विचार/लेख
पिछले हफ़्ते स्टैंडअप कॉमेडियन अग्रिमा जॉशुआ का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। सालभर पुराने इस वीडियो में अग्रिमा ने कई चीजों के साथ मुंबई में बनने वाले छत्रपति शिवाजी स्मारक पर भी टिप्पणी की थी। इस टिप्पणी में उन्होंने बताया कि ‘कोरा’ वेबसाइट पर कुछ लोग इस स्मारक के बारे में बेबुनियाद दावे कर रहे थे, जैसे यह कि वह दरअसल स्मारक के रूप में, नई तकनीक से लैस एक हथियार है। इस बात पर अग्रिमा ने व्यंग्य किया कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव के नाम पर झूठे तथ्य फैलाना हमें स्वीकार है मगर ऐतिहासिक हस्तियों के ‘आदर’ और ‘सम्मान’ में ज़रा सी भी कमी हो तो हम जंग छेड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं।
अग्रिमा की यह टिप्पणी सही साबित हुई जब उनकी इस टिप्पणी से कई लोगों की भावनाएं बेहद आहत हो गई। लोगों ने अग्रिमा पर शिवाजी महाराज का अपमान करने और महाराष्ट्र की जनता की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया। हज़ारों लोगों ने अग्रिमा की गिरफ़्तारी की मांग की और ख़ुद महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने अग्रिमा पर एफ़आईआर दर्ज करने की बात की। सोशल मीडिया पर उन्हें गालियां और धमकियां मिलीं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कुछ कार्यकर्ताओं ने उस स्टूडियो को तहस-नहस कर दिया, जहां उन्होंने परफ़ॉर्म किया था। स्थिति इतनी बुरी हो गई कि ट्विटर पर एक वीडियो जारी कर अग्रिमा को शिवाजी महाराज पर की गई अपनी टिप्पणी के लिए माफ़ी मांगनी पड़ी।
इसके बाद सोशल मीडिया पर अग्रिमा को बलात्कार और जान से मारने की धमकियां देने वाले वीडियो आने लगे। भद्दी भाषा में अग्रिमा और उनके परिवार को नुक़सान पहुंचाने की बात करते इन वीडियोज़ का सोशल मीडिया पर समर्थन भी किया गया। ऐसे वीडियो बनानेवाले कुछ लोगों के नाम सामने आए और वे गिरफ़्तार भी हुए हैं। पर शिवाजी महाराज के इस तथाकथित ‘अपमान’ के लिए अग्रिमा के ख़िलाफ़ यह द्वेष एक विषैला रूप धारण कर चुका है। उनके यौन शोषण से लेकर उनके खुलेआम कत्ल की मांग करनेवालों की कमी नहीं है। ज़्यादातर ट्रोल्स को इसी बात से ऐतराज है कि अग्रिमा एक ईसाई हैं और एक बेबाक, उन्मुक्त सोच वाली औरत हैं। ये दो चीजें पितृसत्ता और धर्मांधता की सड़ांध में फल-फूल रहे इस समाज से बर्दाश्त नहीं होतीं।
आज अभिव्यक्ति की आज़ादी हमारे देश में एक मज़ाक बनकर रह गई है। एक फ़िल्म, एक किताब, एक कविता या महज़ एक ‘कॉमेडी शो’ से तथाकथित धर्मरक्षक आहत हो जाते हैं। लेखकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों को ‘हिंदू विरोधी’, ‘देशद्रोही’, ‘आतंकवादी’, ‘नक्सली’ घोषित करके उन्हें नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। सोशल मीडिया पर धमकियां, लांछन और चरित्र हनन तो है ही, उन्हें दिनदहाड़े जान से मार भी दिया जाता है। यही ज़हर गौरी लंकेश, नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे जैसे तमाम लेखकों और चिंतकों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार है, जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों और नाइंसाफियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई।
सिर्फ़ बड़े लेखक और कलाकार ही नहीं, हर वह औरत जो मौजूदा सामाजिक या शासन व्यवस्था का विरोध करने की हिम्मत रखती है, इसी तरह के हमले का निशाना बनती है।
लेखक या पत्रकार हो या कोई अभिनेता या हास्य कलाकार, ‘देश विरोधी’ और ‘हिंदू विरोधी’ होने का इल्ज़ाम कभी भी, किसी पर भी लगाकर उसे हर तरह के शारीरिक हमले और धमकियों का निशाना बनाना अब आम बात हो गयी है और इसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ रहा है महिलाओं पर। महिलाओं पर हमला करने का मुख्य तरीका है यौन उत्पीड़न और उनका चरित्र हनन। अग्रिमा अकेली नहीं हैं जिन्हें अपने विचारों के लिए ‘रंडी’ बुलाया गया या बीच सड़क पर उनका शोषण करने की धमकी दी गई। आए दिन हम देखते हैं कैसे सोशल मीडिया पर महिला पत्रकारों, राजनेताओं, कलाकारों, बुद्धिजीवियों के चरित्र और यौनिकता पर सवाल उठाए जाते हैं, उनके नाम पर अश्लील वीडियो और तस्वीरें फैलाई जाती हैं और गंदी भाषा में उन्हें अमानवीय शारीरिक हिंसा की धमकियां दी जातीं हैं।
सिर्फ़ बड़े लेखक और कलाकार ही नहीं, हर वह औरत जो मौजूदा सामाजिक या शासन व्यवस्था का विरोध करने की हिम्मत रखती है, इसी तरह के हमले का निशाना बनती है। हमें याद है किस तरह शाहीन बाग़ में नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाली महिलाओं पर वेश्यावृत्ति का इल्ज़ाम लगाया गया था। सफ़ूरा ज़रगर के गर्भवती अवस्था में गिरफ़्तार होने पर उनके बच्चे के पिता के परिचय पर सवाल उठे थे और छिछली टिप्पणियां की गई थीं। मुख्यधारा से विपरीत विचार रखनेवाली बेबाक औरतों पर उंगली उठाना तो लगभग रोज़ का मामला है ही।
जिस देश में लगभग हर चौथी औरत बलात्कार और यौन उत्पीड़न का शिकार रह चुकी है, जिसे ‘महिलाओं के लिए सबसे ख़तरनाक देश’ के तौर पर जाना जाता है, वहां इस प्रकार औरतों का लांछन और शोषण कल्पना से परे नहीं है। अग्रिमा जॉशुआ जैसे कलाकार ही नहीं, हम में से कोई भी इसका निशाना बन सकता है। दुख की बात यह है कि जिन ऐतिहासिक महापुरुषों के सम्मान के बहाने अग्रिमा जैसी महिलाओं पर आक्रमण किया जाता है, वे खुद ही कभी इसका समर्थन नहीं करते बल्कि वे खुद सबसे पहले इसका विरोध ही करते।
प्रकाश दुबे
कहते हैं, करमों की सजा इसी जनम में, इसी जग में मिल जाती है। भरोसा न हो तो अधीर रंजन बनर्जी से पूछ लो। अधीर बाबू लोकसभा में कांग्रेस पक्ष के नेता हैं। कम सांसद जीते, इसलिए नेता प्रतिपक्ष का दर्जा नहीं मिला। संसद की सबसे ताक़तवर लोक लेखा समिति के सभापति हैं। लोकतंत्र की मज़बूती चाहने वालों ने प्रथा डाल दी कि विपक्ष में बैठने वाला सांसद ही सभापति बनेगा। झख मारकर विपक्ष को पद देना पड़ता है। जनता पर होने वाले खर्च की पूछताछ करने का समिति को अधिकार है। समिति की बैठक हो जाने के बाद पता लगा कि लोकसभा का अतिरिक्त सचिव कोरोना संक्रमित पाया गया। वह बैठक में हाजिऱ था। सचिवालय ने अधीर सहित बैठक में हाजिऱ रहने वाले दर्जन भर सांसदों को तन-दूरी बनाने और जांच कराने कहा है। इसके ठीक पहले वाली बैठक में अधीर बाबू प्रधानमंत्री केयर फंड की जांच कराने के लिए अधीर थे। बहुमत सत्ता दल के सांसदों का है। उन्होंने पहल ठुकरा दी थी।
गजेन्द्र की गंगा में
केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ढंग से पुरोहिती नहीं कर पाए। सचिन पायलट भी नहीं समझ सके कि शादी-विवाह में कई अड़ंगे आते हैं। मर्जी से डा फारुक अब्दुल्ला की बिटिया से विवाह करने और मुख्यमंत्री बनने में अंतर है। शेखावत के विरुद्ध विधायकों को ललचाने का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज की गई। शेखावत ने सफाई देते हुए चुटकी ली--पति-पत्नी की तकरार में सात फेरे कराने वाले पुरोहित को दोष देना बेमानी हैं। शेखावत ने आडियो मंत्र पढ़ा या नहीं? इसकी जांच तो आवाज़ की पहचान करने वाले विशेषज्ञ करेंगे। दो बरस पहले प्रधानमंत्री से लेकर अमित शाह तक ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। इसके बावजूद महारानी ने शेखावत को प्रदेश पार्टी का अध्यक्ष नहीं बनने दिया था। महारानी वसुंधरा राजे के मुकाबले गजेन्द्र और भांजे ज्योतिरादित्य असहाय हैं। दल बदल की गंगा में सचिन डुबकी लगाने पहुंचे जरूर। गंगा सफाई अभियान के मंत्री गजेन्द्र शेखावत तट पर खड़े देखते रहे।
श्रीराम ने कहा-हे भगवान
भगवान का नाम लेना गलत नहीं हो सकता। नाम श्री राम है और जनता जनार्दन के परम भक्त। खनन घोटाले के कारण जनार्दन रेड्?डी की मंत्री वाली लाल बत्ती छिनी थी। जेल की काल कोठरी पहुंचने वाले जनार्दन रेड्डी के साथी बलारी श्रीरामुलु ने पार्टी छोड़ दी थी। कर्नाटक और तेलंगाना सरकारें खनन घोटाला भूल चुकी हैं। श्रीरामुलु पुरानी नाराजग़ी भूलकर भाजपा में वापस लौटे। कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री हैं। तस्वीरों में मुंह पर पट्?टी, मास्क लगाए दिखने वाले श्रीरामुलु ने मन की बात कही-कोरोना के कोप से सिर्फ भगवान ही बचा सकता है। ऐसा कहने का मतलब यह कतई नहीं रहा होगा, कि कर्नाटक सरकार या केन्द्र सरकार के काम में कोताही-कमी है। संक्रमित संख्या 50 हजार और मृतक संख्या एक हजार पार करने पर भगवान ही यादआएगा। गुजरात को पीछे छोड़ कर्नाटक चौथे स्थान पर है।
खज़ाने की खोज
तेलंगाना राज्य में नया सचिवालय बनाने की योजना पर काम आरम्भ हो चुका है। पुरानी इमारत को ध्वस्त किया जा रहा है। जी ब्लाक को गिराते समय राज्य के मुख्य सचिव तथा पुलिस महानिदेशक उपस्थित थे। इसमें चकित होने जैसी क्या बात है? है। आधी रात में इमारत ढहाने का मकसद? चर्चा है कि पुरानी इमारत से गुप्त खज़ाने तक सुरंग है। पुरातत्व विभाग से मांग की जा रही है कि पहले सुरंग और खज़ाने की वास्तविकता का पता लगाएं। तब तक काम रुकवा दें। अपने को तुर्रम खां मत समझो। यदि कह दिया कि मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव खज़ाने की खोज करा रहे हैं तो धर लिए जाओगे। राव इन दिनों प्रत्यक्ष दर्शन नहीं देते। किसी पत्रकार ने उन्हें कोरोना संक्रमित बता दिया। अब अदालत के चक्कर काट रहा है।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
डॉ. गोल्डी एम.जार्ज
वनों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था-आरक्षित वन, संरक्षित वन और ग्रामीण वन। आमजनों का आरक्षित वनों में प्रवेश गैर-क़ानूनी घोषित कर दिया गया और झूम खेती पर और कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए।
भारत में आदिवासीयों का सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन वनों से गहराई से जुड़ी हैं। लेकिन आज वन क्षेत्रों में पहला हक़-अधिकार किसका है, इस सवाल पर देशव्यापी बहस छिड़ी हुई है। देश के भौगोलिक क्षेत्र का करीब 23 प्रतिशत भू-भाग वनभूमि है। आंकड़ों के अनुसार भारत का कुल वन क्षेत्र 7 करोड़ 70 लाख 10 हजार हेक्टेयर है। पूरे विश्व के कुल वन क्षेत्र का दो प्रतिशत आज भारत में है। वनों की भारत के आदिवासियों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यह एक जाना-माना तथ्य है कि अधिकांश आदिवासी भारत के वन क्षेत्रों में सदियों से आपस में मिल-जुल पर्यावरण की सुरक्षा और परिस्थितिकी संतुलन के साथ रहते आए हैं। वनों के साथ उनका सम्बन्ध सहजीवी का है।
मानव सभ्यता सदियों से जंगलों पर निर्भर रही है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में सिन्धु घाटी में हुई खुदाई में मिली सीलों और रंगे हुए मिट्टी के पात्रों में पीपल और बबूल के पेड़ों के प्रतीकात्मक चित्रण से यह संकेत मिलता है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता (5000-4000 ई.पू.) में भी इमारतों के लिए लकडिय़ां आदि तमाम वनोपजों का प्रयोग होता था। गुप्तकाल (200-600 ई.) का वनों से संबंधित विवरण, मौर्य काल से मेल खाता है। वहीं मुग़लकाल (1526-1707) में इमारती लकड़ी और खेती के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों का सफाया किया गया। ब्रिटिश शासन आने के बाद, सरकार और आदिवासियों में सीधा टकराव शुरू हुआ और वन इसका एक प्रमुख कारण था।
अठारहवीं सदी के मध्य तक अंग्रेजों को यह समझ में आ गया था कि भारत के वनों में अकूत संपदा छिपी हुई है और इसलिए उन्होंने वनों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की कवायद शुरू कर दी। वे या तो सीधे अथवा ज़मींदारों और साहूकारों के जरिए जंगलों को अपने नियंत्रण में लेना चाहते थे। इसका एक कारण यह था कि उन्हें न केवल भारत वरन् इंग्लैंड में भी मकान बनाने और अन्य कामों के लिए इमारती लकड़ी की ज़रुरत थी। उन्होंने ज़मींदारी प्रथा को मज़बूत किया और उसके ढांचे में इस तरह के परिवर्तन किये ताकि वे प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर वन क्षेत्रों पर कब्जा जमा सकें। जाहिर तौर पर इसका खामियाजा स्थानीय रहवासियों को भुगतना पड़ा। अंग्रेजों ने ऐसे इलाकों में घुसपैठ करनी शुरू कर दी जो आदिवासियों के वास स्थल थे और इस कारण उनके बीच सीधा टकराव शुरू हुआ।
भारत में आदिवासी विद्रोहों के पहले 100 सालों (1760 के दशक से लेकर 1860 के दशक तक) में वन कानून नहीं थे और इस दौरान जंगलों से इमारती लकड़ी और अन्य संसाधनों का अनियंत्रित दोहन हुआ। भारत में रेल सेवा शुरू करने का निर्णय 1832 में लिया गया और इसके लिए मद्रास को चुना गया। रेलों की आवाजाही के लिए जो पटरियां बिछाई जानी थीं उनके स्लीपर इमारती लकड़ी से बनने थे। इसके अलावा, इंजनों और डिब्बों के निर्माण में भी लकड़ी का इस्तेमाल होना था। सन् 1837 में भारत की पहली रेल सेवा- जिसे रेड हिल रेलवे का नाम दिया गया-शुरू हुई। यह एक मालगाड़ी थी, जिसे भाप का रोटरी इंजन खींचता था। यह गाड़ी मद्रास में रेड हिल्स और चिंताद्रिपेट ब्रिज के बीच चलती थी।
सन् 1846 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने कलकत्ता से दिल्ली तक रेल लाइन बिछाने का निर्णय लिया, परन्तु यह योजना अमल में नहीं लाई जा सकी। देश की पहली यात्री रेलगाड़ी 1853 में बम्बई और ठाणे के बीच चली और बाद में, कलकत्ता और मद्रास में भी रेलगाडिय़ां चलने लगीं। रेलवे के निर्माण के इस दौर में, इमारती लकड़ी की मांग बहुत बढ़ गई। यही नहीं, भारत की इमारती लकड़ी पानी के जहाजों के निर्माण के लिए भी मुफीद थी। भारतीय इमारती लकड़ी से बने मज़बूत जहाजों की मदद से ही इंग्लैंड, नेपोलियन के साथ अपने युद्ध (1803-15) में विजय प्राप्त कर सका।
शुरुआत में अंग्रेज़ इमारती लकड़ी की अपनी ज़रुरत बर्मा के जंगलों से पूरी करते थे। सन् 1826 में वे तेनास्सेरिम पर कब्ज़े के बाद से मौल्में में इमारती लकड़ी का व्यापार करने लगे। बाद में, इमारती लकड़ी के लालच में ही उन्होंने पेगू प्रांत पर कब्जा किया। परन्तु समय के साथ, उन्होंने भारत के जंगलों का दोहन शुरू कर दिया।
सन् 1850 के दशक की शुरुआत में अंग्रेजों ने तेजी से भारत के उन वन क्षेत्रों में घुसपैठ करनी शुरू कर दी, जहां आदिवासी रहते थे। रेलवे के विस्तार के लिए इमारती लकड़ी की जरूरत बढ़ती जा रही थी। सन् 1855 के संथाल विद्रोह के मद्देनजर, 1856 में गवर्नर जनरल लार्ड डलहौज़ी ने एक स्थाई वन नीति बनाने पर जोर दिया ताकि इमारती लकड़ी के लिए वनों का दोहन करने में आ रही दिक्कतें दूर हो सकें। सन् 1857 के गदर से उपजी अस्थिरता पर काबू पाने के बाद, 1860 में अंग्रेजों के आदिवासियों द्वारा झूम खेती किए जाने को प्रतिबंधित कर दिया और 1864 में इम्पीरियल फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की स्थापना की।
सन् 1855 में भारत के पहले वन कानून-इंडियन फॉरेस्ट एक्ट, 1855-के जरिए अंग्रेजों ने देश के संपूर्ण वन क्षेत्र पर अपने अधिपत्य की घोषणा कर दी। सन् 1876 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया और नये संशोधनों के साथ फॉरेस्ट एक्ट, 1878 लागू किया गया। इसके अंतर्गत, वनों के सामुदायिक उपयोग की सदियों पुरानी परिपाटी पर कई तरह की रोकें लगा दी गईं और सरकार को यह अधिकार दे दिया गया कि वह सार्वजनिक उपयोग के लिए वनों का अधिग्रहण कर सकती है। इस अधिनियम के ज़रिए एक ओर वनों पर राज्य का लगभग एकाधिकार स्थापित हो गया तो दूसरी ओर यह संदेश दिया गया कि ग्रामीणों द्वारा वनों का उपयोग किया जाना उनका ‘अधिकार’ नहीं, बल्कि एक ‘रियायत’ है जिसे ब्रिटिश सरकार कभी भी वापस ले सकती है।
वहीं सन् 1894 में अपनी वन नीति के आधार पर अंग्रेजों ने वनों को चार श्रेणियों में विभाजित किया-अ) वे वन, जिनका आवश्यक रूप से संरक्षण किया जाना है। ब) वे वन, जिनका इमारती लकड़ी के लिए व्यावसायिक दोहन किया जा सकता है। स) लघु वन और ड) चारागाह। सन् 1878 के अधिनियम के प्रावधानों को रद्द करते हुए, इस नीति के अंतर्गत कुछ सुरक्षा उपायों के साथ वन भूमि पर खेती की इजाजत दी जा सकती थी। इस नीति का यह प्रावधान कि आरक्षित वनों के बाहरी क्षेत्र का ग्रामीण अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रयोग कर सकते हैं, आदिवासियों और अन्य मूल निवासियों के लिए राहत का एकमात्र राहत था। परन्तु, कुल मिलाकर, इस नीति का सार यही था कि राज्य के हितों को जनता के हितों पर प्राथमिकता मिलेगी।
सन् 1927 का इंडियन फॉरेस्ट एक्ट, सन 1878 में वनों के दोहन के लिए बनाई गई नीति के अनुरूप था। इसका लक्ष्य अंग्रेजों की इमारती लकड़ी की ज़रुरत को पूरा करना था और इसमें वनों के संरक्षण के लिए कोई प्रावधान नहीं थे। इसके अंतर्गत, वनों को राज्य की संपत्ति घोषित कर, इमारती लकड़ी के दोहन का रास्ता साफ़ कर दिया गया और पारंपरिक वनाधिकारों और वन प्रबंधन प्रणालियों को दरकिनार कर दिया गया। इस अधिनियम में वनों की कोई सुस्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई थी। वनों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था-आरक्षित वन, संरक्षित वन और ग्रामीण वन। आमजनों का आरक्षित वनों में प्रवेश गैर-क़ानूनी घोषित कर दिया गया और झूम खेती पर और कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए। हां, इसमें वनों को अनारक्षित करने का प्रावधान जरूर था। तब से अब तक वनों से जुड़े सारे कानून और नीतियां इसी अधिनियम पर आधारित हैं।
(लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता है, तथा वर्तमान में फॉरवर्ड प्रेस नई दिल्ली में सलाहकार संपादक है।)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत में उत्तरप्रदेश हिंदी का सबसे बड़ा गढ़ है लेकिन देखिए कि हिंदी की वहां कैसी दुर्दशा है। इस साल दसवीं और बारहवीं कक्षा के 23 लाख विद्यार्थियों में से लगभग 8 लाख विद्यार्थी हिंदी में अनुतीर्ण हो गए। डूब गए। जो पार लगे, उनमें से भी ज्यादातर किसी तरह बच निकले। प्रथम श्रेणी में पार हुए छात्रों की संख्या भी लाखों में नहीं है। यह वह प्रदेश है, जिसने हिंदी के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों और देश के सर्वाधिक प्रधानमंत्रियों को जन्म दिया है।
हिंदी को महर्षि दयानंद ‘आर्यभाषा’ और महात्मा गांधी ‘राष्ट्रभाषा’ कहते थे। नेहरु ने उसे ‘राजभाषा’ का दर्जा दे दिया लेकिन 73 साल की आजादी के बाद हिंदी के तीनों नामों का हश्र क्या हुआ ? ‘आर्यभाषा’ तो बन गई ‘अनार्य भाषा’ याने अनाडिय़ों की भाषा ! कम पढ़े-लिखे, गांवदी, पिछड़े, गरीब-गुरबों की भाषा। ‘राष्ट्रभाषा’ आप किसे कहेंगे ? यह ऐसी राष्ट्रभाषा है, जिसका प्रयोग न तो राष्ट्र के उच्च न्यायालयों में होता हैं और न ही विश्वविद्यालयों की ऊंची पढ़ाई में होता है। राष्ट्रभाषा के जरिए आप न तो कानून, न चिकित्सा, न विज्ञान पढ़ सकते हैं और न ही कोई अनुसंधान कर सकते हैं। आज से 55 साल पहले मैंने जब ‘इंडियन स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़’ में अपना पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी में लिखने का आग्रह किया था तो संसद में जबर्दस्त हंगामा हो गया था। मुझे ‘स्कूल’ से निकाल बाहर किया गया। संसद और प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद मुझे वापिस लिया गया लेकिन आज तक कितने पीएच.डी. भारतीय भाषाओं के माध्यम से हुए ? जहां तक ‘राजभाषा’ का सवाल है, आज भी देश में राज-काज के सारे महत्वपूर्ण काम अंग्रेजी में होते हैं। संसद और विधानसभाओं के कानून क्या हिंदी में बनते हैं ? सरकारी नौकरशाह क्या अपनी रपटें, टिप्पणियां, अभिमत, आदेश वगैरह अंग्रेजी में नहीं लिखते हैं ? सच्चाई तो यह है कि अंग्रेजी आज भी भारत की राजभाषा है। अंग्रेजी की इस भूतनी की आगे हमारे सारे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दब्बू साबित हुए हैं। ये स्वतंत्र भारत के गुलाम नेता हैं। इन बेचारों को पता ही नहीं कि कोई राष्ट्र संपन्न, शक्तिशाली और सुशिक्षित कैसे बनता है।
दुनिया का कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा के जरिए संपन्न और महाशक्ति नहीं बना है। जिस देश में किसी विदेशी भाषा का वर्चस्व होगा, उसके छात्र नकलची ही बने रहेंगे। उनकी मौलिकता लंगड़ाती रहेगी। जो देश तीन-चार सौ साल पहले तक विश्व-व्यापार में सर्वप्रथम था, जिस देश के नालंदा और तक्षशिला- जैसे विश्वविद्यालयों में सारी दुनिया के छात्र पढऩे आते थे और जो देश अपने आप को विश्व-गुरु कहता था, आज उस देश के लाखों छात्रों का प्रतिभा-पलायन क्यों हो जाता है ? क्योंकि उनकी रेल को बचपन से ही अंग्रेजी की पटरी पर चला दिया जाता है। मैं विदेशी भाषाएं सीखने का विरोधी बिल्कुल नहीं हूं। मैंने स्वयं अंग्रेजी के अलावा रुसी, फारसी और जर्मन भाषाएं सीखी हैं लेकिन अपने प्रत्येक काम में मैंने अपनी मातृभाषा हिंदी को प्राथमिकता दी है। सभी प्रांतों में यदि शिक्षा का अनिवार्य माध्यम मातृभाषा हो तो हिंदी आर्यभाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा अपने आप बन जाएगी।(nayaindia.com)
(नया इंडिया की अनुमति से)
हर महीने कमा रहे हैं 2 लाख रूपये
कोड़िकोड (कोझीकोड) के पेरिम्परा में आप बिंदु और जोजो के घर के सामने से गुज़रें और उसे पलट कर न देखें, ऐसा शायद मुमकिन नहीं। उनके घर में खिले बोगनविलिया फूलों के चटकीले रंग हर किसी को अपनी तरफ खींच ही लेते हैं। आपको इस बागीचे में हर रंग के फूल देखने मिल सकते हैं।
पिछले 36 सालों से यह कपल अपनी 15 हज़ार वर्ग फुट ज़मीन पर फूलों की खेती कर रहा है। खास बात यह है कि अब ये अपने बगीचे से हर महीने 2 लाख रूपये की कमाई भी कर रहे हैं। बगीचे में मौजूद फूलों के खूबसूरत रंग घर के सामने आने-जाने वाले लोगों को आकर्षित करते हैं। लोग रूक कर वहां के नज़ारे का मज़ा तो लेते ही हैं, साथ ही कई लोग फूलों से संबंधित सुझाव भी मांगते हैं।
केरल का यह कपल बोगेनविलिया फूल उगाने के साथ इन फूलों का व्यवसाय भी करता है। वो फूलों के खूबसूरत पौधे बेचते हैं, शादियों में फूलों की सप्लाई करते हैं और अपने ग्राहकों के लिए इंस्टेंट गार्डन यानी तत्काल बगीचा सेटअप करते हैं। ये दोनों नौकरी और खेती के कामों में काफी व्यस्त रहते हैं लेकिन फिर भी वीकेंड पर स्कूलों और कॉलेजों सहित कई संस्थानों के लिए प्रेरक और उद्यमिता कक्षाएं भी संचालित करते हैं।
अपने इस अद्भुत काम के लिए इस जोड़ी को 2003 में केरल राज्य युवा कृषक पुरस्कार और प्रधानमंत्री से राष्ट्रीय प्रगतिशील किसान पुरस्कार से मिल चुका है।

परिवार का साथ
40 वर्षीय बिंदु जोसफ गुज़रे वक्त को याद करते हुए बताती हैं कि जब वह पहली बार इस घर में आई थीं तो उन्होंने देखा कि जोजो की माँ, ट्रेसिया ने अपनी 12 एकड़ ज़मीन में एक छोटा अमेज़ॅन का जंगल बनाया हुआ था। वह कहती हैं कि वह भी एक किसान परिवार से ही संबंधित थीं लेकिन ऐसा नज़ारा उन्होंने कभी नहीं देखा था। वह कहती हैं, वहां नारियल के पेड़, मवेशी, सुंदर फूल और कई फलों के पेड़ थे।
बिंदु मुस्कुराते हुए बताती हैं कि जब उनकी शादी हुई तब उनका संयुक्त परिवार था जिसमें जोजो के 11 भाई-बहन और उनके परिवार साथ रहते थे। वह बताती हैं कि परिवार के सभी लोग खेतों में दिन रात काम करते थे, जिन्हें देख कर बिंदु को भी प्रेरणा मिली। जल्द ही उन्होंने भी खेती के लिए समय निकालना शुरू कर दिया और अपनी सास से खेती के कई गुर सीखे। बिंदु कहती हैं कि वह समय उनके लिए ट्रेनिंग अवधि की तरह था और इसने उन्हें जोजो के परिवार को समझने और हिस्सा बनने का मौका दिया।
अपने बच्चों के जन्म के बाद, बिंदु और जोजो अपने परिवार के घर से कुछ किलोमीटर दूर अपने नए घर पर चले गए और जल्द ही अपने घर के आसपास की 15 हज़ार वर्ग फुट जमीन में खेती शुरू कर दी। उसी समय, बिंदु ने पेरम्बरा के सेंट मीरा के हायर सेकेंड्री स्कूल में इकोनोमिक्स टीचर के रूप में अपना करियर फिर से शुरू किया।
जोजो जैकब एक फुलटाइम किसान हैं। वह कहते हैं कि बच्चों के बड़े होने के बाद बिंदु एक शिक्षक के रूप में अपने करियर को फिर से शुरू करने के लिए तैयार थीं। इसलिए उन्होंने घर के पास की ज़मीन पर खेती करने का फैसला किया। उन्होंने अपने घर से कुछ पौधे लिए और कुछ उन्होंने केरल के विभिन्न नर्सरी से इकट्ठा किया था। कई सारी चीज़ें उनके लिए नई थी लेकिन जोजो और बिंदु दोनों हर काम करने के लिए दृढ़ थे।
बोगनविलिया के अलावा, वो हल्दी, अदरक, काली मिर्च, लीची भी उगाते हैं। यहां तक कि उन्होंने एक नर्सरी भी शुरू की है, जहाँ से ग्राहक और उनके शानदार बगीचे को देखने आने वाले लोग पौधे खरीद सकते हैं।
…जहां बोगोनविलिया खिलते हैं

बिंदु और जोजो की छत
केवल एक वर्ष के समय में, इस दंपति ने जमीन के हर कोने पर पौधा लगाया। पौधों के लिए छत और बाड़ का इंतज़ाम भी किया गया था।
बिंदू कहती हैं कि उनके बगीचे में जो बोगोनविलिया उगाए जाते हैं वे स्थानीय किस्म के नहीं हैं इसलिए वे 7-8 फीट तक बढ़ जाते हैं और बाड़ पर गिर जाते हैं। यह नज़ारा लोगों को बहुत भाता है। वे आते हैं और उनसे इस खेती की तकनीक पूछते हैं। लोगों की दिलचस्पी देखते हुए जल्द ही इस कपल ने पौधे बेचना शुरू कर दिया। साथ ही शादियों के लिए फूलों की व्यवस्था करने का काम और यहां तक कि ग्राहकों को इंस्टेंट गार्डन स्थापित करने में मदद भी करने लगे।
इस जोड़े की एक ग्राहक हैं मारिया थॉमस। मारिया थॉमस ने इनके मदद से इंस्टेंट गार्डन बनाया है। वह अपने बगीचे से बहुत खुश हैं। अपनी खुशी जाहिर करते हुए वह बताती हैं, “बिंदू ने मेरे नए घर के लिए जो इंस्टेंट गार्डन बनाया है, वह बहुत शानदार है। सिर्फ एक हफ्ते में, उन्होंने उस जगह को बॉल अरालिया झाड़ियों और खूबसूरत बोगनविलिया से भर दिया। इसने मेरे गृह प्रवेश को बेहद खूबसूरत बना दिया था।”
इसके साथ ही, यह दंपति हल्दी, अदरक, लीची और आम जैसे कई अन्य पौधों की भी खेती करते हैं। जलवायु आवश्यकताओं के अनुसार वे पौधों के लिए जगह बनाते हैं ताकि ज़मीन का ठीक तरह से इस्तेमाल कर पाएं।
इस बारे विस्तार से समझाते हुए जोजो बताते हैं, “उदाहरण के लिए, बोगेनविलिया को धूप की बहुत ज़रूरत होती है, इसलिए गर्मियों के दौरान हम बगीचे में गमले रखते हैं और बरसात के मौसम में, हम उन्हें छत पर शिफ्ट कर देते हैं, जबकि हम हल्दी और अदरक को नीचे बगीचे में में ले आते हैं।”
धीरे-धीरे जोजो और बिंदू की 36 सेंट ज़मीन पर की जाने वाली खेती काफी लोकप्रिय होने लगी। आगे चल कर उन्होंने प्रधानमंत्री से राष्ट्रीय प्रगतिशील कृषि पुरस्कार सहित कई सम्मान मिला।
दंपति को जब राष्ट्रीय प्रगतिशील कृषि पुरस्कार मिला, उसके बाद, इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ स्पाइस रिसर्च कोझीकोड प्रशासन के तहत आने वाली कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) ने इस जोड़े के लिए, एक नर्सरी सेटअप करने के साथ स्पॉन्सर करने का फैसला किया ताकि कोझीकोड में खेती को प्रोत्साहन मिले और प्रशिक्षण प्रदान किया जा सके।
इस बारे में बिंदू विस्तार से बताते हुए कहती हैं, “केवीके ने हमें एक मॉडल फार्म के रूप में स्थापित किया और जल्द ही कई छात्र और शोधकर्ता आने लगे। इनमें कई लोगों ने हमारे फार्म से पौधे भी खरीदे। हमारे पास हर हफ्ते करीब 60 वीजिटर आने लगे।”
बिंदू बताती हैं कि हर कोई उनके जैसा ही बगीचा चाहता था। इसलिए उनके लिए, इस कपल ने इंस्टेंट गार्डेन बनाना शुरू किया जिसमें उन्हें ये गमले में लगाए और पूरी तरह से खिले हुए बोगोविलिया देते थे। गमलों की संख्या के आधार पर इंस्टेंट गार्डन बनाने की लागत 20,000 से 30,000 रूपये तक आती है।
फल देने के प्रयास
पिछले कुछ वर्षों से, दंपति सुबह 5 बजे से रात के 11 बजे तक इसी काम में व्यस्त रहते हैं। इनकी रोज की रूटीन में खेती, बिक्री, शिक्षण और यहां तक कि प्रेरक वार्ता और कक्षाएं भी शामिल हैं!
दिनचर्या के बारे में बात करते हुए बिंदू कहती हैं कि क्योंकि उन्हें स्कूल जाना होता है इसलिए वह सुबह पांच बजे उठती हैं, नर्सरी साफ करती हैं और सबके लिए लंच पैक करती हैं। दिन के समय बगीचे का ध्यान जोजो रखते हैं। स्कूल से आने के बाद, शाम 4 बजे से वह फिर बगीचे के काम में जोजो का हाथ बंटाती हैं। वह कहती हैं कि कभी-कभी उन्हें रात के 11 बजे तक भी गार्डन में रुकना पड़ता है।
बिंदू का एक यूट्यूब चैनल भी है जिसके 64,000 से अधिक फॉलोअर्स हैं। बिंदु बताती हैं कि करीब दो साल पहले उन्होंने टेक फ्लोरा नाम से एक यूट्यूब चैनल शुरू किया था। वह कहती हैं, “यह प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है। मुझे यह जानकर बहुत खुशी होती है कि लोग वास्तव में उस कार्य की सराहना करते हैं जो हम करते हैं।”
वह मुस्कुराते हुए कहती हैं कि पैसे और लोकप्रियता से ज़्यादा खुशी उन्हें अपने फलते-फूलते बगीचे को देख कर मिलती है।
जोजो और बिंदु का फल और फूलों से भरा ये बगीचा अब कई शहरी बागवानों के लिए एक प्रेरणा बन गया है। इसके साथ ही यह इस सच्चाई को भी दर्शाता है कि समय और समर्पण के साथ छोटे से ज़मीन के टुकड़े पर पर भी फल और फूल उगाए जा सकते हैं। (thebetterindia)
वह उस पर बढ़ते चीनी प्रभाव की एक झलक भर है
-राकेश भट्ट
एक फ़ारसी कहावत है कि “आदम-ए खाबीदे फ़क़त रोयाये खुश मी बीनद न के खबर-ए खुश” यानी सोये हुए आदमी को मात्र सुन्दर सपने देखने को मिल सकते हैं, अच्छी ख़बरें नहीं. ईरान से आई यह खबर भी निश्चित तौर पर अच्छी नहीं कि उसने भारत को चाबहार-ज़ाहिदान रेल मार्ग निर्माण समझौते से बाहर कर दिया है.
चार साल पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 और 23 मई 2016 को दो दिवसीय ईरान यात्रा पर गए जहां उन्होंने ईरानी सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई, राष्ट्रपति हसन रूहानी एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मुलाक़ात की. इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच 12 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए. इनमें से सबसे महत्वपूर्ण समझौता आईपीजीपीएल [इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड] और ईरान के आर्या बनादर निगम के बीच चाबहार बंदरगाह के विकास और संचालन का था.
इसी अनुबंध से जुड़ा एक अन्य समझौता भारतीय सरकारी उपक्रम इंडियन रेलवेज कंस्ट्रक्शन लिमिटेड (इरकॉन) और ईरान के सड़क एवं रेल मार्ग विकास निगम (सीडीटीआईसी) के बीच हुआ. इस समझौते के तहत चाबहार से 628 किलोमीटर उत्तर में स्थित ज़ाहिदान तक और फिर वहां से होते हुए करीब 1000 किलोमीटर उत्तर-पूर्व ईरान-तुर्कमेनिस्तान के बार्डर पर स्थित सरख्स तक रेल मार्ग का निर्माण किया जाना था.
भारत के लिए इस रेलमार्ग के सामरिक महत्व का अंदाज़ा सिर्फ इस बात से ही लगाया जा सकता है कि सामान से लदे एक ट्रक को बेंगलुरु से दिल्ली पहुंचने में तीन से चार दिन लगते हैं जबकि गुजरात के पोर्ट से भेजा सामान नौ घंटे में चाबहार और वहां से तकरीबन 11 घंटों में काबुल पहुंच सकता था. इस लिहाज से यह समझौता तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और इस क्षेत्र के अन्य देशों में भारत के लिए व्यापार के सुनहरा द्वार खोलने जैसा था. मगर अफ़सोस!
भारत को इस समझौते से क्यों निकाला
बीती सात जुलाई को ईरानी परिवहन और शहरी विकास मंत्री मोहम्मद इस्लामी ने इस रेलमार्ग पर ट्रैक बिछाने की प्रक्रिया का उद्घाटन किया. द हिंदू अख़बार ने ईरानी अधिकारियों के हवाले से बताया है कि यह परियोजना मार्च 2022 तक पूरी हो जाएगी, और यह रेल मार्ग भारत की सहायता के बिना ही आगे बढ़ेगा. ईरान ने इसके पीछे की वजह परियोजना के लिए भारत से मिलने वाले फंड में हो रही देरी को बताया है.
यह सच है कि चार साल की इस अवधि में ईरान ने भारत से अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए लगातार आग्रह किया लेकिन भारत ने उसके आग्रह पर कोई ठोस कदम नहीं उठाये. भारत ने अपने वित्तीय वादों को पूरा न करके ईरान को इस समझौते को तोड़ने का एक बड़ा कारण तो दिया लेकिन ईरान के इस कदम के पीछे उसकी चीन के साथ बढ़ती निकटता और दोनों के बीच हुआ 25 साला संयुक्त आर्थिक और सुरक्षा समझौता भी है.
ईरान-चीन व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौता
जून 2016 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ईरान यात्रा की थी. इस दौरान उन्होंने ईरान के समक्ष एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी के तहत तेल, गैस एवं रक्षा क्षेत्र में निवेश का मसौदा रखा. इस निवेश की राशि इतनी आकर्षक थी कि ईरान के लिए चीन की पेशकश को ठुकरा पाना मुश्किल था. दोनों देशों ने इस मसौदे की शर्तों पर तेज़ी से काम करना शुरू कर दिया. अगस्त 2019 के अंत में ईरानी विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने अपनी चीन यात्रा के दौरान वहां के विदेश मंत्री वांग ली के साथ इस व्यापक साझेदारी का रोडमैप पेश किया.
इस समझौते के प्रारूप को दोनों देशों ने दुनिया से कभी भी छुपाकर नहीं रखा. पेट्रोलियम इकोनॉमिस्ट नामक ब्रिटिश थिंक-टैंक ने इस समझौते की जानकारी 2016 में प्रकाशित की तथा 11 जुलाई 2020 को अमरीकी समाचार पत्र न्यूयोर्क टाइम्स ने ईरान-चीन समझौते से सम्बंधित विस्तृत जानकारी छापी.
इस प्रस्तावित समझौते के तहत चीन ईरान में करीब 400 बिलियन डॉलर (करीब 32 लाख करोड़ रूपये) का निवेश करेगा जिसमे से 280 बिलियन डॉलर का निवेश ईरान के तेल और गैस क्षेत्र में किया जायेगा. इसके अलावा 120 बिलियन डॉलर सड़क, रेल-मार्ग, बंदरगाह तथा रक्षा सम्बन्धी क्षेत्रों में किया जायेगा.
इसके अलावा चीन ईरान में एयरपोर्ट, बुलेट ट्रेन जैसी हाई-स्पीड रेलवे और 5-जी दूरसंचार नेटवर्क के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण करेगा. चीन ईरान में अपने इस भारी भरकम निवेश को सुरक्षित रखने के लिए अपने 5,000 सैनिकों को भी तैनात करेगा.
ईरान-चीन समझौते का भारत पर प्रभाव
पहले डोकलाम में तनातनी और फिर लद्दाख सीमा पर आक्रामक सैन्य गतिविधियों के चलते यह तो स्थापित हो गया है कि चीन भारत का मित्र राष्ट्र नहीं है. दक्षिण एशिया में भारत का कद चीन को जरा भी नहीं भाता. इसलिए वह पश्चिम और उत्तर में पाकिस्तान द्वारा, पूरब में नेपाल और दक्षिण में श्रीलंका के जरिये भारत की घेराबंदी को अंजाम देना चाहता है. ईरान के साथ होने वाले समझौते के जरिये चीन अब भारत के प्रभुत्व और आर्थिक गतिविधियों को और भी हानि पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा.
चीन-ईरान के प्रस्तावित समझौते के एक अनुच्छेद के मुताबिक चीन को ईरान की हर रुकी या अधूरी पड़ी परियोजनाओं को दोबारा शुरू करने का प्रथम अधिकार होगा. यदि चीन इस विकल्प को चुनता है तो चाबहार बंदरगाह का प्रभावी नियंत्रण अपने हाथ में ले सकता है. इस बंदरगाह के नियंत्रण को यदि भारत चीन के हाथों खो देता है तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति के लिए यह बहुत ही अशुभ संकेत होगा. ऐसा होने पर भारत को पश्चिम एशिया से कच्चा तेल उन समुद्री मार्गों से लाना होगा जिनका नियंत्रण चीन के पास होगा.
चाबहार-ज़ाहिदान रेल-मार्ग निर्माण से भारत को हटाया जाना एक झटके में अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों को भारत की पहुंच से वंचित कर देना है. और यदि चीन चाबहार बंदरगाह को भी अपने नियंत्रण में लेता है तो इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है.
समझौते का पश्चिम एशिया के देशों पर प्रभाव
पश्चिम एशिया में ईरान, सऊदी अरब और इजराइल ही वे तीन देश हैं जिनका प्रभाव न सिर्फ इस क्षेत्र पर असर डालता है बल्कि इन तीनों के बीच के नाज़ुक संतुलन में रत्ती भर अंतर आने से समूचा विश्व अछूता नहीं रहता.
ईरान में इतने बड़े पैमाने पर चीनी निवेश के कारण सऊदी अरब और इजराइल की चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक है. ऊर्जा के क्षेत्र में 280 बिलियन डॉलर का चीनी निवेश निश्चित ही ईरान को तेल उत्पादन में सऊदी अरब से आगे ले जाने की क्षमता रखता है. साथ ही चीन और ईरान का सैन्य सहयोग क्षेत्र के संतुलन को ईरान के पक्ष में कर सकता है. पश्चिम एशिया में ईरान के बढ़ते वर्चस्व से इजराइल की चिंता और भी बढ़ सकती है. आर्थिक रूप से संपन्न और सैन्य शक्ति से लैस ईरान इस क्षेत्र में सऊदी अरब एवं इजराइल के प्रभुत्व को निश्चित तौर पर कमज़ोर कर सकता है.
अमेरिका और यूरोप पर प्रभाव
1979 के शुरुआत में हुई शिया इस्लामी क्रांति ने ईरान को यूरोप और अमेरिका से दूर कर दिया और तब से ही यह नया ईरान और विश्व का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका एक दूसरे के दुश्मन बन गए. 2015 में इन दोनों देशों की दुश्मनी थोड़ी थम गई जब अमेरिका समेत सयुंक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के पांचों देश और जर्मनी ने ईरान के साथ परमाणु समझौता किया. इसे जॉइंट कॉम्प्रेहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए) के नाम से जाना जाता है. लेकिन 2018 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एकतरफा तौर पर अमेरिका को इस समझौते से अलग कर दिया और ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए. इन प्रतिबंधों ने ईरान के अर्थतंत्र को तब बुरी तरह से प्रभावित किया जब ईरानी बैंकों को स्विफ्ट नाम के बैंकिंग प्रोटोकॉल से अलग कर दिया जिसके कारण दूसरे देशों से ईरान का व्यापार लगभग ठप्प हो गया.
अब ईरान-चीन के प्रस्तावित समझौते के तहत दोनों देश एक-दूसरे के देशों में अपने बैंकों की शाखाएं खोलेंगे. इस समझौते में इस तरह के अनुबंधों को शामिल किया गया है जो अमेरिकी मुद्रा के वर्चस्व के लिए खतरा बन सकता है. क्योंकि चीन और ईरान स्विफ्ट को दरकिनार करते हुए एक नए बैंकिंग प्रोटोकॉल के तहत पैसे का लेनदेन करेंगे जिसमे डॉलर नदारद होगा. यानी कि पश्चिम एशिया में चीन का आगमन अमेरिका के लिए नयी चुनौतियां लेकर आएगा.
ईरान के लिए नफा या नुकसान?
ईरान वह देश है जहां सरकार और नागरिक चरित्र एक-दूसरे के विपरीत रहा करते हैं. चाहे वह तब का ईरान हो जब वहां राजशाही थी या अब जब देश की शासन प्रणाली इस्लामी हो चली है.
ऐसे में इस समझौते को लेकर जहां ईरानी सत्ता खुश है कि देश की ध्वस्त होती अर्थव्यवस्था दोबारा परवान चढ़ेगी, वहीं ईरानी जनता इस समझौते में चीनी गुलामी की आहट सुनती है.
ईरानी सरकार और जनता दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही हैं. नज़दीक भविष्य में यह समझौता भले ही ईरान के लिए हितकारी हो लेकिन मित्रता के मुखौटे में छिपी चीनी सहायता उस शहद की तरह है जो मीठा तो है लेकिन कालांतर में वही मिठास हलाहल में तब्दील हो जाती है. क्या ईरानी शासक वर्ग चीनी निवेश से अफ़्रीकी देशों में उपजे संकट को नज़रअंदाज़ कर रहा है और सिर्फ नज़दीकी भविष्य की रौशनी को ही सूरज का अमर उजाला समझ बैठा है.
चीन की चांदी
इस समझौते में किसका कितना नुकसान होता है यह तो आने वाला भविष्य बताएगा लेकिन निश्चित तौर पर चीन अपने धनबल से बदलते विश्व में अपना वर्चस्व बनाने की और अग्रसर है.
समझौते के तहत निवेश के एवज में चीन को ईरानी तेल 30 फीसदी रियायती दरों पर मिलेगा जिसका भुगतान वह दो साल की अवधि के बाद करेगा जो विश्व में अब तक अनदेखा और अनसुना तेल समझौता है. और इस पैसे का भुगतान वह डॉलर में नहीं बल्कि अपनी मुद्रा युआन में करेगा जिसका उसके पास अथाह भण्डार है. यानी हर दृष्टि से लाभ ही लाभ.
चीन जिस अंदाज़ में मदद के नाम पर दूसरे देशों को अपना आर्थिक गुलाम बना रहा है उसका नज़दीकी उदाहरण हमारा पडोसी देश पाकिस्तान है. पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रान्त बलूचिस्तान में चीनी प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वहां ज़मीन की खरीद-फरोख्त बिना चीनी इजाज़त के नहीं हो सकती.
अप्रैल 2020 में तंजानियाई राष्ट्रपति जॉन मागुफुली ने चीन के 10 बिलियन डॉलर के ऋण को ठुकराते हुए कहा था कि चीनी ऋण की शर्तें अफ्रीका में नव उपनिवेशवाद को जन्म देती हैं. उन्होंने कहा कि “कोई नशे में मदमस्त शराबी ही मदद के एवज में चीनी शर्तों को स्वीकारेगा.”
क्या ईरानी सत्ता इसलिए चीन को खतरा नहीं मानती क्योंकि ईरान में शराब पर प्रतिबन्ध है!(satyagrah)
मध्यप्रदेश में एक आईपीएस अफसर का वीडियो चर्चा में है, चर्चा ये नहीं है कि वे लिफाफे लेते कैमरे में कैद हुए, मुद्दा ये है कि इतने लापरवाही, पकडे गए ? आखिर समाज और सत्ता ने क्यों रिश्वत को तोहफा मान लिया
-पंकज मुकाती
(राजनीतिक विश्लेषक )
आखिर मधु बाबू एक्सपोज़ हो गए। ऐसा क्यों हुआ ? एक मंझा हुआ तपा तपाया अफसर और ऐसी लापरवाही? इसे लापरवाही इसलिए कह रहा हूं क्योंकि लिफाफा तो अब सौहार्द का प्रतीक है। इस सौजन्यता को स्वीकारना अफसरी के बने रहने का एकमात्र रास्ता है। मध्यप्रदेश या किसी भी राज्य में अफसरशाही ऐसे ही लिफाफों पर ज़िंदा है। ये जो लिफाफा रेल है। बड़ी लम्बी है।
इसमें सवार होकर आप मुख्य सचिव तक पहुंच सकते हैं। ऐसा नहीं करेंगे तो किसी अकादमी में अफसरों की मेस का जिम्मा संभालते रहेंगे। फील्ड की तैनाती के लिए आपके पास लिफाफे की बड़ी योग्यता जरुरी है। जो जितने सयानेपन से ये लिफाफा एकत्रीकरण करेगा वो उतना समझदार कहलायेगा। सत्ता ऐसे लोगों को खुद तलाश लेती है। स्क्रैच एंड विन जैसी योजना है सरकारी ओहदे।
रिश्वत लेना-देना कोई बुराई रहा ही नहीं। पर इस तरह से पकडे जाने ने अफसर की बरसों की मेहनत पर पानी फेर दिया। वे सत्ता की नजर में एक वीडियो से उतर गए। चर्चा ये नहीं है कि एक आईपीएस रिश्वत लेते दिख रहा है। चर्चा ये है कि ऐसी लापरवाही रिश्वत भी ठीक से नहीं ले सके। वीडियो साढ़े तीन साल पुराना है। जब साहब उज्जैन में पदस्थ थे।
अफसरों में और आम लोगों में ये भी चर्चा का विषय है कि बड़े कमजोर निकला मधु बाबू का मेनेजमेंट। चार साल में वीडियो बनाने वाले को पूरी तरह सेट नहीं कर पाए। उसने अब वायरल कर दिया। कुछ लोग उन्हें साजिश आपसी रंजिश का शिकार बता रहे हैं। लोगों की सहानुभूति है बेचारे साहब, उलझ गए। तर्क है कि ये वीडियो उस वक्त के एक एसपी ने उनसे खुन्नस में बनाया। यानी इस बात से किसी को आश्चर्य, पीड़ा नहीं है कि एक नौकरशाह इस सुशासन वाली सरकार में ऐसे लिफाफे लेता है। क्योंकि सब इसे स्वीकार चुके हैं। ये सबसे खतरनाक है।
एक बात ये भी उठ रही कि कांग्रेस के कमलनाथ ने जिस अफसर को ट्रांसपोर्ट कमिश्नर बनाया, वे लिफाफे लेते कैमरे में कैद हुए। पर सवाल ये भी है कि वे कैमरे में कैद तो शिव राज में हुए। सरकारें किसकी है, इससे धनबल वालों की आस्था में कोई फर्क नहीं पड़ता।
दरअसल, मधु कुमार बाबू दीवार की एक खूंटी है इस वक्त बात करने के लिए। वैसे तो पूरी दीवार ही गन्दी है। वरना सत्ता और नौकरशाही के बीच सेतु ही लिफाफे बने हुए हैं। चतुराई से लिफाफे लेने और उसे आगे बढ़ाने वाले शाबाशी पाते हैं। पर मधु कुमार बाबू अब उस दौड़ में पिछड़ गए। आखिर पकडे जो गए। अब नई पौध को मौका मिलेगा। कोरोनाकाल में कई नए ऐसे काबिल, कमाऊ अफसर सामने आये हैं। सरकार की निगाहें हैं, उनपर जल्द सम्मानित भी होंगे।
ऐसे वीडियो तमाम अफसरों के लिए प्रेरणा साबित होंगे। सबक और मिसाल बनेंगे। वे इससे सीखेंगे कि क्या-क्या नहीं करना है। लिफाफे ऐसे नहीं लेना है। अफसरशाही के प्रबंधन में इसे हिदायत के साथ पढ़ाया जाएगा। अक्सर जब अफसरों को ये लगने लगता है कि पूरी दुनिया मुट्ठी में है, तब वे अपनी मांद से निकलकर ऐसे खुले में शिकार करने लगते हैं।
सरकार की सदशयता देखिये, मधु कुमार बाबू को सस्पेंड नहीं किया। भोपाल पुलिस मुख्यालय भेज दिया। आखिर भेजते भी कैसे। उनके ऊपर केंद्र के एक बड़े नेता का हाथ। प्रदेश में कांग्रेस-भाजपा दोनों सरकारों के कई राज़ उनके पास है। बहुत संभव है कि बड़ी सजा देने से दूसरे अफसर ठिठक जाते और लिफाफा कारोबार प्रभावित होता। कुल मिलाकर सत्ता के लिए 'मधु' मेह अच्छा है।
इलायची ..थोड़ी सी पड़ताल करिये। सोचिये पहले जो अफसर आय से अधिक संपत्ति या रिश्वत में पकडे गए। वो अब कहां हैं। सब आपको आपने आसपास किसी बड़े ओहदे पर ही मिलेंगे। आखिर एक बड़ा लिफाफा सारे दाग धो देता है।
दसवीं अनु सूची के अनुरूप गठित है मंत्रि-परिषद?
-देवेंद्र वर्मा
(पूर्व प्रमुख सचिव छत्तीसगढ़ विधानसभा
संसदीय एवं संवैधानिक विशेषज्ञ)
संविधान की दसवीं अनु सूची (दल बदल कानून) का उद्देश्य यह है कि कोई निर्वाचित जन प्रतिनिधि अपने व्यक्तिगत कारणों, लोभ, लालच छल कपट से सरकार को अस्थिर करने के उद्देश्य से अपने मूल राजनीतिक दल जिससे वह निर्वाचित हुआ है, की सदस्यता स्वेच्छा से न छोड़े। प्रावधान निम्नानुसार है।
"(पैरा 2 (1)(क) उसने ऐसे राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी है"
यदि कोई निर्वाचित जन प्रतिनिधि,उस राजनीतिक दल जिसकी विचारधारा,घोषणा पत्र,पर विश्वास प्रकट करते हुए,दल के कार्यक्रमों पर आस्था व्यक्त करके,जनता को लुभाते हुए,चुनाव लड़ता है, और फिर जितनी अवधि के लिए जनता ने उसे निर्वाचित किया है, बिना जनता को विश्वास में लिए स्वेच्छा से जिस राजनीतिक दल के टिकट पर जनता ने उसे निर्वाचित किया है उस राजनीतिक दल अर्थात विधान दल से त्याग-पत्र दे कर, विधान दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है, जिस जनता ने उस पर विश्वास व्यक्त किया,जनता के साथ विश्वासघात करते हुए, किसी अन्य राजनीतिक दल मैं सम्मिलित हो जाता है, जनादेश को परिवर्तित कर देता है और उसके एवज में वह मंत्री पद अथवा अन्य कोई लाभ प्राप्त करने वाला पद प्राप्त कर लेता है, तो क्या यह दल बदल कानून,उपरोक्त पैरा (2)(1)(क),उसके उद्देश्य और उसकी मूल भावना के विपरीत नहीं है?
क्या केवल इस कारण से कि वह पुनः चुनाव लड़ने वाला है, मूल पद को तिलांजलि देने और जनादेश प्राप्त सरकार को अपदस्थ करने जैसे जघन्य अपराध से मुक्ति पाने और मंत्री पद पर नियुक्त होने अथवा नियुक्त किए जाने की अधिकारिता रखता है?
क्या कोई राजनीतिक दल जो ऐसे दलबदलू को राजनीतिक लाभ के लिए मंत्री अथवा अन्य लाभ के पद पर नियुक्त करता है तो क्या राजनीतिक दल का ऐसा कार्य प्रजातंत्र, संसदीय प्रणाली, संविधान, की अवज्ञा और दसवीं अनु सूचि(दल बदल कानून) के उल्लंघन और इसके उद्देश्यों के विपरीत नहीं है ?
संविधान की दसवीं अनु सूची(दल बदल कानून) जब वर्ष 1985 में संविधान में संशोधन करते हुए सम्मिलित की गई तब संसद में सदस्यों द्वारा व्यक्त विचारों में सामंजस्य स्थापित करने के उद्देश्य से जहां किसी सदस्य द्वारा दल बदलने पर सदस्यता से निरर्हरित (disqualify)करने जैसा प्रावधान लागू किया गया, और विभाजन(split) की स्थिति के लिए दल बदल कानून में निरहरित(disqualify)करने की अधिकारिता विधानसभा अध्यक्ष को दी गई और उनसे यह अपेक्षा की गई कि वह कानून और नियमों का निर्वचन करते हुए निरहंरित(disqualify) करने के संबंध में निर्णय दे.
राजनीतिक दलों में विभाजन पर दल बदल कानून एवं निर्मित नियमों के आधार पर विधानसभा अध्यक्षों के निर्णय प्राय: विवाद के विषय बने और आए दिन न्यायालयों में चुनौती भी दी जाने लगी।
किंतु वर्ष 1985 के पश्चात अनुभव यह भी रहा कि अधिकतर विभाजन छोटे दलों में ही हुआ और विभाजन के पश्चात, विभाजित समूह को दूसरे दलों की सरकार में मंत्री पद से नवाजा गया अथवा मंत्री पद के समान ही लाभ प्राप्त करने जैसे पदों पर नियुक्त किया गया।
1985 में दल बदल कानून के लागू होने के पश्चात इसमें अनुभव की गई कमियों आदि पर विचार करने हेतु चुनाव सुधार पर अध्ययन एवं प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के लिए दिनेश गोस्वामी कमेटी की सिफ़ारिशें, तथा ला कमीशन की 170 वी रिपोर्ट 1999, भारत सरकार द्वारा वर्ष 2002 में संविधान की कार्य पद्धति को रिव्यू करने हेतु नियुक्त कमीशन ने भी दसवीं अनु सूची में विभाजन वाले पैरा को हटाने की अनुशंसा की।
उपरोक्त अनुशंसाओं के अनुरूप वर्ष 2003 में दसवीं अनु सूची को संशोधित करने हेतु लोकसभा में 97वां संशोधन विधेयक 5 मई 2003 को पूर:स्थापित(introduce) होने पर इसे प्रणव मुखर्जी के सभापतित्व में गठित संसद की स्थाई समिति को संदर्भित कर दिया गया।
इस समिति ने भी पैरा तीन को डिलीट करने की अनुशंसा के साथ-साथ यह भी अनुशंसा की कि यदि “सदन का कोई सदस्य दसवीं अनु सूची के पैरा दो के अंतर्गत सदस्यता के लिए निर्रहित हो जाता है।
{अर्थात उसने अपने
(क)मूल राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी है, अथवा
(ख)ऐसे राजनीतिक दल जिसका वह सदस्य है के किसी निर्देश के विरुद्ध पूर्व अनुज्ञा के बिना ऐसे सदन में मतदान करता है या मतदान करने से विरत रहता है और ऐसे राजनीतिक दल ने ऐसे मतदान या मतदान करने से विरत रहने की तारीख से 15 दिन के भीतर माफ नहीं किया है।}
(कृपया संविधान की दसवीं अनु सूची का संदर्भ लें)
तो इस प्रकार दसवीं अनु सूची के अंतर्गत निरर्हरित(disqualify)सदस्य संविधान के अनुच्छेद 164(1)ख के अनुसार निरर्हरित होने की तारीख से,प्रारंभ होने वाली तारीख से उस तारीख तक, जिसको ऐसे सदस्य के रूप में उसकी पदावधि समाप्त होगी या जहां वह ऐसी अवधि की समाप्ति के पूर्व यथा स्थिति किसी राज्य की विधानसभा के लिए या विधान परिषद वाले किसी राज्य के विधान मंडल के किसी सदन के लिए कोई निर्वाचन लड़ता है उस तारीख तक जिसको वह निर्वाचित घोषित किया जाता है इनमें से जो भी पूर्वोत्तर हो, की अवधि के दौरान खंड1 के अधीन मंत्री के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए भी निरहर्ररित(disqualify)होगा।
संविधान में 6 माह के लिए मंत्री पद पर नियुक्त करने के प्रावधानों के अंतर्गत भी ना तो उसे मंत्री पद पर नियुक्त किया जाए और ना ही सरकार में किसी अन्य रिमुनरेटिव (लाभकारी) पद पर नियुक्त किया जाए।
मंत्री पद पर नियुक्त नहीं किए जाने के साथ-साथ इस संभावना को सीमित करने के उद्देश्य से कि बिना किसी बंधन के मंत्रिमंडल का आकार ऐसे दलबदलूओं के कारण असीमित ना हो मंत्रिमंडल मैं मंत्रियों की संख्या को भी 15% रखने और छोटे राज्य जहां की संख्या 40,60 या 90 है, वहां कम से कम12 मंत्री, मंत्रिमंडल में सम्मिलित किए जाने की अनुशंसा की।
तत्कालीन विधि मंत्री श्री अरुण जेटली ने समिति की सिफ़ारिशो को स्वीकार करने का कथन कहते हुए संविधान में संशोधन का विधेयक समिति की अनुशंसा के साथ16 दिसंबर 2003 को लोकसभा में प्रस्तुत और पारित हुआ और पश्चात 18दिसंबर 2003 को राज्यसभा में प्रस्तुत और पारित हुआ जो भारत के राज पत्र में 91 वा संविधान संशोधन अधिनियम 2003, 2 जनवरी 2004 को भारत के राज पत्र में प्रकाशित होकर लागू हुआ।
इस विधेयक पर हुई चर्चा इसके उद्देश्य, संसद की मंशा आदि जानना इसलिए आवश्यक है, कि वर्तमान में राजनीतिज्ञों एवं राजनीतिक दलों का जो आचरण एवं व्यवहार देश की जनता देख रही है क्या वह वास्तव में विधेयक की शब्दावली, संसद मैं हुई चर्चा माननीय सदस्यों एवं माननीय विधि मंत्री जी द्वारा व्यक्त विचारों भावनाओं के अनुरूप है ?
इस संविधान संशोधन विधेयक पर लोकसभा एवं राज्यसभा में हुई चर्चा के कुछ महत्वपूर्ण अंश हूबहू स्वरूप में निम्नानुसार है:-
लोकसभा की कार्यवाही दिनांक 16 दिसंबर 2003 के अंश
Priya Ranjan Das Munshi:-
“...........in this parliament I defined defection in two categories- one is defection per se as per the statute and the other is deceptionThis legislation will give a wider scope that if a leader of a party resigned from that party joins another party it is also defection and if he does not get elected by the People's mandate he will not be considered as a Minister. Simply contesting election will not wash his whole sin or crime whatever it is.I agree it is good,you are giving the total emphasis on the mandate of the people,if the mandate of the people is the single criterion to honour the constitution then my submission to honorable minister of law and Justice is with due respect to the upper house here and the Council in States get the percentage of the legislators inducted in the ministry 15% or tomorrow you can further make it to 12% if there is a shortcoming.It should be done on the basis of the people elected by the people and not combining both the houses.Combining both the houses negates the very concept where you state that a member who resigns and joins other party cannot be considered as a member of council of minister and sworn in at the Rashtrapati Bhavan or the Governor house, unless he is elected. so elected by the people should be the basic criterion and if that is so in that case combining both the houses and deciding the strengths to determine the size of the Council of Ministers is not a correct approach……….”
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Shri Arun Jaitley: I am grateful to the hon. Member.Some other questions have been raised,and one questions which Members have repeatedly raised,which was asked to me in the end,as to what happens with regard to parties expelling their Members From the membership of the Political party.Now the provisions of the Tenth Schedule it self take care of that which is to the effect that the Tenth Schedule is triggered off or attracted only if somebody voluntarily relinquishes the membership of a political party.कोई अपनी मर्जी से वाल्यनटरली अपनी पार्टी की सदस्यता को छोड़ता है तभी संविधान के दसवे शेड्यूल के अंतर्गत प्रावधान उस पर लागू होते हैं। जो अपनी मर्जी से नहीं छोड़ता और जिसे पार्टी की तरफ से एक्सपेल कर दिया जाता है, एक्स्पल्शन की वजह से दसवाँ शेड्यूल अपने आप में अट्रैक्ट नहीं होता। इसलिए उसके ऊपर यह प्रावधान लागू नहीं होगा।……………………..
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राज्यसभा की कार्यवाही दिनांक 18 दिसम्बर के अंश:-
Shri Pranab Mukherjee; …………….But most important part of of this is the defection, and I do entirely agree with the Honorable minister that in the name of of expressing distant dissenting voice from the political parties or the leadership of the the political party this provision was used to to subserve self interest it was not in the question of the the dissent nobody prevents dissent no body can throttle dissent. What is Being prohibited is that you cannot take advantage of your elected strata being a member of a legislature either in the Assembly or in the The council or in Lok Sabha or or in Rajya Sabha and there after Express your decent. If you genuinely feel that you do not agree with the the views of the political party the most respectable course left to you would you resign from the party, you resign from the the membership and you seek the mandate on that Limited issue if a limited mandate could be obtained. ………………………………………….
One instance comes to to my mind immediately, when Mr Siddharth Shankar Ray was the the law minister of Dr B C Roy government of West Bengal he had differences with the Congress Party and he resigned immediately from the party,he resigned from the membership of the assembly and sought by-election and that is the normal democratic practice which we should have.Unfortunately we are not doing so therefore this is an attempt to prevent taking that advantage and power anxiety to eat the cake and at the same time have it.we have also suggested that it may happen that a Minister without being a member of either House for six months is being prohibited but the remunerative political office should also be. We suggested to the department, and thereafter the definition has come which we have incorporated in the report, the government has also accepted that. …………………………………………………..
SHRI ARUN JAITELY: :..........................................
One more question which was raised by some of the the Members as to whether this would also be applicable to Members who are expelled by political parties.The tenth schedule itself does not apply to Members who are expelled by political parties.The Tenth Schedule has triggered off only against a Member who voluntarily gives up the membership of a political party.If somebody voluntarily does not give up the membership of apolitical party.If somebody doesn't give up the membership of a political party and he is expelled by the political,the provisions of the Tenth Schedule Itself would be inapplicable in such case…………….
उपरोक्त संविधान की दसवीं अनु सूची के पैरा 2(1)(क),)(ख) संविधान के अनुच्छेद164(1B),एवं सदन में हुई चर्चा और विधी मंत्री के उत्तर के परिपेक्ष में विचारणीय यह है कि दल की सदस्यता स्वैच्छा से छोड़ने वाले सदस्यों को मंत्री पद पर नियुक्त किया जाना,अथवा लाभकारी पद पर नियुक्त करना संवैधानिक है?अथवा असंवैधानिक??
संदर्भ:-1 भारत का संविधान दसवीं अनुसूची एवं अन्य संबंधित अनुच्छेद
2 संविधान के 97 वेवा संशोधन विधेयक तथा उस पर लोकसभा में हुई चर्चा दिनांक 16 दिसंबर 2003 तथा राज्यसभा में हुई चर्चा दिनांक 18 दिसंबर 2003
दयानिधि
शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने लोगों के माध्यम से भारी मात्रा में वातावरण में जारी होने वाली नाइट्रोजन के प्रभाव का मूल्यांकन किया है। मूल्यांकन के इस काम में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन भी शामिल थे। हर साल वातावरण में जारी होने वाली इस नाइट्रोजन का पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
नाइट्रोजन का उपयोग नाइट्रिक एसिड, अमोनिया बनाने में होता है। अमोनिया से उर्वरक, नायलॉन, दवाओं और विस्फोटकों का उत्पादन किया जाता है।
जैसा कि शोधकर्ताओं ने बताया, पर्यावरण में जारी मानव-संबंधित नाइट्रोजन की मात्रा पिछले कई दशकों से लगातार बढ़ रही है। वायुमंडल में बहुत सी गैसे पहले से ही है, नाइट्रोजन की मात्रा के बढऩे से लोगों का जीवन खतरे में आ गया है। यह शोध पत्र नेचर फूड नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
इस नए प्रयास में, शोधकर्ताओं ने वातावरण में जारी नाइट्रोजन की मात्रा को मापने का प्रयास किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि हम ग्रहों की सीमा (प्लेनेटरी बाउंड्री) के कितने करीब आ रहे हैं। ग्रहों की सीमा (प्लेनेटरी बाउंड्री) एक अवधारणा है जिसमें पृथ्वी में होने वाली प्रक्रियाएं पर्यावरणीय सीमाओं के अंदर होने की बात कही गई है। ग्रहीय सीमाएं स्पष्ट रूप से वैश्विक स्तर के लिए डिज़ाइन की गई हैं। इसका उद्देश्य औद्योगिक क्रांति से पहले मौजूद सुरक्षित सीमाओं के भीतर पृथ्वी को बनाए रखना है। बहुत ज्यादा नाइट्रोजन हानिकारक हो सकती है क्योंकि इसमें से कुछ नाइट्रेट्स के रूप में उत्सर्जित होते हैं, जो जल प्रदूषण के लिए जाने जाते है। इसमें से कुछ को अमोनिया के रूप में भी उत्सर्जित किया जाता है, जो एक ग्रीनहाउस गैस है। नाइट्रोजन पानी में बहकर पानी के स्रोतों तक पहुच जाता है, जिससे वहां अधिक मात्रा में शैवालों को उगने में मदद कर सकती है जो उस क्षेत्र में रहने वाले अन्य सभी प्राणियों के लिए खतरनाक है। मनुष्य विभिन्न स्रोतों के माध्यम से नाइट्रोजन का उत्सर्जन करते हैं, जिनमें उर्वरक के रूप में इसका छिडक़ाव, सीवेज उपचार संयंत्रों, बिजली संयंत्रों और अन्य उद्योग शामिल है। नाइट्रोजन उत्सर्जन के लिए सबसे बड़ी पशुधन श्रृंखला जिम्मेदार है। पशुओं को खिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले भोजन को उगाने के लिए फसल पर भारी मात्रा में नाइट्रोजन युक्त उर्वरक डाला जाता है। उनकी खाद से भारी मात्रा में नाइट्रोजन निकलती है।
शोधकर्ताओं ने अकेले पशुधन श्रृंखला पर अपने प्रयासों को केंद्रित किया। दुनिया भर के आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद, उन्होंने गणना की कि पशुओं की वजह से हर साल 65 ट्रिलियन ग्राम नाइट्रोजन पर्यावरण में फैल रही है। यह वह संख्या है जो ग्रह की सीमा (प्लेनेटरी बाउंड्री) के लिए तय की गई गणना से अधिक है।
उन्होंने यह भी पाया कि पशुधन श्रृंखला पर्यावरण में जारी मानव-संबंधित नाइट्रोजन का लगभग एक-तिहाई हिस्से के लिए जिम्मेदार है। शोधकर्ताओं ने भविष्य में आपदा को रोकने के लिए नाइट्रोजन उत्सर्जन को कम करने पर जोर दिया है। (dw.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राजस्थान के राजनीतिक दंगल ने अब एक बड़ा मजेदार मोड़ ले लिया है। कांग्रेस मांग कर रही है कि भाजपा के उस केंद्रीय मंत्री को गिरफ्तार किया जाए, जो रिश्वत के जोर पर कांग्रेसी विधायको को पथभ्रष्ट करने में लगा हुआ था। उस मंत्री की बातचीत के टेप सार्वजनिक कर दिए गए हैं। एक दलाल या बिचैलिए को गिरफ्तार भी कर लिया गया है।
दूसरी तरफ यह हुआ कि विधानसभा अध्यक्ष ने सचिन पायलट और उसके साथी विधायकों को अपदस्थ करने का नोटिस जारी कर दिया है, जिस पर उच्च न्यायालय में बहस चल रही है। पता नहीं, न्यायालय का फैसला क्या होगा लेकिन कर्नाटक में दिए गए अदालत के फैसले पर हम गौर करें तो यह मान सकते हैं कि राजस्थान का उच्च न्यायालय सचिन-गुट के 19 विधायकों को विधानसभा से निकाल बाहर करेगा। यह ठीक है कि सचिन का दावा है कि वह और उसके विधायक अभी भी कांग्रेस में हैं और उन्होंने पार्टी व्हिप का उल्लंघन नहीं किया है, क्योंकि ऐसा तभी होता है जबकि विधानसभा चल रही हो।
मुख्यमंत्री के निवास पर हुई विधायक-मंडल की बैठक में भाग नहीं लेने पर आप व्हिप कैसे लागू कर सकते हैं ? इसी आधार पर सचिन-गुट को दिए गए विधानसभा अध्यक्ष के नोटिस को अदालत में चुनौती दी गई है। कांग्रेस के वकीलों का तर्क है कि दल-बदल विरोधी कानून के मुताबिक अध्यक्ष का फैसला इस मामले में सबसे ऊपर और अंतिम होता है। अभी अध्यक्ष ने बागी विधायकों पर कोई फैसला नहीं दिया है। ऐसी स्थिति में अदालत को कोई राय देने का क्या हक है ? इसके अलावा, जैसा कि कर्नाटक के मामले में तय हुआ था, उसके विधायकों ने औपचारिक इस्तीफा तो नहीं दिया था लेकिन उनके तेवरों से साफ हो गया था कि वे सत्तारुढ़ दल के साथ नहीं हैं यानि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। यदि यह तर्क जयपुर में भी चल पड़ा तो सचिन पायलट-गुट न इधर का रहेगा न उधर का !
यदि अदालत का फैसला पायलट के पक्ष में आ जाता है तो राजस्थान की राजनीति कुछ भी पल्टा खा सकती है। जो भी हो, राजस्थान की राजनीति ने आजकल बेहद शर्मनाक और दुखद रूप धारण कर लिया है। मुख्यमंत्री गहलोत के रिश्तेदारों पर आजकल पड़ रहे छापे केंद्र सरकार के मुख पर कालिख पोत रहे हैं और इस आरोप को मजबूत कर रहे हैं कि भाजपा और सचिन, मिलकर गहलोत-सरकार गिराना चाहते है। इतना ही नहीं, करोड़ों रु. लेकर विधायकगण अपनी निष्ठा दांव पर लगा रहे हैं। वे पैसे पर अपना ईमान बेच रहे हैं। क्या ये लोग नेता कहलाने के लायक हैं ?
भाजपा-जैसी राष्ट्रवादी और आदर्शोन्मुखी पार्टी पर रिश्वत खिलाने का आरोप लगानेवालों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए और यदि ये आरोप सच हैं तो भाजपा का कोई भी नेता हो, पार्टी को चाहिए कि उसे तत्काल निकाल बाहर करे और वह राजस्थान की जनता से माफी मांगे। (nayaindia.com) (नया इंडिया की अनुमति से)
-मृणाल पाण्डे
फ्रांसीसी कहावत हैः चीजें जितनी बदलती हैं, उतनी ही पहले जैसी होती जाती हैं। 2019 में बीजेपी ने लोकसभा चुनावों में भारी जीत दर्ज कराई। पर इस बीच जिन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बहुमत मिला था, उनको भी मौका पाते ही उसने धर दबोचा। नतीजतन बहुमत के बावजूद गोवा या गुजरात में उसकी बजाय भाजपानीत सरकारें बन गईं। कुछ शपथ लेकर राज-काज संभाल चुकी राज्य सरकारें (कर्नाटक, मध्य प्रदेश की) सामदाम-दंड-भेद से गिरा दी गईं। अभी भी कुछ गिरने की कगार पर बताई जा रही हैं (राजस्थान, महाराष्ट्र)। बंगाल, बिहार के चुनाव सर पर हैं, उनके नतीजे और उन नतीजों के बाद के नतीजे देखना राजनीतिशास्त्र के अध्येताओं के लिए काफी रोचक रहेगा।
कोविड का डरावना असर भी हमारी चुनावी राजनीति का चाल, चरित्र, चेहरा और चिंतन नहीं बदल सका है, इसके दो दुखद उदाहरण हैं: मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में जाने और अब राजस्थान में बगावती तेवर देखते हुए राज्य के पार्टी प्रमुख और उपमुख्यमंत्री- जैसे दो महत्वपूर्ण पदों से सचिन पायलट का यकायक हटाया जाना। अब तक एक स्थापित परंपरा बन चली है कि अक्सर चुनावी नतीजों से राज्यवार जिस दल की सरकार और उसके वादों के मुताबिक जैसे आमूलचूल बदलाव की गणनाएं टीवी के पंडित लगाते हैं, वह अक्सर फलीभूत नहीं होते।
कोविड के बीच भी खास तौर से बुक किए विमानों से जो कल के आयाराम थे, किसी रिसॉर्ट ले जाए जाते हैं जहां से राजकचोरी खाकर वे गया राम बन कर निकलते हैं और बिना सुर ताल के कल तक अपनी मातृ पार्टी रही संस्था के सार्वजनिक बखिये उधेड़ने लगते हैं। मध्य प्रदेश में यह मंजर सबसे साफ दिखा, जहां कोविड के बढ़ते सायों के बीच भी काबीना की बनवाई अटकी रही, जब तक कोई टाइगर एक अभयारण्य का वरदहस्त त्याग कर दूसरे अभयारण्य में जाकर पुराने रखवालों के खिलाफ जम कर न दहाड़ने लगा।
अब तक बंगाल में दीदी ने अपने तृणमूल दल को और केरल में विजयन ने सत्ता में मार्क्सवादी गठजोड़ को कस कर जमाए रखा है। असम में पूर्ण बहुमत रखने वाली बीजेपी भी कांग्रेस के लंबे शासन को हटा कर सत्ता में डटी दिखती है। लेकिन कल तक कांग्रेस में रहे उसके शीर्ष नेता पुराने आजमूदा हथकंडों से विपक्षी दल हिलवा कर हिमालयी राज्यों पर केंद्र की जकड़बंदी को और भी सख्त बनाने में जुटे हैं। कोविड की मार न होती तो नागरिक रजिस्टर का विभेदकारी मुद्दा भी जोरों से धुकाया जाता, इसमें संशय नहीं।
उधर, गैर बीजेपी राज्य सरकारों में ईमानदार अंतर्मंथन से सूबे के भीतरी झगड़े समय पर भीतर ही सुलझाने की इच्छा और क्षमता चिंताजनक तौर से कम दिख रही है। ‘जे बिनु काज दाहिने बाएं’ हिसाबी-किताबी किस्म के विश्लेषक जो कहें, शीर्ष पर दो बड़ी पार्टियों के सनातन झगड़ों के बीच राज्यस्तर पर कई महत्वपूर्ण फैसले सलट नहीं पा रहे।
कोविड से जूझने और प्रवासी मजदूरों को अन्न-धन देने की योजनाएं बिना राज्य सरकारों को भरोसे में लिए अगला चुनाव जीतने की नीयत से बनाई जा रही हैं और पुलिस की दमनकारिता को शह देकर जनता की छटपटाहट को लोकतांत्रिक आवाज नहीं मिल रही। सत्ता की मलाई कुछेक केंद्र के चहेते राज्यों के दल और उनके वे एकछत्र नेता काट रहे हैं, जिनके तेवर दिल्ली का मुख देखकर हर पल बदलते रहते हैं।
यह बात सब मानते हैं कि अगले क्षेत्रीय चुनावों में दोनों राष्ट्रीय दलों को मुंह में तिनका दबा कर ताकतवर क्षेत्रीय दलों और उनके वोटों के सौदागरों से चुनावी गठजोड़ के लिए चिरौरी करनी होगी। यह भी नितांत संभव है कि कुछ क्षेत्रीय दल जनता पार्टी युग में लौट कर चुनाव आते-आते अपने ही बीच से किसी एक क्षेत्रीय क्षत्रप को केंद्रीय धुरी बना कर राष्ट्रीय चुनावों में अपना चूल्हा अलग सुलगाने की तैयारी करने लगें।
जब वैचारिकता का राजनीति में चौथा उठाला हो चुका हो तो कैसे वैचारिक मतभेद, कैसे वैचारिक विभाजन? अस्सी पार के अभी भी दमखम वाले शरद पवार इस आशय की बात कह भी चुके हैं कि केंद्र को बड़ी चुनौती देने के लिए सभी विपक्षी दलों को जल्द से जल्द अपना संगठन बना लेना चाहिए।
उत्तर कोविड काल में बीजेपी के प्रचारक प्रकोष्ठ हालांकि शीर्ष नेता की चुनावी पकड़ एकदम पक्की होने का दावा कर रहे हैं, पर 2014 या 2019 की बीजेपी अब पुरानी तहरीरों, सीमा की सुरक्षा के लिए एकजुट होकर देश बचाने के नारों के बीच रंगारंग वक्तृता से जनता को दोबारा उसी तरह रिझा सकेगी इसमें संशय है। थैलियां चाहे जितनी बड़ी हों, कोविड संक्रमण के डर से रैलियां पहले की तरह करना नाममुकिन हो गया है।
दुनिया की आर्थिक हालत खस्ता है और चीन तथा अमेरिका- दो महाशक्तियों के बीच शीतयुद्ध का तनाव गहरा रहा है। चीन का सामूहिक हुक्का-पानी बंद करने का नारा आकर्षक भले हो, पर आसान नहीं। पुरानी चुनावी रैलियों में बीजेपी ने भरोसा दिलाया था कि जैसे-जैसे नई अर्थव्यवस्था और विदेशी निवेश रंग लाएंगे शहरी उद्योगों का विकास होगा, ग्राम समाज की अंधविश्वासी और प्रतिगामी सामाजिक परंपराएं टूटेंगी, खेती की बजाय उद्योग-धंधे आर्थिक धुरी बन जाएंगे। महिलाएं तरक्की करती हुई हर क्षेत्र में पैठ बनाएंगी।
जब लिंग, जाति, क्षेत्र वगैरा के भेदभाव कम होंगे तब सारे समाज में एक नई रोशनी आएगी। बड़ी आर्थिक क्रांति के बाद सामाजिक क्रांति तो खुद-ब-खुद हो जाया करती है इसलिए हम चीन की टक्कर की एशियाई ताकत बन कर उभरेंगे। लेकिन पिछले चार महीनों में हमने इस सपने को धुंधलाते देखा है। देशों के बीच नस्लवादी आर्थिक गुटबंदियां या सोच और सदियों पुरानी साम्राज्यवादी परंपराओं की जड़ें आसानी से नहीं खत्म होतीं।
कई बार ऊपरी छंटाई के बाद बदलाव का भ्रम बन जाता है। कोई बड़ी चुनौती सामने आई नहीं, कि पुरानी सांस्कृतिक जड़ें फिर फुनगियां पत्ते फेंकने लगती हैं: वही श्वेत-अश्वेत टकराव, चीन की वही पड़ोसी सीमा को पार कर जमीन हथियाने की साम्राज्यवादी आदत और यूरोप बनाम मुस्लिम विश्व के सदियों पुराने राग-विराग। घर भीतर देखें तो यहां भी वही मंदिर, मंडल, वही सरकारी खजाने खाली कराने और सरकारी बैंकों को दिवालिया कराने वाली सब्सिडियां, वही लैपटॉप, मिक्सी, टीवी और मुफ्त अनाज का बेशर्म वितरण फिर हो रहा है। विधायकों को रिसॉर्ट भेजकर जबरन तोड़ने की कोशिशें भी जारी हैं।
शंकराचार्य ने कहा था- ब्रह्म ही सच है, जगत मिथ्या है। भारत में भी लगता है चुनाव ही सच है, कोविड और गरीबी मिथ्या। उज्जवला योजना, बेटी पढ़ाओ सरीखी योजनाओं के गुब्बारों से रीझी महिलाओं के सघन वोट बैंक को साम-दाम से समेट कर बीजेपी दूसरी पारी जीत गई और केरल में भी लाल किताब के बाहर जाकर खालिस भारतीय सुपरस्ट्रक्चर के एझवा-ईसाई-नायर-लीगी जैसे वोट बैंकों का महत्व मार्क्सवादी सर माथे रख कर सत्ता में आ गए।
रही मुस्लिम वोट बैंक की बात। बीजेपी तो उसका मोह-छोह कबका त्याग चुकी है। पर मुसलमान क्या सोचता है? खासकर काश्मीर के विभाजन और मंदिर मसले पर सरकारी पक्ष की जीत के बाद? इस पर शेष दलों की नजर है। आजादी के बाद कुछ दशकों तक जो मुसलमान क्रांति कामना रखता था, कम्युनिस्ट बन जाता था। लेकिन नाना थपेड़े खाकर अब वह राज्यवार अलग-अलग तरह से नए भावताव की सोच रहा है।
देश में जिन शब्दों का पिछले दो सालों में सबसे ज्यादा अवमूल्यन हुआ है, धर्मनिरपेक्षता उनमें से एक है। शाब्दिक स्तर पर जिन दलों ने धर्मनिरपेक्ष राजनीति अंगीकार की भी हुई है, जैसे कि जेडीयू, मुसलमान पाता है कि वह उनके राजकाज को कोई आंतरिक धार्मिक संतुलन नहीं देती। न ही उसकी प्रशासकीय मशीनरी में सेक्युलर कर्तव्य का बोध कराती है जो केंद्र से भिन्न हो।
चुनाव आता है तो धर्म की बातें करने वाले भी धर्म के नाम पर कुछ स्वयंभू किस्म के साधु-साध्वियों की अनकहनी बातों को खंडित करने की बजाय हर मंच पर उनकी मौजूदगी सनिुश्चित करने लगते हैं। संगीन आतंकी हमलों के चार्जशीटेड अपराधियों को नई जांच बिठा कर मुक्त करवा दिया गया है, जबकि कई उदारवादी समाजसेवी एकदम पोच किस्म के मुकदमों में फंस कर सलाखों के भीतर हैं।
कुल मिलाकर हमारी महत्तर राजनीति कभी योग और कभी (उप)भोग के रूपों को हिंदुत्ववादी भाषा से जोड़ कर जाहिर कर रही है कि उसे सचमुच के धर्म की गहरी समझ कतई नहीं है। धर्म और धर्मनिरपेक्षता दोनों की सारी बुराइयां चुनावी फायदे के लिए हमारे राजनीतिक दल बेशर्मी से अंगीकार करने लगे हैं। असली मूल्य इतनी बुरी तरह से परे कर दिए हैं कि जब राहुल गांधी सत्यनिष्ठा और अहिंसक आंदोलनों का ज़िक्र करें तो उनकी खिल्ली उड़ाई जाती है और जब अनुराग ठाकुर देश के गद्दारों का विवादास्पद नारा उठाते हैं तो उसे कानून का उल्लंघन नहीं माना जाता, उल्टे उसकी प्रतिध्वनियां गली-कूचों में जल्द ही गूंजने लगती हैं।
यही सब देख-समझ कर अल्पसंख्य समुदायों और दलितों की प्राथमिकता फौरी तौर से ही सही, अपने जान-माल की सुरक्षा और बीजेपी को सत्ता से दूर रखने की सामर्थ्यवाली क्षेत्रीय पार्टी की मदद करने की बन चली है। केंद्र में विपक्षी गठजोड़ को सत्ता में लाने का सपना देखने वालों के आगे जनता का ईमानदार सवाल यह है कि क्या वे इस बात का ठोस सबूत दे सकते हैं कि आने वाले समय में राष्ट्रीय दलों का क्षेत्रीय दलों से समन्वय बन गया, तब ऐसे समय में विपक्षी गठजोड़ क्षेत्रीय और राष्ट्रीय हितों का एक धड़कता हुआ प्राणवान समन्वय किस तरह कायम कर सकेगा?(navjivan)
हमारे देश में बेचने-खरीदने वाले का धंधा कोरोना काल में भी जोरों पर है। इसमें इतना उछाल आया हुआ है कि कामधंधे भले चौपट हो गए मगर सेंसेक्स ऊपर और ऊपर और ऊपर ही चढ़ता जा रहा है। मैंने सेंसेक्स को दोस्त समझकर कहा कि ए, ताऊ, इस हालत में तो इतना ऊपर मत जा, गिरेगा तो तेरे कलपुर्जे भी नहीं मिलेंगे। उसने कहा, ‘अबे हट, बे कलमघिस्सू। तू क्या जाने हमारा खेल! तूने तो कभी एक पैसा भी शेयर बाजार में नहीं लगाया है।कायर कहीं के, बुझदिल, मुझे शिक्षा देता है! तेरी ये मजाल! तू है क्या चीज।आदमी का चोला पाकर तू मुझसे भिडऩे आया है। तू समझता है, तू मुझसे ताकतवर है? बेट्टा मेरे सामने पूरा बाजार, सारे मंत्री-प्रधानमंत्री शीश नवाते हैं जबकि तेरे ऊपर गली का खजेला कुत्ता भी भोंकने को भी तैयार नहीं होगा। जा पहले गंदे नाले के पानी में अपनी शकल धोकर आ, फिर आकर बात करना। हट जा, मेरी नजरों के सामने से वरना तेरा कत्ल कर दूँगा।
क्यों रे गधे, जब देश बेचनेवाले, देश बेच रहे हैं। बेच-बेच कर एमएलए, मंत्री और सरकारें खरीद रहे हैं, तब तू मुझसे कह रहा है, ज्यादा उछल मत। क्यों नहींं उछलूँ? तुझसे पूछ कर उछलूँगा क्या? और नीचे धड़ाम से गिरा भी तो तेरे पिता श्री का क्या जाता है बे। तू अपने काम से काम रख।
सही कहा, ताऊ तुमने। मैं क्षमा माँगता हूँ। क्षमा बडऩ को चाहिए, छोटन को उत्पात। इतना कह कर मैंने मामला शांत करना चाहा।यह सुन कर उसने कहा, अबे ये कौनसी छोटन-बडऩ भाषा बोल रहा है, हिंदी बोल, हिंदी। अंग्रेजी आती हो तो अंग्रेजी बोल।
खैर मैंने किसी तरह राम-राम करते मामला सुलझाया। संकट टलने के पंद्रह मिनट बाद दिमाग थोड़ा शांत हुआ तो सोचा, वाकई ताऊ सही कह रह था। जब बेचनेवाले बैंक बेच रहे हैं, बीमा कंपनियाँँ बेच रहे हैं, तेल कंपनियाँ, विमान सेवा, हवाई अड्डे, ओनजीसी, भारतीय रेल बेच रहे हैं। एयर इंडिया न बिके तो लोहेलंगर के भाव बेचने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे मैं भी सेंसेक्स बेचारा न उछले तो क्या सुस्त पड़ा रहे?
अरे जब एक सुपर स्टार तेल से लेकर ऐप तक सबकुछ बेच चुका और अभी भी उसका बेचने का हौसला बुलंदी पर है तो सेंसेक्स क्यों मृतप्राय: रहे? अभी वह कोरोना पॉजिटिव हो गया तो इसे भी उसने एक प्राइवेट अस्पताल का विज्ञापन करके भुना लिया। नाम और कमा लिया, नामा इसी से मिलेगा। किसी ने कभी सोचा था कि बेचने वाला स्टार अगर कोरोना पाजिटिव भी हो जाए तो घबराता नहीं, इसे भी बेच देता है! यह पक्का है कि अस्पताल से बाहर आकर, वह कोरोना से लडऩे का अपना ‘साहस’ भी ऊँची कीमत में बेचेगा।इस बीच कोरोना का टीका बन गया तो उसे भी बेचेगा। कोरोना का ब्रांड एंबेसडर वही बनेगा। प्रधानमंत्री की ‘उज्ज्वल छवि’ उसने पहले भी बेची है अब और भी जोरशोर से बेचेगा।
कहानी इन दो पर ही खत्म नहीं होती। क्रिकेट खिलाड़ी तो सरेआम बिकते हैं। फिर उनकी कैप, उनकी शर्ट, उनकी पैंट के घुटने भी बिकती है। बल्ला भी बिकता है।खेल का मैदान भी बिकता है। फिर तरह -तरह के सामान बेचना रह जाता है, तो उसे भी ये खिलाड़ी बेचने लगते हैं। ‘भारतरत्न’ पा जाएँ तो भी ईश्वर की कृपा के वशीभूत होकर ये बेचते रहते हैं।
अभी कुछ युवा कांग्रेसी नेताओं ने भाजपा को अपनी धर्मनिरपेक्षता आस्था बेच दी और सांप्रदायिकता खरीद ली। साथ में राज्यसभा की सीट भी हासिल कर ली। इतना ही नहीं, अपनों को अपने राज्य में मंत्री पद दिलवाकर, अब खुद भी केंद्र में मंत्री बनेंगे। फिर न जाने क्या-क्या खरीदेंगे-बेचेंगे। गैरभाजपाई नेता और एमएलए तो भाजपा मंडी में थोक के भाव खरीदती है। सुनते हैं कि हर विधायकी की कीमत तीस-पैंतीस करोड़ तक है। पचास करोड़ भी हो सकती है और एक राजस्थानी नेता तैयार बैठे हैं। जीवनभर में भी जितनी काली कमाई नहीं होती, वह एक झटके में हो जाती है।ईमान ही तो बेचना होता है, मतदाताओं को धोखा ही तो देना होता है। ईमान कोई कीमती चीज तो है नहीं, दस रुपये के नोट बराबर इसकी वैल्यू है। और धोखा देना तो खैर आज की राजनीतिक शैली है।
खरीदनेवाले में यह आत्मविश्वास होता है कि सबकुछ खरीदा जा सकता है। यह दुनिया एक बाजार के सिवाय कुछ नहीं है। यहाँ न्याय भी खरीदा जा सकता है, गवाह, वकील, जज भी। धर्म, ईमान, इंसानियत सब खरीदे जा सकते हैंं। उन्हें ताज्जुब होता है कि इस दुनिया में ऐसा भी कुछ होता है, जो बिकशनशील नहीं होता, जो खरीदा नहीं जा सकता! उधर जो जितनी जल्दी बिक जाता है, जितनी जल्दी ऊँची सीढिय़ाँ चढ़ जाता है, वह उतना ही ज्यादा गरीबों का हमदर्द होने की घोषणाएँ भी करता रहता है। खुद गरीबी से, पिछड़ी जाति से आने की मुनादी इतनी बुलंद आवाज में करता है कि दूसरे किसी की आवाज सुनाई नहीं देती।वह सत्ता को खरबपतियों को बेच कर आराम से 18-18 घंटे सोता है। वह सोने को ही जागना घोषित कर देता है। हाँ जब कोई अडाणी-अंबानी मोबाइल पर उसे याद करता है तो आधी रात को भी जी सर, कहते-कहते बिस्तर से उठकर खड़ा हो जाता है। जी, जी बस हो गया आपका काम।सुबह हम बेच देंगे, शाम को आप खरीद लेना। नमस्ते-नमस्ते, गुडनाइट, गुडनाइट।
-विष्णु नागर
(इस साल के अंत में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर दरभंगा की रहने वाली पुष्पम प्रिया चौधरी ने विज्ञापन के जरिए खुद को बिहार के मुख्यमंत्री पद की प्रबल दावेदार बताया था। पुष्पम प्रिया ने कुछ समय पहले ‘प्लूरल्स’ नाम के एक राजनीतिक दल के गठन का ऐलान किया था और खुद को प्रदेश के मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया। पुष्पम प्रिया चौधरी दरभंगा की रहने वाली हैं और उन्होंने लंदन से अपनी पढ़ाई पूरी की है। उनके पिता विनोद चौधरी जेडीयू के वरिष्ठ नेता हैं और एमएलसी रह चुके हैं. पुष्पम प्रिया ने जनसंपर्क अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिला नालंदा से की। जनसंपर्क अभियान की शुरुआत करने के दौरान पुष्पम प्रिया चौधरी ने फेसबुक पर लिखा, उनकी पार्टी ‘प्लूरल्स’ की योजना बहुत स्पष्ट है -अंतरराष्ट्रीय ज्ञान और जमीनी अनुभव की साझेदारी ताकि कृषि क्रांति, औद्योगिक क्रांति और नगरीय क्रांति की नई कहानी लिखी जा सके। (यह जानकारी ‘आजतक’ से) -संपादक, ‘छत्तीसगढ़’)
-पुष्य मित्र
इन दिनों पुष्पम प्रिया चौधरी का नाम सोशल मीडिया में तेजी से फैल रहा है। इस कोरोना काल में भी वह पूरे बिहार में घूम रही हैं, हर इलाके की प्रमुख समस्या को उठा रही हैं। वे जिन मुद्दों को लेकर सोशल मीडिया को लेकर मुखर हैं, वे बिहार के विकास से संबंधित जरूरी सवाल हैं। कई लोग उनमें विकल्पहीन होती बिहार की राजनीति के लिए एक सकारात्मक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं।
उनकी यात्राओं से संबंधित पोस्ट देखता हूँ तो मुझे एक रिपोर्टर के तौर पर 2015 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव की गई अपनी यात्राएं याद आती हैं। इनमें से ज्यादातर जगहों पर मैं इस दौरान जा चुका हूँ। बिहार के जो कुछ चुनिंदा घुमंतू रिपोर्टर हैं, वे इन जगहों पर जाते रहते हैं, अपने सीमित संसाधनों में। मगर उनकी कैमरा टीम काफी प्रोफेशनल है, इसलिये उनकी यात्राओं की तस्वीरें काफी प्रभावशाली दिखती हैं।
मगर पुष्पम प्रिया रिपोर्टर नहीं हैं, वे टीवी जर्नलिस्ट भी नहीं हैं। वे राजनीति करने आई हैं और राजनीति में जरूरी मुद्दों की समझ होना काफी नहीं है। यह तो राजनीति का पहला अध्याय है। मुद्दों की समझ के साथ साथ राजनेताओं को इन मुद्दों के लिये संघर्ष करना और संघर्ष के साथियों की टीम बनाना जरूरी होता है। लोग यह भी देखना चाहते हैं कि आपमें समझ के साथ-साथ बदलाव की क्षमता है कि नहीं। बदलाव कैसे आएगा यह विजन है कि नहीं। इस लिहाज से अभी उन्हें काफी काम करना है।
हां, यह कहा जा सकता है कि उनकी शुरुआत सही है। हालांकि इसके बदले यह कहा जाना चाहिए कि उनकी रिसर्च टीम अच्छी है, उनके प्रेजेंटर अच्छे हैं, उनका विजुअल प्रेजेंस बेहतरीन है। उन्होंने अच्छी पीआर टीम हायर की है। मगर इन सबका प्रभाव सिर्फ सोशल मीडिया पर है।
इन दिनों गांव में हूँ और पिछले डेढ़ महीने में किसी को पुष्पम प्रिया के बारे में बात करते नहीं सुना। हो सकता है वे उन्हें जानते हो मगर उनकी यात्राओं के बारे में उन्हें ज्यादा नहीं मालूम। फेसबुक और ट्विटर एक भ्रम है, इसके संदेश जमीन पर बहुत कम पहुंचते हैं। इसके बदले टीवी और वाट्सएप राजनीति के लिहाज से ज्यादा पॉवरफुल और प्रभावी माध्यम है। इन माध्यमों तक उनकी पहुंच नहीं बनी है।
उनकी टीम कार्यकर्ताओं का नेटवर्क बना रही है या नहीं, यह मालूम नहीं। यह सब इसलिये लिख रहा हूँ, क्योंकि देखता हूँ कई मित्र उनसे काफी प्रभावित दिख रहे हैं। मगर उन्हें यह भी समझना चाहिए कि पुष्पम प्रिया आजतक की स्टार रिपोर्टर नहीं हैं, वे बिहार जैसे भदेस राज्य की स्वघोषित मुख्यमंत्री पद की दावेदार हैं। दिल्ली जैसे मेट्रोपोलिटन शहर में भी आम आदमी पार्टी को जमीन बनाने में प्रभावी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ साथ हर मुहल्ले में जाकर संघर्ष करना पड़ा था। उनके पास प्रतिबद्ध युवाओं की एक बेहतरीन टीम थी और वैचारिक लोगों का मार्गदर्शन भी। राजनीति इतनी आसान चीज नहीं है।
जीवन के सरस दस बरस मैंने ‘जनसत्ता’ के चंडीगढ़ संस्करण का संपादन करते हुए बिताए। वास्तुकला में वह शहर दुनिया भर में जाना जाता है, जिसे मूल रूप से स्वीडी, मगर फ्रांस में रहने वाले शार्ल-एदुआ जेनेरे उर्फ ल कार्बूजिए ने आकार दिया था। यानी शहर की योजना और वास्तुशिल्प को उन्होंने अंजाम दिया। उन्हें पं. नेहरू ने पंजाब-हरियाणा की नई राजधानी बनाने का जिम्मा सौंपा था।
कार्बूजिए को पिछली सदी के महान वास्तुकारों में गिना जाता है। उन्होंने वास्तुकला को ‘शुचिता’ का सिद्धांत दिया। आज कई वास्तुकार उनके नक्शे-कदम पर चलते हैं। कुछ वास्तुकार कार्बूजिए सरीखा मोटे घेरे का बड़ा चश्मा लगाते हैं। चाल्र्स कोरिया भी लगाते थे।
इस्ताम्बुल की एक छोटी दुकान में बड़ी किताबों के बीच दुबकी दुर्लभ किताब मुझे मिली — तुर्की वास्तुकला और शहरीकरण, एल-सी की दृष्टि में। कार्बूजिए को अपनापे से लोग ‘एल-सी’ बोलते थे। किताब के लेखक रहे प्रो. (डॉ.) अनीस कोरतन। छोटी-छोटी टिप्पणियाँ। अंगरेजी, तुर्की और फ्रांसीसी में एक साथ।
इस्ताम्बुल से एथेंस के सफर में मैंने किताब को मनोयोग से पढ़ा। चंडीगढ़ में कार्बूजिए के बारे में बहुत सुना-पढ़ा था, मगर यह जिक्र कभी नहीं सुना कि कार्बूजिए ने वास्तुकला का पाठ इस्ताम्बुल में पाया था।
मारियो सल्वादोरी की एक सुंदर उक्ति है: ‘वास्तुकला को पढ़ाया नहीं जा सकता। मगर उसका अध्ययन किया जा सकता है।’ शायद यही वजह हो वास्तुकला के श्रेष्ठ अच्छे शिक्षण संस्थान नहीं हैं; मगर श्रेष्ठ वास्तुकार दुनिया में बहुत हैं।
कार्बूजिए ने कभी वास्तुकला की औपचारिक पढ़ाई नहीं की। मगर स्वैच्छिक अध्ययन खूब किया। बचपन में वे चित्र अच्छे बनाते थे। लडक़पन में वास्तुकला में दिलचस्पी पैदा हुई। रोम, विएना और लियों जाकर मशहूर वास्तुकारों के काम का अध्ययन किया। फिर पेरिस के ऑगस्त पेरे के साथ काम शुरू किया। पैरिस में रहते हुए कला में ‘घनवाद’ का भी गहन अध्ययन कर डाला।
1911 में चौबीस वर्ष की उम्र में कंधे पर झोला लटका कर अपने एक दोस्त के साथ कार्बूजिए जर्मनी, सर्बिया, रोमानिया और बुल्गारिया होते हुए तुर्की पहुंचे। सात महीने के उस शिक्षा-सफर को कार्बूजिए ने ‘पूरब की फलदायी मुसाफिरी’ की संज्ञा दी है।
उन्होंने तुर्की वास्तुशिल्प को देख सौ के ऊपर रेखाचित्र बनाए। और कुछ जलरंग-चित्र भी। 1948 में, जब वे एक वास्तुकार के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे, कुछ रोज के लिए फिर तुर्की गए तो उन्हें लगा कि अच्छा हो वे अपने सैंतीस साल पुराने उस सफर की डायरी के पन्ने भी पलटें। उन्होंने पलटे।
उस पहली यात्रा की डायरी में एक जगह उन्होंने लिखा था: ‘चाहे वास्तुकला हो, चित्रकला हो या मूर्तिकला—सफर में आप अपनी आंख से देखते हैं और हाथ से रेखाचित्र बनाते हुए अपने अनुभव आंकते हैं, दर्ज करते हैं। ...कैमरा तो निठल्लों के लिए है, जो चाहते हैं कि मशीन उनके लिए देखने का काम करे। जब आप अपने हाथ से कुछ उतारते हैं, उकेरते हैं, आकारों को सहेजते हैं, सतह को सुव्यवस्थित करते हैं — इस सबका अर्थ होता है कि आप पहले देखते हैं, फिर निरखते हैं और फिर शायद कुछ उद्घाटित कर पाते हैं। इसी में कुछ सार्थकता है। आविष्कार करना, रचना, अपने पूरे अस्तित्व को सक्रिय करना... इसी सक्रियता का महत्त्व है।’
लगता है रोदाँ के इस सच को कार्बूजिए ने बड़ी जवानी में आत्मसात कर लिया था कि आम आदमी नजर डालता है। जबकि कलाकार देखता है। इसी विचार का कार्बूजिए ने बाद में अपनी किताब ‘नए वास्तुशिल्प की ओर’ (1923) के एक अध्याय में विवेचन किया, जिसका शीर्षक है : ‘जिसे आंखें नहीं देखतीं।’
जाहिर है, तुर्की की यात्रा ने कार्बूजिए के भीतर छिपे कलाकार और चिंतक को बाहर आने में बहुत मदद की।
इस्ताम्बुल पहुंचते ही कार्बुजिए को लगा था कि जिस चीज की तलाश थी वह मिल गई। उन्होंने लिखा, ‘इस्ताम्बुल एक बगिया है, हमारे शहरों की तरह पत्थर की खदान नहीं।’
तुर्की की मसजिदों के बारे में कार्बूजिए ने कहा: ‘अतीत, वर्तमान, उसके पार निर्विकार — गोया आकारों की रंगावली का एक करुण गान’।
उनका कहना था वे मसजिदें काव्य से ओतप्रोत हैं। सरल, सहज और पवित्र।
तुर्की की मसजिदों के अपने हर रेखांकन के नीचे कार्बूजिए ने सुंदर इबारत लिखी है। मसलन, इस्तांबुल में सुल्तान सलीम की मसजिद के रेखांकन पर लिखा : ‘कोमल आकारों का मधुर राग’।
दशकों बाद उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘शहरीकरण’ में ‘दुख या आनंद’ शीर्षक से लिखा कि ‘अगर हम न्यूयार्क से इस्ताम्बुल की तुलना करें तो पाएंगे कि पहला तबाही का रूप है, दूसरा जैसे धरती पर आनंदधाम है। न्यूयार्क सुंदर नहीं है; व्यावहारिक गतिविधियों में भले वह कुछ काम का प्रतीत होता हो, मगर वह हमारे आनंद के संवेदन को आहत करता है।’
इस्ताम्बुल की हरियाली ने कार्बूजिए को भीतर तक छुआ।
कार्बूजिए के वास्तुकला सिद्धांत में तीन तत्तव हैं, जो हर पारंपरिक वास्तुशिल्प में मिलेंगे: सूर्य, आकाश और हरियाली।
-ओम थानवी
शोधकर्ताओं ने नाइट्रोजन को मापने का किया प्रयास
- दयानिधि
शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने लोगों के माध्यम से भारी मात्रा में वातावरण में जारी होने वाली नाइट्रोजन के प्रभाव का मूल्यांकन किया है। मूल्यांकन के इस काम में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन भी शामिल थे। हर साल वातावरण में जारी होने वाली इस नाइट्रोजन का पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
नाइट्रोजन का उपयोग नाइट्रिक एसिड, अमोनिया बनाने में होता है। अमोनिया से उर्वरक, नायलॉन, दवाओं और विस्फोटकों का उत्पादन किया जाता है।
जैसा कि शोधकर्ताओं ने बताया, पर्यावरण में जारी मानव-संबंधित नाइट्रोजन की मात्रा पिछले कई दशकों से लगातार बढ़ रही है। वायुमंडल में बहुत सी गैसे पहले से ही है, नाइट्रोजन की मात्रा के बढ़ने से लोगों का जीवन खतरे में आ गया है। यह शोध पत्र नेचर फूड नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
इस नए प्रयास में, शोधकर्ताओं ने वातावरण में जारी नाइट्रोजन की मात्रा को मापने का प्रयास किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि हम ग्रहों की सीमा (प्लेनेटरी बाउंड्री) के कितने करीब आ रहे हैं। ग्रहों की सीमा (प्लेनेटरी बाउंड्री) एक अवधारणा है जिसमें पृथ्वी में होने वाली प्रक्रियाएं पर्यावरणीय सीमाओं के अंदर होने की बात कही गई है। ग्रहीय सीमाएं स्पष्ट रूप से वैश्विक स्तर के लिए डिज़ाइन की गई हैं। इसका उद्देश्य औद्योगिक क्रांति से पहले मौजूद सुरक्षित सीमाओं के भीतर पृथ्वी को बनाए रखना है।
बहुत ज्यादा नाइट्रोजन हानिकारक हो सकती है क्योंकि इसमें से कुछ नाइट्रेट्स के रूप में उत्सर्जित होते हैं, जो जल प्रदूषण के लिए जाने जाते है। इसमें से कुछ को अमोनिया के रूप में भी उत्सर्जित किया जाता है, जो एक ग्रीनहाउस गैस है। नाइट्रोजन पानी में बहकर पानी के स्रोतों तक पहुच जाता है, जिससे वहां अधिक मात्रा में शैवालों को उगने में मदद कर सकती है जो उस क्षेत्र में रहने वाले अन्य सभी प्राणियों के लिए खतरनाक है।
मनुष्य विभिन्न स्रोतों के माध्यम से नाइट्रोजन का उत्सर्जन करते हैं, जिनमें उर्वरक के रूप में इसका छिड़काव, सीवेज उपचार संयंत्रों, बिजली संयंत्रों और अन्य उद्योग शामिल है। नाइट्रोजन उत्सर्जन के लिए सबसे बड़ी पशुधन श्रृंखला जिम्मेदार है। पशुओं को खिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले भोजन को उगाने के लिए फसल पर भारी मात्रा में नाइट्रोजन युक्त उर्वरक डाला जाता है। उनकी खाद से भारी मात्रा में नाइट्रोजन निकलती है।
शोधकर्ताओं ने अकेले पशुधन श्रृंखला पर अपने प्रयासों को केंद्रित किया। दुनिया भर के आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद, उन्होंने गणना की कि पशुओं की वजह से हर साल 65 ट्रिलियन ग्राम नाइट्रोजन पर्यावरण में फैल रही है। यह वह संख्या है जो ग्रह की सीमा (प्लेनेटरी बाउंड्री) के लिए तय की गई गणना से अधिक है।
उन्होंने यह भी पाया कि पशुधन श्रृंखला पर्यावरण में जारी मानव-संबंधित नाइट्रोजन का लगभग एक-तिहाई हिस्से के लिए जिम्मेदार है। शोधकर्ताओं ने भविष्य में आपदा को रोकने के लिए नाइट्रोजन उत्सर्जन को कम करने पर जोर दिया है।(downtoearth)
तो क्या सचिन की बात के अनुसार आउट देना चाहिए या नहीं.
-आदेश कुमार गुप्त
बीते दिनों भारत के पूर्व कप्तान और बल्लेबाज़ सचिन तेंदुलकर ने वेस्टइंडीज़ के पूर्व कप्तान और बल्लेबाज़ ब्रायन लारा के साथ वीडियो चैट के दौरान कहा कि क्रिकेट में तकनीक के इस्तेमाल का मक़सद यही है कि निर्णय सही हों.
सचिन ने उस दौरान अंपायरों के फ़ैसले की समीक्षा प्रणाली यानी डीआरएस से अंपायर्स कॉल को हटाने का सुझाव देते हुए कहा कि एलबीडब्ल्यू में जब गेंद स्टंप्स से टकरा रही हो तो बल्लेबाज़ को आउट दिया जाना चाहिए.
सचिन ने यह साफ़ लहज़े में कहा कि वो एलबीडब्ल्यू को लेकर डीआरएस के फ़ैसले पर आईसीसी से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि डीआरएस में मैदानी फ़ैसला तभी बदला जा सकता है जब गेंद का 50% हिस्सा स्टंप्स से टकराता दिखे जो सही नहीं है.
सचिन कहते हैं कि जब मामला तीसरे अंपायर के पास जाता है तो इसमें तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, फिर तकनीक से ही फ़ैसला तय होना चाहिए, जैसा कि टेनिस में होता है कि गेंद या तो कोर्ट के अंदर है या बाहर. वहां इसके बीच की कोई स्थिति नहीं होती.
सचिन की बात का पूर्व स्पिनर हरभजन सिंह ने भी ट्वीट करके समर्थन किया.
उन्होंने लिखा, "पाजी मैं आपसे सौ फ़ीसदी सहमत हूं कि अगर गेंद स्टंप्स को छूकर भी निकल रही है तो बल्लेबाज़ को आउट दिया जाना चाहिए. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि गेंद का कितना प्रतिशत हिस्सा स्टंप्स से टकराया. ऐसे में खेल की बेहतरी के लिए नियमों में बदलाव होने चाहिए जिसमें से एक यह होना चाहिए."
क्या कहते हैं यूडीआरएस के नियम
दरअसल, यूडीआरएस नियम के तहत जब खिलाड़ी को अंपायर के किसी फ़ैसले पर एतराज़ होता है तो वह इसकी अपील कर सकता है और तीसरा अंपायर टीवी पर रिकॉर्डिंग देखकर उस फ़ैसले को सही या ग़लत बताता है, लेकिन यूडीआरएस के लिए सिरीज़ से पहले दोनों क्रिकेट बोर्ड की सहमति ज़रूरी है.
पहले भी इस बात को लेकर बहस हो चुकी है कि आईसीसी को सभी देशों में यूडीआरएस को लागू करना चाहिए इससे खेल में सुधार होगा, लेकिन बीसीसीआई इसका विरोध करती रही है.
वैसे यूडीआरएस के लिए ज़रूरी तकनीक सभी देशों के पास नहीं है. जाँच में यह पता चला है कि यूडीआरएस का इस्तेमाल करने से 96% प्रतिशत फ़ैसले सही होते हैं लेकिन उसके बिना भी 92% प्रतिशत फ़ैसले सही होते हैं.
बीसीसीआई का मानना है कि तकनीक सौ प्रतिशत फ़ैसला सही नहीं दे सकती इसलिए इसे लागू करने की ज़रूरत नहीं है.
अंतरराष्ट्रीय अंपायर के. हरिहरन क्या कहते हैं?
इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय अंपायर के. हरिहरन कहते हैं, "इसमें दो-तीन बातें महत्वपूर्ण हैं ख़ासकर एलबीडब्लू के मामले में. अंपायर सबसे पहले देखता है कि गेंद कहां पिच हुई यानी टप्पा खाई, पैड पर लगी और सुनिश्चित किया कि बल्ले पर नहीं लगी. इसके बाद कि क्या गेंद स्टंप्स पर लगेगी. अब यह महत्वपूर्ण नहीं है कि गेंद बीस, तीस या पचास प्रतिशत स्टंप्स पर लग रही है, यह एक पहला पॉइंट है."
"दूसरा पॉइंट है कि गेंद स्टंप्स पर लगेगी या नहीं यह बात अगर अंपायर के मन में दुविधा पैदा करती है तो वो डीआरएस निर्णय के लिए तीसरे अंपायर के पास जाते हैं. वो ये देखता है कि गेंद सही जगह पिच हुई है या नहीं. इसके बाद थर्ड अंपायर, फील्ड अंपायर के निर्णय को सुनिश्चित करता है."
"वह देखता है कि गेंद स्टंप्स पर लग रही है या नहीं, इसमें दस, बीस या पचास प्रतिशत महत्वपूर्ण नहीं है. अगर गेंद स्टंप्स से टकरा रही है तो बल्लेबाज़ आउट है. सबसे महत्त्वपूर्ण है गेंद कहां टप्पा खा रही है, गेंद की दिशा और प्रभाव और उसका स्टंप्स से टकराना. अब अगर इनमें से किसी बात पर अंपायर या थर्ड अंपायर के मन में कोई शंका होती है तो वह बल्लेबाज़ को शंका का लाभ देकर नॉटआउट देता है."
के. हरिहरन अंपायर गेंद की पिचिंग कहां हुई यानी कहां टप्पा खाई, इम्पैक्ट यानी गेंद का असर या प्रभाव और हिटिंग यानी स्टंप्स से टकराना, को पूरी तरह से स्पष्ट करते हैं. अगर अंपायर को इनमें से किसी दो बात पर शंका हुई तो वह सौ फ़ीसदी बल्लेबाज़ को नॉटआउट क़रार देगा.
जब मैदानी अंपायर के मन में शंका होती है तभी वह थर्ड अंपायर के पास जाता है. तकनीक कहती है कि अगर गेंद स्टंप्स से टकरा रही है तो बल्लेबाज़ को आउट दे दो.

सचिन के उठाए सवाल पर क्या बोले हरिहरन
अब सवाल तो यही है कि अगर टीवी रीप्ले में गेंद स्टंप्स को केवल छूकर या स्टंप्स से ऊपर जा रही है तो बल्लेबाज़ को नॉटआउट क्यों दिया जाता है?
जवाब में अंपायर के. हरिहरन कहते हैं कि कई बार देखा गया है कि गेंद के स्टंप्स पर लगने के बाद भी गिल्लियाँ नहीं गिरतीं और बल्लेबाज़ आउट नहीं होता. वहीं कई बार हल्का सा छूकर निकलने पर भी गिर जाती हैं और बल्लेबाज़ आउट हो जाता है. लिहाज़ा डीआरएस में ऐसी स्थिति आने पर बल्लेबाज़ को आउट नहीं देते.
तो क्या सचिन तेंदुलकर की बात के अनुसार बल्लेबाज़ को आउट देना चाहिए या नहीं.
जवाब में अंपायर के. हरिहरन कहते हैं कि आउट तो देना चाहिए लेकिन तीन अलग-अलग तरह की विविधता पिचिंग, इम्पैक्ट और हिटिंग द स्टंप्स में पिचिंग में थोड़ा बहुत बाहर भी चलेगा. इम्पैक्ट में बल्लेबाज़ विकेट के सामने होना चाहिए और हिटिंग द स्टंप्स अंपायर्स का कॉल है, केवल इसके आधार पर बल्लेबाज़ को आउट दिया जा सकता है.
दूसरी तरफ़ यूडीआरएस तकनीक को अपनाना न तो सस्ता है और न ही हर देश के पास यह सुविधा उपलब्ध है.
इसे लेकर अंपायर के. हरिहरन तीखा जवाब देते हैं कि क्रिकेट भी खेलना चाहते हैं और तकनीक भी इस्तेमाल करना चाहते हैं तो इसमें सस्ता-महंगे का सवाल कहां से आ गया.
तो क्या इस तकनीक पर विवाद होते रहेंगे?
के. हरिहरन इसे विवाद न मानते हुए कहते हैं कि खिलाड़ी ही अंपायर के निर्णय को मानने को तैयार नहीं है.
इस तकनीक के 96 फ़ीसदी कामयाब होने को लेकर के. हरिहरन कहते हैं कि यह तो सही है लेकिन एलबीडब्लू वाले मामले में हिटिंग द स्टंप्स का अनुमान सबसे महत्वपूर्ण है. इसका अनुमान अंपायर भी लगाता है और कैमरा भी. इस तकनीक को ही 100 फ़ीसदी सही करने की कोशिश होनी चाहिए. हरिहरन अपनी बात को समाप्त करते हुए कहते हैं कि यह निर्णय तो दोनों टीमों के लिए है एक के लिए नहीं.
'क्रिकेट को तकनीक पर छोड़ा गया तो रोमांच चला जाएगा'
क्रिकेट समीक्षक विजय लोकपल्ली कहते हैं कि सचिन सही कह रहे हैं. अब अगर गेंद स्टंप्स पर लग रही है लेकिन अगर अंपायर ने नॉटआउट दे दिया तो यह अंपायर्स कॉल है.
बेल्स के मामले में लोकपल्ली कहते हैं कि क्रिकेट में ऐसा बहुत कम हुआ है.
वो कहते हैं, "कई बार तेज़ हवा से बेल्स गिरे हैं लेकिन अब ये पहले से अधिक भारी हैं. ऐसे में क्रिकेट अंपायर पर छोड़ दो. लेकिन ये भी नहीं हो सकता क्योंकि क्रिकेट पर बहुत पैसा लगा है और जनता देख रही है. तकनीक है तो इस्तेमाल करो लेकिन अगर इसे तकनीक आधारित ही बना दिया तो इस खेल का रोमांच चला जाएगा."
विजय लोकपल्ली कहते हैं कि अगर सचिन तेंदुलकर जैसा बल्लेबाज़ कह रहा है तो सोचिए इसमें कितनी दुविधा है. आईसीसी को सोचना चाहिए कि एक महान खिलाड़ी क्रिकेट को लेकर चिंतित है, कुछ बदलाव होना चाहिए. पहले तो गेंदबाज़ को एलबीडब्लू मिलता ही नहीं था अब वह सोच तो सकता है. आईसीसी के सामने क्रिकेट को बचाने की चुनौती है, उसे सचिन तेंदुलकर की बात पर विचार करना चाहिए.
कमेंटेटर आकाश चोपड़ा क्या कहते हैं
वहीं पूर्व सलामी बल्लेबाज़ और कमेंटेटर आकाश चोपड़ा कहते हैं कि जब हम देखते हैं कि गेंद बल्लेबाज़ के पैड पर लगी है तो दस में से नौ बार आपको भी पता चल जाता है कि बल्लेबाज़ आउट है या नहीं या क़रीबी मामला है. रही बात सचिन की बात की तो यह तो सिर्फ़ अनुमान दिखाया जाता है कि गेंद स्टंप्स से टकराएगी क्योंकि बीच में पैड आ जाते हैं. अब ऐसे में सचिन ऐसा क्यों कह रहे हैं इसे समझा जा सकता है कि अगर गेंद स्टंप्स पर लगेगी तो बेल्स गिरेगी और खेल ख़त्म.
अब ऐसा क्यों कि गेंद अगर पचास प्रतिशत से अधिक स्टंप्स पर लगे तो आउट और बीस प्रतिशत लगे तो नॉटआउट?
आकाश चोपड़ा कहते हैं, "तकनीक में कुछ कमियाँ हैं. शंका यह है कि अगर तकनीक पचास प्रतिशत से अधिक गेंद स्टंप्स पर टकराती दिखाती है तो 99% वह स्टंप्स पर लगने वाली है लेकिन अगर उससे कम दिखाती है तो फिर संभावना कम होती है. यहां तक तो मामला ठीक है. अब इसमें मुश्किल यह है कि 50% से कम होते ही अंपायर्स कॉल आ जाती है. यह समझ से बिलकुल परे है."
"अगर पचास प्रतिशत से अधिक गेंद स्टंप्स पर लग गई तो अंपायर ने आउट दिया या नहीं इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता लेकिन नियम कहते हैं 5% भी गेंद अगर स्टंप्स पर लग गई और अंपायर ने आउट दे दिया तो उसे माना जाएगा. लेकिन अगर अंपायर ने नॉटआउट दे दिया तो उस निर्णय को पलट नहीं सकते. यही एक बड़ी ग़लती है."
क्या सचिन तेंदुलकर की बात को माना जाएगा?
आकाश चोपड़ा साफ़ साफ़ कहते हैं कि सचिन की बात को नहीं माना जाएगा क्योंकि इसमें बुनियादी कमी है. हो सकता है आने वाले दिनों में यह नियम आ जाए कि अगर अंपायर्स कॉल है तो उसे आउट माना जाएगा या नॉटआउट क्योंकि इसमें दो बातें नहीं हो सकती. एक नियम बनाना पड़ेगा.
आकाश चोपड़ा यह भी कहते हैं कि यहां एक परेशानी यह भी है कि अगर अंपायर ने आउट दिया तो आउट और नॉटआउट दिया तो नॉटआउट जबकि गेंद उतना ही स्टंप्स पर लगती नज़र आ रही है तो शायद यह नियम बदल जाए लेकिन अगर कोई यह सोचे कि पांच फ़ीसदी भी गेंद अगर विकेट पर लगे और बल्लेबाज़ को आउट दे दिया जाए ऐसा नहीं होगा. तकनीक में जब तक कमी है, शंका है तब तक बल्लेबाज़ अपना विकेट इतनी आसानी से नहीं गँवा सकते.
बैडमिंटन या टेनिस से तुलना पर आकाश चोपड़ा कहते हैं कि वहाँ अनुमान नहीं है. क्रिकेट में पिच पर बल्लेबाज़ है, उसके बाद गेंद पैड या शरीर पर लग गई तो लग गई, तो उसके बाद क्या होगा इसे कोई देख नहीं सकता बस अनुमान लगाया जाता है या सोचा जाता है.
अब देखना है सचिन तेंदुलकर की सलाह भविष्य में क्या रंग लाती है.(bbc)
-आकाश शुक्ला
घुमावदार लोकतंत्र के रेत में से तेल निकालने वाले बिन पेंदी के महारथी विधायक जब इस्तीफा देकर मंत्री बन कर दोबारा चुनाव में आते हैं तो अपनी विचारधारा में परिवर्तन के ऐसे-ऐसे कुतर्क जनता के सामने रखते हैं, की जनता भी घुमावदार लोकतंत्र की घुमावदार बातों में आ जाती है और तमाम नैतिक अनैतिक बातों को छोड़कर ऐसे ढुलमुल घुमावदार लोकतंत्र के सिपहसालार उम्मीदवार को दोबारा जिताकर घुमावदार लोकतंत्र की जय जयकार करती है।
हमारे देश का लोकतंत्र घुमावदार हो गया है घुमावदार के साथ साथ एक पार्टी का पर्याय हो गया है। घुमावदार लोकतंत्र की विशेषता है, वोट किसी भी पार्टी को दो सरकार एक पार्टी की ही बन ही जाती है। पूर्ण बहुमत हो, आधा बहुमत हो या अल्पमत हो यह घुमावदार लोकतंत्र जनता की भावना समझता ही नहीं है। पूरे समय मनमानी में लगा रहता है घूम फिर कर एक पार्टी की सरकार हर राज्य में बना देता है। इसीलिए अब वह पार्टी भी जनता के हितों से विमुख होकर यह समझ गई है की जनता से ज्यादा जनता के चुने हुए लोगों को बस में करना आसान है और यह आज के घुमावदार लोकतंत्र में सरकार बनाने का आसान तरीका है ।
वैसे इस अकेली पार्टी को इन सब के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता । क्योंकि जब तक दूसरी पार्टियों में लालची और अवसरवादी नेता और विधायक नहीं रहेंगे तब तक उनको खरीदने वाला तो बेकार ही बैठा रहेगा।
घुमावदार लोकतंत्र ने दो प्रथाओं को जन्म दिया है, पहली प्रथा मंत्रिमंडल के गठन की परिपाटी बदल गईं है अब विधायक मुंह देखते रह जाता और विधायक से इस्तीफा देने वाले मंत्री बन जाता है और जनता को यह समझना मुश्किल हो जाता है, की उसने उम्मीदवार को विधायक बनने के लिए चुना था के विधायक के पद से इस्तीफा देने के लिए। निर्दलीयों छोटी पार्टियों के विधायकों का वजन भी इस घुमावदार लोकतंत्र में बढ़ा है, उनके मंत्री बनने की संभावनाएं बढ़ी है। पहले निर्दलीय या 5-10 सदस्यों वाली पार्टियों के विधायकों का मंत्री बनना असंभव था परंतु घुमावदार लोकतंत्र में दल बदल कानून का प्रभाव कम पढ़ने की उज्जवल संभावना के कारण मंत्री बनने की संभावना बड़े दलों के उम्मीदवार से अधिक रहती है।
दूसरी प्रथा चाहे कोई भी दल कितना भी बहुमत में रहे वह यह नहीं बता सकता की सरकार 5 साल चलेगी कि नहीं, इसलिए कम समय में सरकार का दोहन अधिक से अधिक कैसे किया जा सकता है इसमें राजनीतिक दल माहिर हो गए है। अब कोई भी पार्टी दूरगामी योजनाओं के आधार पर सरकार नहीं चलाती।
घुमावदार लोकतंत्र के माहिर खिलाड़ी आर्थिक रूप से भी संपन्न हो जाते हैं, विधायक से इस्तीफा देकर भी करोड़ों कमाते हैं बाद में मंत्री बन कर भी सत्ता का पूरा दोहन करते हैं, ऐसे लोगों को नुकसान की संभावना बहुत कम रहती है क्योंकि उनके राजनैतिक विरोधी भी दलबदल करने पर उनके तलवे चाटने पर मजबूर होते हैं। जनता समझने की कोशिश करे तो यह समझ आता है की ढुलमुल और बिन पेंदी के लोटो का जमाना आ गया है, घुमावदार लोकतंत्र में सबसे अच्छा विधायक वही है जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही भरोसा ना कर सके, ऐसे गैर भरोसेमंद विधायकों की मंत्री बनने की संभावना 100% के करीब रहती है।
घुमावदार लोकतंत्र के रेत में से तेल निकालने वाले बिन पेंदी के महारथी विधायक जब इस्तीफा देकर मंत्री बन कर दोबारा चुनाव में आते हैं तो अपनी विचारधारा में परिवर्तन के ऐसे-ऐसे कुतर्क जनता के सामने रखते हैं, की जनता भी घुमावदार लोकतंत्र की घुमावदार बातों में आ जाती है और तमाम नैतिक अनैतिक बातों को छोड़कर ऐसे ढुलमुल घुमावदार लोकतंत्र के सिपहसालार उम्मीदवार को दोबारा जिताकर घुमावदार लोकतंत्र की जय जयकार करती है।
इस घुमावदार लोकतंत्र में पार्टी की विचारधारा पर जिंदगी कुर्बान करने वाले कार्यकर्ता और नेताओं को अपने आप को इसके अनुरूप अभ्यस्त करने मैं परेशानी महसूस हो रही है क्योंकि उन्हें यह समझ नहीं आता की विपक्षी उम्मीदवारों का विरोध किस स्तर तक करना है, क्योंकि विपक्षी उम्मीदवार उनकी पार्टी के भविष्य की संभावना भी हो सकता है ,इस पहलू पर उसका विरोध करने से पहले विचार करना आवश्यक हो गया है। उनके अपनी पार्टी में राजनीतिक कद बढ़ने के विकल्प भी खत्म करने में घुमावदार लोकतंत्र के माहिर खिलाड़ी पारंगत होते है, बरसों पुराने विचारधारा से बंधे हुए कार्यकर्ताओं से भी अपनी जय जयकार करवा लेते हैं।
इस घुमावदार लोकतंत्र में किसी भी पार्टी में आयातित उम्मीदवारों का स्वागत ऐसे उत्साह से किया जाता है जैसे कोई अपने बच्चे को जन्म देने के बाद जवान और काबिल कर उसे घर जमाई बनने के लिए किसी और को सौंपता हैऔर उसका स्वागत होता है। वर्तमान में कई राजनीतिक दलों के हालात आयातित नेताओं के कारण ऐसे हो गए है, जैसे घर जमाई ससुर की संपत्ति पर कब्जा कर लेता है।
पूरे घुमावदार लोकतंत्र में जनता की स्थिति सबसे बेबस और दयनीय है । क्योंकि एक बार वोट देने के बाद उसकी उपयोगिता, उसका मूल्य, कीमत शुन्य और दो कौड़ी की रह जाती है। वोट मांगने तक तो लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन होता है लेकिन एक बार जहां सरकार बन गई तो उसके बाद लोकतंत्र नेता का, नेता के लिए, नेताओं के द्वारा शासन हो जाता है। मेरे देश के ऐसे करामाती, हरकती, घुमंतू, ढुलमुल नेताओं के प्रति वफादार और चक्रव्यूही, घुमावदार लोकतंत्र को बारंबार प्रणाम।(सप्रेस )
मंगलेश डबराल
पाब्लो पिकासो की आखिरी पत्नी और चित्रकार फ्रांस्वा जिलों ने अपने संस्मरणों की किताब ‘लाइफ विद पिकासो’ में लिखा है कि एक दिन पिकासो अपने गहरे मित्र और जाने-माने चित्रकार आनरी मातिस के घर में बैठे थे। उनकी रसोई में एक भेड पकाई जा रही थी। पिकासो ने पूछा-तो आज भेड़ पक रही है तुम्हारे यहाँ? पक गई है क्या?
मातिस ने कहा-अभी पकी नहीं।
भेड़ के पकने की खुशबू रह-रहकर पिकासो के नथुनों में प्रवेश कर रही थी। दो मिनट बाद वे मातिस से बोले-जरा देख कर आओ। पक गयी होगी।
मातिस ने भावहीन तरीके से कहा-पूरी नहीं पकी है।
दो मिनट बाद पिकासो फिर बोले-भई, अब तुम देख कर ही आओ। कहीं ज्यादा न पक जाए। मातिस ने पिकासो की अधीरता की अनदेखी करते हुए कहा-अभी कुछ कसर बाकी है।
कहते हैं ऐसी ही बेसब्री और बेचैनी महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन में भी वायलिन के बारे में थी। वे वायलिन बजाते थे निहायत अधकचरे ढंग से। लेकिन वायलिन वादन की सभाओं में वे अपना हाथ आजमाने के लिए आतुर हो उठते और संगीतकार भी उनका मान रखने के लिए वाद्य उनके हाथ में दे देते। दो-तीन मिनट बजाने के बाद आइन्स्टाइन संतुष्ट होकर बैठ जाते, लेकिन पांच मिनट बाद ही फिर अपनी सीट से उठकर कहते--क्या थोडा सा और बजा सकता हूँ? बार-बार सुर छेडऩे के लिए मचल उठने की उनकी यह आदत कभी गयी नहीं। इस ढंग से कुछ संगीत सभाओं को बर्बाद करने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।
यह अधीरता,और बेचैनी बहुत प्रिय लगती है। महान लोगों की बौड़म बेसब्री। महानता की कोई फिक्र, उसका कोई मुगालता नहीं है, फिर भी महान लोगों की एकाधिक खब्तें और आतुरताएं नक़ल कर ली जाएँ तो क्या हजऱ्! सो आज सुबह जब संयुक्ता मूंग के पकौड़े तलने जा रही थी तो पांच मिनट बाद ही मैं अधीर हो उठा। रसोई में जाकर पूछा-पकोड़े बन गए?
उसने कहा-अरे, अभी कहाँ! सामान तैयार कर रही हूँ।
कुछ ही वक्त बीता था कि फिर से दरयाफ्त की, बन गए?
अभी नहीं। तेल गरम हो रहा है अभी, उसने कहा।
चीजें अनुपस्थित होने के बावजूद अपनी गंध, रंग, स्पर्श, स्वाद आदि भेजती रहती हैं। जब मुझसे रहा नहीं गया तो फिर से रसोईं में जाकर कहा-अभी भी नहीं तैयार हुए।
संयुक्ता ने कहा--बस, थोड़ी ही देर में।
अधीरता के प्रतिवाद के तौर पर एक किस्सा यह भी है कि एक बार जवाहर लाल नेहरू ने कुछ दोस्तों को दावत पर बुलाया। जब मेज पर चिकन परोसा जाने लगा तो मेहमान बेचैन हो उठे। नेहरू ने चुटकी ली-भई, कुछ सब्र कीजिये। सभी मुर्गे मरे हुए हैं। वे उडकऱ कहीं नहीं जाएंगे!
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने शीर्षासन करने में जऱा भी देर नहीं लगाई। हमारे जो भी छात्र अमेरिका में पढ़ रहे थे, वे यदि अपनी शिक्षा ई-क्लासेस के द्वारा ले रहे थे तो ट्रंप प्रशासन ने उनके वीजा रद्द कर दिए थे और उन्हें भारत लौटने का आदेश दे दिया गया था। मैंने उसका स्पष्ट विरोध किया था। मुझे खुशी है कि ट्रंप ने अपना आदेश वापस ले लिया है।
ट्रंप को भारत की नहीं, दोस्ती की नहीं, सिर्फ अपनी चिंता है। उन्हें यह चिंता भी नहीं थी कि लाखों विदेशी छात्रों से मिलनेवाले करोड़ों डालरों से अमेरिकी शिक्षा-संस्थाएं वंचित हो जाएंगी। उन्हें तो अपने गोरे अमेरिकी मतदाताओं को यह कहकर लुभाना था कि देखो, मैं तुम्हारे रोजगारों की रक्षा के लिए इन विदेशियों को निकाल बाहर कर रहा हूं। यह काम तो अभी रुक गया लेकिन यह हमें यह सोचने के लिए मजबूर कर रहा है कि हमारे लाखों छात्र-छात्राएं अपनी पढ़ाई पूरी करके अमेरिका और यूरोप क्यों चले जाते हैं और वहां जाकर एक-दो परीक्षाएं पास करके वहीं नौकरी क्यों करने लगते हैं और वहीं क्यों बस जाते हैं।
इस समय अमेरिका में 38 लाख के करीब भारतीय हैं। इनमें से 9 लाख 50 हजार तो वैज्ञानिक और इंजीनियर्स ही हैं। अमेरिका में पढऩेवाले हमारे छात्र लगभग 11 बिलियन डॉलर फीस अमेरिकी संस्थाओं को देते हैं। वे जाते हैं, पढऩे के लिए लेकिन उनका असली उद्देश्य वहां जाकर मोटी कमाई करने का होता है। भारत में उनके माता-पिता जब तक जीवित होते हैं तो कुछ लोग डॉलर वगैरह भारत भेजते रहते हैं लेकिन बाद में उन लोगों की दूसरी पीढ़ी भारत को लगभग भूल जाती है। इस समय सारी दुनिया में ऐसे लगभग दो करोड़ भारतीय बसे हुए हैं। हमारे जो मजदूर और कर्मचारी खाड़ी देशों में हैं, वे तो अपनी बचत का हिस्सा भारत भेजते रहते हैं लेकिन अमेरिका और यूरोप में रहनेवाले भारतीयों को बस अपनी ही चिंता रहती है। यह कितने दुख की बात है कि भारत उनकी शिक्षा और पालन-पोषण पर इतना पैसा खर्च करता है और उनका फायदा विदेशी उठाते हैं। विदेशी सरकारें और कंपनियां भी भारतीयों को नौकरी देना इसलिए ज्यादा पसंद करती हैं कि वे कम पैसों पर राजी हो जाते हैं।
अब से 50 साल पहले जब मैं न्यूयार्क की कोलंबिया युनिवर्सिटी में पढ़ता था, तब मुझे भी कई प्रस्ताव मिले, राजनीतिक पदों के लिए भी, लेकिन मैंने साफ मना कर दिया लेकिन मेरे साथ के कई ईरानी और जापानी छात्रों ने अपने लिए कुछ काम पकड़ लिए, क्योंकि शाह के ईरान और तत्कालीन जापान में अमेरिका की भोगवादी संस्कृति की पकड़ बढ़ती जा रही थी। यदि हम भारतीय संस्कृति के मूल्यों की रक्षा करना चाहते हैं और भारत की सर्वविध उन्नति चाहते हैं तो इस प्रतिभा-पलायन (ब्रेन-ड्रेन) पर रोक लगाने या इसे बहुत सीमित करने पर सरकार को विचार करना चाहिए। (nayaindia.com)
(नया इंडिया की अनुमति से)
-चैतन्य नागर
शिक्षा अकादमिक विषयों की पढ़ाई तक सीमित होकर रह गयी है| खेल-कूद, और हॉबी क्लासेज के लिए ऑनलाइन पढ़ाई में कोई जगह नहीं रह गयी है| अब बच्चा संगीत कैसे सीखेगा बच्चा, खेल-कूद की बारीकियां कहाँ से सीखेगा, पेंटिंग और गायन जैसी ललित कलाएं कहाँ से सीखेगा? इनके लिए तो शिक्षक की भौतिक उपस्थति अत्यावश्यक है| हालाँकि संगीत और पेंटिंग जैसे विषय ऑनलाइन पढाये जा रहे हैं, पर यह सब कुछ कितना सीमित होगा यह कोई भी समझ सकता है| इससे जुड़ी और भी कई समस्याएं शिक्षकों के सामने हैं| ऑनलाइन शिक्षा ने शिक्षक को भी बहुत असुरक्षित बना दिया है| वह तनाव में रहता है और इसका असर उसके अध्यापन पर भी पड़ता है|
पहले स्कूल और शिक्षक और माता-पिता बच्चों को लगातार मोबाइल और लैपटॉप से दूर रहने की सलाह देते थे| मुख्यधारा के स्कूलों में तो यह हिदायत इतनी सख्त नहीं थी, क्योंकि वहां बच्चों के साथ शिक्षक थोडा वक्त ही बिताते हैं, पर वैकल्पिक शिक्षा के हिमायती स्कूलों में और ख़ास तौर पर रिहायशी स्कूलों में तो मोबाइल और कंप्यूटर के प्रयोग के खिलाफ बड़ी सख्त पाबंदी रहती है| विडम्बना है कि अब महामारी की वजह से शिक्षा लैपटॉप या स्मार्ट फ़ोन तक ही सिमट गयी है| शिक्षकों और बड़े बच्चों के अलावा ख़ास कर छह से बारह साल के बच्चों पर ऑनलाइन पढ़ाई का बड़ा गंभीर असर पड़ता दिखाई है|
छोटे बच्चों को स्कूल जाने में रूचि इसलिए नहीं होती क्योंकि वे पढ़ना चाहते हैं| स्कूल जाने के उनके कारण बौद्धिक और तकनीकी न होकर भावनात्मक होते हैं| बच्चे उन शिक्षकों के कारण स्कूल जाते हैं, जो उन्हें प्यार देते हैं| हालांकि एक कक्षा में सत्तर या उससे अधिक बच्चों को पढ़ाने वाले बच्चों के शिक्षक के मन में तनाव ज्यादा प्यार कम ही बचता होगा, पर कुछ मुख्यधारा के स्कूलों में भी ऐसे शिक्षक देखा गए हैं जिन्हें देख कर ही बच्चे खुश हो जाते हैं, और अगले दिन भी उनसे मिलने की प्रतीक्षा में रहते हैं| गौरतलब है कि बच्चे अपने मन में किसी विषय और शिक्षक के बीच फर्क नहीं करते| जो शिक्षक उन्हें खुशी देता है और सुरक्षित महसूस कराता है, उसके विषय को वह जाने-अनजाने में पसंद करने लगते हैं|
दूसरा मुख्य कारण जो बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करता है, वह है दूसरे बच्चों का साथ और खेल-कूद| खेल कूद बच्चों के लिए उतना ही जरूरी है जितना कि सांस लेना| इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं| शहर के छोटे फ्लैट्स और ख़ास कर ऐसे दिनों में जब लोग एक दूसरे को देख कर ही दूर छिटकते हैं, बच्चों को खेलना नसीब हो पा रहा| महामारी का यह बहुत ही क्रूर पहलू है जिसका शिकार छोटे बच्चे हुए हैं| शिक्षा अकादमिक विषयों की पढ़ाई तक सीमित होकर रह गयी है| खेल-कूद, और हॉबी क्लासेज के लिए ऑनलाइन पढ़ाई में कोई जगह नहीं रह गयी है| अब बच्चा संगीत कैसे सीखेगा बच्चा, खेल-कूद की बारीकियां कहाँ से सीखेगा, पेंटिंग और गायन जैसी ललित कलाएं कहाँ से सीखेगा? इनके लिए तो शिक्षक की भौतिक उपस्थति अत्यावश्यक है| हालाँकि संगीत और पेंटिंग जैसे विषय ऑनलाइन पढाये जा रहे हैं, पर यह सब कुछ कितना सीमित होगा यह कोई भी समझ सकता है|
इससे जुड़ी और भी कई समस्याएं शिक्षकों के सामने हैं| ऑनलाइन शिक्षा ने शिक्षक को भी बहुत असुरक्षित बना दिया है| वह तनाव में रहता है और इसका असर उसके अध्यापन पर भी पड़ता है| ऑनलाइन शिक्षा में एक शिक्षक यह महसूस करता है कि जब पढ़ाई इसी तरह होनी है, तो स्कूल या कॉलेज किसी बहुत ही मशहूर एवं शुद्ध रूप से पेशेवर शिक्षक की ऑनलाइन सेवाएँ भी ले सकता है और इस तरह नियमित शिक्षकों की तो छुट्टी ही हो जायेगी| यह डर बेबुनियाद नहीं| आप अखबारों में ऐसे स्तम्भ देखते हैं जिसे एक ही लेखक कई अख़बारों को भेजता है और सभी अखबार उसे इसके लिए पैसे देते हैं| इन सिंडिकेटेड स्तम्भों की तरह सिंडिकेटेड व्याख्यान भी हो सकते हैं एक ही अनुभवी प्रोफेसर एक ही विषय पर अपने व्याख्यान कई स्कूल और कॉलेज को दे सकता है, सबसे अलग अलग रकम वसूल करके| क्यों नहीं हो सकता ऐसा? और कौन सा शैक्षिक संस्थान यह नहीं चाहेगा कि उसके यहाँ दुनिया के सबसे अच्छे शिक्षक उपलब्ध हों| अच्छे शिक्षक की तलाश में वह देश से बाहर ताकेगा और ऐसे कई कारोबारी शिक्षक उसे मिल जायेंगें| ऐसे में ख़ास कर निजी स्कूलों और कॉलेज में शिक्षकों को नौकरी जाने की चिंता बहुत सता रही है| लगातार अपनी नौकरी के बारे में चिन्तित शिक्षक पढ़ायेगा क्या? यह सवाल देर-सवेर हमारे सामने आएगा ही| निजी स्कूलों के लिए अपने शिक्षकों को नियुक्त करने, उनकी कई जिम्मेदारियां संभालने और उनकी अनुपस्थिति की समस्याओं से बचने का यह अच्छा अवसर होगा और वे तो इसका खूब फायदा उठायेंगें|
एक और गंभीर चुनौती शिक्षकों के सामने है और वह यह कि ऑनलाइन शिक्षा में उन्हें बेहतर तरीके से पढ़ाने के लिए बहुत ज्यादा मेहनत करने की जरुरत होगी| ऐसा इसलिए क्योंकि जिन स्त्रोतों का उपयोग अभी तक वे करते आये थे वे अब बच्चों को भी उपलब्ध हैं| पहले शिक्षक आराम से यू ट्यूब, और अलग-अलग वेबसाइट्स से मदद लेकर अपने व्याख्यान तैयार करते थे, और अब ये सभी छात्रों को भी सरलता से उपलब्ध हैं| तो एक तरह से छात्र के सामने दोनों विकल्प हैं, शिक्षक भी और वे स्त्रोत भी जिसका शिक्षक उपयोग करता है| अब वह किसे चुने? इससे शिक्षा की गुणवत्ता नहीं सुधरी है, बल्कि शिक्षक ज्यादा असुरक्षित हो गया है|
अब इस समस्या का एक और पहलू देखें| महानगरों को छोड़ कर देश के कई हिस्सों में बिजली की सप्लाई अनियमित है, बिजली है भी तो बगैर पूर्व सूचना के बीच-बीच में कटती रहती है| छोटे शहरों और गाँवों में लोग अपने फ़ोन तक चार्ज नहीं कर पाते| ऑनलाइन कक्षाओं के लिए स्मार्ट फ़ोन चाहिए या फिर लैप टॉप| गरीब बच्चों के पास लैप टॉप नहीं होता| घर में हो सकता है एक ही स्मार्ट फ़ोन हो, जो कि अक्सर उस पिता के पास होता है, जो काम पर गया होता है| बच्चा कैसे पढ़ेगा? या तो फ़ोन नहीं, लैपटॉप नहीं, या तो बिजली नहीं| ऐसे बच्चे क्या करेंगें, यह एक बड़ा सवाल है| यदि सब कुछ है भी तो फिर डेटा का खर्च अलग से होगा| ब्रॉड बैंड के लिए हर महीने अलग से बिल आएगा, और डेढ़ जीबी के आस पास रोज़ मिलने वाला डेटा एक ही कक्षा में ख़त्म हो जाएगा| फिर बच्चे क्या करें? स्कूल की फीस भी भरें और डेटा पर भी खर्च करें हर माह? घर में पढने वाले एक से अधिक बच्चे हुए तो एक ही फ़ोन या कंप्यूटर को लेकर रोज़ होने वाले झगड़ों से घरेलू तनाव भी अधिक बढ़ेगा| इन सवालों से जूझना पड़ेगा ऑनलाइन शिक्षा की नयी पद्धति को| बच्चों को लगातार स्क्रीन को ताकते रहने के खतरे अलग से झेलने होंगें| ख़ास कर छोटे बच्चों के समेकित विकास पर, उनके सामाजिक विकास पर इसके बहुत बुरे प्रभाव पड़ते दिखाई दे रहे हैं| छोटे बच्चों को लैप टॉप या मोबाइल के साथ अकेले छोड़ने के भी कई दुष्परिणाम हैं| उनकी देख-रेख के लिए किसी वयस्क पारिवारिक सदस्य को लगातार उनके साथ रहना पड़ता है| बच्चों को लगातार किसी वयस्क की मदद की जरुरत भी पड़ती है मोबाइल या लैप टॉप का सही ढंग से उपयोग करने के लिए| महामारी की वजह से बड़ों को भी घर से काम करना पड़ रहा है, ऐसे में कोई अपना काम करे, बच्चों की मदद करे या फिर उन्हें नयी तकनीक से परिचित कराये|
ज़ाहिर है इन परिस्थितियों में आतंरिक क्लेश बहुत बढ़ता होगा| ख़ास कर जब संसाधन सीमित हों और डिजिटल पढ़ाई के लिए पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं न हों| एक बड़ी समस्या उन छात्रों को लेकर भी है जिनकी विशेष जरूरतें हैं, मसलन दृष्टि बाधित या किसी और वजह से सीमित दैहिक क्षमताओं वाले बच्चे| वे इस नए सिस्टम में कैसे खुद को ढाल पायेंगे, यह भी एक बड़ा सवाल है| मानसिक परेशानियों वाले बच्चे भी ऑनलाइन शिक्षा से फायदा नहीं उठा पायेंगें, क्योंकि उन्हें बहुत ही व्यक्तिगत स्तर पर पढ़ाने और सिखाने की जरुरत पड़ती है| उनके लिए शिक्षक भी ख़ास तौर पर प्रशिक्षित होते हैं|
गौरतलब है कि स्कूल सिर्फ अकादमिक विषयों की पढाई के लिए नहीं होते, वहां बच्चा आपसी संबंधों से बहुत कुछ सीखता है| अपने घर से निकलकर पहली बार वह अजनबियों के संपर्क में आता है और उसे कई नए, सुखद और दुखद अनुभव होते हैं| अपने घर की चारदीवारी में कैद होकर पढना शुरू में उसे दिलचस्प लग सकता है, पर धीरे-धीरे जब इसके दुष्प्रभाव उसपर पड़ेंगे तब नयी तरह की चुनौतियां परिवारों और समाज के सामने आयेंगीं|
यह सही है कि यह सब कुछ कोई खुशी-खुशी नहीं कर रहा, महामारी से जन्मी परिस्थितियों ने मजबूर कर दिया है और इसलिए स्कूल वगैरह छोड़ कर बच्चों को घरों में कैद होना पड़ा है, पर इस पर बहुत अधिक ध्यान देने की जरुरत है| एक समस्या का हल ढूँढने के फेर में हम कई नयी समस्याओं को न्योत रहे हैं, इस तथ्य को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता| थोड़ी सजगता और दूरदर्शिता हमें इसने निपटने की ऊर्जा अवश्य देगी| पढ़ाई-लिखाई पूरी तरह मशीनों के जिम्मे हो जायेगी तो बच्चों के भी मशीन में तब्दील होने के खतरे बढ़ जायेंगें| पहले ही यह कम नहीं थे|(सप्रेस )
-मनीष सिंह
राहुल का लेटेस्ट वीडियो देखा क्या? एगजेक्टली जो राहुल मैं अपने जेहन में देखता हूँ, तमाम आलोचनाओं, चमचे, कांगी, वामी और तटस्थ न होने की तोहमतों के बावजूद, राहुल के जिस इंटेलक्ट के पक्ष में बात करता हूँ, लिखता हूँ.. वो आपको भी इस वीडियो में साफ साफ दिखेगा।
राहुल को लेकर बहुत अच्छी इमेज मेरे दिमाग मे नही थी। सबसे बड़ा कारण था, वो पथेटिक इन्टरव्यू, जो अर्नब ने लिया था, 2014 इलेक्शन के जस्ट पहले। लगभग लडख़ड़ाते, सकपकाते, कन्फ्यूज्ड राहुल की वही इमेज फ्रीज थी।
अक्टूबर या नवंबर 2018 में मुझे आमंत्रित किया गया, नागेन्द्र भाई के द्वारा जो कांग्रेस के अच्छे पद पर हैं। राहुल छतीसगढ़ इलेक्शन के सिलसिले में दौरे पर थे, खास खास लोगो से मिल रहे थे। मैं उस दौरान बड़ा भयंकर आपिया था, और फिर सेलेब्रिटीज से मिलने की मेरी इच्छा नही। मगर भाई साहब के बुलावे, दोबारा कॉल, और पासेज के इंतजाम आदि को देख, लिहाज में गया। तमाम एसपीजी चक्र पार कर हॉल में पहुंचा। सबसे आगे की रो में सीट मिली। मुझे भाई साहब ने कहा था- तू सवाल जरूर करना।
राहुल आये। कुछ मिनट के इंट्रोड्क्टरी स्पीच के बाद सवाल आमन्त्रित किये। पहला सवाल मेरा था, उत्तर दिया गया। कोई सात आठ मिनट, धाराप्रवाह, अर्टिकुलेटेड, एकदम सही शब्दो मे। सही शब्द के लिए उनका सेकेंड भर रुकना, और फिर निकलने वाले शब्द परफेक्ट होगा..। यह बन्दे की समूची पर्सनालिटी को समझने की चाबी है। बन्दा जरा थम लेगा, विचार कर लेगा, मगर फांस मारकर आगे नहीं बढ़ेगा।
वो वीडियो भी होगा मेरी वाल पर। उन साथ आठ मिनट में उनकी वीक कम्युनिकेटर की मेरी धारणा का परखच्चे उड़ गए। सोशल मीडिया के युग में, जब आपकी बात मेनस्ट्रीम मीडिया नहीं दिखा रहा, राहुल के छोटे-छोटे वीडियोज का ये तरीका मास्टरस्ट्रोक है। यकीन कीजिये, ये वीडियो छाने वाले हैं।
आलोचक कह सकते हैं, कि ये स्क्रिप्टेड है, रटाया हुआ है। मैं अपने अनुभव से साफ नकार सकता हूँ। इस वीडियो को बनाने में 20-30 मिनट से ज्यादा नहीं लगे होंगे। कन्टेन्ट उनका खुद का है, ये उसकी ओरिजनल समझ है, बात करने का तरीका है। अगला इंग्लिश में सोचता है, उसमें बड़े आराम से बोलता है। हिंदी में भी अब ठीक ही है। भाषा नहीं, कन्टेन्ट पर जाएंगे, तो जरूर आनंद आएगा।
अर्टिकुलेटेड थिंकिंग किसे कहते हैं, क्रिटिकल एनालिसिस क्या होता है, मैनेजमेंट के स्टूडेंट इस वीडियो से प्रेजेंटेशन का ट्यूटोरियल ले सकते हैं। वीडियो अब तक नहीं देखा, तो जरूर देखें। सरसरी देखा हो, तो दोबारा देखें।
Since 2014, the PM's constant blunders and indiscretions have fundamentally weakened India and left us vulnerable.
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) July 17, 2020
Empty words don't suffice in the world of geopolitics. pic.twitter.com/XM6PXcRuFh
सनलाइट के अलावा विटामिन-डी से भरपूर
कोरोना वायरस और अन्य बीमारियों से लडऩे के लिए शरीर में रोग प्रतिरोध क्षमता का होना जरूरी होता है। ऐसे में प्रकृति में मौजूद जैव विविधता पर्यावरण के साथ ही शरीर के लिए विभिन्न पोषक तत्व प्रदान करती है। बरसात के मौसम में गरज और बारिश में उगने वाला मशरूम दीमक की बामियों, पैरा, साल के पेड़ों और बांसों की ढेर में निकलता है। जंगलों और खेत खिलहानों में प्राकृतिक और कृत्रिम रूप से उत्पादन किए जाने वाले औषधीय गुणों व पोषक तत्व से भरपूर मशरूम यानी फुटू सब्जी का स्वाद बहुत ही लजीज होता है।
छत्तीसगढ़ में यह फुटू (पुटू) नाम से जाना जाता है जिसको आयुर्वेद में धरती का फूल कहा जाता है। मशरूम में कई ऐसे जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं जिनकी शरीर को बहुत आवश्यकता होती है। सूर्य की धूप के बाद पोषण आहार के रुप में विटामिन-डी तथा फाइबर यानी रेशे का यह एक अच्छा स्रोत है। कई बीमारियों में मशरूम का इस्तेमाल औषधि के तौर पर किया जाता है। मशरूम में विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व जैसे खनिज एवं विटामिन पाया जाता है जो शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत करता है और रोगों से लडऩे की क्षमता में वृद्धि होती है। मशरूम में एक खास पोषक तत्व पाया जाता है जो मांसपेशियों की सक्रियता और याददाश्त बरकरार रखने में बेहद फायदेमंद रहता है।
विटामिन और मिनरल्स है भरपूर
प्राकृतिक तौर पर जंगलों में मिलने वाली यह सब्ज़ी (फंगस) मशरूम में गुड फैट, स्टार्च, शुगर फ्री, विटामिन और खनिज तत्व के साथ प्रोटीन पाया जाता है। इसमें कैलोरीज ज्यादा नहीं होतीं। नॉनवेज पसंद नहीं करने वालों के लिए पनीर की तरह प्रोटीनयुक्त शुद्व शाकाहारी है। महंगे प्राणीज पदार्थ के स्थान पर मशरूम का उपयोग लाभकारी होगा, क्योंकि इसमें विटामिंन और मिनरल्स पाये जाते हैं जो 100 ग्राम मशरूम में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहता है। विटामिन-बी6, सी, डी, आयरन, काबोहाइड्रेट, फाइबर, प्रोटीन, पोटेशियम, मैग्निशियम मशरुम में मिलते हैं।
पोषण व औषधिय गुणों से भरपूर है मशरूम
डिग्री गल्र्स कॉलेज की फूड एवं न्यूट्रेशन विभाग की प्रोफेसर डॉ. अभ्या आर. जोगलेकर बताती हैं सावन-भादों के मौसम में मशरूम प्राकृतिक रुप से जंगलों व खेतों में मिलती है। मशरूम की पौष्टिकता का रोग निवारण में प्रभाव देते हैं जैसे- बीपी, शुगर, कब्ज, हृदय रोग, मोटापा, कैंसर, एड्स, हड्डी रोग, कुपोषित बच्चे, कमजोर व्यक्तियों, एनिमिक व गर्भवती महिलाएं के लिए मशरूम में मौजूद तत्व रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। इससे सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियां जल्दी-जल्दी नहीं होती। मशरूम में मौजद सेलेनियम इम्यूनिटी सिस्टम के रिस्पॉन्स को बेहतर करता है। मशरूम विटामिन डी का भी एक बहुत अच्छा माध्यम है। यह विटामिन हड्डियों की मजबूती के लिए बहुत जरूरी होता है। इसमें बहुत कम मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं, जिससे वह वजन और ब्लड शुगर लेवल नहीं बढ़ाता। मशरूम में एंटी-ऑक्सीडेंट भूरपूर होते हैं। इसके अलावा मशरूम को बालों और त्वचा के लिए भी काफी फायदेमंद माना जाता है। वहीं कुछ स्टडीज में मशरूम के सेवन से कैंसर होने की आशंका कम होने की बात तक कही गई है।
70 फीसदी महिलाओं में हडडी से संबंधित रोग-
शासकीय आयुर्वेदिक कॉलेज पंचकर्म विभाग के एचओडी डॉ. रंजीप कुमार दास का कहना है अस्पताल की ओपीडी में आने वाली 40 वर्ष की उम्र पार कर चुके महिलाओं में हड्डी, कमर दर्द और कैल्शियम की कमी की समस्या प्रमुख रूप से पाई जाती है। इस तरह की बीमारियों की शिकायत लेकर आने वाली 70 फीसदी महिलाओं में अर्थराइटिस और ऑस्टियो-पोरोसिस की समस्याएं होती है। इसके लिए मशरूम में मिलने वाला पोषक तत्व और विटामिन-डी हड्डी से संबंधित रोगों से लडऩे के लिए कारगर होता है।
प्राकृतिक मशरूम के उत्पादन के लिए हो रहा रिसर्च-
इंदिरागांधी कृषि विश्वविद्यालय के प्लांट पैथोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. सीएस शुक्ला ने बताया मशरूम की अलग-अलग प्रजातियों का बीज तैयार कर कृत्रिम रुप से व्यवसायिक उत्पादन के लिए अखिल भारतीय मशरूम अनुसंधान परियोजना के तहत रिसर्च कार्य चल रहा है। डॉ. शुक्ला ने बताया छत्तीसगढ की जलवायु मशरुम के लिए अनुकूल होने की वजह से यहां 30 से 35 प्रजातियां खाने योग्य है। कुछ औषधीय मशरूम पर भी कृषि विवि में रिसर्च चल रहा है।
प्राकृतिक रुप से कनकी फुटू, भिंभोरा फुटू, बोडा, पेहरी एवं अन्य प्रकार के मशरुम मिलते हैं। वहीं कृत्रिम रुप से आयस्टर, पैरा फुटू, बटन, सफेद दुधिया मशरूम की खेती की जा रही है। डॉ. शुक्ला ने बताया, दुनियाभर में मशरुम की 42,000 प्रजातियां हैं जिसमें से 800 प्रजातियों की पहचान भारत में कर ली गई है। सीड तैयार कर मशरूम की कृत्रिम खेती घर के अंदर सरलता से वर्षभर की जा सकती है। प्राकृतिक मशरूम को सब्जी बनाने से पहले घर के बुजुर्गों से खादय मशरूम की पहचान कराने के बाद ही खाना चाहिए।
-अनिल गोस्वामी
उन्हें किसी भी दिन बनारस शहर के अन्नपूर्णा होटल में पच्चीस रुपए की थाली का खाना खाते हुए देखा जा सकता है। इसके साथ ही वह आज भी बीएचयू में अपनी चिकित्सा सेवा नि:शुल्क जारी रखे हुए हैं। डॉ. लहरी को आज भी एक हाथ में बैग, दूसरे में काली छतरी लिए हुए पैदल घर या बीएचयू हास्पिटल की ओर जाते हुए देखा जा सकता है।
लोगों का नि:शुल्क इलाज करने वाले बीएचयू के जाने-माने कार्डियोथोरेसिक सर्जन पद्म डॉ. टी.के. लहरी (डॉ. तपन कुमार लहरी) ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके घर पर जाकर मिलने से इंकार कर दिया है। योगी को वाराणसी की जिन प्रमुख हस्तियों से मुलाकात करनी थी, उनमें एक नाम डॉ. टी के लहरी का भी था। मुलाकात कराने के लिए अपने घर पहुंचने वाले अफसरों से डॉ. लहरी ने कहा कि मुख्यमंत्री को मिलना है तो वह मेरे ओपीडी में मिलें। इसके बाद उनसे मुलाकात का सीएम का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। अब कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री चाहते तो डॉ. लहरी से उनके ओपीडी में मिल सकते थे लेकिन वीवीआईपी की वजह से वहां मरीजों के लिए असुविधा पैदा हो सकती थी।
जानकार ऐसा भी बताते हैं कि यदि कहीं मुख्यमंत्री सचमुच मिलने के लिए ओपीडी में पहुंच गए होते तो डॉ. लहरी उनसे भी मरीजों के क्रम में ही मिलते और मुख्यमंत्री को लाइन में लगकर इंतजार करना पड़ता। बताया जाता है कि इससे पहले डॉ. लहरी तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को भी इसी तरह न मिलने का दो टूक जवाब देकर निरुत्तरित कर चुके हैं। सचमुच धरती के भगवान जैसे डॉ. लहरी वह चिकित्सक हैं, जो वर्ष 1994 से ही अपनी पूरी तनख्वाह गरीबों को दान करते रहे हैं। अब रिटायरमेंट के बाद उन्हें जो पेंशन मिलती है, उसमें से उतने ही रुपए लेते हैं, जिससे वह दोनो वक्त की रोटी खा सकें। बाकी राशि बीएचयू कोष में इसलिए छोड़ देते हैं कि उससे वहां के गरीबों का भला होता रहे।
उन्हें किसी भी दिन शहर के अन्नपूर्णा होटल में पच्चीस रुपए की थाली का खाना खाते हुए देखा जा सकता है। इसके साथ ही वह आज भी बीएचयू में अपनी चिकित्सा सेवा नि:शुल्क जारी रखे हुए हैं। डॉ. लहरी को आज भी एक हाथ में बैग, दूसरे में काली छतरी लिए हुए पैदल घर या बीएचयू हास्पिटल की ओर जाते हुए देखा जा सकता है। वह इतने स्वाभिमानी और अपने पेशे के प्रति इतने समर्पित रहते है कि कभी उन्होंने बीएचयू के बीमार कुलपति को भी उनके घर जाकर देखने से मना कर दिया था।
ऐसे ही डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया जाता है। तमाम चिकित्सकों से मरीज़ों के लुटने के किस्से तो आए दिन सुनने को मिलते हैं लेकिन डॉ. लहरी देश के ऐसे डॉक्टर हैं, जो मरीजों का नि:शुल्क इलाज करते हैं। अपनी इस सेवा के लिए डॉ. लहरी को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2016 में चौथे सर्वश्रेष्ठ नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. लहरी ने सन् 1974 में प्रोफेसर के रूप में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अपना करियर शुरू किया था और आज भी वह बनारस में किसी देवदूत से कम नहीं हैं। बनारस में उन्हें लोग साक्षात भगवान की तरह जानते-मानते हैं। जिस ख्वाब को संजोकर मदन मोहन मालवीय ने बीएचयू की स्थापना की, उसको डॉ. लहरी आज भी जिन्दा रखे हुए हैं।
वर्ष 2003 में बीएचयू से रिटायरमेंट के बाद से भी उनका नाता वहां से नहीं टूटा है। आज, जबकि ज्यादातर डॉक्टर चमक-दमक, ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं, लंबी-लंबी मंहगी कारों से चलते हैं, मामूली कमीशन के लिए दवा कंपनियों और पैथालॉजी सेंटरों से सांठ-गांठ करते रहते हैं, वही मेडिकल कॉलेज में तीन दशक तक पढ़ा-लिखाकर सैकड़ों डॉक्टर तैयार करने वाले डॉ. लहरी के पास खुद का चारपहिया वाहन नहीं है। उनमें जैसी योग्यता है, उनकी जितनी शोहरत और इज्जत है, चाहते तो वह भी आलीशान हास्पिटल खोलकर करोड़ों की कमाई कर सकते थे लेकिन वह नौकरी से रिटायर होने के बाद भी स्वयं को मात्र चिकित्सक के रूप में गरीब-असहाय मरीजों का सामान्य सेवक बनाए रखना चाहते हैं। वह आज भी अपने आवास से अस्पताल तक पैदल ही आते जाते हैं। उनकी बदौलत आज लाखों गऱीब मरीजों का दिल धडक़ रहा है, जो पैसे के अभाव में महंगा इलाज कराने में लाचार थे। गंभीर हृदय रोगों का शिकार होकर जब तमाम गरीब मौत के मुंह में समा रहे थे, तब डॉ. लहरी ने फरिश्ता बनकर उन्हें बचाया।
डॉ. लहरी जितने अपने पेशे के साथ प्रतिबद्ध हैं, उतने ही अपने समय के पाबंद भी। आज उनकी उम्र लगभग 75 साल हो चुकी है लेकिन उन्हें देखकर बीएचयू के लोग अपनी घड़ी की सूइयां मिलाते हैं। वे हर रोज नियत समय पर बीएचयू आते हैं और जाते हैं। रिटायर्ड होने के बाद विश्वविद्यालय ने उन्हें इमेरिटस प्रोफेसर का दर्जा दिया था। वह वर्ष 2003 से 2011 तक वहाँ इमेरिटस प्रोफेसर रहे। इसके बाद भी उनकी कर्तव्य निष्ठा को देखते हुए उनकी सेवा इमेरिटस प्रोफेसर के तौर पर अब तक ली जा रही है। जिस दौर में लाशों को भी वेंटीलेटर पर रखकर बिल भुनाने से कई डॉक्टर नहीं चूकते, उस दौर में इस देवतुल्य चिकित्सक की कहानी किसी भी व्यक्ति को श्रद्धानत कर सकती है।
रिटायर्ड होने के बाद भी मरीजों के लिए दिलोजान से लगे रहने वाले डॉ. टी के लहरी को ओपन हार्ट सर्जरी में महारत हासिल है। वाराणसी के लोग उन्हें महापुरुष कहते हैं। अमेरिका से डॉक्टरी की पढ़ाई करने के बाद 1974 में वह बीएचयू में 250 रुपए महीने पर लेक्चरर नियुक्त हुए थे। गरीब मरीजों की सेवा के लिए उन्होंने शादी तक नहीं की। सन् 1997 से ही उन्होंने वेतन लेना बंद कर दिया था। उस समय उनकी कुल सैलरी एक लाख रुपए से ऊपर थी। रिटायर होने के बाद जो पीएफ मिला, वह भी उन्होंने बीएचयू के लिए छोड़ दिया। डॉ. लहरी बताते हैं कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें अमेरिका के कई बड़े हॉस्पिटल्स से ऑफर मिला, लेकिन वह अपने देश के मरीजों की ही जीवन भर सेवा करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हैं। वह प्रतिदिन सुबह छह बजे बीएचयू पहुंच जाते हैं और तीन घंटे ड्यूटी करने के बाद वापस घर लौट आते हैं। इसी तरह हर शाम अपनी ड्यूटी बजाते हैं। इसके बदले वह बीएचयू से आवास के अलावा और कोई सुविधा नहीं लेते हैं।
अंधेरे में तलवार चलाकर नुकसान करने पर आमादा
-तथागत भट्टाचार्य
अतुल्य बागराबोंड उत्तरी कर्नाटक के एक किसानस के बेटे हैं। इस साल फरवरी तक उन्होंने मैंगलोर में एक बीपीओ ऑपरेशंस सेंटर में काम किया जहां वह महीने में 24,000 रुपये कमा लेते थे। लॉकडाउन में नौकरी जाती रही। अतुल्य पिछले तीन महीने से दोबारा किसी बीपीओ में नौकरी पाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। हताश आवाज में वह कहते हैं, “कहीं कोई नौकरी नहीं। एक ऑफर मिला भी तो वह बेंगलुरू के लिए था और वे 18,000 रुपये देने की बात कर रहे थे। इतने से आप बेंगलुरू में तो नहीं रह सकते। मेरे कई पूर्व सहयोगियों को नौकरी से निकाल दिया गया, कई के वेतन में 30-30 प्रतिशत की कटौती कर दी गई है।”
अतुल्य की दिक्कत यह है कि उन्होंने साइड बिजनेस करने की कोशिश पहले ही की थी, पर वह सफल नहीं हो पाए। अतुल्य को कुत्तों से बड़ा प्रेम है और उन्होंने हमेशा से एक केनेल (कुत्ताघर) और कुत्ते का प्रजनन केंद्र खोलने का सपना देखा था। पिछले दो वर्षों के दौरान उन्होंने धीरे-धीरे करके इसके लिए लगभग एक लाख रुपये जमा भी कर लिए थे। उन्होंने फरवरी में आठ पिल्ले लिए और मार्च में लॉकडाउन की घोषणा होने तक वह दो पिल्लों को बेच भी चुके थे। वह कहते हैं, “बता नहीं सकता कि यह सब कैसा रहा। मैंने अपनी सारी बचत पिल्लों पर तो खर्चकर ही दी, पिता से भी कुछ पैसे मांगने पड़े। 1 जून के बाद, मैंने एक पूर्व सहकर्मी से कहा कि वह हमें हमारे गांव तक छोड़ दे। तब से यहीं गांव में हूं। गांव आने से पहले मेरे दो पूर्व सहयोगियों ने मुझसे एक-एक कुत्ता खरीदा था। अब मैं चार कुत्तों के साथ अपने माता-पिता के घर ही रह रहा हूं।”
लेकिन यह सिर्फ अतुल्य का किस्सा नहीं है। इन दिनों आप लोगों से मिलें, तो लोग घुमा-फिराकर यही सब सुनाने लगते हैं। दरअसल, आम तौर पर कम उम्र के लोग कम स्किल, कम वेतन वाली नौकरियों पर कब्जा कर लेते हैं। कंपनियां इन्हें प्रशिक्षण देने पर बहुत कम खर्च करती हैं और जब मुश्किल समय आता है तो इन्हें हटा देना उनके लिए अपेक्षाकृत आसान होता है। जॉब्स पोर्टल नौकरी डॉट कॉम के अनुसार, पिछले साल मई की तुलना में इस साल मई में पूरे देश में भर्ती आधी रह गई। होटल, रेस्तरां, यात्रा-पर्यटन और एयरलाइंस उद्योगों में तो भर्तियों में 91 फीसदी की गिरावट आई। अटलांटिक काउंसिल थिंक टैंक की रिपोर्ट के अनुसार, खुदरा, आतिथ्य और पर्यटन-जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों पर खास तौर पर इस महामारी के समय बहुत बुरा असर पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन(आईएलओ) ने मई में चेतावनी दी थी कि महामारी कई युवाओं को पीछे धकेल सकती है और उन्हें स्थायी रूप से नौकरी बाजार से बाहर कर सकती है। साथ ही आगाह किया था कि वायरस की विरासत अब हमारे साथ दशकों तक रहने वाली है।
आईएलओ का अनुमान है कि महामारी के बाद से दुनिया भर में हर छह में से एक व्यक्ति ने अपनी नौकरी खो दी है। भारत में हम इस बात को अपनी ताकत बताते हैं जिसमें काम करने वाले युवाओं की आबादी काफी अधिक है लेकिन महामारी के इस काल का दुष्प्रभाव भी इसी तबके पर सबसे ज्यादा पड़ा है। सीएमआईई की रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल में 20-30 साल के बीच के 2.7 करोड़ लोगों की नौकरी चली गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 15 से 29 साल के 41 फीसदी लोगों के पास इस साल मई में काम नहीं था जबकि 2018-19 में इसी आयु वर्ग के केवल 17.3 प्रतिशत लोग काम से बाहर थे।
भारत में आईटी कंपनियों में भी जोर-शोर से छंटनी हो रही है, हालांकि यह मोटे तौर पर खराब प्रदर्शन से जुड़ी हुई है। कुछ को इसलिए हटा दिया गया कि कंपनी के पास प्रोजेक्ट नहीं रहा। पुणे में आईटी और आईटीईएस मैन पावर फर्म चलाने वाले प्रभात द्विवेदी ने कहा, “खास तौर पर आईबीएम और कॉग्निजेंट में जो छंटनी का दौर चला है, उसका कारण अनिश्चित कारोबारी माहौल में काम करने वालों की संख्या को न्यूनतम कर देना है।” टाटा समूह के एक सूत्र ने कहा कि उनके यहां भी ऑटोमोबाइल, विमानन, एयरोस्पेस और खुदरा डिवीजनों में काम करने वालों की संख्या को कम करने की योजना तैयार की जा रही है।
मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज ने 30 अप्रैल को ही तेल और गैस डिवीजन के शीर्ष कर्मचारियों के वेतन में 50 प्रतिशत तक की कटौती की घोषणा कर दी। प्रति वर्ष 15 लाख रुपये से अधिक कमाने वाले कर्मचारियों को 10 फीसदी कटौती का सामना करना पड़ा जबकि वरिष्ठ अधिकारियों के वेतन में 30 से 50 प्रतिशत तक कटौती की गई। भारत में छंटनी करने वाली अन्य प्रमुख कंपनियां हैंः कैब चलाने वाली ओला और उबेर, फूड डिलीवरी क्षेत्र की अग्रणी कंपनियां- स्विगी और जोमाटो और अंतरराष्ट्रीय कार्य क्षेत्र शेयरिंग फर्म- वेवकोर इत्यादि।
भारतीय मीडिया में भी बड़ी संख्या में लोगों को निकालने, वेतन में कटौती-जैसे कदम उठाए गए। कोविड-19 के प्रभाव पर द इकोनॉमिक टाइम्स द्वारा कराए गए ऑनलाइन सर्वेक्षण के अनुसार, 3,074 लोगों में से 39 प्रतिशत ने कहा कि उनके वेतन में कटौती हो गई है जबकि 15 फीसदी ने बताया कि उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया है। छंटनी और वेतन कटौती का दौर ऐसी अर्थव्यवस्था में चल रहा है जो पहले से ही मंदी की मार झेल रही थी, इसलिए जाहिर है इसका असर तो और बुरा होने जा रहा है। अब मांग में और कमी आएगी क्योंकि प्रभावित होने वाले घर न्यूनतम जरूरी सामान ही खरीद रहे हैं।
सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि भारत सरकार भी स्थिति को बेहतर बनाने में मदद नहीं कर रही है। एयर इंडिया में कर्मचारियों के वेतन में कटौती की घोषणा हुई। इसके बाद, भारत में सबसे अधिक नौकरियां देने वाले भारतीय रेलवे ने अब देश भर में कोई भी नई भर्ती नहीं करने का फैसला किया है। पिछले नवंबर में रेल मंत्री पीयूषगोयल ने घोषणा की थी कि रेलवे ने लगभग 2.93 लाख पदों को भरने के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी है। लेकिन लॉकडाउन के बाद खर्चे को कम करने की रणनीति के तहत रेलवे बोर्ड ने अब जोनल रेलवे और उत्पादन इकाइयों को अगले आदेश तक सुरक्षा श्रेणी को छोड़कर नए पद सृजित करने से मना कर दिया है। इतना ही नहीं, जोनल रेलवे को यह भी कहा गया है कि वे पिछले दो वर्षों के दौरान सृजित पदों की भी समीक्षा करें और अगर किन्हीं पदों पर अभी नियुक्ति नहीं हुई है तो उसे रोक दें। इसके अलावा, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और सिग्नल और दूरसंचार विभागों सहित गैर-सुरक्षा श्रेणियों में मौजूदा रिक्तियों को भी 50 प्रतिशत कम करने को कहा गया है। रेलवे कर्मचारी संघ के एक पदाधिकारी ने कहा, “कई महत्वपूर्णपद जो पिछले कुछ महीनों में सेवानिवृत्त कर्मचारियों से भरे गए थे, वे लॉकडाउन के दौरान पदों से मुक्त हो जाने के बाद खाली हो गए हैं। रेलवे को जल्द-से-जल्द रिक्तियों को भरने की कोशिश करनी चाहिए।”
केंद्र सरकार के कर्मचारी संघ से जुड़े हुए भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमें पता है कि शीर्ष स्तर पर हुई बैठक के बाद केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन में फिलहाल 35 प्रतिशत की कमी करने का प्रस्ताव है। सरकार का कहना है कि उसके पास अभी पैसे नहीं हैं और जब भी सरकार के राजस्व की स्थिति सुधरेगी, कर्मचारियों का कटा हुआ वेतन एरियर के तौर पर उन्हें वापस दे दिया जाएगा। हम सेल, गेल, एलआईसी, ऑयल इंडिया लिमिटेड, ओएनजीसी, एनटीपीसी और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों के लोगों के साथ बातचीत कर रहे हैं कि अगर सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी तो हम कैसे-क्या करेंगे”।
ऐसे समय सरकार को रोजगार सृजन योजनाओं में सरकारी खर्च में अच्छी-खासी वृद्धि करनी चाहिए, सरकारी पदों को भरना चाहिए और मांग को बढ़ाने के लिए मनरेगा के आवंटन में भी भारी वृद्धि करनी चाहिए। यही एकमात्र उपाय है। लेकिन लगता है कि नरेंद्र मोदी सरकार मौजूदा संकट से निकलने के लिए हरसंभव गलत उपाय ही कर रही है। ऐसे समयमें वह क्रेडिट रेटिंग के बारे में ज्यादा परेशान दिखती है जब उसका फोकस अर्थव्यवस्था में पैसे के प्रवाह और आर्थिक गतिविधियों को वापस पटरी पर लाने पर होना चाहिए था। इसका खामियाजा देश की श्रम शक्ति को उठाना पड़ रहा है और हर बीतते दिन के साथ स्थिति और खराब होती जा रही है।
यह बात बिल्कुल साफ नजर आ रही है कि बढ़ती बेरोजगारी और आर्थिक मंदी से निपटने का कोई रोडमैप सरकार के पास नहीं है। वह अंधेरे में तलवार चलाकर सबका नुकसान करने पर आमादा है(navjivan)
डॉ. मुजफ्फर हुसैन गजाली
बाल श्रम विधेयक 2016 में खतरनाक उद्योगों की संख्या 83 से घटाकर 3 कर दी गई है। अब केवल खनन, अग्निशामक और विस्फोटक को ही खतरनाक माना गया है, तो क्या जऱी, प्लास्टिक, चूड़ी उधोग, कपड़े, कालीन बनाने, दुकान, कारखाने, खेत खल्यान में कीटनाशकों और रसायनों के बीच काम करना बच्चों के लिए सुरक्षित है? क्या बीड़ी बनाने, रंग पेंट करने, ईंट के भट्टों में काम करना उनके लिए ठीक है? क्या कचरा चुनना या ढोना उनके स्वास्थ्य के लिए सही है?
प्राकृतिक आपदा, बाढ़, हिंसक संघर्ष और विस्थापन का बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि बच्चे का संबंध गरीब, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग से हो तो उसकी हालत और दयनीय होती है। भोजन, स्वच्छ पेयजल, चिकित्सा, सुरक्षित आवास, कुछ भी उपलब्ध नहीं होता। माइग्रेशन के कारण उन का स्कूल छूट जाता है। अनिश्चितता, कठोर परिस्थिति और गरीबी में हंसता खेलता बचपन श्रम के बोझ तले दब जाता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा 2015 में सतत विकास के जो लक्ष्य निर्धारित किये गये थे हर प्रकार के बाल श्रम का उन्मूलन उनमें से एक था। दुनिया को 2030 तक गरीबी, बीमारी, अशिक्षा, पर्यावरण के लक्ष्य को प्राप्त करना है। बाल श्रम सहित मानव दासता को 2025 तक खत्म करना है। इस लक्ष्य को हासिल करने में केवल साढ़े चार साल बाकी हैं। लेकिन वैश्विक महामारी के चलते इस लक्ष्य तक पहुंचना आसान नहीं होगा।
कोरोना संकट केवल स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़ा मामला नहीं है। यह बच्चों के भविष्य का संकट भी है। साल 2000 में, दुनिया में 26 करोड़ बच्चे ऐसे थे जिन की उम्र 14 वर्ष से कम थी, उन का वक्त कॉपी किताबों और दोस्तों के बीच नहीं बल्कि होटलों, घरों, कारखानों, उद्योगों, खेत-खलिहानों, बर्तन बनाने, पोलिश करने वाली फैक्टरीयों और उपकरणों के बीच गुजर रहा था। संयुक्त प्रयासों के कारण, उनकी संख्या घटकर अब 15 करोड़ रह गई है। बच्चों के द्वारा सब से ज्यादा सामान भारत, बांग्लादेश और फिलीपींस में बनाए जाते हैं। दुनिया के कुछ देशों में, श्रम के लिए कोई आयु सीमा नहीं है और कुछ ने खतरनाक कामों की सूची भी नहीं बनाई है। बाल श्रम दुनिया भर में एक बड़ी समस्या है। पिछले साल, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रबंध निदेशक गाय राइडर ने एक कार्यक्रम में चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि जिस गति से बाल श्रम पर काम हो रहा है, उस से अनुमान है कि 2025 में भी 12 करोड़ बाल श्रमिक बच जाएंगे। नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने अपनी प्रतिक्रया देते हुए कहा था कि दुनिया बाल श्रम को समाप्त करने में पूरी तरह सक्षम है। वहां मौजूद कई बुद्धिजीवियों ने इस बात का समर्थन करते हुए माना था कि योजनाबद्ध तरीके से इस बुराई को मिटाया जा सकता है।
कैलाश सत्यार्थी के अनुसार कोरोना वायरस एक बड़ी चुनौती लेकर आया है। इससे बाल श्रम, बाल विवाह, यौन शोषण और बाल उत्पीडऩ का खतरा बढ़ गया है। इसलिए अब हमें और अधिक ठोस और त्वरित समाधान खोजने की जरूरत है। विकास और दासता साथ साथ नहीं चल सकते। लिहाजा गुलामी का खात्मा तो करना ही पड़ेगा। कोरोना से इस वर्ष लगभग 6 करोड़ नए बच्चे अत्यधिक गरीबी में धकेले जा सकते हैं। जिन में से बड़ी संख्या बाल मजदूर बन जाएंगी।
1991 की जनगणना के अनुसार, भारत में बाल श्रम का आंकड़ा 11.3 मिलियन था। बच्चों के लिए काम करने वाली एनजीओ के अनुसार, इन में से 50.2 प्रतिशत बच्चे सप्ताह में सातों दिन काम करते हैं।
53.22 प्रतिशत मासूम यौन शोषण का शिकार होते हैं। 50 प्रतिशत खतरनाक परिस्थितियों में काम करते हैं। उनका जीवन गुलामों से भी बदतर है। उनसे दिन-रात काम लिया जाता है और मजदूरी का भुगतान भी नहीं किया जाता। और काम न करने पर उन्हें शारीरिक कष्ट सहना पड़ता है। अनुमान है कि नियोजित बाल श्रमिकों में एक तिहाई लड़कियां हैं। बाल श्रम में लगे ज्यादातर बच्चे एशियाई देशों के हैं। खास तोर पर भारत में इस समस्या ने कोरोना संकट के कारण गंभीर रूप धारण कर लिया है।
जब भी बच्चों के अधिकारों की बात आती है, तो बहाने बनाये जाने लगते हैं। छोटे बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने के लिए गोपाल कृष्ण गोखले ने 1911 में इंपीरियल विधान परिषद में एक विधयक पेश किया था। यह विधयक किशोरों की शिक्षा तक ही सीमित था लेकिन फिर भी पारित नहीं हो सका। 1986 में, जब संसद ने कानून बनाया कि 18 साल से कम आयु के बच्चों से मजदूरी नहीं कराई जा सकती, तब भी यह सवाल उठा था कि गरीब परिवारों के लिए मुश्किल हो जाएगी। इसका मतलब साफ है कि जो गरीब हैं वे अपनी आजीविका में उलझे रहें। इस से बहार निकल कर उन्हें सोचने का मौका न मिले और न ही उनका देश के किसी मामले से कोई सरोकार हो। बाल श्रम, गरीबी और अशिक्षा के बीच त्रिकोणीय संबंध है। वे एक-दूसरे को जन्म देते हैं, जो सतत विकास, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय और मानव अधिकारों के लिए सबसे बड़ी बाधा है।
सुप्रीम कोर्ट में चले कई मुकदमों, शोध रिपोर्टों और सैकड़ों सामाजी व कल्याणकारी संगठनों की मेहनत और कोशिशों के परिणाम स्वरूप बने राजनीतिक दबाव के कारण 2009 में कांग्रेस सरकार ने अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का कानून बनाया। इसके तहत 6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त शिक्षा का मूल अधिकार मिला। इस कानून की बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें छोटी लड़कियां शामिल थीं। इसी के सहारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बेटी बचाओ बेटी पढाई योजना शुरू करने का अवसर मिला। जबकि पिछड़े और वंचित वर्गों को यह सबक पढ़ाया जाता रहा है कि बालिका को जन्म से ही घर के कामों में हाथ बटाने का प्रशिक्षित दिया जाये। यह हमारी सभ्यता का हिस्सा है। सात- आठ साल की लडक़ी घर कि साफ सफाई, खाना बनाने जैसे दैनिक कामों में सहायता करने के अलावा उस काम में भी दाखिल हो चुकी होती है जो जात के अनुकूल उसका परिवार करता है। लडक़ी को स्कूल भेजने और स्कूल में उसकी शिक्षा की गुणवत्ता को मापने की कोशिश करने वाला कानून एक सपने जैसा था। इस सपने के साकार होने में सांस्कृतिक कांटे और सरकारी चट्टानें पहले से ही बाधा थीं, फिर 2016 के नए बाल श्रम कानून ने उनके सपने को दशकों आगे खिसका दिया। अर्थव्यवस्था को सुधारने और निवेशकों को आकर्षित करने के लिए श्रम कानूनों को अधिक लचीला बनाने पर सरकारों का जोर रहा है। कोरोना संकट के दौरान भी कई राज्य सरकारों ने श्रम कानूनों में संशोधन किये हैं।
बाल श्रम कानून को 2012 और फिर 2016 में नरम किया गया। तत्कालीन श्रम और रोजगार मंत्री बंडारु दत्तात्रेय ने बाल श्रम संशोधन विधेयक 2016 को ऐतिहासिक व मील का पत्थर बताया था। उनके अनुसार, इसका उद्देश्य बाल श्रम को पूरी तरह से समाप्त करना था। इस विधेयक में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए पारिवारिक कार्यों को छोड़ कर विभिन्न श्रेणियों में काम करने पर पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि जब कोई कानून जमीन से जुड़ा होता है तभी टिकता है और न्याय देता है। इसे शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 से भी जोड़ा गया है। नया विधेयक कहता है कि कोई भी बच्चा किसी भी काम में नहीं लगाया जाएगा, लेकिन कानून तब लागू नहीं होगा जब बच्चा अपने परिवार या परिवार के काम में मदद कर रहा हो, स्कूल के बाद या छुट्टियों के दौरान और काम खतरनाक न हो। बंडारु दत्तात्रेय ने तर्क दिया कि पारिवारिक व्यवसाय में मालिक-मजदूर का संबंध नहीं होता। यह बड़ी सरल बात लगती है कि बच्चे घर के कामों में मदद करें। सवाल यह है कि बच्चे स्कूल के बाद या छुट्टियों के दौरान काम करेंगे तो सैर व तफरी कब करेंगे? पढ़ेंगे कब? खेलेंगे कब? क्या यह उनके मानसिक विकास के लिए यह ठीक होगा? क्या उनके नाजुक शरीर पर किसी भी तरह के श्रम का बोझ लादना सही होगा? और यह कौन निर्धारित करेगा कि बच्चा परिवार के काम में मदद कर रहा है? या वह अपने माता-पिता के कर्ज का भुगतान करने के लिए बंधुआ मजदूर बन गया है।
बाल श्रम विधेयक 2016 में खतरनाक उद्योगों की संख्या 83 से घटाकर 3 कर दी गई है। अब केवल खनन, अग्निशामक और विस्फोटक को ही खतरनाक माना गया है, तो क्या जऱी, प्लास्टिक, चूड़ी उधोग, कपड़े, कालीन बनाने, दुकान, कारखाने, खेत खल्यान में कीटनाशकों और रसायनों के बीच काम करना बच्चों के लिए सुरक्षित है? क्या बीड़ी बनाने, रंग पेंट करने, ईंट के भट्टों में काम करना उनके लिए ठीक है? क्या कचरा चुनना या ढोना उनके स्वास्थ्य के लिए सही है? क्या फिल्म, टीवी धारावाहिक और विज्ञापनों में कलाकार के रूप में काम करने से बच्चों में तनाव पैदा नहीं होता है? क्या यह उनके मानसिक विकास के लिए अच्छा है? कुछ लोग ट्रैफिक सिग्नल पर किताबें, अखबार, फूल, खिलौने, मोबाइल चार्जर बेचकर अपना जीवन यापन करते हैं, तो क्या उनके बच्चों को ट्रैफिक सिग्नल पर सामान बेचने की अनुमति होगी? पारिवारिक कार्यों में बच्चों के सहयोग के पीछे तर्क यह है कि यह बच्चों को गृहकार्य और कौशल सिखा सकता है, लेकिन यह जाति व्यवस्था को मजबूत करने का एक षड्यंत्र है। विशेषज्ञ इसके विरुद्ध हैं, उनका मानना है कि इससे स्कूल छोडऩे वालों की संख्या बढ़ेगी। सवाल यह है कि बच्चे को माता-पिता के पेशे को क्यों अपनाना चाहिए? वास्तव में, बच्चों को माता-पिता के व्यवसाय से जोडऩे का मतलब है उद्योगों के लिए सस्ते श्रम की व्यवस्था करना। मोदीजी ने दुनिया भर में घूम -घूम कर वादा किया है कि यदि आप हमारे देश में औद्योगीकरण करते हैं, तो सस्ते श्रमिक हम प्रदान करेंगे। बाल कल्याण एवं अधिकारों के लिए काम करने वालों का मानना है कि अगर बाल श्रम को देश से समाप्त करना है, तो बाल श्रम कानूनों में ढील नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि इस से असंगठित श्रेणी के श्रमिकों में गरीबी और बाल श्रम में इजाफा होगा।
कोरोना संकट के कारण बाल श्रम में सुधार के बजाए हालत और बिगडऩे की संभावना है। कोड- 19 से सब से अधिक सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा कमज़ोर वर्ग प्रभावित हो रहा है। उन में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ रही है, जिसका ख़मयाज़ा उनके बच्चों को भुगतना पड़ेगा। इसका परिणाम बाल श्रम के रूप में सामने आ सकता है। सरकार 30 करोड़ बच्चों को मिड-डे मील या स्कूल जाने के बदले उनके माता-पिता को नकद रक़म देती है। लॉकडाउन और बीमारी के डर से स्कूल बंद हैं। लंबे समय के लिए स्कूल छूट जाने के बाद, अधिकांश गरीब बच्चे दोबारा स्कूल नहीं लौटते। उनके मजदूर बनने की संभावना बढ़ जाती है। भारत के लाखों प्रवासी श्रमिकों के बच्चों के साथ भी ऐसा ही कुछ हो सकता है। यदि समाज, सरकार, उद्योगपति, व्यवसायी बच्चों को काम पर जाने से रोकने के लिए ठोस पहल करें तो बच्चों को श्रम की बेडिय़ों से बचाया जा सकता है। सुरक्षित और समृद्ध बचपन से ही एक सुरक्षित और समृद्ध देश का निर्माण संभव है। आज यदि हम अपने बच्चों को बेहतर जीवन नहीं दे पाए, तो कल पूरी पीढ़ी की बर्बादी के दोषी कहलाएंगे।


