विचार/लेख
कांग्रेस प्रशांत किशोर (पीके) की समस्या से आज़ाद हो गई है। पार्टी ने तय किया है कि अपना घर ठीक करने के किए उसे किसी भी बाहरी विशेषज्ञ की ज़रूरत नहीं है। उसके पास अपने ही अनुभवी नेताओं की बड़ी फ़ौज है।प्रशांत एपिसोड के पटाक्षेप के बाद पार्टी के सेवेंटी-प्लस योद्धाओं में उत्साह की लहर है कि उनकी मेहनत आख़िरकार रंग ले लाई और वे चर्चित रणनीतिकार को ग्रैंड ओल्ड पार्टी से बाहर रखने में कामयाब हो गए।
इस बात की पहले से ही आशंका व्यक्त की जा रही थी कि एक सौ सैंतीस साल बूढ़ी पार्टी को पैंतालीस की उमर के प्रशांत किशोर की ज़रूरत हो ही नहीं सकती। मामला राहुल और प्रियंका के तैयार होने का नहीं बचा था जिन्हें कि सबसे ज़्यादा आपत्ति होनी चाहिए थी पर नहीं हुई। दिक़्क़त उन तमाम बुजुर्गों को थी जिनके हाथ अभी भी पार्टी और भविष्य में बन सकने वाली सरकारों का नेतृत्व करने के लिए कांप रहे हैं। इन नेताओं के तो बेटे-बेटियाँ भी अब प्रशांत किशोर की उमर के हो गए हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस का सफ़ाया हो गया और संसद में विपक्ष का नेता बनने के भी लाले पड़ गए तब राहुल गांधी ने पार्टी की हार की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए आरोप लगाया था कि कुछ बड़े नेता बजाय पार्टी की जीत के लिए काम करने के, अपने बेटे-बेटियों को जिताने में ही लगे रहे (‘दो मुख्यमंत्रियों और एक वरिष्ठ नेता ने अपने बेटों के हितों को पार्टी के हितों से ऊपर रखकर दबाव बनाया ,कांग्रेस से इस्तीफ़ा देने तक की धमकी दी थी।’)
हक़ीक़त यह है कि राहुल गांधी ने जिन नेताओं को लेकर उक्त टिप्पणी की थी वे चुनावों में पार्टी की हार के बाद संगठन में और ज़्यादा मज़बूत हो गए और वे (राहुल) कुछ नहीं कर पाए।प्रशांत किशोर मामले में सोनिया गांधी भी इन्हीं नेताओं के साथ चर्चाएँ करतीं रहीं। समूचे घटनाक्रम में अच्छी बात यह रही कि प्रशांत किशोर सीरियल के अंतिम एपिसोड के वक्त अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए राहुल गांधी नई दिल्ली में उपस्थित नहीं थे। उन्हें बातचीत के नतीजों की जानकारी पहले से हो चुकी थी।
कांग्रेस पार्टी को किसी भी क़ीमत पर बदलने नहीं दिया जाए इस षड्यंत्र में निहित स्वार्थों की एक बहुत बड़ी लॉबी की रुचि और भागीदारी हो सकती है। यह लॉबी किसी भी ऐसी होनी को अनहोनी में बदलने के लिए बड़ी से बड़ी सुपारी बाँटने के लिए भी तैयार बैठी हो सकती है। कांग्रेस के मज़बूत होने का मतलब राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता परिवर्तन की शुरुआत भी माना जा सकता है। इस लॉबी में बड़े औद्योगिक घरानों और कांग्रेस-विरोधी दलों के साथ-साथ पार्टी के अंदरूनी तत्वों को भी शामिल किया जा सकता है।दांव पर आख़िर दो सौ के क़रीब लोकसभा की वे सीटें हैं जिनकी कि कांग्रेस के खाते में प्रशांत किशोर ने पहले से गिनती कर रखी है। इन सीटों पर मुक़ाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही रहता है। प्रशांत किशोर के जुड़ जाने से उन ग्यारह राज्यों के विधान सभा परिणामों पर भी फ़र्क़ पड़ सकता था जहां लोक सभा के पहले चुनाव होने हैं।
अब जबकि तात्कालिक तौर पर साफ़ हो गया है कि प्रशांत किशोर नहीं जुड़ रहे हैं, बातचीत की असफलता के संबंध में सफ़ाई पेश करने के साथ-साथ चर्चाएँ कांग्रेस के भविष्य को लेकर भी प्रारम्भ हो गईं हैं। जैसी कि सम्भावना ज़ाहिर की जा रही थी, प्रशांत किशोर चाहे औपचारिक तौर पर कांग्रेस से नहीं जुड़ने वाले हों, पार्टी ने उनके दिए गए सुझावों पर काम प्रारम्भ कर दिया है। पी चिदम्बरम ने स्वीकार किया है कि प्रशांत किशोर द्वारा सुझाए गए कुछ प्रस्तावों पर पार्टी कार्रवाई करना चाहती है। उनके द्वारा प्रस्तुत विश्लेषण और आँकड़े काफ़ी प्रभावशाली हैं।
कांग्रेस आलाकमान और प्रशांत किशोर के बीच बातचीत के असफल होने के असली कारणों का पता वार्ताकारों और भाजपा के शिखर क्षेत्रों के अलावा किसी को नहीं चल पाएगा। इनकार प्रशांत किशोर ने किया कि कांग्रेस ने इस पर किसी अगले दौर की बातचीत की खबरों तक पर्दा पड़ा रहेगा। बातचीत की असफलता को लेकर क़यास यह भी लगाया जा सकता है कि सास इंदिरा गांधी की तरह से सोनिया गांधी का असंतुष्ट नेताओं पर नियंत्रण नहीं है या फिर पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र ज़रूरत से ज़्यादा मौजूद है।इसीलिए कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं को अभी सूझ नहीं पड़ रही है कि वे प्रशांत किशोर के नहीं जुड़ने की खबर पर दुःख मनाएँ या एक दूसरे को बधाई देते हुए मिठाई बाँटें !
कई दौरों की बातचीत के बाद भी दोनों पक्षों के बीच किसी समझौते पर नहीं पहुँच पाने को लेकर इतना अनुमान तो लगाया ही जा सकता है कि प्रशांत किशोर अपनी शर्तों पर ही कांग्रेस को परिणाम देने की गारंटी चाहते थे। वे गांधी परिवार से संवाद के दौरान मध्यस्थों के हस्तक्षेप या विरोध के ख़िलाफ़ भी आश्वासन चाहते थे। परिवार और पार्टी नेताओं को इस तरह की कार्य-संस्कृति की निश्चित ही आदत नहीं है। ऐसी शर्तों का पालन केवल उन्हीं दलों में सम्भव है जहां केवल एक व्यक्ति की हुकूमत है। प्रशांत किशोर ने अतीत में ऐसी ही पार्टियों के साथ काम किया है। संक्षेप में कहना हो तो कांग्रेस के नेता समस्या के इलाज के लिए मिट्टी के लेप और टब बाथ से प्रारम्भ कर चरणबद्ध प्राकृतिक चिकित्सा चाहते थे और प्रशांत किशोर पहले ही दिन एनीमा देना चाहते थे।
वैसे यह मान लेना भी जल्दबाज़ी करना होगा कि कांग्रेस के लिए प्रशांत किशोर अध्याय अंतिम रूप से समाप्त हो गया है। किसी दिन फिर से यह खबर आ सकती है कि प्रशांत किशोर एक बार पुनः दस जनपथ के दरबार में परिवार के साथ बातचीत करने पहुँच गए हैं। प्रशांत किशोर और कांग्रेस के बीच बातचीत टूटी है पर रिश्ते क़ायम हैं। एक बात तो तय है कि इस समय कांग्रेस को ही प्रशांत किशोर की ज़्यादा ज़रूरत है।
-शुमायला खान
पाकिस्तान की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी ने बुधवार को पाकिस्तान के विदेश मंत्री के रूप में शपथ ली।
पाकिस्तान के सभी राजनीतिक हलकों और राजनीति पर नजर रखने वालों का मानना है कि बिलावल भुट्टो के मंत्रिमंडल में शामिल होने से हाल ही में बनी पाकिस्तान मुस्लिम लीग के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार मजबूत होगी।
लेकिन अब सभी की निगाहें उनकी विदेश नीति पर होंगी, ख़ासकर भारत के साथ रिश्ते पर। पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की पूर्ववर्ती सरकारों के रिश्ते भारत से बहुत खराब नहीं रहे हैं। हालांकि पिछले सात सालों में हालात बहुत बदल गए हैं। पाकिस्तान के विश्लेषक इन खराब हुए रिश्तो के लिए भारत की नरेंद्र मोदी सरकार को जिम्मेदार मानते हैं।
अब सवाल यह है कि क्या बिलावल भुट्टो जरदारी भारत को लेकर पाकिस्तान की विदेश नीति में कोई बदलाव ला सकेंगे, खासकर कश्मीर के मुद्दे पर। भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त शाहिद मलिक कहते हैं, ‘पाकिस्तान के सभी पक्ष यह चाहते हैं कि भारत के साथ रिश्ते फिर से सामान्य हो और कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा हो। पाकिस्तान में पिछले 5-7 सालों में जो भी सरकार सत्ता में आई है, उसने भारत के साथ रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश की है। बातचीत शुरू होनी चाहिए लेकिन भारत ने इस दिशा में कोई प्रगति नहीं की है।’ यहाँ यह गौर करने वाली बात है कि शाहिद मलिक पाकिस्तान में पीपल्स पार्टी की सरकार के दौरान भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त थे। यह वह दौर था जब पाकिस्तान की सबसे युवा विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने भारत की कामयाब यात्रा की थी।
शाहिद मलिक कहते हैं, ‘जब भारत में मनमोहन सिंह सत्ता में थे तब दोनों देशों के बीच नियमित बात होती थी। दूसरे मुद्दों के साथ-साथ कश्मीर के मुद्दे पर भी वार्ता की प्रक्रिया चल रही थी। दोनों देशों के बीच व्यापार, कई मुद्दों पर बैठकर हो रही थी और एक दूसरे की खेल टीमें इधर-उधर जा रही थीं।’ वहीं कराची विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों की प्रोफेसर डॉक्टर हुमा बक़ाई मानती हैं कि अगले साल होने वाले चुनावों की वजह से बिलावल भुट्टो ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह भारत को लेकर पाकिस्तान की विदेश नीति में कोई निर्णायक बदलाव कर सकें।
‘पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में इस बात को लेकर आम सहमति है कि जब तक भारत में नरेंद्र मोदी सत्ता में हैं भारत और पाकिस्तान के रिश्तो में कुछ नहीं हो सकता। इस मामले में विदेश नीति में बदलाव पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है क्योंकि उसकी सहयोगी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज इस मुद्दे पर अपने आपको विदेश मंत्री से अलग करके देखेगी।’
पाकिस्तान में सत्ताधारी गठबंधन की दोनों ही अहम पार्टियां पाकिस्तान पीपल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज़ भारत के साथ अच्छे रिश्ते चाहती हैं। पीपीपी एक उदारवादी लोकतांत्रिक विचारों वाली पार्टी है जो सुरक्षा को लेकर तो समझौता नहीं करेगी लेकिन वह मानती है की बातचीत की प्रक्रिया और राजनीतिक स्तर पर वार्ता से ही समस्याओं का समाधान निकलना चाहिए। पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज व्यापारिक हितों का ध्यान रखने वाली पार्टी है और वह चाहती है किस संकट का समाधान हो ताकि कारोबारी हितों का ध्यान रखा जा सके। वहीं इस्लामाबाद की कायद-ए-आजम यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर जफर नवाज सपाल मानते हैं कि दोनों ही पार्टियां लंबे समय तक कश्मीर को अपना फौरी एजेंडा नहीं बनाएंगी।
भारत के कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे को समाप्त करने के संदर्भ में डॉ जसपाल कहते हैं कि भारत पाकिस्तान को किसी भी तरह की राहत नहीं देना चाहेगा, ऐसे में गठबंधन सरकार इस मुद्दे को नजरअंदाज ही करना चाहेगी। वह इस मुद्दे पर अपनी सैद्धांतिक स्थिति को तो बरकरार रखेंगे लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की तरह आक्रामक नहीं होंगे। जिस तरह इमरान ख़ान ने इस मुद्दे को उछाला, बिलावल शायद ही ऐसा करें।
डॉक्टर जसपाल भारत पाकिस्तान की विदेश नीति में किसी सकारात्मक बदलाव की उम्मीद नहीं रख रहे हैं। वह कहते हैं कि पाकिस्तान में साल 2023 और भारत में साल 2024 में आम चुनाव होने हैं। मोदी साहब पाकिस्तान से बात नहीं करना चाहते क्योंकि इससे उनके वोट बैंक प्रभावित होते हैं। ऐसे में अगर बिलावल वार्ता की शुरुआत भी करना चाहे तो उन्हें भारत से बहुत उत्साहवर्धक जवाब नहीं मिलेगा।
पाकिस्तान की सेना और विदेश नीति
पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार के पतन से पहले सेना ने स्पष्ट किया था कि वह गैर राजनीतिक है और अपने आप को राजनीतिक मामलों से अलग रखती है। लेकिन पाकिस्तान में आम राय यह है कि पाकिस्तान के विदेश नीति के मामलों से सेना अपने आपको अलग नहीं रख सकती। भारत को लेकर पाकिस्तान की विदेश नीति उनके लिए बेहद अहम है।
डॉ. हुमा इस मान्यता से इत्तेफाक रखती हैं। वह कहती हैं कि विदेश नीति में, खासकर भारत के मामले में कुछ नया करना बिलावल का आखिरी पत्ता होगा। अंत में सेना ही भारत को लेकर पाकिस्तान की विदेश नीति तय करेगी। पाकिस्तान के इस ताजा राजनीतिक संकट की वजह से जनरल वाजवा की स्थिति कमज़ोर हुई है, ऐसे में अगर बिलावल भारत समर्थक स्टैंड लेना चाहेंगे भी तो नहीं ले पाएंगे। यथास्थिति बनी रहेगी और वह भारत को लेकर बहुत सक्रियता से काम नहीं कर पाएंगे।
भारत को लेकर विदेश नीति में बदलाव को सेना संवेदनशील क्यों मानती है?
डॉक्टर हुमा इसे समझाते हुए कहती हैं, ‘पाकिस्तान के सुरक्षा बलों के लिए यह एक मुश्किल साल रहा है और कराची यूनिवर्सिटी पर बलूच लिबरेशन आर्मी के ताजा हमले के बाद मुझे नहीं लगता कि बिलावल पाकिस्तान की नीति में बड़ा बदलाव करने की स्थिति में है।’
डॉक्टर हुमा कहती हैं कि ‘सेना प्रमुख जनरल जावेद क़मर बाजवा इस समय पहले से हुए नुकसान की भरपाई में लगे होंगे। ऐसे में मैं यह देखती हूं कि अमेरिका और यूरोप के साथ पाकिस्तान के रिश्तो में सुधार संभव है लेकिन अफगानिस्तान या भारत को लेकर पाकिस्तान की विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता।’ (bbc.com/hindi)
-मुकेश नेमा
अरुण लाल को बधाई! छाछठ साल के ये जवान जब तक क्रिकेट मैदान में रहे बूढ़े बने रहे, ऐसा कोई तीर नहीं मार पाये जिससे लोगों का ध्यान जाता उनकी तरफ! बहरहाल अब वो फार्म में आ चुके और इस बार उन्होंने जो बल्ला घुमाया है, गेंद जिस तूफानी रफ्तार से मैदान के बाहर जाकर बहुतों के दिल की खिड़कियों के काँच तोड़ चुकी वो रश्क करने लायक है! छाछठ साल के अरुण लाल अड़तीस की खूबसूरत, मृदुभाषी बुलबुल के दूल्हा बने हैं, जाहिर है इस खबर से उन लाखों करोड़ों कुँवारों की छाती पर साँप लोट रहे है जो बिना घोड़ी का मुँह देखे एक्सपाईरी डेट बरसों पहले पार कर चुके! और जिनके जीवन में बस बाराती होने के अवसर ही आये हैं!
बहरहाल ऐसे सभी कुंवारे, शादीशुदा, के अलावा ऐसे जीव जो केवल पुरुष होकर पैदा हुए है, ऐसे नकारात्मक लोग, जिन्हें यह खबर जहर जैसी लग रही है मेरी राय को कान देकर सुने! पहली बात तो ये कि सुंदर, सुलक्षणा कन्या मात्र योग्य वर का ही वरण करती है! हम वीर भोग्या वसुंधरा वाले देश है! गधो को सेवन कोर्स लंच डिनर नहीं मिलता कभी! ऐसे में हमारे निडर ट्रकों के पीछे लिखी उस अमर सूक्ति का स्मरण रखें जो हमें स्वस्थ प्रतियोगिता के लिये प्रेरित करती है! हम सभी ने पढ़ा है उसे, जलों नहीं बराबरी करो! ऐसे में आप ये जो स्वस्थ, प्रसन्न, अमीर अरूण लाल का मजाक बना रहे हैं, वो बस ये बताती है कि आप अंदर ही अंदर कलप रहे है, मरे जा रहे हैं अरूणलाल होने के लिये, पर हो नहीं पा रहे!
सच तो यह है बुढ़ापे में शादी करने का मतलब बूढ़ा होने से इनकार कर देने जैसा है! नई दुल्हन लेकर आये किसी बुजुर्ग के चेहरे की चमक देखे! बंदा फेरे लेते ही बीस बरस कम हो जाता है! बुज़ुर्गवार दूल्हे खाँसने खखारने में, विश्वास नहीं रखते! बुढ़ापे में ब्याह च्यवनप्राश सा प्रभावी है, वे चुस्त दुरुस्त हो लेते हैं फौरन! दौड़ते भागते हैं और फिट बने रहना चाहते हैं! स्वस्थ इंडिया बनाने में सबसे ज़्यादा योगदान बूढ़े दूल्हे का होता है! उनकी खूबसूरत दुल्हन को देखकर पूरी कॉलोनी, पूरा गाँव, पूरा शहर फिट होने के प्रति आग्रही हो जाता है, तोंदों की शामत आ जाती है! स्पोर्ट्स शू की बिक्री बढ़ जाती है एकाएक! सारे नागरिक सुबह सुबह दौडऩा शुरू कर देते है, पूरी कोशिश करते हैं कि उनके रास्ते में इस नवविवाहित बुजुर्ग दूल्हे का घर जरूर पड़े! अमिताभ बच्चन ने भी बताया ही है कि देश की इकोनॉमी तभी स्वस्थ रह सकेगी जब देश में हर आदमी स्वस्थ हो! ऐसे में स्वस्थ, पुनर्विवाहित बूढ़े देश की इकोनॉमी में उत्प्रेरक का काम करते हैं!
और फिर आसपास के दस बीस किलोमीटर के इलाके में कानून और व्यवस्था सुधर जाती है! लोग नववधू के समक्ष, अनुशासित, सभ्य और शांतिप्रिय दिखने के लिये मरे जाते है! शादीशुदा जोड़े से नमस्ते करने के चक्कर में पूरे गाँव के कुत्ते बिल्ली तक को प्रणाम करने लगते हैं लडक़े! जाहिर है अमन चैन और भ्रातृत्व का वातावरण बनता है इससे! पुलिस और कोर्ट के पास ज़्यादा काम नहीं रह जाता! बतौर नागरिक, राज्य आपसे और क्या अपेक्षा कर सकता है!
आसपास रहते सारे अधेड़, बाल रंगवाने के लिये लाइन लगा लेते हैं हेयर कटिंग सेलून पर! बाल काटने वाला होशियार बंदा इन्हे फेशियल, मेनीक्यौर, पैडीक्यौर के बिना जाने जाने नहीं देता! नये चलन के कपड़े खरीदने बिना कैसे रह सकता है मोहल्ला ऐसे में शहर के खडख़ड़ाते बुजुर्गों के अलावा कपड़ों की दुकान में जान आ जाती है! देश की अर्थव्यवस्था को चार चाँद लगने की स्थितियाँ निर्मित होने लगती है! किसी भी बुजुर्ग के शादी करने के ये सकारात्मक प्रभाव है!
और फिर सबसे बड़ा लाभ! निकटवर्ती सारे लोग आशावादी और खुशमिजाज हो उठते हैं! ऐसा लगता है कि अब आनंद मंत्रालय की कोई जरूरत ही नहीं रही हमें! सारे रिश्तेदार, अड़ोसी पड़ोसी, मिलनसार होकर ऐसे प्रेम से भर जाते हैं कि उन पर भरोसा करने का मन होने लगता है! जि़ंदा रहने के लिये आप और क्या चाह सकते है!
ऐसे में मन बड़ा कीजिये ! बधाई दीजिये अरूणलाल को! प्रार्थना कीजिये भगवान से कि सुअवसर उपस्थित होने पर, कोई कमनीय बुलबुल चहके आपके आँगन में भी! वैसा ही सुंदर अरुणोदय हो आपके जीवन में, जैसा उनके साथ हुआ है!
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के तौर पर सतपाल मलिक ने जो अद्भुत काम किया है, मेरी स्मृति में इतना साहसिक कार्य किसी अन्य राज्यपाल ने भारत में पहले कभी नहीं किया। उन्होंने 300 करोड़ रु. की रिश्वत को ठोकर मार दी। यदि वे उन दो फाइलों पर अपनी स्वीकृति के दस्तखत भर कर देते तो अनिल अंबानी की एक कंपनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक नेता उन्हें 300 करोड़ रु. आसानी से दिलवा देते। जब मलिक ने छह-सात माह पहले इस प्रकरण को सार्वजनिक जिक्र किया तो मुझे एकाएक विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि आरएसएस के कार्यकर्त्ता इस तरह के अनुचित कार्यों से प्राय: दूर ही रहते हैं।
उनके और मेरे कुछ मित्रों ने कहा कि उन्हें पहले कश्मीर से गोवा और फिर वहां से मेघालय भेज दिया गया तो वे बस इस तबादले पर अपनी नाराजी निकाल रहे हैं लेकिन मैं सतपाल मलिक को उनके छात्र-काल से जैसा जानता हूं, मुझे लगता था कि उनके जैसा सत्यनिष्ठ और निर्भीक नेता ऐसे निराधार आरोप कैसे लगा सकता है। सतपाल मलिक की हिम्मत ने अब रंग दिखा दिया। जम्मू-कश्मीर के वर्तमान उप-राज्यपाल मनोज सिंह ने जो कि खुद मलिक की तरह लोकप्रिय छात्र-नेता रहे हैं, दोनों मामले सीबीआई को सौंप दिए हैं।
जम्मू-कश्मीर में भ्रष्टाचार के ऐसे मामलों की लंबी परंपरा है। जब शासन मुख्यमंत्रियों के हाथ में होता है तो वे बेलगाम होकर भ्रष्टाचार करते हैं। कश्मीर में भ्रष्टाचार का दूसरा नाम शिष्टाचार है। जिन दो मामलों की जांच चल रही है, उनमें एक जम्मू का कीरू हाइडल पॉवर प्रोजेक्ट है और दूसरा प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों के स्वास्थ्य बीमे से संबंधित है। इन दोनों मामलों में जम्मू-कश्मीर के हजारों करोड़ रु. खपने थे।
पहले तो इनके टेंडर जारी करने में घपले हुए और फिर जब टेंडर जारी किए गए तो उनमें कई शर्तो का पालन नहीं किया गया। अंबानी की कंपनी को 61 करोड़ रू. का अग्रिम भुगतान भी हो गया। लगभग 4 हजार करोड़ के दूसरे प्रोजेक्ट में भी पता नहीं कितना घपला होता। सरकारी अफसरों ने सारी अनियमितताओं की अनदेखी कर दी और टेंडर भी पास कर दिए। यदि राज्यपाल आपत्ति नहीं करते तो हमेशा की तरह सारा खेल आराम से चलता रहता लेकिन विभागीय जांच से पता चला कि इन दोनों कंपनियों को हरी झंडी दिखाने के काले काम में सरकार के ऊँचे अफसरों की भी मिलीभगत है।
जाहिर है कि उन्होंने भी रिश्वत खाई होगी। उन अफसरों के खिलाफ पुलिस ने रपट लिख ली है और केंद्रीय जांच ब्यूरो ने जांच शुरु कर दी है। उप-राज्यपाल मनोज सिंहा ने पर्याप्त सख्ती और मुस्तैदी दिखाई, वरना जम्मू-कश्मीर को भारी नुकसान भुगतना पड़ता। भ्रष्टाचारी व्यवसायी और अफसरों की तो जेबें भरतीं लेकिन कश्मीरी नौजवानों को रोजगार के नाम पर कोरा अंगूठा मिलता। यदि अन्य प्रदेशों के राज्यपाल भी ऐसी ही सतर्कता का परिचय दें तो भ्रष्टाचार पर थोड़ा-बहुत अंकुश जरुर लग सकता है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
फ्रांस में इमेनुएल मेक्रों फिर से राष्ट्रपति का चुनाव जीत गए हैं। 20 वर्षों में यह दूसरा मौका है, जब कोई नेता लगातार दूसरी बार फ्रांस का राष्ट्रपति बना है। मेक्रों दूसरी बार भी जीत गए लेकिन दो तथ्य ध्यान देने लायक हैं। पहला, 2017 के पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में मेक्रों को वोट कम मिले। पिछले चुनाव में उन्हें अपने प्रतिद्वंदी मरीन ल पेन से लगभग दुगुने वोट मिले थे लेकिन इस बार यह फासला काफी कम हो गया।
मेक्रों को 58.5 प्रतिशत तो ल पेन को 41.5 प्रतिशत वोट मिले। चुनाव के दौरान अफवाहें तो यह भी थीं कि ल पेन मेक्रों को हरा सकती थीं। ल पेन एक ऐसी फ्रांसीसी महिला नेता हैं, जो धुर दक्षिणपंथी हैं। जबकि मेक्रों वामपंथी नहीं हैं। वे मध्यममार्गी हैं। फ्रांस के इस चुनाव ने लोगों का दम फुला रखा था। यदि ल पेन जीत जातीं तो लोगों को डर था कि वे यूक्रेन के मामले में रूस का समर्थन कर देतीं, क्योंकि व्लादिमीर पूतिन से उनके संबंध काफी अच्छे हैं। वे उग्र राष्ट्रवादी हैं। इसलिए शंका यह भी थी कि जैसे ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर निकल आया, ल पेन फ्रांस को भी यूरोपियन संघ और शायद नाटो से भी बाहर निकालने की कोशिश करें। मेक्रों के वोट इतने कम हो गए और ल पेन जीत नहीं पाई, इसका एक कारण यह भी रहा कि 28 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान में भाग ही नहीं लिया। इस बीच फ्रांस में बेरोजगारी और मंहगाई ने लोगों की कमर तोड़ रखी थी। मेक्रों ने पिछले चुनाव में बढ़-चढक़र जो दावे किए थे, उन्हें वे जमीन पर नहीं उतार सके। मेक्रों ने अपनी जीत के बाद जो बयान दिया, वह फ्रांस की राजनीति का प्रामाणिक आईना है। उन्होंने कहा है कि उनकी समस्त कमजोरियों के बावजूद फ्रांस की जनता ने उन्हें इसीलिए जिताया है कि वह फ्रांस को दक्षिणपंथी उग्रवादियों के हवाले नहीं करना चाहती।
जून में होनेवाले संसदीय चुनाव में भी मेक्रों की जीत की संभावना काफी अच्छी है। मेक्रों की उम्र इस समय सिर्फ 44 साल है। वे राजनीति में आने के पहले बेंकर थे। उम्मीद है कि वे अगले पांच साल में फ्रांस की आर्थिक स्थिति में कई सुधार ले आएंगे। उन्होंने इस्लामी उग्रवादियों को काबू करने के लिए कई प्रतिबंध लगाए हैं लेकिन वे ल पेन की तरह इस्लाम-द्रोह से ग्रस्त नहीं हैं। विदेश नीति के मामले में भी उन्होंने न तो अमेरिका-विरोधी मोर्चा खोला है और न ही वे रूस से दुश्मनी गांठने का दावा करते हैं। उन्होंने यूक्रेन-युद्ध के दौरान पूतिन और झेलेंस्की दोनों से संवाद कायम किया था। भारत से भी पिछले पांच वर्षों में फ्रांस के आर्थिक और सामरिक संबंध घनिष्ट हुए हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में यद्यपि फ्रांस चौगुटे का सदस्य नहीं है लेकिन भारत और उसकी नीतियों में काफी समानता है। यूरोपीय संघ के साथ भारत के जो ताजा आर्थिक और राजनीतिक समीकरण बने हैं, उनमें भी फ्रांस की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होगी क्योंकि फ्रांस यूरोपीय संघ का सबसे बड़ा और शक्तिशाली राष्ट्र है। भारतीय प्रधानमंत्री की अगले सप्ताह होनेवाली यूरोप-यात्रा के दौरान भारत-फ्रांस संबंधों की घनिष्टता पर अब फिर से मुहर लगेगी। (नया इंडिया की अनुमति से)
हुकूमत अगर बहुसंख्यक वर्ग के कट्टरपंथी दंगाइयों के साथ खड़ी नजर आती हो तो लोकतंत्र और अल्पसंख्यकों की रक्षा की जिम्मेदारी किसे निभानी चाहिए? असगर वजाहत एक जाने-माने उपन्यासकार, नाटककार और कहानीकार हैं। उनके प्रसिद्ध नाटक ‘जिन लाहौर नई वेख्या, ओ जन्मयाई नई’ (1990)का दुनिया के कई देशों में मंचन हो चुका है। हाल में घटी साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं के सिलसिले में असगर ने ‘’हिंदू-मुस्लिम सद्भावना और एकता के लिए कुछ विचारणीय बिंदु’ शीर्षक से बहस के लिए एक महत्वपूर्ण नोट अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है। नोट में उल्लेखित दस बिंदुओं में बहस के लिहाज से दो बिंदु ज्यादा महत्व के हैं: पहला और अंतिम।
अपने पहले बिंदु में असगर कहते हैं- ‘मुस्लिम समुदाय के लिए यह मानना और उसके अनुसार काम करना बहुत आवश्यक है कि देश में लोकतंत्र मुसलमानों के कारण नहीं बल्कि हिंदू बहुमत के कारण स्थापित है और हिंदू बहुमत ही उसे मजबूत बनाएगा। इसलिए अल्पसंख्यकों के अधिकारों की कोई लोकतांत्रिक लड़ाई सेकुलर और डेमोक्रेटिक हिंदुओं का साथ लिए बिना नहीं लड़ी जा सकती।’
असगर अपने दसवें या अंतिम बिंदु में कहते हैं कि संभ्रांत मुसलिम समुदाय और साधारण गरीब मुसलमानों के बीच एक बहुत बड़ी दीवार है जिसे तोडऩा और जरूरी है।
पिछले सात-आठ साल या उसके भी पीछे जाना हो तो गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगों की घटनाओं ने इस भ्रम को तोड़ दिया या कमजोर कर दिया है कि देश में आजादी के जमाने जैसी सेकुलर और डेमोक्रेटिक हिंदुओं की ऐसी कोई जमात बची हुई है जो हर तरह के अल्पसंख्यकों (जिनमें दलितों को भी शामिल किया जा सकता है) के मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए किसी लोकतांत्रिक लड़ाई के लिए तैयार है! असगर जिन सेकुलर और डेमोक्रेटिक हिंदुओं की बात कर रहे हैं उनमें अधिकांश मुसलमानों के नुमाइंदों के तौर पर संभ्रांत मुस्लिमों की ओर से और दलितों के प्रतिनिधियों के रूप में दलितों की तरफ से मंत्रिमंडलों में शामिल सुविधाभोगी पिछड़े नेताओं की तरह ही हो गए हैं।
दिल्ली में जहांगीरपुरी (लगभग एक लाख आबादी) के छोटे से इलाके में जब गरीब मुसलमानों की बस्तियाँ उजाड़ी जातीं हैं तो राजधानी के कोई बाईस लाख मुसलमानों को बुलडोजरों की आवाज ही सुनाई नहीं पड़ती। डेमोक्रेटिक हिंदुओं का वहाँ इसलिए पता नहीं पड़ता कि संभ्रांत मुसलिमों की तरह ही वे भी अपनी जान जोखिम में डालने से बचना चाहते हैं। इस तरह के प्रसंगों में यह सच्चाई बार-बार दोहराई जाती है कि दूसरे विश्वयुद्ध (1941-45) के दौरान जब हिटलर के नेतृत्व में कोई साठ लाख निर्दोष यहूदियों की जानें लीं जा रहीं थीं आठ करोड़ जर्मन नागरिक मौन दर्शक बने नरसंहार होता देख रहे थे। ‘न्यूयॉर्क टाईम्स’ अखबार ने हाल ही में एक समाचार में बताया है कि जर्मनी की अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय ब्रांड वाली जिन बड़ी-बड़ी कार कम्पनियों पर टिकी हुई है उनकी बागडोर हिटलर के जमाने में हुए यहूदियों के नरसंहार के गुनहगार पूँजीपतियों की पीढ़ी के हाथों में ही है और वह किसी भी तरह के अपराध बोध से ग्रसित नहीं है।
सितम्बर 2015 में यूपी के दादरी में मोहम्मद अखलाक की मॉब लिंचिंग और उसके बेटे दानिश की पिटाई से मौत के दौरान जो सेकुलर और डेमोक्रेटिक हिंदू-मुसलमान मूक दर्शक बने रहते हैं वे ही खरगोन और जहांगीरपुरी में भी आँखें चुराते हैं। जहाँगीरपुरी में काफी कुछ तबाह हो जाने के बाद भी जब कोई वामपंथी महिला नेत्री वृंदा करात बुलडोजर के सामने अकेली खड़े होने का साहस दिखाती है तो पीडि़तों को कुछ उम्मीद बंधने लगती है।
असगर जब कहते हैं कि संभ्रांत और साधारण गरीब मुसलमानों के बीच एक बहुत बड़ी दीवार है तो वे यह कहने में संकोच करते हैं कि हालत बहुसंख्यक समाज में भी लगभग ऐसी ही है। साधारण गरीब मुसलमान का नेतृत्व भी कट्टरपंथी कर रहे हैं और असगर जिसे ‘हिंदू बहुमत’ कहते हैं उसकी कमान भी कट्टरपंथियों की पकड़ में ही है। सेकुलर और डेमोक्रेटिक हिंदू तथा मुसलमान दोनों ही अपनी-अपनी जमातों में अल्पसंख्यक हैं। गिनने जितने बचे मैदानी सेकुलर और डेमोक्रेटिक हिंदुओं (और मुसलमानों) में समाजवादियों और वामपंथियों को माना जा सकता है। वामपंथियों के बारे में यह याद रखते हुए कि इंदिरा गांधी के लोकतंत्र-विरोधी आपातकाल का उन्होंने खुला समर्थन किया था।
यह अवधारणा कि देश में लोकतंत्र हिंदू बहुमत के कारण स्थापित है और वही (हिंदू बहुमत) उसे मजबूत बनाएगा उस सच्चाई के सर्वथा विपरीत है जिसके कि हम एक नागरिक के तौर पर प्रत्यक्षदर्शी और एक सेकुलर तथा डेमोक्रेटिक हिंदू के रूप में अपराधी हैं। हम चुपचाप खड़े देख रहे हैं कि हिंदू बहुमत का उपयोग देश में लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय भारत को एक हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए किया जा रहा है। भाजपा की समझ में आ गया है कि मुसलमान और दलित जिन ताकतों को सेकुलर और डेमोक्रेटिक मानकर अपना वोट बेकार करते रहे हैं वे हकीकत में कभी मौजूद ही नहीं थीं।बालों की सफेदी को ढाँकने की तरह ही पार्टियाँ सेकुलरिज्म की डाई का इस्तेमाल कर रहीं थीं। चुनाव-दर-चुनाव प्राप्त होने वाले नतीजों में इस नकली सेकुलरिज्म का कलर उतरता गया। इसीलिए जब केसरिया बुलडोजर चलते हैं तो केवल वर्दीधारी पुलिस ही नजर आती है सेकुलरिस्ट या गांधीवादी नहीं।
जो हुकूमत इस समय सत्ता में है वह न तो सेकुलर है और न ही उसका सेकुलर हिंदुओं की ताकत या उनकी राजनीतिक हैसियत में कोई यकीन है। यह हुकूमत परम्परागत मंदिरमार्गी हिंदुओं के दिलों में मुसलमानों या इस्लाम के खिलाफ खौफ की बुनियाद पर कायम हुई है और आगे भी उसी को अपनी सत्ता की स्थायी ताकत बनाना चाहती है। अटल जी सहित भाजपा के दूसरे नेताओं की कथित छद्म धर्मनिरपेक्षता इस तरह की जोखिम उठाने से डरती थी।मोदी ने करके दिखा दिया। इस विरोधाभास को संयोग भी माना जा सकता है कि सर्व धर्म समभाव को लेकर सत्य के प्रथम प्रयोग भी गुजरात में हुए थे और बाद में कट्टर हिंदुत्व की प्रयोगशाला भी गुजरात ही बना। एक के नायक मोहनदास करमचंद गांधी बने और दूसरे के नरेंद्र दामोदरदास मोदी।
लोकतंत्र की लड़ाई अब उतनी सहज नहीं रही है जितनी कि असगर अपने सुझावों के जरिए बताना या बनाना चाह रहे हैं (मसलन- ‘देश में एकता और शांति के महत्व और आवश्यकता पर एक बड़ा राष्ट्रीय सम्मेलन किया जाना चाहिए जिसमें अंतिम दिन दंगा-प्रभावित क्षेत्र में कैंडल मार्च निकाला जा सकता है।)। लड़ाई लम्बी चलने वाली है क्योंकि किन्ही विदेशी ताकतों के खिलाफ नहीं है। चूँकि हमारे बीच कोई महात्मा गांधी उपस्थित नहीं हैं लड़ाई के अहिंसक परिणामों को लेकर कोई गारंटी भी सुनिश्चित नहीं समझी जा सकती है।मैंने अपने पूर्व के एक आलेख में उद्धृत किया था कि जैसे-जैसे लोगों के पेट तंग होते जाते हैं, हुकूमत के पास उन्हें देने के लिए ‘हिंदुत्व’ और ‘राष्ट्रवाद’ के अलावा कुछ और नहीं बचता। अत: सभी तरह के साधारण और गरीब अल्पसंख्यकों को प्रतीक्षा करना होगी कि उनके अधिकारों की लड़ाई में सेकुलर हिंदू और संभ्रांत अल्पसंख्यक नहीं बल्कि वे धर्मप्राण हिंदू ही साथ देंगे जो मुफ्त के सरकारी अनाज के दम पर राष्ट्रवाद के नारे लगाते-लगाते एक दिन पूरी तरह से थक जाएँगे और अपने लिए ज्यादा आजादी की माँग करेंगे।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पंचायती राज दिवस के उपलक्ष्य में कल प्रधानमंत्री ने जम्मू में ऐसी परियोजनाओं का शिलान्यास किया है, जिनसे जम्मू-कश्मीर की जनता को बड़ी राहत मिलेगी। 20 हजार करोड़ रु. सरकार लगाएगी और 38 हजार करोड़ रु. का निवेश पिछले दो साल में हो चुका है। प्रधानमंत्री के साथ दुबई और अबू धाबी के निवेशक भी उस समारोह में उपस्थित थे। इस निवेश से कश्मीर के लोगों की सुविधाएं बढ़ेंगी और लाखों नए रोजगार भी पैदा होंगे।
जम्मू के पत्ली गांव में 500 किलोवाट के सोलर प्लांट का शुभारंभ करके उन्होंने सारे देश को संदेश दिया है कि भारत चाहे तो अगले कुछ ही वर्षों में बिजली, ईंधन और तेल के प्रदूषण से मुक्त हो सकता है। बनीहाल से क़ाजीगुंड तक की सुरंग जैसे कई निर्माण-कार्य संपन्न होंगे, जिनके परिणामस्वरुप आवागमन और यातायात अधिक सुरक्षित और सुगम हो जाएगा। केंद्र सरकार आजकल जम्मू-कश्मीर के लिए पहले की तुलना में ज्यादा योगदान कर रही है। उसके कुल खर्च का 64 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार देती है।
देश के बहुत कम राज्यों को इतनी बड़ी मात्रा में केंद्र सरकार की मदद मिलती है। पंचायत राज दिवस के दिन जम्मू-कश्मीर के लिए की गई इन घोषणाओं का स्वागत है लेकिन यह बड़ा सवाल भी विचारणीय है कि देश में पंचायतों को हमने अधिकार कितने दिए हैं? पंचायतों को ताकतवर बनाने का अर्थ है— सत्ता का विकेंद्रीकरण! क्या केंद्र और राज्यों की सरकारें इसके लिए सहर्ष तैयार हैं। जम्मू-कश्मीर में लोगों की शिकायत यह भी है कि अगस्त 2019 में उसका जो विशेष दर्जा खत्म किया गया था, उसे केंद्र सरकार कब तक अधर में लटकाए रखेगी? प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों ने आश्वासन दिया था कि उसे राज्य का दर्जा फिर से वापस किया जाएगा। गुपकर गठबंधन ने उस विशेष दर्जे की मांग जोरों से की है।
उसने 2020 के जिला विकास परिषद के चुनावों में स्पष्ट विजय भी हासिल की थी। उसे यह शिकायत भी है कि विधानसभा में जम्मू की 6 सीटें बढ़ाकर कश्मीर को हल्का किया जा रहा है। कश्मीरी नेताओं का वर्तमान प्रतिबंधों से दम घुट रहा है, इसमें शक नहीं है लेकिन कश्मीर में पहले के मुकाबले इस समय शांति और व्यवस्था बेहतर है, यह भी सत्य है। आतंकी घटनाएं भी कभी-कभी होती रहती हैं लेकिन बड़े पैमाने पर इधर कोई आतंकी घटना की खबर नहीं है।
इसका श्रेय मुस्तैद उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा और उनके योग्य अफसरों को है लेकिन जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति तभी बनेगी, जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया वहां बाक़ायदा शुरु हो जाएगी। अब जम्मू-कश्मीर बाहरी लोगों के लिए भी खुल गया है। वे वहां अन्य प्रांतों की तरह जाकर रह सकते हैं। गर्मियों में पर्यटकों की संख्या बढ़ जाने से लाखों लोगों की आर्थिक राहत भी बढ़ी है। इसके अलावा पाकिस्तान में शहबाज़ शरीफ की सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह सीमा-पार आतंकवाद पर सख्ती से काबू करेगी और कश्मीर के सवाल पर भारत सरकार के साथ सार्थक संवाद भी करेगी।
प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीरियों को जो यह संदेश दिया है कि आपके माता-पिता और उनके माता-पिता ने जैसी तकलीफें सही हैं, वैसी आपको अब नहीं सहनी पड़ेंगी, अपने आप में दिल को छूनेवाला है। उम्मीद है कि ऐसा माहौल कश्मीर में शीघ्र ही बन सकेगा। कश्मीर में लोक-कल्याण तो बढ़ गया है लेकिन लोकतंत्र की वापसी भी उतनी ही जरुरी है। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमन की अध्यक्षता में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे कई फैसले किए हैं, जिनसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सम्मान में वृद्धि हुई है। उन्होंने तमिलनाडु के उच्च न्यायालय भवन की नींव रखते समय जो भाषण दिया, उसमें उन्होंने अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। वह है— भारत की न्याय-व्यवस्था के भारतीयकरण का। यह मुद्दा उठाने के पहले उन्होंने कहा कि हमारी अदालतों का आचरण ऐसा होना चाहिए, जिससे आम जनता के बीच उनकी प्रामाणिकता बढ़े। उनके फैसलों में कानूनों को अंधाधुंध तरीके से थोपा नहीं जाना चाहिए। न्याय सिर्फ किताबी नहीं होता। उसका मानवीय स्वरूप ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
इसी तरह न्याय द्रौपदी के चीर की तरह लंबा भी नहीं होना चाहिए। अब भी देश की अदालतों में लगभग 5 करोड़ मुकदमे लटके हुए हैं। कई मुकदमे 30-30, 40-40 साल तक चलते रहते हैं। उन्हें लडऩेवाले लोग और वकील भी कई मामलों में दिवंगत हो चुकते हैं। यह इंसाफ नहीं, इंसाफ का मजाक है। न्यायमूर्ति रमन ने बताया कि देश में 1104 जजों के पद हैं लेकिन उनमें से 388 अभी भी खाली पड़े हैं। उन्होंने विधानपालिका और कार्यपालिका द्वारा किए गए अतिक्रमणों का भी जिक्र किया। न्यायाधीशों को इन मामलों में नागरिकों का हित सर्वोपरि रखना चाहिए और सरकार, संसद व विधानसभाओं से कोई मुरव्वत नहीं करनी चाहिए। उन्होंने हमारी न्याय-व्यवस्था के भारतीयकरण का बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा भी अपने भाषण में उठा दिया। भारतीयकरण का अर्थ क्या है? यही है कि हमारा कानून आजादी के 75 साल बाद भी मूलत: औपनिवेशिक ढर्रे पर चल रहा है। अंग्रेज के बनाए हुए कुछ कानून हमारी सरकारों ने रद्द जरुर किए हैं लेकिन अभी भी वही पुराना ढर्रा चला आ रहा है।
देश के सभी लोगों के लिए एक-जैसा कानून कब बनेगा? पहली बात तो यह है कि हमारे उच्च न्यायालयों में बहस और फैसले प्रादेशिक भाषाओं में क्यों नहीं होते? उसके लिए हमारे कानून पहले प्रादेशिक भाषाओं में ही बनने चाहिए। न्यायमूर्ति रमन ने कहा है कि आज के यांत्रिक मेधा के युग में अनुवाद की प्रक्रिया इतनी सरल हो गई है कि यह सुविधा आसानी से प्रदान की जा सकती है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस संबंध में पिछले दिनों अच्छी पहल की थी। यदि हमारे कानून संसद में मूल रूप से हिंदी में बनने लगें तो सभी भारतीय भाषाओं में उनका अनुवाद काफी सरल हो जाएगा। यदि न्याय-व्यवस्था का हमें भारतीयकरण करना है तो सबसे पहले उसे अंग्रेजी के शिकंजे से मुक्त करना होगा। इस समय भारत की न्याय-व्यवस्था जादू-टोना बनी हुई है। इसीलिए वह ठगी, विलंब और अन्याय का शिकार भी होती है। क्या देश में कभी कोई ऐसी सरकार भी आएगी, जो सचमुच न्याय व्यवस्था का भारतीयकरण कर सकेगी। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ब्रिटेन के कई प्रधानमंत्री और महारानी एलिजाबेथ भी भारत आ चुकी हैं लेकिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की यह यात्रा दोनों देशों के लिए जितनी सार्थक रही है, वह अपने आप में एतिहासिक उपलब्धि है। जॉनसन का साबरमती आश्रम जाना अपने आप में एक घटना है। जो आश्रम महात्मा गांधी ने बनाया था और जिस गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला दी थीं, उस गांधी के आश्रम में कोई ब्रिटिश प्रधानमंत्री जाए और जमीन पर बैठकर चरखा चलाए, यह अपने आप में एक किस्सा है।
चार किलोमीटर के रास्ते में जॉनसन का हजारों लोगों ने जैसा भाव-भीना स्वागत किया, वैसा उन्होंने पहले कभी देखा नहीं होगा। इसीलिए उन्होंने कह दिया कि उन्हें अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर जैसा अनुभव हो रहा है। ये ऐसे पहले अंग्रेज प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने भारत आकर हिंदी में मोदी को कहा कि वे उनके ‘खास दोस्त’ हैं। अंग्रेजी भाषा के गुलाम भारत में आकर कोई अंग्रेज प्रधानमंत्री हिंदी में बोले, यह अपने आप में अजूबा है। इसका पहला कारण तो यह है कि विश्व राजनीति और व्यापार में भारत का प्रभाव बढ़ रहा है।
दूसरा, आजकल की ब्रिटिश राजनीति में भारतीय मूल के नागरिकों का बढ़ता हुआ वर्चस्व है। अब क्योंकि ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर आ गया है, इसलिए भारत-जैसे बड़े राष्ट्रों के साथ उसे अपने राजनीतिक, व्यापारिक और सामरिक संबंध घनिष्ट भी बनाने हैं। यदि दिवाली तक दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता हो गया तो निश्चय ही कुछ वर्षों में भारत-ब्रिटेन व्यापार दुगुना हो सकता है। आस्ट्रेलिया और संयुक्त अरब अमीरात के साथ हुए भारत के मुक्त-व्यापार समझौते के सुपरिणाम अभी से दिखने लगे हैं।
भारत-ब्रिटेन समझौता तो नए हजारों रोजगार पैदा कर सकता है। जॉनसन ने यह भी कहा है कि उनकी सरकार योग्य भारतीयों को वीज़ा देने में उदारता बरतेगी। जॉनसन और मोदी ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में भी सामरिक सहकार पर सहमति व्यक्त की है। जॉनसन ने ब्रिटेन द्वारा भारत को बेचे जानेवाले शस्त्रों, नई सामरिक तकनीकों और सामुद्रिक निगरानी की कई तकनीको को देने का भी वादा किया है। दोनों राष्ट्रों ने शस्त्र-निर्माण के संयुक्त कारखाने खोलने का भी संकल्प किया है। अफगान जनता को पहुंचाई जानेवाली भारतीय सहायता की जॉनसन ने प्रशंसा की और दोनों पक्षों ने अफगानिस्तान को आतंकवाद का अड्डा बनाने का विरोध किया। दोनों राष्ट्रों ने अफगानिस्तान में सर्वसमावेशी सरकार को जरुरी बताया।
ऐसा लग रहा था कि इस दिल्ली-यात्रा के दौरान जॉनसन की कोशिश यह होगी कि वे भारत को अपनी तरफ झुकाएंगे याने उसे रूस की आलोचना के लिए मजबूर करेंगे लेकिन इसका उल्टा ही हुआ। जॉनसन ने भारत की यूक्रेन-नीति की सराहना की और मोदी की तारीफ में कई कसीदे काढ़ दिए। उन्होंने ब्रिटेन में सक्रिय कई खालिस्तानी और आतंकवादी संगठनों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भी वायदा किया।
उन्होंने भारत को खुश करने के लिए यह भी कह दिया कि वे सीमा-पार से आनेवाले आतंकवाद की कड़ी भर्त्सना करते हैं। ऐसा लगता है कि इस यात्रा के दौरान जो समझौते और संवाद हुए हैं, वे इन दोनों देशों को संबंधों के नए और ऊँचे धरातल पर पहुंचा देंगे। (नया इंडिया की अनुमति से)
भारतीय राजनीति में एक अंतर्धारा बह रही जैसे पौराणिक किंवदंतियों की सरस्वती नदी। है भी और नहीं भी दिखाई देती, लेकिन अस्तित्व में कही जाती है। हिन्दू मुस्लिम राजनीति लगातार वाचाल ककहरा है। उसकी आड़़ में हिन्दुओं की सवर्ण श्रेष्ठता ने क्षत्रिय और वणिक कुल पर रणनीति कायम करने भरोसा किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तमाम दिमागी संकीर्णताओं के आरोप के बावजूद सादगी, शुचिता, स्वदेशी और सामाजिक समरसता का मुखौटा लगाकर सत्तानशीन होने धीरे-धीरे तयशुदा इरादों के साथ बढ़ता रहा। अपने शताब्दी समारोह (2025) के पहले उसने काफी फतह हासिल कर ली है।
हालिया यह लगता है कि भाजपा के चाल और चरित्र में संघ को विकार दिख रहे होंगे। उसे डर होगा ये विकार भाजपा को सत्ता से बेदखल न कर दें। संघ ने धीरज रखते आठ नौ दशकों की प्रतीक्षा के बाद सत्ता हासिल की है। इसलिए नया शिगूफा छेडक़र एक समर्पित शख्सियत को ढूंढा। तेज तर्रार, चपल, वाचाल इंकम टैक्स ऑफिसर की नौकरी छुड़ाकर उसे दक्षिण पंथ के एक नए सत्ताभिमुख चरित्र के रूप में तराशना शुरू किया। अरविंद केजरीवाल संघ चिन्तन के उत्पाद हैं। नरेन्द्र मोदी के आत्ममुग्ध, प्रभावशाली, महत्वाकांक्षी लेकिन अनियंत्रित होते व्यक्तित्व के पूरे विपक्षी स्पेस को भी संघ अपने एकाधिकारवाद में हासिल कर रखना चाहता होगा। चाहता होगा सभी विपक्षी पार्टियां गुमनामी के हाशिए में धकेल दी जाएं। भाजपा के सत्ताच्युत होने की हालत में केजरीवाल की अगुआई में आम आदमी पार्टी को सामने किया जाए। संघ परिवार के विराट छाते के नीचे सत्ता और विपक्ष दोनों नंबरदारी करते रहें।
योजना के मुख्य किरदार केजरीवाल गौरव के साथ घोषणा करते हैं कि वे और उनका परिवार संघ के समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं। शाहीन बाग, नागरिकता कानून, कशमीर अवमूल्यन, किसान आंदोलन, जहांगीरपुरी बुलडोजर कांड जैसी तमाम घटनाओं में केन्द्र सरकार का साथ देते हैं। दिल्ली में सरकार बनाकर पॉलिटिक्स को ही मैनेजमेंट में बदल देते हैं। समर्थ, सवर्ण और आलिम फाजिल मतदाताओं की धड़ेबंदी करके मुफलिसों को समझा देते हैं कि देश में नया हातिमताई आया है। वह पहली बार दिल्ली को स्कूल, अस्पताल, बिजली, पानी, सडक़ वगैरह मुहैया करा रहा है। नागरिकों को सरकार से इससे ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
केजरीवाल संविधान के मूल अधिकारों और नागरिक आजादी की बात जानबूझकर नहीं करते। संघ विचार में भारतीय संविधान ही अनावश्यक दस्तावेज है। उसे खत्म करते हिन्दू राष्ट्र बनाना है। केजरीवाल भारत की राजधानी में रहकर भी नागरिकों को शिक्षण नहीं देते। वे हर सरकारी अत्याचार के खिलाफ गांधी की तरह जनसंघर्ष करने की सीख मिटाते चलते हैं। उनकी पूरी ताकत दिल्ली सरकार की संवैधानिक और प्रशासनिक हैसियत बढ़ाने की रहती है। वे पंजाब के सरकारी अधिकारियों को गोपनीय दस्तावेजों सहित आम आदमी पार्टी के संयोजक की हैसियत में दिल्ली बुला लेते हैं और दखलंदाजी करते निर्देष जारी करते हैं। केन्द्र शासित सीमित अधिकारों वाली दिल्ली सरकार के मुखिया अपनी ही पार्टी के पूर्ण अधिकार प्राप्त पंजाब के मुख्यमंत्री को अपना मातहत दिखा देते हैं। विरुद्ध टिप्पणी करने पर पार्टी में रहे कवि कुमार विश्वास के खिलाफ पुलिसिया कार्यवाही कराते हैं। अपने से उम्र और अनुभव में वरिष्ठ ख्यातनाम वकील प्रशांत भूषण, समाजविद प्रा.े आनंद कुमार, एक्टिविस्ट योगेन्द्र यादव, पत्रकार आशुतोष, प्रशासक किरण बेदी वगैरह को पार्टी से बाहर कर एकला चलो गाते हैं।
उम्र, अनुभव तथा सामाजिकी ज्ञान में उनसे वरिष्ठ पार्टी में नहीं रह पाता। सुनिश्चित करते हैं एकक्षत्र हुकूमत चलती रहे। केजरीवाल छोटे मोदी या भविष्य के मोदी की तरह तराशे जा रहे हैं। मोदी ने अडानी और अंबानी की हैसियत के विश्व स्तर के खरबपतियों को हासिल कर रखा है। देश की दौलत गैरकानूनी तौर से उनको दहेज की तरह देते हैं। मझोले दर्जे के सत्ता सुलभ उद्योगपति भी हैं। उनमें से कई केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं के साथ संबद्ध होने से धन की कमी अब महसूस नहीं हो रही। जनता का केवल स्कूल, अस्पताल, पेयजल, बिजली, सडक़ जैसी अधोसंरचनाओं में कुछ इजाफा या बेहतरी देखकर जनता होने का संवैधानिक संतोष मिलने लगता है।
ऐसा नहीं कि केजरीवाल केवल मिट्टी के माधो हैं। इसलिए चुने गए हैं कि उनमें अपना भी कुछ माद्दा है। नरेन्द्र मोदी की मीडिया तकनीक का इस्तेमाल करते केजरीवाल ने अपनी स्टार वैल्यू पैदा कर ली है। वे हताष मतदाताओं को दिल्ली के बाहर भी राबिनहुड नजर आने लगे हैं। केजरीवाल बहुत सयानी समझदारी के तिलिस्म के साथ भाजपा पर दोस्ताना हमला करते हैं। उससे विपक्ष का सांप मर जाए और भाजपा की लाठी नहीं टूटे। विवेक अग्निहोत्री की ‘दी कश्मीर फाइल्स’ का मजाक उड़ाते उन्होंंने मोदी का भी सस्ती लोकप्रियता पाने के किरदारों में शुमार कर लिया। दिल्ली विधानसभा के भाषण में भाजपा सदस्यों पर कटाक्ष करते शातिराना अंदाज में कह दिया भाजपा छोड़ो। आम आदमी पार्टी में शामिल हो। जिस पार्टी से खुंदक है, उसी पार्टी के सदस्यों को बहलाने फुसलाने का मतलब? कभी नहीं कहा प्रगतिशील, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष ताकतें उनके साथ जुडें़। चतुर केजरीवाल ने दिल्ली का दुबारा मुख्यमंत्री बनने या पंजाब में पहली बार सरकार बनने पर किसी राज्य के मुख्यमंत्री को आमंत्रित नहीं किया। दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने पर अलबत्ता कहा वे केवल प्रधानमंत्री को बुला सकते हैं क्योंकि केन्द्र सरकार से काम रहता है।
केजरीवाल में दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक एवं अन्य वंचित वर्गों के लिए प्राथमिकता भी नहीं है। दिल्ली और पंजाब से राज्यसभा में आम आदमी पार्टी ने सवर्ण और ज्यादातर धनाढ्य उम्मीदवार भेजे। राष्ट्रीय फलक पर आने यह महत्वाकांक्षा है। बहुजन की उपेक्षा अभी से उनके राजनीतिक अस्तित्व गर्भगृह में भ्रूण की तरह आ गई है। आनुपातिक आंकड़ेे बता सकते हैं छोटे प्रदेश दिल्ली ने जितना विज्ञापन मीडिया को परोसा है, कई राज्यों के मुकाबले ज्यादा होगा। केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की सफलता इसलिए भी है कि कई सरकारों ने प्रदेशों में बुनियादी जरूरतों स्कूल, अस्पताल, सडक़ें, पानी, बिजली वगैरह को मुनासिब अनुपात मेंं नहीं जुटाया। उनकी पार्टी ने यह काम कर दिखाया तो है। इसी बीच दिल्ली के जहांगीरपुरी बुलडोजर कांड की आड़ में दिलचस्प किरदार मोहम्मद अंसार उभरा है। एक ही थैली के चट्टे-बट्टे की तरह वह एक साथ अलग-अलग मौकों पर भाजपा और आम आदमी पार्टी की टोपी लगाए हुए है। दोनों पार्टियां एक-दूसरे को उलाहना दे रही हैं कि अंसार हमारी नहीं तुम्हारी पार्टी में है। मिली जुली कुश्ती या डबल क्रॉस का यह एक अनोखा विरल राष्ट्रीय उदाहरण है।
-दिनेश चौधरी
नगर पालिका कार्यालय के प्रवेश-द्वार के ठीक सामने चारदीवारी से घिरा एक बड़ा-सा कमरा था। इसी कमरे में सार्वजनिक वाचनालय हुआ करता था। अपना घर नगर-पालिका के पीछे थे। पीछे लोहे की सलाखों वाला गेट था और दो सलाखों के बीच इतना अंतराल था कि अपने सिर को धँसा दिया जाए तो वह आसानी से प्रवेश कर जाता था। एक बार सिर अंदर चला गया तो कंधों को समकोण पर मोड़ लेने से पूरी देह आर-पार हो जाती है। अंदर ठीक सामने जन्म-मृत्यु पंजीयन कार्यालय था और इसके बाद मुख्य कार्यालय। यह लाइब्रेरी जाने का अपना ‘शार्टकट’ था। यानी घर से लाइब्रेरी जाने में बमुश्किल डेढ़-दो मिनट लगते रहे होंगे। लाइब्रेरी के पीछे एक छोटा-सा मैदान था, जो हमारे खेलने के काम आता था।
वाचनालय का मासिक शुल्क दो रुपये था। लकड़ी और काँच से बनी किताबों की आलमारियां दीवार से लगी होती थीं। लाइब्रेरी में प्रवेश करते ही दायीं ओर लाइब्रेरियन की मेज और कुर्सी थी और इसके ठीक ऊपर गांधीजी की मढ़ी हुई लोकप्रिय फोटो, जिस पर स्थायी रूप से प्लास्टिक की माला चढ़ी होती। स्थायी ग्राहक होने के कारण लाइब्रेरियन से अपनी पक्की दोस्ती थी। लाइब्रेरी खुलने से पहले ही आस-पास भीड़ जमा हो जाया करती थी और जैसे ही दरवाजा खुलता लोग झुंड में टूट पड़ते। इस आतुरता की वजह नई पत्रिकाओं को हथियाने की होती थी। पत्रिकाओं में धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान, रविवार, माया, मनोहर कहानियां, सत्य कथा, सरिता, मुक्ता, कादम्बिनी, सारिका, माधुरी और मायापुरी वगैरह हुआ करती थीं। बच्चों की पत्रिकाओं में पराग, नन्दन, चंदामामा और बाल भारती होती थीं।
कॉमिक्स इस लाइब्रेरी में नहीं आती थी। तब ‘लोटपोट’ और ‘मधु मुस्कान’ बहुत पॉपुलर हुआ करते थे। अपने क्लास में कुछ सिंधी सेठों के बच्चे हुआ करते थे जो पढऩे में फिसड्डी थे। इनके यहाँ कॉमिक्स का ढेर लगा होता था, पर ये किसी को देते नहीं थे। इनके साथ अपना एक समझौता था। अपन होमवर्क में इनकी मदद करते और वे बदले में पढऩे के लिए कॉमिक्स देते। एक ‘दीवाना’ नाम की पत्रिका भी मुझे याद आ रही है। फैंटम और जादूगर मेंड्रेक की सीरीज रोज अखबारों में आती थी। जादूगर मेंड्रेक की लोथार के साथ जोड़ी वैसे ही पॉपुलर थी, जैसे चाचा चौधरी की साबू के साथ। फैंटम का ट्री हाऊस हाऊस हुआ करता था और उसके परिवार में पत्नी डायना और जुड़वाँ बच्चे रैक्स और लुई भी हुआ करते थे। कोई नाम-वाम गलत आ जाए, तो कृपया ठीक कर लें।
नई पत्रिकाएँ घर ले जाने नहीं मिलती थीं, उन्हें लाइब्रेरी में ही पढऩा होता था। साहित्यिक किताबों को लेकर कोई बंदिश नहीं थी। चूंकि इसके ग्राहक कम थे, इसलिए कितनी भी मात्रा में किताबे रजिस्टर में दर्ज कर घर ले जाई जा सकती थीं। लाइब्रेरियन आलसी था। किताबों और लेखक के नाम दर्ज करने के बदले सिर्फ संख्या दर्ज करता था। इसका भरपूर लाभ अपने एक परिचित ने उठाया, जिनके घर में वाचनालय की आधी से अधिक किताबे पायी जाती थीं। उन्हें कोई अपराध-बोध भी नहीं था, उल्टे वे इस बात का उल्लेख बड़े गर्व के साथ करते थे। उनसे प्रभावित होकर यशपाल की ‘चक्कर क्लब’ और ‘बात बात में बात’ मैंने भी उड़ाने की ठान ली थी, फिर सोचा कि अच्छी किताब है तो औरों के भी काम आनी चाहिए। दोनों बड़ी मजेदार किताबें थी। इसमें कामरेड किस्म के जीव मुफ्त की चाय-पकौड़ी के जुगाड़ में रहते हैं और मध्यमवर्गीय परिवारों में बतरस का आनन्द लेते हुए अपनी बात कह जाते हैं। निराला से लेकर बच्चन तक की किताबें यहाँ उपलब्ध थीं। ‘अंधा संगीतज्ञ’ भी यहीं मिलती थी और चेखव की कहानियां भी। विदेशी साहित्य मैं ज्यादा नहीं पढ़ पाता क्योंकि पात्रों और शहरों के नाम मुझे याद नहीं रहते। मुझे लगता कि अनुवादक जब अनुवाद में इतनी मेहनत करते हैं तो उन्हें पात्रों को भी मोहन-सोहन और गाँव-शहरों को रामपुर-श्यामपुर कर देना चाहिए, ताकि पढऩे में जरा आसानी हो जाए। ब्लादिमीर नोबोकोव जैसे नाम पढऩे में ही पसीना छूटता था। फिर भी जो थोड़ा-बहुत पढ़ पाया, उसका संस्कार यहीं से मिला।
लाइब्रेरी में बहुत तरह के लोग आते थे। ज्यादातर रिटायर्ड या अधेड़ उम्र के। नन्दन-पराग के चक्कर बच्चे भी खूब होते थे, अलबत्ता युवा कम ही दिखते थे। फिर भी आज के माहौल को देखते हुए उस संख्या को ठीक-ठाक कहा जा सकता है। आजकल के छोकरों की दिलचस्पी जिम जाने में ज्यादा है। जिम जाकर छ: या आठ एप बनाने से सेल्फ़ी अच्छी आती है, जबकि तब न जिम थे न सेल्फी। तो बेचारी युवा पीढ़ी को मजबूरी में लाइब्रेरी ही जाना पड़ता था और ‘आजाद लोक-अंगड़ाई’के चक्कर में वे सार्वजनिक क्षेत्र के बजाय निजी क्षेत्र की लाइब्रेरी को चुनना पसन्द करते थे। निजी क्षेत्र की लाइब्रेरी दो किस्म की होती थी; एक स्थायी जो साल भर चलती थी और दूसरी अस्थायी जो केवल गर्मियों की छुट्टियों में खुलती थीं। छोटे से छोटे कस्बे में इस तरह की 8-10 लाइब्रेरियाँ तो होती ही थीं। तब एक सिटिंग में नॉवेल पढऩा गर्व का सबब होता था और मोहल्ले में यह बात बाकायदा ऐलान के रूप में बताई जाती थी। किशोर उम्र के बालकों के लिए निजी लाइब्रेरी में राजन-इकबाल सीरिज वाली एस.सी. बेदी की किताबें हुआ करती थीं।
निजी क्षेत्र की लाइब्रेरी में भिलाई की ‘अपना पुस्तकालय’ से अपना विशेष नाता रहा। इसकी दो शाखाएँ थीं, एक सेक्टर -6 में और दूसरी सेक्टर-10 में। कोई और भी रही हो तो मेरी जानकारी में नहीं है। यहाँ भीड़ ऐसी उमड़ती थी, मानों शहर भर के लोगों ने इसकी सदस्यता ले रखी हो। सुबह-शाम इसके खुलने से पहले ही लोगों की भीड़ जमा होनी शुरु हो जाती थी। लाइन भी लगती थी। किताबों को लेकर कोई बंदिश नहीं थी। 8-10 किताबें, जितनी भी चाहें निकलवाई जा सकती थीं, बशर्ते पुरानी जमा कर दी गई हों। अब तक जो कुछ भी पढ़ा, उसका एक बड़ा हिस्सा यहीं से मिला। पहली बार ‘राग दरबारी’ भी यहीं से लेकर पढ़ी। एक सज्जन हमेशा कविताओं की किताब ले जाते थे। मैंने उनसे पूछा ‘‘आप नॉवेल नहीं पढ़ते?’’ उन्होंने कहा कि ‘‘वो तो खरीद लेता हूँ।’’ मैने पूछा, ‘‘फिर कविताएँ क्यों नहीं लेते?’’ उन्होंने हँसते हुए कहा, ‘‘ये किताबें मुझे जरा महंगी लगती हैं। एक तो पहले ही शब्द-संख्या बहुत कम होती है। फिर दो-चार समझ में नहीं आईं तो और नुकसान!’’ तभी यह मौलिक ख्याल मेरे जेहन में आया कि अगर शब्दों को तोलकर बेचा जाता तो भारी मात्रा में लेखन करने वाले प्रेमचन्द जैसे लेखक फ़टे जूते पहनकर नहीं घूमते।
इसी दौर में सुरेंद्र मोहन पाठक की किताबें पढऩे का चस्का भी लगा। बड़े भाई साहब ने बताया था कि इनके नॉवेल ठीक-ठाक होते हैं। दो-तीन किताबें पढ़ीं। मजा तो आने लगा पर ‘पथभ्रष्ट’ होने का अपराध-बोध भी। एक सिटिंग में नॉवेल खत्म करना क्या होता है, यह समझ में आने लगा था। दूसरी ओर से आत्मा धिक्कार रही थी। साहित्यानुरागी का ऐसा विचलन! साँप-छछूँदर वाली स्थिति हो रही थी। तभी श्रीलाल शुक्ल की दो किताबें मिलीं, ‘मकान’ और ‘आदमी का जहर।’ ‘मकान’ बेशक ‘राग-दरबारी’ नहीं थी पर इसका शिल्प भी कुछ अलग हटकर ही था और मुझे आज भी लगता है कि इसकी चर्चा जरा कम ही हो पाई। ‘आदमी का जहर’ पढा तो सकते में आ गया। दोबारा लेखक का नाम देखा। फिर किसी से पुष्टि की कि ‘हाँ, ये वही श्रीलाल शुक्ल हैं।’ किसी और ने बताया या शायद कहीं पढा कि मुक्तिबोध भी जासूसी नॉवेल पढ़ते थे। इन सबका मिला-जुला असर ये हुआ कि मन में बैठा हुआ अपराध- बोध चल बसा और सुरेंद्र मोहन पाठक के साथ जेम्स हैडली चेज के सारे उपलब्ध नॉवेल पढ़ डाले। आगे तो यह भी होता रहा कि पाठक की कोई नॉवेल खरीद कर लेते, उसे जरा सावधानी के साथ पढ़ते कि कहीं पन्ने वगैरह न मुडें और फिर उसी दुकान से उस किताब के बदले में कोई दूसरी किताब चौथाई मूल्य पर ले लेते। नई किताब के आने का इंतज़ार भी बड़ी बेसब्री के साथ किया जाता। विमल सीरीज की किताबों का तो जैसे मुझे नशा ही हो गया था।
इससे पहले इब्ने शफी, कर्नल रंजीत और ओमप्रकाश शर्मा पर भी अपन हाथ आजमा चुके थे। ओमप्रकाश शर्मा को तब ‘जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा’ कहा जाता था और जगत, जगन, गोपाली वगैरह उनके लोकप्रिय पात्र हुआ करते थे। तब बहुत से घरों में इन उपन्यासकारों का प्रवेश वर्जित हुआ करता था। जिन्हें मध्यमवर्गीय परिवारों में मान्यता थी, वे ‘सामाजिक’ उपन्यास कहलाते थे और इनमें गुलशन नंदा का नाम अव्वल था। रानू और राजवंश भी हुआ करते थे। कोई एक कुशवाहा कांत भी थे, जो क्या लिखते थे अब याद नहीं आ रहा। वेद प्रकाश शर्मा का भी एकाध नॉवेल पढऩे की मैंने बहुत कोशिश की, पर नहीं पढ़ सका। इन लेखकों को भले ही साहित्य में कोई जगह न मिल पाई हो पर इतना तो उदारतापूर्वक स्वीकार किया ही जाना ही चाहिए कि इन्होंने एक बड़े तबके के बीच पढऩे की आदत को विकसित किया, जो अब नितांत दुर्लभ हो चली है।
नगर पालिका वाली लाइब्रेरी में आने वाले रिटायर्ड लोगों में एक यदु अंकल हुआ करते थे। वे दिल्ली प्रेस की ‘सरिता’ के घनघोर प्रशंसक थे और उसका इतना प्रचार करते थे, जितना अमिताभ बच्चन ने नवरतन तेल का भी नहीं किया होगा। ‘सरिता आई क्या’ उनका तकिया कलाम बन गया था और वे यह सवाल हर तीसरे दिन पूछते थे, जबकि पत्रिका पाक्षिक थी। पत्रिका का नया अंक आया हो और सबसे पहले उन्हें हासिल न हो तो वे हंगामा काट देते थे। एक दिन एक अलग समूह में कुछ अधेड़ पाठक आपस में बातें कर रहे थे और उनमें से किसी ने कहा कि ‘सरिता आ गई है।’ यदु अंकल के कान खड़े हो गए। वे लपक कर वहाँ पहुँचे और जान न पहचान उनसे पूछने लगे कि ‘सरिता कहाँ है?’ वे सज्जन बेचारे थोड़े संकट में पड़ गए। फिर भी जवाब दिया कि घर में है। यदु अंकल आनन-फानन में लाइब्रेरियन के पास पहुँच गए और लडऩे लगे कि जब पत्रिका इश्यू नहीं की जाती है तो घर कैसे पहुँच गई। बाद में पता चला कि जिन सज्जन ने ‘सरिता आ गई है’ वाली बात कही थी, वह सच्ची थी पर सरिता उनकी पत्नी का नाम था जो अपने मैके गई हुई थीं। इस घटना के बाद बेचारे यदु अंकल 6-7 दिन तक लाइब्रेरी नहीं आए। मैं लाइब्रेरियन से धीरे से पूछता ‘सरिता आई क्या’ और फिर हम दोनों धीरे से मुस्कुरा उठते।
फिर 1982 में एशियाई खेलों के बहाने टीवी का प्रसार हुआ। ‘फिश बोन’ आकार वाले एंटीना कुकुरमुत्तों की तरह छतों में उग आए। एक टीवी इसी लायब्रेरी में भी आया। खेलों का मामला था। टीवी दिन भर चलने लगा। फिर चित्रहार और सिनेमा वगैरह आने लगे, सीरियल चालू हुए। टीवी धीरे-धीरे सस्ते होने लगे और न्यूज प्रिंट व कागज वगैरह के दाम बढऩे लगे। टीवी जितना फैलता जा रहा था, पत्रिकाएँ उतनी सिमटती जा रही थीं। एशियाई खेलों के दौरान टीवी केंद्र का उद्घाटन करते हुए श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा था कि टीवी के आने से वैज्ञानिक चेतना का प्रसार होगा। क्या हुआ यह सबने देखा। टेक्नोलॉजी पर बाबाओं ने कब्जा कर लिया। भूत-प्रेत के सीरियल आने लगे। अंधविश्वास को विज्ञान साबित किया जाने लगा। मिथकीय गुफाओं-कन्दराओं-पहाडिय़ों की खोज की जाने लगी और एक दिन हम सबने देखा कि अचानक मूर्तियां दूध पीने लगीं। इस बीच धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिंन्दुस्तान, दिनमान, रविवार वगैरह बन्द हो चुके थे। फिश बोन एंटीना ने हमारे घरों में दीमक की फौज घुसा दी थी। कवि कहता है, ‘दीमक किताबें नहीं पढ़तीं, दीमक किताबें चाट जाती हैं।’
-राजू पाण्डेय
पिछले कुछ दिनों से प्रशांत किशोर सुर्खियों में हैं। यह चर्चा जोरों पर है कि लगभग 135 वर्षों की अपनी यात्रा में संघर्ष और सत्ता तथा उत्थान एवं पतन का हर रंग देख चुकी कांग्रेस पार्टी को नवजीवन देने वाली अगर कोई संजीवनी बूटी है तो वह प्रशांत किशोर के पास ही है। जीवन भर राजनीति की जटिलताओं में उलझने और उन्हें सुलझाने वाले कांग्रेस के कद्दावर और अनुभवी नेता प्रशांत किशोर का प्रेजेंटेशन देखकर शायद चमत्कृत हो रहे हैं और अपनी कमतरी के अहसास से शर्मसार भी।
प्रशांत किशोर भारत के लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ कार्य कर चुके हैं। भाजपा (गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 तथा लोकसभा चुनाव 2014), जेडीयू (2015 बिहार विधानसभा चुनाव), कांग्रेस (2017 पंजाब विधानसभा चुनाव), वायएसआरसीपी (2019 आंध्रप्रदेश विधानसभा चुनाव), आप (2020 दिल्ली विधानसभा चुनाव), टीएमसी (2021 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव) तथा डीएमके (2021 तमिलनाडु विधानसभा चुनाव) की चुनावी सफलताओं में प्रशांत किशोर की अहम भूमिका मानी जाती है। एकमात्र असफलता जो उनके खाते में दर्ज है वह सन् 2017 की है जब वे उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को विजय दिलाने में नाकाम रहे थे।
प्रशांत किशोर एक पेशेवर चुनावी रणनीतिकार हैं और वह अपने ग्राहक राजनीतिक दलों को जीत दिलाने के लिए भरपूर प्रयास करते हैं। एक सच्चे पेशेवर की भांति उन्होंने परस्पर विरोधी विचारधाराओं और परस्पर राजनीतिक विरोध रखने वाले नेताओं के साथ समान समर्पण से कार्य किया है। प्रशांत किशोर ने मई 2021 में एक निजी टीवी चैनल को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि वे अपने क्षेत्र में बहुत कुछ कर चुके हैं और अब वे चुनावी रणनीतिकार की भूमिका नहीं निभाना चाहते, उन्हें अवकाश चाहिए ताकि वे जीवन में किसी अन्य भूमिका के चयन के बारे में विचार कर सकें। शायद वे कोई नई भूमिका तलाश नहीं कर पाए और अब कांग्रेस के साथ जुडऩे की तैयारी में हैं। यह भी संभव है कि जिस नई भूमिका का वे जिक्र कर रहे थे वह राजनेता के रूप में नई शुरुआत से संबंधित हो। हमें यह स्मरण रखना होगा कि जेडीयू के सदस्य के रूप में सक्रिय राजनीति का उनका पिछला अनुभव अच्छा नहीं रहा था।
एक सशक्त और प्रतिस्पर्धी विपक्ष लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के प्रति अपनी तमाम सदिच्छाओं के बावजूद यह कहना ही होगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में जान फूंकने और बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट करने का उत्तरदायित्व अब एक ऐसे पेशेवर को मिलने वाला है जो विचारधाराओं और आदर्शों से अधिक अपने पेशे के प्रति प्रतिबद्ध है-एक ऐसा प्रोफेशनल जो अपने हर क्लाइंट के लिए कुछ भी करने को तैयार है।
प्रशांत किशोर स्वयं एक परिघटना हैं या किसी व्यापक परिघटना का एक ध्यानाकर्षण करने वाला चमकता हिस्सा हैं, इस बहस में न पड़ते हुए हम उनकी कार्यप्रणाली पर नजर डालते हैं। प्रशांत किशोर का रणनीतिक जादू मार्केटिंग और इवेंट मैनेजमेंट के उन घातक प्रयोगों में छिपा है जो ग्राहक को किसी अनावश्यक, कमतर और औसत प्रोडक्ट को बेहतर मानकर चुनने के लिए मानसिक रूप से तैयार करते हैं। हमने श्री नरेन्द्र मोदी को गुजरात के विवादित मुख्यमंत्री से सर्वशक्तिमान, सर्वगुणसम्पन्न, महाबली मोदी में कायांतरित होते देखा है।
भावुक और नायक पूजा के अभ्यस्त भारतीय मतदाता के लिए श्री नरेन्द्र मोदी जैसे सुपर हीरो को गढऩा शायद भारतीय लोकतंत्र की प्रयोगशाला का सबसे घातक प्रयोग था जिसने एक ऐसे लार्जर दैन लाइफ करैक्टर को जन्म दिया जिसकी चकाचौंध की ओट में हमें तेजी से एक धर्मांध और कट्टर समाज में बदला जा रहा है। यदि प्रशांत किशोर इस प्रयोग के कर्णधार नहीं थे तो भी बतौर सुयोग्य सहयोगी उन्होंने श्री मोदी के छवि निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान अवश्य दिया है।
श्री नरेन्द्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनावों में महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे जमीनी मुद्दों का जादुई समाधान देने वाले नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया था। यदि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और स्वयं सरकारी एजेंसियों के आंतरिक आकलन को आधार बनाएं तो भारत का प्रदर्शन स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार, आर्थिक प्रगति, प्रेस की स्वतंत्रता, मानव और अल्पसंख्यक अधिकारों के संरक्षण, लैंगिक समानता की स्थापना, कुपोषण मिटाने तथा भ्रष्टाचार नियंत्रण आदि सुशासन को सुनिश्चित करने वाले विभिन्न मानकों पर 2014 के बाद से निरंतर गिरा है। महंगाई और बेरोजगारी की भयावह स्थिति को समझने के लिए आंकड़ों में भटकने के बजाए दैनंदिन के अनुभव ही पर्याप्त हैं।
ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री ने भूलें नहीं कीं और विपक्ष को वापसी के अवसर नहीं दिए। पहले कार्यकाल में नोटबन्दी के बाद तबाही और अफरातफरी का मंजर देखा गया।
दूसरे कार्यकाल में कोविड-19 के दौरान लाखों मजदूरों के पलायन के हृदय विदारक दृश्य देखने को मिले। हमने हमारी लचर और लाचार स्वास्थ्य सेवाओं को दम तोड़ते देखा। दवाओं और ऑक्सीजन की कमी से मृत्यु की घटनाओं तथा मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए परिजनों की अंतहीन प्रतीक्षा के दृश्य मुख्यधारा के मीडिया को भी दिखाने पड़े। लाखों लोगों के रोजगार छिन गए, आय कम हुई।
एक वर्ष तक किसानों का ऐतिहासिक आंदोलन चला और किसानों ने आंदोलन के दौरान तथा उसके स्थगन के बाद भी राजनीतिक हस्तक्षेप की रणनीति अपनाई तथा भाजपा को चुनावों में हराने की अपील की।
इसके बावजूद भी भाजपा, लगभग हर निर्णायक अवसर पर सत्ता हासिल करने में कामयाब रही है और इसका एक बड़ा कारण श्री नरेन्द्र मोदी की वह मायावी छवि है जिसे प्रशांत किशोर जैसे कुशल रणनीतिकारों ने गढ़ा तो अवश्य किंतु इस छवि की माया को भेदना अब शायद इसके निर्माताओं के लिए भी कठिन होगा।
एक ऐसे वक्त जबकि देश संवैधानिक मूल्यों, बहुलवाद और अपने सेकुलर चरित्र की रक्षा के लिए जूझ रहा है तब कांग्रेस पार्टी को अपनी विरासत का स्मरण करते हुए देश की मूल तासीर को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए सैद्धांतिक दृढ़ता के साथ नैतिक संघर्ष करते दिखना चाहिए किंतु सत्ता हासिल करने के लिए बाजारवादी लटकों झटकों पर आधारित रणनीतियों को हासिल करना उसकी प्राथमिकता दिखती है।
प्रश्न अनेक हैं। क्या देश की लगभग सभी मुख्य राजनीतिक पार्टियां जनता से सीधे संवाद करने की कला इस हद तक भूल चुकी हैं कि उन्हें जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए किसी ब्रांडिंग-मार्केटिंग-पैकेजिंग विशेषज्ञ या इवेंट मैनेजर की सहायता लेनी आवश्यक लग रही है?
क्या कॉरपोरेट मीडिया ने ‘जमीनी मुद्दों’ और ‘बुनियादी मुद्दों’ को गौण बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है? वाजपेयी जनता को जिस फील गुड फैक्टर की अनुभूति कराने में नाकाम रहे थे क्या वह अब सरकार समर्थक टीवी चैनलों और सोशल मीडिया समूहों की कोशिशों से जनता को आनंदित कर रहा है?
क्या मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग परपीडक़ आनंद का आदी बन चुका है और अपनी दुर्दशा के लिए सत्ताधारी दल की विचारधारा द्वारा उत्तरदायी ठहराए गए समूहों- विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय- के साथ हो रहे अत्याचार उसे संतोष प्रदान करने लगे हैं?
क्या राजनीति में ‘करने’ के बजाए ‘करते दिखना’ अधिक महत्वपूर्ण बनता जा रहा है?
क्या विपक्ष लगातार पराजय के कारण इतना हताश हो गया है कि उस पर नकारात्मकता हावी होने लगी है? क्या चुनावों के बाद होने वाले आत्म मंथन का उद्देश्य पराजय के सही कारण के स्थान पर सुविधाजनक कारण की तलाश मात्र होता है?
‘आप’ के रूप में हम एक ऐसे राजनीतिक दल को देख रहे हैं जो बिना किसी स्पष्ट एवं सुपरिभाषित वैचारिक आधार के केवल सुशासन के दावे के बल पर सत्ता हासिल कर रहा है। क्या पूंजीवादी लोकतंत्र और वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के समर्थकों की शक्ति ‘आप’ के पीछे है? क्या भाजपा का संकीर्ण राष्ट्रवाद विश्व बाजार की ताकतों को रास नहीं आ रहा है और यदि उन्होंने ‘आप’ के रूप में उसका विकल्प तैयार करने की कोशिश नहीं की है तब भी क्या ‘आप’ में वे संभावनाएं तलाश रहे हैं?
तथ्य चौंकाते भी हैं और विचलित भी करते हैं। हाल ही में संपन्न हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा लखीमपुर खीरी में क्लीन स्वीप करती है, जिन इलाकों में किसान आंदोलन का सर्वाधिक प्रभाव था वहां भाजपा को आशातीत सफलता मिलती है, उन्नाव रेप पीडि़ता की माता श्रीमती आशा सिंह को विधानसभा चुनाव में मात्र 1555 वोट (.63 प्रतिशत) मिलते हैं, पंजाब में किसान आंदोलन को एकजुट रखने में धुरी की भूमिका निभाने वाले वाम दलों को समवेत रूप से केवल .14 प्रतिशत मत मिलते हैं और आप 42.01 प्रतिशत मत प्राप्त कर 92 सीटें अर्जित कर लेती है।
क्या इन परिस्थितियों में कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों का यह कर्तव्य नहीं बनता है कि वे उस सामूहिक सम्मोहन को तोडऩे के लिए संकल्पबद्ध हों जो जनता को प्रतिशोध, हिंसा और घृणा के नैरेटिव का अभ्यस्त बना रहा है?
प्रशांत किशोर को कांग्रेस में मिलते महत्व से बहुत आशान्वित हो जाना आत्म प्रवंचना ही होगी। प्रशांत किशोर की रणनीतियां अभी तक भारतीय राजनीति के घिसे पिटे फॉर्मूलों को व्यवसायिक प्रबंधन और मार्केटिंग के सिद्धांतों के अनुरूप ढालकर बॉक्स ऑफिस में कामयाबी हासिल करने तक सीमित रही हैं। इन फॉर्मूलों से हम सभी अवगत हैं- नायक पूजा, क्षेत्रवाद,जातीय और भाषिक अस्मिता से जुड़े प्रश्नों तथा भावनात्मक मुद्दों को बढ़ावा देना। भाजपा की भाषा और मुहावरे का मृदु कांग्रेसी संस्करण तैयार करना अथवा गांधी परिवार के किसी सदस्य में नए महानायक की तलाश शायद प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीति का हिस्सा हो। यदि प्रशांत किशोर को परिवर्तन का संवाहक मानने में हमें आनंद का अनुभव होता है तब भी हमें उनसे सत्ता परिवर्तन की उम्मीद ही लगानी चाहिए, कांग्रेसवाद की पुनसर््थापना उनकी प्राथमिकता नहीं होगी।
कांग्रेस को जब तक अपने मूल्यों और आदर्शों के खरेपन पर संशय बना रहेगा तब तक वह साम्प्रदायिक और विभाजनकारी शक्तियों के विरुद्ध जमीनी संघर्ष के लिए खुद को तैयार नहीं कर सकती। कांग्रेस यदि भाजपा सरकार को अपदस्थ करना चाहती है तो शायद प्रशांत किशोर की अगुवाई उसके कुछ काम आए किंतु यदि फ़ासिस्ट विचारधारा को पराजित करना है तो इस संघर्ष का नेतृत्व किसी विचारवान एवं सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले नेता को करना होगा। सैद्धांतिक संघर्ष समझौतापरस्त सोच से नहीं जीते जाते इससे केवल सत्ता हासिल की जाती है।
सत्ता के लिए अधीरता ठीक नहीं। बहुत दिन नहीं बीते हैं जब कांग्रेस 2004 से लगातार दस वर्षों तक सत्ता में रही थी। हमारी सामासिक संस्कृति, बहुलवाद और सेकुलरवाद की रक्षा के लिए संघर्ष कर चुनावों में पराजित हो जाने वाली कांग्रेस में यह सामथ्र्य अवश्य रहेगा कि वह मतदाता के सामूहिक सम्मोहन को तोड़ सके किंतु भाजपा के रंग में रंगी कांग्रेस यदि पुन: सत्ता हासिल कर भी लेती है तो यह संकीर्ण एवं असमावेशी राष्ट्रवाद के समर्थकों की विजय ही कही जाएगी।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग यूक्रेन के सवाल पर अब भी रूस का साथ दिए जा रहे हैं। वे रूस के हमले को हमला नहीं कह रहे हैं। उसे वे विवाद कहते हैं। यूक्रेन में हजारों लोग मारे गए और लाखों लोग देश छोडक़र भाग खड़े हुए लेकिन रूसी हमले को रोकने की कोशिश कोई राष्ट्र नहीं कर रहा है। चीन यदि भारत की तरह तटस्थ रहता तो भी माना-जाता कि वह अपने राष्ट्रहितों की रक्षा कर रहा है लेकिन उसने अब खुले-आम उन प्रतिबंधों की भी आलोचना शुरु कर दी है, जो नाटो देशों और अमेरिका ने रूस के विरुद्ध लगाए हैं।
चीनी नेता शी ने कहा है कि ये प्रतिबंध फिजूल हैं। सारा मामला बातचीत से हल किया जाना चाहिए। यह बात तो तर्कसंगत है लेकिन चीन चुप क्यों है? वह पूतिन और बाइडन से बात क्यों नहीं करता? क्या वह इस लायक नहीं है कि वह मध्यस्थता कर सके? वह तमाशबीन क्यों बना हुआ है? उसका कारण यह भी हो सकता है कि यूक्रेन-हमले से चीन का फायदा ही फायदा है। रूस जितना ज्यादा कमजोर होगा, वह चीन की तरफ झुकता चला जाएगा। चीन आगे-आगे रहेगा और रूस पीछे-पीछे ! रूस की अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर हो जाएगी कि मध्य एशिया और सुदूर एशिया में भी रूस का स्थान चीन ले लेगा। शीतयुद्ध के जमाने में अमेरिका के विरुद्ध सोवियत संघ की जो हैसियत थी, वह अब चीन की हो जाएगी। चीन ने संयुक्तराष्ट्र संघ और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रूस के पक्ष में वोट देकर पूतिन के हाथ मजबूत किए हैं ताकि इस मजबूती के भ्रमजाल में फंसकर पूतिन गल्तियों पर गल्तियां करते चले जाएं।
चीन ने यूक्रेन में हो रहे अत्याचारों को भी पश्चिमी प्रचारतंत्र की मनगढ़ंत कहानियां कहकर रद्द कर दिया है। पूतिन का साथ देने में शी ने सभी सीमाएं लांघ दी हैं। वे एक पत्थर से दो शिकार कर रहे हैं। एक तरफ वे अमेरिका को सबक सिखा रहे हैं और दूसरी तरफ वे रूस को अपने मुकाबले दोयम दर्जे पर उतार रहे हैं। हो सकता है कि पूतिन ने जो यूक्रेन के साथ किया है, वैसा ही ताइवान के साथ करने का चीन का इरादा हो। अमेरिका ने जैसे झेलेंस्की को धोखा दे दिया, वैसे ही वह ताइवान को भी अधर में लटका सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय राजनीति इसी पगडंडी पर चलती रही तो विश्व के शक्ति-संतुलन में नए अध्याय का सूत्रपात हो जाएगा। द्वितीय महायुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति का जो ढांचा बन गया था, उसे पहले सोवियत-विघटन ने प्रभावित किया और अब यूक्रेन पर यह रूसी हमला उसे एकदम नए स्वरुप में ढाल देगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)
केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा के आरोपी बेटे आशीष को बहुत गंभीर अपराधों के बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने से सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अपेक्षित हलचल हुई। कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया कानूनी और न्यायिक इलाकों मेंं हुई। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के जज राजीव कुमार ने कई स्थिर मान्यताओं को दरकिनार करते जमानत दी। वह तो संदेह भी पैदा करता है। सुप्रीम कोर्ट की भलमनसाहत थी कि जमानत के आदेश पर कड़ी और असरकार टिप्पणी नहीं की। मीडिया में इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने मानो कहा कि जमानत देने के पहले पीडि़त पक्ष को तसल्लीयुक्त ढंग से सुनना चाहिए। कुछ वर्षों पहले तक यह अदालत आधारित अवधारणाएं पुष्ट होती रही हैं कि अपराधिक मामलों में मुल्जिम और राज्य के बीच ही वास्तविक विवाद होता है। पीडि़त पक्ष एवं अन्य की तो केवल गवाही होती है। वे एक तरह से तृतीय पक्ष या पाश्र्व या हाशिए में खड़े हुए किरदारों की तरह समझे जाते रहे हैं। दुनिया की फौजदारी अदालतों मेंं लगातार यह नाइंसाफी महसूस की जाती रही कि मुस्टंडे और रसूखदार मुल्जिम पुलिस की सांठगांठ और कई बार चश्मदीद गवाहों सहित पोस्टमॉर्टम आदि करने वाले डॉक्टरों को पटाकर मुकदमे बहुत दिनों तक चलवाने में समर्थ होते हैं और फिर छूट जाते रहे। शिकायतकुनिंदा व्यक्ति चाहे डकैती, बलात्कार या हत्या जैसे अपराधों का भी षिकार हो धीरे-धीरे निराश और हताश होता मुिल्जम से ही मुंह चुराता रहा। मानो पीडि़त ही गुनहगार है। इस मार्मिक सवाल पर पूरी दुनिया का ध्यान गया। तब संयुक्त राष्ट्र संघ में एक मत स्थिर हुआ कि फौजदारी प्रकरणों में पीडि़त व्यक्ति को पूरी तौर पर अपना पक्षसमर्थन करने का अधिकार मिलना चाहिए, वरना न्याय हो ही नहीं सकेगा।
तद्नुसार दंड प्रक्रिया संहिता में भारत में पीडि़त व्यक्ति की परिभाषा शामिल की गई और उसके अधिकारों का आसमान सुप्रीम कोर्ट की नजीरों में बुना गया। आशीष मिश्रा के प्रकरण में भी सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से पीडि़त के अधिकारों की उपेक्षा करने के कारण इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज की खिंचाई की और मामला फिर विचारण के लिए वापस किया कि पीडि़त पक्ष को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देकर नए सिरे से तीन माह के अंदर जमानत पर आदेश पारित किए जाएं। कोर्ट ने यह मत भी दोहराया कि विश्व स्तर पर न्यायिक दर्शनशास्त्र में यह उदारता और नया रुख आया है कि गंभीर से गंभीर अपराधों में भी पूरा प्रकरण सुन लिए जाने तक जमानत नहीं दी जाए-यह भी सोच लेना अभियुक्त के लिए न्यायसंगत नहीं होगा। कई बार मामले के लंबित रहने के दौरान संभावित सजा का एक बड़ा हिस्सा अपने आप ही व्यतीत हो जाता है। लेकिन इसका यह आशय नहीं कि आरोपी को छूट देने का कोई उपक्रम रचा ही जाए। असल में सुप्रीम कोर्ट ने आशीष मिश्रा के प्रकरण के निर्णय के पैरा 30 में संभावित जमानत मिलने की मुश्कें बांध दी हैं। इस ओर ध्यान देना जरूरी है। अपने एक पुराने फैसले प्रशांत कुमार सरकार बनाम आशीष चटर्जी वगैरह पर निर्भर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आठ बिंदु इलाहाबाद हाईकोर्ट के विचारण के लिए तय कर दिए हैं। उन पर तार्किक विचार किए बिना आषीष मिश्रा को जमानत देना यक-ब-यक मुनासिब नहीं होगा:-
1.क्या प्रथम दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि मुलजिम ने अपराध किया होगा। (आशीष मिश्रा उसी जीप पर बहैसियत मालिक सवार तो था जिसने किसानों को रौंद दिया।)
2.आरोप की गंभीरता और प्रकृति क्या है? (पैदल चलते किसानों के झुंड को तेज गति से चलती मोटरगाड़ी से कुचल तो दिया गया।)
3.सजा की हालत में दंड का परिमाण क्या हो सकता है? (कत्ल का इल्जाम भी लगने पर अधिकतम सजा तो आजन्म कारावास या फांसी की हो सकती है।)
4.जमानत मिलने पर अभियुक्त का फरार हो सकना। (केन्द्रीय मंत्री का पुत्र होने से आरोपी रसूखदार तो है।)
5.आरोपी का चरित्र, बर्ताव, साधन संपन्नता और समाज में स्तर वगैरह (केन्दीय मंत्री और उनके पुत्र का प्रभाव लखीमपुर खीरी क्षेत्र में इतना है कि वहां से विधानसभा और लोकसभा की सीटें उनके कारण भाजपा लगातार जीत रही है और वे उत्तेजक भाषण और धमकी देने में पुराने माहिर हैं।)
6.अपराध की पुनरापत्ति होने की संभावना? (मंत्री और पुत्र के विरुद्ध लगातार अपराधिक प्रकृति की शिकायतें होती ही रही हैं।)
7.गवाहों को धमकाए जाने की संभावनाएं? (यह संभावना तो बहुत मजबूत है क्योंकि गवाह समाज में साधारण हैसियत के लोग हैं। उन्हें धमकाया, फुसलाया, बहलाया तो जा सकता है और खासकर उत्तरप्रदेश की सरकार ने जिस तरह आरोपी की लगातार मदद की है। उसे देखते तो संभावनाओं का आकाश कभी भी टूट पड़ सकता है।)
8.जमानत देने की स्थिति में न्याय के पथ में अवरोध हो सकता है? (देश का मीडिया राजनीतिक दल किसान समूह और तमाम लोग लगातार केन्द्रीय मंत्री के रसूखदार बेटे के खिलाफ मांग करते रहे लेकिन उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने जांच तक ठीक से नहीं की। तब सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर पंजाब और हरियााण हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की निगरानी में अन्वेषण कराना पड़ा। उस कमेटी ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट मे अपील करने की सलाह दी उसे भी योगी सरकार ने खारिज कर दिया।)
उपरोक्त हालत में सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय अपने स्वतंत्र विवेक के अनुसार जमानत के आवेदन पत्र का निपटारा करे। हाईकोर्ट को पूरा हक होता हैं कि वह स्वायत्त रूप से ऐसे आवेदन का निराकरण कर सकता है लेकिन इस प्रकरण में जस्टिस राजीव कुमार द्वारा हड़बड़ी और एकांगी आधारों पर जो फैसला किया गया उसे सुप्रीम कोर्ट ने सही नहीं माना और उपरोक्त न्याय निर्णय पर अविलंब करने का सैद्धांतिक आधार मुहैया कराया है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को विश्व स्तरीय बनाने के लिए गुजरात के जामनगर से एक नए अभियान का सूत्रपात किया। उन्होंने कहा है कि भारत के इस आयुष-अभियान में आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपेथी आदि सभी पारंपरिक चिकित्साओं का योगदान होगा। इन चिकित्सा पद्धतियों को विश्वव्यापी बनाने के लिए कुछ नए कदम भी उठाए जाएंगे, जिसका नाम होगा- आयुष वीजा। यहां मेरा सुझाव यह है कि इस आयुष-वीजा का शुल्क सामान्य वीज़ा शुल्क से आधा क्यों नहीं कर दिया जाए? पड़ौसी देशों के लाखों-करोड़ों नागरिक इस पारंपरिक चिकित्सा के मुरीद हैं।
यह चिकित्सा एलोपेथी के मुकाबले बहुत सस्ती है। इसका लाभ पड़ौसी देशों के मध्यम और गरीब वर्ग के लोग भी उठा सकें, इसका इंतजाम भारत सरकार को करना चाहिए। पड़ौसी देशों के जिन लोगों का भारत में सफल इलाज होता है, वे और उनके परिवार के लोग सदा के लिए भारतभक्त बन जाते हैं। यह बात मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूं। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है कि हमारी औषधियों पर सरकार एक ‘आयुष चिन्ह’ भी जारी करेगा, जो उनकी प्रामाणिकता की गारंटी होगी।
भारत की पारंपरिक औषधियों का प्रचलन सभी पड़ौसी देशों में लोकप्रिय है। यहां तक कि चीन में भी ऐसी भारतीय औषधियां मैंने देखी हैं, जिनके नाम चीनी वैद्यों ने अभी तक मूल संस्कृत में ही रखे हुए हैं। हमारी आयुष औषधियों का व्यापार पिछले 7 वर्षों में तीन अरब से बढक़र 18 अरब डॉलर का हो गया है। इस क्षेत्र में बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण का योगदान अपूर्व और अतुलनीय है।
यदि केरल की तरह भारत के हर जिले में ऐसे पारंपरिक चिकित्सा केंद्र खुल जाएं तो भारत की आमदनी खरबों डॉलर तक पहुंच सकती है। चिकित्सा-पर्यटन की दृष्टि से भारत दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है। भारत में लाखों-करोड़ों नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। ऐसे आयुष-केंद्र सभी पड़ौसी देशों में भारत खोल सकता है।
सात साल बीत रहे हैं लेकिन जो काम अभी तक अधूरा पड़ा हुआ है, सरकार उसे भी पूरा करने की ठान ले तो सारे विश्व में भारत का डंका बजने लगेगा। मैंने अपने पहले और दूसरे स्वास्थ्य मंत्री श्री ज.प्र. नड्डा और डॉ. हर्षवर्द्धन से अनुरोध किया था कि वे एलोपेथी समेत सभी पेथियों को मिलाकर चिकित्सा का नया पाठ्यक्रम तैयार करवाएं और मेडिकल की पढ़ाई भारतीय भाषाओं के जरिए हो।
यदि ऐसा हो जाता तो चिकित्सा-विज्ञान में एक नए इतिहास का सृजन होता और विश्व में भारत का झंडा फहराने लगता। इस समय सारी दुनिया चिकित्सा के नाम पर चलनेवाली भयंकर लूट-पाट से परेशान है। यदि भारत समग्र चिकित्सा पद्धति का विकास कर सके तो दुनिया के दीन-हीन लोगों को उसका सबसे ज्यादा फायदा होगा। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह अच्छी पहल की है कि सभी धार्मिक जुलूस बिना सरकारी अनुमति के नहीं निकाले जाएं। उन्होंने दंगाइयों के अवैध मकान गिराने की जो पहल की थी, उसका अनुकरण भी कई राज्य कर रहे हैं। अब इस नई पहल को भी सभी राज्यों में क्यों नहीं लागू किया जाना चाहिए? कई बार ऐसा होता है कि दो धर्मों के त्यौहार एक ही दिन आ जाते हैं। ऐसे में दोनों के जुलूसों में ल_ बजने लगते हैं। वे उस त्यौहार को भूल जाते हैं। वे भक्त के वेश में जानवरपना करने लगते हैं। जब तक पुलिसवाले पहुंचें, तब तक तोड़-फोड़, मारपीट और खून-खराबा शुरु हो जाता है।
अगर जुलूसों के लिए पहले से अनुमति का प्रावधान कड़ाई से लागू हो तो उसमें हथियार और डंडे वगैरह ले जाने पर प्रतिबंध रहेगा और पुलिस पहले से सचेत रहेगी। यह नियम सभी धर्मों के अनुयायियों पर एक समान लागू होगा। इस तरह के जो जुलूस वगैरह निकलते हैं, उनमें भी लाउडस्पीकर वगैरह इतनी ज़ोर-जोर से लगातार नहीं बजना चाहिए कि वह लोगों के लिए सिरदर्द बन जाए। यह भी जरुरी है कि उन जुलूसों की भीड़ रास्तों को देर तक रोके नहीं, बाजारों को घंटों बंद न करे और किसी प्रकार की लूटमार या तोडफ़ोड़ न करे। यदि ऐसी व्यवस्था सभी राज्यों में लागू हो जाए तो हिंसा और तोड़-फोड़ की घटनाएं एकदम घट जाएंगी।
ये नियम सिर्फ धार्मिक जुलूसों पर ही नहीं, सभी प्रकार के जुलूसों पर लागू किए जाने चाहिए। इसके अलावा मस्जिदों, मंदिरों और गुरुद्वारों से आनेवाली भौंपुओं की कानफोड़ आवाजों पर भी उत्तरप्रदेश सरकार ने कुछ नियंत्रणों की घोषणा की है। भौंपुओं, घंटा-घडिय़ालों, लाउडस्पीकरों की आवाज आजकल इतनी तेज होती है कि घरों, बाजारों और दफ्तरों में सहज भाव से काम करते रहना मुश्किल हो जाता है। शायद भक्त लोग अपनी आवाज भगवान तक पहुंचाने के फेर में पड़े रहते हैं। कबीरदास ने इस प्रवृत्ति पर क्या खूब टिप्पणी की है:
कांकर-पाथर जोड़ के मस्जिद लई चुनाय।
ता चढि़ मुल्ला बांग दे, बहिरा हुआ खुदाय।।
पता नहीं, भक्त लोग इतनी कानफोड़ू आवाज़ के प्रेमी क्यों होते हैं? क्या उन्हें पता नहीं कि उनके आराध्य राम और कृष्ण, मूसा और ईसा, मुहम्मद और गुरु नानक ने कभी लाउडस्पीकार का इस्तेमाल ही नहीं किया? क्या उनकी आवाज ईश्वर और अल्लाह तक नहीं पहुंची होगी? अब क्या ईश्वर या अल्लाह बहरे हो गए हैं? जिन भक्तों को वेदमंत्र या बाइबिल की वर्स या कुरान की आयत या गुरुवाणी सुननी होगी, वे उसे शांतिपूर्वक बड़े प्रेम से सुनेंगे। जो लोग दूसरों को सुनाने के लिए कानफोड़ू आवाज का आयोजन करते हैं, उनके बारे में हमें यही संदेह होता है कि वे खुद भी उस आवाज को सुनते हैं या नहीं? ऐसे लोग दूसरों के साथ-साथ खुद का भी नुकसान करते हैं। (नया इंडिया की अनुमति से)
अमेरिकी सरकार के मानवाधिकार रिपोर्ट पर चीन बिफर गया है. वैसे तो इस रिपोर्ट से रूस, भारत, मलेशिया समेत कई और देश भी नाखुश हैं लेकिन चीन ने तो बकायदा एक जवाबी रिपोर्ट का सहारा लेकर अमेरिका पर ही हमला बोल दिया है.
डॉयचे वैले पर राहुल मिश्र की रिपोर्ट-
अमेरिकी विदेश मंत्रालय का लोकतंत्र, मानवाधिकार, और श्रम से जुड़े मामलों का ब्यूरो पिछले पांच दशकों से दुनिया भर के देशों में संयुक्त राष्ट्र की मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा और दूसरे मानदंडों के अनुसार एक सालाना मानवाधिकार रिपोर्ट तैयार करता है.
12 अप्रैल को जारी की गयी इस रिपोर्ट की दिलचस्प बात यह भी है कि इस रिपोर्ट में 198 देश शामिल हैं.
2021 की रिपोर्ट में अमेरिका से सहायता ले रहे और संयुक्त राष्ट्र संघ से जुड़े देशों में राज्य, प्रशासन, पुलिस, आम इंसान की स्वतंत्रताओं और अधिकारों से जुड़े मामलों पर व्यापक टिप्पणी की गयी है.
शिनजियांग में स्थिति चिंताजनक
रिपोर्ट के अनुसार पिछले लगभग पांच सालों में चीनी सरकार ने 20 लाख से अधिक उइगुर अल्पसंख्यकों को री-एजुकेशन कैम्पों में डाला है, उनसे कपास कारखानों, खेतों, मिलों, और खदानों में बंधुआ मजदूरी कराई है. और ना मानने वालों का नामोनिशान मिट चुका है.
अमेरिकी प्रशासन चीन की शिनजियांग में सरकार की देखरेख में चल रही अमानवीय हरकतों पर पहले भी उंगलियां उठाता रहा है. हालांकि बीते दो - तीन सालों में उसके तेवर काफी तीखे हुए हैंमिसाल के तौर पर 2020 की रिपोर्ट में भी चीन पर ऐसे ही आरोप लगे थे. गौरतलब है कि चीन को नरसंहार का दोषी मानने का चलन ट्रंप प्रशासन के आखिरी दिनों से चला आ रहा है. अमेरिकी रिपोर्ट में शिनजियांग के मुद्दे के अलावा व्यापक स्तर पर आम नागरिकों की गुमशुदगी के मामलों पर भी चिंता जताई गयी है.यह भी पढ़ेंः श्रीलंका की खस्ताहाल का कौन जिम्मेदार
भूतपूर्व चीनी उप प्रधानमंत्री चांग काओ ली पर यौन शोषण का आरोप लगाने के बाद जिस तरह चीनी टेनिस स्टार फंग श्वे गायब हुई हैं, उस पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गयी है.
नवंबर 2021 में जब फंग श्वे ने चीनी सोशल मीडिया वाइबो पर इस बात की जानकारी दी तो वो अचानक तीन हफ्ते के लिए गायब हो गयी, उनके सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट हो गये और टेनिस शब्द भी सेंसर हो गये. दुनिया भर में इस बात पर बवाल मचने के बाद फंग श्वे मीडिया में तो दिखीं लेकिन यह साफ था कि उन पर निगरानी रखी जा रही थी. अभी भी फंग श्वे आजाद हैं या नहीं इस पर निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता.
तिब्बत और हांगकांग की भी फिक्र
तिब्बत पर भी इस रिपोर्ट में विस्तार से चर्चा की गयी है. तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं के साथ अत्याचार, तिब्बती लोगों के निर्बाध आवागमन पर रोक, उन पर तरह तरह के निगरानी के तरीके जैसे आंखों के सेंसर, अंगुलिओं के निशान से पहचान करना, अभिव्यक्ति की और मनचाहा काम करने पर पाबंदियों जैसे कई मसलों पर चिंता प्रकट की गयी है.
बौद्ध भिक्षुओं का चीनी सरकार के विरोध में आत्मदाह भी एक बड़ी चिंता का विषय है.
यही हाल हांगकांग से जुड़े दस्तावेज का भी है जिसमें कहा गया है कि प्रशासन और पुलिस ने हांगकांग में अधिकारों की मांग कर रहे लोगों को चुन चुन कर निशाना बनाया है.
इस रिपोर्ट से यह साफ होता है कि चीन में मानवाधिकारों की और वहां रह रहे आम इंसान की स्थिति उत्तरी कोरिया या ईरान से बेहतर नहीं है. दुनिया के तमाम देशों को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा. लेकिन इस ओर कदम उठाने में कई अड़चने हैं.
चीन का जवाब
अमेरिका की इस मानवाधिकार रिपोर्ट की आलोचना करते हुए चीन ने इसे आडंबरपूर्ण और दोहरे मानदंडों से ग्रसित बताया है. दिलचस्प है कि जिस दिन अमेरिका में यह रिपोर्ट आयी उसके 24 घंटे के अंदर वाइबो जैसे सोशल मीडिया चैनलों पर अमेरिका के मानवाधिकारों से जुड़े संदेश ट्रेंड करने लगे.
13 अप्रैल को जारी अपने बयान में चीनी विदेश मंत्रालय ने अमेरिका की जमकर आलोचना की और कहा कि रिपोर्ट और इस संदर्भ में जारी किये गए अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकेन के बयान तथ्यों को तोड़मोड़ कर पेश करने की साजिश का हिस्सा हैं. उनका यह भी कहना था कि, "अमेरिका हर साल यह रिपोर्ट लांच करता है और इसके जरिये चीन की छवि खराब करने की कोशिश करता है, और चीन इस बात का पुरजोर विरोध करता है.” चीन ने यह भी कहा कि "अमेरिकी रिपोर्ट झूठ है और चीन के खिलाफ वैचारिक पक्षपात से प्रेरित है”.
चीन को यह बात भी खल गयी कि जब 12 अप्रैल को अपने बयान में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने यूक्रेन मसले पर रूस के आक्रमण को नरसंहार की संज्ञा दी तो साथ में चीन को लपेटे में ले लिया और कहा कि चीन भी ऐसी ही गतिविधियां शिनजियांग प्रांत में पिछले कुछ वर्षों से करता आया है.
इसमें कोई दो राय नहीं है कि चीन शिनजियांग में ज्यादतियां करता रहा है, लेकिन बाइडेन का शिनजियांग को यूक्रेन से जोड़ना चीन को नागवार गुजरा.
चीन के हाथ लगा जवाबी हथियार
चीनी विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा है कि अमेरिका में अल्पसंख्यकों को लेकर वह चिंतित है और अमेरिका का आह्वान करता है कि वह अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों का उल्लंघन ना करे.
चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार चीनी विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों के प्रति अमेरिकी सरकार के रवैये में सुधार की जरूरत है.
इस सिलसिले में जवाबी कूटनीतिक कार्रवाई करते हुए चीनी सरकार ने नेशनल अरबन लीग की 2022 की "स्टेट आफ ब्लैक अमेरिका रिपोर्ट” को हथियार बनाया.
12 अप्रैल को ही लांच हुई इस रिपोर्ट के अनुसार बीते साल अश्वेत अमेरिकन नागरिकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आई है. रिपोर्ट के अनुसार बीते साल में ही 20 प्रदेशों में कांग्रेसनल परिसीमन हुआ है जिसके चलते क्य अश्वेत अमेरिकी नागरिकों के राजनितिक हितों का हनन हुआ है.
नेशनल अरबन लीग अमेरिकी गैरसरकारी नागरिक अधिकार संगठन है जो 1976 से अमेरिका में अश्वेतों की आर्थिक, सामाजिक, और राजनीतिक स्थिति पर सालाना रिपोर्ट जारी करता रहा है.
रिपोर्ट के इक्वलिटी इंडेक्स के अनुसार अश्वेतों को गोरों के मुकाबले 73.9 % सुविधायें ही उपलब्ध हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि वैसे तो अश्वेतों ने आर्थिक और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे मुद्दों पर विकास किया है लेकिन शिक्षा, सामजिक न्याय और नागरिक संबंधों जैसे मुद्दों में और पिछड़ गये हैं.
अमेरिकी सरकार के दोहरे मानदंड
नेशनल अरबन लीग की रिपोर्ट ने निस्संदेह अमेरिकी सरकार के दोहरे मानदंडों की पोल खोल दी है.
हालांकि अमेरिकी सरकार इसे लेकर चिंतित नहीं दिखती. और क्यों न हो, दुनिया में मानवाधिकारों की ठेकेदारी तो अमेरिका के पास ही है - और यह ठेका भी कुछ इस कदर बड़ा कि रूस, चीन, और बर्मा (म्यांमार) तो छोड़िये, भूटान, स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन जैसे देश भी शामिल हैं लेकिन अपना जिक्र करने की उसे जरूरत नहीं महसूस होती. अमेरिका की मानवाधिकार रिपोर्ट पर चीन और रूस के अलावा भारत और मलेशिया जैसे देश भी खुश नहीं हैं.
हालांकि अमेरिका पर उंगली उठाने से किसी भी देश के मानवाधिकार हनन के दाग हलके नहीं होंगे, लेकिन राजनय और अंतरराष्ट्रीय विश्वव्यवस्था में बड़ा प्रश्न सभी सार्वभौम देशों की बराबरी का है. अमेरिका या कोई भी महाशक्ति इस मूलभूत सिद्धांत को कम से कम नैतिक तौर पर तो नजरअंदाज कर ही नहीं सकती. जमीनी हकीकत से तो खैर हम सभी वाकिफ ही हैं.
चीन जैसे तमाम देशों की नाखुशी की वजह यही है कि पिछले कई सालों में अमेरिका में अश्वेतों, चीनी मूल के लोगों, भारतीयों, खास तौर से सिक्खों के साथ बदसलूकी, रंगभेद, और हिंसा के मामले आये लेकिन अमेरिका ने उस पर दुनिया के सामने कोई सफाई देना जरूरी नहीं समझा. इसे हमेशा अमेरिका का अंदरूनी न्याय और कानून व्यवस्था से जुड़ा मामला माना गया.
बावजूद इसके, हर साल की तरह एक बार फिर अमेरिका का पूरी दुनिया को मानवाधिकार संरक्षण और संवर्धन का पहाड़ा का चलन दुनिया के तमाम देशों को रास नहीं आ रहा.
आखिरकार यह कैसी रिपोर्टें हैं जिनमें जमाल खशोगी की नृशंस हत्या का जिक्र तो है लेकिन विंस्टन स्मिथ की अमेरिकी मार्शलों के हाथों निर्मम हत्या पर चिंता की कोई जगह नहीं है? ऐसा क्यों है कि रूस के आलेक्सी नोवोलनी तो भ्रष्टाचार से लड़ने वाले देवदूत हैं और जूलियन असांज राज्य के गुप्त कागजात लीक करने के और जासूसी के दोषी?
अगर अमेरिका इन रिपोर्टों को लेकर संजीदा है तो उसे अपने आप को और साथ में अपने तमाम सहयोगियों को भी आईने के सामने खड़ा करना पड़ेगा. और अगर वह ऐसा नहीं करता तो चीन जैसे ताकतवर देश उसे खुद आईने के सामने खड़ा करने की कोशिश करेंगे. और ऐसी स्थिति अमेरिका और उसके बनाये इंटरनेशनल लिबरल ऑर्डर वाले निजाम के लिए अच्छी नहीं होगी. (dw.com)
-नितिन त्रिपाठी
जब आप अपनी दसवीं के मित्रों के साथ बैठते है और विश्लेषण करते हैं कि कौन क्या बना-तो केवल और केवल एक अंतर समझ आता है-शिक्षा। जिसने अंतर बनाया।
वह जो इतने गरीब थे कि कालेज के दिनों में नौ रुपए फीस नहीं भर पाते थे-आज अफसर हैं, बड़ा बंगला है, प्रतिष्ठित हैं। केवल शिक्षा की वजह से।
वह जिनके पिता वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थे और स्कूल के समय जिनकी दादागिरी चलती थी, कैंटीन में जिनके नाम से उधार चलता था, उनकी लास्ट खबर यह थी कि वह जेल में थे।
वह लड़कियाँ जो आउट ऑफ लीग थीं, जिनके कुत्ते भी पैरों में मोजे पहनते थे, जिनसे बात करने के लिए रैपिडेक्स से वाक्य याद कर जाना पड़ता था। उनका ध्यान शिक्षा पर न रहा रोमांस पर रहा। और जाहिर सी बात है उनके बॉयफ्रेंड भी वैसे ही निकले-आज वह आंटियाँ शिक्षा के महत्व को समझ अपनी बेटियों को स्कूल खुद छोडऩे लेने जाती हैं।
इंजीनियरिंग कालेज में ऐसे ऐसे छात्र थे जिन्होंने बारहवीं तक कोई फिल्म सिनेमा हाल में न देखी थी, पिता लेबर थे। आज वह चीफ इंजीनियर बन मुख्यमंत्री के साथ फोटो डालते हैं।
ऐसे भी मित्र थे जिनकी घरेलू परिस्थितियाँ इतनी विकट थीं कि पढऩा मुश्किल था। किसी तरह से दसवीं पास की पर लगे रहे। पढ़ाई की, सरकारी नौकरी में गए और पढ़ाई की, आज समाज के संभ्रांत व्यक्ति हैं। बच्चों को वह शिक्षा दे रहे हैं जो खुद नहीं पाए थे।
इक्का-दुक्का नेताजी के साथ टहलने वाले लोग छोड़ दिए जाएँ तो केवल और केवल शिक्षा ने सबके जीवन में अंतर पैदा किया। खुले दिमाग से अपने अगल-बगल देख डालिए, पचीस साल की कैरियर ग्रोथ, नब्बे प्रतिशत आप पाएँगे शिक्षा ने बनाई।
और अंतर केवल पैसे का ही नहीं लाइफ स्टाइल का होता है। शिक्षित व्यक्ति की कम्पनी में सबको मजा आता है। मै स्वयं यदि किसी नेता से मिलता हूँ तो यदि वह शिक्षित है तो बात करने का अलग लेवल होता है, लगता है कुछ अच्छा किया। वहीं अशिक्षित नेता से कार्य तो बन जाता है पर उसका समाज में इज्जत पाना मुश्किल होता है।
मेरी सब मित्रों को यही सलाह रहती है कि आप हैसियत से बढक़र शिक्षा ग्रहण करो और बच्चों को भी दो। इस काल में शिक्षा से बेहतर निवेश कुछ नहीं।
शेष अभी दसवीं फि़ल्म देख रहा हूँ। फिल्म का संदेश भी यही है कि शिक्षा कैसे सकारात्मक परिवर्तन लाती है। नया डायरेक्टर है, डायलाग कुमार विश्वास के हैं तो थोड़ी फ्रेशनेस है। पिक्चर एक बार देखने लायक है। मुख्य है फिल्म का संदेश जिससे मैं सौ प्रतिशत सहमत हूँ।
-चिन्मय मिश्र
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुख के प्रतीक राम के जन्मदिन पर मध्यप्रदेश के खरगोन में हुए विवाद व हिंसा की परिणति में ढेर सारे मकानों को बुलडोजरों से ध्वस्त कर दिया गया..बजाय शांति के संदेश देने के, देश में अनेक स्थानों पर अशांति का बोलबाला के रूप में एक नया ट्रेंड सामने आया है.. न्यायालय के स्थान पर बुलडोजर अब एक चलित न्यायालय की तरह, वादी-प्रतिवादी के घर - दुकान पर पहुंचकर मनचाहा न्याय करता दिख रहा है।
भारत पर बीते करीब 15 दिन बेहद खौफनायक साबित हुए हैं। कर्नाटक से शुरु हुआ सांप्रदायिक बवंडर रामनवमी को देश के तमाम राज्यों मध्यप्रदेश, कर्नाटक, गोवा, बंगाल, आंधप्रदेश, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र से होता हुआ हनुमान जयंती को राष्ट्र की राजधानी दिल्ली तक पहुंच गया। कहां क्या हुआ? कैसे हुआ? क्यों हुआ? इन सब सवालों को लगातार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का माध्यम बनाया जा रहा है।
बुलडोजर क्या कानून का स्थानापन्न बन जाएगा यह नवीनतम प्रश्न है, भारतीय लोकतंत्र के सामने। सांप्रदायिकता को आधार बनाने वाले समुदाय को इस ऐतिहासिक तथ्य पर जरुर गौर करना चाहिए कि ‘भारत के विभाजन में मुस्लिम लीग की सफलता सांप्रदायिकता को सही ठहराती है और पाकिस्तान को एक रखने में उसकी विफलता इसे गलत सिद्ध करती है।’ अतएव सांप्रदायिकता को आदर्श मानने वालों को पाकिस्तान की वर्तमान परिस्थिति का आकलन कर अपने व देश के भविष्य का ठीक-ठीक आकलन कर लेना चाहिए। न करें तो उनकी इच्छा। परंतु परिणाम निश्चित तौर पर सुखद तो नहीं ही निकलेगा। पाकिस्तान की दशा दुर्दशा के समानांतर एक और घटना पर गौर करिए।
सावरकर सन् 1857 के विद्रोह पर अपनी पुस्तक की प्रस्तावना (सन् 1909) में लिखते हैं, ‘राष्ट्र को अपने इतिहास का स्वामी होना चाहिए उसका दास नहीं। मुसलमानों के प्रति घृणा की भावना शिवाजी के काल में उचित और आवश्यक थी किंतु आज केवल इसलिए इस भावना को पाले रखना गलत और मूर्खतापूर्ण होगा कि यह उस समय हिंदुओं की प्रबल भावना थी।’’ गौरतलब है सावरकर सन् 1910 से 1921 तक अंडमान जेल में थे।
आज हर सांप्रदायिक मामले में औरंगजेब का प्रेत लगातार सामने लाया जा रहा है। बहरहाल रामनवमी पर घटी घटनाओं को आधार बनाकर कुछ बात करते हैं। मानस के बालकांड में तुलसीदास जी रामचन्द्र के नामकरण को लेकर लिखते हैं,
जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी। सो सुखधाम राम अस नासा। अखिल लोक दायक विश्रामा।
अर्थात, ये जो आनंद के समुद्र और सुख की राशि हैं, जिस (आनंदसिंधु) के एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं, उन (आपके सबसे बड़े पुत्र) का नाम ‘राम’ है, जो सुख का भवन और संपूर्ण लोकों को शांति देने वाला है।’ परंतु यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि रामनवमी के दिन सुख के भवन के प्रतीक राम के जन्मदिन पर मध्यप्रदेश के खरगोन में हुए विवाद व हिंसा की परिणति ढेर सारे मकानों के बुलडोजरों से ध्वंस और बजाय शांति फैलने के पूरे देश में अनेक स्थानों पर अशांति का बोलबाला के रूप में सामने आई है। सरकार कहती है कि दंगों की सजा के तौर पर घर तोड़े गए। प्रशासन कहता है कि अतिक्रमण था, इसलिए तोड़े गए। बहरहाल इस ध्वंस का समय स्वयं ही यह सिद्ध कर रहा है कि तोड़-फोड़ का मुख्य कारण रामनवमी पर हुआ उपद्रव ही था। मध्यप्रदेश के ही बड़वानी जिले के सेंधवा कस्बे में ऐसे तीन लोगों पर आगजनी की एफआईआर कर दी गई जो पिछले करीब एक माह से जेल में बंद थे। उनका भी मकान तोड़ दिया गया। क्या न्यायालय के स्थान पर बुलडोजर अब एक चलित न्यायालय की तरह, वादी-प्रतिवादी के घर-दुकान पर पहुंचेगा और मनचाहा न्याय कर देगा ?
अरुंधती राय की नवीनतम पुस्तक है ‘आजादी’। इसके पहले अध्याय का शीर्षक है, ‘सताये हुए शहरों पर किस भाषा में बारिश होती है।’ अब भारत में जिस नई भाषा का प्रयोग हो रहा है, वह सांप्रदायिकता से ओतप्रोत है। क्या कभी यह सोचा गया था कि भारत में रामनवमी, जिसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्मदिन के रूप में माना जाता है, उस दिन जुलूस में भागीदारी करने वाले कई लोग सार्वजनिक तौर पर ‘माँ-बहन’ की गालियां देते नजर आएंगे। सैकड़ों लोग तलवार नचाते हुए सार्वजनिक स्थानों पर ऊघम करते नजर आएंगे। कान का पर्दा फाड़ देने जैसी तेज आवाज में डीजे पर अश्लील व सांप्रदायिक गानों की दहाड़ सुनाई देगी।
याद रखिए कि देवताओं में भी सिर्फ रामचंद्रजी के ही आगे ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ जुड़ा है। परंतु उस दिन बहुत से भारतीयों ने सभी तरह की मर्यादाओं और वर्जनाओं को छिन्न भिन्न कर डाला। गुजरात दंगे हमारे घरों में हो रही हिंसा की सार्वजनिक अभिव्यक्ति का विस्तार थे। हम अपने को, अपने परिवार को लगातार हिंसक बना रहे हैं। इधर पिछले दिनों ओटीटी प्लेटफार्म पर जिस तरह से हिंसा और अश्लील भाषा, यहां तक कि गंदी गालियों तक का खुलेआम प्रयोग हो रहा है, उसने भी भाषाई अश्लीलता और गालियों को सार्वजनिक स्वीकृति दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। तो समझ रहे हैं न भारतीय शहरों में कौन सी भाषा बरस रही है 7
आजकल हम अपने आसपास तीन शब्दों को लगातार सुन रहे हैं, ‘हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान’। ये तीनों ही शब्द फारसी-अरबी से लिए गए हैं। भारत में पिछले दिनों हिन्दी को राजकाज की भाषा बनाने को लेकर शुरु हुई चर्चा से जो कुछ सामने आ रहा है, वह बेहद जोखिम भरा है। यूँ तो भारत की करीब 45 प्रतिशत से ज्यादा आबादी हिन्दी भाषी है, लेकिन इसमें भी कई उपभाषाएं या बोलियां शामिल हैं। इनमें से कई आठवीं अनुसूची में अपना स्थान चाहतीं हैं। अभी इसमें 22 भाषाएं हैं। जम्मू से डोगरी और कश्मीर से कश्मीरी इसमें शामिल हैं। भोजपुरी बोलने वाला समुदाय चाहता है कि उसे इस सूची में स्थान मिले। उनकी संख्या करीब 5 करोड़ है। बहरहाल एक के बाद एक विवाद खड़े होते जाने से देश की मुख्य समस्याएं तो हल नहीं होंगी बल्कि नई समस्याएं जरूर अपनी जगह बनाती जाएंगी।
भाषा विवाद आजादी के बाद सबसे संवेदनशील विषयों में रहा है। भारत में भाषायी आधार पर ही तो राज्यों का पुनर्गठन भी हुआ है। यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान के टूटने और बांग्लादेश के बनने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक भाषा ही थी। बांग्ला पर उर्दू की प्रभुता पाकिस्तान के टूटने का एक बड़ा कारण बनी थी। इसी तरह श्रीलंका में सिंहलियों ने तमिलों पर सिंहला भाषा थोपने का परिणाम वहां पर भयानक व क्रूर गृहयुद्ध के रूप में देखने का आया था।
मीर तकी मीर का शेर हैं,
जिस सर को गुरुर आज है यहां ताज वारी का। कल उस पें यहीं शोर है फिर नौहागारी (मातम) का।
इन पंक्तियों को भारतीय राजनीतिज्ञों से ज्यादा बेहतर और कौन समझ सकता है। इसके बावजूद सब कबूतरों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। सांप्रदायिकता नाम की बिल्ली तो बस मौके के इंतजार में है। समय के साथ सांप्रदायिकता स्वयं को विस्तारित करते हुए अपने में बहुसंख्यवाद को भी समाहित कर लेती है। इसी बजह से पाकिस्तान, श्रीलंका और म्यामांर का पतन हमारे देखते-देखते ही हो गया। आज से करीब 15 वर्ष पहले श्रीलंका सभी पैमानों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला अधिकार, प्रति व्यक्ति आय में हमसे आगे था। राजपक्षे, परिवार की सरकार ने सांप्रदायिकता व बहुसंख्यक होने के मुहावरों को थोपा और वहां की स्थिति हमारे सामने है। म्यांमार में बौद्ध सांप्रदायिकता और पाकिस्तान का इस्लामी अतिवाद उन देशों को किधर ले गया है, हमारे सामने है। बांग्लादेश जब तक इसे बचाता रहा, जबरदस्त तरक्की करता गया। वहां भी सांप्रदायिक ताकतें अब सिर उठाने को मचल रहीं है। सार्क देशों की स्थिति अब हम सबके सामने है। एक राष्ट्र, एक धर्म और एक भाषा का विचार मूलत: समतावादी समाज की स्थापना में सबसे बड़ा रोड़ा होता है।
भारत में फैल रही सांप्रदायिक नफरत हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। मुख्य समस्याओं से ध्यान बंटाने में इसकी भूमिका तलाशने वालों को यह समझना होगा कि आगामी कुछ वर्षों में यह भारत की सबसे बड़ी समस्या बनकर उभर सकती है और तब तक बहुत देर हो जाएगी। इतिहासकार बिपिन चंद्र ने आजादी के पूर्व की सांप्रदायिकता पर बेहद महत्वपूर्ण बात कही है, ‘हमें सांप्रदायिक तनाव और सांप्रदायिक राजनीति के अंतर को भली प्रकार समझ लेना चाहिए। इनमें से पहला अर्थात सांप्रदायिक तनाव आकस्मिक होता था और इसमें आमतौर पर केवल निचला वर्ग ही प्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित होता रहा। सांप्रदायिक तनाव के समय जिस क्षेत्र में यह तनाव होता वहां भिन्न धर्मावलंबियों के बीच पारस्परिक संबंध बिल्कुल समाप्त हो जाते थे।’ वहीं तत्कालीन सांप्रदायिक राजनीति पर वे कहते हैं, ‘दूसरी ओर सांप्रदायिक राजनीति का इतिहास अधिक लंबा है और उसमें निरंतरता दिखाई देती है। इसमें मुख्य रूप से मध्य वर्ग, जमींदार व नौकरशाह संबद्ध रहे हैं। वे सांप्रदायिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे। इसकी अभिव्यक्ति राजनीतिक क्षेत्र में होती थी, अन्य समुदाय के सदस्यों के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्यकलापों में नहीं।’’ परंतु वर्तमान में परिस्थितियों ने नया मोड़ ले लिया है और सांप्रदायिक राजनीति हमसे देश के सामाजिक व सांस्कृतिक आधार में हस्तक्षेप कर रही हैं और इसके घातक परिणाम सामने आ रहे हैं।
भाषा को लेकर टूटन का इतिहास दक्षिण एशिया में रहा है तो सांप्रदायिकता से होने वाले भयानक दुष्परिणाम भी किसी से छुपे हुए नहीं है। भारत के विभाजन की विभीषिका आज भी हमें दहला देती है। परंतु हालिया समय में पाकिस्तान, श्रीलंका और म्यामांर कमोवेश बर्बादी के कगार पर पहुंच गए हैं। भारत में पिछले कुछ महीनों से बढ़ते सांप्रदायिक तनाव और हिंसा को लेकर देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की चुप्पी वास्तव में चकित कर रही है। वहीं इसी विषय पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के बयान एकदम अलग मानसिकता की ओर इशारा कर रहे हैं। बुलडोजर संस्कृति को दिया जा रहा प्रोत्साहन कानून व्यवस्था व न्यायालयों की गरिमा को खतरे में डाल रहा है। उच्च न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय की चुप्पी भी डरावनी है।
सवाल यह है कि भारतीय राजनीति को किस दिशा में ले जाने का प्रयास किया जा रहा है ? देश अभी भाषायी और सांप्रदायिक विवादों से अभी जूझ ही रहा था कि एकाएक अगले 15 वर्षों में अखंड भारत स्थापित होने की बात उछाल दी गई। इस विषय पर चलते - चलते यही कहा जा सकता है कि यह कोई समझदारी भरा वक्तव्य नहीं है और जो असंभव है उसे संभव बनाने का प्रयास ही आत्मघाती होता है। अभी अखंड भारत में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान व बर्मा (म्यांमार) ही आते हैं या पूरा जंबूद्वीप आएगा। यानी
इंडोनेशिया वगैरह ? तब क्या भारत एक हिन्दू राष्ट्र बना रह पाएगा ? खैर इस पर भी अलग से बात होना चाहिए। यह प्रस्ताव भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि को धूमिल करेगा। यह प्रस्ताव भारत हमें वर्तमान रूस की मानसिकता के नजदीक पहुंचा देता है। वास्तविकता को झुठलाना स्वयं को (धोखा) देना है। संकटकाल में गांधी को याद करते हैं। अपना अंतिम उपवास प्रारंभ करते हुए उन्होंने 13 जनवरी 1948 को कहा था, ‘‘हम गुनहगार बन गए हैं, लेकिन कोई एक आदमी गुनहगार थोड़े है। हिन्दू, सिख, मुसलमान तीनों गुनहगार थे। अब तीनों गुनहगारों को दोस्त बनना है। हम तो धर्म के नाम पर अधर्मी बन गए। अगर हम तीनों धर्म पथ पर चलें तो किसी एक को डरने की आवश्यकता नहीं है।’’ जरुरी तो यह है कि सांप्रदायिक तनाव को सांप्रदायिक राजनीति में परिवर्तित होने से तुरंत रोका जाए। (हमसमवेत)
(उपरोक्त आर्टिकल में लेखक ने अपने स्वतंत्र विचार को संप्रेषित किया है)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अगर दुनिया में मिलावटखोर देशों की खोज-बीन होने लगे तो शायद हमारे भारत का नाम पहली पंक्ति में होगा। ऐसा नहीं है कि अन्य देशों में मिलावट के अपराध नहीं होते लेकिन कई देशों में मिलावटखोरों के लिए उसी सजा का प्रावधान है, जो किसी हत्यारे के लिए होती है। वास्तव में मिलावटखोर किसी भी हत्यारे से बड़ा हत्यारा होता है। मिलावटी खाद्य पदार्थों का सेवन करनेवाले सैकड़ों और हजारों लोग धीरे-धीरे मारे जाते हैं। यह ऐसी प्रक्रिया है कि न मरनेवाले का पता चलता है और न ही मारनेवाले का! सब काम चुपचाप होता रहता है। हत्यारा तो दो-चार आदमियों को मार देता है लेकिन मिलावटखोर तो दर्जनों हत्यारों का कुकर्म अकेला ही कर देता है।
ऐसे ही एक हत्यारे को हरियाणा के पलवल में पुलिस ने रंगे हाथ गिरफ्तार किया है। वह देसी घी के नाम पर तरह-तरह के रासायनिक पदार्थों को मिलाकर नकली घी बेचता था। वह कई बड़ी-बड़ी कंपनियों का खराब हुआ घी खरीदकर उन्हें सुंदर-सी शीशियों में भरकर भी बेचता था। यह घी छोटे-मोटे दुकानदारों को काफी कम कीमत पर दिया जाता था। वे नकली घी को मंहगे दाम पर बेचकर उससे मुनाफा जमकर कमाते थे।
यह घी कई बीमारियां पैदा कर सकता है। हृदय रोग, रक्तचाप और मधुमेह तो यह घी पैदा करता ही है, इससे कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है। किडनी और यकृत को निढाल करने में यह घी विशेष सक्रिय रहता है। गर्भवती महिलाओं के लिए भी यह घी खतरे की घंटी है। घी में मिलावट से उतने लोग प्रभावित नहीं होते, जितने आटे और नमक में मिलावट से होते हैं। आटा और नमक तो गरीब से गरीब आदमी को भी रोज चाहिए। अभी सूरत में ऐसे आटे और नमक के कई प्रसिद्ध ब्रांडो के नमूने पकड़े गए हैं, जिन्हें खाने से तरह-तरह की बीमारियां हो सकती हैं।
खाने-पीने की ऐसी सैकड़ों चीजें हैं, जिसमें हर दिन मिलावट होती रहती है। मिलावटी चीजें प्रतिदिन खानेवाले ऐसे करोड़ों लोग हैं, जो अपनी तबियत खराब होने पर ठीक से इलाज भी नहीं करवा सकते। ऐसा नहीं है कि सरकार इन मिलावटखोरों के खिलाफ सक्रिय नहीं है या कोई कार्रवाई नहीं करती। सरकार ने ‘खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006’ में मिलावटखोरों पर 10 लाख रु. जुर्माने और 6 माह से लेकर उम्र कैद तक का प्रावधान कर रखा है लेकिन क्या आज तक किसी को उम्रकैद हुई है?
10 लाख जुर्माने की बात अच्छी है लेकिन कितने मिलावटखोरों पर यह जुर्माना अभी तक हुआ है? वास्तव में यह कानून बेहद सख्त होना चाहिए। मिलावट की गंभीरता के आधार पर सजा भी होनी चाहिए। मिलावटखोरों में से दो-चार को भी फांसी की सजा दी जाए और उसका जमकर प्रचार किया जाए तो भावी मिलावटखोरों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ सकती है।
मिलावटी चीजों के कारखानों में काम करनेवालों और उन चीजों को बेचनेवाले दुकानदारों के लिए भी छोटी-मोटी सजा का प्रावधान हो तो उसका भी काफी असर पड़ेगा। वास्तव में मिलावट तो नर-संहार के बराबर अपराध है। सजा-ए-मौत ही इसका इसका सही जवाब है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
धर्म की रक्षा के नाम पर हिंसक भीड़ों के जो समूह सड़कों पर लगातार बढ़ते जा रहे हैं उन पर नियंत्रण क़ायम करने का क्षण आ पहुँचा है। इस काम में जितना ज़्यादा विलम्ब होगा स्थिति उतनी ही विस्फोटक होती जाएगी। जो चल रहा है उसे देखते हुए आगे आने वाले समय(मान लीजिए पंद्रह साल) के किसी ऐसे परिदृश्य की कल्पना प्रारम्भ कर देना चाहिए जिसमें किसी विचारधारा या धर्म विशेष की अगुआई करने वाले अराजक तत्वों की संगठित ताक़त संवैधानिक संस्थानों की सीढ़ियों पर जमा होकर उन पर अपना नियंत्रण क़ायम कर लेंगी !
मतलब यह कि जिन नागरिकों का वर्तमान में चयन विधर्मियों के आराधना स्थलों पर अतिक्रमण कर अपनी धर्म ध्वजाएँ फहराकर धार्मिक आतंक क़ायम करने के लिए किया जा रहा है वे ही किसी आने वाले समय में अनियंत्रित होकर संसद भवनों, विधान सभाओं और न्यायपालिका, आदि के परिसरों में भी अनाधिकृत प्रवेश कर अराजकता मचा सकते हैं ! उस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में इन अनियंत्रित समूहों को वे सत्ताएँ भी क़ाबू में नहीं कर पाएँगी जो तात्कालिक राजनीतिक अथवा धार्मिक हितों के लिए उनका अभी अस्थायी अनुयायियों के तौर पर उपयोग कर रहीं हैं।
जिस परिदृश्य की यहाँ बात की जा रही है वह चौंकाने वाला ज़रूर नज़र आ सकता है पर उसके घट जाने को इसलिए असम्भव नहीं समझा जाना चाहिए कि दुनिया के देखते ही देखते सिर्फ़ सवा साल पहले अमेरिका जैसी पुख़्ता प्रजातांत्रिक व्यवस्था भी उसका निशाना बन चुकी है। अमेरिका के तैंतीस करोड़ नागरिक पंद्रह महीनों के बाद भी उस त्रासदी के आतंक से अपने को मुक्त नहीं कर पाए हैं जो पिछले साल छह जनवरी को राजधानी वाशिंगटन में घटित हुई थी।
राष्ट्रपति पद के चुनावों में हार से बौखलाए डॉनल्ड ट्रम्प के कोई ढाई हज़ार समर्थकों की हिंसक भीड़ ने संसद भवन (कैपिटल हिल) पर उस समय क़ब्ज़ा कर लिया था जब उपराष्ट्रपति माइक पेंस की उपस्थिति में कांग्रेस के संयुक्त अधिवेशन में चुनाव परिणामों की पुष्टि के लिए मतों की गिनती का काम चल रहा था। व्हाइट हाउस में परिवार सहित बैठे ट्रम्प घटना के टेलिविज़न प्रसारणों के ज़रिए अपने हिंसक समर्थकों के सामर्थ्य पर गर्व कर रहे थे। ये समर्थक चुनाव परिणामों को हिंसा के बल पर ट्रम्प के पक्ष में उलटवाना चाहते थे। ट्रम्प आज तक स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि चुनावों में उनकी पराजय हुई है। ट्रम्प का आरोप है कि बाइडन ने उनकी जीत पर डाका डाला है।
जॉर्ज वाशिंगटन द्वारा 30 अप्रैल 1789 को पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद हुई अमेरिका के संसदीय इतिहास की इस पहली बड़ी शर्मनाक घटना ने समूचे विश्व को हिलाकर रख दिया था। ग्यारह सितम्बर 2001 को जो हुआ वह अगर अमेरिका पर बाहरी आतंकी हमला था तो यह अंदर से हुआ आक्रमण था।छह जनवरी 2021 की घटना और उसमें ट्रम्प की भूमिका की चाहे जैसी भी जाँच वर्तमान में चल रही हो, हक़ीक़त यह है कि पूरे अमेरिका में ट्रम्प के समर्थकों की संख्या इस बीच कई गुना बढ़ गई है। हो सकता है ट्रम्प एक बार फिर राष्ट्रपति बन जाएँ। 2024 में वहाँ भी चुनाव है और हमारे यहाँ भी हैं।
ट्रम्प समर्थक कौन हैं ? ये वे गोरे सवर्ण हैं जो अपने ही देश में रहने वाले अश्वेत अफ़्रीकियों, एशियाइयों, मुसलिमों और अपने से अलग चमड़ी के रंग वाले लोगों से नफ़रत करते हैं, अपनी समृद्धि में इन वर्गों की भागीदारी का विरोध करते हैं और अमेरिका की सड़कों पर आए दिन नस्ली हमले करते हैं। ट्रम्प के नेतृत्व में ही इन्हीं अराजकतावादियों ने कोविड के ख़िलाफ़ लड़ाई में मास्क पहनने सहित समस्त प्रतिबंधों का विरोध किया था और टीके लगवाने से इनकार कर दिया था। सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुए लोग जब प्रजातांत्रिक तरीक़ों से अपने आप को बचाए रखने में नाकामयाब होने लगते हैं तो फिर अपने हिंसक धार्मिक समर्थकों को सड़कों की लड़ाई में झोंक देते हैं।
सत्ता और संगठनों के मौन समर्थन और धार्मिक नेताओं की मदद से भीड़ की जिस राजनीति को संरक्षण प्राप्त हो रहा है वह न सिर्फ़ लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है एक ऐसी स्थिति की ओर देश को धकेलने का संकेत भी है जिसमें सड़कों की अराजकता सभी प्रकार के संवैधानिक बंधनों से बाहर हो जाएगी। ख़तरा यह भी है कि जो सत्ताएँ आज जिस भीड़ को संरक्षण दे रहीं हैं वे ही आगे चलकर उसके द्वारा बंधक बना ली जाएँगी।
हम इस सच्चाई से जान-बूझकर मुँह मोड़ रहे हैं कि पिछले कुछ महीनों या सालों के दौरान हमारे आसपास बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान, कारख़ाने अथवा रोज़गार उपलब्ध करवाने वाले संसाधन निर्मित होने के बजाय बड़े-बड़े धार्मिक स्थलों, ऊँची-ऊँची मूर्तियों और आराधना स्थलों का निर्माण ही ज़ोर-शोर से चल रहा है। धार्मिक समागमों और धर्म संसदों की बाढ़ आ गई है। संवैधानिक संस्थानों के समानांतर धर्मगुरुओं की सत्ताएँ स्थापित हो रही हैं।
नागरिकों को इस फ़र्क़ के भीतर झांकने नहीं दिया जा रहा है कि जो सच्चा आध्यात्मिक भक्त अपनी भूख-प्यास की चिंता किए बग़ैर सैंकड़ों कोस पैदल चलकर ईश्वर के दर्शन के लिए दुर्गम स्थलों पर पहुँचता है या किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजाघर के कोने में चुपचाप बैठा हुआ ध्यान और तपस्या में लीन रहता है. वह सड़क की भीड़ में शामिल उस ‘भक्त’ से भिन्न है जिसके पास अपना कोई चेहरा या पता नहीं है; जो हमेशा ‘अज्ञात’ बना रहता है। इस अज्ञात नागरिक के पास सुनने के लिए कान नहीं होते, सिर्फ़ दो आँखें होतीं हैं जो किसी ईश्वर को नहीं बल्कि अपने धार्मिक शिकार को ही तलाशती रहती हैं। इस भीड़ के नायक भी अंत तक अज्ञात बने रहते हैं। वे अपने अनुयायियों का चयन उनकी आध्यात्मिक चेतना के बजाय उनके शारीरिक सामर्थ्य के आधार पर करते हैं।
हमें भयभीत होना चाहिए कि अराजक भीड़ों के समूह अगर इसी तरह सड़कों पर प्रकट होकर आतंक मचाते रहे तो न सिर्फ़ क़ानून-व्यवस्था के लिए राष्ट्र्व्यापी संकट उत्पन्न हो जाएगा, उसमें शामिल होने वाले लोग धर्म और राष्ट्रवाद को ही अपनी जीविका का साधन बनाकर नागरिक समाज में हिंसा का साम्राज्य स्थापित कर देंगे। ये ही लोग फिर सत्ता में भागीदारी की माँग भी करने लगेंगे। जो भीड़ अभी नागरिकों के लिए पहनने और खाने के क़ानून बना रही है वही फिर देश को चलाने के दिशा-निर्देश भी जारी करने लगेगी! संसद और विधान सभाओं में आपराधिक रिकार्ड वाले सदस्यों की वर्तमान संख्या को अभी शायद पर्याप्त नहीं माना जा रहा है !
धर्म की रक्षा और राष्ट्रवाद के नाम पर जिस तरह की हिंसा का प्रदर्शन हो रहा है उसे लेकर प्रधानमंत्री की खामोशी पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि जो कुछ चल रहा है उसके पीछे मंशा या तो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को और मज़बूत करने की है या फिर महंगाई और बेरोज़गारी सहित अन्य बड़ी समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने के लिए विघटनकारी उपक्रमों को प्रोत्साहित किया जाना है। इस काम में मुख्य धारा का मीडिया भी सत्ता प्रतिष्ठानों की मदद कर रहा है। सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री अपनी खामोशी तोड़कर कोई जवाब देंगे ? उनका जवाब सुनने के लिए पूरा देश प्रतीक्षा करता हुआ क़तार में है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
रामनवमी और हनुमान जयंति के अवसरों पर देश के कई प्रदेशों में हिंसा और तोड़-फोड़ के दृश्य देखे गए। उत्तर भारत के प्रांतों के अलावा ऐसी घटनाएं दक्षिण और पूर्व के प्रांतों में भी हुईं। हालांकि इनमें सांप्रदायिक दंगों की तरह बहुत खून नहीं बहा लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता कि आज़ाद भारत में ऐसी हिंसात्मक घटनाएं कभी कई प्रदेशों में एक साथ हुई हों। ऐसा होना काफी चिंता का विषय है।
यह बताता है कि पूरे भारत में सांप्रदायिक विद्वेष की कोई ऐसी अदृश्य धारा बह रही है, जो किसी न किसी बहाने भडक़ उठती है। विरोधी दलों ने संयुक्त बयान देकर पूछा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं? वे कुछ बोलते क्यों नहीं हैं? इस प्रश्न का भावार्थ यह है कि इन हिंसात्मक कार्रवाइयों को भाजपा सरकार का आशीर्वाद प्राप्त है। विरोधी दलों के नेता इन कार्रवाइयों के लिए सत्ताधारी भाजपा को जिम्मेदार ठहराना चाहते हैं।
यहां यह सवाल भी विचारणीय है कि क्या इस तरह के सांप्रदायिक दंगे और हिंसात्मक घटना-क्रम सिर्फ भाजपा शासन-काल में ही होते हैं? कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और समाजवादियों के शासनकाल में ऐसी घटनाएं क्या बिलकुल नहीं हुई हैं? यह हमारे भारतीय समाज का स्थायी चरित्र बन गया है कि हम अपने राष्ट्र से भी कहीं ज्यादा महत्व अपनी जात और अपने मज़हब को देते हैं। 1947 के बाद जिस नए शक्तिशाली और एकात्म राष्ट्र का हमें निर्माण करना था, उस सपने का थोक वोट की राजनीति ने चूरा-चूरा कर दिया।
थोक वोट के लालच में सभी राजनीतिक दल जातिवाद और सांप्रदायिकता का सहारा लेने में जऱा भी संकोच नहीं करते। भारत में ऐसे लोग सबसे ज्यादा हैं, जिनका नाम सुनते ही उनमें से उनकी जात और मजहब का नगाड़ा बजने लगता है। जो कोई अपनी जात और मजहब को बनाए रखना चाहते हैं, उन्हें उसकी पूरी आजादी होनी चाहिए लेकिन उनके नाम पर घृणा फैलाना, ऊँच-नीच को बढ़ाना, दंगे और तोड़-फोड़ करना कहां तक उचित है?
यही प्रवृत्ति देश में पनपती रही तो भौगोलिक दृष्टि से तो भारत एक ही रहेगा लेकिन मानसिक दृष्टि से उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। यह खंड-खंड में बंटा भारत क्या कभी महाशक्ति बन सकेगा? क्या वह अपनी गरीबी दूर कर सकेगा? मुझे तो डर यह लगता है कि 22 वीं सदी पूरी होते-होते कहीं ऐसा न हो जाए कि भारत के हर प्रांत और हर जिले को सांप्रदायिक और जातिवादी आधार पर बांटने की मांग पनपने लगे। आज भारत की राजनीति में अनेक सक्रिय दल ऐसे हैं, जिनका आधार शुद्ध संप्रदायवाद या शुद्ध जातिवाद है।
यह राष्ट्रीय समस्या है। इसका समाधान अकेले प्रधानमंत्री या उनका अकेला राजनीतिक दल कैसे कर सकता है? इस पर तो सभी दलों की एक राय होनी चाहिए। अकेले प्रधानमंत्री ही नहीं, सभी दलों के नेताओं को मिलकर बोलना चाहिए। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, इसलिए उनकी आवाज़ सबसे बुलंद होनी चाहिए। किसी भी नेता को वोट बैंक की हानि से डरना नहीं चाहिए। वे अपने वोट बैंक के चक्कर में भारत की एकता बैंक का दिवाला न पीट दें, यह सोच जरुरी है।
भारत-जैसा विविधतामय देश दुनिया में कोई और नहीं है। जितने धर्म, जितनी जातियां, जितनी भाषाएं, जितने खान-पान, जितनी वेश-भूषाएं और जितने रंगों के लोग भारत में प्रेम से रहते हैं, दुनिया के किसी भी देश में नहीं रहते। क्या ऐसे करोड़ों भारतवासी मु_ीभर उग्रवादियों के हाथ के खिलौने बनना पसंद करेंगे? (नया इंडिया की अनुमति से)
-रवीश कुमार
धार्मिक जुलूस में आपको उलछते-कूदते देख अच्छा लग रहा है। जिस हिन्दी भाषी समाज ने आप हिन्दी मीडियम वालों को किनारे सरका दिया था, उस समाज की मुख्यधारा में आप लौट आए हैं। क्या शानदार वापसी की है। एक रंग की पोशाक पहन ली है, हाथों में तलवारें हैं, जुबान पर गालियां हैं। जुलूस का नाम रामनवमी की शोभायात्रा है। अशोभनीय हरकतों को आप लोगों ने आज के दौर में सुशोभित कर दिया। आपकी इस कामयाबी को मैंने कई वीडियो में देखे तब जाकर सारी शंकाएं दूर हो गईं कि ये वही हैं, हमेशा फेल माने जाने वाले हिन्दी मीडियम के युवा,जिन्हें समाज ने तिरस्कार दिया, आज धर्म रक्षक बनकर लौट आए हैं। इनके समर्थन में पूरा समाज खड़ा है। सरकार भी है।
मैं दावे के साथ नहीं कह सकता कि उन वीडियो में कोई डीपीएस या श्रीराम स्कूल जैसे महंगे पब्लिक स्कूलों के बच्चे भी रहे होंगे लेकिन देखने से तो यही लगा कि ज़्यादातर वही होंगे जो गणित और अंग्रेजी से परेशान रहते हैं। जिन्हीं हिन्दी भी ठीक से लिखनी नहीं आती मगर गाली देने आती है। मैंने कई वीडियो में गालियों के उच्चारण सुने। एकदम ब्रॉडकास्ट क्वालिटी का उच्चारण था और ब्रॉडकास्ट हो भी रहा था। जिस समाज में उदारता कूट-कूटकर भरी होती है उस समाज में उच्चारण भी कूट-कुटाकर साफ हो जाता है।
हिन्दी मीडिया के तिरस्कृत छात्रों ने यह उपलब्धि भाषा के आधार पर हासिल नहीं की है। धर्म के आधार पर की है मगर धर्म के शास्त्रों और दर्शनों का ज्ञान हासिल कर नहीं की है। दूसरे धर्म की मां-बहनों को गाली देकर हासिल की है। यहां भी आप हिन्दी मीडियम वालों ने कुंजी पढक़र पास होने की मानसिकता का प्रमाण दे ही दिया। पूरी किताब की जगह गालियों की कुंजी से धर्मरक्षक बन गए। कोई बात नहीं। अभी आपकी हाथों में तलवारें हैं तो चुप रहना बेहतर है। इसलिए मैं आपकी प्रशंसाओं में श्रेष्ठ प्रशंसा भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहा हूं।
हिन्दी प्रदेशों की आर्थिकी के कारण आपकी शारीरिक कमजोरी इन जुलूसों में भी झलक रही थी। कुपोषकता इतनी आसानी से नहीं जाती है लेकिन समूह में आप जिस तरह से उछल-उछलकर गालियां दे रहे थे, विद्याकसम, पता नहीं चल रहा था कि आपमें किसी प्रकार की शारीरिक कमजोरी है। आपने हिन्दी प्रदेशों की दीवारों पर लिखीं मर्दाना कमजोरी की दवाओं के विज्ञापनों को भी परास्त कर दिया है। जिनमें हिन्दी में वीर्यहीनता को कोसा जाता है। जब आप तलवार उठाए दूसरे धर्म के लोगों को गालियां दे रहे थे तभी मैंने विश्व गुरु भारत के क्षितिज पर एक नई वीरता के उदय की उषा किरणों का साक्षात दर्शन कर लिया। प्रणाम वीरवर।
हमने हिन्दी साहित्य की किताब में राधा कृष्ण की एक कहानी पढ़ी थी। भामिनी भूषण भट्टाचार्य शारीरिक कमजोरी के शिकार थे। जीवन में बहुत कुछ बनना चाहा, वकील भी बने, वकालत नहीं चली तो व्यायाम करने लगे। एक दिन उनके मित्र ने देखा कि कमरे के भीतर व्यायाम कर रहे हैं। उठा-पठक चल रही है। पूछने पर भामिनी भूषण भट्टाचार्य ने कहा कि मुझे कोई भला क्या पटकेगा, बल्कि मैं ही अभी पचास काल्पनिक पहलवानों को कुश्ती में पछाड़ कर आया हूं। मेरे प्यारे हिन्दी मीडियम वालों तलवार लिए आपको देखा तो राधाकृष्ण की कहानी की ये पंक्तियां बरबस याद हो गईं। इसमें भट्टाचार्य जी ताकत के जोश में बताने लगते हैं कि जल्दी ही मोटरें रोकने लगेंगे। लेकिन जब उनके मित्र ने गाौर से देखा तो शरीर में कोई तब्दीली नहीं आई थी। बिल्कुल वही के वही थे। लेकिन भट्टाचार्य मानने को तैयार नहीं थे कि व्यायाम के बाद भी वे दुबले ही हैं। लगे चारों तरफ से शरीर को दिखाने कि कैसे तगड़े हो गए हैं। अंत में मित्र ने कह दिया कि तुम गामा पहलवान से भी आगे निकल जाओगे। तब भामिनी भूषण भट्टाचार्य की एक पंक्ति है। अभी गामा की क्या बात, थोड़े दिनों में देखना, मैं बंगाल के सुप्रसिद्ध पहलवान गोबर से भी हेल्थ में आगे बढ़ जाऊंगा।
इस पर लेखक लिखते हैं कि विचित्र विश्वास था। वह उल्टा मित्र को ही गरियाने लगे कि तुम्हारी तरह किरानी बनकर झक नहीं मारना है। मैं बड़ा आदमी होना चाहता हूं। आज मेरा नाम है भीम भंटा राव कुलकर्णी, व्यायाम विशारद, मुगदराविभूषि, डंबलद्वयी, त्रिदंडकारक। इस विस्तृत परिचय पत्र में मैं अपनी तरफ से तलवारधारी, डीजे नर्तक, गाली वाचक जोड़ देता हूं ताकि हिन्दी माध्यम के युवाओं का सीना एक इंच और फूल जाए।
जैसा कि हर कामयाबी में होता है, आपकी इस नवीन कामयाबी में भी एक कमी रह गई। समाज के सारे युवा आपके साथ नहीं आए जबकि धर्म की रक्षा और बदला लेने का काम उनका भी था। खासकर मिडिल क्लास के मां-बाप ने अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम में डालकर उन्हें धर्म विमुख कर दिया है। ऐसा नहीं है कि वे पूजा अर्चना नहीं करते हैं, खूब करते हैं मगर तलवार लेकर दूसरे धर्म की मां-बहनों को गालियां देने सडक़ों पर नहीं उतरते हैं। अपने बीच मौजूद ऐसे स्वार्थी तत्वों की पहचान कर लीजिए। धर्म की लड़ाई में असली ट्रॉफी यही लोग ले जाते हैं जब सडक़ पर उतरने की जगह सोशल मीडिया पर लिख कर पोपुलर हो जाते हैं और इंजीनियर तो हो ही जाते हैं। कुछ डॉक्टर भी होते हैं और कुछ अफसर भी। आप देखिएगा जल्दी ही ये सारे इंग्लिश मीडियम वाले अपने मोहल्ले से गायब होने लगेंगे। फेसबुक पर पूजा के पंडाल को मिस करेंगे लेकिन पंडाल लगाने की जिम्मेदारी आपके महान कंधों पर छोड़ जाएंगे।
जब अमरीका लंदन से लौटेंगे तो मोहल्ले में सस्ती परफ्य़ूम से लेकर घड़ी बांट कर पोपुलर हो जाएंगे। अपनी कहानी सुनाएंगे और लोग चाव से सुनेंगे। कब तक आप उन्हें दोस्ती के नाम पर स्टेशन से घर लाने का काम करेंगे। ये काम आपने अच्छा चुना है। अब मैसेज कर दीजिएगा कि आप धर्म की रक्षा में एक शोभा यात्रा में निकले हैं। तलवारें लेकर दूसरे धर्म की मां-बहनों को गालियां दे रहे हैं। आप ही धर्म की रक्षा के अवैतनिक प्रभारी हैं। स्कूल के दिनों में संस्कृत की कक्षा में मुश्किल मंत्रों और श्लोकों के कारण आप धर्म विमुख हो गए थे। लेकिन मंत्रों की जगह गालियों के इस्तेमाल ने आपको फिर से धर्मोन्मुख कर दिया है।
अब रक्षा का भार आप पर है। आप नहीं होंगे तो धर्म नहीं बचेगा। तलवारें नहीं बचेंगी। गालियां नहीं बचेंगी। आपने बहुत सह लिया। गणित और अंग्रेजी की कमज़ोरी का हिसाब अब धर्म की रक्षा के काम से निकालना है। आपका टाइम आ गया है। आप की शोभा बढ़ रही है। आपके चलते हिन्दी मीडियम वालों की पूछ बढ़ रही है। इंग्लिश मीडियम में पढऩे वाले हिन्दी समाज के लडक़े बाद में पछताएंगे कि जब धर्म की रक्षा में गालियां देने का वक्त था तो वे कोचिंग कर रहे थे। धर्म को अगर खतरा है तो इन प्राइवेट स्कूलों में पढऩे वाले युवाओं से हैं जो व्हाट्सऐप में नफरती मीम तो फॉरवर्ड करते हैं लेकिन कभी सडक़ पर उतर कर गालियाँ नहीं देते। इंग्लिश मीडियम वाले मोर्चे और मुल्क से भागे हुए लोग हैं। निर्लज्ज इंग्लिश मीडियम वाले।
आपका
वही जिसे आप हमेशा से पराया मानते रहे हैं
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जो जवाबी खत लिखा है, उसे देखकर मुझे लगता है कि दोनों देशों के बीच पिछले तीन साल में जो संवादहीनता पनप गई थी, अब शायद वह टूट जाए। मोदी ने शाहबाज को बधाई का जो पत्र लिखा था, उसमें यही इच्छा व्यक्त की थी कि दोनों देशों के बीच ऐसे संबंध रहने चाहिए, जिनसे दक्षिण एशिया के क्षेत्र में शांति और स्थायित्व का वातावरण बने। शाहबाज ने एक कदम आगे बढ़कर कहा है कि दोनों देशों को मिलकर गरीबी और बेकारी के खिलाफ युद्ध लड़ना चाहिए।
दोनों प्रधानमंत्रियों ने एक-दूसरे को बहुत ही सराहनीय बातें कही हैं लेकिन दोनों की मजबूरियां हैं। उन्हें वे व्यक्त न करें तो दोनों देशों में उनके विरोधी उनकी जान खा जाएंगे। इसीलिए शाहबाज अपने खत में कश्मीर का मुद्दा उठाए बिना नहीं रहे और नरेंद्र मोदी आतंकवाद का! इन मुद्दों ने ही भारत-पाक संबंधों में खटास पैदा कर रखी है। इमरान खान जब सत्तारुढ़ हुए थे तो उन्होंने कहा था कि भारत-पाक संबंध सुधारने के लिए यदि भारत एक कदम आगे बढ़ाएगा तो हम दो कदम आगे बढ़ाएंगे लेकिन 2019 में पुलवामा में पाकिस्तान के हवाई हमले और भारत के बालाकोट में जवाबी हमले ने जो तनाव पैदा किया था, उसे खतरे के निशान तक पहुंचाने में कश्मीर से धारा 370 की बिदाई ने सख्त भूमिका अदा की। दोनों देशों का आपसी व्यापार ठप्प हो गया और दोनों के राजदूतावासों में आजकल उच्चायुक्त भी नहीं हैं। ऐसा लगता है कि इमरान सरकार ने 2019 में कूटनीति का मार्ग छोड़कर अपनी सेना को खुश रखने का मार्ग ज्यादा पसंद किया लेकिन शाहबाज शरीफ के नेतृत्व में बनी यह नई सरकार चाहे तो वह काम कर सकती है, जो आज तक पाकिस्तान की कोई भी सरकार नहीं कर सकी है। इस नई सरकार को सेना का भी पूरा समर्थन प्रतीत होता है।
यह तो मैं पहले ही लिख चुका हूं कि जब-जब शरीफ बंधुओं से मेरी मुलाकात हुई, शाहबाज को हमेशा मैंने ज्यादा नरम और विनम्र पाया। इसके अलावा इनके पूज्य पिता मोहम्मद शरीफ मुझे बताया करते थे कि विभाजन के बाद वे कई वर्षों तक रोज सुबह अपने गांव जाति उमरा, जो कि अमृतसर में है, जाते थे और बस में भरकर उसके मजदूरों को ले आते थे। जैसा कि आसिफ जरदारी ने कहा था, हर पाकिस्तानी की तरह, उनके दिल में भी एक हिंदुस्तान धड़कता था। जब नरेंद्र मोदी पहली बार शपथ ले रहे थे तो प्रधानमंत्री मियां नवाज़ ने दो-तीन दिन कोई जवाब नहीं दिया तब मैंने उनके वरिष्ठ साथी सरताज अजीज को बताया कि सभी पड़ौसी देशों के प्रधानमंत्रियों को बुलाने की पेशकश मेरी ही है। उन्हें आना ही चाहिए। वे दोनों आए भी। 2014 में इस्लामाबाद में जब मियां नवाज़ से मेरी लंबी भेंट हुई तो वे यही जानना चाहते थे कि हमारे नए प्रधानमंत्री के साथ बेहतर संबंध बनाने के लिए क्या-क्या पहल की जाए। लेकिन अब मौका पहले से भी बढ़िया है, जबकि दोनों देशों के संबंधों में नई शुरुआत हो सकती है। (नया इंडिया की अनुमति से)
(डाॅ. वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)
-राहुल कुमार सिंह
18 अप्रैल को प्रतिवर्ष विश्व विरासत दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2022 के लिए थीम है ‘विरासत और जलवायु‘। सामान्यतः विरासत का आशय मानवकृत उदाहरणों से जोड़ लिया जाता है, किंतु इसके साथ प्राकृतिक विरासत, जल और वायु के महत्व को रेखांकित करने के लिए ही संभवतः यह इस वर्ष के थीम में ‘जलवायु‘ विशेष रूप से है।
विरासत के अंतर्गत प्राकृतिक, मानवकृत-सांस्कृतिक तथा मिश्रित विरासत शामिल है। यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थलों के चयन के लिए मुख्यतः मानव रचनात्मक प्रतिभा, वास्तुकला आदि, मानव-इतिहास के महत्वपूर्ण चरण की उत्कृष्ट कृति/ घटनाओं या परंपराओं, विचारों या विश्वासों के साथ, उत्कृष्ट सार्वभौमिक महत्व के कलात्मक और साहित्यिक कार्यों का प्रत्यक्ष या मूर्त रूप/ पर्यावरण और मानव संपर्क के विशिष्ट उदाहरण/ पारिस्थितिक जैव समुदायों की जैविक प्रक्रिया और विकास का प्रतिनिधित्व करने वाले उत्कृष्ट उदाहरण, प्राकृतिक स्थितियां/ उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य की संकटग्रस्त प्रजातियां को शामिल किया जाता है।
इस प्रकार जंगल, नदी, पहाड़, जल-प्रपात आदि नैसर्गिक सौंदर्य स्थल मूर्त विरासत है। साथ ही पुरातात्विक और ऐतिहासिक मंदिर, भवन, संरचनाएं भी मूर्त विरासत हैं। संस्कृति और परंपरा, जिसमें नृत्य, संगीत, खान-पान, जीवन-शैली, लोकाचार, रीति-रिवाज, तीज-त्यौहार आदि सभी शामिल है, अमूर्त विरासत है। दूसरे शब्दों में नदी-पहाड़, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, उनका परिवेश, स्मारक, कला, गीत-संगीत, परंपरा, जीवन-शैली, जिनमें मानव सभ्यता के सुदीर्घ इतिहास और उद्यम की सौंदर्यमूलक अभिव्यक्ति हो, वह सभी हमारी विरासत है।
विरासत किसी एक व्यक्ति की नहीं, अपितु पूरी सभ्यता और समाज की थाती होती है। यह मात्र पर्यटन और मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि मानवता के उच्चतर मूल्यों और प्रतिमानों की पहचान है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी, बरसों से चली आ रही विरासत को आने वाली पीढ़ी के हाथों सौंपना हर पीढ़ी का दायित्व है। ऐसे स्थलों और विरासत के इन उदाहरणों के प्रति जागरूकता और संतुलन आवश्यक है। कई ऐसे विरासत स्थल है, जो महत्वपूर्ण होने के बावजूद भी उपेक्षित रह जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ लोकप्रिय स्थलों में पर्यटकों की भारी संख्या पहुंचती है, साथ ही अनियंत्रित विकास के कारण उस विरासत को क्षति पहुंचने की आशंका बनी रहती है। इनका ध्यान रखा जाना आवश्यक हो जाता है।
अपनी विरासत की स्थिति, उसके संरक्षण के पक्षों और संभावनाओं पर विचार करते हुए उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली में आयोजित भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण की 150वीं वर्षगांठ समारोह में प्रधानमंत्री जी ने कहा था- ‘शहरीकरण और जनसंख्या के विस्तार के दबावों से देश भर में हमारे ऐतिहासिक स्मारकों के लिए खतरा पैदा हो गया है।‘ ... इसके लिए दूर दृष्टि, उद्देश्य के प्रति निष्ठा और विभिन्न सम्बद्ध पक्षों के सम्मिलित प्रयासों की आवश्यकता होगी। मुझे उम्मीद है कि आप इस महत्वपूर्ण प्रयास के दायित्व को संभालेंगे।‘ निसंदेह यह समूचे विरासत पर लागू होता है।
इस परिप्रेक्ष्य में उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों समाचार आया कि नीति आयोग के ‘ट्रांसफार्मेशन ऑफ एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम‘ के अंतर्गत शामिल छत्तीसगढ़ के 10 आकांक्षी जिले हैं, इसके संबंध में मुख्यमंत्री जी ने प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखा कर विश्वास व्यक्त किया है कि हमारे वनांचल तथा गांव के जीवन में संस्कृति और परंपराओं का विशेष योगदान होता है, जिससे वहां के लोगों के जीवन में समरसता, उत्साह एवं स्वावलंबन का भाव रहे, इसलिए आकांक्षी जिलों की अवधारणा में सांस्कृतिक उत्थान के बिन्दु को भी यथोचित महत्व एवं ध्यान दिया जाना चाहिए। उपरोक्त इंडीकेटरों को भी जोड़े जाने पर आकांक्षी जिलों के बहुमुखी विकास में किये जा रहे सभी प्रयासों पर भी ध्यान रहेगा और जिस आशा के साथ यह आकांक्षी जिलों की पृथक मॉनीटरिंग व्यवस्था शुरू की गई है वह भी सफल होगी।
दूरद्रष्टा राजनेताओं और नीतियों के कियान्वयन की दृष्टि से उल्लेखनीय है कि 73वें संविधान संशोधन, पंचायती राज अधिनियम के साथ 11वीं अनुसूची को सम्मिलित किया गया, इस अनुसूची में पंचायतों के 29 कार्यकारी विषय-वस्तुओं में से ‘बाजार एवं मेले, सांस्कृतिक गतिविधियां और सार्वजनिक संपत्ति का रखरखाव‘ को सीधे विरासत संरक्षण से जोड़ कर देखा जा सकता है। अधिनियम की विषय-वस्तु से स्पष्ट है कि महान विरासत के साथ, गांव-बस्ती, नगर के पारा-मुहल्ला में आसपास फैली विरासत और उसके संरक्षण का भी अपना महत्व है।
इस दृष्टि से विशिष्ट प्राकृतिक संरचना, जीव-जंतु, पेड़-पौधे, नदी-नाले का उद्गम, संगम और अन्य जल-स्रोत नदी-नालों के घाट, गुड़ी आदि स्थानीय आस्था-उपासना स्थल महत्वपूर्ण होते हैं। पुराने तालाब, डीह-टीला आदि की जानकारी के साथ विरासत स्थलों का संकेत मिलता है। कम प्रचलित मार्ग, पैडगरी रास्तों के साथ इतिहास और परंपरा के प्रमाण सुरक्षित रहते हैं। हरेक गांव में घटना, पर्व, परंपरा, संस्था आदि की अपनी विरासत, मान्यताओं और विश्वास से जुड़ी गौरव-गाथा होती ही है, यही विरासत के विशिष्ट उपादान हैं। स्थानीय निकाय स्तर पर अपनी अस्मिता, गौरव की पहचान और दस्तावेजीकरण कर उनके संरक्षण में स्थानीय सहभागिता और उत्तरदायित्व आवश्यक है।
ध्यान रहे कि सरकारों की प्राथमिकता रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, सड़क और कानून-व्यवस्था है। इसलिए धरोहर की रक्षा के लिए प्रत्येक नागरिक को इसे पुनीत कर्तव्य मानते हुए स्वयं जिम्मेदारी लेनी होगी। जिस प्रकार हम अपनी खुशियों और अपनी सुखद स्मृतियों को बचा कर रखना चाहते हैं, उसी प्रकार का लगाव रखते हमें अपने धरोहर के प्रति सजगता आवश्यक है। इसके संरक्षण में स्वयंसेवी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, उद्योगों, जन-प्रतिनिधियों तथा आवश्यक होने पर दबावपूर्वक शासन/एजेंसियों का सहयोग आवश्यक है, तभी अपनी विरासत पर गौरव और उनका सम्मान करते हुए, बेहतर संरक्षित किया जा सकेगा।
( लेखक पुरातत्व एवं संस्कृति अध्येता हैं)


