संपादकीय
छत्तीसगढ़ में कोरोना की वजह से जो नौबत आज आ खड़ी हुई है, उसमें सरकार एक चौराहे पर खड़ी दिख रही है, और बेहतर रास्ता कौन सा है यह तय करना आसान नहीं है। अभी-अभी खत्म हुई छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल की बैठक अधिक तैयारी के इरादे के साथ खत्म हुई है और सरकार ने हालात गंभीर होने की बात इस तैयारी के बयान के साथ ही एक किस्म से मान ली है। व्यापारी प्रतिनिधियों के साथ बैठक के बाद आज शाम तक राजधानी रायपुर और कुछ दूसरे शहरों में लॉकडाऊन की घोषणा के आसार हैं। जाहिर है कि इस रफ्तार से बढ़ते कोरोना के साथ तो जिंदगी चल नहीं सकती, इसलिए उसे कुछ दिनों के लिए स्थगित करके घरों में कैद रखा जाए। प्रशासन के सामने यह भी एक बड़ी चुनौती रहेगी कि लॉकडाऊन के बीच कैसे हर शहर में रोज हजारों कोरोना-टेस्ट किए जाएंगे, और कैसे हजारों वैक्सीन लगाई जाएंगी।
बीते कल चौबीस घंटों में करीब दस हजार नए कोरोना पॉजिटिव मेडिकल जांच में पाए गए हैं, और लोगों का अंदाज यह है कि इससे दर्जनों गुना कोरोना पॉजिटिव लोग होंगे लेकिन वे नौकरी जाने, मजदूरी जाने के डर से जांच नहीं करा रहे हैं। ऐसे भी बहुत से लोग होंगे जो कि मेडिकल जुबान में असिम्प्टोमेटिक (लक्षणविहीन) होंगे और इसलिए वे किसी जांच के लिए पहुंच ही नहीं रहे हैं। प्रदेश भर में कोरोना जांच केंद्रों पर जो अंधाधुंध भीड़ लगी है, वहां पहुंचकर भी बहुत से लोग लौट जा रहे हैं कि अब तक अगर कोरोना नहीं लगा होगा, तो भी यहां लग जाएगा। अस्पतालों में बिस्तर नहीं बचे हैं, और छोटे से छोटे निजी अस्पताल में भी कोरोना वार्ड के एक हफ्ते का बिल डेढ़ लाख रुपये तय कर दिया गया है। बड़े अस्पताल और भी बड़ा बिल बना रहे हैं, मरीजों का ऑक्सीजन स्तर जब तक एक निर्धारित सीमा से ऊपर नहीं पहुंच रहा है, उन्हें छुट्टी नहीं दी जा रही है, और खर्च की कोई सीमा नहीं रह गई है। चारों तरफ सरकारी इंतजाम इस कदर चुक गया है कि सुबह से देर दोपहर तक कई जगहों पर कोरोना वार्ड में खाना नहीं पहुंच रहा है।
इन बातों से परे आज छत्तीसगढ़ की जमीनी हकीकत यह है कि यह अपनी आबादी के कई गुना अधिक आबादी वाले प्रदेशों से कई गुना अधिक कोरोना संक्रमण वाला प्रदेश हो गया है, और अब तक के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में पचास हजार से अधिक सक्रिय कोरोना पॉजिटिव अभी हैं। इनमें से अधिकतर घरों पर ही अलग रखे गए हैं, लेकिन जब लोगों के लापरवाह मिजाज को देखा जाए, तो यह बात अविश्वसनीय लगती है कि मास्क तक से परहेज करने वाला यह प्रदेश घरों पर सावधानी से अलग बैठे रहेगा और परिवार के बाकी लोगों के लिए खतरा नहीं बनेगा।
लेकिन आज सबसे बड़ी फिक्र लॉकडाऊन को लेकर है कि अलग-अलग शहरों या जिलों को किस तरह बंद किया जाए ताकि लोगों का संपर्क एक-दूसरे से टूटे और कोरोना की लंबी-लंबी छलांग बंद हो, या धीमी पड़े। पिछले दो दिनों के आंकड़े देखें तो छत्तीसगढ़ में पांच अपै्रल को करीब 75सौ कोरोना पॉजिटिव मिले थे जो कि छह अपै्रल को बढक़र करीब दस हजार नए कोरोना पॉजिटिव हो गए हैं। यह अविश्वसनीय किस्म की और हक्काबक्का करने वाली नौबत है। दुनिया की किसी सरकार की पूरी ताकत भी इस रफ्तार से बढऩे वाले कोरोना संक्रमण से नहीं जूझ सकती और छत्तीसगढ़ को कड़ा और कड़वा फैसला लेना ही होगा।
एक अलग मोर्चा वैक्सीन का चल रहा है। देश के अलग-अलग राज्यों में कोरोना के टीके लगाने की रफ्तार अलग-अलग है। महाराष्ट्र में जहां पर कि देश की सबसे खराब हालत है, वहां अगले तीन दिनों के लिए ही टीके बचे हैं, और राज्य सरकार का कहना है कि जिन्हें पहले टीके लग चुके हैं, उन्हें भी लगाने के लिए दूसरा टीका नहीं बचेगा। छत्तीसगढ़ में भी कल से बिलासपुर के निजी अस्पतालों को टीके देना बंद कर दिया गया था, और ताजा हालत आगे सामने आएगी। टीकों की कमी अगर हो जाएगी तो कुछ महीनों बाद भी कोरोना पर काबू पाने की उम्मीद एक सपना साबित होगी। एक सौ 30 करोड़ आबादी के इस देश में अब तक महज कुछ करोड़ लोगों को ही टीके लगे हैं, और उनमें भी कम लोगों को ही दो टीके लगे हुए एक पखवाड़ा हो चुका है जिसके बाद उसका असर माना जाता है।
किसी भी प्रदेश में संक्रमण को रोकना पहली नजर में उसकी अपनी जिम्मेदारी मानी जाती है, और टीकों की सप्लाई केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन उनको लगाना राज्य सरकार का ही काम है। यह नौबत किसी भी राज्य के लिए एक अभूतपूर्व चुनौती की है जिसमें शासन और प्रशासन के बड़े अफसरों से लेकर छोटे कर्मचारियों तक की समझ-बूझ और क्षमता कसौटी पर चढ़ रही है। निर्वाचित राजनीतिक नेता सरकार की मशीनरी का कैसा इस्तेमाल करते हैं यह बहुत बड़ी चुनौती उनके सामने है।
फिर जनता के सामने भी यह बहुत बड़ी चुनौती है कि किसी लॉकडाऊन की नौबत में वह कमाए क्या, और खाए क्या। राज्य सरकारें या केंद्र सरकार गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों तो जिंदा रहने के लिए मुफ्त अनाज दे सकती हैं, और संपन्न तबके को बैंक की किश्त पटाने में समय की कुछ छूट मिल सकती है, सरकारी नौकरी के लोगों को भी तनख्वाह की गारंटी है, लेकिन असंगठित कर्मचारियों और रोजगार पर जिंदा रहने वाले छोटे-छोटे कारोबारियों के लिए कोई भी लॉकडाऊन मरने जैसी नौबत ला देता है। किसी भी राज्य सरकार के सामने ऐसे बड़े तबके का ख्याल रखना भी एक असंभव सी चुनौती है, और देखना होगा कि छत्तीसगढ़ या किसी दूसरे राज्य की सरकार किस तरह अपने लोगों के काम आती है, उनका साथ देती है।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
बस्तर में हुए ताजा नक्सल हमले में 22 जवानों की शहादत पर राज्य और केंद्र सरकारें हिली हुई हैं। इन सरकारों ने न तो मुआवजा देने में कोई कमी की है, और न ही नक्सलियों के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई छेडऩे की घोषणा करने में कोई देर की है। ऐसा हमला हो जाने के बाद ये दोनों सरकारें जो-जो कर सकती थीं, उन्होंने तकरीबन तमाम काम किए हैं। अब महज यह बाकी रह गया है कि बस्तर जिस बुरी तरह नक्सल प्रभावित है, उस प्रभाव के पीछे की वजहों को देखा जाए, और उन्हें दूर किया जाए।
यह कुछ मुश्किल काम भी है। अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त से, तीन दशक से भी अधिक हो चुके हैं कि बस्तर में नक्सलियों का डेरा है, और वहां पिछले बीस बरस में तो हर बरस औसतन सौ से अधिक नक्सल-मौतें होती ही हैं। ये तीन दशक भोपाल और रायपुर की राजधानियों के भी रहे हैं, और कांगे्रस और भाजपा की सरकारों के भी। लेकिन आदिवासियों के जिस अंतहीन शोषण, और उन पर राज करने वाले शासन-प्रशासन, राजनीतिक ताकतों, और तरह-तरह के माफिया की वजह से नक्सलियों को बस्तर में दाखिला मिला था, और जमीन मिली थी, वह सब कुछ तो अब भी जारी है। इस बुनियादी नाकामयाबी और खतरे की बात भी किए बिना सिर्फ बंदूकें बढ़ाकर बस्तर से नक्सलियों को खत्म करने की बात एक हसरत अधिक हो सकती है, हकीकत नहीं। जब किसी पेड़ की जड़ों में ही कोई बीमारी लगी हो, तो उसके पत्तों और फलों पर दवा छिडक़कर भला क्या हासिल किया जा सकता है?
बस्तर में सरकारी मशीनरी और सरकारी कामकाज में जो परंपरागत भ्रष्टाचार लंबे समय से बैठा हुआ है, गरीब आदिवासियों के नाम पर निकली रकम का जो बेजा इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है वह भी बुनियादी दिक्कत का एक हिस्सा है। दिक्कत का दूसरा, अधिक खतरनाक हिस्सा आदिवासियों का शोषण है। पिछले बरसों में, खासकर भाजपा के निरंतर 15 बरस के राज में बस्तर के आम आदिवासियों के न्यूनतम मानवाधिकारों को भी जिस तरह कुचलकर रख दिया गया था, और मुजरिमों से भी बदतर पुलिस अफसरों ने वहां आतंक के नंगे नाच के कई बरस पेश किए थे, उसने बस्तर के आदिवासियों के बीच नक्सलियों के एजेंडा की विश्वसनीयता बढ़ाने का ही काम किया था। जिस तरह गांव के गांव पुलिस जला रही थी, बेकसूरों को गोली मार रही थी, आदिवासी महिलाओं से बलात्कार हो रहे थे, ये बातें उस वक्त के विपक्ष की कांगे्रस पार्टी की तोहमतें ही नहीं थीं, ये बातें सुप्रीम कोर्ट तक जाकर खड़ी रहीं हैं। लेकिन मजाल है कि हिंदुस्तानी लोकतंत्र ऐसे अंतहीन और धारावाहिक जुर्म और जुल्म के जिम्मेदार लोगों को छू भी ले! इसी का नतीजा है कि अभी जब नक्सलियों ने 22 जवानों को मारा, तो उसके दो दिन पहले ही बस्तर पुलिस के एक छोटे अफसर ने अपने दोस्तों सहित एक नाबालिग आदिवासी लडक़ी से बलात्कार किया था। यह शहरी, संपन्न, शिक्षित, और सुरक्षित लोगों के लिए तो सिर्फ पुलिस रिपोर्ट की बात हो सकती है, लेकिन बस्तर में जुल्म के ऐसे सिलसिले से निपटने के लिए नक्सली भी मौजूद हैं। जिन आदिवासियों ने पुलिस जुल्म के, और सरकारी-अनदेखी के कई दशक देखे हैं, उनके सामने एक अलग किस्म के, लोकतंत्र से परे के, इंसाफ का जरिया भी आसपास मौजूद है नक्सलियों की शक्ल में। इसलिए अगर राज्य या केंद्र की सरकार, या आधा दर्जन और नक्सल प्रभावित प्रदेशों की सरकारों को नक्सल हिंसा खत्म करनी है तो वर्दीधारी-सरकारी जुल्म और जुर्म के सिलसिले को पहले खत्म करना होगा।
छत्तीसगढ़ के बस्तर के इस ताजा नक्सल हमले को लेकर एक यही बात सूझती है जिसे न राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा है, और न ही केंद्र से आए हुए गृहमंत्री ने। हो सकता है कि इस हमले के बाद के ताबूतों के बीच इस किस्म की कोई बात कहना बेमौके की बात होती, लेकिन अब जब बस्तर में शासन-प्रशासन दूसरे काम में भी लगेंगे, और राजनीतिक ताकतें भी तरह-तरह के कानूनी और गैरकानूनी धंधों में लगेंगी, तो राज्य सरकार को यह सोचना चाहिए कि बस्तर में सरकार की साख कैसे बनाई जाए? यह काम राज्य सरकार के मौजूदा ढांचे के बस का नहीं है क्योंकि वह बस्तर में आदतन शोषण को ही प्रशासन मानते आया है। आदिवासी इलाकों के लिए उनकी संस्कृति और परंपराओं की समझ रखने वाले गैरसरकारी जानकार लोगों को लाकर बस्तर में शासन-प्रशासन की खामियों की शिनाख्त करवानी चाहिए। वैसे भी संविधान में बस्तर को लेकर या दूसरे अधिसूचित इलाकों को लेकर शासन की एक अलग व्यवस्था और प्रणाली साफ-साफ लिखी गई है। इन सबको ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार को बहुत ईमानदार नीयत से एक संवेदनशील प्रशासन कायम करने की कोशिश करनी चाहिए। देश और दुनिया के बहुत से ऐसे समाजशास्त्री हैं जो कि छत्तीसगढ़ सरकार को एक संवेदनशील व्यवस्था सुझा सकते हैं, और ऐसा किए बिना संवेदनाशून्य नेता-अफसर बस्तर के प्रशासन को बेहतर नहीं बना सकते, वहां से नक्सलियों को खत्म नहीं कर सकते। इतना जरूर है कि हिंदुस्तान की सरकार की ताकत बहुत बड़ी है, और वह 25-50 हजार सुरक्षाकर्मी भेजकर बस्तर को और बुरी तरह रौंद सकती है, लेकिन क्या उससे बस्तर के लोगों का दिल भी जीता जा सकेगा? फिर आज छत्तीसगढ़ की कांगे्रस सरकार पर एक नैतिक जिम्मेदारी भी है कि पिछली भाजपा सरकार के वक्त का जुल्म का बरसों का सिलसिला खत्म किया जाए जो कि उस वक्त कांगे्रस ही उठाती थी। जानकार लोगों का यह भी कहना है कि कांगे्रस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी छत्तीसगढ़ के बस्तर की चर्चा होने पर बार-बार यह पूछते हैं कि वह बदनाम अफसर कहां है, उसे कोई काम तो नहीं दिया है? जाहिर है कि कांगे्रस हाईकमान के दिमाग में भी बस्तर के जुल्म के इतिहास की बात दर्ज है। ऐसे में राज्य सरकार को राज्य और सरकार से परे के जानकार और आदिवासियों के लिए हमदर्दी रखने वाले लोग लाकर बस्तर के एक बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था बनवानी चाहिए। और अधिक सुरक्षाकर्मी भेजना सरकार के हाथ में तो है, लेकिन कल देश भर में दर्जन भर जगहों पर ताबूत पहुंचने पर जैसा हाहाकार मचा है, वैसी मानवीय त्रासदी की कीमत पर ही सरकार की हथियारबंद कार्रवाई जारी रह सकती है। सरकार को एक संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता भी दिखानी चाहिए और बस्तर को शोषण और भ्रष्टाचार से मुक्त प्रशासन देने की एक मौलिक कोशिश करनी चाहिए जो कि नक्सल-विरोधी हथियारबंद-मुहिम के मुकाबले बहुत अधिक कठिन भी होगी।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
छत्तीसगढ़ के बस्तर में दो दिन पहले नक्सल हमले में बाईस सुरक्षाकर्मियों की शहादत के बाद आज केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बस्तर पहुंचे और शवों की घर रवानगी के पहले राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ मिलकर श्रद्धांजलि दी। इसके बाद केंद्र और राज्य के बड़े सुरक्षा अफसरों की बैठक हुई और उससे निकलकर अमित शाह और भूपेश बघेल ने नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई को निर्णायक अंत तक ले जाने की घोषणा की। राजनीतिक रूप से परस्पर विरोधी इन दोनों नेताओं ने भी इस कठिन मौके पर एक-दूसरे के साथ पूरी तरह खड़े रहने की बातें कहीं। दोनों ही नेताओं ने नक्सलियों को बुरी तरह धिक्कारते हुए उनके खात्मे की बात दुहराई है।
जाहिर है कि केंद्र और राज्य के सुरक्षा बलों ने दो दिन पहले ही अपने बाईस साथियों को खोया है और बहुत से जख्मी साथी अस्पतालों में अभी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। ऐसे में अपने सुरक्षा बलों के मनोबल को बढ़ाने के अलावा नेता और कर भी क्या सकते हैं? और फिर यह जितनी बड़ी हिंसक घटना हुई है, लोकतंत्र को बचाने में लगे हुए सुरक्षा कर्मचारी जितनी बड़ी संख्या में मारे गए हैं, ऐसे में केंद्र और राज्य की यह जवाबदेही भी होती है कि नक्सलियों के खिलाफ हथियारबंद कार्रवाई की जाए। इसलिए यह मौका किसी और बात का रहता नहीं है, खासकर ऐसे में शांति सुझाना एक बहुत ही अलोकप्रिय बात होना तय है। फिर भी सरकारें अपना काम कर रही हैं, हम अपना काम कर रहे हैं।
आज बस्तर के इस मोर्चे पर एक और खबर आई है कि इस मुठभेड़ के बाद से लापता सीआरपीएफ का एक जवान नक्सलियों के कब्जे में है। ऐसा पता लगा है कि नक्सलियों ने ही पुलिस और मीडिया को फोन पर यह खबर दी है और इस जवान की जम्मू में रह रही पत्नी से भी फोन पर बात करके कोई नुकसान न करने का भरोसा दिलाया है। इसके पहले भी कुछ ऐसे मौके आए हैं जब कुछ छोटे पुलिस कर्मचारी नक्सलियों के कब्जे में पहुंच गए थे, और बाद में उन्हें रिहा किया गया। इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि बड़ा अफसर न होने पर भी इस जवान की रिहाई के लिए केंद्र और राज्य सरकार वही लचीलापन दिखाएंगी जो कि दस बरस पहले एक आईएएस के अपहरण के बाद दिखाया गया था, या जो कंधार विमान अपहरण के बाद तालिबानी आतंकियों को रिहा करके दिखाया गया था।
आज चूंकि नक्सली हथियारबंद होकर मोर्चे पर डटे हुए हैं, और वे सुरक्षाकर्मियों को मारने का कोई भी मौका नहीं चूकते हैं, इसलिए उन पर जवाबी हथियारबंद कार्रवाई न करने की कोई वजह नहीं है। केंद्र और राज्य के सुरक्षाबल अब मिलकर और अधिक ताकत से उन पर हमला बोलेंगे, ऐसे आसार हैं। लेकिन इस बीच इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान जैसे दुश्मन समझे जाने वाले देश के साथ भी अभी सरहद पर अमन कायम रखने का जो समझौता निचले फौजी स्तर पर हुआ है, उसके पीछे भारत और पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकारों के बीच मध्यस्थों के मार्फत लंबी बातचीत बताई जाती है। वैसे भी कूटनीति में या अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परदे के पीछे की कोशिशें जब किसी कामयाबी तक पहुंचाने के करीब रहती हैं, तभी परदे के बाहर कैमरों के सामने औपचारिक बातचीत होती है। इसलिए नक्सलियों के खिलाफ सरकारी कार्रवाई अपनी जगह चलती रहे, लेकिन परदे के पीछे ऐसी कोशिशें जरूर करनी चाहिए जो कि लोकतंत्र के हिमायती लोगों के बीच तो हो, लेकिन जिसमें ऐसे लोग भी शामिल हों जिन पर कि नक्सलियों का भी भरोसा हो। बस्तर जैसे नक्सल मोर्चे पर जो भी कार्रवाई हो रही है, वह दोनों ही पक्ष रातों-रात तो बंद करने से रहे, लेकिन बस्तर से दूर किसी और शहर में बैठे विचारवान और विश्वसनीय लोग हिंसा को खत्म करने और लोकतंत्र को जीत दिलाने के लिए काम कर सकते हैं। ऐसी बातचीत के बिना मोर्चों पर छोटे सुरक्षा कर्मचारी उसी तरह शहीद होते रहेंगे जिस तरह शतरंज की बिसात पर प्यादे खत्म होते रहते हैं और वजीर पीछे बैठे नजारा देखते रहते हैं। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों और केंद्र या राज्य की सरकारों की कामयाबी हथियारबंद उग्रवादियों या आतंकवादियों को मारने में नहीं है, उन्हें लोकतंत्र की मूलधारा में लाने में है। हिंदुस्तान में कोई भी नेता नक्सलियों को पांच बरस भी मारते रहकर न तो उन्हें खत्म कर सकते हैं, और न ही खुद महानता का दर्जा पा सकते हैं। लेकिन अगर कोई नेता नक्सल हिंसा को ही खत्म करके नक्सलियों को लोकतंत्र में ला सकें, तो वह बहुत बड़ी ऐतिहासिक कामयाबी होगी। इसलिए हम बंदूकों के लिए कोई मनाही किए बिना भी लोकतांत्रिक ताकतों को लोकतांत्रिक समाधान तलाशने की एक नई पहल सुझाना चाहते हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि ऐसी कोशिश तेजी से कामयाब हो जाए, लेकिन तेजी से तो दसियों हजार सुरक्षा कर्मचारी मिलकर भी एक अकेले बस्तर से नक्सलियों को खत्म नहीं कर पा रहे हैं। नक्सलियों के साथ औपचारिक शांतिवार्ता की कोई जमीन अभी तैयार नहीं है, लेकिन यह लोकतांत्रिक-निर्वाचित सरकार का जिम्मा है कि अनौपचारिक बातचीत से ऐसी जमीन तैयार करे। और इस सिलसिले में कामयाबी मिले या न मिले, नक्सलियों के दिल-दिमाग की बात जानने वाले जो मध्यस्थ सरकार के प्रतिनिधियों के साथ बैठेंगे, वे कम से कम सरकारी-लोकतंत्र की खामियों पर तो चर्चा करेंगे ही, और उससे सरकार को अपनी व्यवस्था को सुधारने का एक मौका भी मिलेगा।
देश के आधा दर्जन राज्यों और केंद्र सरकार के सामने मनमोहन सिंह-सरकार के वक्त से ही माओवादी या नक्सली कही जाने वाली हिंसा देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बनी हुई है। इसे खत्म करने के लिए जिस तरह कई किस्म के सुरक्षा बल, कई किस्म के हथियार, और कई किस्म की रणनीति का इस्तेमाल पिछले कई दशकों से चले आ रहा है, वैसी ही एक अलग शांतिवार्ता की रणनीति हम सुझा रहे हैं, इस पर भी कोशिश करनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ के नक्सलग्रस्त बस्तर के बीजापुर जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर कल दोपहर नक्सलियों के हमले में 22-24 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए हैं। इनमें दो तिहाई राज्य पुलिस के बताए जा रहे हैं और एक तिहाई सीआरपीएफ के। इस इलाके में नक्सलियों की तलाश और मुठभेड़ में राज्य और केंद्र के सुरक्षा बल मिलकर काम करते हैं, और किसी नाकामयाबी की हालत में आम तौर पर दोनों ही एक-दूसरे से तोहमत से बचते हैं और जिम्मेदारी बंद कमरे की बैठक में तय होती है, और बाहर दोनों एकजुट नजर आने की कोशिश करते हैं। नक्सल मोर्चे पर यह हाल-फिलहाल में एक बड़ी शहादत है, और कुल एक या दो नक्सलियों की लाशें मिलने की सरकारी खबर से यह बात साफ होती है कि यह कोई मुठभेड़ नहीं थी, बल्कि सुरक्षा बल नक्सलियों के बिछाए हुए किसी जाल में फंस गए थे, और उन पर दो-तीन तरफ से हुई गोलीबारी में दिन की रौशनी में भी वे कोई जवाबी कार्रवाई नहीं कर पाए और उनकी एकमुश्त शहादत हुई है। लेकिन यह कैसे हुआ इसकी बारीकियां आज यहां लिखने का मकसद नहीं है, मुद्दे की बात यह है कि चौथाई सदी से अधिक हो चुका है कि अविभाजित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सबसे अधिक दूरी पर बसा हुआ बस्तर नक्सल प्रभावित चले आ रहा है, और मौतों के आंकड़ों में उतार-चढ़ाव से परे यह समस्या कभी खत्म नहीं हो पाई है। इसने भोपाल और रायपुर में बैठे कई मुख्यमंत्री देख लिए हंै, केंद्र में कई सरकारें देख ली हैं, लेकिन सुरक्षाकर्मियों को इस मोर्चे पर झोंकने से परे केंद्र और राज्य की कोई नीति अब तक सामने नहीं आई है। जब निर्वाचित-लोकतांत्रिक सरकारों के पास भी रणनीति ही अकेली नीति हो, तो फिर ऐसी जटिल हथियारबंद सामाजिक-राजनीतिक समस्या आखिर खत्म कैसे होगी?
जब कभी नक्सलियों से बातचीत की कोई सलाह दी जाए तो तुरंत ही सरकारों की तरफ से यह प्रतिक्रिया आती है कि नक्सलियों की कोई एक लीडरशिप, उनका कोई एक संगठन तो है नहीं, बात करें तो किससे करें? और फिर सत्तारूढ़ पार्टियां, सरकार, और नक्सल संगठन इनकी तरफ से तरह-तरह की शर्तें सामने आने लगती हैं कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं बशर्तें दूसरा पक्ष हथियार डाल दे, या नक्सल-इलाकों से सुरक्षाबलों को हटा लिया जाए। ऐसी शर्तों को खारिज करने से आगे बढक़र और कोई बात अभी तक हो नहीं पाई है, और अकेले बस्तर के नक्सल मोर्चे पर सैकड़ों जवान शहीद हो चुके हैं, ग्रामीण-आदिवासियों और नक्सलियों की मौतों को भी गिनें, तो कुल मिलाकर यह गिनती हजारों तक भी पहुंच सकती है।
नक्सलियों से बातचीत का कोई गंभीर और ईमानदार इरादा इस चौथाई सदी में हमें सुनाई भी नहीं पड़ा है। छत्तीसगढ़ में एक दशक से पहले बस्तर के एक कलेक्टर का नक्सलियों ने अपहरण कर लिया था, और चूंकि वह बड़ा अफसर था, राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक खासे दबाव में थीं कि उसे रिहा कराया जाए। उसे छोडऩे के एवज में नक्सलियों ने कई मांगें रखी थीं, जिन पर गौर करने और चर्चा करने के लिए नक्सलियों और सरकार की आपसी और मिलीजुली पसंद के कुछ लोगों की एक कमेटी बनाई गई थी जिसकी सिफारिशों पर बस्तर की जेलों में सड़ रहे बहुत से बेकसूर लगने वाले आदिवासियों को छोड़ा भी गया था। बहुत से लोगों के खिलाफ मामले वापस लिए गए थे और वह नौजवान आईएएस कलेक्टर रिहा होकर लौटा था। लेकिन उस वक्त की छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार, और केंद्र की यूपीए सरकार ने बातचीत की इस अस्थाई मेज को स्थाई बनाकर बातचीत आगे बढ़ाने की कोई कोशिश नहीं की, और अखिल भारतीय सेवा के महज एक अफसर को बरी कराने के साथ ही यह संभावना भी खत्म कर दी।
नक्सलियों को गैरराजनीतिक मुजरिम करार देना इस मुद्दे का एक सरकारी-अतिसरलीकरण है। दुनिया का इतिहास है कि हथियारबंद राजनीतिक-आंदोलनों को कभी महज सरकारी हथियारों से खत्म नहीं किया जा सका है। हर कहीं बातचीत जरूरी साबित हुई है, और हिंदुस्तान में भी पंजाब के आतंकी दिनों से लेकर उत्तर-पूर्वी राज्यों के बहुत से हथियारबंद आंदोलनों तक समाधान बातचीत से ही निकला है। हिंदुस्तान के बाहर भी इतिहास के सबसे लंबे, उत्तरी आयरलैंड के हथियारबंद और आतंकी आंदोलन का खात्मा बातचीत से ही हुआ था, और आखिरी दौर के समझौते के लिए उस वक्त के अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने उत्तरी आयरलैंड पहुंचकर मध्यस्थता की थी। छत्तीसगढ़ में एक अफसर की रिहाई के लिए ऐसी मध्यस्थता कायम होने के बाद भी उसकी संभावनाओं को आगे बढ़ाने का मौका सरकारों ने गंवा दिया, और मौतें जारी हैं।
लोकतांत्रिक-निर्वाचित सरकारों की कामयाबी बंदूकों से नक्सलियों को मारने में नहीं है, अगर उन्हें पूरी तरह खत्म करना मुमकिन मान भी लिया जाए, तो भी। कामयाबी इसमें है कि देश के भीतर के किसी भी किस्म के हथियारबंद-आंदोलनकारियों को लोकतंत्र की मूलधारा में वापिस लाया जाए। कोई भी लोकतांत्रिक देश दूसरे देशों से भी बातचीत करके अमन कायम करने और मौतों को रोकने की कोशिश करते हैं। ऐसे में अपने देश के भीतर के असहमत लोगों को बातचीत के लिए तैयार करना निर्वाचित सरकारों की जिम्मेदारी है। नक्सली तो लोकतंत्र पर ही भरोसा नहीं करते हैं, सरकार और संविधान पर भरोसा नहीं करते हैं, इसलिए उनसे तो ऐसी पहल की उम्मीद नहीं की जा सकती, लेकिन लोकतांत्रिक सरकार की यह बुनियादी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है कि वह देश के भीतर के लोगों को बातचीत के लिए सहमत करे, और फिर कोई रास्ता निकाले। इस चौथाई सदी में एक भी सरकार ऐसा कोई ईमानदार कदम उठाते नहीं दिखी है, न छत्तीसगढ़ की, और न ही देश के बाकी आधा दर्जन नक्सल-प्रभावित राज्यों की, और न ही केंद्र में सत्ता संभालने वाले अलग-अलग गठबंधनों ने ऐसी कोशिश की है। यह सिलसिला फौजी-रणनीति या पुलिसिया नजरिए से तो ठीक है, लेकिन लोकतंत्र के नजरिए से यह नाकाफी है। इस देश को अपने छोटे सुरक्षाकर्मियों को इस तरह शहादत की तरफ धकेलना बंद करना चाहिए, और बातचीत की अधिक बड़ी चुनौती मंजूर करना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
हिन्दुस्तान में सबसे तेज रफ्तार से जिन दो-चार राज्यों में कोरोना बढ़ रहा है, उनमें छत्तीसगढ़ एक है। आबादी के अनुपात में संक्रमण और मौत अगर देखें तो छत्तीसगढ़ देश के बहुत से दूसरे प्रदेश और महानगरों से भी आगे निकल गया है। और इसके बढऩे के रूकने का कोई ठिकाना नहीं दिख रहा है। पूरे देश में कोरोना पिछले पूरे एक बरस के सारे रिकॉर्ड को तोडऩे के करीब है, और एक दिन में कोरोना पॉजिटिव लोगों की बढ़ोत्तरी दो-चार दिनों में ही पिछले साल का रिकॉर्ड तोडऩे जा रही है। श्मशानों की तस्वीरें दिल दहलाने वाली हैं कि वहां पर चिता की राख ठंडी होने का वक्त भी नहीं मिल रहा है, और अगल-बगल दूसरी लाशें बिछा दी जा रही हैं। महाराष्ट्र के एक शहर की खबर है कि वहां कोरोना-मौतों में अंतिम संस्कार का जिम्मा परिवार का ही रहेगा, जबकि अब तक देश भर में परिवार को इससे दूर रखा जाता था, और पीपीई पोशाक पहने हुए कर्मचारी अंतिम संस्कार करते थे।
देश भर में तरह-तरह के लॉकडाउन, नाईट कफ्र्यू का वक्त आ गया है, और राज्य के शासन से लेकर जिलों के प्रशासन तक बंद और प्रतिबंध ही सबसे आसान औजार माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने जिला प्रशासनों पर लॉकडाउन या नाईट कफ्र्यू का फैसला छोड़ा है, और एक-एक करके कई जिले इसकी घोषणा भी करते जा रहे हैं। लॉकडाउन से लोगों में बेकारी, और बेरोजगारी बड़े पैमाने पर शुरू हो जाएगी, और कारोबार-कारखाने बंद होने से रोजगार और मजदूरी करने वाले लोग बड़ी संख्या में बिना काम के रह जाएंगे। इसलिए लॉकडाउन की नौबत आए बिना अगर कोरोना संक्रमण के बढऩे पर रोक लगाने का कोई जरिया निकाला जा सकता है, तो प्रशासन की वह अधिक बड़ी कामयाबी होगी।
आज शहरी जिंदगी में जहां कोरोना संक्रमण बढऩे के खतरे सडक़ों पर दिखते हैं, वहां कोई कार्रवाई होते नहीं दिखती है। पुलिस को रिश्वत देकर जो ओवरलोड ऑटोरिक्शा चलते हैं, वे आज भी उसी तरह ओवरलोड चल रहे हैं, और इस खतरे को रोकना बहुत आसान हो सकता था, लेकिन पुलिस और प्रशासन की ऐसी कोई नीयत भी नहीं दिखती है। दूसरा एक खतरा सडक़ किनारे ऐसे खाने-पीने के ठेलों पर है जहां प्लेट-चम्मच या कप-ग्लास एक ही बाल्टी में बार-बार धोकर ग्राहकों को दिए जाते हैं। इन पर भी कोई कार्रवाई इतने महीनों में भी नहीं हुई, और अब आम हिन्दुस्तानी लोग कोरोना के खतरे से बेफिक्र हो चुके हैं, और ऐसी जगहों पर खाना-पीना बेबसी न होने पर भी वह धड़ल्ले से जारी है। बेघर लोग रोज का खाना बाहर खाने को तो बेबस हो सकते हैं, लेकिन स्वाद के लिए इस तरह खाना गैरजरूरी है, और लोगों को खतरे की समझ खत्म हो चुकी है।
प्रशासन के पास लॉकडाउन करने का अधिकार तो है, लेकिन यह तो एक आखिरी रास्ता रहता है जिससे अर्थव्यवस्था भी चौपट होती है, और गरीब सबसे अधिक बदहाल हो जाते हैं। इसलिए यह नौबत आने के पहले ही दूसरी तरकीबों से संक्रमण को रोकने की समझदारी अगर दिखाई जाती, तो वह एक कामयाब प्रशासन होता। लॉकडाउन जैसा प्रतिबंध लगाकर तो संक्रमण को रोकना एक भारी नुकसान वाला आसान रास्ता है, जिसमें प्रशासनिक-कामयाबी कुछ भी नहीं है।
पिछले कुछ बरसों में शहरों की सार्वजनिक जगहों पर, बगीचों में, तालाब किनारे, और फुटपाथों पर कसरत की बहुत सी मशीनें लगाई गई हैं जिनमें से हरेक का सैकड़ों लोग इस्तेमाल करते हैं। ये सारे लोग इन मशीनों के गिने-चुने हिस्सों को थामते हैं, और ये संक्रमण का एक बड़ा खतरा हो सकता है, लेकिन इन पर कोई रोक नहीं लगाई गई है। छत्तीसगढ़ में तो जागरूक लोगों से लेकर सरकार तक सभी बहुतायत आबादी की गैरजिम्मेदारी देखकर हक्का-बक्का हैं कि इतनी मौतों के बाद भी लोग मास्क तक लगाने को तैयार नहीं हैं। यहां सडक़ों पर महिला कर्मचारियों के जत्थे लोगों की गाडिय़ों को घेर-घेरकर उन पर जुर्माना लगा रही हैं, उसकी तस्वीरें रोज छप रही हैं, फिर भी लोग सुधर नहीं रहे हैं। जिन दुकानों में रोज सैकड़ों ग्राहक पहुंच रहे हैं, वहां भी दुकानदार खुद मास्क लगाने को तैयार नहीं हैं। अब सवाल यह है कि इतने गैरजिम्मेदार और लापरवाह लोग बर्दाश्त क्यों किए जाएं? जब ये लोग दूसरे जिम्मेदार लोगों की जिंदगी पर खतरा बनकर खड़े हैं, तो इन पर मामूली जुर्माने से अधिक बड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की जाए? आज कोरोना के संक्रमण का खतरा इतना अधिक है कि किसी को जेल भेजने की सलाह देना गलत होगा, लेकिन कारोबार के आकार और लापरवाही का दर्जा देखकर इन पर इतना तगड़ा जुर्माना तो लगाना ही चाहिए कि और लोगों को सबक मिल सके।
महामारी से आबादी को बचाना आसान नहीं है, दसियों लाख सावधान लोगों के बीच अगर दसियों हजार लापरवाह हैं, तो वे बीमारी को फैलाने के लिए काफी हैं। इसलिए प्रशासन को लापरवाह लोगों पर बड़ी सख्ती बरतनी चाहिए, और ऐसी कड़ी कार्रवाई का प्रचार भी करना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ बड़ी बात यह है कि संक्रमण फैलने के खतरे वाले कारोबार, कार्यक्रम की शिनाख्त करके उन्हें तुरंत रोका जाना चाहिए। अगर बीच के कुछ महीनों में जब कोरोना का हमला कुछ कम था, उस वक्त कारोबार और कार्यक्रम को लेकर प्रशासन ने सावधानी बरती होती, तो ऐसी नौबत नहीं आई होती। दुनिया भर के चिकित्सा वैज्ञानिकों और महामारी के जानकारों का यह मानना है कि कोरोना का टीका लगाने की जरूरत हर बरस पड़ सकती है, और मास्क तो बरसों तक लगाना ही पड़ेगा, तो ऐसी नौबत में हर राज्य और जिले को सख्ती से सावधानी लागू करने का काम करना चाहिए। जिन लोगों को कोरोना से होने वाली मौतें अभी भी काफी नहीं लग रही हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि कोरोना से उबरने के बाद भी लोग बदन से हुए नुकसान से नहीं उबर सकते, और वे बाकी जिंदगी कई किस्म की दिक्कतें झेलते रहेंगे। लोगों के पास, लापरवाह लोगों के पास गैरजिम्मेदारी दिखाने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए, और उन पर सख्त कार्रवाई प्रशासन का जिम्मा है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
मध्यप्रदेश दलितों, आदिवासियों और महिलाओं के साथ बहुत ही परले दर्जे के जुल्मों के लिए हमेशा से जाना जाता है। सतना-रीवां से लेकर ग्वालियर तक का इलाका सामंती असर में जीता है, और कल के सामंत, आज के नेता, इनके जुल्मों में कोई बहुत फर्क आ गया हो, ऐसा भी नहीं दिखता है। अभी वहां 16 बरस की एक नाबालिग लडक़ी से एक बालिग ने बलात्कार किया तो गांव ने दोनों को बांधकर साथ-साथ परेड निकाली। जब इसका वीडियो चारों तरफ फैल गया, तब पुलिस के पास भी बलात्कार के इस आरोपी और परेड निकालने वाले पांच लोगों को गिरफ्तार करने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया था। दिल दहलाने वाला यह वीडियो बताता है कि लोगों की भीड़ इन दोनों को बांधकर पीटते हुए इनका जुलूस निकाल रही थी, और भारत माता की जय के नारे लगा रही थी। अब जब चारों तरफ थू-थू होते कुछ दिन हो गए तो भारतीय बाल अधिकार संरक्षण परिषद ने मध्यप्रदेश के पुलिस प्रमुख से इस पर रिपोर्ट मांगी है।
यह घटना याद दिलाती है कि किस तरह कुछ बरस पहले जब जम्मू-कश्मीर एक राज्य था, और वहां पीडीपी-भाजपा की गठबंधन सरकार थी तब जम्मू में एक खानाबदोश मुस्लिम बच्ची से एक मंदिर में पुजारी समेत आधा-एक दर्जन लोगों ने बलात्कार करके उस बच्ची को मार डाला था, तो इनके नाम सामने आने पर इन्हें बचाने के लिए भाजपा नेताओं की अगुवाई में जम्मू में तिरंगे झंडे लेकर जुलूस निकाले थे। जम्मू हिन्दू बहुतायत वाला इलाका है, और वहां पर सिर्फ हिन्दुओं वाली इस बलात्कारी-टोली को बचाना एक बड़ा हिन्दूवादी मुद्दा बनाया गया था। और तो और इस मुस्लिम बच्ची की तरफ से जो हिन्दू महिला वकील खड़ी हुई थी, उसे भी हिन्दू संगठनों की ओर से तरह-तरह की धमकियां दी गई थीं, उसका सामाजिक बहिष्कार किया गया था।
किसी धर्म की महानता इस बात से तय नहीं होती कि उसकी किताबों में कैसी नसीहतें लिखी हुई हैं। यह तो उस धर्म को मानने वाले लोगों के चाल-चलन और बर्ताव से तय होने वाली बात रहती है। फिर अधिकतर धर्मों में धार्मिक किताबों से लेकर मानने वालों के चाल-चलन तक कुछ बुनियादी बेइंसाफी चली ही आती है। कहीं दलितों के खिलाफ, तो कहीं पति खो चुकी महिला के खिलाफ, तो कहीं किसी लांछन की शिकार महिला के खिलाफ, त्रेता और द्वापर युग से लेकर अब तक यह चले ही आ रहा है। और यह बात सिर्फ हिन्दू धर्म में है, ऐसा भी नहीं है। दूसरे भी बहुत सारे धर्मों में महिलाओं और दीगर कमजोर तबकों के खिलाफ बेइंसाफी की बातें भरी हुई हैं। नतीजा यह होता है कि जब मध्यप्रदेश में कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर सवार होकर बारात के साथ निकलता है, तो उस पर गांव के सवर्ण पथराव करते हैं। शर्मिंदगी की ऐसी तस्वीरें भी मध्यप्रदेश से कई बार सामने आती हैं जब ऐसी बारात को सुरक्षा देते हुए साथ चलती पुलिस हेलमेट लगाकर पैदल चलती है, और दूल्हे को भी घोड़ी पर हेलमेट पहना दिया जाता है।
यह पूरा सिलसिला किसी धर्म, किसी देश, किसी प्रदेश, या किसी जाति के लोगों को शर्मिंदगी में डुबाने के लिए काफी होना चाहिए, लेकिन ये तमाम तबके ऐसे चिकने घड़े बन चुके हैं जिन पर शर्मिंदगी की एक बूंद भी नहीं टिक पाती, उसे छू भी नहीं पाती।
जब देश में एक धर्म को दूसरे धर्म के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए भडक़ाया और उकसाया जाता है, जब दूसरे धर्म का एक काल्पनिक खतरा सामने खड़ा किया जाता है, और फिर कुछ ऐसा ही एक जाति में दूसरी जाति के खिलाफ पैदा किया जाता है, ऊंची कही जाने वाली जातियों को यह खतरा दिखाया जाता है कि नीची कही जाने वाली जातियां एकजुट होकर एक दिन हमलावर हो जाएंगी, तो ऐसे में सदियों से चले आ रहा सामाजिक तनाव पिछली पौन सदी के लोकतंत्र को अनदेखा करके सडक़ों पर हिसाब चुकता करने में लग जाता है। आज यह सामाजिक तनाव बढ़ाते-बढ़ाते इस हद तक पहुंचा दिया गया है कि लोगों को अपनी जाति के बलात्कारी सुहाने लगे हैं, और दूसरी जाति की बलात्कार की शिकार लडक़ी भी सजा की हकदार लगने लगी है। यह सिलसिला देखकर किसी की लिखी यह लाईन याद आती है कि जिन्हें नाज है हिन्द पर वे कहां हैं?
दो राष्ट्रवाद लोगों के बीच एक अभिमान भरने वाला होना चाहिए, उसे अभिमान के लायक तो कुछ मिल नहीं रहा है, और शर्मिंदगी उसे होना बंद हो चुकी है। यह सिलसिला इस देश को टुकड़े-टुकड़े कर रहा है, लेकिन लोगों को ये दरारें अभी दिख नहीं रही हैं क्योंकि लोगों को अपने ही तबकों, अपनी बिरादरियों के भीतर मगन रहना सिखा दिया गया है। अपने तबके के बलात्कारियों को बचाने में जिस तबके को गौरव हासिल होता हो तो उस तबके के लोगों के धर्म और जाति अपनी इज्जत की फिक्र खुद कर लें। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि हरिद्वार में होने जा रहे कुंभ मेले में आने वाली अपार भीड़ की कोरोना-जांच के लिए मेला स्थल पर हर दिन 50 हजार कोरोना जांच की जाए। अदालत ने इसके लिए पार्किंग और घाट के इलाकों में मोबाइल मेडिकल सुविधाओं सहित प्रशिक्षित मेडिकल टीम तैनात करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी कहा है कि केन्द्र सरकार द्वारा दिए गए कोरोना-निर्देशों पर सख्ती से अमल किया जाए। यह आदेश ऐसे वक्त आया है जब आज पहली अप्रैल से हरिद्वार महाकुंभ की औपचारिक शुरूआत हो रही है, और 30 अप्रैल तक यह मेला चलेगा। इसमें दसियों लाख लोग पहुंचने वाले हैं, और राज्य सरकार का कहना है कि कोरोना से अधिक प्रभावित एक दर्जन राज्यों से आने वाले लोगों पर खास नजर रखी जाएगी। सरकार ने यह भी कहा है कि पहुंचने के पिछले 72 घंटों के भीतर ही आरटीपीसीआर निगेटिव रिपोर्ट और फिटनेस प्रमाणपत्र कुंभ मेले की वेबसाईट पर अपलोड करने के बाद उसकी रसीद दिखाने पर ही श्रद्धालुओं को मेला क्षेत्र में प्रवेश दिया जाएगा। जो लोग हरिद्वार जैसे नदी किनारे बसे हुए शहर से वाकिफ हैं वे समझ सकते हैं कि शहर की सरहद पर हर दिन पहुंचने वाले लाखों लोगों के कागजातों की इतनी जांच कैसे हो सकेगी, और कैसे हाईकोर्ट के हुक्म के मुताबिक रोज 50 हजार लोगों की आरटीपीसीआर जांच हो सकेगी।
अभी चार दिन पहले ही महाराष्ट्र के नांदेड़ में सिक्खों के एक बड़े महत्वपूर्ण माने जाने वाले गुरूद्वारे के बाहर पुलिस ने जब धार्मिक जुलूस निकालने से रोका, तो सैकड़ों सिक्खों की भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया। इनमें से दर्जनों लोग तलवारें लेकर पुलिस पर टूट पड़े। इस हमले का वीडियो भी चारों तरफ फैला है। धक्का-मुक्की वाला ऐसा जुलूस, और धार्मिक लोगों का ऐसा हथियारबंद हमला झेलती हुई पुलिस न सिर्फ जख्म पा रही थी, बल्कि कोरोना का खतरा भी पा रही थी। ऐसी ही नौबत उत्तराखंड में आ सकती है जहां लाखों लोगों से हर दिन उनकी कोरोना रिपोर्ट इंटरनेट पर डालने की उम्मीद की जाएगी, और मोबाइल फोन पर उसकी रसीद दिखाने की भी। ऐसी अपार धार्मिक भीड़ से अदालत और सरकार किस किस्म के अनुशासित होने की उम्मीद कर सकती है? और सवाल यह भी उठता है कि जब पिछले एक बरस में महीनों तक इस देश में तमाम ईश्वरों के दरवाजे बंद देखे हैं जिन्हें खोलने के लिए ईश्वरों ने भी अपनी दैवीय ताकत या करिश्मे का कोई इस्तेमाल नहीं किया, तो आज दुनिया के एक सबसे बड़े धार्मिक आयोजन, कुंभ की इस जानलेवा धक्का-मुक्की वाली भीड़ को कोरोना के खतरे से कोई कैसे बचा सकेंगे? अगर लोगों को अपनी धार्मिक भावनाओं को पूरा करते हुए यह याद नहीं पड़ रहा है कि आज हिन्दुस्तान में कोरोना का खतरा कितना गंभीर है, तो उन्हें यह याद दिलाना जरूरी है। पिछले बरस जब कोरोना इस देश में सबसे खतरनाक हाल पैदा कर चुका था, तब हर दिन हिन्दुस्तान में एक लाख से कुछ कम लोग कोरोना पॉजिटिव मिल रहे थे। वह नौबत कई महीनों के कोरोना-संक्रमण के बाद आई थी। लेकिन अभी हाल के कुछ हफ्तों में कोरोना पॉजिटिव तेजी से छलांग लगाकर अब कल एक दिन में 72 हजार पार कर चुकी है और कल के एक दिन में 459 कोरोना मौतें हुई हैं। जो कि पिछले बरस के सर्वाधिक आंकड़ों से अधिक पीछे नहीं है। ऐसे में हिन्दुओं का एक बहुत बड़ा मेला जिसमें एक महीने में दसियों लाख लोग पहुंचेंगे, वह किसका भला करने जा रहा है? अगर देश के हालात और अधिक बिगड़े तो महाराष्ट्र की तरह दूसरे राज्य भी ईश्वरों को बचाने के लिए धर्मस्थलों को बंद कर देंगे, लेकिन इंसान कहां जाएंगे? नांदेड़ में चार सौ लोगों की भीड़ जब सैकड़ों पुलिसवालों पर टूट पड़ी तो उसने कई पुलिसवालों को बुरी तरह जख्मी कर दिया। अब कुंभ में धर्मालु भीड़ अगर किसी वजह से हिंसक या बेकाबू हुई तो किस धर्म के लोगों का सबसे अधिक नुकसान होगा? कुंभ से लौटकर आने वाले श्रद्धालु जाहिर तौर पर अपने हिन्दू परिवारों में ही लौटेंगे, और अगर वे संक्रमण लेकर आते हैं तो देश के हिन्दुओं को ही कोरोना का प्रसाद देंगे। ऐसे में कोरोना के इस खतरनाक और जानलेवा दौर में जिस धर्म के लोग इकट्ठा हो रहे हैं उसी धर्म का सबसे बड़ा नुकसान है। उत्तराखंड के मुख्य सचिव ने औपचारिक रूप से यह कहा है कि पूरे कुंभ के दौर में हरिद्वार में देश-विदेश के श्रद्धालु रहेंगे, और कोरोना संक्रमण का खतरा बने रहेगा। तमाम सावधानी के बावजूद वहां के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत और उनकी पत्नी दोनों कोरोना पॉजिटिव हैं, पूर्व सीएम और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री भी कोरोना पॉजिटिव हैं। महामारी के इस भयानक दौर में इस धार्मिक आयोजन पर अड़े रहना राज्य सरकार के लिए, बाकी देश के लिए जितना भी बड़ा खतरा है, उससे कहीं अधिक बड़ा खतरा वह इस धर्म के लोगों और उनके परिवारों के लिए है।
लोगों को याद होगा कि पिछले बरस इन्हीं दिनों में दिल्ली में तब्लीगी जमात के कुछ हजार लोगों के बीच से कोरोना देश भर में फैलने को लेकर दिल्ली की सरकारों ने कुछ इस किस्म का हंगामा खड़ा किया था कि उस पर देश की कई अदालतों ने बहुत बुरी नाराजगी जाहिर की है, और सरकार और मीडिया की कड़ी आलोचना भी की है। अब कुछ हजार लोगों के एक धार्मिक आयोजन से तो दसियों लाख लोगों के गंगा स्नान वाले कुंभ की कोई तुलना भी नहीं की जा सकती। उस वक्त अगर लौटे हुए तब्लीगी जमातियों से कोरोना फैला था, तो अब दसियों लाख हिन्दुओं के कुंभ-स्नान से लौटने के बाद क्या वैसा कोई खतरा नहीं हो सकता? देश में धार्मिक भावनाएं उबाल पर हैं, और हिन्दुस्तानियों की सोच में जितनी कुछ भी वैज्ञानिक सोच आधी सदी में विकसित हो पाई थी, उसे धर्मान्धता की धार मार-मारकर धो दिया गया है। कुंभ का जितना इंतजार तीर्थयात्री नहीं कर रहे हैं, उनका ईश्वर नहीं कर रहा है, कुंभ का उतना इंतजार कोरोना कर रहा है।
भारत के पड़ोस के जिस म्यांमार में लोकतंत्र की वापिसी के लिए चल रहे आंदोलन पर वहां की ताजा फौजी तानाशाही की गोलियां अभी एक दिन में सौ से अधिक लोगों का कत्ल कर चुकी हैं। जाहिर है कि वहां के लोग पड़ोस के देशों में जाकर शरण लेने की कोशिश करेंगे। ऐसे में भारत में म्यांमार से लगी सरहद के मणिपुर में भी वहां के कुछ लोग आ रहे हैं, और ऐसे में राज्य की सरकार ने एक आदेश निकालकर सभी जिलों को कहा कि म्यांमार के नागरिकों के अवैध दाखिले को रोकने के लिए उचित कार्रवाई करें, और अपने जिलों में आए ऐसे लोगों को रहने-खाने का कोई भी इंतजाम न दें। मणिपुर की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री एन. बिरेन सिंह अभी कुछ दिन पहले खबरों में आए थे जब मीडिया में उनका एक वीडियो सामने आया जिसमें वे अफसरों के साथ किसी सरकारी इमारत का दौरा कर रहे हैं, और उनके चलने के कालीन के दोनों तरफ स्कूली बच्चे जमीन पर सिर टिकाए हुए कतार में खड़े थे। उसके बाद अभी आए इस दूसरे आदेश से भी राज्य की सरकार के खिलाफ देश-विदेश के सोशल मीडिया में इतना कुछ लिखा गया कि सरकार को अपने इस आदेश को सुधारना पड़ा, और नर्म करना पड़ा। वरना पहले आदेश में मणिपुर सरकार ने जिलों को लिखा था कि किसी सामाजिक या अशासकीय संगठन को भी म्यांमार से आने वाले लोगों को रहने-खाने का इंतजाम न करने दिया जाए।
मणिपुर का यह आदेश उस वक्त आया जब संयुक्त राष्ट्र में म्यांमार के राजपूत ने भारत सरकार और भारत की राज्य सरकारों से अपील की थी कि दोनों देशों के बीच के लंबे ऐतिहासिक संबंधों को न भुलाया जाए, और आज मानवीय त्रासदी की वजह से म्यांमार के जो लोग भारत में जान बचाने के लिए आ रहे हैं, उन्हें शरण दी जाए। भारत का पुराना इतिहास रहा है कि पड़ोसी देशों से मुसीबत में आने वाले लोगों की उसने मदद की है। पाकिस्तान से आए हुए लोगों को भारत में लगातार नागरिकता दी जाती रही है, चीन छोडक़र आए हुए दलाई लामा सहित दसियों हजार तिब्बतियों को भारत ने शरण दी है, जब पाकिस्तान ने अपने पूर्वी पाकिस्तान वाले हिस्से पर जुल्म किया, और लाखों लोग सरहद पार करके भारत आए, तो तब से लेकर अब तक वे बांग्लादेशी कहे जाने वाले लाखों शरणार्थी भारत में ही हैं। और तो और अभी भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बांग्लादेश की राजकीय यात्रा पर वहां औपचारिक घोषणा करके आए हैं कि बांग्लादेश की आजादी के लिए चले सत्याग्रह में 1971 में हिन्दुस्तान में वे भी शामिल थे। और यह तो इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है कि बांग्लादेश के निर्माण के साथ ही जुड़ी हुई हकीकत है कि भारत ने ऐसे लाखों शरणार्थियों को अपने देश में बसाया जो कि आज भी यहीं हैं। भारत में नेपाल के लोग बिना वीजा रहकर काम करते हैं, और बहुत किस्म की नौकरियां भी करते हैं। इस तरह भारत में तकरीबन हर पड़ोसी देश के लोगों की मुसीबत में मदद अपनी आजादी के दिनों से ही की है। ऐसे में जब भारत का एक राज्य यह आदेश निकालता है कि म्यांमार से आने वाले लोगों को खाना भी न दिया जाए, और न किसी को इजाजत दी जाए कि वह ऐसे शरणार्थियों को खाना दे, तो ऐसा सरकारी आदेश धिक्कार के लायक है। खासकर उस वक्त जब देश की मोदी सरकार और मणिपुर की प्रदेश सरकार एक ही पार्टी की अगुवाई वाली सरकारें हैं, यह सोच पाना नामुमकिन है कि एक भाजपाई मुख्यमंत्री केन्द्र सरकार से पूछे बिना अपने स्तर पर ऐसा आदेश निकाल सकता है। जब पड़ोस के देश में फौजी तानाशाह की फौज एक-एक दिन में सौ से अधिक लोकतंत्र-आंदोलनकारियों को मार गिरा रही है, उस वक्त जान बचाकर आए हुए लोगों को अगर गौरवशाली इतिहास वाले हिन्दुस्तान में जगह और खाने-पीने से भी मना कर दिया जाए, तो हिन्दुस्तान एक दकियानूसी टापू बनकर रह जाएगा।
वैसे भी आज हिन्दुस्तान न सिर्फ म्यांमार बल्कि दूसरे देशों में हो रही अमानवीय घटनाओं में अपनी अंतरराष्ट्रीय-मानवीय जिम्मेदारी निभाने से बुरी तरह कतरा रहा है। उसने फिलीस्तीनियों पर हो रहे अंतहीन इजराईली जुल्मों को देखने से भी मना कर दिया है, उस पर कुछ बोलना तो दूर रहा। देश के भीतर विदेशी कहे जाने वाले दसियों लाख लोगों को हिरासत-शिविरों में डालने, और अंतत: देश के बाहर निकालने पर भी मोदी सरकार आमादा है। यह एक अलग बात है कि इस दर्जे में गिने जा रहे सबसे अधिक लोग जिस बांग्लादेश से आए बताए जाते हैं, उस बांग्लादेश की दो दिन की राजकीय यात्रा में भी प्रधानमंत्री मोदी ने इन लोगों की चर्चा तक नहीं की, जबकि बांग्लादेश के विदेश मंत्री खासे अरसे पहले यह बोल चुके थे कि उन्होंने भारत सरकार से लिस्ट मांगी है कि अगर कोई बांग्लादेशी नागरिक वहां अवैध रूप से रह रहे हैं तो उन्हें बांग्लादेश वापिस लेने तैयार है। भारत के बहुचर्चित और विवादास्पद एन.आर.सी., नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप, के विवाद पर बांग्लादेशी विदेश मंत्री एक बार भारत का दौरा रद्द भी कर चुके हैं।
अपने पड़ोस के लोगों की मुसीबत के वक्त उनके काम आना किसी भी लोकतांत्रिक देश की घोषित जिम्मेदारी रहती है। अंतरराष्ट्रीय संबंध ऐसी जिम्मेदारी की बुनियाद पर ही बनते हैं। लोगों ने हाल के बरसों में देखा है कि सीरिया जैसे अशांत देशों से नौकाओं पर सवार होकर योरप पहुंचने वाले लाखों शरणार्थियों को तकरीबन तमाम यूरोपीय देशों ने जगह दी है, और उनके लिए इंतजाम किए हैं। मणिपुर का रूख भारत के लिए बहुत शर्मिंदगी का है, और खुद भारत सरकार का रूख भी ऐसा नहीं है कि जिस पर आने वाली सदियां कोई गर्व कर सके। मानवीय आधार पर मदद की नौबत आने पर बिना किसी शर्त इंसानों को जिंदा रहने की मदद करनी चाहिए। भारत का जो फौजी विमान पाकिस्तान में गिरा था, वह दुश्मन-फौजी विमान होने के बावजूद वहां की सरकार ने उसके हिन्दुस्तानी पायलट की मदद की थी। भारत सरकार को मणिपुर सरकार की चिट्ठी पर इस देश का नजरिया साफ करना चाहिए क्योंकि यह मामला भारत के किसी राज्य के पड़ोसी देश से संबंध का नहीं है, बल्कि भारत के विश्व समुदाय से संबंधों का मामला है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
हिन्दुस्तान के और हिन्दू धर्म के किसी भी दूसरे त्यौहार के मुकाबले होली कई किस्म की बुराईयों से जुड़ी हुई आती है। हो सकता है कि सैकड़ों बरस पहले लकड़ी की कमी न रहती हो, और लोग होली जलाते हों तो उससे न तो लकड़ी की कमी होती होगी, न ही हरे पेड़ उसके लिए काटने पड़ते होंगे, और न ही प्रदूषण इतना अधिक रहता होगा कि होली की आग से प्रदूषण और बढ़ता रहा हो। वैसे वक्त होली जलाने की जो परंपरा थी, उस वक्त सडक़ें भी डामर की नहीं रहती थीं, और न तो वे जलकर खराब होती थीं, और न ही अगले दिन से उस जगह से निकलने वाली गाडिय़ों से कई दिन तक उडऩे वाली राख दिक्कत खड़ी करती होगी। जिस तरह दीवाली बहुत से पटाखों के बारूद और रसायन का भयानक प्रदूषण हवा में फैलाकर सेहत पर खतरा खड़ा करने लगी है, उसी तरह होली से अब शहरी और कस्बाई सडक़ें जलती हैं, राख और कोयला कई दिनों तक हवा में उड़ते हैं, और लोग हरे पेड़ काटकर भी जला देते हैं।
अब होली जलाने से परे का रिवाज देखें तो अगले दिन रंग खेला जाता है, और किसी समय वह अच्छा रंग भले रहता होगा, अब यह रंग तरह-तरह के रसायनों से बना हुआ रहता है, और लोग चेहरों को चांदी या सोने जैसा पेंट लगाकर भी घूमते हैं। अधिक उत्साही लोग चुनाव की अमिट स्याही जुटाकर भी कुछ चुनिंदा चेहरों पर पोतते हैं, और इनका नुकसान तुरंत चाहे नहीं दिखता, वह रहता तो लंबे समय तक है। होली जलाने से लेकर रंग खेलने तक जो बात एक सरीखी रहती है वह नशे और अश्लीलता की है। होली के दो-चार दिन जमकर नशा चलता है, और लोग अश्लील गालियां देते घूमते हैं। अब एक हिन्दू धार्मिक कथा से शुरू हुआ यह त्यौहार कब और कैसे नशे और अश्लीलता में डूब गया यह अंदाज लगाना खासा मुश्किल काम है, लेकिन अभी तो पिछले 25-50 बरस से देखने में ऐसा ही आ रहा है।
त्यौहारों का जिंदगी में एक अलग महत्व होता है, और होली के साथ एक खूबी यह है कि यह सबसे सस्ता हिन्दू त्योहार भी है। और त्योहारों में यहां मामूली क्षमता के लोग भी कपड़े सिलाने या खरीदने की परंपरा निभाते हैं, वहीं होली में लोग पुराने कपड़ों में निकलते हैं, और पहले से खराब हो चुकी एक जोड़ी पूरी तरह फेंकने लायक हो जाती है, इसमें कोई खर्च नहीं होता। दारू भी लोग अपनी औकात से पीते हैं, रंग-गुलाल में भी बहुत बड़ा खर्च नहीं होता है। इस तरह होली एक सस्ता त्योहार है जो किसी गरीब परिवार पर भी बोझ बनकर नहीं आता। फिर जैसा कि होली के त्योहार को लेकर कहा जाता है कि दुश्मन बन चुके दिल भी इस दिन मिल जाते हैं, तो हो सकता है कि कुछ लोग खोए हुए दोस्त इस दिन वापिस पा जाते होंगे, या नए दोस्त बना लेते होंगे। इससे परे की एक बात यह भी है कि हिन्दुस्तानी जनजीवन में अश्लीलता और गाली-गलौज से अमूमन परहेज चलता है, लेकिन इस दिन लोगों को अपनी भड़ास निकालने का पूरा मौका मिलता है, और उनकी दमित-कुंठित भावनाएं त्यौहार की आड़ में बाहर आ जाती हैं। उत्तर भारत के कुछ इलाके ऐसे भी हैं जिनमें महिलाओं और पुरूषों के बीच सार्वजनिक रूप से मिलकर खेले जाने वाले अकेले त्यौहार होली से महिलाओं को भी बराबरी का एक मौका मिलता है, और वे ल_मार होली खेलते भी दिखती हैं। होली के रंग-गुलाल के साथ-साथ परंपरागत गीत-संगीत की बड़ी समृद्ध परंपरा है, और लोगों को इन एक-दो दिनों पर फिक्र अलग रखकर आनंद लेने का मौका मिलता है, और भारत की इसी परंपरा के चलते कई भाषाओं की फिल्मों को भी होली के नाच-गाने मिल जाते हैं।
इस बरस, 2021 में यह होली एक अभूतपूर्व तनाव के बीच आई है। पिछले बरस 2020 में होली कोरोना-लॉकडाउन के पहले आई थी, और लोगों ने उसे हर बार की तरह खेला भी था। लेकिन इस बरस पिछले एक-दो महीनों से हिन्दुस्तान में जिस रफ्तार से कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं, और अभी बंगाल-असम के चुनाव, और कई क्रिकेट मुकाबलों की मेहरबानी से बढ़ते चलने हैं, उसे देखते हुए इस बार की होली सिर्फ लापरवाही और गैरजिम्मेदार लोगों के बीच पहले सरीखी हो सकती है, बाकी तमाम लोग डरे-सहमे भी रहेंगे, और हो सकता है कि सरकार की सलाह के मुताबिक घर के भीतर भी रहेंगे। यह याद रखने की जरूरत है कि होली में जिस तरह एक-दूसरे को छूना, एक-दूसरे के गले मिलना, एक-दूसरे पर रंग डालना चलता है, वह सिलसिला कोरोना को बहुत पसंद आने वाला है, और हो सकता है कि होली की मस्ती हिन्दुस्तान में कोरोना को एक नई ऊंचाई पर ले जाए। आज कोरोना की जितनी काल्पनिक तस्वीरें बनाई गई हैं, और प्रचलित हैं, वे सारी की सारी होली जैसे रंगों में दिखती हैं, और आज हकीकत भी यही है कि इन रंगों के साथ-साथ छुपा हुआ कोरोना भी चारों तरफ फैले। होली की परंपरा शुरू होने के बाद से अब तक कभी ऐसी नौबत नहीं आई थी कि लोगों को इतनी सावधानी बरतने की जरूरत पड़ी हो, और होली की लापरवाही इस महामारी या ऐसी महामारी के फैलाने का खतरा रहे। अगले दो-तीन दिन लोगों को होली की अपनी हसरतों को तब तक काबू रखना चाहिए जब तक कि कोरोना चला न जाए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक बयान पर की गई अपनी टिप्पणी पर माफी मांगी है। मोदी ने बांग्लादेश के दौरे के बीच वहां एक भाषण में बांग्लादेश की आजादी या उसके निर्माण के संदर्भ में इंदिरा गांधी का भी जिक्र किया था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था- बांग्लादेश की आजादी के लिए संघर्ष में शामिल होना मेरे जीवन के भी पहले आंदोलनों में से एक था। मेरी उम्र 20-22 साल रही होगी, जब मैंने और मेरे कई साथियों ने बांग्लादेश के लोगों की आजादी के लिए सत्याग्रह किया था।
मोदी के इस कथन पर शशि थरूर ने ट्वीट किया था- हमारे प्रधानमंत्री बांग्लादेश को फर्जी खबर का स्वाद चखा रहे हैं। हर कोई जानता है कि बांग्लादेश को किसने आजाद कराया। अब शशि थरूर ने अपनी इस ट्वीट के लिए माफी मांगी है और कहा है कि उन्होंने जल्दबाजी में ऐसा ट्वीट किया था। उन्होंने कहा कि कल खबरों की सुर्खियां पढक़र उन्होंने यह लिख दिया था जबकि बाद में उन्होंने देखा कि मोदी ने इंदिरा गांधी को भी इसका श्रेय दिया था।
आज जब किसी गलत राजनीतिक बयान के लिए माफी मांगना या अफसोस भी जाहिर करना हिन्दुस्तान में चलन से बाहर हो चुका है, और अमरीका में भी ट्रंप-युग में यह आऊट ऑफ फैशन था। ऐसे में शशि थरूर का यह माफी मांगना उनके सज्जन और उदार होने का एक संकेत तो है, लेकिन उनकी यह नौबत यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज का वक्त और इसकी टेक्नालॉजी लोगों के पास सोचने का वक्त भी छोड़ते हैं?
अभी कुछ दशक पहले तक हिन्दुस्तान में लोग टेलीफोन पर बात करने के लिए भी ऑपरेटर को नंबर देकर घंटों तक इंतजार करते थे। किसी को कुछ लिखकर भेजना होता था तो पोस्टकार्ड या अंतरदेशीय पत्र लाकर उसमें लिखकर उसे पोस्ट करने जाना होता था, और यह सबसे तेज प्रतिक्रिया भी कुछ घंटे तो लेती ही थी। फिर यह भी होता था कि छोटे गांवों में डाकिया रोज नहीं आता था, और जब वह अगली बार आए तब तक सोचने का और लिखने का वक्त रहता था। वह तमाम सिलसिला अब खत्म हो गया है। अब तो लोग वॉट्सऐप पर तेजी से टाईप करके उसे भेज देते हैं, एसएमएस टाईप करके भेज देते हैं, या ईमेल भेज देते हैं, और बात खत्म हो जाती है। कुछ दशकों के भीतर क्या इंसान का मिजाज सचमुच ही इस रफ्तार से बदल गया है कि वे अब पलक झपकते जवाब देने के लायक हो गए हैं? कम्प्यूटर और मोबाइल फोन पर किसी भी चैट पर एक मिनट के भीतर लोगों की दस-दस बातें आती-जाती हैं, और लोग इस बात की भी परवाह नहीं करते कि उनका लिखा हुआ सभी है या नहीं, या वे किसी कानूनी उलझन की बातें तो नहीं लिख रहे हैं? आज जब कोई बात जुर्म के दायरे में आ जाती है तो लोगों को समझ पड़ता है कि उनका एक-एक शब्द किस तरह उन्हें सजा दिलाने के लिए काफी है। दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर बहुत से केन्द्रीय मंत्री और सांसद समय-समय पर अपने सार्वजनिक बयानों के लिए अदालतों में या अदालत के बाहर माफी मांगकर, बयान वापिस लेकर कानूनी मामले खत्म करवाते दिखते हैं। ये बयान लोग उत्तेजना में देते हैं, या हड़बड़ी में कही हुई बातें रहती हैं। जब टीवी चैनलों के माइक्रोफोन सामने रहते हैं और कैमरे तने रहते हैं, तो लोग एक अजीब सी दिमागी हालत में बयान देने लगते हैं, और मानो वे अपना आपा खोकर बेदिमाग बातें करने लगते हैं। कई दशक पहले जब सिर्फ अखबारनवीस डायरी में बातों को नोट करते थे, तो लोग प्रेस कांफ्रेंस की शुरूआत में अपनी कही बातों को खत्म होने के पहले तक कुछ सुधार भी लेते थे, और अखबारनवीस भी ऐसी चूक या बदली हुई सोच को मान लेते थे। लेकिन आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो महज चूक, लापरवाही, बददिमागी, या बेदिमागी पर फोकस रहता है, और यही बातें उसे अधिक दर्शक जुटाने में मदद करती हैं। कुछ-कुछ इसी किस्म की बातें लोगों के सोशल मीडिया अकाऊंट्स पर भी काम आती हैं। इसलिए अब कुछ कहने के बाद कुछ पल बाद भी उसमें सुधार या फेरबदल की गुंजाइश नहीं रह जाती। आज टेक्नालॉजी का हर चीज को रिकॉर्ड कर लेने और सुबूत की तरह दर्ज कर लेने का मिजाज ऐसा है कि बहुत सावधान नेता भी कभी-कभी चूक कर ही जाते हैं। इसलिए आधे पढ़े हुए पर डेढ़ दिमाग से की गई टिप्पणी खुद पर भारी पड़ती है, और ट्विटर का पंछी उडक़र आकर लापरवाह के चेहरे पर बीट कर जाता है। आज डिजिटल और सोशल मीडिया पर किसी चूक के लिए, गलती या गलत काम के लिए माफी की कोई गुंजाइश नहीं है। इसलिए लोगों को इत्मीनान से पढ़-समझकर, सोच-विचारकर ही जुबान खोलनी चाहिए, या उंगलियों को की-बोर्ड पर चलाना चाहिए। हड़बड़ी महज माफी मांगने या मुकदमा झेलने की गुंजाइश छोड़ती है।
भारत और पाकिस्तान के बीच लम्बे वक्त के बाद फिर बातचीत होने वाली है। जिसमें कई मुद्दों पर चर्चा होगी। यह बातचीत ऐसे वक्त होने जा रही है जब पाकिस्तान एक नई अस्थिरता में घिरते दिख रहा है। वहां पर सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ विपक्षी पार्टी खुलकर खड़े होते भी दिख रही है और लोकप्रियता पाते भी दिख रही है। किसी भी देश में एक मजबूत विपक्ष में कोई बुराई नहीं है, इससे लोकतंत्र मजबूत ही होता है, लेकिन पाकिस्तान जैसे कमजोर और जर्जर हो चुके लोकतंत्र में आज किसी भी फेरबदल का मौका आने पर कभी आतंकी, कभी सेना, कभी खुफिया एजेंसियां, कभी विदेशी ताकतें, फेरबदल को प्रभावित करने की खुली या ढंकी-छुपी कोशिश करने लगते हैं। ऐसे बाहरी असर मतदाता के फैसले को या तो मतदान के पहले प्रभावित करते हैं या फिर मतदान के बाद सरकार बनाने के समय इनका असर दिखता है।
यह शायद पहली बार हो रहा है कि निर्वाचित सरकार के होते हुए भी पाकिस्तानी फौजी मुखिया हिंदुस्तान के साथ शांति और अच्छे संबंधों की वकालत कर रहे हैं, बयां दे रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों में भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में संयुक्त अरब अमीरात के मध्यस्थता करने का दावा भी किया गया है कि संयुक्त अरब अमीरात की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच पर्दे के पीछे बातचीत हुई है। हालांकि भारत या पाकिस्तान ने इसकी पुष्टि नहीं की है। विश्लेषक ये भी मान रहे हैं कि हाल की दोनों देशों के बीच की सकारात्मक घटनाएं पर्दे के पीछे चल रहीं गतिविधियों का नतीजा हैं।
पाकिस्तान की किसी भी किस्म की बदहाली से भारत में लोगों का एक तबका खुश सा होते दिखता है। इसमें ऐसे लोग हैं जिन्होंने मुम्बई हमले जैसे बहुत से जख्म खा-खाकर पाकिस्तान से नफरत करना जरूरी समझ लिया है। इसमें ऐसे लोग भी हैं जिनको पाकिस्तान पर हमले के बहाने मुसलमानों पर हमला करना एक आसान मौका लगता है और वे इससे नहीं चूकते। बहुत से ऐसे साधारण लोग इन दोनों तबकों के बाहर के ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है कि भारत को एक हमला करके पाकिस्तान नाम के सिरदर्द को मिटा देना चाहिए। इसमें हमें अधिक हैरानी इसलिए नहीं होती कि एक जटिल अंतरराष्ट्रीय मामले की समझ तो बहुत अधिक लोगों में होने की उम्मीद करना सही नहीं होता, किसी भी मामले में समझदार लोगों की गिनती गिनी-चुनी होती है और बेसमझ, कमसमझ या अनजान लोग ही अधिक होते हैं। भारत में पाकिस्तान के बारे में जो जनमत है, उसमें ऐसे लोग ही अधिक हैं। हम संदेह का लाभ देते हुए यह मानते हैं कि इनमें बहुतायत अनजान लोगों की ही है।
पाकिस्तान की आज की हालत भारत के लिए बहुत फिक्र की बात भी है। हमारी सरहद से लगे हुए दो ही परमाणु देश हैं जिनमें से पाकिस्तान ऐसा है जो कि सरकार के काबू से बाहर की नौबतें झेलता है और वहां पर आतंकियों का एक तबका, फौजी तानाशाही में भरोसा रखने वाला एक तबका, और हथियारों के सौदागरों के सत्ता में बैठे हुए दलाल ऐसे हैं जो कि युद्धोन्माद को बढ़ावा देने में भरोसा रखते हैं। ऐसे में एक बड़े देश के रूप में, सफल लोकतंत्र के रूप में भारत की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह पाकिस्तान को लोकतंत्र की पटरी पर लौटने में मदद करे और उसका हौसला बढ़ाए। जिस तरह फिलीस्तीनियों को यह मानकर चलना चाहिए कि इजराइल अब एक हकीकत बन चुका है और उसे मिटाने की शर्त पर कोई बात आगे नहीं बढ़ सकती। इसी तरह भारत के युद्धोन्मादियों को यह मान लेना चाहिए, समझ लेना चाहिए कि पाकिस्तान को मिटाना अब मुमकिन नहीं है, न ही ऐसी कोई हरकत सही भी होती, होगी। ऐसे में उसे अमरीका की जेब से निकलकर चीन की जेब में पूरी तरह जाने देना भारत के फौजी हितों के खिलाफ होगा।
अंतरराष्ट्रीय संबंध दो और दो चार की तरह, या शतरंज की तयशुदा चालों की तरह नहीं बढ़ते। ऐसे संबंध बहुत सी बातों को ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं, और हम ऐसी बातों के बीच भी, बजाय देश के हितों को ही ध्यान में रखकर काम करने के, पूरी दुनिया के, पूरे मानव समाज के हितों को ध्यान में रखकर काम करने पर अधिक भरोसा रखते हैं। ऐसे में पाकिस्तान की आज की अस्थिरता और वहां चल रहे तनाव को कम करने की जरूरत है क्योंकि एक परिपच् लोकतंत्र, स्थायी लोकतंत्र भारत के हित में है। इतने पड़ोस में बसा हुआ कोई देश अगर आतंकियों से अपने आपको नहीं बचा पा रहा है तो वह कल के दिन वहां से भारत आकर हमला करने वाले आतंकियों को, अगर चाहेगा तो भी, कैसे रोक पाएगा? और अगले किसी मुम्बई हमले की नौबत आने पर भी भारत के लिए यह आसान नहीं होगा कि वह पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर मारे। वैसे भी चीन जैसे नए दोस्त की ताकत जब पाकिस्तान के साथ आज भी है तब यह शक्ति संतुलन ऐसे किसी बड़े हमले की संभावना पैदा नहीं होने देगा। इसलिए आज भारत के लोगों को यही मनाना चाहिए कि पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत हो। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
तकरीबन हर दिन देश के किसी न किसी शहर से खबर आती है कि किसी करीबी ने धोखा दे दिया, और आपसी अंतरंग पलों के बनाये हुए वीडियो लीक कर दिए या पोस्ट कर दिए। इसके बाद कत्ल या खुदकुशी की नौबत आती है, पुलिस, जेल, कोर्ट, और सजा तो आम बात है ही। हालांकि मामले-मुकदमे बरसों तक चलते हैं, और जब तक कोई फैसला आता है, तब तक लोगों को ऐसी मौतों की खबर याद भी नहीं रहती। नतीजा यह होता है कि ऐसी हरकत पर क्या सजा मिलती है, यह सबक नहीं बन पाता।
आज टेक्नालॉजी इतनी आसान हो गई है कि लोग अपने अंतरंग संबंधों की रिकॉर्डिंग भी निजी उत्तेजना के लिए, या कि बाद में मजा लेने के लिए कर बैठते हैं। इंटरनेट पर देखें तो जितने किस्म के वीडियो क्लिप तैरते हैं, उनमें से अधिकतर ऐसे रहते हैं जो कि आम लोगों ने अपने तक ही रखने के लिए बनाए थे, और वे अब बाजार में फैल रहे हैं। उत्तर भारत से तो ऐसी भी खबरें आती हैं कि वहां बलात्कार के वीडियो क्लिप कम्प्यूटर सेंटरों पर बिकते हैं। यह पूरा सिलसिला भयानक इसलिए है कि आज मोबाइल फोन की शक्ल में हर हाथ में एक कैमरा है, और जब लोग अपनी निजी इस्तेमाल के लिए खुद की ऐसी कोई फिल्म बनाते हैं, तो उन्हें उस वक्त उसके फैल जाने के खतरे का अंदाज भी नहीं रहता। कई ऐसे मामले भी रहते हैं जिनमें दो लोगों के बीच संबंध रहते हैं, और संबंध खराब होने पर जोड़ीदार को ब्लैकमेल करने के लिए लोग ऐसे वीडियो फैलाने की धमकी देते हैं, या फैलाते हैं।
आज सामान्य समझबूझ का इस्तेमाल करके लोगों को यह सावधानी बरतनी चाहिए कि वे अपने किसी नाजुक वक्त भी, अपने सबसे करीबी व्यक्ति के साथ भी ऐसी कोई रिकॉर्डिंग न करें जिसके लिए बाद में उन्हें शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। लोगों के संबंध आज अच्छे रहते हैं, और बाद में बहुत खराब भी हो सकते हैं। जो लोग आग के इर्द-गिर्द सात फेरे लगाकर सात जन्म तक साथ रहने की कसमें खाते हैं, उन्हीं में से बहुत से लोग तलाक के लिए सात-सात बरस तक अदालत में धक्के भी खाते हैं, पुलिस में रिपोर्ट भी लिखाते हैं, और अनगिनत वारदातें ऐसी होती हैं जिनमें जीवन-साथी एक-दूसरे को मार भी डालते हैं। जब रिश्तों में इतनी हिंसा की नौबत आती है तो यह जाहिर है कि एक-दूसरे की वीडियो क्लिप फैला देना तो उसके मुकाबले छोटी हिंसा है और छोटा जुर्म है।
लोगों को इंसानी रिश्तों पर जरूरत से अधिक भरोसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए। जितने किस्म के राजनीतिक या सरकारी स्टिंग ऑपरेशन होते हैं, वे जान-पहचान के लोगों के किए हुए रहते हैं जो कि उस वक्त पर बड़े भरोसेमंद भी बनकर दिखाते हैं। इसलिए इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि अपने खुद के हितों से अधिक भरोसा किसी को किसी पर नहीं करना चाहिए। फिर बाकी बातों के साथ-साथ यह भी याद रखना चाहिए कि किसी वजह से आपकी अचानक मौत हो जाए, तो बाकी चीजों की विरासत के साथ-साथ फोन और कम्प्यूटर पर दर्ज आपके वीडियो आपके बच्चों को नसीब होते हैं, और उनकी बाकी पूरी जिंदगी आपकी यादों के साथ हिकारत से जीते हुए गुजरती है। इसलिए साफ-सुथरी जिंदगी, सौ फीसदी सावधानी में ही सुरक्षा है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक होनहार नाबालिग स्कूली छात्र ने अपनी शिक्षिका द्वारा किए गए देह शोषण से थककर और उसके द्वारा की जा रही ब्लैकमेलिंग से डरकर खुदकुशी कर ली। छात्र से दोगुनी से अधिक उम्र की शिक्षिका अपने इस छात्र के साथ मोबाइल फोन के टेलीग्राम अकाऊंट से अश्लील वीडियो लेन-देन कर रही थी। इस छात्र ने खुदकुशी करते हुए डिजिटल कैमरा शुरू कर रखा था जिसमें फांसी रिकॉर्ड है, और उसने दोस्तों को खुदकुशी के संदेश भी भेजे थे, और आत्महत्या की चिट्ठी भी अपने मोबाइल पर टाईप करके रखी थी। उसने लिखा है कि शिक्षिका ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, और उसका वीडियो बनाकर ब्लैकमेल कर रही है, इसके अलावा वह उसे अनुसूचित जनजाति कानून के तहत जेल भेजने की बात भी कर रही है। खुदकुशी के इस नोट और तरह-तरह के वीडियो के बाद पुलिस ने 30 बरस उम्र की इस शिक्षिका को बच्चों के सेक्स-शोषण के कानून पॉक्सो एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया है।
अभी कल-परसों ही हमने स्कूल-कॉलेज की लड़कियों और महिला खिलाडिय़ों के देह शोषण के बारे में इसी जगह पर लिखा था इसलिए इतनी जल्दी यहां पर जुड़े हुए एक और मुद्दे पर लिखने की जरूरत नहीं पडऩी थी, लेकिन यह घटना ऐसी है, और इन दिनों सोशल मीडिया पर ऐसा कुछ घट भी रहा है कि उन्हें जोडक़र देखना जरूरी है। जो लोग फेसबुक पर दिखने वाले नाच-गाने के कुछ साधारण दिखते हुए वीडियो खिसकाते हुए आगे बढ़ते हैं, दूसरे वीडियो की तरफ जाते हैं, तो दो-चार वीडियो के बाद ही पोर्नो शुरू हो जाता है। और हिन्दुस्तान में, हिन्दी में बनाए गए ऐसे अश्लील, वयस्क, और नग्नता वाले वीडियो में से आधे ऐसे रहते हैं जिनमें कोई महिला शिक्षिका ट्यूशन पढऩे आने वाले किसी छात्र-लडक़े का यौन शोषण करती दिखती है। अब बिलासपुर में गिरफ्तार इस शिक्षिका के बारे में यह तो जांच में ही पता लगेगा कि उसके और खुदकुशी करने वाले छात्र के बीच कौन किसे कैसे वीडियो भेज रहे थे, लेकिन मरने वाले की बात को सच मानें तो इस शिक्षिका ने अपने से आधी उम्र के इस छात्र के साथ खुद के कुछ सेक्स वीडियो बना रखे थे, और उसके आधार पर वह उसे ब्लैकमेल कर रही थी। चूंकि इन दिनों फेसबुक पर ऐसे हजारों हिन्दुस्तानी-पोर्नो तैर रहे हैं इसलिए ये दोनों बातें मिलकर एक साथ लिखने के लिए मजबूर कर रही हैं।
जो लोग पोर्नोग्राफी को नुकसानरहित मानते हैं, और यह मानते हैं कि इससे लोग अपनी उत्तेजना की जरूरत खुद पूरी कर पाते हैं, उन्हें भी मनोवैज्ञानिकों के इस निष्कर्ष पर गौर करना चाहिए कि अधिक पोर्नो देखने वालों के दिमाग की कोशिकाएं इससे कमजोर होती चलती हैं, मरती जाती हैं। बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि जब पोर्नोग्राफी अधिक आसानी से हासिल होती है तो उसमें दिखाई और सुझाई गई कहानियों से प्रेरणा पाकर लोग अपने आसपास जबर्दस्ती पर उतारू हो जाते हैं। अभी हमारा खुद का इस बारे में अधिक सोचना इसलिए नहीं है कि यह मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों के अध्ययन और विश्लेषण के नतीजों की बात है, और इस मुद्दे का हम अतिसरलीकरण करके खुद कोई नतीजा निकालना नहीं चाहते। अमरीकी सरकार की एक वेबसाईट पर भारत में पोर्नोग्राफी और रेप के बीच संबंध स्थापित करने की कोशिश की गई है, और ऐसे अध्ययन का नतीजा यह निकला है कि पोर्नोग्राफी तक आसान पहुंच से बलात्कार की घटनाओं और महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कोई मायने रखने वाला असर पड़ते नहीं दिखता है। लेकिन यह सिर्फ एक अध्ययन के नतीजे की बात है, और हो सकता है कि कुछ दूसरे अध्ययन कुछ और सुझाएं।
लेकिन एक बात जो हमें लगती है वह यह कि अपने ही देश और अपनी ही भाषा के लोगों के ऐसे पोर्नो जो कि किसी पारिवारिक कहानी में गूंथकर बनाए गए हों, वे देखने वालों को ऐसे संबंध बनाने का हौसला शायद देते होंगे जो बलात्कार या जुर्म न भी हों, लेकिन जो पारिवारिक और सामाजिक खतरे वाले जरूर होते होंगे, जैसा कि बिलासपुर के सेक्स-शोषण और खुदकुशी के इस मामले में दिख रहा है। एक 30 बरस की शिक्षिका 17 बरस के नाबालिग छात्र से ऐसे संबंध बनाए, रखे, उसका वीडियो बनाए, उस पर दबाव डाले, उसे ब्लैकमेल करे, यह कुल मिलाकर ऐसा लग रहा है जैसे फेसबुक पर पोस्ट किसी पोर्नो की हिन्दुस्तानी कहानी हो। यह मामला एक आम देह-शोषण से अलग है, और यह खुदकुशी एक आम आत्महत्या से अलग है। दुनिया के बहुत से देशों से बड़ी उम्र की शिक्षिकाओं, और कमउम्र के उनके छात्रों के बीच ऐसे संबंधों की कहानियां बीच-बीच में आती रहती हैं, और बिना किसी हत्या-आत्महत्या के भी सिर्फ ऐसे संबंध रखने के लिए भी बहुत सी शिक्षिकाएं जेल जाते दिखती हैं।
इस मुद्दे पर लिखने का मकसद यही है कि स्कूल-कॉलेज जैसे संस्थान भी ऐसी बातों की तरफ आंखें खुली रखें, और परिवार अपने बच्चों का ख्याल रखे। इसके अलावा समाज के लोगों को भी अपने आसपास ऐसा कुछ संदिग्ध होते हुए दिखे, तो उन्हें सावधान रहना चाहिए ताकि ऐसे और हादसे न हों। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
वैसे तो हिन्दुस्तान देवियों की पूजा करने वाला देश है। पश्चिम से लेकर पूरब तक, और जम्मू से लेकर केरल तक सभी जगह देवियों की उपासना होती है, उनके न सिर्फ बड़े-बड़े मंदिर और तीर्थ हैं, बल्कि गुजरात की नवरात्रि में दुर्गा पूजा से लेकर बंगाल की दुर्गा पूजा तक, और दीवाली पर देश के अधिकतर हिस्से में कारोबार से लेकर सरकारी खजाने तक में होने वाली लक्ष्मी पूजा धर्म से आगे बढक़र सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा बन चुकी है। ऐसे देश में महिलाओं से अत्याचार का भी कोई अंत नहीं है।
आज एक प्रमुख समाचार वेबसाईट पर कुछ खबरों को कतार से देखते हुए इस मुद्दे पर लिखना सूझा जिसमें नया कुछ नहीं है लेकिन इन्हें एक साथ देखते हुए लगा कि देवियों की पूजा करने वाला यह देश किस तरह हर नामुमकिन तरीके से भी लड़कियों और महिलाओं पर जुल्म करता है। जुल्म की हकीकत है, और देवी पूजा के फसाने हैं! जब कभी हिन्दुस्तानी समाज के महिलाओं के प्रति हिंसक होने की बात कही जाए, भ्रूण हत्या से लेकर कन्या हत्या तक, और फिर दहेज हत्या से लेकर विधवाश्रम तक की कोई भी बात की जाए, तो हिन्दुस्तानी समाज बड़ी रफ्तार से अपने बचाव में देवी पूजा की परंपरा गिनाने लगता है। लोग यह गिनाना नहीं भूलते कि यहां कन्या पूजा करके छोटी-छोटी बच्चियों के भी पैर छूने की परंपरा है। मानो ये सारी परंपराएं हिन्दुस्तानी मर्दों ने लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ अपनी हिंसा के बचाव के सुबूत की तरह गढक़र रखी हैं।
अभी सोशल मीडिया पर एक जगह मां-बाप की विरासत में बेटों के अलावा बेटियों के भी हक की बात छिड़ी, तो पुत्रमोह के शिकार हिन्दुस्तानी, हिन्दू आदमियों के मन की महिलाविरोधी बातें फूट पड़ीं। लोग याद दिलाने लगे कि लड़कियों को न सिर्फ दहेज दिया जाता है, बल्कि बाद में भी जिंदगी भर भाई उनसे रिश्ता निभाते हैं, लेन-देन करते हैं, इसलिए मां-बाप की सम्पत्ति पर बेटियों का कोई हक नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट तक इस बारे में बिल्कुल साफ है कि मां-बाप की जायदाद का बंटवारा करते हुए बेटियों और बेटों में कोई फर्क नहीं किया जा सकता, लेकिन बहस में शामिल अधिकतर आदमी मानो इस कानूनी व्यवस्था से नावाकिफ रहकर बहन-बेटियों को कोई भी कानूनी हक देने के खिलाफ लिखते रहे। और तो और कोई-कोई महिला भी इस पुरूषवादी तर्क की हिमायती निकलीं कि बेटियों का हक बराबरी का होना चाहिए।
भारत में लैंगिक समानता एक बहुत ही काल्पनिक आदर्श सोच है जिसके उपजने और पनपने के लिए समाज में कोई जमीन नहीं है। और यह नौबत महज हिन्दुओं के बीच है ऐसा भी नहीं है, मुस्लिमों के बीच एक शाहबानो के हक को लेकर हिन्दुस्तान में मुस्लिम समाज के आदमियों ने इतना तनाव खड़ा किया था कि उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अल्पसंख्यक-वोटरों की दहशत में आकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था, और कांग्रेस के उस वक्त के संसदीय बाहुबल का बुलडोजर बूढ़ी शाहबानो पर चला दिया था। देश के जिन आदिवासी समाजों को सबसे कम पढ़ा-लिखा मानते हुए शहरी लोग जिन्हें जंगली कहते हैं, उन्हीं आदिवासी समाजों में महिलाओं को शहरी और सवर्ण तबकों की महिलाओं के मुकाबले अधिक बराबरी के हक मिलते हैं। शहरी, शिक्षित, सवर्ण महिलाओं को समाज में पुरूषों के मुकाबले जरा सी भी बराबरी का कोई हक अगर मिलता है तो वह उनके आर्थिक आत्मनिर्भर होने पर ही मिलता है, वरना वे गुलामों की सी जिंदगी जीती रह जाती हैं।
हर दिन कई ऐसी खबरें आती हैं कि हिन्दुस्तान में महिलाओं और लड़कियों पर किस किस्म के जुल्म हो रहे हैं। आज की ही खबर है कि हरियाणा में आठवीं की एक छात्रा ने अपने वकील के मार्फत पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई है कि उसकी मां ने अपने प्रेमी और उसकी पत्नी के साथ मिलकर उस लडक़ी की जबर्दस्ती शादी करवाई और जबर्दस्ती शारीरिक संबंध को मजबूर किया। हरियाणा की ही एक दूसरी खबर है कि वहां ट्यूशन पढ़ा रहा शिक्षक नाबालिग छात्रा से लगातार बलात्कार कर रहा था, और जब लडक़ी ने ट्यूशन पर जाना बंद कर दिया, तो मां-बाप ने उसकी डॉक्टरी जांच कराई और बलात्कार के इस सिलसिले की खबर हुई।
लड़कियों के लिए यह बहुत आम बात है कि किसी टीम में चुने जाने के लिए उन्हें खेल संघों के पदाधिकारी, खेल प्रशिक्षक, या चयनकर्ता के सामने अपना समर्पण करना पड़ता है, तो दूसरी किसी अधिक काबिल खिलाड़ी का हक मारकर उसे टीम में ले लिया जाता है। कई बार तो टीम में जगह तक नहीं मिलती, और अलग-अलग कई लोग लड़कियों का शोषण करते रहते हैं। विश्वविद्यालयों में शोधकार्य करने वाली लड़कियों का रिसर्च-गाईड द्वारा देहशोषण बहुत अनसुनी बात नहीं है, और ऐसा बहुत से मामलों में होता है, यह अलग बात रहती है कि पीएचडी पाने के मोह में और सामाजिक बदनामी-प्रताडऩा से बचने के लिए लड़कियां और महिलाएं यह जुल्म बर्दाश्त कर लेती हैं। देश के एक सबसे नामी-गिरामी संपादक रहे एम.जे.अकबर पर उनके सबसे कामयाबी के बरसों में अपनी मातहत महिला-पत्रकारों के यौन शोषण के दर्जन भर से अधिक आरोप लग चुके हैं, और इसी सिलसिले में एक आरोप के खिलाफ अकबर के दायर किए गए मुकदमे में अकबर की हार भी हो चुकी है। एम.जे. अकबर उसी बंगाल की राजधानी कोलकाता से अखबारनवीसी करते थे जहां देवियों की पूजा की लंबी परंपरा है। बंगाल में तो देवताओं की पूजा सुनाई भी नहीं पड़ती, और दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और काली की ही पूजा होती है, और वहां की इस सामाजिक संस्कृति के बावजूद वहां के इस मशहूर संपादक का यह आम हाल और मिजाज था। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
वैसे तो हिन्दुस्तान देवियों की पूजा करने वाला देश है। पश्चिम से लेकर पूरब तक, और जम्मू से लेकर केरल तक सभी जगह देवियों की उपासना होती है, उनके न सिर्फ बड़े-बड़े मंदिर और तीर्थ हैं, बल्कि गुजरात की नवरात्रि में दुर्गा पूजा से लेकर बंगाल की दुर्गा पूजा तक, और दीवाली पर देश के अधिकतर हिस्से में कारोबार से लेकर सरकारी खजाने तक में होने वाली लक्ष्मी पूजा धर्म से आगे बढक़र सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा बन चुकी है। ऐसे देश में महिलाओं से अत्याचार का भी कोई अंत नहीं है।
आज एक प्रमुख समाचार वेबसाईट पर कुछ खबरों को कतार से देखते हुए इस मुद्दे पर लिखना सूझा जिसमें नया कुछ नहीं है लेकिन इन्हें एक साथ देखते हुए लगा कि देवियों की पूजा करने वाला यह देश किस तरह हर नामुमकिन तरीके से भी लड़कियों और महिलाओं पर जुल्म करता है। जुल्म की हकीकत है, और देवी पूजा के फसाने हैं! जब कभी हिन्दुस्तानी समाज के महिलाओं के प्रति हिंसक होने की बात कही जाए, भ्रूण हत्या से लेकर कन्या हत्या तक, और फिर दहेज हत्या से लेकर विधवाश्रम तक की कोई भी बात की जाए, तो हिन्दुस्तानी समाज बड़ी रफ्तार से अपने बचाव में देवी पूजा की परंपरा गिनाने लगता है। लोग यह गिनाना नहीं भूलते कि यहां कन्या पूजा करके छोटी-छोटी बच्चियों के भी पैर छूने की परंपरा है। मानो ये सारी परंपराएं हिन्दुस्तानी मर्दों ने लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ अपनी हिंसा के बचाव के सुबूत की तरह गढक़र रखी हैं।
अभी सोशल मीडिया पर एक जगह मां-बाप की विरासत में बेटों के अलावा बेटियों के भी हक की बात छिड़ी, तो पुत्रमोह के शिकार हिन्दुस्तानी, हिन्दू आदमियों के मन की महिलाविरोधी बातें फूट पड़ीं। लोग याद दिलाने लगे कि लड़कियों को न सिर्फ दहेज दिया जाता है, बल्कि बाद में भी जिंदगी भर भाई उनसे रिश्ता निभाते हैं, लेन-देन करते हैं, इसलिए मां-बाप की सम्पत्ति पर बेटियों का कोई हक नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट तक इस बारे में बिल्कुल साफ है कि मां-बाप की जायदाद का बंटवारा करते हुए बेटियों और बेटों में कोई फर्क नहीं किया जा सकता, लेकिन बहस में शामिल अधिकतर आदमी मानो इस कानूनी व्यवस्था से नावाकिफ रहकर बहन-बेटियों को कोई भी कानूनी हक देने के खिलाफ लिखते रहे। और तो और कोई-कोई महिला भी इस पुरूषवादी तर्क की हिमायती निकलीं कि बेटियों का हक बराबरी का होना चाहिए।
भारत में लैंगिक समानता एक बहुत ही काल्पनिक आदर्श सोच है जिसके उपजने और पनपने के लिए समाज में कोई जमीन नहीं है। और यह नौबत महज हिन्दुओं के बीच है ऐसा भी नहीं है, मुस्लिमों के बीच एक शाहबानो के हक को लेकर हिन्दुस्तान में मुस्लिम समाज के आदमियों ने इतना तनाव खड़ा किया था कि उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अल्पसंख्यक-वोटरों की दहशत में आकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था, और कांग्रेस के उस वक्त के संसदीय बाहुबल का बुलडोजर बूढ़ी शाहबानो पर चला दिया था। देश के जिन आदिवासी समाजों को सबसे कम पढ़ा-लिखा मानते हुए शहरी लोग जिन्हें जंगली कहते हैं, उन्हीं आदिवासी समाजों में महिलाओं को शहरी और सवर्ण तबकों की महिलाओं के मुकाबले अधिक बराबरी के हक मिलते हैं। शहरी, शिक्षित, सवर्ण महिलाओं को समाज में पुरूषों के मुकाबले जरा सी भी बराबरी का कोई हक अगर मिलता है तो वह उनके आर्थिक आत्मनिर्भर होने पर ही मिलता है, वरना वे गुलामों की सी जिंदगी जीती रह जाती हैं।
हर दिन कई ऐसी खबरें आती हैं कि हिन्दुस्तान में महिलाओं और लड़कियों पर किस किस्म के जुल्म हो रहे हैं। आज की ही खबर है कि हरियाणा में आठवीं की एक छात्रा ने अपने वकील के मार्फत पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई है कि उसकी मां ने अपने प्रेमी और उसकी पत्नी के साथ मिलकर उस लडक़ी की जबर्दस्ती शादी करवाई और जबर्दस्ती शारीरिक संबंध को मजबूर किया। हरियाणा की ही एक दूसरी खबर है कि वहां ट्यूशन पढ़ा रहा शिक्षक नाबालिग छात्रा से लगातार बलात्कार कर रहा था, और जब लडक़ी ने ट्यूशन पर जाना बंद कर दिया, तो मां-बाप ने उसकी डॉक्टरी जांच कराई और बलात्कार के इस सिलसिले की खबर हुई।
लड़कियों के लिए यह बहुत आम बात है कि किसी टीम में चुने जाने के लिए उन्हें खेल संघों के पदाधिकारी, खेल प्रशिक्षक, या चयनकर्ता के सामने अपना समर्पण करना पड़ता है, तो दूसरी किसी अधिक काबिल खिलाड़ी का हक मारकर उसे टीम में ले लिया जाता है। कई बार तो टीम में जगह तक नहीं मिलती, और अलग-अलग कई लोग लड़कियों का शोषण करते रहते हैं। विश्वविद्यालयों में शोधकार्य करने वाली लड़कियों का रिसर्च-गाईड द्वारा देहशोषण बहुत अनसुनी बात नहीं है, और ऐसा बहुत से मामलों में होता है, यह अलग बात रहती है कि पीएचडी पाने के मोह में और सामाजिक बदनामी-प्रताडऩा से बचने के लिए लड़कियां और महिलाएं यह जुल्म बर्दाश्त कर लेती हैं। देश के एक सबसे नामी-गिरामी संपादक रहे एम.जे.अकबर पर उनके सबसे कामयाबी के बरसों में अपनी मातहत महिला-पत्रकारों के यौन शोषण के दर्जन भर से अधिक आरोप लग चुके हैं, और इसी सिलसिले में एक आरोप के खिलाफ अकबर के दायर किए गए मुकदमे में अकबर की हार भी हो चुकी है। एम.जे. अकबर उसी बंगाल की राजधानी कोलकाता से अखबारनवीसी करते थे जहां देवियों की पूजा की लंबी परंपरा है। बंगाल में तो देवताओं की पूजा सुनाई भी नहीं पड़ती, और दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और काली की ही पूजा होती है, और वहां की इस सामाजिक संस्कृति के बावजूद वहां के इस मशहूर संपादक का यह आम हाल और मिजाज था। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
आज 22 मार्च को दुनिया भर में विश्व जल दिवस मनाया जाता है। पानी इंसान की जिंदगी में सबसे जरूरी तीन चीजों में से एक है। हवा, खाना, और पानी, इनके बिना ब्रम्हांड के किसी और ग्रह पर भी जिंदगी की कल्पना नहीं की जा सकती, और आज अंतरिक्ष में जहां-जहां इंसानों को बसाने की कल्पना की जा रही है, वहां इन तीन बुनियादी जरूरतों के बारे में संभावनाओं को सबसे पहले टटोला जा रहा है। इसलिए पानी का महत्व बहुत है, लेकिन लोगों को वह उसी वक्त समझ पड़ता है जब वह नहीं रहता। जब उसे पाने के लिए टैंकरों पर टूट पडऩा पड़ता है, जब मीलों दूर से पानी लाना पड़ता है, या गहरे कुओं में जान-जोखिम में डालकर उतरना पड़ता है। इसके बावजूद सारे वक्त पानी मिल ही जाता हो यह भी जरूरी नहीं है। महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में गर्मी के बाद गांवों के बाहर जानवरों की लाशों के कंकाल दिखते हैं जो कि पानी न मिलने की वजह से, और पानी न होने से चारा न मिलने की वजह से भूखे-प्यासे मर जाते हैं। अब तक इंसानों का प्यास से मरना शुरू नहीं हुआ है, और देशों के बीच या इंसानों के तबकों के बीच पानी को लेकर फौजी लड़ाईयां अभी तक शुरू नहीं हुई हैं इसलिए पानी लोगों का ध्यान नहीं खींच रहा है। लेकिन जिस दिन इसकी कमी लोगों का ध्यान खींचने लायक गंभीर हो जाएगी, उस दिन फिर पानी की वापिसी भी नहीं हो पाएगी। आज हवा के बाद सबसे मुफ्त मिलने वाला सामान पानी है, और मुफ्त में मिलने की वजह से उसकी कोई कद्र नहीं है।
दुनिया के जिन इलाकों में पानी है, और आसान पानी है, उसे धरती के भीतर से उलीचने के लिए आसान बिजली हासिल है, उन इलाकों में पानी के खर्च, फिजूलखर्च से समझदारी का कोई रिश्ता नहीं है। मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को लें जहां खेती के लिए बिजली तकरीबन मुफ्त है, बिजली चौबीसों घंटे है, और जमीन के भीतर अब तक पानी बाकी है, तो फिर सरकारी खरीद वाली धान की आसान फसल से परे सोचने की जरूरत किसान को पड़ नहीं रही है। धान की फसल पेट भरने के काम आती है, लेकिन वह आसमान का जितना पानी लेती है, और धरती के भीतर का जितना पानी उसे दिया जाता है, क्या कोई ऐसा ऑडिट कृषि वैज्ञानिक और कृषि अर्थशास्त्री करते हैं कि दूसरे अनाजों की फसल में लगने वाले पानी के मुकाबले धान की फसल में पानी कितना अधिक लगता है? और इंसान के खाने के काम आने वाले अनाजों में किस फसल से कितने पानी के बाद कितनी कैलोरीज मिलती हैं?
एक तरफ तो सरकार और कृषि अर्थशास्त्री, कृषि वैज्ञानिक फसल पर खर्च होने वाले पानी को घटाने के बारे में पर्याप्त करते हुए नहीं दिख रहे हैं, दूसरी तरफ शहरों में लोगों के हर मकान में नलकूप खोदकर पंप लगाकर मनचाहा पानी निकालने की आजादी हासिल है। नतीजा यह होता है कि जो भूजल पूरी धरती की सामूहिक सम्पत्ति है, उसे गहरा नलकूप खुदवाने और अधिक ताकत का पंप लगवाने की लोगों की निजी ताकत पी जा रही है। पानी निजी सम्पत्ति है, या इसे सामूहिक सम्पत्ति रहना चाहिए, इसके इस्तेमाल की लागत कहां से निकलनी चाहिए इसे लेकर अब तक कोई कानून नहीं है इसलिए बोतलबंद पानी बनाने और बेचने वाली कंपनियां जमीन के भीतर से मनचाहा पानी निकालती हैं, और किसी के लिए जवाबदेह नहीं रहतीं। बाकी कारखानों और कारोबारी कामकाज के लिए भी भूजल नाम की सार्वजनिक सम्पत्ति ऐसे ही बेजा इस्तेमाल के लिए मौजूद है।
शहरी जीवन में लोग अपनी आर्थिक ताकत के अनुपात में पानी का बेजा इस्तेमाल करने को आसान हैं। संपन्न लोग अपने घर के लॉन को धान की फसल की तरह सींचते हैं, और सूरज को चुनौती देते हुए अपनी छत पर बागवानी करने के लिए बेतहाशा पानी का इस्तेमाल करते हैं। लोगों ने अपने घरों के बाहर अपनी कारों को धोने के लिए पंप और तेज रफ्तार पानी की धार का इंतजाम कर रखा है, और अधिक संपन्न लोग अपने बंगलों के सामने की सडक़ें तक धो लेते हैं। दूसरी तरफ इन्हीं शहरों की गरीब बस्तियों में लोगों की जिंदगी में हर दिन घंटे-दो घंटे का संघर्ष कुछ बाल्टी पानी जुटाने के लिए टैंकरों के इंतजार और धक्का-मुक्की में निकल जाता है। ऐसा लगता है कि लोगों के मकान की जितनी जमीन है उसके नीचे का हजार-पांच सौ फीट तक गहराई पर उनका हक है, और अपने तले से गुजरने वाली भूजल-धारा को वे जितना चाहे उतना उलीच सकते हैं। यह शहरी इस्तेमाल कम भयानक नहीं है, और देश-प्रदेश को यह चाहिए कि वे निजी नलकूपों पर भी पानी के मीटर लगाने का काम करें ताकि पानी के फिजूलखर्च पर काबू लग सके।
ये चर्चाएं पिछले कुछ दशकों में लगातार बढ़ती रही हैं कि एक दिन पानी के लिए देशों के बीच जंग होगी। आज भी भारत जैसा देश अपने दो-चार पड़ोसी देशों के साथ आर-पार आने-जाने वाले नदी-जल को लेकर तनाव झेलता ही है। यह तनाव किस दिन जंग में बदल जाए, किस दिन चीन में कोई बांध भारत में बाढ़ लाने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल होने लगे, इसका कोई ठिकाना तो है नहीं।
अब एक संभावना जो दिखती है वह ग्राउंडवॉटर री-चार्जिंग की। आसमान से पानी गिरता ही है, और वह नदियों के रास्ते समंदर में जाकर एक किस्म से इस्तेमाल के बाहर हो जाता है। यह पानी सबसे अधिक बारिश के दिनों में धरती के भीतर नहीं पहुंच पाता, नालों और नदियों में बाढ़ बनकर चारों तरफ बर्बादी भी करता है, और समंदर में पहुंचकर इस्तेमाल से बाहर हो जाता है। इसलिए राज्यों को बड़े पैमाने पर ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे बारिश के पानी का अधिक से अधिक इस्तेमाल हो सके। केन्द्र सरकार की मनरेगा योजना के तहत काफी बड़ा हिस्सा पानी पर खर्च करने का प्रावधान लोग इस योजना को महज ग्रामीण रोजगार की योजना समझते हैं, लेकिन यूपीए सरकार के वक्त 15 बरस पहले शुरू की गई यह योजना जलस्रोतों के विकास की, संरक्षण की देश की सबसे बड़ी योजना भी है। सेंटर फॉर साईंस एंड एनवॉयरनमेंट की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि किस तरह मनरेगा में यह कानूनी बंदिश है कि उसकी 60 फीसदी हिस्से को पानी से जुड़े हुए ढांचों पर ही खर्च किया जाएगा। केन्द्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इसे 15 बरसों में भारत के गांवों में 3 करोड़ से अधिक जल संरक्षण काम इस योजना में हुए हैं यानी करीब 50 काम हर गांव में हुए हैं। जो लोग पानी के आंकड़ों को समझ सकें, वे यह अंदाज लगा सकते हैं कि इन जल संरक्षण कार्यों से 28 करोड़ 74 लाख क्यूबिक मीटर पानी का संरक्षण हो पाया है।
इन आंकड़ों से परे हम एक और गुंजाइश देखते हैं जिसके बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं। मनरेगा के तहत काम उन्हीं इलाकों में हो सकता है जहां पर लोगों को रोजगार दिया जा सकता है। लेकिन प्रदेशों के भूगोल में बहुत से ऐसे बिना आबादी वाले इलाके रहते हैं जहां पर बारिश का पानी भरपूर बहता है, और नदियों में बाढ़ लाता है। आबादी से परे के ऐसे सुनसान इलाकों में बिना मजदूरों के भी मशीनों से ऐसे बड़े-बड़े तालाब बनाने चाहिए जो बारिश के अतिरिक्त पानी को नदियों में जाने से रोके, और भूजल को बढ़ाए। एक तरफ मनरेगा जैसी योजना रोजगार और आबादी के आसपास के जल संरक्षण का काम जारी रखे, और दूसरी तरफ निर्जन इलाकों में मशीनों से काम करवाके ऐसे बड़े-बड़े तालाब बनाए जाएं जिनका पानी धीरे-धीरे रिसकर धरती के भीतर उसके खाली हो रहे पेट को भर सके। इसी से जुड़ा हुआ एक और मामला है। आज बांधों से लेकर शहरों तक पानी को खुली नहरों से लाया जाता है जिनमें रिसाव से पानी जमीन में भी खत्म होता है, और धूप में सूखकर वह पानी उड़ता भी है। इसके आंकड़े हैरान कर देते हैं कि किसी शहर में कितना पानी लाने के लिए किसी बांध से उससे कितना अधिक पानी छोडऩा पड़ता है। हर प्रदेश को ऐसी योजना बनानी चाहिए कि बांधों से शहरी जरूरत का पानी लाने के लिए पाईप लाईन डले, जिससे जल प्रदूषण थमे, रिसाव और भाप बनकर पानी का खत्म होना भी थमे। आज हमें कम ही जगहों पर सरकारों में ऐसी कल्पनाशीलता दिख रही है। खासकर वे प्रदेश बेफिक्र हैं जहां आज पानी रेलगाडिय़ों से नहीं ले जाना पड़ रहा है।
आज विश्व जल दिवस पर हमारे कम कहे को अधिक माना जाए, और निजी जीवन से लेकर सरकारी योजनाओं तक अगले दस-बीस बरस बाद की फिक्र की जाए वरना यह लाईन तो बिना समझे लिखी और दुहराई ही जाती है- जल है, तो कल है।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
मुम्बई के पुलिस कमिश्नर रहे, प्रदेश के डीजीपी स्तर के अधिकारी परमबीर सिंह ने मुख्यमंत्री को लिखी एक चिट्ठी में राज्य के गृहमंत्री अनिल देशमुख पर आरोप लगाया है कि उन्होंने पुलिस अधिकारियों पर महीनों से यह दबाव बनाया हुआ था कि वे मुम्बई के बार, पब, और रेस्त्रां से उगाही करके उन्हें सौ करोड़ रूपए महीना दें। अपने आरोपों के सुबूत में उन्होंने कुछ दूसरे बड़े अधिकारियों के साथ फोन पर आए-गए संदेशों को भी लगाया है। बड़े रहस्यमय तरीके से यह चिट्ठी परमबीर सिंह के सरकारी ईमेल से न भेजकर किसी और ईमेल से सीएम को भेजी गई, और चिट्टी पर उनके दस्तखत नहीं थे। लेकिन मीडिया में इस बारे में सवाल उठने पर उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि यह चिट्ठी उन्होंने ही भेजी है और उनके पास अपने आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सुबूत हैं। यह पूरा मामला इस अफसर को मुम्बई पुलिस कमिश्नर के पद से हटाने के बाद फूटा है, और हटाने के पीछे की वजह जाहिर तौर पर मुकेश अंबानी के घर के बाहर विस्फोटकों की एक गाड़ी के पकड़ाने से जुड़ी हुई है। वह एक अलग ही लंबी कहानी है जिसमें मुम्बई का एक बहुत ही कुख्यात सबइंस्पेक्टर एनआईए ने गिरफ्तार किया है जिसे इन विस्फोटकों से जोडक़र देखा जा रहा है, और विस्फोटकों की गाड़ी के मालिक की मौत से भी। लेकिन मुम्बई पुलिस के छोटे-बड़े अफसरों के इस साजिश और जुर्म से जुड़े रहने की जो जांच एनआईए कर रहा है, वह भी बड़े सनसनीखेज नतीजे पेश करती सुनाई पड़ रही है। लेकिन इस पूरे सिलसिले में मुम्बई पुलिस, या महाराष्ट्र के मंत्रियों का जो चरित्र सामने आ रहा है उस पर गौर करना जरूरी है।
न तो मुम्बई पुलिस देश की अकेली भ्रष्ट पुलिस है, और न ही वह देश में सबसे अधिक भ्रष्ट है। पुलिस का हाल अधिकतर प्रदेशों में नेताओं की मेहरबानी से गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, और अगर प्रदेश यूपी सरीखा रहा, तो भ्रष्टाचार के साथ-साथ घोर साम्प्रदायिकता में भी डूबा हुआ है। महाराष्ट्र और मुम्बई में यह अकेला या पहला केस नहीं है जब मुठभेड़ में मारने के विशेषज्ञ कहे जाने वाले ऐसे किसी छोटे पुलिस अफसर के करोड़पति या अरबपति बनने की चर्चा आए। इसके पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है, बहुत से दूसरे पहली नजर के हीरो बाद में विलेन साबित होते मिले हैं। मुम्बई पुलिस के कुछ लोगों पर दाऊद इब्राहिम सरीखे देश के सबसे खतरनाक मुजरिमों के साथ सांठ-गांठ होने की चर्चा भी कभी खत्म नहीं हुई है। और इस मुम्बई और महाराष्ट्र में पुलिस के विवादास्पद अफसर भूमाफिया बनते हुए भी दिखे हैं, और वे बरसों तक अपना एक माफियाराज भी चलाते रहने में कामयाब रहे हैं।
अब दूसरे प्रदेशों का हाल देखें, तो बाकी प्रदेशों को कोसने से पहले छत्तीसगढ़ को देख लेना ठीक है जहां पर समय-समय पर बहुत से आला पुलिस अफसर जमीनों के सौदागरों की तरह काम करते भी दिखते हैं, और भूमाफिया की तरह भी। लोगों को याद होगा कि इसी पुलिस के कई कुख्यात अफसरों की भूमाफियाई के खिलाफ एक वक्त भाजपा सरकार में गृहमंत्री रहे हुए ननकी राम कंवर ने लगातार अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री को इन अफसरों के नाम सहित शिकायत लिखी थी, और जो हाल आज मुम्बई में वसूली, उगाही, और भूमाफियाई का दिख रहा है, वही हाल छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भी एक से अधिक पुलिस अफसरों ने बना रखा था। लेकिन जैसा कि पैसों की अपार ताकत का विशेषाधिकार होता है, इन भ्रष्ट अफसरों और इनको पालने वाले सत्तारूढ़ लोगों ने कभी कोई फंदा इनके गले तक नहीं पहुंचने दिया, कभी कोई हथकड़ी भी इनके हाथों तक नहीं पहुंचने दी। मुम्बई चूंकि अधिक चर्चित जगह है और सौ करोड़ रूपए महीने की उगाही का टारगेट बहुत बड़ा है, और केन्द्र सरकार का महाराष्ट्र सरकार से बड़ा टकराव चल रहा है, इसलिए यह मामला बड़ी खबर बना है। लेकिन कम कमाऊ प्रदेशों और शहरों में नेताओं और अफसरों के दिए हुए छोटे टारगेट भी करोड़ों के रहते हैं, और छत्तीसगढ़ में आईएएस, आईपीएस, और सत्तारूढ़ नेताओं के ऐसे भ्रष्टाचार को भरपूर देखा हुआ है। अफसोस महज यह है कि कानून के बहुत लंबे हाथ भी इन तक नहीं पहुंच पाते क्योंकि ऐसी भूमाफियाई को राज्य से लेकर केन्द्र तक कई किस्म का संरक्षण मिला रहता है।
मुम्बई के इस मामले में महज यह सोचने का मौका दिया है कि इस देश में पुलिस को सबसे ही भ्रष्ट नेताओं की सबसे ही बंधुआ मजदूरी से कैसे बचाया जा सकता है? इसे लेकर देश में समय-समय पर राष्ट्रीय स्तर के आयोगों और कमेटियों की सिफारिशें चौथाई सदी से दिल्ली में धूल और धक्के खा रही हैं, लेकिन उन्हें लागू करने का हौसला कोई पार्टी नहीं दिखाती है। हर पार्टी को अपनी सरकार रहते हुए यही ठीक लगता है कि राजनीति और जुर्म की बिसात पर पुलिस को प्यादों की तरह इस्तेमाल किया जाए, और जरूरत पडऩे पर अफसरों की बलि दे दी जाए। ऐसे में मुम्बई के एक अच्छे या बुरे बड़े अफसर ने सच्चे या गढ़े हुए जैसे भी सुबूतों के साथ गृहमंत्री पर इतनी बड़ी तोहमत लगाई है, तो उसकी जांच सरकार से परे किसी जज की अगुवाई में होनी चाहिए। ऐसा भी नहीं है कि जज आज हिन्दुस्तान में एकदम पाक-साफ रह गए हैं, लेकिन ईमानदार जांच के लिए भारतीय लोकतंत्र के भीतर अपनी तंग सीमाएं और तंग संभावनाएं हैं, अब हिन्दुस्तान की जांच अमरीकी एफबीआई को तो दी नहीं जा सकती।
इस मामले में यह बात ठीक लगती है कि किसी आला अफसर ने दूसरे बड़े आईपीएस से हुई अपनी बातचीत फोन पर सम्हालकर रखी है। कोई इसे दगाबाजी कहे, या गद्दारी कहे, कोई आरोप लगाने वाले अफसर को ही भ्रष्ट कहे, हमारा तो यह मानना है कि ऐसे सुबूत जिस भी भ्रष्ट मंत्री या अफसर को निपटाने के काम आएं, गंदगी उतनी ही छंटेगी। महाराष्ट्र के इस मामले को देखते हुए देश के बाकी अफसरों को भी टेलीफोन की बातचीत और संदेश सम्हालकर रखने चाहिए क्योंकि वे बड़े सुबूत की तरह काम आ सकते हैं। यह लड़ाई कुछ ऐसी है कि विभीषण का साथ लेकर भी अगर रावण को निपटाया जा सके, तो उसे गद्दारी नहीं समाजसेवा मानना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
जापान की सरकार और वहां के वैज्ञानिकों ने विज्ञान और नैतिकता को लेकर एक नई बहस का मौका खड़ा कर दिया है। वहां की सरकार ने शोधकर्ताओं को मानव शरीर की कोशिकाओं का उपयोग करके उसे जानवरों के शरीर में स्थापित करके मानव भ्रूण किस्म का एक विकास करने की इजाजत दी है। वैज्ञानिकों का तर्क यह है कि वे इस शोध से मानव भ्रूण विकसित नहीं कर रहे हैं, बल्कि ऐसी कोशिकाओं का प्रयोग कर रहे हैं जो कि भ्रूण के विकास में आगे काम आ सकती हैं। यह पूरा मामला बड़ा तकनीकी है, और नैतिक आपत्तियों से निपटने के लिए वैज्ञानिकों का तर्क यह है कि वे मानव जन्म का प्रयोग नहीं कर रहे हैं, बल्कि भ्रूण बनने के पहले की प्रक्रिया में कोशिकाओं का प्रयोग ही कर रहे हैं। लेकिन दुनिया के अधिकतर देश अब तक ऐसे प्रयोगों के खिलाफ कानूनी रोक लगाकर चल रहे हैं, ताकि इंसानी शरीर को प्रयोगशालाओं में तैयार करने के किसी भी शोध को भी रोका जा सके। यह एक अलग बात है कि प्रयोगशालाओं में जानवरों के नर और मादा के शरीरों से निकाले गए हिस्सों के बीच संबंध करवाकर उससे एम्ब्रियो बनाकर मादाओं के शरीर में स्थापित करना और फिर उससे बच्चों को जन्म दिलवाने का काम लंबे समय से चल रहा है। और तो और छत्तीसगढ़ में ही एक निजी पशु-प्रयोगशाला में चौथाई सदी के भी पहले यह नियमित रूप से हो रहा था। अब इस दुनिया में जहां कई देशों में तानाशाही है, और दुनिया के कई आत्ममुग्ध नेता और कारोबारी, या फौजी मुखिया अपने ही क्लोन तैयार करवाना चाहेंगे, तो उन्हें ऐसे वैज्ञानिक प्रयोगों से हसरत पूरी करने में बड़ी मदद ही मिलेगी।
विज्ञान कथाओं में शायद आधी-एक सदी पहले से क्लोनिंग पर आधारित कहानियां गढ़ी जाती रही हैं, और दुनिया का तजुर्बा यह भी है कि विज्ञान कथाएं वक्त लेकर हकीकत में तब्दील होती हैं। जो तकनीक जानवरों पर कारगर हो चुकी है, उस पर चाहे दुनिया के अधिकतर देश इंसानों पर इस्तेमाल पर कानूनी रोक क्यों न लगा दें, कोई ऐसी तानाशाही हो सकती है, या कोई ऐसा कारोबारी छोटा सा देश हो सकता है जो अतिमहत्वाकांक्षी वैज्ञानिकों को लेकर ऐसी सहूलियत बेच रहा हो। हो सकता है कि दुनिया के कई आत्ममुग्ध लोग अपने क्लोन बनवा चुके हों जो कि न सिर्फ हमशक्ल होंगे, बल्कि जिनका सारा डीएनए उन्हीं का होगा, और जो हर मामले में अपनी ही सरीखी संतान पैदा कर सकेंगे। यह बात तो जाहिर है कि दुनिया में लोग खुद अमर रहने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, दूसरी तरफ संतान पाने के लिए भी बहुत से लोग हर किस्म के गैरकानूनी काम करने को तैयार हो जाते हैं, मानवबलि तक दे देते हैं। ऐसे लोगों को अगर उनकी अपार दौलत के सहारे अपना ही क्लोन बनवाने का मौका मिलेगा, तो वे पीछे हटेंगे, ऐसा सोचना मुश्किल है।
वैज्ञानिकों के सामाजिक सरोकार कम रहते हैं। वे किसी आविष्कार या किसी खोज की कामयाबी के नशे में अधिक रहते हैं। उनकी महत्वाकांक्षा प्रयोगशाला के भीतर की कामयाबी तक सीमित रहती है, और फिर अगर उनकी खोज बाहर की दुनिया के लिए खतरनाक या नुकसानदेह रहे, तो भी वे उसकी परवाह नहीं करते। हिरोशिमा और नागासाकी पर जो हाइड्रोजन बम गिराया गया था, उसे बनाने वाले वैज्ञानिकों को इस व्यापक मानवसंहार के खतरे ने किसी भी स्तर पर रोका नहीं था। दुनिया में जितने किस्म के हथियार बने हैं, उनमें से कोई भी फौजियों ने नहीं बनाए हैं, वे सारे के सारे वैज्ञानिकों के बनाए हुए हैं, जिनके काम में सामाजिक सरोकार कोई पहलू ही नहीं रहता है।
आज अगर दुनिया के तकरीबन तमाम विकसित और सभ्य देशों ने मानव भ्रूण को लेकर, मानव-क्लोनिंग को लेकर किसी शोध पर भी रोक लगा रखी है, तो इसके पीछे सिर्फ नैतिकता के मुद्दे नहीं हैं बल्कि मानव-क्लोनिंग से होने वाले और खतरों का अंदाज लगाकर सरकारों ने इसे रोक रखा है। आज दुनिया के अपराधों में फिंगर प्रिंट से लेकर चेहरे तक, और डीएनए तक की जितनी मदद जांच में मिलती है, वह पूरी की पूरी मानव-क्लोनिंग से खत्म हो सकती है, और क्लोनिंग के बाद भी दुनिया से निपटने की ताकत आज दुनिया की बाकी तकनीक, बाकी कानून के पास भी नहीं है।
जब तक खतरों से निपटने की ताकत न हो, तब तक उन्हें लेकर बहुत किस्म के शोध का दुस्साहस ठीक नहीं है। दुनिया ने देखा हुआ है कि बहुत से मामलों में सरकारों, फौजों, और कारोबारियों के करवाए हुए शोध के असली मकसद छुपाकर रखे जाते हैं, और जब उनसे खतरनाक ईजाद हो चुकी रहती है तब जाकर वे मकसद उजागर होते हैं। इसलिए मानव कोशिकाओं को लेकर जापान में जैसे प्रयोगों की इजाजत दी गई है, वह हमारी सीमित वैज्ञानिक समझ के मुताबिक एक गलत और बहुत खतरनाक इजाजत है। दुनिया के देशों को घोषित या अघोषित रूप से ऐसा करने का हक या सहूलियत हासिल तो हैं, लेकिन पूरी इंसानी नस्ल के लिए बेहतर यह है कि इससे बचा जाए। अगर किसी दिन दुनिया में बहुत सारे क्लोन बन जाएंगे, तो ऐसे क्लोन के आपसी देह-संबंधों का क्या नतीजा होगा यह भी अभी साफ नहीं है। यह दुनिया में ऐसे दानव, ऐसे खतरे खड़े करने का काम है जिससे तबाही का कोई अंदाज आज खुद विज्ञान के पास नहीं है। यही वजह है कि विज्ञान की असीमित संभावनाओं पर लोकतांत्रिक-जनकल्याणकारी सरकारों के पास रोक लगाने के अधिकार रहते हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में आए दिन खबरें रहती हैं कि कौन सी सब्जी का कितना भाव हो गया है। पाकिस्तान में टमाटर दो सौ रूपए किलो एक बार हो गए, तो वहां से अधिक खबरें हिन्दुस्तान में बनीं, और हिन्दुस्तान के जो लोग टमाटर नहीं भी खाने वाले थे, वे यह सोचकर खाते रहे कि वे वह टमाटर खा रहे हैं जो कि पाकिस्तानी नहीं खा पा रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ बाजार में सब्जी की महंगाई की खबरों को अटपटा सा साबित करती हुई खबरें रहती हैं कि किस तरह किसानों ने दाम सही न मिलने पर सब्जी तुड़वाना महंगा पडऩे पर खेत में ट्रैक्टर चलाकर सब्जियां कुचल डालीं। आज भी आसपास चारों तरफ यही सुनाई पड़ता है कि खेतों से एक-दो रूपए किलो निकलने वाली सब्जियां चिल्हर बाजार में ग्राहकों को 25-50 रूपए किलो तक मिलती हैं। अब जब देश में संगठित किसानों की संगठित उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का एक बड़ा किसान आंदोलन सौ से अधिक दिनों से चल रहा है तो यह भी सोचने की जरूरत है कि सब्जी उगाने वाले किसानों के असंगठित सेक्टर को किस तरह जिंदा रखा जा सकता है? आज भी हिन्दुस्तान जैसे देश में अनाज और तिलहन-दलहन जैसी फसलों के तुरंत बाद सबसे अधिक रोजगार का जरिया सब्जियां और फल ही हैं। इनमें खेतों से लेकर घरों तक करोड़ों रोजगार हैं, लेकिन बीच के एक-दो व्यापारी तबकों के अलावा बाकी सबकी हालत मजदूर सरीखी ही है।
जिन प्रदेशों में दूध की संगठित और योजनाबद्ध खरीदी के लिए, उनके स्टोरेज के लिए, पैकेट बनाकर मार्केटिंग की सहूलियत नहीं है, वहां के दुग्ध उत्पादक कोई कमाई नहीं कर पाते। दूसरी तरफ जिन प्रदेशों में अमूल जैसे सहकारी आंदोलन कामयाब हैं, या राज्य के सरकारी संगठन कामयाब हैं, वहां पर डेयरी चलाकर लोग खासी कमाई कर लेते हैं। और तो और अगर किसी राज्य में निजी डेयरी बड़ा ब्रांड बनकर दूर तक मार्केटिंग कर पाती है, तो उस डेयरी के आसपास के सौ-दो सौ किलोमीटर के इलाके में भी छोटे-छोटे पशुपालक उसके भरोसे चल निकलते हैं। ऐसे में फलों और सब्जियों को लेकर अगर ट्रांसपोर्ट, स्टोरेज, प्रोसेसिंग, पैकिंग-बॉटलिंग और मार्केटिंग का इंतजाम हो जाए, तो इससे सब्जियों के खेतों को ट्रैक्टरों से कुचलने की नौबत नहीं आएगी। आज जब घर-घर में फ्रिज आ चुके हैं, तब उनकी सीमित जगह पर अधिक मात्रा में साफ की हुई सब्जियां रखने लायक पैकेट तैयार मिलें, तो सब्जियों का एक नया बाजार बन सकता है, और इसमें बहुत से रोजगार भी खड़े हो सकते हैं। किसी भी उत्साही राज्य सरकार को इस काम को बढ़ावा देना चाहिए जो कि किसानों की अनाज, दाल, तेल की मुख्य उपज के अलावा भी दूसरी उपज से किसान की कमाई बढ़ाने का काम कर सके।
हम इसी जगह कई बार इस बारे में लिखते हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने और बढ़ाने के लिए खेती के साथ-साथ फल-सब्जी, डेयरी, मधुमक्खी पालन से लेकर लाख की खेती, रेशम के कीड़ों को पालना, जड़ी-बूटी की खेती जैसे दर्जनों दूसरे काम बढ़ाने चाहिए ताकि ग्रामीण और कुटीर अर्थव्यवस्था मजबूत हो सके। ये सारे के सारे काम बिना किसी बाहरी तकनीक के, बिना किसी बाहरी रसायनों के हो सकते हैं, और इनमें गांवों में मौजूद अतिरिक्त मानव शक्ति का भरपूर इस्तेमाल हो सकता है। हम यह कोई बड़ी कल्पनाशील बात नहीं कर रहे हैं, गांधी ने अपने वक्त से इसी किस्म के आत्मनिर्भर गांव सुझाए थे, और आज भी गांवों में उत्पादकता की अछूती संभावनाएं अपार हैं। जो बातें हमने ऊपर गिनाई हैं उनके अलावा पशुपालन, मछलीपालन, और पक्षीपालन जैसे काम हो सकते हैं जो कि गांवों में लोगों के खानपान में बेहतरी भी ला सकते हैं, और उनकी अच्छी खासी कमाई भी करवा सकते हैं।
आज जब खबरें बनती हैं कि बाजारों में सब्जियां 75-100 रूपए किलो बिक रही हैं, या बेंगलुरू के बाजार में अमरूद के दाम 250 रूपए किलो हैं, तो यह लगता है कि एक तरफ बाजार में दाम आसमान छू रहे हैं, दूसरी तरफ किसान अपने खेतों में पेड़ों से टंग रहे हैं। इन दोनों सिरों के बीच की कमाई जहां जा रही है, उसमें से किसान को अधिक हक मिलना जरूरी है, और बीच में एक-दो दलाल-व्यापारी जो मोटी कमाई कर रहे हैं, उसकी जगह सरकारों को मार्केटिंग का एक ढांचा लाना चाहिए। सरकारें अलग-अलग इलाकों में फल-सब्जियों को बढ़ावा देने के लिए कोल्ड स्टोरेज भी बना सकती हैं, और इनके प्रोसेसिंग प्लांट भी। इस सुझाव में भी कोई नई बात नहीं है, फर्क बस यह है कि यह बात अनदेखी या उपेक्षित रह जाती है।
एक तरफ देश की आम जनता सब्जी की महंगाई को रोए, और दूसरी तरफ किसान खुदकुशी करते रहें, यह नौबत बहुत खराब है, और इसे ठीक करने की ताकत और जिम्मेदारी दोनों ही सरकारों पर है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
उत्तराखंड के नए सीएम तीरथ सिंह रावत अपने एक बयान की वजह से एकाएक खबरों में आ गए हैं, और हिन्दुस्तान के जिन लोगों ने उनके मुख्यमंत्री बनने की खबर नहीं पढ़ी होगी, उन सबको एकाएक उनका नाम और चेहरा दिख गया, और याद रहेगा। उन्होंने घुटनों पर फटी हुई जींस पहनी एक महिला का जिक्र करते हुए कहा कि विमान में बगल में बैठी ऐसी महिला को देखकर हैरानी हुई कि उनके घुटने दिखते हैं, वे समाज के बीच में जाती हैं, बच्चे साथ में हैं, वे क्या संस्कार देंगी?
अब फटी हुई या फाड़ी हुई जींस को पहनना बरसों से पूरी दुनिया में चली आ रही एक ऐसी फैशन है जिसे पश्चिमी कहना भी गलत होगा क्योंकि 10-20 बरस से तो हिन्दुस्तान में भी उसका इतना चलन है कि लोगों की नजरें भी अब ऐसे घुटनों पर नहीं जाती। मुख्यमंत्री के इस बयान को लेकर जवाब में कुछ लोगों ने कटी हुई जींस से बना हाफ पेंट पहनी हुई उनकी बेटी के साथ उनकी तस्वीर पोस्ट की है, और भी कुछ दूसरे किस्म के उघड़े कपड़ों में उनकी बेटी उनके साथ खड़ी दिख रही है। हम इस बहस को उनके परिवार पर ले जाना नहीं चाहते क्योंकि उनकी सोच अलग हो सकती है, और उनकी बालिग बेटी की सोच उसकी उल्टी भी सकती है। हम किसी के बालिग बेटे-बेटियों पर उनकी सोच थोपने के खिलाफ हैं, इसीलिए हम उनके परिवार को इस बहस में घसीटना नहीं चाहते, बहस में घसीटने के लिए तीरथ सिंह रावत के खुद के शब्द काफी हैं।
सोशल मीडिया पर जिन लोगों ने उनके बयान की खिंचाई की है, वह भी पढऩे लायक है, और सीएम के बयान के बाद ऐसी फैशन करने वाली तमाम लड़कियों का यह हक भी बनता है कि वे उसका जवाब दे सकें। एक लडक़ी/महिला ने लिखा है- महिला को ऊपर से लेकर नीचे तक निहारने वाले ये खुद बड़े संस्कारी हैं? ऐसी घटिया बातें बोलकर भाजपाई क्यों अपने संस्कार प्रदर्शित करते हैं? विदेशों में जाकर ऐसे ही लोग औरतों को घूर-घूरकर देखते हैं।
एक दूसरी लडक़ी/महिला ने लिखा है- रिप्ड जींस पहनने वाली औरतें क्या संस्कार देंगी? क्या इसी वजह से शर्टलेस आदमी फेल होते हैं? एक दूसरी लडक़ी/महिला ने लिखा है- फटी जींस नहीं, फटी मानसिकता को सिलाई की जरूरत है। अमिताभ बच्चन की नातिन ने भी सोशल मीडिया पर लिखा है- हमारे कपड़े बदलने से पहले अपनी सोच बदलिए।
उत्तराखंड सीएम के इस बयान के खिलाफ दूसरे राजनीतिक दलों के लोगों ने भी लिखा है और ट्विटर-फेसबुक पर बहुत सी लड़कियों और महिलाओं ने रिप्ड जींस में अपनी तस्वीरें पोस्ट करने की मुहिम छेड़ दी है।
हिन्दुस्तानी वोटरों के जिस बड़े तबके को एक काल्पनिक भारतीय संस्कृति दिखाकर, उसे भारत का इतिहास बताकर जिस तरह की सांस्कृतिक शुद्धता से उसके गौरव को उत्तेजित किया जाता है, वह अभियान इस उत्तेजना को वोटों में तब्दील करने की पुरानी हरकत है। हिन्दुस्तान के इतिहास के जितने भी पन्नों को देखें, यहां की प्रतिमाओं से लेकर यहां की पुरानी तस्वीरों तक, और यहां के साहित्य में सौंदर्य के वर्णन तक महिलाएं बड़े ही दुस्साहसी किस्म के कपड़ों में दिखती थीं। हिन्दुस्तान के अनगिनत मंदिरों में न सिर्फ बेनाम सुंदरियों की प्रतिमाएं, बल्कि देवियों की प्रतिमाएं भी बहुत ही कम कपड़ों की दिखती हैं। संस्कृत साहित्य से लेकर भारत की लोकभाषाओं तक की साहित्य में सुंदरियों के शरीर और कपड़ों का जो ब्यौरा दिखता है, वह रिप्ड जींस से कहीं अधिक खुला हुआ रहता है। यह अलग बात है कि जींस एक पश्चिमी और ईसाई-बहुल देश अमरीका से निकलकर पूरी दुनिया में छाई है, और पूरी दुनिया की नौजवान पीढ़ी की सबसे लोकप्रिय अकेली पोशाक का एकाधिकार पा चुकी है। अब जींस से पश्चिम के नाते परहेज करें, या पश्चिम के ईसाईयों के नाते परहेज करें, उस जींस को फाडक़र पहनना दुनिया के तमाम देशों में एक फैशन बन चुका है जो कि लौटने वाला नहीं है। ऐसे में इस फैशन को कोसना भारतीय संस्कृति के झंडाबरदारों को खुश करने का काम तो हो सकता है, लेकिन यह हकीकत को नकारकर एक अस्तित्वहीन इतिहास की कल्पना को स्थापित करने के पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।
जैसा कि बहुत से लोगों ने अपने जवाब में लिखा भी है, कपड़ों पर पैबंद के बजाय अधिक जरूरत लोगों की फटी हुई सोच और उससे भी अधिक फटी हुई भाषा में पैबंद लगाने की है। आज जिन तथाकथित हिन्दुत्ववादियों या राष्ट्रवादियों का हमला लड़कियों की पोशाक पर होता है, उनके शाम तक बाहर रहने पर होता है, रात में किसी पार्टी में जाने पर होता है, उन्हें अपना हमला उन लडक़ों और आदमियों पर केन्द्रित करना चाहिए जिनसे इन लड़कियों और महिलाओं को खतरा होता है। दिक्कत यह है कि बलात्कारियों की आलोचना भी इस राष्ट्रवादी तबके से तब तक सुनाई नहीं पड़ती जब तक बलात्कारी कोई गैरहिन्दू न हो। अगर मंदिर में पुजारी सहित दर्जन भर लोग एक मुस्लिम बच्ची से बलात्कार कर रहे हैं, तो भी इन राष्ट्रवादियों को कोई दिक्कत नहीं है, वे बलात्कारियों को छुड़ाने के लिए जम्मू में देश का तिरंगा झंडा लेकर लंबी-लंबी रैलियां निकालते हैं, उस बच्ची की महिला वकील पर हमले करते हैं, उसका सामाजिक बहिष्कार करते हैं, लेकिन ऐसे लोगों का ईश्वर मंदिर में एक छोटी बच्ची से सामूहिक बलात्कार और उसके कत्ल से भी अपमानित नहीं होता है। इन लोगों की यह तथाकथित भारतीय संस्कृति लड़कियों के घुटने दिखने से घायल हो जाती है, अपमानित हो जाती है।
यह पूरा सिलसिला बहुत ही शर्मनाक है। जिन लोगों को भारतीय संस्कृति की फिक्र है, उन्हें भारत को दुनिया की बलात्कार-राजधानी बनने से रोकना चाहिए लेकिन जिनके जिम्मे देश की लड़कियों की हिफाजत है, वे बलात्कारियों की हिफाजत में लगे हैं, और लड़कियों के घुटनों को कुसूरवार ठहरा रहे हैं। सोच की यह शर्मनाक हालत बदलनी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव ने जिला प्रशासन को लिखकर भेजा है कि रोज सुबह करीब साढ़े 5 बजे मस्जिद के लाउडस्पीकर पर अजान की आवाज से उनकी नींद खराब होती है, और उसके बाद वे दुबारा सो नहीं पातीं, दिन भर सरदर्द बना रहता है। उन्होंने लिखा है कि वे किसी सम्प्रदाय, जाति, या वर्ग के खिलाफ नहीं हैं, अजान बिना लाउडस्पीकर भी हो सकती है ताकि दूसरों की दिनचर्या प्रभावित न हों। उन्होंने अपनी शिकायत में भारत के संविधान की पंथ निरपेक्षता का जिक्र भी किया है, और इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश का हवाला भी दिया है। इसके जवाब में अफसरों ने कहा है कि वे नियमानुसार कार्रवाई कर रहे हैं। दूसरी तरफ लखनऊ से शिया धर्मगुरू मौलाना सैफ अब्बास ने कहा है कि ऐसे में तो सुबह होने वाला कीर्तन भी गलत है। उन्होंने कहा- अजान तो दो-तीन मिनट की होती है, अधिक से अधिक पांच मिनट। अगर कुलपति ने सुबह की आरती और कीर्तन को लेकर भी शिकायत की होती तो भी मसला समझ में आता। लेकिन सिर्फ अजान को लेकर शिकायत करना ठीक नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि कुलपति जिस शहर की रहने वाली हैं वहां बड़ा कुंभ होता है, पूरे महीने लाउडस्पीकर की आवाजें उठती हैं, सडक़ें भी बंद होती हैं लेकिन किसी भी मुसलमान ने कोई चि_ी नहीं लिखी, न ही आपत्ति की।
दोनों ही बातें बड़ी जायज हैं। चूंकि कुलपति ने साफ किया है कि वो किसी सम्प्रदाय के खिलाफ नहीं हैं, इसलिए उन्हें इसमें कोई परहेज नहीं होना चाहिए कि वे अपनी शिकायत को सुधारकर उसमें सभी धर्मों के, सभी धर्मस्थलों के लाउडस्पीकरों को बंद करवाने की बात लिखें। अगर वे सिर्फ मस्जिद के लाउडस्पीकर की बात करती हैं, तो उसका तो एक खास मतलब निकलेगा ही निकलेगा, और वे तोहमतों से बच नहीं सकेंगी। चूंकि उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को साथ में लगाया है, इसलिए देश की कई अदालतों के अलग-अलग वक्त के फैसलों को देखना जरूरी है जिनमें धार्मिक स्थलों के अवैध कब्जों, और उनके ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ कार्रवाई की बात लिखी गई है।
यह बात बिल्कुल सही है कि मंदिर-मस्जिद, या गुरूद्वारों और दूसरे धर्मस्थलों के लाउडस्पीकर आसपास के लोगों का जीना हराम करते हैं। जो आस्थावान हैं, और जो उस धार्मिक प्रसारण को सुनना चाहते हैं, उनके लिए अपने घरों के भीतर दीवारों के बीच तक सीमित धार्मिक संगीत वे खुद बजा सकते हैं। लोगों को नमाज का वक्त याद दिलाने के लिए मस्जिद के लाउडस्पीकरों पर से अगर अजान दी जाती है, तो यह उस वक्त की बात थी जब लोगों के पास अलार्म घडिय़ां नहीं होती थीं, फोन नहीं होते थे। आज तो गरीब से गरीब मुसलमान के पास भी मोबाइल फोन हैं, और उन पर दिन में पांच वक्त का अलार्म भी लगाया जा सकता है। कुलपति की यह मांग बिल्कुल सही है, और इलाहाबाद के प्रशासन को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए।
इसके साथ ही इलाहाबाद के प्रशासन और बाकी देश के भी शासन-प्रशासन को इन अदालती आदेशों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए जिनमें धर्मस्थलों के ध्वनि प्रदूषण को रोकने की बात कही गई है। हम अपने आसपास दिन में कुछ बार कुछ-कुछ मिनटों के लिए मस्जिद के लाउडस्पीकरों का ध्वनि प्रदूषण झेलते हैं, और सुबह-शाम, पूरी-पूरी रात मंदिरों के कीर्तनों का उससे भी तेज ध्वनि प्रदूषण बर्दाश्त करते हैं। सरकार के अफसरों का हौसला इतना कम है कि रायपुर शहर के एक मंदिर के खिलाफ पड़ोस में रहने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार और मंदिरनिर्माता समाज के एक व्यक्ति हाईकोर्ट जाकर मंदिर के लाउडस्पीकर के खिलाफ स्थगन लेकर आए, तब कहीं जाकर उस मंदिर पर रोक लगी, लेकिन अफसरों ने बाकी शहर, प्रदेश के बाकी शहर-गांव कहीं भी कानून लागू करने की जहमत नहीं उठाई।
कोई वक्त ऐसा रहा होगा जब आबादी बिखरी हुई रहती होगी, कंस्ट्रक्शन बहुत कम रहे होंगे, और लोगों को न फोन पर काम करना पड़ता होगा, न ही रात-दिन देखे बिना पढ़ाई करनी पड़ती होगी, वैसे वक्त में धार्मिक लाउडस्पीकर खप जाते होंगे। लेकिन अब तो चारों तरफ घनी आबादी रहती है, लोग रात-दिन की शिफ्ट में काम करते हैं, और ऐसे में नींद पूरी कर रहे लोग, आराम कर रहे बीमार, पढ़ रहे बच्चे या कच्ची नींद सो रहे छोटे बच्चे, तमाम लोग लाउडस्पीकरों की प्रताडऩा सहते हैं क्योंकि इसका विरोध धर्म का विरोध करार दे दिया जाएगा।
तमाम धर्मस्थलों के साथ एक जैसा सुलूक करके सबसे लाउडस्पीकर हटा देने चाहिए, और सार्वजनिक जगहों पर धार्मिक अवैध कब्जे, अवैध निर्माण, सडक़ों पर अवैध धार्मिक आयोजन इन सबको बंद करवाना चाहिए। धर्म निरपेक्ष सरकार का मतलब हर धर्म की मनमानी और अराजकता को बर्दाश्त करना नहीं होता। धर्म निरपेक्ष का मतलब किसी भी धर्म की गुंडागर्दी न चलने देना भी होता है। सभी धर्मों की गुंडागर्दी रोकने में उत्तरप्रदेश के योगी राज को खासी दिक्कत आ सकती है क्योंकि बहुसंख्यक हिन्दू धर्म की अराजकता के खिलाफ वहां की पुलिस के हाथ उठेंगे कैसे? आज मस्जिदों के लाउडस्पीकर तो बंद करवाए जा सकते हैं, लेकिन क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मंदिरों पर भी बराबरी की कार्रवाई कर पाएंगे? ऐसा करना उनके अस्तित्व की आत्महत्या से परे कुछ नहीं होगा क्योंकि धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता ही उनकी सबसे बड़ी पहचान हैं।
देश में जिस रफ्तार से साम्प्रदायिकता बढ़ती चल रही है, धर्मान्धता बढ़ती चल रही है, उसे कुचलना जरूरी है। और धार्मिक आस्था के प्रतीकों के इस किस्म के सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगनी ही चाहिए जिससे बाकी लोगों का जीना हराम हो रहा है। अदालतों के आदेश किसी एक धर्म के खिलाफ नहीं हैं, राज्य सरकारों को इतनी हिम्मत दिखानी चाहिए कि वे अपने-अपने इलाकों में धर्म की मनमानी को खत्म करें। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
राजस्थान में कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पार्टी के भीतर उनके प्रतिद्वंद्वी सचिन पायलट के बीच तनातनी को लेकर कांग्रेस विरोधी पार्टियों का खुश होना जायज ही है। पिछले बरस जब सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों को लेकर सरकार गिराने के लिए हरियाणा के रिसॉर्ट में जा बैठे थे, तब ऐसी भी चर्चा हुई थी कि उनके कब्जे से कांग्रेस विधायकों को खुद कांग्रेस पार्टी खरीदकर वापस लेकर आई थी, और सरकार बचाई थी। अब ऐसी खरीद-बिक्री पर कोई जीएसटी तो पटता नहीं है कि उसके बिल और रसीद पेश किए जा सकें, ये तमाम राजनीतिक कानाफूसियां ही रहती हैं। अब राजस्थान विधानसभा में सरकार ने एक साधारण सवाल का साधारण जवाब दिया है तो देश के मीडिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा उस साधारण को असाधारण खबर बनाकर पेश करने में लग गया है। एक विधायक ने सवाल पूछा कि क्या बीते दिनों में फोन टेप किए जाने के प्रकरण सामने आए हैं? यदि हां तो किस कानून के अंतर्गत, और किसके आदेश पर? इसके जवाब में गृहविभाग ने कहा कि लोगों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था को खतरा होने पर सक्षम प्राधिकारी के अनुमति लेकर केन्द्र सरकार के बनाए कानून के तहत फोन टेप किए जाते हैं। राजस्थान पुलिस ने इसी तरह फोन टेप किए हैं, और निगरानी पर लिए गए फोनों की मुख्य सचिव के स्तर पर बनी समिति समीक्षा करती है, कर चुकी है।
अब यह साधारण सवाल देश के किसी भी राज्य में पूछा जा सकता है, और वहां की सरकार विधानसभा में ठीक ऐसा ही जवाब दे सकती है। इस सवाल-जवाब से कहीं भी यह नहीं निकलता कि कांग्रेस के बागी विधायकों के फोन टैप हुए हों। लेकिन मीडिया में सुर्खियां देखें तो दिखता है कि सचिन पायलट की बगावत के वक्त फोन टैप हुए थे, गहलोत सरकार ने पहली बार मंजूर किया। दर्जनों अखबारों, वेबसाईटों, और चैनलों ने ऐसी ही खबरें छापी हैं। न तो विधानसभा के सवाल में और न ही वहां के जवाब में पायलट का जिक्र है, या किसी विधायक के फोन का जिक्र है, और एक निहायत तकनीकी सवाल और तकनीकी जवाब को मीडिया ने अपना मनचाहा रंग देकर पेश कर दिया। बहुत पहले किसी ने ऐसी ही नौबत के लिए यह लिखा होगा- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
कल से लेकर अब तक तकरीबन चारों तरफ मीडिया में खबरें ऐसी तस्वीर पेश कर रही हैं कि गहलोत सरकार ने पायलट के फोन टैप करने की बात मंजूर कर ली हो। हैडिंग धोखा देती है, पूरे समाचार में विधानसभा के सवाल-जवाब को बहुत छोटे से हिस्से में बीच में दबा दिया गया है, और अपनी राजनीतिक अटकलों को सरकार के जवाब की तरह खबर बना दिया गया है। अब यह इतनी चटपटी और सनसनीखेज बात है कि अखबार, वेबसाईटें, और चैनल कोई एक-दूसरे से पीछे रहना नहीं चाहते क्योंकि विधानसभा के सवाल और जवाब तक खबर को सीमित रखा जाए तो उसे कोई नहीं पढ़ेंगे। सवाल और जवाब एक सार्वभौमिक सत्य की तरह हैं कि कानून क्या है, और सरकार ने उसका उसी तरह इस्तेमाल किया है। इसमें भला क्या खबर बनती?
हम पहले भी कई बार लिखते हैं कि लोग उतने ही समझदार बन सकते हैं जितने समझदार मीडिया का वे इस्तेमाल करते हैं। समझदार मीडिया, जिम्मेदार मीडिया, और सरोकारी मीडिया, इन खूबियों को अगर देखें तो ऐसा मीडिया कम ही बच गया है। मीडिया ने अपने पाठकों, दर्शकों, और श्रोताओं को जिम्मेदार-सोच के बोझ और उसकी मशक्कत की तकलीफ से बचाने की कोशिशों को लगातार जारी रखा है। अपने ग्राहकों को दिमाग पर जोर न डालना पड़ जाए इसकी पूरी कोशिश की जाती है। नतीजा यह होता है कि सजाकर पेश की गई एक सनसनीखेज तस्वीर के बाद उसके पाठक या दर्शक अपनी अक्ल का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते। इस तरह के मीडिया तक सीमित रहने वाले लोग इस किस्म की सनसनीखेज और अर्धसत्य से भी कमसत्य, या पूरी तरह असत्य जानकारी को सच मानकर चलते रहेंगे।
लोगों की जिंदगी में मीडिया के लिए वक्त बड़ा सीमित बचा है। लोगों को समाचार और विचार के अपने श्रोत बहुत सोच-समझकर तय करने चाहिए क्योंकि उनसे मिली जानकारी और सोच उनकी अपनी जिंदगी की कई बातें तय करती हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
सोशल मीडिया इस मायने में बड़ा दिलचस्प है कि कई बरस पुरानी कोई कतरन निकालकर, उसके पुराने होने के जिक्र के बिना उसे पोस्ट कर दिया जाता है, और लोग उस पर टूट पड़ते हैं। कुछ लोग अनजाने में ऐसा कर बैठते हैं, और बहुत से लोग सोच-समझकर ऐसा करते हैं कि पेट्रोल और डीजल की महंगाई, रसोई गैस और तेल की महंगाई को लेकर यूपीए सरकार के वक्त एनडीए के नेताओं ने जितने प्रदर्शन किए थे, और डॉलर के महंगाई पर जितने भाषण दिए थे उनके वीडियो लोग पोस्ट करते हैं ताकि मनमोहन सरकार को जिन बातों के लिए मोदी सहित तमाम भाजपा नेता जितना कोसते थे, उन तर्कों को तो आज याद दिलाया जाए। ऐसी ही एक पुरानी कतरन आज सामने आई है जिसमें 2018 में इंदौर के किसी कार्यक्रम में आरएसएस के एक नेता इंद्रेश कुमार ने कहा था कि भीख मांगना भी हिन्दुस्तान में एक किस्म का रोजगार है। वहां पर ‘कलाम का भारत’ विषय पर आयोजित एक बैठक में इंद्रेश कुमार ने कहा था कि देश में 20 करोड़ लोगों का रोजगार भीख मांगना है, जिन्हें किसी ने रोजगार नहीं दिया उन्हें धर्म में रोजगार मिलता है। उन्होंने कहा जिस परिवार में पांच पैसे की कमाई भी न हो उस परिवार के कोई दिव्यांग या दूसरे सदस्य धार्मिक स्थलों पर भीख मांगकर परिवार का गुजारा करते हैं, और यह छोटा काम नहीं है।
अब यह बात किसने कही, कब कही, इसे अगर छोड़ भी दें, तो भी मुद्दे पर सोचने-विचारने की जरूरत है। यह बयान देश में मोदी सरकार के रहते हुए उनके एक सहयोगी संगठन आरएसएस की तरफ से न भी आया होता, तो भी यह हकीकत तो है कि हर धार्मिक जगह के बाहर बड़ी संख्या में लोग भीख मांगते बैठे दिखते हैं। जो लोग ईश्वर की जगह पर उसकी उपासना करने जाते हैं, उनके मन में जाहिर तौर पर स्वर्ग का लालच और नर्क का डर तो रहता ही है, और ऐसे में वे भिखारियों को कुछ सिक्के देकर अगर स्वर्ग के किसी बड़े मकान पर रूमाल बिछाना चाहते हैं, तो यह इंसान के लिए एक बिल्कुल आम मिजाज की बात है। अब ऐसे लोगों की वजह से अगर हिन्दुस्तान में 20 करोड़ लोगों के रोजगार का अंदाज है, तो इस देश में रोजगार की हालत के बारे में सोचने की जरूरत भी है। यह भी हो सकता है कि सौ-दो सौ रूपए रोजी का काम मिलने पर भी बहुत से भिखारी उसे करने को तैयार न होते हों क्योंकि उसमें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, और किसी धर्मस्थान के बाहर भीख मांगने में कोई मेहनत नहीं लगती, और खाने-पीने को भी मिल जाता है। यह देश के लिए एक शर्मनाक बात हो सकती है कि आबादी का 10-20 फीसदी भीख मांगकर गुजारा कर रहा है, और इसमें दिव्यांग, बीमार, बूढ़े और बच्चे, ऐसे तमाम कमजोर तबकों की बहुतायत है। लेकिन शर्म भरे पेट आने वाली चीज होती है। जब पेट भरा होता है तभी किसी को शर्म आ सकती है। पेट जब खाली रहता है तो सिर्फ भूख आती है, भूखे के पास शर्म भी नहीं आती कि उसके पास आकर क्या भूखे मरना है? इसलिए शर्म तो इस देश के भरे पेट वाले लोगों को आनी चाहिए कि 20 करोड़ लोग भीख मांगकर जीने को मजबूर हैं, या उसे किसी रोजगार से बेहतर समझते हैं। पिछले दो-तीन बरस में देश की मोदी सरकार ने और कई किस्म के तबकों के लिए अच्छे दिन लाने की बात की थी, यह एक अलग बात है कि दूसरी पार्टियां छोडक़र भाजपा में आने वाले लोगों के अलावा और किसी तबके के लिए अच्छे दिन आए नहीं। लेकिन इस सरकार ने भी भिखारियों के लिए अच्छे दिन लाने की योजना नहीं बनाई। भाजपा के राज वाले मध्यप्रदेश के इंदौर में इतना जरूर हुआ कि शहर को साफ करने के लिए बुजुर्ग भिखारियों और बेघरों का इंसानी कचरा म्युनिसिपल की कचरा गाडिय़ों में लादकर शहर के बाहर ले जाकर फेंक दिया गया, लेकिन भाजपा राज ने खुद अपने इंद्रेश कुमार की इस बात पर गौर नहीं किया कि रोजगार तो धर्मस्थानों के बाहर भीख मांगकर चल रहा है, बेघर गरीब, बुजुर्ग शहर के बाहर सुनसान में भला कहां भीख और रोटी पाएंगे। लेकिन इंदौर की इस मिसाल से परे बाकी पूरे देश में खुद आरएसएस के नेता की कही इस कड़वी बात पर उसके बाद के दो-तीन बरसों में भी किसी भाजपा सरकार ने ऐसा अभियान नहीं चलाया कि भिखारियों को कोई बेहतर जिंदगी दी जा सके। और फिर भिखारी कोई जमीन के नीचे छिपे हुए तो हैं नहीं, वे तो गैरभाजपा राज्यों में भी सडक़ों पर दिखते हैं, ट्रैफिक की लालबत्तियों पर दिखते हैं, घरों के बाहर दर्दभरी आवाज लगाते सुनाई पड़ते हैं, और धर्मस्थलों के बाहर तो उनका खास डेरा रहता ही है। देश की किसी भी सरकार ने भिखारियों के पुनर्वास के लिए कुछ किया हो ऐसा दिखता नहीं है। और अगर सचमुच ही इनकी गिनती 20 करोड़ जैसी है, तो फिर हिन्दुस्तान की किसी एक राज्य सरकार की भी इतनी ताकत नहीं हो सकती कि अपने राज्य के सारे भिखारियों का एक साथ पुनर्वास कर सके।
एक पुरानी कतरन से आज इस मुद्दे पर लिखने की वजह पैदा हुई, और अब यह सोचना जरूरी लग रहा है कि कोई भी कल्याणकारी-लोकतांत्रिक सरकार किस तरह अपने इस सबसे कमजोर तबके के लिए क्या कर सकती है? इनके अनदेखा रहने की एक वजह शायद यह भी हो सकती है कि ये 20 करोड़ लोग पूरे हिन्दुस्तान में इस कदर बिखरे हुए, इस कदर बेघर गैरवोटर हैं कि इनका चुनाव में कोई इस्तेमाल ही नहीं है। और जिनकी चुनाव में कोई जरूरत नहीं है, उनकी फिक्र करने की भी कोई जरूरत नहीं है। यही भिखारी अगर संगठित होकर वोट डालने की हालत में रहते, तो राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेता इनके घर पहुंचकर फर्श पर बैठकर खाना खाकर आते, फिर चाहे वह खाना खुद के ही लोगों का पहुंचाया हुआ क्यों नहीं रहता।
जो प्रदेश या जो शहर अपने आपको गौरवशाली मानते हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि जब तक उनके इलाकों के ये सबसे कमजोर लोग जिंदा रहने लायक नहीं रहेंगे, लोगों की भीख के मोहताज बने रहेंगे, तब तक उनके इलाके की सरकारों का कोई गौरवगान नहीं हो सकता। भिखारियों में से शायद ही कोई हमारा लिखा पढ़ें, और शायद ही मीडिया को इस अधिक लिखने की जरूरत सूझती हो क्योंकि इस मुद्दे से विज्ञापनदाताओं का भला क्या लेना-देना? लेकिन समाज में सरोकार रखने वाले लोगों को इन बेजुबान भिखारियों के बारे में सोचना चाहिए कि क्या ये बाकी समाज के लिए बड़ी शर्मिंदगी की वजह नहीं बनते हैं? क्या बाकी समाज की इनके प्रति जिम्मेदारी नहीं बनती है? और यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के लिए अच्छे दिन आना इन्हीं लोगों से शुरू हो सकते हैं क्योंकि इनके अच्छे दिन सबसे ही सस्ते पड़ते हैं। बाकी लोगों की जिंदगी इनसे अधिक महंगी रहती है, और फिलहाल तो देश में ऐसे कमजोर तबकों के लिए सबसे सस्ते पडऩे वाले अच्छे दिनों के भी कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। आरएसएस के इंद्रेश कुमार को 2018 के बाद के भिखारियों के आंकड़े अपडेट करना चाहिए जो कि अब तक कई लाख बढ़ चुके होंगे, और उनकी कही बात को भाजपा की सरकारें शायद अधिक ध्यान से सुनें। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
अभी हिन्दी की एक लेखिका को साहित्य का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला तो उस पर कई किस्म की बहस चल रही है। अधिकतर लोग तो आम चलन के मुताबिक बधाईयां दे रहे हैं, और कुछ बड़े प्रतिष्ठित और विश्वसनीय संपादक रहे हुए पत्रकार उनकी खूबियां भी लिख रहे हैं इसलिए यह मानना ठीक ही होगा कि वे इस पुरस्कार की हकदार होंगी। लेकिन कोई भी बहस किसी मौके पर ही छिड़ती है। जजों का आचरण कैसा होना चाहिए इस पर बहस के लिए मुख्य न्यायाधीश की राह चलते हुए एक महंगी विदेशी मोटरसाइकिल पर बैठे हुए तस्वीर का सामने आना जरूरी था तब जजों के सार्वजनिक बर्ताव पर बात शुरू हुई। इसी तरह किसी न किसी पुरस्कार के मौके पर तो यह बहस छिडऩी ही थी कि साहित्य या किसी दूसरे किस्म के पुरस्कार लेना चाहिए या नहीं, और देना भी चाहिए या नहीं।
हमारा इस बारे में बड़ा साफ सोचना है। पुरस्कारों और सम्मानों में जो पत्रकारिता से संबंधित हैं, उनमें पुरस्कार रया सम्मान देने वाली संस्था का इसके पीछे का मकसद, उसकी अपनी साख, उसके निर्णायक मंडल की साख, और सम्मान या पुरस्कार के लिए नाम छांटने की एक बहुत ही पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया। अगर इतनी तमाम बातें पूरी हो पाती हैं, तो वैसे पुरस्कार/सम्मान शायद थोड़े बहुत सम्मान के हकदार हो भी सकते हैं, और हो सकता है कि कुछ सचमुच ही इज्जतदार पत्रकार उन्हें लेना मंजूर कर सकें। लेकिन हिन्दुस्तान जितने बड़े देश में ऐसे दो-चार ही पत्रकारिता सम्मान होंगे जिनका खुद का कोई सम्मान होगा। बाकी तमाम सम्मान अपने लिए सम्मान तलाशते हुए दूसरों को सम्मान देते या बेचते हुए अपना अस्तित्व चलाते रहते हैं।
यह तो बात हुई पत्रकारिता के गैरसरकारी सम्मानों की। और फिर सम्मानों की बात करें तो छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में अस्तित्व में आते ही पहले बरस से पत्रकारिता, साहित्य, कला, समाजसेवा जैसे शायद एक-डेढ़ दर्जन सामाजिक क्षेत्रों के चुनिंदा लोगों के लिए जो सम्मान शुरू किए, वे अब सम्मान के पात्र लोगों को तरस रहे हैं। सम्मानजनक तो दूर, मामूली चर्चित लोग भी ये सम्मान पा-पाकर अघा चुके हैं, और किसी सम्मान का इससे अधिक अपमान शायद हो नहीं सकता, और हो सकता है कि इससे भी अधिक अपमान आने वाले बरसों में हो जाए। छत्तीसगढ़ के सरकारी सम्मानों में पत्रकारिता का सम्मान भी है, और सरकार से पता नहीं किस किस्म की पत्रकारिता सम्मानित हो सकती है! सरकार और पत्रकार ये दोनों तकरीबन आमने-सामने रहने वाले तबके हैं जिनके बीच अनिवार्य रूप से एक तनातनी निरंतर ही चलती रहनी चाहिए, ऐसे में ये तबके एक-दूसरे का सम्मान करने लगें, तो उससे जाहिर है कि ये अपनी खुद की पहचान खो बैठे हैं, या दूसरे की पहचान खत्म करना चाहते हैं।
दुनिया में पत्रकारिता के लिए दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्मान या पुरस्कार पुलित्जर है जिसे देने की एक बहुत पारदर्शी प्रक्रिया है, और यह आमतौर पर अमरीका की पत्रकारिता पर दिया जाता है। पुलित्जर एक बहुत कामयाब अखबार-प्रशासक थे, और इन पुरस्कारों को कोलंबिया विश्वविद्यालय स्वतंत्र रूप से तय करता है। इस पुरस्कार के लिए लोगों को दाखिला भेजना होता है, एक छोटी सी फीस भी देनी होती है, तब कहीं उनके काम पर विचार किया जाता है। इतने बरसों में यह पुरस्कार पत्रकारिता के सबसे अच्छे कामों के लिए दिया गया है, और कभी इसके बिकने या खरीदने जैसी बातें अफवाहों में भी नहीं आती। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में सौंदर्य से लेकर साहित्य तक और पत्रकारिता से लेकर समाजसेवा तक के नाम पर दिए जाने वाले अनगिनत ऐसे सम्मान हैं जिन्हें खुले रूप में खरीदा और बेचा जाता है।
अब हिन्दुस्तान में राष्ट्रीय स्तर के बहुत सारे पुरस्कार हैं जो कि फिल्मों से लेकर खेल तक, और समाजसेवा से लेकर लोककला तक दर्जनों दायरे में दिए जाते हैं। बहुत से सालाना पुरस्कार हैं और बहुत से राष्ट्रीय सम्मान हैं जिनमें पद्मश्री से लेकर भारतरत्न तक हैं। सरकार के दिए हुए पुरस्कार इस कदर फिजूल के रहते हैं कि नाम सामने आते ही पहले तो लोग आसानी से यह रिश्ता ढूंढ लेते हैं कि फलां को यह सम्मान क्यों दिया गया होगा और किसी चुनावी वर्ष में किसी प्रदेश के लोगों को सम्मान क्यों दिया जाता है। ऐसे अप्रिय विवादों के बीच में इन सम्मानों को लेना पता नहीं किन्हें अच्छा लगता है, लेकिन हम लगातार इस बात के खिलाफ लिखते आए हैं कि सरकार या सरकारी पैसों पर चलने वाली संस्थाओं से कोई सम्मान नहीं लेना चाहिए, और वह लोगों के अपने व्यक्तित्व का अपमान छोड़ और कुछ नहीं होता। फिर भी सम्मान की हवस में अपना जीवन परिचय लेकर लोगों के दरवाजों पर मत्था टेकते हुए लोगों को देखा जा सकता है जो पांच-दस बरस का मिशन बनाकर ऐसे अभियान में लगे रहते हैं।
बीच-बीच में जब कभी हम इस विषय पर लिखना चाहते हैं, तो हफ्ते-दो हफ्ते के भीतर ही हमारे दायरे के कोई न कोई पत्रकार-साहित्यकार ऐसा सम्मान/पुरस्कार पाए हुए रहते हैं, और ऐसा लगता है कि यह लिखना उन पर निजी हमला लगेगा, और यह लगेगा कि इस अखबार के संपादक को ऐसा कोई सम्मान या पुरस्कार नहीं मिला है, इसलिए खीझ उतारने के लिए यह लिखा जा रहा है। अब इस बात की सार्वजनिक घोषणा करना तो ठीक रहता नहीं कि इस अखबार के संपादक ने पिछले 25-30 बरस के सम्मान/पुरस्कार के हर प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया है कि वे सैद्धांतिक रूप से इसके खिलाफ हैं। और तो और सरकार के पत्रकारिता सम्मान के निर्णायक मंडल में रहने से भी मना कर दिया कि जिस सम्मान का हम सैद्धांतिक रूप से विरोध करते हैं उसे तय करने में शामिल होना तो बहुत अनैतिक होगा।
बिना किसी मौके के, बिना किसी नाम के, हम एक आम बात लिखना चाहते हैं कि किसी सरकार को कोई पुरस्कार या सम्मान नहीं देना चाहिए, और किसी सम्माननीय व्यक्ति को ऐसा कुछ लेना नहीं चाहिए। नोबल पुरस्कार कमेटी या पुलित्जर पुरस्कार कमेटी किस्म के पारदर्शी ट्रस्ट हों, जहां बड़ी साख वाला निर्णायक मंडल हो, और जहां दाखिले की खुली और पारदर्शी प्रक्रिया हो, वहां लोगों को यह सोचना चाहिए कि वे उससे मिलने वाले पुरस्कार/सम्मान के लिए मुकाबला करें या न करें।
इससे कम पारदर्शी और साख वाली किसी भी प्रक्रिया से तय होने वाले सम्मानों का अपने आपमें कोई सम्मान नहीं होता। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
हिन्दुस्तान में कोरोना वैक्सीन लगाने का काम रफ्तार से चल रहा है। अलग-अलग राज्यों में रफ्तार कुछ कम या अधिक हो सकती है, लेकिन कुल मिलाकर करोड़ों लोगों को वैक्सीन लग चुकी है, और अधिक नाजुक या अधिक खतरे में जी रहे तबके इसे पहले पा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी लोग वैक्सीन का इंजेक्शन लगवाते हुए अपनी तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं, जिनमें से कुछ का मतलब प्रसार हो सकता है, लेकिन कुछ का मकसद यह भी है कि वैक्सीन को लेकर जिन लोगों के मन में दहशत है वह दूर हो, और भरोसा कायम हो।
छत्तीसगढ़ सहित दूसरे बहुत से राज्यों के वैक्सीन लगाने के इंतजाम देखें तो उनमें एक बुनियादी चूक दिखाई पड़ रही है। अभी भी यह काम कागजों पर किया जा रहा है, एक ही जानकारी को अलग-अलग तीन-चार टेबिलों पर बताना पड़ रहा है, वक्त भी बर्बाद हो रहा है, और लोगों के लाए हुए कागज कम से कम तीन-चार कर्मचारी छू रहे हैं जिससे सभी लोगों पर खतरा बढ़ रहा है। एक तरफ तो हिन्दुस्तान डिजिटल कामकाज का दावा कर रहा है, अधिकतर राज्यों में काफी कुछ कामों में कम्प्यूटर का इस्तेमाल बढ़ा भी है, लेकिन जनता का सरकारी कामकाज से यह वास्ता कम्प्यूटरों पर एक अलग भरोसा पैदा कर सकता था, जो कि वह नहीं कर पाया। लोगों को वैक्सीन पर भरोसा हो गया, उसे लगाने की महीन सुई पर भरोसा हो गया, लेकिन लोग यह नहीं देख पाए कि कम्प्यूटर काम को आसान कैसे करता है। बहुत ही मामूली और गली-गली में उपलब्ध कम्प्यूटरों को तार से एक-दूसरे से जोड़ देने वाली लेन प्रणाली से टीकाकरण के पूरे इंतजाम को कागजमुक्त किया जा सकता था, लेकिन ऐसा किया नहीं गया। दरअसल जब वैक्सीन पाने और लगाने को ही बहुत बड़ी उपलब्धि मान लिया गया है, तो फिर उसे कागजमुक्त बनाकर भला और कौन सी कामयाबी पाई जा सकती थी?
लेकिन टीकाकरण जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम आम लोगों के मन में सरकार के कम्प्यूटरीकृत इंतजाम के बारे में एक भरोसा पैदा हो सकता था, खासकर टीकाकरण के शुरुआती दौर में इस उम्र के आम लोगों को टीके लग रहे हैं, उन लोगों ने कम्प्यूटरों को अधिक देखा हुआ नहीं है। सरकार डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने की बात करती है, दावा करती है, लेकिन टीका लगाने जाने वाले को कई बार अपना नाम, पता, मोबाइल नंबर बताना पड़ रहा है, हर टेबिल पर बार-बार उसी जानकारी को दर्ज किया जा रहा है, टीकाकरण की क्षमता भी बर्बाद हो रही है, और एक-एक कागज को कई लोगों के छूने से संक्रमण का एक खतरा भी बढ़ रहा है। ऐसा भी नहीं है कि राज्य सरकारों ने इंतजाम में खर्च नहीं किया है, खर्च भी किया है लेकिन चार कम्प्यूटरों को आपस में जोडक़र पूरे काम को कागजमुक्त करने की कल्पना नहीं दिखाई है।
अब समय आ गया है कि सरकार को गैरजरूरी कागजी कार्रवाई का बोझ जनता पर से खत्म करना चाहिए। टीकाकरण से परे एक दूसरा मामला सरकारी कामकाज में गैरजरूरी कागजी कार्रवाई का है। आज लोग किसी भी सरकारी दफ्तर में मामूली सा काम लेकर जाते हैं तो उनसे ऐसे ढेर सारे कागज मांगे जाते हैं जो कि उस दफ्तर में पहले से जमा हैं। विश्वविद्यालय में नए इम्तिहान या दाखिले के लिए अर्जी लगाने पर उसी विश्वविद्यालय के पुराने नतीजों को मांगा जाता है। छोटे से छोटा सरकारी दफ्तर कागजों का अधिक से अधिक कचरा इक_ा करना चाहता है, मानो फोटोकॉपी की दुकानें उनके घरवाले चला रहे हों। दूसरी तरफ अमरीका जैसे विकसित और सभ्य सरकारों वाले देशों का यह हाल है कि वहां किसी भी सरकारी फॉर्म में मांगी जाने वाली हर जानकारी के बारे में यह तौला जाता है कि क्या उसे मांगना जरूरी है? हर सरकारी फॉर्म पर यह लिखना जरूरी होता है कि उसे भरने में करीब कितने मिनट लगेंगे? आज छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में बिजली का कोई मौजूदा ग्राहक घर पर एक एसी लगाने पर अगर खुद होकर स्वीकृत बिजली लोड को बढ़ाने की अर्जी दे, तो उससे वे सारे के सारे कागज फिर से मांगे जाते हैं जो उसने बिजली का कनेक्शन लेते हुए जमा किए थे। इससे ग्राहक के ऊपर कागजों को जुटाने का अंधाधुंध बोझ बढ़ता है, और खुद बिजली विभाग उन कागजों को दुबारा लेकर क्या कर लेगा जिनके आधार पर उसने पहला कनेक्शन दिया था?
कागजों को लेकर सरकारी व्यवस्था का मोह हैरान करता है। जब कभी पुराने कागजों के ग_े दीमकों के खाए हुए दिखते हैं, तब यह समझ नहीं आता कि इनका अधिक बड़ा शौक दीमक को है, या सरकार को? सरकारी दफ्तरों में जाकर देखें तो ऐसे गैरजरूरी मंगाए गए लोगों के दस्तावेज धूल खाते, पानी में भीगते, दीमक का इंतजार करते फर्श से छत तक भरे रहते हैं। इसके बावजूद सरकार अपनी आदत को सुधारना नहीं चाहती। आज टीकाकरण में कागजों के गैरजरूरी बेजा इस्तेमाल को देखते हुए इस पर लिखना सूझा, तो सरकारी दफ्तरों में कागजों का आम बेजा इस्तेमाल भी सूझ गया। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


