानी है। राजनीतिक सत्ता हो या सामाजिक सत्ता- दिमाग पर कब्जे की लड़ाई हमेशा सबसे पहले लड़ी जाती है। कई बार यह पता भी नहीं चलता है और कब्जा होता जाता है।
- नासिरूद्दीन
जनवरी का आधा महीना बीत चुका था। हम बिहार के सुदूर इलाके में मेहनतकशों के साथ काम करने वाले अपने कुछ साथियों के साथ थे। इस दौरान हमें एक स्कूल में हाईस्कूल के विद्यार्थियों से बातचीत का मौका मिला। यह उस शहर के सबसे अच्छे स्कूलों में है। हम कोई सिरा तलाश रहे थे ताकि विद्यार्थियों से बातचीत की जाए, तकरीर न की जाए। हमने तय किया कि हम 30 जनवरी, यानी महात्मा गांधी की शहादत के बारे में बात करने की कोशिश करेंगे। हमारे पास पहले से बना-बनाया कोई खाका नहीं था।
बातचीत शुरू हुई- क्या 30 जनवरी कुछ खास है? क्या इस दिन कुछ अहम हुआ था? बात निकली। गांधी जी की शहादत तक पहुंची। फिर यह बात हुई कि किसने मारा, तो नाथूराम गोडसे का नाम आया। लेकिन क्यों मारा, इसके जवाब इस तरह आएः
गांधी जी ने देश का बंटवारा करा दिया।
गांधी जी सिर्फ मुसलमानों के बारे में सोचते थे। उन्हीं के साथ रहना चाहते थे। वे सब कुछ उन्हें ही दे देना चाहते थे।
गांधी जी भारत के खजाने से पाकिस्तान को पैसा दिलाने के लिए अनशन पर बैठ गए थे। वे पाकिस्तान-पक्षी थे। वे पाकिस्तान को सब दे देना चाहते थे।
गांधी जी पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच संपर्क के लिए भारत के बीच से रास्ता बनाने को तैयार हो गए थे।
गांधी जी इस्लामी राष्ट्र चाहते थे लेकिन भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के खिलाफ थे।
सत्ताके लिए जिन्ना और नेहरू ने गांधी जी को मरवा दिया।
गांधी जी हिंदू-मुसलमान एकता चाहते थे। वे सेक्यूलर थे।
गांधी जी आरक्षण के समर्थक थे।
हकीकत क्या है? ऊपर गिनाई गई बातों में सिर्फ एक बात सही है- ‘गांधी जी हिंदू-मुसलमान एकता चाहते थे।’ तब सवाल है, स्कूल में पढ़ने वालों को यह जानकारी कैसे मिली? क्या पढ़ाने के लिए तय किसी किताब से मिली? नहीं। क्योंकि सीबीएसई या बोर्ड की किताबें महात्मा गांधी की हत्या की ऐसी वजहें नहीं गिनातीं। स्कूल सही जानकारी और ज्ञान की जगह मानी जाती है। स्कूल में पढ़ाई जाने वाली किताबें और उसके पाठ ही जानकारी का स्रोत होते हैं। मगर हाईस्कूल के इन विद्यार्थियों की जानकारी का स्रोत सिलेबस की किताबें नहीं हैं। वे खुद भी इसे मानते हैं।
यह महज इत्तेफाक नहीं हो सकता। इत्तेफाक होता तो देश की सर्वोच्च माने जाने वाली सेवा- आईएएस और आईपीएस के अफसर उन झूठी या मनगढ़ंत बातों को फैलाने वाले नहीं बनते जो एनसीईआरटी की उन किताबों में थी ही नहीं, जिन्हें पढ़कर उन्होंने सिविल सेवा का बेड़ा पार किया था।
यानी स्कूल की किताबों का इस्तेमाल महज इम्तेहान पास करने के लिए है। समाज के बड़े हिस्से के लिए उनकी उपयोगिता बहुत ही सिमटी हुई है। इनके सामाजिक-राजनीतिक ज्ञान या जानकारी का जरिया स्कूली किताबों से अलग है। वही जरिया देश, समाज और भारत के लोगों को देखने और देश में होने वाले घटनाक्रम को देखने के वास्ते उनका नजरिया बना रहा है।
संसद के गुजरे मानसून सत्र में वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा कि नेहरू जी ने 1948 में एक शाही आदेश की तरह प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष बनाने का आदेश दिया था लेकिन उसका पंजीकरण आज तक नहीं हो पाया है। इसे नेहरू जी ने नेहरू-गांधी परिवार को फायदा पहुंचाने के लिए बनाया था। सवाल है, यह जानकारी तथ्यपरक है या तथ्य से परे है? अगर तथ्य से परे है तो एक मंत्री के जहन में यह कैसे पैठी है? यह इनके जेहन में कितनी गहरी पैठी है, इसी से पता चलता है कि वे इसे सच मानकर संसद में बोलते हैं। यानी, हमारे मुल्क में जानकारी की एकऔर धारा चल रही है। वह धारा कई मामलों में देश के कई हिस्सों के ज्यादातर स्कूलों में दी जाने वाली जानकारी से ज्यादा मजबूत है। तब ही तो वह धारा स्कूल के विद्यार्थी से शुरू होते हुए ऊपर तक चली जाती है।
और यह हालत उन लोगों की है जिन्हें ज्ञान के आधुनिक मंदिरों में जाने का मौका मिला है। इसी से हम आसानी से उन सबकी हालत का अंदाजा लगा सकते हैं जिनके पास आधुनिक मंदिरों में जाने का मौका नहीं था, जानकारी के पुख्ता स्रोत भी नहीं थे और जानकारी का कोई और जरिया भी नहीं था। उन तक जो पहुंच गया और जो बताया गया, उनके लिए वही पुख्ता जानकारी बन गई। वही उनके ज्ञान का स्रोत है। सवाल है, किसने उन्हें, क्या और कैसे बताया? क्यों बताया? उन तक कौन, कैसे पहुंचा?
जहनों में पैठी इन ‘जानकारियों’ का आधार तर्क की कसौटी पर खरे और वैज्ञानिक तथ्य नहीं हैं। सत्य नहीं है। कई बार अर्धसत्य है तो कई बार सत्य और तथ्य का कटा-छंटा रूप हैं। यही नहीं, ऐसी जानकारियां उन्हें कहीं से भी सत्य की तलाश के लिए नहीं उकसातीं। ज्ञान का तो यही काम है न? बल्कि इसके उलट वे कह रही होती हैं कि यही अंतिम सत्य है। यही तथ्य है। इसे आंख मूंदकर मानो।
अगर पड़ताल की जाए तो पता चलता है कि ऐसी ‘जानकारियों’ का खास सामाजिक-राजनीतिक मकसद होता है। हम ऐसी किसी भी समानांतर जानकारी को सामने रखकर इस बात को तौल सकते हैं। ये जानकारियां आमतौर पर किसी समूह, समुदाय, जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र के खिलाफ होती हैं। इन जानकारियों का सबसे बड़ा मकसद दुश्मन पैदा करना होता है। नफरत पैदा करना होता है।
यह बात भी गौर करने लायक है कि समाज के पास ज्ञान और जानकारियों का जरिया सिर्फ स्कूल नहीं है। स्कूल और यूनिवर्सिटियों में पढ़ाई जाने वाली किताबें नहीं हैं। इतिहास-समाज की तथ्यपरक और तर्क से भरपूर उन विद्वानों की किताबें भी नहीं हैं जिनके मकसद नफरत फैलाना या दुश्मन पैदा करना नहीं है। ज्ञान और जानकारी की इससे उलटऔर समानांतर एकधारा चल रही है। उसके कई स्तर हैं। वह किताबों में है भी और नहीं भी। वह विद्वानों के भरोसे है और ज्यादातर नहीं भी है। वह समाज के बीच उन लोगों के भरोसे अपना दायरा और पैठ बढ़ा रही है जो ज्ञान और जानकारी का इस्तेमाल नफरत की दुनिया बसाने के लिए कर रहे हैं। शत्रु पैदा करने के लिए कर रहे हैं।
इस समानांतर ज्ञान और जानकारी की मुहिम में वे लोग अभी कमजोर पड़ते दिख रहे हैं जो सत्य के खोजी हैं। जो ज्ञान का इस्तेमाल इंसानियत और समाज की बेहतरी के लिए करते हैं। जिनका सत्य अंतिम और दुश्मन पैदा करने वाला नहीं होता है। उनकी पकड़ दिमागों पर ऐसी मजबूत नहीं दिख रही है जैसी पकड़ नफरत पैदा करने वाली जानकारियों की दिखाई दे रही है।
विचारों की लड़ाई सबसे मारक असरदार लड़ाई है। इसके सामने बड़ी से बड़ी फौज और उसकी जीत बेमानी है। राजनीतिक सत्ता हो या सामाजिक सत्ता- दिमाग पर कब्जे की लड़ाई हमेशा सबसे पहले लड़ी जाती है। कई बार यह पता भी नहीं चलता है और कब्जा होता जाता है। मौजूदा दौर में गांधी जी की हत्या की ये वजहें लोगों के दिमाग में कब और कैसे पैठती गईं, इसका सही-सही पता किसे है?
दिलचस्प है, लेकिन ऐसा लगता है कि इन वजहों की आड़ में महात्मा गांधी की हत्या को जायज ठहराने के तर्क मुहैया कराए गए हैं। ये तर्क गढ़े गए हैं। ये सत्य से परे हैं। चूंकि ये गढ़े गए तथ्य या तर्क हैं, इसलिए ये खुद-ब-खुद लोगों तक आसानी से नहीं पहुंचे होंगे। लोगों तक इन्हें पहुंचाने के लिए सोचा-समझा गया होगा। मजबूत मशीनरी लगी होगी। यह एक दिन में भी मुमकिन नहीं हुआ है। इसमें वक्त लगा और लगाया गया है- बिना इसकी परवाह किए कि नतीजा कितनी जल्दी मिलेगा, लगातार आम दिमागों पर काम किया गया है।
इसलिए अगर जबरदस्त धीरज, खामोशी से काम करने की हिम्मत, सत्य, तथ्य और वैज्ञानिक तर्क पर भरोसा, उसे किताबों से बाहर ले जाने की ख्वाहिश और आम जन तक इसे पहुंचाने की मिशनरी लगन- ये सब नहीं हैं तो भारत के लोगों के दिमागों को बंटने और हमें एक नफरती समाज बनने से कोई नहीं रोक सकता।(navjivan)
शारजाह, 3 अक्टूबर (आईएएनएस/ग्लोफैंस)। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के 13वें संस्करण में शनिवार को दूसरा मैच शारजाह क्रिकेट स्टेडियम में दिल्ली कैपिटल्स और कोलकाता नाइट राइडर्स के बीच खेला जाएगा। इस मैच में दिल्ली इस सीजन की पहली हार झेलने के बाद आ रही है जबकि कोलकाता ने राजस्थान रॉयल्स जैसी मजबूत टीम को मात दी थी। दिल्ली का मजबूत बल्लेबाजी क्रम पिछले मैच में सनराइजर्स हैदराबाद की नपी तुली गेंदबाजी के सामने 163 रनों का लक्ष्य भी हासिल नहीं कर सका था।
एक हार के बाद हालांकि किसी भी टीम को हल्के में लेना गलती होगी और कोलकाता के कप्तान दिनेश कार्तिक इस बात को जानते हैं। कार्तिक ने पिछले मैच में जिस तरह से कप्तानी की थी और अपने गेंदबाजों का अच्छे से इस्तेमाल किया था, उस पर दिल्ली ने नजर रखी होगी और निश्चित तौर पर रणनीति भी बनाई होगी।
दिल्ली की बल्लेबाजी में उसका बड़ा नाम ऋषभ पंत का प्रदर्शन इस सीजन एक बड़ी पारी दरकार में है। पंत के बल्ले से उस तरह की पारियां नहीं निकली हैं जिनके लिए वो मशहूर हैं।
युवा पृथ्वी शॉ एक अर्धशतक जड़ चुके हैं। शिखर धवन का बल्ला भी चल रहा है। यही हाल बाकी के बल्लेबाजों का। दिल्ली के बल्लेबाजों ने अभी तक संयुक्त रूप से अच्छा किया है लेकिन किसी भी बल्लेबाज ने स्डैंटआउट पारी नहीं खेली है। टीम प्रबंधन उम्मीद करेगा कि इस मैच में वो आए।
गेंदबाजी में दिल्ली बेहद मजबूत है। कैगिसो रबादा, एनरिक नोर्टजे अच्छा कर रहे हैं। पिछले मैच से ईशांत शर्मा की वापसी हुई थी और उनके आने से रबादा को जरूरी अनुभव और समर्थन मिला है।
स्पिन में आईपीएल इतिहास के सबसे सफल स्पिनरों में से एक अमित मिश्रा भी टीम के लिए उपयोगी रहे हैं, लेकिन रविचंद्रन अश्विन आते हैं तो मिश्रा को ड्रेसिंग रूप में बैठना पड़ सकता है।
वहीं, कोलकाता ने अपना संतुलन एक तरह से वापस हासिल कर लिया है। शुभमन गिल फॉर्म में हैं। इयोन मोर्गन, आंद्रे रसेल भी धीरे-धीरे लय में आ रहे हैं। चिंता है तो गिल के साथ एक अच्छी सलामी जोड़ीदार तलाशने की। सुनील नरेन पूरी तरह से विफल रहे हैं। यहां राहुल त्रिपाठी और खुद कप्तान दिनेश कार्तिक एक अच्छा विकल्प साबित हो सकते हैं। कार्तिक का बल्ला चल नहीं रहा है और ऐसे में बल्लेबाजी क्रम में बदलाव उनके लिए कारगार साबित हो सकता है।
गेंदबाजी में तो कोलकाता के पास पैट कमिंस के अनुभव के अलावा शिवम मावी और कमलेश नागरकोटी की युवा जोड़ी है जो बेहद असरदार साबित हो रही है।
स्पिन में कुलदीप यादव, सुनील नरेन और वरुण चक्रवर्ती की तिकड़ी भी अच्छा कर रही है।
यह मैदान छोटा है और इसी मैदान पर राजस्थान रॉयल्स ने किंग्स इलेवन पंजाब के खिलाफ आईपीएल इतिहास में रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए सबसे बड़ी जीत हासिल की थी।
एक बार फिर यहां रनों की बारिश देखने को मिल सकती है क्योंकि दोनों टीमों के पास बड़े शॉट्स खेलने वाले तूफानी बल्लेबाज हैं।
टीमें (सम्भावित) :
केकेआर : दिनेश कार्तिक (कप्तान), आंद्र रसेल, सुनील नरेन, कुलदीप यादव, शुभमन गिल, लॉकी फग्र्यूसन, नीतीश राणा, रिंकू सिंह, प्रसिद्ध कृष्णा, संदीप वॉरियर, अली खान, कमलेश नागरकोटी, शिवम मावी, सिद्देश लाड, पैट कमिंस, इयोन मोर्गन, टॉम बेंटन, राहुल त्रिपाठी, वरुण चक्रवर्ती, एम. सिद्धार्थ, निखिल नाइक, क्रिस ग्रीन।
दिल्ली कैपिटल्स : श्रेयस अय्यर (कप्तान), अजिंक्य रहाणे, एलेक्स कैरी, जेसन रॉय, पृथ्वी शॉ, ऋषभ पंत (विकेटकीपर), शिखर धवन, शिमरन हेटमायेर, अक्षर पटेल, क्रिस वोक्स, ललित यादव, मार्कस स्टोइनिस, कीमो पॉल, अमित मिश्रा, आवेश खान, हर्षल पटेल, ईशांत शर्मा, कागिसो रबादा, मोहित शर्मा, रविचंद्रन अश्विन, संदीप लामिछाने, तुषार देशपांडे।
न्यूयॉर्क, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)| एक संघीय न्यायाधीश ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वर्क वीजा जारी करने पर लगाए प्रतिबंध को अस्थायी रूप से रोक दिया है। इसने कहा कि नीति में आमूलचूल परिवर्तन जनहित में नहीं है। सैन फ्रांसिस्को में फेडरल कोर्ट के न्यायाधीश जेफरी एस. व्हाइट ने गुरुवार को टेक, निर्माण और खुदरा कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यापार संगठनों द्वारा दायर एक मामले में यह आदेश दिया, जो कंपनिया विदेशों से पेशेवरों की भर्ती करती है, उनके लिए यह राहत की बात है।
यह निर्णय पेशेवरों और उनके परिवारों के लिए एच वीजा की सभी श्रेणियों पर लागू होता है, अमेरिका में काम करने के लिए ट्रांसफर्ड कर्मचारियों के लिए एल वीजा, और स्कॉलर, प्रशिक्षुओं और कुछ छात्रों के लिए जे वीजा होता है।
गौरतलब है कि ट्रंप ने 25 जून को अमेरिकी दूतावासों को आदेश दिया था कि कोविड-19 महामारी के कारण अत्यधिक बेरोजगारी के कारण वर्ष के अंत तक वर्क वीजा श्रेणियों को प्रोसेसिलंग करना बंद कर दिया जाए।
बेंगलुरु, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)| संसद में विवादास्पद कृषि विधेयकों को पारित करने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कांग्रेस नेता एम. मल्लिकार्जुन खड़गे ने शुक्रवार को कहा कि मोदी देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के दिए नारे 'जय जवान, जय किसान' के बजाय 'मारो जवान, मारो किसान' में विश्वास करते हैं।
यहां कर्नाटक कांग्रेस भवन में महात्मा गांधी और दिवंगत प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के उपलक्ष्य में कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से आयोजित कार्यक्रम में श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद अपने संबोधन में खड़गे ने आरोप लगाया कि मोदी की नीतियां- चाहे वह नोटबंदी हो, जल्दबाजी में जीएसटी लागू करना हो, या तीनों कृषि विधेयकों को पारित कराना हो--ये तीनों बिल कुछ और नहीं, बल्कि यह भविष्य में 'मारो जवान, मारो किसान' की प्रतिध्वनि हैं।
उन्होंने कहा, "मोदी को हमारे देश का इतिहास पढ़ना चाहिए। कम से कम उन्हें चंपारण सत्याग्रह के बारे में पढ़ना चाहिए। इस सत्याग्रह में, वे किसान थे जो महात्मा गांधी के पीछे खड़े थे और इसने पूरे स्वतंत्रता संग्राम का चेहरा बदल दिया।"
उत्तर प्रदेश सरकार को भी आड़े हाथों लेते हुए खड़गे ने कहा कि देश में दलितों को उनकी राजनीतिक आजादी मिली है, लेकिन वे सामाजिक स्वतंत्रता हासिल करने से बहुत दूर हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में दलितों के साथ कैसा बर्ताव किया जा रहा है, इसे देखने के लिए हर कोई मौजूद था।
खड़गे ने यह भी सवाल किया कि उत्तर प्रदेश पुलिस कांग्रेस नेताओं के साथ बदसलूकी कैसे कर सकती है? हमारे नेता प्रियंका गांधी और राहुल गांधी सबसे शांतिपूर्ण तरीके से हाथरस जा रहे थे। वे बार-बार कह रहे थे कि वे अकेले चले जाएंगे, लेकिन पुलिस ने उनकी बात सुनने के बजाय उनके साथ हाथापाई की। यह सत्ता में होने के दंभ का मामला है।
मुंबई, 3 अक्टूबर (आईएएनएस) आगामी वेब सीरीज 'ब्लैक विडोज' में चार प्रमुख महिला कलाकार मोना सिंह, स्वस्तिका मुखर्जी, शमिता शेट्टी और राइमा सेन शो को लेकर बहुत उत्साहित हैं। उनका कहना है कि यह सीरीज उन्हें शक्तिशाली तरीके से पेश करती हैं। इस वेब सीरीज का भारतीय संस्करण यूक्रेन, एस्टोनिया, लिथुआनिया, मध्य पूर्व, मेक्सिको, स्कैंडिनेविया और चेक रिपब्लिक के बाद आठवां अंतर्राष्ट्रीय रीमेक होगा।
शो के बारे में बात करते हुए मोना ने कहा, "हमने शो की शूटिंग के दौरान शानदार समय बिताया और क्रू टीम का हर सदस्य बेहतरीन प्रोडक्शन देने के लिए अपनी सीमा के पार जाकर मेहनत कर रहे हैं। मुझे भरोसा है कि फस्र्ट लुक दिलचस्पी पैदा करेगा।"
स्वास्तिका ने कहा, "अंतर्राष्ट्रीय शो की प्रतिष्ठा को देखते हुए टीम पर यह एक बड़ी जिम्मेदारी है और सभी कलाकार कुछ असाधारण पेश करने के लिए प्रयासरत हैं।"
राइमा ने कहा, "'ब्लैक विडोज' की शूटिंग मजेदार यात्रा रही है। स्पष्ट रूप से बेहतरीन किरदारों के साथ कलाकारों का प्रतिभाशाली समूह है। निश्चित रूप से पहला लुक दर्शकों को हमारी प्रत्येक भूमिका की छोटी झलक देगा।"
इस शो में शरद केलकर, परमब्रत चट्टोपाध्याय, आमिर अली और सब्यसाची चक्रवर्ती भी हैं।
बिरसा दासगुप्ता द्वारा निर्देशित यह शो भारत के एक छोटे से शहर पर आधारित है। यह तीन सबसे अच्छी सहेलियों की इर्दगिर्द घूमता है।
यह सीरीज दिसंबर में जी5 पर प्रीमियर होगा।


