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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 19 अक्टूबर। राज्य में आज शाम 6.00 तक 2002 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। इनमें सर्वाधिक 226 अकेले रायपुर जिले के हैं। केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर के इन आंकड़ों के मुताबिक आज शाम तक 5 जिलों में सौ-सौ से अधिक कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
आईसीएमआर के मुताबिक आज बालोद 89, बलौदाबाजार 91, बलरामपुर 10, बस्तर 95, बेमेतरा 23, बीजापुर 48, बिलासपुर 147, दंतेवाड़ा 53, धमतरी 66, दुर्ग 181, गरियाबंद 18, जीपीएम 2, जांजगीर-चांपा 183, जशपुर 36, कबीरधाम 34, कांकेर 44, कोंडागांव 54, कोरबा 90, कोरिया 50, महासमुंद 68, मुंगेली 50, नारायणपुर 9, रायगढ़ 150, रायपुर 226, राजनांदगांव 74, सुकमा 20, सूरजपुर 37, और सरगुजा 54 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर के इन आंकड़ों में रात तक राज्य शासन के जारी किए जाने वाले आंकड़ों से कुछ फेरबदल हो सकता है क्योंकि ये आंकड़े कोरोना पॉजिटिव जांच के हैं, और राज्य शासन इनमें से कोई पुराने मरीज का रिपीट टेस्ट हो, तो उसे हटा देता है। लेकिन हर दिन यह देखने में आ रहा है कि राज्य शासन के आंकड़े रात तक खासे बढ़ते हैं, और इन आंकड़ों के आसपास पहुंच जाते हैं, कभी-कभी इनसे पीछे भी रह जाते हैं।
जानेमाने अभिनेता जॉनी लीवर बॉलीवुड के ऐसे कलाकारों में से एक हैं जिन्होंने कॉमेडियन के तौर पर इंडस्ट्री में अपनी ख़ास पहचान बनाई है. जॉनी लीवर की तरह ही अब उनकी बेटी जेमी लीवर भी उनके ही नक्शे कदम पर चल रही हैं.
जेमी साल 2015 में कॉमेडियन कपिल शर्मा की फिल्म 'किस-किस को प्यार करूं' और फिर 'हाउस फुल 4' में नज़र आईं थीं. उन्होंने फिलहाल दो ही हिंदी फिल्में की हैं, लेकिन स्टैंडअप कॉमेडी में अपना एक अलग मुकाम बनाने में वो कामयाब रहीं हैं.

कॉमेडी में बाप-बेटी की हिट जोड़ी
बाप-बेटी की ये जोड़ी ना केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी कई स्टेज शोज भी कर चुकी है. और ये बेहद कामयाब भी रहे हैं.
अपनी इस हिट जोड़ी के बारे में बीबीसी हिंदी से ख़ास बातचीत में जेमी ने बताया, "पापा जब घर पर रहते हैं तो वे बेहद ही साधारण तरीके से रहते हैं, अपने बचपन और संघर्ष के दिनों की कहानियां सुनाते हैं लेकिन जब उनके साथ कोई कार्यक्रम करती हूँ तो स्टेज पर मुझे बहुत डर लगता है."
"स्टेज पर वो मेरे पिता नहीं बॉस होते हैं और जब वो मेरे बॉस होते हैं तो बहुत सख़्त बन जाते हैं और उन्हें काम में कोई लापरवाही पसंद नहीं है. पापा ने कई साल लगा दिया अपनी एक पहचान बनाने में और मुझे डर रहता है कि मुझसे स्टेज पर कोई ग़लती ना हो इस लिए मैं स्टेज पर जाने से पहले दोगुनी मेहनत करती हूँ."
ऐसी ट्रेनिंग की मुश्किलों का जिक्र करते हुए जेमी लीवर ने बीबीसी को बताया, "पापा एक कोने में बैठ कर मुझसे मेरी लाइनें पूछते हैं और जब मैं उनको वो सुना रही होती हूँ तो वो ज़रा सा भी चेहरे पर कोई भाव नहीं लाते और फिर वो मुझे कहते कि इसे समझने की कोशिश करो, पूरे दिल से. कई बार तो मेरे आँखों में आंसू तक आ जाते. आज मैं जितना भी सीख पाई हूँ, उन्हीं से सीखा है."

क्रिएटिव काम करने की इच्छा
मुंबई से मास कम्यूनिकेशन और फिर लंदन की वेस्टमिंस्टर यूनिवर्सिटी से मार्केटिंग कम्युनिकेशन में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त करने के बाद साल 2012 में उन्होंने लंदन की एक कंपनी में सेल्स एग्जिक्यूटिव के तौर पर नौकरी भी की लेकिन एक दिन सबकुछ छोड़कर वापस लौट आईं.
इतनी पढ़ाई लिखाई के बाद स्टैंडअप कॉमेडी करने का ख्याल कैसे आया, इस सवाल पर जेमी ने बताया, "बचपन से ही मुझे अपने दोस्तों, अध्यापकों, आंटी लोगों की नक़ल उतारना पसंद था. मेरे माता-पिता मेरी इस रूचि को अच्छी तरह पहचानते भी थे. वो आज भी कहते हैं कि तुम्हारे अंदर वो कीटाणु थे लेकिन उन्होंने कभी बताया नहीं क्योंकि वो चाहते थे कि मैं और मेरा भाई पहले अपनी पढ़ाई पूरी करें और साथ में दूसरी नौकरी करें और फिर अपने शौक पूरे करें."
क्रिएटिव काम करने की चाहत पर जेमी ने बताया, "जब लंदन में थी तो मैं अक्सर यही सोचती थी कि ऐसा क्या करूं जिससे मुझे ख़ुशी मिले क्योंकि मैं वहां खुश नहीं थी. मुझे अक्सर ऐसा लगता था कि मैं कोई क्रिएटिव काम करूं, इसलिए मैं सब कुछ छोड़ वापस जब मुंबई आई तो मैंने पापा को बताया और पापा ने कहा अगर तुमने ठान ही लिया है तो अपने लिए खुद रास्ता भी तलाशो, मैं तुम्हारी मदद नहीं करूँगा."

अपने दम पर बनाई पहचान
पापा की बातों से जेमी कितनी निराश हुईं, इस सवाल पर उन्होंने कहा, "पापा का मेरी मदद ना करने के पीछे उनका अपना स्ट्रगल छिपा था. वो अक्सर बताते हैं कि अपने शुरुआती दिनों में वो कई छोटे-छोटे स्टेज शो किया करते थे. फिर कल्याण और आनंद जी ने उनका काम देखा और अपना लिए स्टेज शो करने का उन्हें मौका दिया और फिर किसी फ़िल्म में किसी को एक रोल के लिए एक एक्टर चाहिए था जो लोगों को हंसा सके, तब कल्याण जी आनंद जी ने पापा के नाम का सुझाव दिया. इस तरह उन्हें काम मिला."
जेमी को भी जॉनी लीवर की तरह शुरुआत करनी पड़ी. उन्होंने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा, "जब मैंने स्टेज शो किये तो ऐसे बहुत से लोग थे जो मुझे कहीं ना कही देख चुके थे. वो ये नहीं जानते थे कि मैं जॉनी लीवर की बेटी हूँ. लोगों ने मुझे स्टेज शो, फिर टीवी शो पर देखा और फिर मेरे कुछ यूट्यूब वीडियो वायरल हो गए. इसके बाद फ़िल्मों में काम मिलने लगा. ना कोई सिफ़ारिश, ना ही किसी को फ़ोन कर मदद मांगी. बहुत साधारण तरीके से धीरे- धीरे मेरा रास्ता निकला."

कलाकारों की मिमिक्री करना आसान काम नहीं
हमने कई पुरुष कलाकारों को देखा है जो कलाकारों की मिमिक्री करते हैं लेकिन महिलाओं में गिनी चुनी ही हैं जिन्होंने सफलता हासिल की है. जेमी इन्ही में से एक हैं जो कलाकारों की मिमिक्री करती हैं और उनकी एक्टिंग की भी हूबहू नक़ल निकालती हैं.
अपने इस टैलेंट के बारे में बात करते हुए वो कहती हैं, "कलाकारों की हूबहू मिमिक्री करने के लिए बहुत अभ्यास करना पड़ता है. दो से तीन हफ्ते तक मैं उनके सारे वीडियो, उनकी फ़िल्में, उनके अवॉर्ड शो जहाँ भी वो गए हैं, उन सभी वीडियोज़ को दिन रात देखती हूँ. मेरे पिता ने मुझे बहुत अच्छे से समझाया है कि आप उन कलाकरों की रूह पर कब्ज़ा कर लें, उनकी रूह को समझ लो तो तुम उन जैसा कर पाओगी."
डर लगता है कि कहीं किसी का रात में फ़ोन ना आ जाए
जेमी ने कई स्टेज शो और अवॉर्ड शो में कलाकारों की मिमिक्री की है लेकिन क्या कभी किसी कलाकर ने ऐसा करने पर कोई अप्पति जताई है, इस पर वो कहती हैं, "कलाकारों की मिमिक्री करते वक़्त मुझे भी बहुत डर लगता है. ये सोचकर की कहीं रात में उनका फ़ोन ना आ जाए कि तुम हमारी नकल क्यों कर रही हो? ऐसा करने से पहले मैं इस बात का ज़रूर ध्यान रखती हूँ कि मैं किसी का दिल न दुखा दूं, ना ही किसी की निजी ज़िन्दगी पर ज़्यादा बात करूँ और ना ही किसी पर नकारात्मक हमला करूँ."
जेमी बताती हैं, "पापा ने हमेशा कहा है कि कभी किसी की नकल करो तो इस तरह से करो की उन्हें भी बुरा ना लगे और वो भी तुम्हारे काम को पसंद करें. हमारे भारतीय दर्शक बहुत संवेदनशील हैं, बेहद भावुक जनता है, अगर तुम किसी कलाकार का ग़लत मज़ाक उड़ाओगे तो वो नाराज़ हो सकते हैं. इसलिए इस काम को पूरी ज़िम्मेदारी से करना ज़रूरी है."
जेमी ने अपनी पहचान ज़रूर बना ली है लेकिन अभी भी उन्हें जॉनी लीवर जितना मशहूर होने के लिए सालों काम करना होगा और इस दौरान उन्हें अपने पिता की छवि से भी निकलना होगा, जो मुश्किल चुनौती के रूप में उनके सामने खड़ी है. (bbc)
प्रदेश भाजपा की वर्चुअल बैठक में भूपेश सरकार की तीखी आलोचना
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 19 अक्टूबर। प्रदेश भाजपा की कार्यसमिति की वर्चुअल बैठक में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धमेंद्र प्रधान ने नए कृषि कानून को क्रांतिकारी बताया और कहा कि केंद्र सरकार 10 हजार करोड़ की लागत से सौ करोड़ लीटर एथेनॉल बनाएगी। इसमें एफसीआई के धान का उपयोग किया जाएगा, जिससे छत्तीसगढ़ को भी फायदा होगा। प्रधान ने कांग्रेस पर निशाना साधा और कहा कि कांग्रेस स्वयं के हित और एक परिवार से आगे कुछ नहीं सोच सकती। बैठक में राजनीतिक प्रस्ताव पारित किए गए, जिसमें भूपेश सरकार की कार्यप्रणाली की तीखी आलोचना की गई।
श्री प्रधान ने केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नए कृषि कानूनों को देशभर के अन्नदाता किसानों के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरुआत बताते हुए कहा है कि केंद्र सरकार की कृषि नीति से सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़ का किसान लाभन्वित होगा। इससे किसानों की आय दोगुनी होगी। इस बिल से कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा और किसानों की पहुंच विश्व बाजार तक होगी। छत्तीसगढ़ के किसान की उपज, वनोपज, टेक्सटाइल उद्योग के लोग आत्मनिर्भर भारत के विचार से जुडक़र तरक्की कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री श्री प्रधान सोमवार को भाजपा की नवगठित प्रदेश कार्यसमिति की पहली वर्चुअल बैठक के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे।
केंद्रीय मंत्री श्री प्रधान ने कांग्रेस की संकीर्ण राजनीतिक सोच और शासन संचालन में विफलता पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस राज्य को अटल जी ने बनाया और हमने अपनी मेहनत से सींचा, उसे कांग्रेस बर्बाद कर रही है। छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार दिल्ली, हैदराबाद में अंग्रेजी में विज्ञापन देकर छत्तीसगढ़ की तरक्की का नाटक खड़ा करने का प्रयत्न कर जनता का पैसा बर्बाद कर रही है। बैठक में प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने राजनीतिक प्रस्ताव पेश कर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर जमकर निशाना साधा। राजनीतिक प्रस्ताव का भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष शिवरतन शर्मा ने समर्थन किया।
इससे पहले भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ को आज देखते ही देखते हत्या, डकैती, लूट, तस्करी का गढ़ बना दिया गया है। छोटी-छोटी बालिकाओं से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक से हो रहे दुष्कर्म की खबरों ने हमारा मस्तक शर्म से झुका दिया है। बस्तर से लेकर सरगुजा तक ऐसी शर्मनाक खबरें हमें रोज लज्जित कर रही हैं। अनेक ऐसी घटनाओं में कांग्रेस के नेताओं की सहभागिता और समर्थन ने हालात को और खराब बनाया है।

बैठक में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने राजनीतिक प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए केंद्र के कृषि सुधार कानून को किसानों की वास्तविक आजादी का घोषणा पत्र बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कृषि सुधार के एक नए युग ने प्रवेश करने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कृषक द्रोही सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ में 2019 में 233 किसान और खेतिहर ने आत्महत्या की और स्वयं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के जिले में इसी माह नंदिनी थानान्तर्गत लीलूराम पटेल व प्रदेश के इतिहास में पहली बार नकली कीटनाशक के कारण दुर्गेश निषाद ने आत्महत्या कर ली।
उन्होंने कहा कि युवा, महिला, सरकारी कर्मचारी सरकार के वादाखिलाफी, जनता शराब, खनिज माफिया से त्रस्त है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष व विधायक शिवरतन शर्मा ने नेताप्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक द्वारा लाए गए राजनीतिक प्रस्ताव का समर्थन किया जिसे हाथ उठा कर ध्वनिमत से सभी ने समर्थन कर राजनीतिक प्रस्ताव पास किया। बैठक में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह सहित अन्य नेता मौजूद थे।
इस्लामाबाद, 19 अक्टूबर | पुलिस ने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के दामाद और उनकी पीएमएलएन पार्टी के नेता मोहम्मद सफ्दर को गिरफ्तार कर लिया है. शरीफ की बेटी मरयम नवाज ने ट्वीट कर के बताया कि वो कराची में जिस होटल में ठहरी हुई हैं पुलिस उस में घुस आई, उनके कमरे का दरवाजा तोड़ दिया और वहां से सफ्दर को गिरफ्तार कर लिया. सफ्दर के खिलाफ इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्नाह की कब्र पर राजनीतिक नारे लगाने के आरोप लगाए थे, जो गैर-कानूनी है.
सफ्दर की पत्नी और नवाज शरीफ की बेटी मरयम नवाज ने रविवार की रैली में सरकार के खिलाफ भाषण दिया था और प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया था कि उन्होंने, "लोगों से नौकरियां छीन ली हैं...और लोगों से दो वक्त की रोटी भी छीन ली है." बताया जा रहा है कि रविवार की रैली में विपक्ष के लाखों समर्थक मौजूद थे जो प्रधानमंत्री को हटाने का एक अभियान शुरू कर चुके हैं. उनका आरोप है कि खान को दो साल पहले चुनावों में धांधली कर के सेना ने प्रधानमंत्री बनवा दिया था.
कराची में हुआ यह प्रदर्शन विपक्षी पार्टियों के गठबंधन पाकिस्तानी डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) द्वारा तीन दिनों में आयोजित किया गया दूसरा प्रदर्शन था. पीडीम नौ मुख्य विपक्षी पार्टियों का गठबंधन है जिसने सरकार के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन शुरू करने की योजना बनाई है. खान के नेतृत्व में पाकिस्तान में मीडिया सेंसरशिप और मतभेदों, आलोचकों और विपक्ष के खिलाफ कठोर कार्रवाई बढ़ी है.
Pakistan Oppositionsparteien in Gujranwala (Tanvir Shahzad/DW)
विपक्ष ने पंजाब प्रांत में पीएमएलएन के गढ़ गुजरांवाला शहर में एक विशाल रैली आयोजित की थी जिसे लंदन से एक वीडियो लिंक के जरिए संबोधित करते हुए नवाज शरीफ ने सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा पर 2018 के चुनावों में धांधली करवाने का आरोप लगाया था.
लेकिन उनके खिलाफ जो अभियान छेड़ा गया है उसमें उनके अर्थव्यवस्था के प्रबंधन को केंद्र में रखा गया है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के आने से पहले ही नीचे गिर रही थी. रविवार की रैली में मरयम नवाज ने देश के एक और पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल भुट्टो जरदारी के साथ मंच साझा किया. कराची में जरदारी की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की ही सरकार है. रैली में अपने भाषण में उन्होंने कहा, " हमारे किसान भूखे हैं...हमारा युवा निराश हैं." यह संदेश देश में बढ़ती महंगाई और नेगेटिव आर्थिक विकास देख रहे उनके समर्थकों को लुभा गया.
63 वर्षीय विपक्षी नेता फकीर बलोच ने रैली में कहा,"महंगाई ने गरीबों की कमर तोड़ दी है और कइयों को अपने बच्चों का पेट भरने के लिए भीख मांगने पर मजबूर कर दिया है... इस सरकार के जाने का वक्त आ गया है." उनका भाषण सुन कर समर्थकों की भीड़ ने "जाओ इमरान जाओ" के नारे लगाए. पाकिस्तान में अगले आम चुनाव 2023 में होने हैं. शुक्रवार को विपक्ष ने पंजाब प्रांत में पीएमएलएन के गढ़ गुजरांवाला शहर में एक विशाल रैली आयोजित की थी.
लंदन से एक वीडियो लिंक के जरिए रैली को संबोधित करते हुए नवाज शरीफ ने सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा पर 2018 के चुनावों में धांधली करवाने का आरोप लगाया था. उन्होंने बाजवा ओर 2017 में उन्हें सत्ता से हटवाने का भी आरोप लगाया था. उन्होंने यह भी कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप मनगढंत हैं. सेना ने अभी तक शरीफ के आरोपों पर प्रतिक्रिया नहीं दी है. खान ने इन आरोपों का खंडन किया है और सेना का समर्थन किया है. शनिवार को उन्होंने विपक्ष के नेताओं के खिलाफ और भी कठोर कार्रवाई की धमकी भी दी. (DW)
भोपाल, 19 अक्टूबर (आईएएनएस)| मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ की कथित तौर पर मंत्री इमरती देवी को 'आइटम' बताए जाने वाली टिप्पणी से सियासी बवाल मचा हुआ है। मुखयमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ पर कार्रवाई की मांग करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को खत लिखा है। सोनिया गांधी को सोमवार को लिखे पत्र में शिवराज ने कहा है कि "मध्यप्रदेश कांग्रेस इकाई के अध्यक्ष कमल नाथ ने कैबिनेट मंत्री और अनुसूचित जाति वर्ग की महिला नेत्री इमरती देवी पर अभद्र एवं अशोभनीय टिप्पणी की है। जब उन्होंने यह टिप्पणी की, तब ठहाके भी लगाए। यह टिप्पणी इतनी अभद्र है कि मैं उसका उल्लेख अपने पत्र में करना किसी भी महिला का पुन: अपमान करने जैसा मानता हूं।"
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में कहा है, "मुझे इस बात की उम्मीद थी कि आप स्वयं महिला होने के नाते कमल नाथ के इस बयान को लेकर प्रकाशित हुई खबरों के आधार पर संज्ञान लेंगी तथा संवैधानिक पद पर आसीन एक महिला के अपमान का प्रतिकार करते हुए अपनी पार्टी के नेता की टिप्पणी की निंदा करेंगी और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेंगी, लेकिन आपने अब तक ऐसा नहीं किया है।"
चौहान ने आगे लिखा है कि कमल नाथ की टिप्पणी के बाद आपने अपने महासचिवों के साथ बैठक की, जिसमें महिलाओं के सम्मान पर चर्चा की गई, लेकिन आपने पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ द्वारा की गई टिप्पणी पर संज्ञान लेने की कोई जरूरत महसूस नहीं की, वहीं दूसरी ओर कमल नाथ की धृष्टता देखिए कि अपनी अशोभनीय व निंदनीय टिप्पणी को भी वे सही ठहरा रहे हैं।
शिवराज ने सोनिया से आग्रह किया है एक दलित महिला के प्रति अभद्र व अशोभनीय टिप्पणी करने वाले और उसे जायज ठहराने वाले पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करते हुए उन्हें पार्टी के सभी पदों से हटाएं। साथ ही उनकी कड़ी निंदा भी करें, ताकि महिलाओं का अपमान करने वाले आपकी पार्टी के नेताओं को सबक मिले।
नई दिल्ली, 19 अक्टूबर (आईएएनएस)| 'द इंडियन फार्मर्स परसेप्शन ऑफ द न्यू एग्री लॉज' ने पाया है कि देश में हर दूसरा किसान संसद से हाल ही में पारित तीन कृषि कानूनों के खिलाफ है, जबकि 35 प्रतिशत किसान इन कानूनों का समर्थन करते हैं। ये खुलासा हुआ है गांव कनेक्शन के एक सर्वे में। हालांकि, यह भी पाया गया कि कृषि कानूनों का विरोध करने वाले 52 फीसदी किसानों में से 36 प्रतिशत से अधिक इन कानूनों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते। इसी तरह, कृषि कानूनों का समर्थन करने वाले 35 प्रतिशत किसानों में से लगभग 18 प्रतिशत को उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता।
गांव कनेक्शन ने ये सर्वेक्षण 3 अक्टूबर से 9 अक्टूबर के बीच देश के 16 राज्यों के 53 जिलों में करवाया था।
सर्वेक्षण के अनुसार, 57 प्रतिशत किसानों में इस बात का डर है कि नए कृषि कानून लागू होने के बाद खुले बाजार में उनको अपनी फसल कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। जबकि 33 प्रतिशत किसानों को डर है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था को खत्म कर देगी।
दिलचस्प बात है कि इन कृषि कानूनों का विरोध करने वाले आधे से अधिक (52 प्रतिशत) किसानों में से 36 प्रतिशत को इन कानूनों के बारे में विशेष जानकारी नहीं है। लगभग 44 प्रतिशत किसानों ने कहा कि मोदी सरकार 'प्रो-फार्मर' (किसान समर्थक) है, जबकि लगभग 28 फीसदी ने कहा कि वो 'किसान विरोधी' हैं।
इसके अलावा, सर्वेक्षण के एक अन्य प्रश्न में, अधिकांश किसानों (35 प्रतिशत) ने कहा कि मोदी सरकार ने किसानों के लिए अच्छा काम किया है, जबकि लगभग 20 प्रतिशत ने कहा कि सरकार निजी कंपनियों के समर्थन में है।
बता दें कि किसान और किसान संगठनों का एक वर्ग नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहा है। इन नए कानूनों पर किसानों की राय जानने के लिए, गांव कनेक्शन ने देश के सभी क्षेत्रों में फैले 5,022 किसानों का सर्वेक्षण किया।
सर्वेक्षण में पाया गया कि कुल 67 प्रतिशत किसानों को इन तीन कृषि कानूनों के बारे में जानकारी थी। दो-तिहाई किसान देश में चल रहे किसानों के विरोध के बारे में जानते थे। विरोध के बारे में जागरूकता सबसे ज्यादा देश के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र (91 प्रतिशत) के किसानों में थी, जिसमें पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश शामिल है। पूर्वी क्षेत्र (पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़) में किसानों के विरोध के बारे में सबसे कम (46 प्रतिशत) जागरूकता देखी गई।
‘छत्तीसगढ़’ न्यूज डेस्क
कोरोना को पूरी तरह रोक पाना नामुमकिन सा लग रहा है, लेकिन बचाव के तरीके इस्तेमाल करके इसके खतरे को घटाया जरूर जा सकता है। अभी ब्रिटेन की एक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने यह सुझाव दिया है कि लोगों को अपने घर से बाहर निकलने के ठीक पहले दांतों को ब्रश करना चाहिए क्योंकि टूथपेस्ट में उसी किस्म के एंटीबैक्टीरियल केमिकल होते हैं जैसे कि हाथ साफ करने वाले सेनेटाइजर में होते हैं। इस विशेषज्ञ का दावा है कि टूथपेस्ट का असर कुछ घंटे तक कायम रहता है, और वह मुंह के रास्ते कोरोना के संक्रमण के खतरे को घटाता है। प्रोफेसर मार्टिन एडी का कहना है कि लोग जब काम पर निकलते हैं, या बाजार जाते हैं, तो उसके ठीक पहले उन्हें टूथपेस्ट के साथ ब्रश करके निकलना चाहिए। उनका यह कहना है कि माउथवॉश के इस्तेमाल से भी मुंह में कोरोना वायरस की मौजूदगी को घटाया जा सकता है, और ऐसे व्यक्ति से दूसरों तक इसके फैलने का खतरा भी कम हो सकता है। उनका सुझाव है कि लोगों को अधिक बार ब्रश करना शुरू कर देना चाहिए।
अबू धाबी, 19 अक्टूबर (आईएएनएस)| आस्ट्रेलियाई सलामी बल्लेबाज डेविड वार्नर ने भारतीय बल्लेबाज विराट कोहली को पछाड़कर आईपीएल में सबसे तेज 5000 रन बनाने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है। आईपीएल फ्रेंचाइजी सनराइजर्स हैदराबाद के कप्तान वार्नर ने रविवार को यहां शेख जायेद स्टेडियम में कोलकाता नाइट राइडर्स के खिलाफ खेले गए मुकाबले में यह उपलब्धि हासिल की।
वार्नर आईपीएल के इतिहास में 5000 रन बनाने वाले चौथे खिलाड़ी हैं। उन्होंने 135 आईपीएल मैचों में यह रिकॉर्ड अपने नाम किया जबकि कोहली ने आईपीएल में 5000 रन तक पहुंचने के लिए 157 पारियों का सहारा लिया था।
आईपीएल में 5000 रन बनाने वाले बल्लेबाजों की सूची में चेन्नई सुपर किंग्स के बल्लेबाज सुरेश रैना तीसरे और मुंबई इंडियंस के कप्तान रोहित शर्मा चौथे नंबर पर हैं।
वार्नर ने आईपीएल में अब तक 135 मैचों में 5037 रन बनाए हैं, जिसमें उनके नाम चार शतक और 46 अर्धशतक दर्ज हैं।
वार्नर की टीम सनराइजर्स हैदराबाद ने आईपीएल-13 में नौ मैचों में अब तक तीन जीते हैं। टीम को अपना अगला मुकाबला गुरुवार को राजस्थान रॉयल्स के साथ खेलना है।
लाहौर, 19 अक्टूबर (आईएएनएस)| पाकिस्तान के अनुभवी आलराउंडर शोएब मलिक को 30 अक्टूबर से जिम्बाब्वे के खिलाफ होने वाली सीमित ओवरों की घरेलू सीरीज के लिए राष्ट्रीय टीम में नहीं चुना गया है। पाकिस्तान ने पिछले 12 महीने से घर में कोई भी वनडे सीरीज नहीं खेली है और अब उसे जिम्बाब्वे के साथ घर में तीन मैचों की वनडे सीरीज और फिर इतने ही मैचों की टी20 सीरीज खेलनी है।
सीरीज के कार्यक्रम के अनुसार, जिम्बाब्वे को रावलपिंडी में 30 अक्टूबर, एक नंबर और तीन नवंबर को वनडे मैच खेलने हैं। वनडे सीरीज विश्व कप सुपर लीग का हिस्सा है।
विश्व कप सुपर लीग की टॉप सात टीमें 2023 में होने वाले विश्व कप में भाग लेंगी। जिम्बाब्वे को इसके बाद लाहौर में सात, आठ और 10 नवंबर को टी 20 मैच खेलने है। पिछले पांच वर्षो में जिम्बाब्वे का यह दूसरा पाकिस्तान दौरा होगा।
पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) ने एक बयान में कहा कि अब्दुल्ला शफीक और रोहैल नजीर जैसे युवा खिलाड़ियों को मौका देने के लिए मलिक को पाकिस्तान टीम में नहीं चुना गया है। इस सीरीज के लिए विकेटकीपर मोहम्माद रिजवान को बैकअप के लिए रखा गया है।
मलिक के अलावा इंग्लैंड दौरे के लिए पाकिस्तान टीम का हिस्सा रहे सरफराज अहमद ने भी इस सीरीज में नहीं खेलने का फैसला किया है ताकि युवा खिलाड़ियों को मौका मिल सके।
पाकिस्तान के मुख्य कोच और चयनकर्ता प्रमुख मिस्बाह उल हक ने कहा, "मलिक और सरफराज को इस सीरीज के लिए नहीं चुना गया है, लेकिन मैं यह साफ करना चाहता हूं कि अभी उनका करियर खत्म नहीं हुआ है। एक रणनीति के तहत यह फैसला लिया गया है ताकि अब्दुल्ला शफीक, हैदर अली और खुशदिल शाह जैसे खिलाड़ियों को मौका मिल सके।"
जिम्बाब्वे सीरीज के लिए पाकिस्तान की संभावित: टीम : बाबर आजम (कप्तान), शादाब खान (उप-कप्तान), अब्दुल्ला शफीक, आबिद अली, फहीम अशरफ, फखर जमान, हैदर अली, हैरिस राउफ, हैरिस सोहेल, इफ्तिखार अहमद, इमाद वसीम, इमाम उल-हक, खुशदिल शाह, मोहम्मद हफीज, मोहम्मद हसनैन, मोहम्मद रिजवान, मूसा खान, रोहेल नजीर, शाहीन शाह अफरीदी, उस्मान कादिर, वहाब रियाज और जफर गोहर।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 19 अक्टूबर। कोरोना केस के मामलों में नियंत्रित रहे गौरेला जिले में मरवाही उप चुनाव के लिये जिस तरह रैलियां, सभायें की जा रही हैं उससे संक्रमण के फैलाव का बड़ा खतरा पैदा हो गया है। हाल में बढ़े आंकड़े इसकी पुष्टि कर रहे हैं। चूंकि इन आयोजनों के पीछे प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रभावशाली नेता हैं, प्रशासन, स्थानीय निकाय और स्वास्थ्य विभाग ने भी अपने हाथ खड़े कर लिये हैं। हालांकि उन्होंने बकायदा इसके लिये हाल ही में शपथ ली थी।
कोविड-19 संक्रमण के बीच मरवाही विधानसभा उप-चुनाव की प्रक्रिया सम्पन्न कराई जा रही है। चुनाव आचार संहिता लागू होने के पहले ही कोरोना गाइडलाइन के उल्लंघन की शिकायतें आने लग गई थीं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों एक दूसरे पर भीड़ एकत्र करने की शिकायत करते रहे लेकिन दोनों ही कोरोना प्रोटोकॉल के उल्लंघन में पीछे नहीं रहे। यहां तक कि मंत्रियों की मौजूदगी में शासकीय कार्यक्रम हुए, पार्टी की बैठकें हुईं।
सरकारी बैठकों में अफसरों, नेताओं, कार्यकर्ताओं का काफिला चलता रहा। आचार संहिता लागू होने के बाद भी यह सिलसिला जारी है। कांग्रेस के आठ मंत्री और 50 विधायकों को गौरेला जिले में चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी दी गई है। दूसरी ओर प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के भी प्रदेश स्तरीय नेता गांव-गांव में घूमकर सभायें कर रहे हैं। नामांकन रैली पर रोक लगाई गई थी लेकिन दोनों ही दलों ने जब नामांकन के लिये सभायें की तो सोशल डिस्टेंसिंग की किसी ने परवाह नहीं की।
गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिले में कोरोना का फैलाव बहुत धीमा रहा है। शहडोल के एक लडक़े से पहली बार कोरोना का केस सामने आया था, लेकिन उस पर काबू पा लिया गया था। ठीक दो माह पहले 18 अगस्त को जब प्रदेश में 6726 एक्टिव केस थे गौरेला जिले में एक्टिव केस की संख्या शून्य थी। इसी तरह सितम्बर में इसी तारीख को एक्टिव केस केवल 20 थे। इसके बाद से रोजाना तीन से पांच नये केस आ रहे हैं। बीते 12 अक्टूबर को उछाल आया और एक साथ 18 नये कोरोना केस मिले। 13 अक्टूबर को नये संक्रमितों की संख्या बढक़र 27 पहुंच गई। 14 अक्टूबर को फिर 5, 16 अक्टूबर को 7, 17 अक्टूबर को 5 और अब 18 अक्टूबर की बुलेटिन के अनुसार 28 नये केस एक साथ मिले हैं, जो किसी एक दिन में मिले अब तक सर्वाधिक केस हैं।
दो माह पहले जहां एक्टिव केस की संख्या शून्य थी अब वहां यह एक्टिव केस की संख्या 90 पहुंच चुकी है और अब तक यहां 491 मामले सामने आ चुके हैं। यह वही तिथियां हैं जब नामांकन दाखिल करने, प्रत्याशी घोषित करने और उनके स्वागत के लिये गाजे बाजे के साथ जुलूस निकालने का दौर चला।
स्कू्रटनी के बाद प्रत्याशियों की अंतिम सूची और चुनाव चिन्हों का आबंटन आज होने के बाद सभी दल और निर्दलीय उम्मीदवार बड़ी संख्या में जन सम्पर्क अभियान चलायेंगे। चुनावी सभाओं में मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने, घर घर सम्पर्क के दौरान चार से ज्यादा लोगों के नहीं निकलने के निर्देश चुनाव आयोग ने दिये हैं। कोरोना संक्रमण से बचे रहें इसलिये प्रत्येक बूथ में मतदाताओं की संख्या औसत 1500 से घटाकर 1000 कर दी गई है।
कोरोना पीडि़तों और बुजुर्गों के लिये डाक मतदान की सुविधा भी दी गई है पर प्रचार के दौरान इसका पालन होता नहीं दिखाई दे रहा है। चिंता की बात यह भी है कि अभी चुनाव अभियान की शुरूआत हुई है। तीन नवंबर को मतदान की तारीख आते-आते कोरोना के प्रति लापरवाही के साथ-साथ संक्रमण के केस भी बढऩे की आशंका है। गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिला जरूर बन गया है पर यहां स्वास्थ्य सेवाओं का घोर अभाव है। गंभीर मरीजों को अभी भी 100 किलोमीटर बिलासपुर रेफर कर दिया जाता है।
बीते 8 अक्टूबर को मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी रीना कंगाले ने चुनाव प्रक्रिया का अवलोकन करने के लिये यहां का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने कर्मचारियों से शपथ दिलाई थी कि कोविड-19 महामारी से बचाव के लिये सभी उपयुक्त व्यवहार करेंगे। मतदाता जागरूकता अभियान के दौरान मास्क का प्रयोग करेंगे, सामाजिक दूरी बनाकर रखेंगे। कर्मचारी अधिकारी खुद पर तो इन नियमों को लागू कर रहे हैं लेकिन चुनाव प्रचार में लगे लोगों को इसकी परवाह है यह दिखाई नहीं देता। यही स्थिति रही तो कोरोना संक्रमण के मामले आने वाले दिनों में काफी बढ़ सकते हैं।
जोनाथन एमोस
अगर आप दुनिया के दुर्लभतम जीवों में से किसी एक की तस्वीर खींचना चाहते हैं तो आपको अपने फन में माहिर होने के साथ ही बेहद खुशकिस्मत भी होना पड़ता है.
सर्गेई गोर्शकोव के साथ ये दोनों बातें हुईं. गोर्शकोव ने रूस के सुदूर पूर्वी इलाके के घने जंगलों में साइबेरिया या आमुर बाघ की स्तब्ध कर देने वाली जो तस्वीर ली है, वह ये दोनों बातें साबित कर देती है.
गोर्शकोव की इस तस्वीर ने उन्हें इस साल का सर्वश्रेष्ठ वन्यजीव फ़ोटोग्राफ़र का तमगा दिला दिया.
गोर्शकोव की ली गई इस तस्वीर में एक बाघिन ने एक पेड़ को अपने आगोश में ले रखा है. बाघिन पेड़ की छाल से खुद को रगड़ती दिख रही है ताकि वहां अपनी गंध छोड़ सके. इस तरह इस नेशनल पार्क में वह अपना इलाका निर्धारित कर रही है.
जजों के चेयरमैन रोज किडमैन-कोक्स ने इस फ़ोटोग्राफ़ की दिल खोल कर तारीफ़ की. उन्होंने कहा, "लाइटिंग, कलर, टेक्सचर तीनों का अद्भुत संगम, जैसे, आपकी आंखों के सामने कोई ऑयल पेंटिंग रख दी गई हो."
बीबीसी न्यूज से उन्होंने कहा, "ऐसा लग रहा है मानों यह बाघिन इस जंगल का अटूट हिस्सा है. उसकी पूंछ मानों पेड़ की जड़ों में मिल गई हो. लगता है दोनों एकाकार हो गए हैं."
सबसे अद्भुत बात तो यह कि यह कैमरे में कैद की गई तस्वीर है. इसके लिए फ़ोटोग्राफ़र ने जंगल में महीनों पहले अपने कैमरे सेट कर दिए थे ताकि जैसे ही बाघिन आए वो कैमरे में कैद हो जाए.
लेकिन यह इतना भी आसान नहीं था. सर्गेई को यह अंदाज लगाना पड़ा होगा कि आखिर इस बाघिन को अपने फ्रेम में उतारने के लिए उन्हें कहां से फ़ोटो क्लिक करनी होगी और निश्चित तौर पर इसके लिए वाइल्ड लाइफ फ़ोटोग्राफ़ी की उनकी बरसों पुरानी स्किल काम आई होगी.
पूर्वी रूस के जंगलों में पाए जाने वाले बाघों पर आफत आई हुई है. लगातार शिकार की वजह से ये अब विलुप्त होने के कगार पर हैं. इन इलाकों में अब कुछ सौ बाघ ही बचे हैं. हिरणों और जंगली सूअरों की तादाद में लगातार आ रही वृद्धि की वजह से उनके लिए आहार का संकट भी खड़ा हो गया है. इसका मतलब यह है कि आमुर बाघों को अपने भोजन की तलाश के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है.
ऐसे हालात की वजह से उनकी तस्वीर खींचना और मुश्किल हो गया है. इन बाघों की किसी भी तरह से तस्वीर लेने का काम अब बेहद मशक्कत भरा हो गया है. भले ही सर्गेई की ली गई यह बेहद प्रभावी तस्वीर आपके सामने हो लेकिन इसके लिए काफी कठिनाइयां झेलनी पड़ती है. जिस कैमरा ट्रैप से यह पुरस्कृत तस्वीर ली गई है, उसे इसके मेमोरी कार्ड के साथ इस तस्वीर को निकालने के दस महीने पहले ही फील्ड में छोड़ दिया गया था.
सर्गेई को मिले इस बड़े पुरस्कार का एलान डचेज़ ऑफ़ कैंब्रिज और दो टीवी प्रेजेंटर- क्रिस पैकहम और मेगन मैक्कबिन ने किया. लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम की ओर से आयोजित एक ऑनलाइन कार्यक्रम में इस पुरस्कार का एलान किया गया.
नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम ही डब्ल्यूपीवाई प्रतियोगिता का आयोजन करता है. पिछले 56 साल से यह प्रतियोगिता लगातार आयोजित कराई जा रही है.
बड़ी सफ़ाई से शिकार- बत्तख को मुंह में दबाई लोमड़ी, फ़ोटोग्राफ़र- लीना हिक्किन, फिनलैंड

एक बार्नेकल बत्तख को मुंह में दबोचे एक कम उम्र लोमड़ी की तस्वीर उतारने वाली फिनलैंड की किशोरी फ़ोटोग्राफ़र लीना 15 से 17 साल की कैटेगरी में अव्वल रहीं. उन्हें जूनियर फ़ोटोग्राफ़र की श्रेणी में पूरी प्रतियोगिता का पहला पुरस्कार मिला. उनके इस फ़ोटोग्राफ़ में लोमड़ी इस बत्तख के सिर को अपने मुंह में इस तरह दबाए हुए हैं कि उसके खाने में हिस्सा बंटाने को तैयार भाई-बहनों को इसकी भनक तक न लगे.
रोज किडमैंड-कॉक्स ने इस तस्वीर के बारे में निर्णायकों का नज़रिया बताते हुए कहा, "निर्णायकों ने इस तस्वीर को खास तौर पर इसलिए पसंद किया क्योंकि सिर्फ एक उत्साही युवा प्रकृतिवादी ही इस तरह की तस्वीर ले सकता है. इस तस्वीर का संयोजन अद्भुत है. लीना को इस तस्वीर को लेने के लिए ज़मीन पर लेटना पड़ा होगा. तस्वीर लेते वक्त उनकी और इस युवा लोमड़ी की आंखें मिल रही होंगी."
बंदर की पोज, तस्वीर - मोजेन्स ट्रोल, डेनमार्क

नर प्रोबासिस बंदर की इस प्रोफ़ाइल को डब्ल्यूपीवाई की एनिमल पोट्रेट श्रेणी में पहला स्थान मिला. यह तस्वीर बोनिर्यो स्थित साबाह के लाबुक बे प्रोबासिस मंकी सेंक्चरी में ली गई है. इस तस्वीर में इस ध्यानमग्न बंदर की यह शानदार नाक सबसे ज़्यादा उभर कर सामने आ रही है. जैसे-जैसे यह बंदर बड़ा होगा इसकी नाक और लंबी होती जाएगी. यह नाक इसकी आवाज़ को और ज़्यादा ताक़तवर बना देगी और यह शायद उसके झुंड में उसके रुतबे का भी संकेत होगा.
एटना का आग का दरिया- तस्वीर लुइसियानो गॉडेन्जिनो, इटली

डब्ल्यूपीवाई के तहत सिर्फ जानवरों की ही तस्वीर नहीं उतारी जाती. इस तस्वीर को देखिए. यह यूरोप की सबसे सक्रिय ज्वालामुखी के उत्तरी इलाके की तस्वीर है.
इस तस्वीर ने पृथ्वी का पर्यावरण कैटेगरी में पहला पुरस्कार जीता है. यह तस्वीर लुइसियानो गॉडेन्जिनो ने खींची है. अपने सबजेक्ट के नजदीक जाने के लिए उन्हें झुलसा देने वाली गर्मी और भारी दुर्गंध छोड़ने वाली गैस के बीच डटे रहना पड़ा. उन्होंने इसे सम्मोहित करने वाला दृश्य बताया.
लुइसियानो कहते हैं, "यह जैसे किसी बड़े डायनासोर की खुरदरी और झुर्रियों वाली त्वचा पर ताज़ा खुले घाव की तरह लग रहा था."
जीवन का संतुलन, तस्वीर जैम कुलब्रास, स्पेन

जैम कुलब्रास की कैमरे से ली गई मकड़ियों को खाने में मशगूल इस ग्लास फ़्रॉग (मेंढक) की इस तस्वीर को बिहेवियर कैटेगरी (उभयचर और सरीसृप) में पहला स्थान मिला है.
जैम ने यह तस्वीर इक्वेडोर के मेंदुरिआकु रिजर्व में उतारी है. तस्वीर भारी बारिश के बीच ली गई है. इस दौरान वह एक हाथ से छाता पकड़े थे और दूसरे से कैमरे का फ़्लैश दबा रहे थे.
दो ततैयों की कहानी, फ़ोटोग्राफ़र- फ्रैंक देसचेनॉ, फ़्रांस

यहां जो ततैयों की तस्वीर आप देख रहे हैं उसे उतारने के लिए एक खास तरह के बने सुपरफास्ट शटर सिस्टम की ज़रूरत थी.
इसके जरिए ही उत्तरी फ़्रांस के नॉरमैंडी में इन दो ततैयों को फ्रेम और फ़्रीज़ किया जा सका. बाईं ओर की लाल धारियों वाली ततैये और दाईं ओर की ततैया अगले घोंसले की छेद में घुसने जा रही हैं. इस फ़ोटोग्राफ़ के लिए फ्रैंक देसचेनॉ को रीढ़विहीन जीवों (इन्वर्टीब्रेट्स) के व्यवहार कैटेगरी में पुरस्कार मिला है.
सुनहरा पल, सोंगदा काई, चीन

पानी के अंदर रहने वाले प्राणियों की तस्वीर वाली कैटेगरी में इस बार का पुरस्कार चीन के सोंगदा काई को मिला है. यह तस्वीर एक छोटी सी डायमंड बैक स्क्विड की है. जो तस्वीर है वह एक अपूर्ण लार्वा की है.
यह अंडे को सेने से पहले की स्थिति है. ऐसी स्थिति जिसमें वह पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है. सोंगदा ने इसे फिलीपींस के एनिलाओ तट पर नाइट डाइविंग के दौरान लिया था. इस प्राणी की लंबाई मात्र छह से सात सेंटीमीटर की है.
जब मां ने कहा, जी-जान से दौड़ो - शानयुआन ली, चीन

ये युवा पलास बिल्लियां हैं. ये बिल्लियां तिब्बत के पठारों में क्विंगहाई के घास वाले मैदानों (उत्तर पश्चिमी चीन) में पाई जाती हैं. शानयुआन ने इस तस्वीर को लेने के लिए इन खिलदंड़ी बिल्ली की बच्चियों को छह साल तक ट्रैक तो किया ही उनके बारे में अध्ययन भी किया. इस तस्वीर को स्तनधारी जीव वर्ग के व्यवहार कैटेगरी में पुरस्कृत किया गया.
आम तौर पर वाइल्डलाइफ फ़ोटोग्राफ़र ऑफ़ द ईयर अवार्ड सामान्य तौर पर साउथ केंसिंग्टन के नैचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में रात्रि भोज के साथ एक भव्य समारोह में दिए जाते हैं. लेकिन कोरोनावायरस संक्रमण की वजह से आयोजकों को वर्चुअल समारोह में ये पुरस्कार देने पड़े.
हालांकि इन फ़ोटो की प्रदर्शनी सामान्य तौर पर ही लगेगी. शुक्रवार को यह प्रदर्शनी लगेगी. लेकिन इसमें टिकट लगता है. प्रदर्शनी में जाने के लिए बुकिंग ज़रूरी है. अगले साल के अवार्ड के लिए नामांकन सोमवार को शुरू हो रहा है.

लेपर्ड नैशनल पार्क में सर्गेई गोर्शकोव अपना कैमरा ट्रैप तैयार करते हुए

यह इलाका काफी बड़ा है, बाघ भोजन की तलाश में यहां मीलों सफ़र करते हैं
एक-दो दिनों में जारी हो सकती है अधिसूचना
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 19 अक्टूबर। विधानसभा का दो दिनी विशेष सत्र 27 और 28 अक्टूबर से हो सकती है। इस सत्र में राज्य के नए कृषि कानून को मंजूरी मिल सकती है।
विधानसभा सत्र बुलाने के लिए सरकार ने फाइल राजभवन को भेज दी है। राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद सत्र को अधिसूचना जारी की जा सकती है।
संसदीय कार्यमंत्री रविंद्र चौबे ने मीडिया से चर्चा में कहा कि सरकार मजदूरों, किसानों और उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिए कानून बनाएगी। केंद्रीय कृषि कानून में कॉन्ट्रेक्ट फॉर्मिंग और भंडारण को लेकर कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जिससे राज्य सरकार को आशंका है कि इससे किसानों के हित प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही साथ जमाखोरी को बढ़ावा मिल सकता है। इस पर नियंत्रण के लिए कानून बनाए जा रहे हैं।
राज्य सरकार दो दिवसीय सत्र में 4 विधेयक प्रस्तुत कर सकती है। इनमें से एक विधेयक श्रम विभाग से जुड़ा है। बताया गया कि केंद्र सरकार ने सौ कर्मचारियों वाले कारखानेदारों को छटनी के लिए अनुमति दी है। इससे पहले 3 सौ मजदूर संख्या वाले कारखाने में ही छटनी की अनुमति थी। राज्य सरकार ने कृषि और श्रम कानूनों को किसानों और मजदूरों के खिलाफ बताया है और पिछली कैबिनेट में इस पर नियंत्रण के लिए कानून बनाने पर सहमति जताई थी। संबंधित विभाग इस पर काम भी कर रहे हैं।
पुुरानी प्रक्रिया से भर्ती की मांग
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 19 अक्टूबर। प्रदेश में शिक्षकों के साढ़े 14 हजार पदों पर जल्द भर्ती की मांग को लेकर चयनित सैकड़ों अभ्यर्थियों ने आज नवा रायपुर इंद्रावती भवन स्थित स्कूल शिक्षा संचालनालय का घेराव कर धरना-प्रदर्शन किया। जमकर नारेबाजी करते हुए उन्होंने चेतावनी दी है कि मांग पूरी न होने पर वे सभी बेमियादी धरना आंदोलन शुरू करेंगे।
छत्तीसगढ़ डीएड-बीएड संघ के बैनर पर शिक्षक के लिए चयनित सैकड़ों अभ्यर्थी आज नवा रायपुर में एकजुट हुए। इसके बाद वे सभी नारेबाजी करते हुए इंद्रावती भवन गेट-एक स्थित स्कूल शिक्षा विभाग के सामने धरने पर बैठ गए। उनका आरोप लगाते हुए कहना है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने हफ्तेभर में शिक्षक भर्ती प्रक्रिया तुरंत शुरू करने के निर्देश दिए थे, लेकिन विभाग द्वारा भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बजाय फिर से सत्यापन की तैयारी है। ऐसे में भर्ती में देरी के साथ गड़बड़ी हो सकती है।
संघ के दाऊद खान, सुशांत धरई व अन्य पदाधिकारियों का कहना है कि लॉकडाउन के पहले से प्रदेश में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया चल रही है। स्कूल शिक्षा विभाग में 14 हजार 580 पदों पर भर्ती की जा रही है, लेकिन कोरोना के चलतेे यह भर्ती करीब 7 महीने से नहीं हो पाई है। भर्ती शुरू करने की मांग को लेकर चयनित युवाओं ने पिछले 22 अगस्त को यहां एक दिनी धरना देकर सरकार तक अपनी बात पहुंचाई थी। सात सितंबर सीएम निवास का घेराव किया था। इस दौरान मुख्यमंत्री ने शिक्षक भर्ती प्रक्रिया हफ्तेभर में शुरू करने के निर्देश दिए थे, लेकिन इसमें और देरी हो रही है।
उनका कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में काफी अनियमिताएं भी बढ़ती जा रही है। व्याख्याताओं की अंतिम निराकरण सूची एवं शिक्षक, सहायक शिक्षक व विज्ञान प्रयोगशाला की पात्र-अपात्र सूची आनी थी, वहां मुख्यमंत्री की बातों की अवहेलना की जा रही है।
मौतें-1478, एक्टिव-26750, डिस्चार्ज-132168
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 19 अक्टूबर। प्रदेश में कोरोना मरीज 1 लाख 60 हजार पार हो गए हैं। बीती रात मिले एक हजार 894 नए पॉजिटिव के साथ इनकी संख्या बढक़र 1 लाख 60 हजार 396 हो गई है। इसमें से 1478 मरीजों की मौत हो गई है। 26 हजार 750 एक्टिव हैं और इनका एम्स समेत अलग-अलग जगहों पर इलाज चल रहा है। 1 लाख 32 हजार 168 मरीज ठीक होकर अपने घर लौट गए हैं। सैंपलों की जांच जारी है।
राजधानी रायपुर समेत प्रदेश में कोरोना संक्रमण जारी है और फिलहाल दो हजार आसपास नए पॉजिटिव मिल रहे हैं। बुलेटिन के मुताबिक बीती रात 8 बजे 1 हजार 894 नए पॉजिटिव सामने आए। इसमें बलरामपुर जिले से सबसे अधिक 179 मरीज पाए गए। रायगढ़ जिले से 176, कोरबा-159, राजनांदगांव-119 व जांजगीर-चांपा जिले से 118 पॉजिटिव मिले।
दुर्ग से 67, बालोद-71, बेमेतरा-19, कबीरधाम-30, धमतरी-70, बलौदाबाजार-76, महासमुंद-56, गरियाबंद-22, बिलासपुर-92, मुंगेली-22, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही-28, सरगुजा-39, कोरिया-38, सूरजपुर-46, जशपुर-54, बस्तर-56, कोंडागांव-15, दंतेवाड़ा-35, सुकमा-50, कांकेर-64, नारायणपुर-3, बीजापुर-43 व अन्य राज्य से 3 मरीज सामने आए हैं। ये सभी मरीज आसपास के कोरोना अस्पतालों में भर्ती कराए जा रहे हैं। इनके संपर्क में आने वालों की जांच-पहचान जारी है।
दूसरी तरफ कल 10 लोगों की मौत हो गई। इसमें 3 की मौत कोरोना से और 7 की मौत अन्य गंभीर बीमारियों के साथ कोरोना से हुई है। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग को दुर्ग एवं रायपुर जिले के अस्पतालों से पूर्व में हुई 29 और मौतों की जानकारी मिली है। इसमें 11 की कोरोना और 18 की मौत अन्य गंभीर बीमारियों के साथ कोरोना से हुई है। इस तरह कल 39 लोगों की मौत दर्ज की गई है। स्वास्थ्य अफसरों का कहना है कि प्रदेश में नए पॉजिटिव पहले की तुलना में कम आ रहे हैं। लोग नियमों का लगातार पालन करते रहे तो इसमें और कमी आ सकती है।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 19 अक्टूबर। रायपुर सांसद सुनील सोनी भी कोरोना पॉजिटिव हो गए हैं। वे होम क्वॉरंटीन हैं। उनकी तबियत ठीक है। श्री सोनी ने अपील की है जो भी उनके संपर्क में आए हैं, वे अपना ध्यान रखें।
उल्लेखनीय है कि श्री सोनी पिछले दिनों प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया के साथ ही दिल्ली से रायपुर आए थे। यहां आने के बाद पुनिया ने कोरोना जांच कराई और रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद दिल्ली में इलाज करा रहे हैं। सुनील सोनी ने भी रविवार को अपनी जांच कराई थी और उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई है। चिकित्सकों की सलाह पर वे होम क्वॉरंटीन है।
बिहार सरकार के मंत्री महेश्वर हज़ारी बाइक पर बैठ कर जनता से वोट माँगने गए।
— Jatinder Kumar ( Tony ) (@tonyJatinder9) October 18, 2020
जनता ने उन्हें खदेड़ दिया, खुद सुनिए। pic.twitter.com/LMeN8IQ5eJ
(वीडियो के शोरगुल में कुछ गालियां हो सकती हैं.. )
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 19 अक्टूबर। प्रदेश भाजपा कार्यसमिति में 21 और नेताओं को जगह दी गई है। इन सभी को फोन पर सूचना देकर बैठक में शामिल होने कहा गया है। नए शामिल किए गए सदस्यों में तीन पूर्व विधायक देवजी पटेल और नंदकुमार साहू, प्रीतम साहू भी हैं।
प्रदेश भाजपा की सूची जारी होने के बाद पार्टी के भीतर अंदरूनी घमासान शुरू हो गया था। कई सीनियर नेताओं को कार्यसमिति के सदस्य के रूप में भी शामिल नहीं किया गया था। इसकी शिकायत पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष से भी की गई थी। प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय और अन्य नेताओं से राय शुमारी के बाद 21 और नाम जोड़े गए हैं। इन सभी को कार्यसमिति के सदस्य के रूप में शामिल किया गया है।
कार्यसमिति की बैठक के ठीक एक दिन पहले सहकार्यालय प्रभारी छगनलाल मूंदड़ा ने सभी शामिल किए गए सदस्यों को फोन पर सूचना देकर बैठक में शामिल होने कहा। कार्यसमिति की वर्जुअल बैठक हो रही है। जिन नेताओं को कार्यसमिति में जगह दी गई है, उनमें नंदकुमार साहू, देवजी पटेल, नरेश गुप्ता, रसिक परमार, डॉ. सलीम राज, अशोक पांडेय, प्रफुल्ल विश्वकर्मा सभी रायपुर से हैं। इसके अलावा कोरबा से अशोक चावलानी, जोगेश लांबा, पेंड्रा-गौरेला-मरवाही से समीरा पैकरा, जशपुर से नरेश नंदे, सरगुजा से प्रबोध मिंज, रायगढ़ जिसे से जगन्नाथ पाणिग्रही, गुरूपाल सिंह भल्ला, जांजगीर-चांपा से लीलाधर सुलतानिया, धमतरी से निरंजन सिन्हा, कोण्डागांव से मनोज जैन, बिलासपुर से राजेश त्रिवेदी, मुंगेली से ठाकुर भूपेंद्र सिंह, गिरीश शुक्ला और बालोद से प्रीतम साहू को समिति में शामिल किया गया है।
- चिंकी सिन्हा
वो ज़्यादा नहीं बोलती. बोले भी तो कैसे? जब भी कोई पत्रकार, उनकी अविश्वसनीय कहानी के बारे में पता करने के लिए पहुँचता है, उनके पिता आसपास ही मौजूद रहते हैं.
आने वालों से ज़्यादातर उनके पिता ही बात करते हैं. वो ख़ुद ज़्यादा कुछ नहीं बोलतीं और कई बार तो वो बातचीत के बीच में ही अचानक उठ कर चल देती हैं.
लेकिन, आज वो दुबली-पतली लड़की एक सेलिब्रिटी है. लोग उन्हें 'साइकिल गर्ल' कहते हैं.
बतियाते हुए कभी-कभार वो मुस्कुरा देती हैं. और फिर वो वही जुमला दोहरा देती हैं, जो उन्होंने मिलने आने वाले लगभग सभी लोगों को बोला होगा. लड़की का नाम है ज्योति पासवान है.
15 बरस की ये लड़की तब सुर्ख़ियों में आई थी, जब वो लगभग 1200 किलोमीटर साइकिल चला कर, गुरुग्राम से बिहार के अपने पुश्तैनी गाँव पहुँची थी. ज्योति का गाँव बिहार के दरंभगा ज़िले में है.
ये बात इस साल के मई महीने की है, जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा हुआ था. अपने गाँव से शहर जाकर काम कर रहे मज़दूरों पर संकट छाया हुआ था. लॉकडाउन के दौरान शहरों में फँसे बड़ी संख्या में मज़दूर पैदल चल कर, साइकिल से या फिर गाड़ियों से लिफ़्ट लेकर अपने गाँव पहुँच रहे थे.
मार्च महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए अचानक पूरे देश में लॉकडाउन लगाने की घोषणा की थी.
इसी दौरान ज्योति पासवान अपने बीमार पिता मोहन पासवान को साइकिल पर बैठा कर गाँव ले आईं थीं. उसके बाद से ही, ज्योति के घर पर उनसे मिलने आने वालों का तांता लग गया था.
बिहार के दरभंगा ज़िले के सिंघवारा ब्लॉक में पड़ता है सिरहुल्ली गाँव. मोहन पासवान अब इस गाँव के बहुत ख़ास आदमी हैं. इसकी वजह उनकी बेटी ज्योति पासवान हैं.
लौटने के सिवा कोई चारा नहीं था
मोहन पासवान के घर पर लोगों का तांता लग गया था. न जाने कौन-कौन से लोग उनके घर आए थे. वो ज्योति से मिलना चाहते थे. उसे तोहफ़े देते थे. तमाम तरह के प्रस्ताव आ रहे थे. कोई अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए ज्योति को ब्रांड एम्बैसडर बनाना चाहता था, तो कोई कुछ और प्रस्ताव लेकर आया था.
दरअसल अपने बीमार पिता को साइकिल पर बैठा कर गुरुग्राम से अपने गाँव पहुँचने की ज्योति पासवान की कहानी एक त्रासदी है. भले ही इसे साहसिक क़दम बता कर आज इसका जश्न मनाया जा रहा हो. हालांकि, ये अपने आप में साहसिक क़दम भी है.
लेकिन असली साहस तो वो था कि उन्होंने ऐसा करने का फ़ैसला किया. अगर रास्ते में क़िस्मत ने साथ दिया तो बहुत बेहतर और अगर नियति पूरे सफ़र के दौरान रूठी रही, तो वो भी उनके फ़ैसले का ही हिस्सा था. लेकिन, असली बहादुरी इसी बात में थी कि ज्योति पासवान ने उस मुश्किल वक़्त में साइकिल से गाँव तक का सफ़र तय करने का फ़ैसला किया.
लेकिन ज्योति को गाँव क्यों वापिस आना पड़ा?
हाई टेक शहर गुरुग्राम में एक झोपड़ी में बसर करने वाली ज्योति के सामने अचानक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी.
अचानक तालाबंदी हो जाने से इतने बड़े शहर में उनके पास गुज़ारा करने का कोई ज़रिया ही नहीं था. सब कुछ अचानक बंद हो गया. काम का कोई ठिकाना नहीं बचा. ज्योति के पिता बीमार थे और अब बाप-बेटी के पास एक ही चारा बचा था. किसी न किसी तरह अपने गाँव पहुँचा जाए.
लॉकडाउन के चलते न तो ट्रेनें चल रही थी और न ही बसें. तो, बहुत से आप्रवासी मज़दूरों ने तय किया कि वो पैदल या साइकिल से यूपी, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के अपने गाँवों तक जाएँगे. ये वो सूबे हैं, जहाँ से काम की तलाश में बड़े पैमाने पर लोग शहरों की ओर जाते हैं.
केंद्रीय श्रम और रोज़गार मंत्रालय के आँकड़े कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान 32 लाख से ज़्यादा आप्रवासी कामगार शहरों से उत्तर प्रदेश लौटे थे. वहीं, बिहार वापस आने वाले मज़दूरों की संख्या 15 लाख के आसपास थी.
'ये बिहार है बाबू. जात ही यहाँ की हक़ीक़त है.'
अगर आप ज्योति के गाँव सिरहुल्ली पहुँचें, तो सड़क से ही उनका घर दिख जाता है. ये गाँव के बाक़ी मकानों से काफ़ी ऊँचा है. तीन मंज़िल का ये मकान, ज्योति और उनके पिता के गाँव लौटने के बाद तीन महीने में बन कर तैयार हुआ था.
अभी भी इस पर रंग-रोगन नहीं हुआ है. लेकिन, घर में एक टॉयलेट बना है. बिहार के इस ग्रामीण क्षेत्र में घर में शौचालय होना बड़ी बात है. घर का बरामदा सामने की सँकरी गली में निकला हुआ है. बरामदे में प्लास्टिक की कुर्सियाँ पड़ी हैं, जिन्हें हाल ही में ख़रीदा गया है.
सिरहुल्ली का भी वही हाल है, जो आपको बिहार के किसी और गाँव में देखने को मिलेगा. ये गाँव भी जात-बिरादरी के हिसाब से टोलों-मोहल्लों में बँटा हुआ है. ऐसे में किसी दलित लड़की को अचानक मिली शोहरत और दौलत को पचा पाना गाँव के बहुत से लोगों के लिए मुश्किल है.
जुलाई महीने में 14 बरस की एक लड़की से बलात्कार के बाद उसकी हत्या की ख़बर ने सुर्ख़ियां बटोरी थीं. वो भी दरभंगा ज़िले की ही रहने वाली थी. इस दलित लड़की को एक बाग़ से आम चुराने की सज़ा दी गई थी. ये ख़बर वायरल हो गई थी.
पेशे से ड्राइवर, प्रेम प्रकाश कहते हैं, "मुझे लगता है कि असल में ये दलितों को दी गई एक वार्निंग थी. ये बताने की कोशिश की गई कि अपनी औक़ात से ज़्यादा मत उछलो. ये बिहार है बाबू. जात ही यहाँ की हक़ीक़त है."
अब एक सेलेब्रिटी हैं, ज्योति
लेकिन ज्योति अपनी उपलब्धि को लेकर बिंदास है, उन्हें कोई संकोच नहीं है. वो जींस और शर्ट पहनती हैं. स्थानीय मीडिया की ख़बरों की मानें, तो ज्योति ने अपनी बुआ की शादी का ख़र्च भी उठाया है. किसी भी आम दिन आप सिरहुल्ली पहुँचें, तो आप उन्हें गाँव की सड़क पर बेतकल्लुफ़ी से साइकिल चलाते देख सकते हैं.
लोग उन्हें जानते हैं. उनके बारे में सबने सुन रखा है. अब ज्योति की ज़िंदगी बिल्कुल अलग है.
साइकिल गर्ल ज्योति का शोहरत का सफ़र
पासवान परिवार ने अब अपना पक्का मकान बना लिया है, जिसमें चार कमरे हैं. पहले पूरा परिवार एक कच्ची झोपड़ी में रहा करता था. वो झोपड़ी अब भी घर के पिछवाड़े दिखती है. उधर, ज्योति के दादा के भाई अपने परिवार के साथ वैसी ही झोपड़ी में रहते है.
उस झोपड़ी के बगल में थोड़ी-सी जगह है. जहाँ आठ साइकिलें खड़ी की गई हैं. उसमें एक लाल रंग की साइकिल भी है, जो दीवार के सहारे खड़ी की गई है. ये साइकिल ज्योति की बड़ी बहन पिंकी की है. पिंकी को वो साइकिल, बिहार के मुख्यमंत्री की बालिका साइकिल योजना के तहत मिली थी.
इस योजना की शुरुआत, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साल 2006 में की थी. उनका मक़सद था कि नौवीं कक्षा में लड़कियों के दाखिले की तादाद बढ़ाई जाए. अब वो साइकिल एक प्रतिमा की तरह घर के पिछवाड़े स्थापित है.
गुरुग्राम से गाँव पहुँचने के बाद ज्योति अब एक सेलेब्रिटी बन गई हैं.
पत्रकार, फ़िल्म निर्माता, राजनेता, एनजीओ और भारत की साइकिलिंग फ़ेडरेशन के सदस्यों ने ज्योति के घर आकर, उन्हें चेक, साइकिलें, कपड़े और यहाँ तक कि फल और तमाम तरह के प्रस्ताव दिए थे.
ज्योति को अमरीका में एक दत्तक पिता भी मिल गए, जिन्होंने उन्हें गोद लेने की चाहत जताई. क्योंकि, उनकी अपनी कोई बेटी नहीं है. वो अक्सर ज्योति को अमरीका आने के लिए कहते हैं. लेकिन ज्योति अपने गाँव में ही ख़ुश हैं.
ज्योति की बड़ी बहन पिंकी को स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी. दो बरस पहले उनकी शादी हो गई थी. ज्योति का दावा है कि ख़ुद उन्हें आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी. क्योंकि, परिवार उसकी फ़ीस भर पाने की हालत में नहीं था.
ज्योति बताती हैं कि उन्होंने 13 बरस की उम्र में साइकिल चलाना सीख लिया था. वो अक्सर अपनी बहन की लाल रंग वाली साइकिल गाँव में चलाया करती थीं. यानी ज्योति की साइकिल का सफर इस तरह शुरू हुआ था.
सितंबर में जब हमारी ज्योति से मुलाक़ात हुई थी, तब वो अपना नाम नौवीं कक्षा में लिखवाने के लिए नीले रंग की साइकिल चलाते हुए पास के पिंडारुच गाँव गई थीं.
ये नीले रंग वाली साइकिल, ज्योति को गिफ़्ट में मिली है. वो कहती हैं, "दरभंगा के डीएम एसएम त्याराजन ने मेरा नाम दोबारा स्कूल में लिखवाया है. मैं पढ़ना चाहती हूँ."
'साइकिल गढ़' बना सिरहुल्ली गांव
जब आप दरभंगा हाइवे से गुज़रते हैं, तो आपको कोई भी सिरहुल्ली गाँव का रास्ता बता देगा. अब वो पहले जैसा छोटा-सा ग़ुमनाम गाँव नहीं रहा. अब लोग उसे 'साइकिल गढ़' के नाम से जानते हैं.
आपको किसी से बस ये पूछना होगा कि क्या सामने वाले को उस गाँव का रास्ता मालूम है, जहाँ की लड़की गुरुग्राम से साइकिल चलाकर अपने गाँव पहुँची थी.
अब सिरहुल्ली वैसा मामूली गाँव नहीं, जहाँ के ज़्यादातर बाशिंदे काम की तलाश में दूसरे ठिकानों की ओर कूच कर जाते हैं और अपने पीछे बस परिवार के बुज़ुर्गों को छोड़ जाते हैं.
लेकिन, गाँव में 'ख़ास' लोगों की आमद के बावजूद, अब तक यहाँ आप्रवासी कामगारों के लिए कोई सरकारी मदद नहीं पहुँची है. 30 बरस के गणेश राम, सड़क किनारे बने मंदिर के बरामदे में बैठे युवाओं की तरफ इशारा करते हैं. गणेश राम यानी लॉकडाउन से पहले ही मुंबई से अपने गाँव लौटे थे.
गणेश राम मुंबई की एक फ़ैक्टरी में काम करते थे, जहाँ उन्हें हर महीने 14 हज़ार रुपये पगार मिलती थी.
गणेश कहते हैं, "यहाँ बहुत टेंशन है. पर करें तो क्या करें? यहाँ करने को कुछ है ही नहीं. हम खाने का जुगाड़ करने के लिए साहूकार से क़र्ज़ ले रहे हैं. हम जहाँ नौकरी करते थे, वो अब हमारा फ़ोन ही नहीं उठा रहा है. हमें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें? यहाँ हमारी मदद के लिए कोई नहीं आया."
मंदिर परिसर में बैठे लोग अपनी उम्मीदें और डर बयां करते हैं. वो सब के सब सारा दिन यहीं बैठे रहते हैं. इस उम्मीद में कि कभी तो दिन फिरेंगे. जितेंद्र कुमार प्रसाद की उम्र 26 साल है. वो गुरुग्राम में एक एक्सपोर्ट हाउस में काम करते थे.
जितेंद्र ने 16 बरस की उमर में ही गाँव छोड़ दिया था. वो कहते हैं, "इस गाँव में हर आदमी कमाने के लिए बाहर जाता है. गाँव में बस बुज़ुर्ग लोग बच जाते हैं. यहाँ कुछ है ही नहीं. जब वहाँ हमारा पैसा ख़त्म हो गया, तो जैसे-तैसे हम लोग गाँव लौटे. यहाँ हम बस दिन गिन रहे हैं. गाँव में तो किसी को हमारी बात सुनने की भी फ़ुरसत नहीं."
जितेंद्र कुमार के मन में उम्मीद अभी ज़िंदा है, लेकिन खीझ और ग़ुस्सा भी है. वो कहते हैं- "हमको समझ में आ गया है, गाँव में हमसे किसी को कोई मतलब नहीं."
ज्योती कुमारी की ज़िंदगी कैसे और कितनी बदली?
मोहन पासवान के ताज़ा-ताज़ा अमीर बनने से इन लोगों के ज़ेहन में सवाल उठ रहे हैं. सरकार आख़िर ग़रीबों के लिए क्या कर रही है?
जितेंद्र कहते हैं, "हम भी तो शहर से गाँव लौटे. हम भी तो इतनी दूरी तक पैदल चल के अपने घर आए. लेकिन, लोग बस उस लड़की के बारे में पूछने आते हैं. किसी ने हमसे नहीं पूछा कि हमें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं."
जितेंद्र, उसी रोज़ गाँव पहुंचे थे, जिस दिन ज्योति घर पहुँची थी. बल्कि, ख़ुद जितेंद्र ने ही मदद के लिए एक स्थानीय पत्रकार को फ़ोन किया था.
ज्योति के पिता मोहन पासवान के मुताबिक़, "गाँव में दलितों की आबादी एक हज़ार के आस-पास होगी. मौजूदा जाति व्यवस्था में दलित निचले पायदान पर आते हैं. ख़ास तौर से बिहार में दलितों की स्थिति काफ़ी ख़राब है."
वहीं मोहन कहते हैं कि अब उनके पास चार पैसा आ गया है, तो पूरा गाँव उनसे जलने लगा है.
मीडिया में कैसे फैली ज़्योति की ख़बर?
साइकिल से लंबा सफर तय कर 15 बरस की ज्योति के गाँव पहुंचने की ख़बर को सबसे पहले स्थानीय पत्रकार अलिंद्र ठाकुर ने एक हिंदी अख़बार के लिए कवर किया था. जल्द ही उनकी ख़बर पूरे देश में ही नहीं, बल्कि विदेश तक फैल गई.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ने ट्विटर पर लिखा कि ये सहनशक्ति और प्यार की ख़ूबसूरत उपलब्धि है.
ज्योति, 16 मई को सिरहुल्ली के सार्वजनिक पुस्तकालय पहुँची थीं. वहाँ, बाहर से गाँव लौटे मज़दूरों ने पनाह ले रखी थी. वो सभी, सुबह-सुबह ट्रक से सिरहुल्ली के पास मब्बी बेलौना गाँव पहुँचे थे.
वहाँ से उन्होंने अलिंद्र ठाकुर को फ़ोन किया था. उन्होंने अलिंद्र से गुज़ारिश की कि वो बाहर से आए लोगों के लिए कोई क़रीबी क्वारंटीन सेंटर खोजने में मदद करें.
अगली सुबह, अलिंद्र ठाकुर एक सरकारी स्कूल पहुँचे, जिसे रातों-रात तब अस्थायी क्वारंटीन सेंटर में तब्दील कर दिया गया था. जब उन्होंने गाँव पहुँचे मज़दूरों के बारे में सिंघवारा ब्लॉक के अधिकारियों को ख़बर दी थी, उससे पहले वाली रात ही ज्योति और मोहन पासवान भी गाँव पहुँचे थे.
ठाकुर ने ज्योति और उसके पिता से मुलाक़ात की और उस लड़की के लंबे सफ़र पर एक स्टोरी लिखी. ये ख़बर एक बड़ी न्यूज़ एजेंसी ने भी उठा ली. फिर ज्योति की कहानी मुख्यधारा के मीडिया में तेज़ी से फैल गई.
संकट के उस दौर में ये एक फ़ील-गुड स्टोरी थी. लेकिन, ज़्यादातर लोगों ने ज्योति की कहानी बताने के चक्कर में मज़दूरों को लेकर सरकार के उपेक्षा भाव की अनदेखी कर दी थी.
गाँव पहुंचते ही ज्योति को उसके घर में ही क्वारंटीन कर दिया गया. लेकिन, वो रोज़ स्थानीय नेताओं और दूसरे लोगों से मिलती थी, जो दूर दराज़ से उनसे मिलने आया करते थे. सुपर 30 नाम के कोचिंग सेंटर के संस्थापक आनंद कुमार ने ज्योति को IIT-JEE में दाखिले के इम्तिहान के लिए मुफ़्त में कोचिंग देने का प्रस्ताव रखा.
आनंद कुमार ने ही उन्हें 'साइकिल गर्ल' ज्योति कुमारी कह कर बुलाना शुरू किया. अब ज्योति, भारत के साइकिलिंग फ़ेडरेशन के लिए तैयारी कर रही है. फ़ेडरेशन ने दिल्ली के इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में ज्योति का फ़्री ट्रायल करने का प्रस्ताव दिया है.
ज्योति की माँ फूलो देवी पहले गाँव में मज़दूरी करती थी और दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर रोज़ 180 रुपये कमाती थी. लेकिन, जब से ज्योति की कहानी सुनकर उनके घर कुछ लोग ज्योति का सम्मान करने के लिए पहुँचे, तब से वो खेतों की ओर नहीं गई हैं.
फूलो कहती हैं, "हमारी ज़िंदगी अब बदल गई है." ज्योति के परिवार ने एक माइक्रो फाइनेंस संस्था से एक लाख रुपए का लोन ले रखा था. इसके अलावा उन्होंने मोहन पासवान के इलाज के लिए गाँव के साहूकारों से भी उधार पैसे लिए हुए थे.
मोहन पासवान अब भी लंगड़ाकर चलते हैं. लेकिन उन्हें उम्मीद है कि सरकार उन्हें नौकरी देगी, जिससे वो परिवार चला सकेंगे.
सबसे पहले इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस के कुछ अधिकारी ज्योति के घर आए थे. उन्होंने परिवार को पाँच हज़ार रुपये का चेक सौंपा था.
फूलो देवी, गाँव में बच्चों के लिए बने आंगनबाड़ी केंद्र में काम करती हैं. भारत सरकार ने इस योजना की शुरुआत 1975 समेकित बाल विकास सेवा कार्यक्रम के तहत की थी. इसका मक़सद बच्चों में कुपोषण की समस्या का समाधान निकालना था. अपनी ज़िंदगी में अचानक आए इस बदलाव से ख़ुद फूलो देवी भी हैरान रह गई थीं.
अपनी आमदनी बढ़ाने और बीमार पति के इलाज के लिए वो अक्सर गाँव के खेतों में और आसपास होने वाले निर्माण कार्य में मज़दूरी करती थीं.
बिहार के एक स्थानीय नेता पप्पू यादव ने ज्योति को गाँव पहुँचने के एक हफ़्ते के भीतर 20 हज़ार रुपए का चेक भेंट किया था. इसके बाद बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने उन्हें 50 हज़ार का चेक दिया. फिर, लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने भी ज्योति को 51 हज़ार रुपये दिए.
राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने ज्योति की पढ़ाई और शादी का पूरा ख़र्च उठाने का वादा किया. वहीं, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ज्योति को एक लाख रुपये देने का एलान किया. ज्योति के मां-बाप पहले ही भीम आर्मी के सदस्य बन चुके हैं.
भीम आर्मी आंबेडकर की विचारधारा वाला एक दलित अधिकार संगठन है. भीम आर्मी ने एलान किया है कि वो बिहार में 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
दो फ़िल्म निर्माताओं, विनोद कापड़ी और शाइन कृष्णा ने ज्योति को फ़िल्मों में काम करने का प्रस्ताव दिया. उनकी फ़िल्म आप्रवासी मज़दूरों के बारे में है. बाप-बेटी ने दोनों ही फ़िल्मों में काम करने के प्रस्ताव पर दस्तख़त कर दिए हैं. जिससे गफ़लत पैदा हो गई है और इस पर क़ानूनी लड़ाई भी शुरू हो गई है.
शाइन कृष्णा गोवा में रहने वाले फ़िल्मकार हैं. उन्होंने दरभंगा आकर ज्योति के परिवार से मुलाक़ात की थी और उन्होंने परिवार को फ़िल्म साइन करने के लिए कुछ पैसे भी दिए थे. वहीं, विनोद कापड़ी का कहना है कि परिवार को इस बात का फ़ैसला करना होगा कि वो किसकी फ़िल्म में काम करना चाहते हैं.
विनोद कापड़ी ने एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाने के लिए ख़ुद भी आप्रवासी मज़दूरों के साथ यात्रा की थी. वो कहते हैं, "ज्योति, साहस की प्रतीक हैं. ये पूरा क़िस्सा इतना लंबा सफ़र साइकिल से करने के फ़ैसले का है. मैं ये समझना चाहता था कि ज्योति ने ये फ़ैसला किस वजह से लिया."
लेकिन, ज्योति पर वो एक फ़ीचर फ़िल्म बनाना चाहते हैं. ज्योति के पिता मोहन पासवान कहते हैं कि फ़िल्म निर्माता ने उन्हें, एडवांस के तौर पर 51 हज़ार रुपये दिए थे, जिसे उन्होंने घर बनवाने में ख़र्च कर दिया. वहीं ज्योति कहती हैं, "मैं पढ़ना चाहती हूँ और अपनी ज़िंदगी में कुछ करना चाहती हूं."
दावे और उनपर उठते सवाल
मोहन पासवान के साथ इस साल जनवरी महीने में हादसा हो गया था. वो गुरुग्राम में अपने ई-रिक्शा से कहीं जा रहे थे. उन्हें देखने के लिए ही ज्योति भी अपनी माँ और जीजा के साथ गुरुग्राम पहुँची थी. ये 30 जनवरी की बात है.
10 दिन बाद उनकी माँ गाँव लौट आई थी. उन्होंने ज्योति को देखभाल के लिए पिता के पास छोड़ दिया था. क्योंकि, मोहन की हालत सफ़र के लायक़ नहीं थी.
मोहन पासवान ई-रिक्शा चलाते थे और रोज़ क़रीब 400-500 रुपए कमा लेते थे. लेकिन, एक्सीडेंट के बाद परिवार के पास कमाई का कोई और ज़रिया नहीं बचा था. अकेले फूलो देवी की कमाई से आठ लोगों के परिवार का ख़र्च चलाना पहले ही मुश्किल था. ऊपर से उस महीने तनख़्वाह आई भी नहीं.
25 मार्च को अचानक पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया गया. ज्योति कहती है कि ये उनके लिए दिल तोड़ने वाला था. उनके पास न दवा के पैसे थे, न खाने-पीने के. वो खाने के लिए उस लाइन में खड़ी हो जाती थी, जहाँ पर लोग खाना बाँटने आते थे. कई बार तो उसका नंबर आने से पहले ही खाना ख़त्म हो जाता था और उन्हें ख़ाली हाथ लौटना पड़ता था. ख़ाली पेट वक़्त गुज़ारना पड़ता था.
तभी, मई महीने में किराने की एक दुकान में ज्योति की मुलाक़ात कुछ आप्रवासी कामगारों से हुई. वो सभी साइकिल से गाँव लौटने की योजना बना रहे थे. तब ज्योति ने एक हज़ार रुपए की गुलाबी रंग की एक साइकिल ख़रीदी. उन्होंने दुकानदार को 500 रुपए दिए. दुकानदार के 500 रुपए उस पर अब भी उधार हैं.
फिर, उन्होंने अपनी माँ को फ़ोन करके बताया कि वो दोनों घर आ रहे हैं. माँ बहुत परेशान हो गई. उन्होंने ज्योति से पूछा भी कि वो ठीक-ठाक गाँव तो पहुँच जाएगी? लेकिन, ज्योति कहती हैं कि उन्हें पता था कि वो क्या करने जा रही हैं.
ख़बरों के मुताबिक़, बाप-बेटी 10 मई की रात 10 बजे गुरुग्राम से रवाना हुए थे.
सफर के पहले दो दिन तो ज्योति के लिए बेहद मुश्किल भरे थे. लगातार साइकिल चलाने से उनके शरीर में बहुत तकलीफ़ होती थी. जब वो आगरा से होकर गुज़रे, तो उन्होंने बड़ी दूर से ही ताजमहल का चमकता हुआ गुम्बद देखा था. उन्हें आज भी याद है कि ताजमहल को देख कर वो दोनों मुस्कुराए थे.
ज्योति कहती हैं, "ये सफ़र बहुत मुश्किल था. न हम ठीक से खा पाते थे और न ही सो पाते थे. लेकिन अब मैं बहुत ख़ुश हूँ."
वो रास्ते में सड़क किनारे सो जाया करते थे और अपना खाना दूसरों से बाँट कर खाते थे.
मोहन पासवान बताते हैं कि उनके साथ मुसलमानों का एक परिवार था. जिसमें छह लोग थे. वो बिहार के ही अररिया ज़िले के रहने वाले थे.
हालाँकि कई स्थानीय लोग ज्योति और उनके पिता के दावे पर सवाल भी उठाते हैं. कई लोग ये भी दावा करते हैं कि ज्योति और उनके पिता ने रास्ते में कई बार लिफ़्ट ली.
ज्योति की कहानी सबसे पहले छापने वाले अलिंद्र ठाकुर कहते हैं कि भले ही रास्ते में उन्होंने लिफ़्ट ली हो. लेकिन पिता को बिठाकर इतनी दूर साइकिल चलाना कोई मामूली बात नहीं है.
उस सुबह, ज्योति के पिता ने हमें उनसे स्कूल में नहीं मिलने दिया. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हमें ज्योति के स्कूल से घर लौटने का इंतज़ार करना होगा.
'सब पैसे का खेल है, पैसा ही जात है'
उससे एक रात पहले, ज्योति का परिवार अपने नए मकान की पहली मंज़िल पर इकट्ठा हुआ था. अब निचली जाति का होने के बावजूद गाँव में उनका बहिष्कार नहीं होता. बल्कि, फूलो देवी तो ये कहती हैं कि अब तो बाबू साहब लोग हमारे घर चाय पीने आना चाहते हैं. ये सब तो पैसे का खेल है. फूलो देवी कहती हैं कि "पैसा ही जात है."
फूलो देवी को आज भी वो दिन याद है, जब दोनों गाँव पहुँचे थे. बेटी तो सूख कर काँटा हो गई थी. उनके हाथ और पैर में घाव थे. वो थकी-थकी रहती थी. उस समय बहुत से लोग ज्योति से मिलने आते रहते थे. लेकिन, अब कोई नहीं आता. मीडिया ने अब दूसरी कहानियाँ तलाश ली हैं. शोहरत की वो चकाचौंध ग़ायब है.
अब सुर्ख़ियाँ बटोरने वाले वो पल इतिहास बन चुके हैं. पिता और बेटी को एक मशहूर टीवी शो सारेगामा में भी बुलाया गया था. मोहन पासवान को अब सरकारी नौकरी चाहिए. मोहन को पता है कि बैंक में जमा पैसे समय से पहले भी ख़त्म हो सकते हैं.
'गांव का कोई फ़ायदा नहीं हुआ'
अब ज्योति के पास ख़ुद अपने नाम से बैंक में फ़िक्स्ड डिपॉजिट हैं. अब वो दरभंगा में पढ़ाई करना करना चाहती हैं. ज्योति अब एक स्थानीय कोचिंग सेंटर में भी पढ़ने जाया करती हैं. ज्योति की बहन मानसी और उनके दो छोटे भाइयों को पढ़ाने के लिए एक अध्यापक घर भी आते हैं. तीनों भाई-बहन पास के ही एक स्कूल में पढ़ते हैं.
अब पिता को इस बात की फ़िक्र ज़्यादा है कि घर का प्लास्टर और रंगाई-पुताई कैसे हो.
अब लोग ज्योति को उसके साहस के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से नामांकित करने की बातें भी कर रहे हैं. ज्योति को वो दिन याद आते हैं, जब लोग उनसे मिलने के लिए क़तार लगाए रहते थे.
जब मैंने चलते हुए उनकी ओर देख कर हाथ हिलाया, तो वो एक कोने में खड़ी थी.
मकान के दूसरे छोर पर 30 बरस के गणेश राम खड़े थे. वो मुंबई में काम करते थे और लॉकडाउन से पहले ही मुंबई से गाँव लौटे थे. वो तब से गाँव में ही अटके हैं.
गणेश राम कहते हैं, "अगर लॉकडाउन से किसी को फ़ायदा हुआ है, तो वो ज्योति का परिवार है. ज्योति ने हमारे गाँव को मशहूर बना दिया. लेकिन इससे ज़्यादा हमारी ज़िंदगी में कुछ नहीं बदला."(bbc)
- पवन वर्मा
आज़ादी के समय भारत के अलग-अलग हिस्सों और समुदायों के बीच तकरीबन 30 तरह के कैलेंडर/पंचांग प्रचलित थे. इतने कैलेंडर होने की वजह से अमूमन तीज-त्यौहार की तिथियां अलग-अलग हो जाने से अक्सर उन्हें मनाए जाने की तारीख को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रहती थी. इसका असर प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर भी पड़ता था. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू इतने सारे कैलेंडरों को सांस्कृति समृद्धि की निशानी तो स्वीकार करते थे लेकिन वे यह भी मानते थे कि इतनी तरह के कैलेंडर देश के एकीकरण में बाधक हैं. देश के लिए एकीकृत कैलेंडर की ज़रूरत महसूस करते हुए 1952 में उन्होंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी अनुसंधान परिषद के अंतर्गत एक कैलेंडर सुधार समिति का गठन किया था.
देश के प्रसिद्ध खगोल विज्ञानी मेघनाद साहा इसके अध्यक्ष थे. एकीकृत कैलेंडर के निर्माण में इस समिति के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि यहां प्रचलित कुछ कैलेंडरों का आधार नितांत धार्मिक था. इसलिए समिति को डर हुआ कि एक राष्ट्रीय कैलेंडर की बात लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती थी. नेहरू जी के इस बात का एहसास था, इसलिए उन्होंने शुरूआत में ही डॉ साहा को एक पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया कि जिस ग्रिगोरियन कैलेंडर का इस्तेमाल दुनिया के तमाम देशों में सरकारी स्तर पर होता है, उसमें भी कई वैज्ञानिक खामियां हैं. इसलिए हमारे राष्ट्रीय कैलेंडर के निर्माण में यह ध्यान रखा जाएगा कि यह पूरी तरह से विज्ञानसम्मत हो. नेहरू जी की इस बात के प्रचार-प्रसार से इस मसले पर विवाद की गुंजाइश खत्म हो गई.
कैलेंडर सुधार समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट दी और राष्ट्रीय कैलेंडर के निर्माण के लिए कुछ सिफारिशें कीं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश थी कि कैलेंडर का आधार शक संवत (78 ईसवी से शुरू) होगा और इसका पहला दिन ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से 22 मार्च (21 मार्च को सूर्य विषुवत रेखा पर ठीक सीधा चमकता है) से शुरू होगा. चैत्र इस कैलेंडर का पहला और फाल्गुन आखिरी महीना होगा. इन सिफारिशों के आधार पर बना कैलेंडर 22 मार्च, 1957 को सरकारी स्तर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ स्वीकार कर लिया गया.
आमतौर पर सरकारी गजट, आकाशवाणी, सरकार द्वारा आम जनता के लिए जारी संदेशों/प्रपत्रों में इस कैलेंडर की तिथि का उल्लेख किया जाता है, लेकिन यह कैलेंडर वैज्ञानिक नजरिए से अधिक शुद्ध होने के बाद भी प्रचार-प्रसार के अभाव में कभी आम जनता के बीच प्रचलित नहीं हो पाया.(satyagrah)
पाकिस्तान में इमरान ख़ान की सरकार के ख़िलाफ़ 11 पार्टियाँ संयुक्त मोर्चे पीडीएम (ऑल पार्टीज़ डेमोक्रेटिक मूवमेंट) के तहत गुजरांवाला में हुए पहले बड़े प्रदर्शन के बाद रविवार को कराची के जिन्ना-बाग़ में जलसा कर रही हैं. इस रैली में शामिल होने मरियम नवाज़, बिलावल भुट्टो समेत अन्य कई नेता पहुंचे हैं.
मरियम नवाज़ पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की बेटी हैं और बिलावल भुट्टो पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के बेटे हैं.
बाग़-ए-जिन्ना में रैली की तैयारी करने वाली पाकिस्तान पीपल्स पार्टी का कहना है कि नवाज़ शरीफ़ के ऑनलाइन भाषण की तैयारियाँ भी पूरी कर ली गई हैं.
इस रैली में विशेष अथिति पीएमएल-एन (पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन) की नेता मरियम नवाज़ हैं जो सिंध में अपनी राजनीति की शुरुआत कर रही हैं.
मरियम नवाज़ हवाई मार्ग से कराची पहुँचीं और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की मज़ार पर भी गईं. पीएमएल-एन नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शाहिद ख़ान अब्बासी और पार्टी के अन्य नेता भी उनके साथ मौजूद रहे.
जनता का प्रतिनिधित्व ठीक से नहीं कर पाए: मरियम नवाज़
इससे पहले कराची के एक होटल में मीडिया से संक्षिप्त बातचीत में मरियम नवाज़ ने कहा कि उन्हें कराची में जिस तरह से प्यार मिला वह याद रहेगा. उन्होंने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि जनता महंगाई से परेशान है.
उन्होंने ये भी कहा, ''हम जनता का सही तरह से प्रतिनिधित्व नहीं कर सके.''
दो दिन पहले विपक्षी गठबंधन की पहली रैली गुजरांवाला में हुई थी जिसमें पीएमएल-एन के नेता नवाज़ शरीफ़ ने अपने भाषण में सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा पर अपनी सरकार को विदा करने और इमरान ख़ान की सरकार के लिए जोड़तोड़ करने का आरोप लगाया था.
इसी बीच पीडीएम के प्रमुख मौलाना फज़लुर्रहमान भी कराची पहुँचे हैं और उन्होंने एक निजी अस्पताल में भर्ती पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी से भी मुलाक़ात की है.
पीडीएम की बैठक शुरू होने से पहले गठबंधन दलों की भी बैठक हुई है.
पीडीएम की पहली रैली में पश्तीन तहरीक आंदोलन के नेतृत्व को आमंत्रित नहीं किया गया था लेकिन इस दूसरी रैली में सांसद मोहसिन डावर भी हिस्सा लेंगे. वो कराची पहुंच चुकी हैं.
पीपीपी नेता नाज़ बलूच ने ट्विटर पर कार्यक्रम स्थल और अपने साथी नेताओं की तस्वीरें शेयर की हैं.
वहीं इमरान ख़ान की सरकार के मंत्रियों ने 11 पार्टियों के गठबंधन की रैली से पहले एक संवाददाता सम्मेलन में गठबंधन की आलोचना की है.
केंद्रीय मंत्री असद उमर ने कहा कि नवाज़ शरीफ़ संस्थाओं के साथ लड़ रहे हैं और ये लोकतंत्र के हित में नहीं हैं.
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के नेता शहबाज़ गुल ने मरियम नवाज़ पर जिन्ना के मज़ार पर पहुंच कर राजनीतिक नारेबाज़ी करने का आरोप लगाया.
सेना प्रमुख नहीं सेना पर हमला कर रहे हैं विपक्षी: इमरान ख़ान
18 अक्तूबर का पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के लिए ऐतिहासिक महत्व भी है.
13 साल पहले इसी दिन पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के काफ़िले पर आत्मघाती हमला किया गया था जिसमें पार्टी के करीब 200 कार्यकर्ता मारे गए थे और 500 लोग घायल हो गए थे. उस वक़्त भुट्टो आठ साल के निर्वासन के बाद देश लौटीं थीं.
गुजरांवाला में हुई रैली में नवाज़ शरीफ़, मरियम नवाज़ और बिलावल भुट्टो ने इमरान ख़ान और सेना प्रमुख पर आक्रामक होकर हमला किया था.
शनिवार को इमरान ख़ान ने एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा था कि ये हमला सेना प्रमुख नहीं बल्कि सेना पर ही था.
क्या कराची में भी ऐसी ही तीख़ी बयानबाज़ी होगी?
पत्रकार मुबाशिर ज़ैदी का मानना है कि कराची में भी सरकार विरोधी भावनाएं हैं और यहाँ विपक्ष का हमला गुजरांवाला से भी ज़्यादा आक्रामक होगा.
वहीं, कराची यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर डॉक्टर जफ़र अहमद का कहना है कि कराची की राजनीति में सक्रिय एमक्यूएम और पीटीआई दोनों ही सत्ता के साथ हैं. महंगाई और दूसरे मुद्दे कराची में भी मौजूद हैं लेकिन किसी भी पार्टी ने अभी तक इस पर शोर नहीं मचाया है.
पिछले चुनावों में पीटीआई और एमक्यूएम ने कराची से सबसे ज़्यादा सीटें जीती थीं. दोनों पार्टियाँ अब केंद्र में सहयोगी हैं जबकि सिंध में वो विपक्ष की भूमिका निभा रही हैं.
पत्रकार मुबाशिर ज़ैदी का कहना है कि एमक्यूम का प्रदर्शन गिर गया है और पीटीआई ने भी मतदाताओं को निराश किया है. ऐसे में कराची का यह विरोध प्रदर्शन पीडीएम को फ़ायदा पहुँचाएगा.
जनता की सहानुभूति है लेकिन...
कराची में उर्दू भाषी आबादी पर अपना असर रखने वाले जमात-इस्लामी ने विपक्षी गठबंधन से ख़ुद को दूर कर लिया है.
वहीं, मुस्तफ़ा कमाल की पाक सरज़मीन पार्टी (पीएसपी) और अफ़क़ अहमद की एमक्यूएम वास्तव में गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं.
पीएमएल-एन ने 1990 के दशक में सिंध में दो बार प्रांतीय सरकार का गठन किया था. उसन पिछले स्थानीय निकाय के चुनावों में भी कई सीटें जीतीं.
प्रोफ़ेसर तौसीफ़ अहमद कहते हैं कि पंजाबी और हजारा लोगों के बीच पीएमएल-एन की सहानुभूति है लेकिन यह लामबंद नहीं हुआ है.
वहीं, डॉक्टर जाफ़र अहमद कहते हैं कि कुछ लोग हमदर्दी की वजह से मरियम नवाज़ को सुनने के लिए जा सकते हैं लेकिन सच तो ये है कि उन्होंने जनता के लिए ज़मीन पर कुछ ख़ास काम नहीं किया है.(bbc)
- Swati Singh
रीमा (बदला हुआ नाम) और आदित्य (बदला हुआ नाम) ने लव मैरिज की थी। यूपी की रीमा और बिहार के आदित्य की मुलाक़ात कॉलेज के टाइम पर हुई थी। उनके रिश्ते के बारे में घर वालों को मालूम था। आदित्य तथाकथित ऊँची जाति से था और रीमा पिछड़ी जाति से। इसलिए मान-प्रतिष्ठा के नामपर शादी में आदित्य के घरवाले शामिल नहीं हुए। पर दोनों परिवारों में संबंध अच्छे थे। रीमा से ससुराल के लोगों की बात होती और अक्सर ननदोई का भी फ़ोन आता, लेकिन मज़ाक़ के नामपर उनकी यौनिक टिप्पणियाँ रीमा को हमेशा परेशान करती और वो हमेशा चुप हो जाती। रीमा की चुप्पी से ननदोई का मन बढ़ता और मज़ाक़ निचले स्तर पर जाने लगा। आख़िरकार रीमा ने आदित्य को इसके बारे में बताया जिसके बाद से आदित्य के घरवालों ने रीमा से बात करना बंद कर दिया, ये कहते हुए कि ‘पिछड़ी जात से है। ज़्यादा नाज़ुक बन रही है। आख़िर सरहज और ननदोई तो मज़ाक़ के रिश्ते होते है।’
आजकल हमलोग आए दिन समाज में बलात्कार और यौन उत्पीड़न की बढ़ती घटनायें देख रहे है। क्या गाँव और क्या शहर, महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा मानो अपनी संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है। हर बार हाथरस और निर्भया रेप जैसी घटनाओं के बाद हम सरकार को घेरते है और क़ानून-व्यवस्था व प्रशासन पर ऊंगली उठाते है, लेकिन इसमें अपनी भागीदारी कभी नहीं देखते या देखना ही नहीं चाहते है। कई रिपोर्ट में सामने आया है कि यौन हिंसा से जुड़े अधिकतर मामलों में किसी जान-पहचान और कई बार परिवारवालों का हाथ होता है। ऐसे में ‘परिवार’ जो समाज की पहली इकाई है उसकी संरचना, व्यवस्था और वैचारिकी ही समाज की दिशा और दशा तय करती है, क्योंकि यौन हिंसा करने वाले पुरुष किसी प्रशासन या सरकारी योजना से नहीं बल्कि हमारे अपने परिवार-समाज में तैयार किए जाते है और ये तैयारी होती है हमारे आसपास के माहौल में। वो माहौल जिसकी हवा में पितृसत्ता बहती है, जो हमेशा महिला-पुरुष में भेद करना और पुरुष को सत्ताधारी बताने का काम करती है।
रीमा कोई अकेली नहीं जिसे रिश्ते के नामपर यौनिक हिंसा का सामना करना पड़ा। हमारे समाज में ‘जीजा-साली’ और ‘देवर-भाभी’ जैसे तमाम ऐसे रिश्ते है जिनको ‘मज़ाक़ का रिश्ता’ कहा जाता है। यानी वो रिश्ते जहां पुरुषों की तरफ़ से किया जाने वाले किसी भी तरह के बात-व्यवहार को बुरा मानना या उनका इनकार करना रिश्तों की तौहीन समझा जाता है। जब भी हम समाज में बलात्कार की संस्कृति की बात करते है तो ज़रूरी है कि हम ऐसे रिश्तों के नामपर होने वाली यौन हिंसाओं को उजागर कर उनका विश्लेषण करें। क्योंकि ये रिश्ते ही तो है जो पुरुष की यौन कुंठाओं वाले भद्दे-फूहड़ मज़ाक़-व्यवहार को सामान्य और महिला की सहमति उसकी ‘ना’ को बग़ावत के रूप में परिभाषित कर, उन्हें ‘बुरी औरत’ के पाले में खड़े कर देते है।
ऐसे रिश्तों का सबसे वीभत्स रूप अक्सर शादी के बाद देखने को मिलता है, जब महिला शादी होकर अपने ससुराल जाती है और उसके ऊपर हर पल ख़ुद को आदर्श बहु साबित करने का दबाव बनाया जाता है तो ऐसे में ‘मज़ाक़ वाले रिश्ते’ के नामपर यौन कुंठित पुरुष अपनी कुंठा को मिटाने के लिए सबसे ज़्यादा हाथ धोते है। उन्हें ये मालूम होता है कि महिला ‘इज़्ज़त’ और ‘रिश्ते’ के नामपर ‘ना’ नहीं कह सकती, किसी से शिकायत नहीं कर सकती और अगर कह भी दिया तो दोष उसी पर दिया जाएगा, ये कहते हुए कि उसने किसी कुंठित इंसान का नहीं बल्कि परिवार के दमाद, बेटे या भतीजे का अपमान किया है। हो सकता है ये आपको सामान्य लगे, तो बता दें इसकी दो वजहें हो सकती है – एक तो ये कि आप विशेषाधिकारी है, जिन्हें कभी भी ऐसे किसी रिश्तेदार का सामना नहीं करना पड़ा। और दूसरा – आप इन ‘मज़ाक़’ के इतने अभ्यस्त हो है कि इसमें कोई बुराई नहीं लगती आपको, बल्कि ये आपको संस्कृति लगती है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी परिवार में ऐसे रिश्तेदार का व्यवहार परिवार में यौन हिंसा से पीड़ित महिला को ही नहीं बल्कि बच्चों के भी ऊपर बुरा असर डालता है, क्योंकि जाने-अनजाने उनके मन में भी उस रिश्ते के नामपर छवि बन रही होती है, जिसका मूल होता है – नकारात्मक मर्दानगी। यानी कि पुरुष जो भी चाहे और जैसे भी चाहे महिला के साथ व्यवहार करे ये उसका अधिकार है और महिला उसको ‘ना’ नहीं कह सकती है। अगर वो ऐसा करती है तो वो अच्छी औरत नहीं होगी।
ज़रूरी है ऐसे हर ‘मज़ाक़ के रिश्ते और उसके व्यवहार’ का विरोध किया जाए, जो महिलाओं के विरुद्ध यौनिक हिंसा को सामान्य बनाते है।
जिस रिश्ते में सम्मान नहीं वो स्वीकार नहीं
अगर आप वाक़ई में महिला के ख़िलाफ़ बढ़ती यौन हिंसा से परेशान है और इसे रोकना चाहते है तो इसकी शुरुआत अपने घर-परिवार और रिश्तों से कीजिए। क्योंकि हो सकता है छोटे देवर के नामपर एक पुरुष ने अपनी भाभी के साथ जो भी यौनिक टिप्पणियाँ और व्यवहार किया हो उसका ज़वाब भाभी ने अपनी चुप्पी से दिया, जिसे पुरुष ने उनकी सहमति मान ली और महिलाओं के प्रति ऐसा व्यवहार उसके लिए सामान्य होता गया, जो बलात्कार की संस्कृति का हिस्सा है। इसी संस्कृति का नतीजा इसलिए ज़रूरी है ऐसे हर ‘मज़ाक़ के रिश्ते और उसके व्यवहार’ का विरोध किया जाए, जो महिलाओं के विरुद्ध यौनिक हिंसा को सामान्य बनाते है। इसी संस्कृति का नतीजा है कि पुरुषों के लिए यौन उत्पीड़न करना सामान्य होता जाता है और जैसे ही उन्हें कोई महिला ‘ना’ कहती है तो वो बलात्कार और एसिड अटैक जैसे घटनाओं जैसे अपराधों को भी अंजाम देते है। इसके साथ ही, महिला की सहमति उसके ‘हाँ’ या ‘ना’ कहने के अधिकार को समझे और स्वीकारें।
क्योंकि जब हम महिलाओं के विरुद्ध होने वाली यौनिक हिंसाओं का विश्लेषण करते है तो अक्सर यही पाते है कि ये हिंसा ‘बदले’ की भावना से की जाती है और ‘बदला’ इस बात का उसने मुझे ‘ना’ कैसे कह दिया। ये विचार ही हर यौन हिंसा का मूल है, जिसे हमलोगों ने अपने पितृसत्तात्मक भारतीय समाज के पुरुषों को बनाते समय उनकी संरचना में शामिल किया है। इसलिए पुरुषों को महिला की ‘सहमति’ न तो सुनाई देती है और न समझ में आती है। इसलिए ज़रूरी है कि ‘सहमति’ के विचार को समझकर उसे अपने व्यवहार में लागू किया जाए और अपने घर-परिवार में भी इसे लागू किया जाए। इसके साथ ही, जब कभी भी कोई महिला (बहु, बेटी या बहन) के रूप में किसी भी रिश्ते से होने वाली यौन हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाए तो उसका साथ दीजिए, क्योंकि आपका साथ ही उन्हें बल देता है, ‘ग़लत के ख़िलाफ़’ खड़े होने का। सच कहने का और हिंसा न सहने का।
(यह लेख पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुआ है।)
आर्मीनिया और अज़रबैजान ने विवादित क्षेत्र नागोर्नो काराबाख़ में एक दूसरे पर संघर्ष विराम तोड़ने के आरोप लगाए हैं. दोनों ही पक्ष शनिवार रात 12 बजे से संघर्ष विराम लागू करने पर राज़ी हो गए थे.
लेकिन अब आर्मीनिया के रक्षा मंत्रलाय की एक प्रवक्ता ने कहा है कि अज़रबैजान ने संघर्ष विराम लागू होने के चार मिनट बाद ही तोप के गोले और रॉकेट दागे हैं. वहीं, बाद में एक बयान में अज़रबैजान की ओर से कहा गया है कि आर्मीनिया ने दो मिनट बाद ही गोलीबारी शुरू कर दी थी.
दोनों ही देशों ने बीते शनिवार भी रूस की मध्यस्थता के बाद संघर्षविराम के लिए समझौता किया था. हालांकि उस समझौते के बाद भी लड़ाई जारी रही थी. बीते महीने दोनों देशों के बीच उस विवादित क्षेत्र को लेकर लड़ाई शुरू हो गई है जिसे अंतरराष्ट्रीय जगत अज़रबैजान का हिस्सा मानता है लेकिन जिस पर आर्मीनियाई लोगों का नियंत्रण है.
इस लड़ाई में अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है. इस क्षेत्र को लेकर दोनों देशों के बीच छह साल लंबा चला युद्ध 1994 में समझौते के साथ समाप्त हो गया था. उसके बाद से ये अब तक का सबसे हिंसक संघर्ष है.
बीते सप्ताह जब रूस की मध्यस्थता में हुआ समझौता टूटा था तब भी दोनों देशों ने एक दूसरे पर पहले गोलीबारी करने के आरोप लगाए थे.
क्या है ताज़ा समझौता
दोनों ही देशों ने मानवीय समझौते की पुष्टि की है लेकिन इसके बारे में अधिक जानकारियां साझा नहीं की गई हैं. अज़रबैजान के विदेश मंत्रालय का कहना है कि ये फ़ैसला अमरीका, फ्रांस और रूस के राष्ट्रपतियों की ओर से जारी बयान पर आधारित है.
1992 में नागार्नो काराबाख़ विवाद के निपटारे के लिए ओएससीई मिंस्क ग्रुप की स्थापना की गई थी जिसके ये तीनों देश सदस्य हैं. आर्मीनिया के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता एना नाग़दालयान ने ऐसा ही बयान जारी करते हुए कहा है कि वो संघर्ष क्षेत्र में संघर्ष विराम के प्रयासों का स्वागत करते हैं.
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ ने शनिवार को दोनों ही देशों के विदेश मंत्रियों से चर्चा की है और कहा है कि उन्हें समझौते का कड़ाई से पालन करना होगा. सर्गेई लावरोफ़ की मौजूदगी में ही बीते शनिवार को समझौता हुआ था.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने कहा है कि उनके देश भी संघर्ष विराम पर नज़दीकी नज़र रखेगा.
ज़मीन पर ताज़ा स्थिति क्या है?
आर्मीनिया के रक्षा मंत्रालय की प्रवक्ता शूशान स्टेपन्यान ने ट्विटर पर बताया है, "दुश्मनों ने 00.04 बजे से 02.45 बजे तक उत्तरी दिशा में तोपों से गोलाबारी की और 02.20 से 02.45 तक दक्षिणी दिशा में रॉकेट दागे."
उन्होंने बाद में बताया कि अज़रबैजान की ओर से नागोर्नो काराबाख़ के दक्षिणी इलाक़ों पर रविवार सुबह हमला किया गया. बीबीसी से बात करते हुए आर्मीनिया के विदेश मंत्री ज़ोहराब म्नातसाकान्यान ने कहा है कि संघर्ष विराम उल्लंघन के लिए उनका देश ज़िम्मेदार नहीं है.
उन्होंने अज़रबैजान पर तनाव कम करने में रूची ना लेने का भी आरोप लगाया है. उन्होंने कहा, "अज़रबैजान की यही नीति है, दूसरे पर आरोप लगा दो और आक्रमण जारी रखो."
वहीं अज़रबैजान के राष्ट्रपति के विदेश मामलों के प्रमुख हिकमत हाजीयेफ़ का कहना है कि ताज़ा लड़ाई के लिए आर्मीनिया ही ज़िम्मेदार है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, 'आर्मीनिया मौजूदा संघर्षविराम का फ़ायदा अपनी स्थिति मज़बूत करने और अज़रबैजान के नए इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करने के लिए उठा रहा है.'
उन्होंने कहा, 'कल उन्होंने अज़रबैजान की सेना पर घात लगाकर हमला किया और उन्हें मारने की कोशिश की. ये ऐसे सवाल है जिनका जवाब आर्मीनिया को देना चाहिए.'
अज़रबैजान ने आर्मीनिया पर मिसाइल हमला करने का आरोप लगाया है. शनिवार को हुए इस हमले में कम से कम 13 लोग मारे गए हैं और 45 घायल हैं. ये हमला गांजा शहर में हुआ है जो युद्ध क्षेत्र से काफ़ी दूर है.
विदेश मंत्रालय की ओर से जारी किए गए एक और बयान में आर्मीनिया पर नागरिक इलाक़ों पर अंधाधुंध हमले करने के आरोप लगाए गए हैं.
आर्मीनिया ने इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए अज़रबैजान पर नागरिक इलाक़ों पर हमले करने के आरोप लगाए हैं.
स्टेपनयान ने फ़ेसबुक पर एक वीडियो जारी करते हुए नागार्नो काराबाख़ इलाक़े में हुई बर्बादी दिखाई है और अज़रबैजानी सैन्य बलों पर नागरिक इलाक़ों पर मिसाइल हमले करने के आरोप लगाए हैं.
अज़रबैजान का दावा, आर्मीनिया का लड़ाकू विमान दूसरी बार मार गिराया
अज़रबैजान की फ़ौज ने घोषणा की है कि उसने आर्मीनिया के दूसरे एसयू-25 विमान को जेबरैल के क्षेत्र में मार गिराया है. हालांकि उन्होंने सबूत के तौर पर कोई तस्वीर, वीडियो या फिर कोई दूसरा प्रमाण नहीं पेश किया है.
आर्मीनिया के रक्षा मंत्री ने दोनों ही बार विमान के मार गिराए जाने की बात से इनकार किया है. अज़रबैजान ने यह भी कहा है कि आर्मीनिया ने सीमा के उत्तरी हिस्से में उसके क्षेत्र में गोलीबारी की है. यह क्षेत्र तोवुज़ शहर के नज़दीक है.
हालांकि इस हमले की पुष्टि के तौर पर भी किसी ने कोई प्रमाण नहीं देखा है. आर्मीनिया के रक्षा मंत्रालय ने कहा है किसी ने भी उस क्षेत्र में गोलीबारी नहीं की है.
आर्मीनियाई फ़ौज ने आरोप लगाया है कि शांति समझौते की शुरुआत होने से ठीक पहले रेड क्रॉस ने घायलों को लड़ाई के मैदान से हटाने का प्रस्ताव रखा था लेकिन अज़रबैजान ने इससे इनकार कर दिया.
दोनों ही तरफ से इस तरह की बयानबाजी हो रही है जिसकी कोई पुष्टि नहीं की जा सकती है. लेकिन समय समय इसके बारे में बताते रहना जरूरी है क्योंकि दोनों ही देश ना सिर्फ़ लड़ाई के मैदान में लड़ रहे है बल्कि वे हर संभव तरीके से सूचनाओं की लड़ाई (इनफॉरमेशन वार) में भी जुटे हुए हैं.
उधर, आर्मीनिया ने मरने वाले अपने जवानों की सूची में 40 नए नाम जोड़े हैं. अब आर्मीनिया के कुल 673 जवान मारे जाने वालों की सूची में शामिल हो गए हैं. वहीं दूसरी तरफ़ अज़रबैजान ने लड़ाई में मारे गए जवानों की अपनी सूची जारी नहीं की है.
अज़रबैजान और आर्मीनिया की जंग में पाकिस्तानी स्पेशल फोर्स
पाकिस्तान ने आर्मीनिया की ओर से लगाए इस आरोप को ख़ारिज कर दिया है कि पाकिस्तानी स्पेशल फोर्स अज़रबैजान की सेना के साथ मिलकर आर्मीनिया के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिस्सा ले रही है.
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस मामले में स्पष्टीकरण दिया है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान की टिप्पणी को 'आधारहीन और अनुचित' बताया गया है.
15 अक्टूबर को आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान ने रूसी समाचार एजेंसी रोसिया सेगोदन्या को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि तुर्की की सेना के साथ मिलकर पाकिस्तान की स्पेशल फोर्स आर्मीनिया के ख़िलाफ़ नागोर्नो-काराबाख़ में जारी लड़ाई में शामिल है.
उनसे पूछा गया कि क्या उनके पास इस बात का कोई प्रमाण है कि अज़रबैजान की सेना को विदेशी सैन्यबलों का भी साथ मिल रहा है.
इस पर निकोल पाशिन्यान ने कहा कि "कुछ रिपोर्ट्स यह बताती हैं कि जंग में पाकिस्तानी फौज का विशेष दस्ता भी शामिल है. मेरा मानना है कि तुर्की के सैनिक इस लड़ाई में शामिल हैं. अब ये बात जगज़ाहिर हो चुकी है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस बारे में लिखा जा रहा है."
पाकिस्तान का खंडन
पाकिस्तान ने इस बात का खंडन करते हुए बयान दिया है कि आर्मीनिया इस तरह के ग़ैर-जिम्मेदाराना प्रोपेगैंडा के माध्यम से अज़रबैजान के ख़िलाफ़ अपनी ग़ैर-क़ानूनी कार्रवाई को छिपाने की कोशिश कर रहा है, इसे तुरंत रोका जाना चाहिए.
पाकिस्तान ने अपने बयान में कहा है, "अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने इस मसले पर साफ तौर पर कहा कि उनके देश की सेना अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए पर्याप्त तौर पर मज़बूत है और उसे किसी बाहरी सेना की जरूरत नहीं है."
हालांकि पाकिस्तान ने अपने बयान में यह साफ तौर पर कहा है कि वो अज़रबैजान को कूटनीतिक और राजनीतिक समर्थन देता रहेगा.
इससे पहले पाकिस्तान और तुर्की ने अज़रबैजान को नैतिक समर्थन देने की बात कही थी. वहीं, रूस दोनों देशों के बीच मध्यस्थता कर शांति कायम करने की कोशिशों में लगा हुआ है.
आर्मीनिया और पाकिस्तान के बीच संबंध
अज़रबैजान और तुर्की के साथ पाकिस्तान से करीबी रिश्ते हैं. शायद इस कारण उसके आर्मीनिया के साथ अच्छे संबंध नहीं हैं.
नागोर्नो काराबाख़ में जारी विवाद को लेकर पाकिस्तान मानता है कि आर्मीनिया ने अज़रबैजान के इलाक़े में कब्ज़ा किया है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के अनुसार इस विवाद का निपटारा होना चाहिए.
वहीं, आर्मीनिया के विदेश मंत्रालय के अनुसार भी पाकिस्तान के साथ उनके कूटनीतिक रिश्ते नहीं है.
आर्मीनिया का दावा, अज़रबैजान का इनकार
आर्मीनिया ने इससे पहले यह भी दावा किया था कि तुर्की केवल कूटनीतिक समर्थन नहीं कर रहा है, बल्कि सैन्य सहायता भी दे रहा है.
आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के साथ एक बातचीत में दावा किया था कि तुर्की के सैनिक अफ़सर और इंस्ट्रक्टर काराबाख़ में अज़रबैजान की सेना को सलाह दे रहे हैं और तुर्की ने अपने लड़ाकू विमान एफ़-16 भेजे हैं.
उन्होंने कहा था, "तुर्की पूरी तरह से अज़रबैजान की सैन्य मदद कर रहा है. तुर्की इसमें शामिल है." लेकिन तुर्की ने भी सैन्य मदद की बात को नकारा था और केवल नैतिक समर्थन को स्वीकार किया था.
आर्मीनिया और अज़रबैजान दोनों ही देश सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके हैं. दोनों के बीच दशकों पुराना सीमा विवाद एक बार फिर भड़क उठा है. ताज़ा विवाद की शुरुआत भी दोनों देशों की तरफ से एक-दूसरे हमला करने के दावे के साथ हुई है.
नागोर्नो-काराबाख़ के बारे में कुछ बातें
ये 4,400 वर्ग किलोमीटर यानी 1,700 वर्ग मील का पहाड़ी इलाक़ा है.
पारंपरिक तौर पर यहां ईसाई आर्मीनियाई और तुर्क मुसलमान रहते हैं.
सोवियत संघ के विघटन से पहले ये एक सवायत्त क्षेत्र बन गया था जो अज़रबैजान का हिस्सा था.
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस इलाक़े को अज़रबैजान के हिस्से के रूप में मान्यता दी जाती है, लेकिन यहां की अधिकांश आबादी आर्मीनियाई है.
आर्मीनिया समेत संयुक्त राष्ट्र का कोई सदस्य किसी स्व-घोषित अधिकारी को मान्यता नहीं देता.
1980 के दशक से अंत से 1990 के दशक तक चले युद्ध में 30 हज़ार से अधिक लोगों की जानें गईं. उस दौरान अलगावादी ताक़तों ने कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा जमा लिया.
उस दौरान अलगावादी ताक़तों ने नागोर्नो-काराबाख के कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा जमा लिया. 1994 में यहाँ युद्धविराम की घोषणा हुई थी, उसके बाद भी यहाँ गतिरोध जारी है और अक्सर इस क्षेत्र में तनाव पैदा हो जाता है.
1994 में यहां युद्धविराम हुआ जिसके बाद से यहां गतिरोध जारी है.
तुर्की खुल कर अज़रबैजान का समर्थन करता है.
यहां रूस का एक सैन्य ठिकाना है.(bbc)
बिलासपुर, 19 अक्टूबर('छत्तीसगढ़' संवाददाता)। बीते 24 घंटे के भीतर जिले में 94 नये कोरोना संक्रमित मरीज मिले। इन्हें मिलाकर अब तक संक्रमित होने वालों की कुल संख्या 11003 हो गई। स्वस्थ होने वाले भी बढ़कर 9400 हो गये हैं।
कल शाम तक मिले मरीजों में नगर निगम सीमा क्षेत्र के 67 शामिल हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वाधिक 12 मरीज तखतपुर से मिले। एक मरीज मुंगेली जिले का है। इस बीच जांजगीर जिले के 3 और बिलासपुर जिले के 2 मरीजों की मौत भी हो गई।
इस हफ्ते दूसरी बार कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा सौ से कम मिला। स्वस्थ होने वाले मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है। 100 बिस्तर कोविड अस्पताल में इस समय सिर्फ 26 मरीजों का इलाज चल रहा है। यहां बीते 24 घंटे में 7 मरीजों को भर्ती किया गया है और 8 को स्वस्थ होने के बाद डिस्चार्ज किया गया। निजी कोविड अस्पतालों और होम आइसोलेट के कुल 128 मरीज बीते 24 घंटे में डिस्चार्ज किये गये हैं।
भारत में कोरोना महामारी के दौर में बिहार पहला राज्य है जहाँ विधानसभा चुनाव होने जा रहा है.
नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले पंद्रह साल के शासन को चुनौती देने के लिए विपक्षी महागठबंधन चुनाव मैदान में है, इतना ही नहीं कुछ और नए गठबंधन भी इस बार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.
एक नज़र बिहार विधानसभा चुनाव की उन बातों पर जो जानना आपके लिए ज़रूरी हैं.
बिहार में चुनाव कब हैं?
- मतदान 28 अक्तूबर, 3 नवंबर और 7 नवंबर को होगा.
- 28 अक्तूबर को पहले चरण में 16 ज़िलों की 71 सीटों पर मतदान होगा.
- 3 नवंबर को दूसरे चरण में 17 ज़िलों की 94 सीटों पर मतदान होगा.
- 7 नवंबर को तीसरे चरण में 15 ज़िलों की 78 सीटों पर मतदान होगा.
- मतों की गणना 10 नवंबर को होगी. बिहार में इस बार कुल वोटर की संख्या करीब 7 करोड़ 30 लाख है.
2015 की बिहार विधानसभा की तस्वीर
बिहार की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 29 नवंबर को समाप्त हो रहा है. बिहार में विधान सभा की कुल 243 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए मैज़िक नंबर 122 है.
बिहार में फ़िलहाल जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. जदयू नेता नीतीश कुमार राज्य के मुख्यमंत्री हैं जबकि बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी उप-मुख्यमंत्री हैं.

2015 में नीतीश कुमार की अगुआई में जदयू ने लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के साथ चुनाव लड़ा था. उस समय जदयू, राजद, कांग्रेस और अन्य दलों को मिलाकर एक महागठबंधन बना था. इन लोगों ने मिलकर सरकार बनाई. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने और उप मुख्यमंत्री बने लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव.
लेकिन 2017 में नीतीश कुमार ने राजद से गठबंधन तोड़ लिया और बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई. तब बीजेपी के पास 53 विधायक थे.
कांग्रेस ने पिछला चुनाव राजद, जदयू और अन्य दलों के महागठबंधन में साथ मिलकर लड़ा था और उसे 27 सीटें मिली थीं. बीजेपी की सहयोगी लोकजनशक्ति पार्टी 2 सीटें ही जीत सकी थी.
2020 में गठबंधन की तस्वीर
इस बार के चुनाव में चार गठबंधन मैदान में हैं. एनडीए और महागठबंधन के अलावा बिहार में इस बार ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट और प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन ऐसे हैं, जो चुनाव से ठीक पहले बने हैं.
सत्ता में वापसी की कोशिश में लगी राजद ने पिछले चुनाव में ही महागठबंधन बनाया था. भाजपा और जदयू को कुर्सी से हटाने के लिए महागठबंधन में इस बार वामपंथी दलों को भी साथ लिया गया है. कांग्रेस उनके साथ पहले से ही है. महागठबंधन में राजद 144 सीटों पर, कांग्रेस 70 सीटों पर और लेफ्ट पार्टियाँ 29 सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही हैं.
एनडीए गठबंधन में इस चुनाव में बीजेपी और जदयू के अलावा वीआईपी के मुकेश साहनी, हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी भी शामिल हो गए हैं. लोजपा इस बार गठबंधन का हिस्सा नहीं है. इन पार्टियों के बीच सीटों का बंटवारा हो चुका है.
जदयू 122 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और बीजेपी 121 सीटों पर. जदयू ने अपने खाते से 7 सीटें जीतन राम मांझी की हम पार्टी को दिया है, वहीं भाजपा मुकेश सहनी की वीआईपी को अपने हिस्से से 11 सीटें दे रही है.
महागठबंधन और एनडीए के अलावा एक तीसरा गठबंधन भी है. रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा, बहुजन समाजवादी पार्टी की मायावती, एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी, जनवादी पार्टी सोशलिस्ट के संजय चौहन और सोहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने भी गठबंधन बनाया है, जिसे ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट का नाम दिया गया है.
जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन यानी पीडीए बनाने की घोषणा की है. इस गठबंधन में चंद्रशेखर आजाद की अध्यक्षता वाली आजाद समाज पार्टी, एमके फैजी के नेतृत्व वाली सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया यानी एसडीपीआई और बीपीएल मातंग की बहुजन मुक्ति पार्टी शामिल हैं. इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग अब इस गठबंधन का हिस्सा नहीं है.

चुनावी मैदान में अहम चेहरे
महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव राघोपुर सीट से चुनाव लड़ेंगे. वहीं उनके बड़े भाई तेज प्रताप ने अपना विधानसभा क्षेत्र महुआ से बदलकर हसनपुर कर लिया है. इन दोनों की जीत-हार पर सबकी नज़रें होंगी.
दूसरी तरफ़ एनडीए ने साफ़ किया है कि वो नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेंगे. जदयू की तरफ़ से जो सबसे चर्चित नाम चुनाव मैदान में हैं उनमें लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव के ससुर चंद्रिका राय सबसे अहम हैं.
चंद्रिका राय इससे पहले राष्ट्रीय जनता दल में रह चुके हैं. वो राजद से मंत्री भी रहे थे. चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या की शादी तेज प्रताप से हुई थी. राजद नेता रघुवंश प्रसाद सिंह के बेटे को भी जनता दल यूनाइटेड ने अपना उम्मीदवार बनाया है.
जदयू ने मुजफ्फरपुर बालिका गृह मामले से चर्चा में आईं मंजू वर्मा को भी उम्मीदवार बनाया है. बालिका गृह मामले में मंजू वर्मा को मंत्री पद गंवाना पड़ा था. अब इन्हें चेरियाबरियारपुर से फिर टिकट मिला है.
बिहार डीजीपी के पद से वीआरएस लेकर जनता दल (यूनाइटेड) से राजनीतिक पारी शुरू करने वाले गुप्तेश्वर पांडे को बक्सर सीट से टिकट नहीं मिला. पहले इस सीट से उनके चुनाव लड़ने की संभावना जताई जा रही थी.
बिहार चुनाव में इस बार एक चर्चित चेहरा पुष्पम प्रिया चौधरी का भी है. खुद को बिहार का सीएम उम्मीदवार बताने वालीं पुष्पम प्रिया चौधरी पटना के बांकीपुर और मधुबनी के बिस्फी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगी. पुष्पम प्रिया जदयू से एमएलसी रह चुके विनोद चौधरी की बेटी हैं.
पुष्पम प्रिया की 12वीं तक की पढ़ाई दरभंगा में हुई जिसके बाद वो विदेश पढ़ने चली गईं. लंदन से पढ़कर लौटीं तो सीधे बिहार चुनाव में उतर गईं. इस चुनाव में उन्होंने प्लूरल्स नाम की एक पार्टी बनाई है.
राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक विजेता श्रेयसी सिंह जमुई विधानसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. श्रेयसी, बिहार की राजनीति में दादा के नाम से मशहूर दिग्विजय सिंह की बेटी हैं.
इस बार के चुनाव की ख़ासियत
उम्मीदवारों के अलावा रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान पर भी इन चुनावों में सबकी नज़र होगी. चिराग इस समय बिहार की जमुई लोकसभा सीट से सांसद हैं, लेकिन उनके नेतृत्व में लोक जनशक्ति पार्टी कैसा प्रदर्शन करती है, ये देखना अहम होगा. उनके राजनीतिक करियर के लिए ये चुनाव काफ़ी अहम माना जा रहा है.
चुनाव से ठीक बीस दिन पहले लोजपा के नेता और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का निधन हो गया. चिराग पासवान ने इस बार एनडीए में शामिल ना होकर अलग चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया है. पिता की विरासत को चिराग आगे कैसे बढ़ाते हैं, ये देखना दिलचस्प होगा.
बिहार विधानसभा का ये चुनाव इसलिए भी अहम होगा क्योंकि लालू यादव प्रचार से दूर रहेंगे. लालू यादव फ़िलहाल जेल में हैं. पिछले विधानसभा चुनाव के समय वे काफ़ी सक्रिय थे और माना जाता है कि गठबंधन में नीतीश कुमार को लाने में उनकी अहम भूमिका थी.
वहीं, बिहार चुनाव में पहली बार गांधी मैदान में लाखों लोगों की भीड़ को संबोधित करने वाली चुनावी रैलियां नहीं होंगी. डिज़िटल रैलियों के साथ चुनाव प्रचार का तरीका पूरी तरह बदल गया है .

इन मुद्दों पर लड़ा जा रहा है चुनाव
कोरोना महामारी के बीच होने वाला ये पहला विधानसभा चुनाव है. जनता महामारी के डर से पोलिंग बूथ पर कितना पहुंचती है यह भी देखना होगा. राज्य सरकार ने बिहार में बीमारी फैलने से रोकने के लिए कितने इंतज़ाम किए हैं और जनता उनके काम से कितनी खुश है, नतीजों से यह भी ज़ाहिर होगा.
नीतीश सरकार 15 साल से सत्ता में है, ऐसे में वो सत्ता विरोधी लहर भी झेल रहे हैं.
प्रदेश के अस्थायी शिक्षकों में 'समान काम समान वेतन' ना देने को लेकर ग़ुस्सा है. बेरोज़गारी, शिक्षा और स्वास्थ्य के अलावा प्रवासी मजदूरों का मुद्दा भी इन चुनावों में जोर-शोर से उठाया जा रहा है.
लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर कोरोना की वजह से प्रदेश में लौट कर आ गए हैं. उनके पास काम-धंधा नहीं है. उनकी राय भी इस चुनाव में काफ़ी अहम मानी जा रही है.
एक कोशिश फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले को भुनाने की भी दिखी थी.

इस चुनाव का राष्ट्रीय महत्व
देश की राजनीति में बिहार की अहमियत किसी से छुपी नहीं है. केंद्र में कांग्रेस की जड़ें हिला देने वाले जेपी आंदोलन की शुरुआत भी यहीं से हुई थी. यहाँ राज्य और राष्ट्रीय स्तर के चुनाव में वोटिंग पैटर्न में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिलता है.
2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने 40 में से 39 सीट पर जीत दर्ज की थी. क्या एनडीए गठबंधन इस चुनाव में भी वही प्रदर्शन दोहरा पाएगा, इस पर सबकी नज़रें होंगी.
जेपी नड्डा के बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद ये दूसरा विधानसभा चुनाव है. इससे पहले दिल्ली में चुनाव हुए थे, जिसमें बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था. इस चुनाव में उनकी किस्मत भी दांव पर हैं.
सीएए-एनआरसी का विरोध, 370 हटाया जाना, नए कृषि बिल का विरोध - एनडीए के दूसरे कार्यकाल में केंद्र सरकार के लिए इन तमाम विवादित फ़ैसलों को जनता कैसे देख रही है, इसका असर भी चुनाव में देखने को मिलेगा.
सबसे बड़ी बात यह है कि पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम नीतीश कुमार ने कोरोना महामारी को जिस तरह से हैंडल किया उससे जनता खुश है या नहीं, इस चुनाव के नतीजे इस बात की भी गवाही देंगे.

कोरोना से जुड़े दिशानिर्देश
बिहार विधानसभा चुनाव में पहली बार चुनाव आयोग द्वारा दिए गए कोरोना दिशानिर्देश का भी परीक्षण होगा. ये दिशानिर्देश सितंबर के महीने में जारी किए गए थे. इनके मुताबिक :
1. नामांकन दाख़िल करते वक्त उम्मीदवार के साथ केवल दो व्यक्ति मौजूद होंगे. उम्मीदवार अपना नामांकन ऑनलाइन कर सकते हैं और वो चुनाव लड़ने के लिए लगने वाली ज़मानत राशि भी ऑनलाइन जमा कर सकते हैं.
2. रोड शो के दौरान कोई भी उम्मीदवार अधिकतम पाँच वाहनों का इस्तेमाल कर पाएँगे.
3. मतदान के दिन अगर किसी मतदाता में कोरोना वायरस के लक्षण पाए गए, तो उन्हें एक टोकन दिया जाएगा और उस टोकन के माध्यम से वे मतदान के अंतिम घंटे में अपना वोट डाल पाएँगे.
4. ईवीएम मशीन में मतदान करने से पहले मतदाताओं को दस्ताने दिए जाएँगे.
5. एक मतदान केंद्र पर अधिकतम एक हज़ार मतदाता वोट दे सकेंगे. पहले मतदाताओं की अधिकतम संख्या 1500 थी.
6. सभी मतदाताओं के लिए मास्क पहनना अनिवार्य होगा, जिसे पहचान ज़ाहिर करने के लिए थोड़ी देर के लिए उन्हें हटाना होगा.
7. कोरोना संक्रमित और क्वारंटीन में रह रहे मरीज़ों को स्वास्थ्य अधिकारियों की मौजूदगी में मतदान के अंतिम घंटे में वोट डालने की इजाज़त होगी. इस दौरान संक्रमण की रोकथाम के लिए तमाम उपाय किए जाएँगे.
8. महामारी की वजह से मतदान का समय एक घंटे बढ़ा दिया गया है. अब अति संवेदनशील क्षेत्रों को छोड़कर ज़्यादातर मतदान केंद्रों पर मतदान सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक होगा.
हालाँकि, दिशानिर्देशों में वर्चुअल रैली और डिजिटल कैंपेन को लेकर कुछ नहीं कहा गया है. लेकिन, राज्य के नौ विपक्षी दलों ने बीजेपी के डिज़िटल कैंपेन पर सवाल उठाते हुए जुलाई महीने में चुनाव आयोग को ज्ञापन सौंपा था.(bbc)
- वात्सल्य राय
कौन लिख रहा है आईपीएल-13 की स्क्रिप्ट?
क्या ये सवाल आपके दिमाग में भी कौंध रहा है?
क्रिकेट हमेशा से अनिश्चितताओं का खेल रहा है. लेकिन आईपीएल-13 तो हर हद तोड़ रहा है. हर मैच में इतना रोमांच. इतने ट्विस्ट. इतने यू टर्न. आपके सारे अनुमान धरे रह जाएं.
कई मैचों में तो आखिरी लम्हों में कांटा इतनी बार इधर-उधर हुआ कि बॉलीवुड की मसाला फ़िल्मों के बड़ी मेहनत से रचे गए क्लाइमेक्स भी उबाऊ लगने लगें.
उदाहरण चाहिए. आईपीएल-13 में रविवार को हुए दो मुक़ाबलों को ही देखिए. दोनों ही मैच टाई रहे. कोलकाता नाइट राइडर्स और सनराइज़र्स हैदराबाद के मैच का नतीजा सुपर ओवर से तय हुआ.
मुंबई इंडियन्स और किंग्स इलेवन पंजाब के मैच में तो सुपर ओवर भी टाई हो गया.
बल्ला टांगने के बाद से ट्विटर पर 'फुलझड़ी छोड़ने' के उस्ताद बन गए वीरेंद्र सहवाग ने रोमांच की ऐसी डोज को 'फ़िल्म शोले के गब्बर' के अंदाज़ में 'नाइंसाफी' बता दिया.

काग़ज पर किंग्स इलेवन की टीम भी टक्कर की लगती है लेकिन आईपीएल-13 में किए प्रदर्शन के पैमाने पर मुंबई उससे मीलों आगे रही है.
लेकिन रविवार को क्या 'कांटे से कांटा लड़ाया' किंग्स इलेवन पंजाब ने.
पंजाब की टीम की ताक़त बल्लेबाज़ी है. टीम में एक से बढ़कर एक धुरंधर बल्लेबाज़ हैं. कप्तान केएल राहुल और दूसरे ओपनर मयंक अग्रवाल ग़जब फॉर्म में हैं लेकिन मुंबई के बॉलिंग अटैक के ख़िलाफ़ 20 ओवर में 177 रन बनाना आसान नहीं.
लेकिन, रविवार तक आखिरी पायदान पर रही पंजाब की टीम ने तो जैसे छलांग लगाने की ज़िद ही ठान ली थी. मुंबई के ख़िलाफ़ मैच के पहले तक पंजाब ने सिर्फ़ दो मैच जीते थे और दोनों जीत रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के ख़िलाफ़ मिली थी.
और, अब पंजाब ने मुंबई से भी दो प्वाइंट छीन लिए हैं और प्वाइंट टेबल में छठे नंबर पर पहुंच गई है. चेन्नई सुपर किंग्स और राजस्थान रॉयल्स से ऊपर. कश्मकश भरे मुक़ाबले में मुंबई को पीटकर बाकी टीमों को उसने मानो सावधान रहने की चेतावनी ही दे दी है.

बदल गई है टीम पंजाब?
डिफेंडिंग चैंपियन मुंबई इंडियन्स के जलवे की तो कई बार बात हुई है. मुंबई की टीम बल्लेबाज़ी, गेंदबाज़ी और फील्डिंग तीनों मोर्चों पर चैंपियन खिलाड़ियों से लैस है. टीम में कई मैच विनर हैं और अगर कोई स्टार लड़खड़ाता है, दूसरा आगे आकर टीम को संभाल लेता है.
लेकिन, रविवार को पंजाब की टीम मुंबई के ज़्यादातर स्टार खिलाड़ियों पर भारी पड़ी. रोहित शर्मा, सूर्य कुमार यादव और ईशान किशन को सस्ते में रोका और केएल राहुल की अगुवाई में पंजाब के बल्लेबाज़ों ने जसप्रीत बुमराह को छोड़कर मुंबई के ज़्यादातर स्टार गेंदबाज़ों को औसत साबित कर दिया.
कप्तान केएल राहुल 525 रन के साथ टूर्नामेंट के सबसे कामयाब बल्लेबाज़ हैं और मयंक अग्रवाल 393 रन के साथ दूसरे नंबर पर हैं.

शमी का सुपर शो
और फिर सुपर ओवर में जब जसप्रीत बुमराह ने पंजाब के बल्लेबाज़ों को सिर्फ़ पांच रन बनाने दिए और क्रिकेट कमेंट्री कर रहे सारे एक्सपर्ट मुंबई के पक्ष में बढ़त बताने लगे तब पंजाब ने ग़जब का पलटवार किया.
मोहम्मद शमी ने 'हिटमैन' के नाम से मशहूर मुंबई के कप्तान रोहित शर्मा को तीन गेंद में एक ही रन बनाने दिया. शमी का ये 'सुपर शो' न होता तो दूसरा सुपर ओवर भी न होता. रोहित शर्मा अपने प्रदर्शन से ऐसे 'हताश' हुए कि मैच के बाद ब्रॉडकास्टर से बात करने नहीं आए.
इस प्रदर्शन के बाद शमी सोशल मीडिया पर छा गए. ट्विटर और दूसरे प्लेटफॉर्म पर फैन्स उनकी जमकर तारीफ़ की.

गेल-मयंक का जलवा
और दूसरे सुपर ओवर में भी पंजाब ने पानी लड़ा दिया. पंजाब के ओपनर मयंक अग्रवाल लक्ष्य का पीछा करते हुए बड़ा स्कोर नहीं बना सके थे. लेकिन दूसरे सुपर ओवर में उन्होंने क्रिस जोर्डन की आखिरी गेंद पर केरोन पोलार्ड के बल्ले से निकले शॉट को जादुई अंदाज़ में रोका. छक्का तय दिख रहा था लेकिन मुंबई टीम को सिर्फ़ दो रन मिले.
और फिर शुरू हुआ क्रिस गेल का खेल. पिछले मैच में बैंगलोर के ख़िलाफ़ बल्ले से गरजने के बाद ख़ुद को 'यूनिवर्सल बॉस' बता चुके गेल ने दूसरे सुपर ओवर की पहली ही गेंद पर बता दिया कि वो मुंबई के गेंदबाज़ों के भी छक्के छुड़ा सकते हैं. और लगातार दो चौके जड़कर जीत पक्की करने वाले मयंक अग्रवाल तो मानो इस मौके के ही इंतज़ार में थे.

हीरो नंबर 1 फर्ग्यूसन?
इससे पहले दिन के पहले मुक़ाबले कोलकाता नाइट राइडर्स बनाम सनराइज़र्स हैदराबाद में भी कई उतार-चढ़ाव दिखे.
दोनों ही टीमों में जीत हासिल करने की बेताबी नज़र आई. दोनों ने ही नए गेम प्लान आजमाए. हैदराबाद ने तो बैटिंग ऑर्डर ही पूरी तरह बदल दिया. कोलकाता ने भी कुछ बदलाव किए.
दोनों ही टीमों की ओर से कई खिलाड़ियों ने उम्दा प्रदर्शन किए. मसलन कोलकाता के लिए दिनेश कार्तिक और कप्तान इयॉन मॉर्गन ने आखिरी ओवर में गज़ब की बल्लेबाज़ी की तो हैदराबाद के कप्तान डेविड वॉर्नर ने भी आखिरी ओवर में जीत के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया.
लेकिन, तमाम खिलाड़ियों के बीच जिस खिलाड़ी ने दोनों टीमों के बीच सबसे ऊंचा मुकाम हासिल किया, वो हैं लॉकी फर्ग्यूसन. मैच को कोलकाता की तरफ उन्होंने ही मोड़ा. पहले जब ओपनिंग में भेजे गए केन विलियमसन बल्ले से धमाल कर रहे थे, तब फर्ग्यूसन ने उनकी पारी पर ब्रेक लगाया. फिर प्रियम गर्ग और मनीष पांडेय को आउट किया और चार ओवर में सिर्फ़ 15 रन दिए.
और जब सुपरओवर को फेंकने के लिए कप्तान ने उन्हें गेंद थमाई तो पहली गेंद पर वार्नर और तीसरी पर समद को बोल्ड करके केवल दो रन ही बनने दिए. हैदराबाद के बाद के पास उनके इस प्रदर्शन की काट नहीं थी. और ये दोनों ही टीमों के बीच सबसे बड़ा अंतर फर्ग्यूसन ही थे जिनकी बदौलत मैच कोलकाता नाइट राइडर्स के हक़ में गई.(bbc)


