अंतरराष्ट्रीय
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में चीन की परियोजनाओं का लंबे समय से विरोध हो रहा है. इमरान खान ने हाल ही में कहा कि वह उन बलोच अलगाववादियों से बातचीत करना चाहते हैं जो इन परियोजनाओं का पुरजोर विरोध करते हैं.
डॉयचे वैले पर एस खान की रिपोर्ट
प्रधानमंत्री इमरान खान ने पिछले हफ्ते कहा था कि वह बलूचिस्तान प्रांत में "अलगाववादियों से बात करने" पर विचार कर रहे हैं. उन्होंने कहा, "देश के इस पश्चिमी प्रांत का विकास तभी हो सकता है जब इलाके में शांति हो. अगर इस इलाके में विकास का काम होता, तो हमें कभी भी अलगाववादियों को लेकर चिंता नहीं करनी पड़ती." खान ने यह बयान बलूचिस्तान के ग्वादर शहर की अपनी यात्रा के दौरान दिया है. यह शहर चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) का केंद्र है. सीपीईसी चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) से जुड़ी अरबों डॉलर की परियोजना है.
पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में विकास की कई परियोजनाएं शुरू की थीं. इनके बावजूद, यह देश का सबसे गरीब और सबसे कम आबादी वाला प्रांत है. पिछले कई दशकों से यहां अलगाववादी समूह सक्रिय हैं. ये समूह इस इलाके को पाकिस्तान से अलग करने की मांग कर रहे हैं. इनका आरोप है कि देश की सरकार उनके संसाधनों का गलत तरीके से इस्तेमाल कर रही है और उनके लोगों का शोषण किया जा रहा है. पाकिस्तान की सरकार ने इन विद्रोहियों और अलगाववादियों के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए 2005 में सैन्य अभियान शुरू किया था. फिर भी, इस इलाके के हालात पहले की तरह ही हैं.
वर्ष 2015 में चीन ने पाकिस्तान में 50 बिलियन डॉलर से अधिक की एक आर्थिक परियोजना की घोषणा की थी. बलूचिस्तान इस परियोजना का अभिन्न हिस्सा है. सीपीईसी के ज़रिए, चीन का लक्ष्य पाकिस्तान और एशिया के अन्य देशों में अपना दबदबा बढ़ाना है. साथ ही, भारत और अमेरिका का मुकाबला करना है. सीपीईसी, पाकिस्तान के बलूचिस्तान में अरब सागर के किनारे स्थित ग्वादर बंदरगाह को चीन के शिनजियांग प्रांत से जोड़ेगा. इसमें चीन और मध्य पूर्व के बीच संपर्क में सुधार के लिए सड़क, रेल और तेल पाइपलाइन लिंक बनाने की योजना भी शामिल है. हालांकि, बलूचिस्तान के अलगाववादी और कुछ स्थानीय नेता चीन के इस निवेश का विरोध कर रहे हैं.
‘अच्छी पहल'
कराची में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ डॉ. तलत ए विजारत ने बलोच अलगाववादियों के प्रति इमरान खाने के नजरिए में हुए बदलाव का स्वागत किया है. वह कहते हैं, "इस प्रस्ताव से बलूचिस्तान में विकास के एक नए युग की शुरुआत हो सकती है. यह एक अच्छी पहल है. बलूचिस्तान में शांति स्थापित होने से चीन यहां और ज्यादा निवेश कर सकता है." इस्लामाबाद में रहने वाली विश्लेषक डॉ. सलमा मलिक का मानना है कि प्रधानमंत्री को काफी पहले ही अलगाववादियों से संपर्क करना चाहिए था. वह कहती हैं, "अब थोड़ी देर हो चुकी है. हालांकि, अभी भी इस पहल का स्वागत होना चाहिए."
बलूचिस्तान के अलगाववादियों में चरमपंथी और राजनीतिक समूह दोनों शामिल हैं. दोनों इस इलाके में चीन की बढ़ती गतिविधियों का विरोध कर रहे हैं. उनका यह भी मानना है कि बातचीत को लेकर खान का इरादा सही नहीं है. उनका इरादा अशांत प्रांत में चीन की परियोजनाओं को स्थापित कराना है.
पूर्व सांसद यास्मीन लहरी का कहना है कि चीन बलूचिस्तान में सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंतित है. वह कहती हैं, "चीन दुनिया के कई इलाकों में विकास की परियोजनाएं चला रहा है, लेकिन उसे किसी भी जगह उतने खतरों का सामना नहीं करना पड़ रहा है जितना पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में करना पड़ रहा है." विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की चिंताओं की वजह से पाकिस्तान की सरकार का बलोच अलगाववादियों के प्रति नजरिया बदला है.
कराची में रहने वाले विश्लेषक डॉ. तौसीफ अहमद खान लहरी की बातों का समर्थन करते हैं. वह कहते हैं, "चीन चाहता है कि वह बलूचिस्तान में जो निवेश कर रहा है वह सुरक्षित रहे. इसलिए, इन स्थितियों से निपटने के लिए चीन इमरान खान की सरकार पर दबाव बना रहा है और पाक सरकार दबाव में है."
चीन के खिलाफ गुस्सा
बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार के पूर्व प्रवक्ता जान मुहम्मद बुलेदी का कहना है कि बलूचिस्तान में कई चीनी परियोजनाओं को सुरक्षा से जुड़े खतरों का सामना करना पड़ रहा है. बुलेदी का कहना है कि बलूचिस्तान में चीन के खिलाफ बहुत गुस्सा है. स्थानीय लोगों का मानना है कि ग्वादर बंदरगाह और सीपीईसी से संबंधित अन्य परियोजनाएं उनके लिए फायदेमंद नहीं रही हैं.
पाकिस्तान के एक प्रमुख अर्थशास्त्री कैसर बंगाली भी इस बात पर सहमत हैं. वह कहते हैं, "बलोच लोगों का मानना सही है कि इन समझौतों और चीनी परियोजनाओं से उन्हें कुछ नहीं मिला है. चीन ग्वादर बंदरगाह से होने वाली आमदनी का 91 प्रतिशत हिस्सा खुद लेता है और बाकी पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार को जाता है.
ग्वादर में स्थानीय लोगों के पास पीने का साफ पानी तक नहीं है." बंगाली कहते हैं कि ग्वादर में सिर्फ चीनी लोगों के लिए आवासीय परिसर बनाए गए हैं. बलूचिस्तान विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों को भी इन परिसरों में जाने की अनुमति नहीं है.
सशस्त्र विद्रोह का सामना
स्थानीय लोगों के पास अपना गुस्सा निकालने के लिए कुछ राजनीतिक रास्ते हैं. वहीं दूसरी ओर, सशस्त्र विद्रोहियों ने न केवल प्रांत में, बल्कि पूरे देश में चीनी परियोजनाओं और ठिकानों को नुकसान पहुंचाने की प्रतिज्ञा ली है. अगस्त 2018 में, एक आत्मघाती हमलावर ने बलूचिस्तान के दलबादीन में चीनी इंजीनियरों को ले जा रही एक बस को निशाना बनाया था. इस हमले में तीन चीनी नागरिकों सहित पांच लोग घायल हो गए थे.
नवंबर 2018 में, एक बलोच विद्रोही समूह ने कराची शहर में चीनी दूतावास पर हमले की जिम्मेदारी ली थी. इस हमले में चार लोग मारे गए थे. मई 2019 में, अलगाववादियों ने ग्वादर में पर्ल कॉन्टिनेंटल होटल पर हमला किया था. इसमें पांच लोग मारे गए थे और छह लोग घायल हो गए थे. जून 2020 में, सशस्त्र अलगाववादियों ने पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज पर हमला किया था. इस स्टॉक एक्सचेंज में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी तीन चीनी कंपनियों के पास है.
चीनी ठिकानों पर हमला करने के अलावा, बलोच विद्रोही नियमित रूप से पाकिस्तान के सुरक्षा बलों, राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों, और उदारवादी बलोच राजनेताओं को भी निशाना बनाते हैं. साथ ही, उन गैर-बलोच मजदूरों को भी निशाना बनाते हैं जो चीन या पाकिस्तान की तरफ से संचालित विकास परियोजनाओं पर काम करते हैं.
क्यों जरूरी है चीनी निवेश?
चीन के आर्थिक निवेश के समर्थकों का तर्क है कि पाकिस्तान को विदेशी निवेश की जरूरत है. चीन अब तक पाकिस्तान का एक विश्वसनीय भागीदार साबित हुआ है. प्रधानमंत्री इमरान खान के आर्थिक परिषद के सदस्य अशफाक हसन ने डॉयचे वेले को बताया, "पाकिस्तान विरोधी तत्व चीन पर झूठे आरोप लगा रहे हैं. हम उनके साथ इसलिए अनुबंध करते हैं क्योंकि वे हमारे देश में निवेश करते हैं. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कोरोनावायरस महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुई है. चीनी निवेश से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को मदद मिलेगी. साथ ही, बलूचिस्तान को भी फायदा होगा."
पाकिस्तान के कई प्रमुख व्यवसायियों का कहना है कि चीनी निवेश से देश में हजारों नौकरियां पैदा हुई हैं और सहायक परियोजनाओं से हजारों लोगों को लाभ हुआ है. (dw.com)
सौर ऊर्जा क्षेत्र में हो रहे विश्वव्यापी अपार निवेश को देखते हुए नौकरियों के बड़े अवसर खुल गए हैं. जानकारों का मानना है कि इससे लाखों कामगारों को ही नहीं बल्कि पर्यावरण का भी लाभ होगा, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं.
डॉयचे वैले पर गेरो रुइटर की रिपोर्ट
फाबियान रोखास कहते हैं, "मुझे अपना जॉब वाकई अच्छा लगता है. मैं रोमांचित हूं और बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है.” 26 साल के अर्जेंटीनी इंजीनियर, फाबियान पश्चिमी जर्मनी के कोलोन शहर में एक छोटी कंपनी में पिछले अक्टूबर से काम कर रहे हैं. यह कंपनी छतों पर सौर पैनल लगाती है.
खुद बिजली बनाने का रोमांच
2008 से सौर पैनल बेच रही कंपनी के सीईओ रेने हेगेल ने रोखास को नौकरी पर रखा था. उस समय वो जर्मनी घूमने आए थे. इस तरह कंपनी इलाके में तेजी से बढ़ रही मांग का कुछ हिस्सा पूरा करने में सक्षम हो पा रही है.
रोखास ने डीडब्ल्यू को बताया, "हमारे पास बहुत सारी इन्क्वायरी आयी हुई हैं. मैं एक हफ्ते में कम से कम छह ऑफर सामने रखता हूं. हमारे पास अगले चार से पांच महीनों के लिए पहले से ही ऑर्डर पड़े हैं. ग्राहक अपनी बिजली खुद पैदा करना चाहते हैं, अपनी इलेक्ट्रिक कारों को चार्ज करना चाहते हैं और ग्रिड की खपत को कम करना चाहते हैं. जलवायु बचाने में ये सब काम ही आता है.”
रोखास ग्राहकों से बात करते हैं, सौर पैनलों को उनकी जरूरत के हिसाब से बनाते हैं. कभी-कभार वह छतों पर उन्हें लगाने में भी मदद करते हैं. हेगेल के मुताबिक, "फाबियान तेजी से सीख रहे हैं. अगले कुछ महीनों में उन्हें कुछ और व्यवहारिक अनुभव हासिल हो पाएगा. और तब चीजें और बेहतर हो जाएंगी.”
जर्मन सौर इंडस्ट्रीः मदद चाहिए
सौर ऊर्जा की बढ़ती मांग को देखते हुए हेगेल को अपनी चार सदस्यों वाली टीम का विस्तार करना है. यह मांग 2000 के शुरुआती दिनों में जिस तेजी के साथ उभर कर आयी थी, वही स्थिति अब लौट आई है. जर्मनी में पांच गीगावाट वाले सौर ऊर्जा सिस्टम 2020 में लगाए गए थे. ऊर्जा क्षमता और बढ़ने की उम्मीद है. अध्ययन बताते हैं कि इस शताब्दी में वैश्विक तापमान को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक रखने के लिए सौर ऊर्जा में छह गुना विस्तार करना होगा, यानी हर साल 30 गीगावाट.
म्युनिख की बेवा आर.ई. कंपनी में सीओओ ग्युंटर हॉग कहते हैं कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सोलर इंडस्ट्री में ज्यादा लोग चाहिए. तेजी से बढ़ती ये कंपनी दुनिया भर में विशाल सोलर और विंड फार्म बना रही है. 2017 में कंपनी में 1100 कर्मचारी थे, आज 2700 हैं.
हॉग कहते हैं, "हमें इंजीनियरों, वित्त विशेषज्ञों, प्रोजेक्ट डेवलेपमेंट के लिए योग्य कर्मचारियों और कस्टमर सर्विस के लिए टेक्निकल ट्रेनिंग वाले लोगों की ज़रूरत है.” कर्मचारियों की तलाश और उन्हें नौकरी पर रखने के लिए हॉग कहते हैं कि "कंपनी अच्छा-खासा निवेश करने को तैयार है और अभ्यर्थियों को खुद ही ट्रेनिंग देने की भी इच्छुक है क्योंकि इस फील्ड में कुशल कारीगर नाकाफी हैं.”
बर्लिन में यूनिवर्सिटी ऑफ अप्लाइड साइंसेस में रिन्युएबल एनर्जी के प्रोफेसर फोल्कर क्वाशनिंग कहते हैं, "जर्मनी में इस समय फोटोवोल्टेयिक्स में करीब 50 हजार नौकरियां हैं.” वह कहते हैं कि कई लोग कोरोना संकट के चलते नयी नौकरियों की तलाश कर रहे हैं हैं. क्वाशनिंग ने डीडब्ल्यू को बताया, "इसे लेकर अपनी अप्रोच में हमें और स्मार्ट होना होगा, कुशल कारीगरों की कमी पूरी करने के लिए हमें ट्रेनिंग कार्यक्रम शुरू करने होंगे. वरना ये ऊर्जा रूपान्तरण कामगारों की कमी की वजह से फेल हो जाएगा.”
छह करोड़ से ज्यादा नौकरियां
इंटरनेशनल रिन्युएबल एनर्जी एजेंसी (आईरेना) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में करीब एक करोड़ 15 लाख लोग पूरी दुनिया में रिन्युएबल एनर्जी सेक्टर में काम कर रहे थे. इनमें से हर तीसरा व्यक्ति सौर ऊर्जा में था.
आईरेना का मानना है कि कोरोना संकट से उबरते देशों को अर्थव्यवस्था और जॉब मार्केट की बहाली के लिए होने वाले निवेशों में नयी ऊर्जा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. आईरेना के महानिदेशक फ्रांसेस्को ला कामेरा कहते हैं, "हमारा अनुमान है कि इस फील्ड में खर्च होने वाला हर डॉलर, फॉसिल ईंधन वाले ऊर्जा सेक्टर के मुकाबले तीन गुना ज़्यादा रोजगार सृजित करता है. बहुत सारे नीति-निर्माता, इस सेक्टर की जॉब देने की सामर्थ्य को पहचानने लगे हैं.”
सौर ऊर्जा अब बिजली उत्पादन का सबसे सस्ता माध्यम है. इसीलिए शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि भविष्य में ये ऊर्जा के प्राथमिक स्रोत के रूप में वैश्विक जगह बना लेगी. पूरी दुनिया में इस समय करीब 850 गीगावॉट की कुल क्षमता वाले फोटोवोल्टेइक सिस्टम लगे हैं. अनुमानतः वे 190 एटमी ऊर्जा संयंत्रों जितनी बिजली पैदा करते हैं.
अध्ययनों का अनुमान ये भी है कि वैश्विक, जलवायु-निरपेक्ष ऊर्जा आपूर्ति के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कम से कम 60 हजार गीगावॉट सौर ऊर्जा की जरूरत होगी. इस लिहाज से सौर ऊर्जा इंडस्ट्री को मॉड्यूल उत्पादन और असेंबली के अलावा सिस्टम की देखरेख और मरम्मत के लिए अगले दशक में छह करोड़ से ज्यादा नौकरियां निकालनी होंगी.
उत्सुक बनिए और यहां नौकरी पाइये
कोलोन में कार्यरत इंजीनियर फाबियान रोखास, सोलर और विंड पावर के साथ साथ ऊर्जा बचाने वाली नयी प्रौद्योगिकियों से खासे प्रभावित हैं. वह नियमित रूप से इन विषयों पर अपने एक अर्जेंटीनी दोस्तों के साथ वीडियो कॉल पर बातचीत करते हैं जो अमेरिका में सोलर पावर सिस्टम लगाने जा रहा है.
रोखास कहते हैं, "सौर ऊर्जा की जरूरत पूरी दुनिया में हैं और इसीलिए इस फील्ड में काम करने वालों की दुनिया भर में मांग बढ़ी हैं.” उनके मुताबिक यूरोप के अलावा ये बात एशिया और दक्षिण अमेरिका के लिए भी उतनी ही सच है.
इस इंडस्ट्री में काम करने के इच्छुक लोगों के लिए रोखास की सलाह है- प्रोएक्टिव बनने की. कहते हैं, "खुद को शिक्षित करो, इंटर्नशिप करो. खुशकिस्मती से इंटरनेट पर भी बहुत सारी जानकारी है.” दुनिया में दूसरी जगहों में भी वह सोलर सेक्टर में बहुत से मौके देखते हैं और अपना ज्ञान और अनुभव बांटने को भी तैयार हैं: "मैं यह देखने को बेताब हूं कि हमारे दरवाजे पर अगली दस्तक कौन देगा.” (dw.com)
डिजिटल दुनिया के इस दौर में बिहार में आज भी मिथिलांचल में ऐसी व्यवस्था कायम है जिसके तहत दशकों पहले बनाई गई पंजी (रजिस्टर) के आधार पर पंजीकार सात पुश्तों की कुंडली खंगाल विवाह तय करने की अनुमति देते हैं.
डॉयचे वैले पर मनीष कुमार की रिपोर्ट
बिहार के मधुबनी जिले का एक गांव है सौराठ. यह जिला मुख्यालय से छह किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पूर्व में स्थित है. इस गांव की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई है. कहा जाता है कि 12वीं सदी में मुगलों के आक्रमण के दौरान सौराष्ट्र से आकर दो ब्राह्मण यहां बस गए. क्योंकि ये लोग गुजरात के सौराष्ट्र से यहां आए थे इसलिए इस जगह का नाम कालांतर में सौराठ हो गया. इस जगह की एक और खासियत यह भी है कि यहां से थोड़ी दूरी पर ही सोमनाथ मंदिर जैसा एक मंदिर भी बना हुआ है.
हर साल जेठ और आषाढ़ (जून-जुलाई) महीने में यहां एक सभा का आयोजन होता है जिसे सौराठ सभा गाछी कहते हैं. मिथिलांचल में फलों के बगीचे को गाछी कहा जाता है. इस अवधि में 11 दिनों तक मिथिलांचल वासी यहां पहुंचकर वर-वधू का चयन करते हैं. पंजीकार विश्व मोहन चंद्र मिश्र कहते हैं, ‘‘मिथिला के सभी वर्णों व जातियों के विवाह प्रस्ताव मैथिलों के कन्या या वर पक्ष से होने के लिए यह व्यवस्था लागू की गई थी. जिसमें मैथिल ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, कायस्थ या वैश्य वर्ण के लिए पंजी बनाई गई थी.''
वर्ष 1310 से होता आ रहा है आयोजन
सौराठ सभा का इतिहास बहुत पुराना है. 700 साल से अधिक समय से इस सभा का आयोजन होता आया है. कहा जाता है कि सौराठ सभा गाछी की शुरुआत सन 1310 में राजा हरिसिंह देव ने तत्कालीन समाज में विवाह पूर्व विद्यमान सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के उद्देश्य से की. मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने की मंशा भी इसके पीछे काम कर रही थी. पंजीकार विश्व मोहन चंद्र मिश्र के अनुसार मैथिल ब्राह्मणों ने सात सौ साल पहले वर्ष 1310 में यह प्रथा शुरू की थी, ताकि अच्छे कुल-खानदानों के बीच वैवाहिक संबंध तय हो सके. लेकिन अब इसकी लोकप्रियता घट रही है. वे कहते हैं, ‘‘1971 में यहां करीब डेढ़ लाख लोग आए थे. 1991 में भी यह संख्या पचास हजार थी, किंतु दिनों-दिन यहां आने वालों की संख्या घटती ही जा रही है.''
कर्णाट वंश के राजा हरिसिंह देव ने पवित्र वैवाहिक संबंध बनाने के लिए 1327 ईस्वी में पंजी व्यवस्था को लागू करवाया, ताकि एक गोत्र में ही विवाह न हो सके. एक गोत्र का तात्पर्य एक पूर्वज की संतान से है. विवाह की गरिमा और पवित्रता को अक्षुण्ण रखने के लिए पंजीकार बनाए गए जो इलाके के लोगों के कुल-खानदान के बारे में जानकारी इकठ्ठा कर उसे पंजीकृत करते थे अर्थात रजिस्टर पर चढ़ाते थे. उनकी स्वीकृति के बिना शादियां संभव नहीं होती.
आखिर होता क्या है सौराठ सभा में
सौराठ सभा में सुयोग्य वर-वधू की तलाश में मैथिल ब्राह्मण जमा होते हैं. वे अपने हिसाब से अपने बच्चों के लिए वर या वधू की तलाश में वहां पहुंचते हैं. जब लड़का-लड़की, दोनों पक्ष विवाह के लिए आपसी सहमति बना लेते हैं तब पंजीकारों की भूमिका शुरू होती है. पंजीकार दोनों पक्षों के सात पुश्तों की जन्म कुंडली खंगालते हैं कि कहीं पिछले सात पुश्तों में दोनों पक्ष में कोई वैवाहिक रिश्ता तो नहीं रहा है. अगर सात पुश्त तक दोनों पक्ष में वैवाहिक सबंध नहीं मिलता है तो पंजीकार शादी की सहमति प्रदान कर देते हैं. पंजीकार जन्मपत्री और राशिफल के आधार पर लड़के और लड़की की कुंडली भी मिलाते हैं. कुंडली मिल जाने पर शादी तय कर दी जाती है. सौराठ सभा में पारंपरिक पंजीकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. यहां जो रिश्ता तय होता है, उसे मान्यता पंजीकार ही देते हैं. इसकी मान्यता कोर्ट में भी होती है.
एक खास बात यह भी है कि जो लोग सौराठ सभा गाछी में वर-वधू का चयन करने के मकसद से नहीं आते हैं वे भी शादी का सिद्धांत लिखवाने अवश्य पहुंचते हैं. सौराठ के ग्रामीण रंजय झा कहते हैं, "आज भी यहां सभा वास के दौरान मिथिलांचल के अलावा नेपाल स्थित मिथिला क्षेत्र और देश-विदेश से लोग पहुंचते हैं. वे यहां वर-वधू का चयन भले न करें, किंतु शादी का सिद्धांत लिखवाने जरूर आते हैं.'' शादी का सिद्धांत लिखवाने का आशय वैवाहिक प्रस्ताव को पंजीकृत करने से है. वे लोग जो मिथिलांचल के मूल निवासी हैं और आज किसी भी वजह से वहां नहीं रह रहे हैं, ऐसे लोग अपने पुत्र-पुत्री की शादी तय होने पर यहां पंजीकारों को सूचित करते हैं, अर्थात शादी का सिद्धांत लिखवाते हैं. कहा जाता है, सौराठ में शादी का सिद्धांत आज भी ताड़ के पत्ते पर लिखने का रिवाज कायम है.
समय के साथ बदला स्वरूप
समय के साथ-साथ सौराठ सभा वास का स्वरूप भी बदल गया है. वहीं इसकी महत्ता भी कम होती जा रही है. पहले जहां लाखों की संख्या में लोग सौराठ सभा वास में पहुंचते थे, वहीं अब हजार लोग भी बमुश्किल जुट पा रहे हैं. समाजशास्त्री ब्रह्मदेव राय कहते हैं, "आधुनिक युग की चकाचौंध में लोग अपने मूल से कट रहे हैं, परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं. अब शादी के लिए सौराठ सभा ही एकमात्र मंच नहीं रहा. अब तो गोत्र, मूल,जाति के बंधन की बाध्यता भी समाप्त होती जा रही है. प्रेम विवाह, अंतरजातीय विवाह धड़ल्ले से हो रहे हैं. लड़का- लड़की खुद मिलते हैं और अपनी मर्जी से जीवनसाथी का चुनाव करते हैं. डर से या फिर संतान मोह की वजह से मां-बाप भी बच्चों की खुशी में अपनी खुशी को ढूंढ लेते हैं."
पत्रकार अमित कहते हैं, "सामाजिक ताना-बाना ऐसा होता जा रहा है कि धर्म, जाति, गोत्र की दीवार कमजोर होती जा रही है. सौराठ सभा में पहले दहेज जैसी चीज नहीं थी, लेकिन अब दहेज की भी मांग की जाने लगी है. पहले आवागमन की सुविधा कम थी तब लोगों की मजबूरी थी कि अपने आसपास के इलाके में ही रिश्ता तय करें. ऐसे में सौराठ सभा जैसे मंच लोगों के मिलने-जुलने का जरिया प्रदान करते थे, किंतु अब रिश्ता तय करने का दायरा बढ़ गया है. डर है कि समय के साथ यह परंपरा कहीं लुप्त न हो जाए."
परंपरा बचाए रखने की जद्दोजहद
ऐसा नहीं है कि सौराठ सभा की खोयी गरिमा को पाने के लिए संगठित प्रयास नहीं किए जा रहे हैं. विभिन्न सामाजिक संगठन इसके लिए आगे आ रहे हैं. सबसे पहले तो डिजिटल युग की मांग के अनुसार पंजी को कम्प्यूटरीकृत करने का काम किया जा रहा है. रिश्ते-नातों के खातों को डिजिटाइज करने से लोगों को भी सहूलियत होगी. इससे मिथिलांचल वासियों को वंशावली संबंधी जानकारी ऑनलाइन मिल सकेगी. प्रसिद्ध गायक एवं अटल भारत फाउंडेशन के संरक्षक उदित नारायण भी सौराठ सभा की प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए आगे आए हैं. वे कहते हैं, "गौरवशाली विश्व प्रसिद्ध सौराठ सभा का कायाकल्प किया जाएगा. पंजी को कम्प्यूटरीकृत करने के साथ-साथ सभा परिसर को बेहतर स्वरूप प्रदान करने की योजना बनाई जा रही है." सौराठ सभा परिसर में मंदिर, धर्मशाला, मंडप आदि धार्मिक संरचना के जीर्णोद्धार और सुंदरीकरण के काम को प्रमुखता दी जा रही है.
अटल भारत फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रदीप झा कहते हैं, "विवाह पूर्व कुल-गोत्र का मिलान धार्मिक व वैज्ञानिक, दोनों ही दृष्टिकोण से आवश्यक है. बदलते समय में मिथिला वासियों के इस वैवाहिक निर्धारण स्थल की महत्ता और भी बढ़ गई है." वहीं सरकारी स्तर पर भी सौराठ सभा की बेहतरी के लिए प्रयास किए जा रहे हैं. मधुबनी जिले की प्रभारी मंत्री लेसी सिंह के अनुसार "मैथिल ब्राह्मणों के विश्व प्रसिद्ध वैवाहिक निर्धारण स्थल सौराठ सभा के विकास की पहल की जाएगी. इसे पर्यटन स्थल का दर्जा दिलाने और राजकीय महोत्सव के रुप में मनाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा."
राज्य के पीएचईडी मंत्री रामप्रीत पासवान भी पंजी के कम्प्यूटरीकरण की आवश्यकता पर जोर देते हैं. वे भी कहते हैं, "सौराठ सभा को राजकीय महोत्सव का दर्जा दिलाने के लिए हरसंभव मदद की जाएगी, ताकि इस अनूठी विश्वस्तरीय परंपरा को बचाया जा सके." बीएन मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के कार्यकारी कुलपति प्रोफेसर जयप्रकाश नारायण झा कहते हैं, "सौराठ सभा मैथिलों का गौरव तथा पूर्वजों की धरोहर है. इसे हर हाल में सहेजने की जरूरत है." (dw.com)
चीन और अमेरिका की तनातनी के बीच जापान ताइवान और दक्षिण कोरिया लेकर चिंतित है साथ ही भारत के प्रति उत्सुक और आशावान भी. देश की रक्षा नीतियों का जो खाका तैयार हुआ है उससे तो यही पता चल रहा है.
डॉयचे वैले पर राहुल मिश्र की रिपोर्ट
रोचक लेआउट और चमक-धमक के साथ जापान का साल 2021 का रक्षा श्वेत पत्र आ गया है. विशेषज्ञों के बीच इस रक्षा श्वेत पत्र के आवरण पृष्ठ को लेकर ही काफी मंथन चल रहा है. जापान का यह रक्षा श्वेत पत्र मंगलवार को प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा की संस्तुति के बाद औपचारिक तौर पर जारी हुआ. एक काल्पनिक घुड़सवार समुराई योद्धा के चित्र से सजा आवरण पृष्ठ जापान के बदलते तेवर की ओर इशारा करता है. इसके अलावा भी इस रक्षा श्वेत पत्र में कई और बातें है जो इसे महत्वपूर्ण बनाती हैं.
एशिया की दूसरी सबसे बड़ी महाशक्ति होने के नाते जापान के इस सालाना जारी होने वाले रक्षा श्वेत पत्र का खास सामरिक महत्त्व है जिससे जापान की सामरिक चिंताओं, इसकी तैयारियों और भविष्य की सामरिक रणनीतियों का भी पता चलता है. जापान के श्वेत पत्र में कई महत्वपूर्ण बिंदु उभर कर आये हैं जिनमें से सबसे प्रमुख है अमेरिका और चीन के बीच बढ़ता तनाव. जापान और एशिया के तमाम देशों के लिए अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती तनातनी चिंता का सबब बन रही है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि श्वेत पत्र में भी जापान ने इस सामरिक संकट को पहले से कहीं बड़ा माना है.
वैसे तो जापान चीन और अमेरिका की सामरिक तनातनी से तो वाकिफ है और शायद इससे जुड़ी परिस्थतियों के लिए कमोबेश तैयार भी है लेकिन जापान की श्वेत पत्र में उल्लिखित चिंता इस वजह से ही नहीं है. उसे डर है कि अमेरिका और चीन के बीच घमासान, आर्थिक और 5जी तकनीक, साइबर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स जैसे तकनीकी मुद्दों पर ज्यादा होगी. जापान और इंडो-पैसिफिक के तमाम देशों पर इसका सीधा असर होगा इस बात में भी कोई दो राय नहीं है. 5जी, साइबर सुरक्षा और रीजनल सप्लाई चेन को लेकर बढ़ती उठापटक से यह रुझान साफ दिख रहे हैं.
ताइवान पर बदला रुख
जापानी श्वेत पत्र की एक और खास बात है ताइवान को लेकर जापान सरकार की चिंताएं. ऐसा पहली बार हुआ है कि जापान ने अपने रक्षा श्वेत पत्र में मुखर होकर ताइवान की सुरक्षा और संप्रभुता को लेकर चिंताओं को स्पष्ट रूप से सामने रखा है. प्रपत्र में यह साफ तौर पर लिखा है कि चीन का बार-बार ताइवान की संप्रभु हवाई सीमा में जानबूझ कर अतिक्रमण चिंता का विषय है. इसी के चलते जापान को ताइवान और उसके आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा को लेकर चौकन्ना रहना होगा. यह जापान की खुद की सुरक्षा के लिए भी जरूरी है.
ताइवान और जापान के बीच की दूरी लगभग 2100 किलोमीटर की है. यह एक बड़ी वजह है जिसके चलते जापान ताइवान की सुरक्षा से खुद को सीधे जोड़ कर देखता है. खास तौर पर जापान का सामरिक नजरिये से महत्वपूर्ण - ओकिनावा द्वीप, ताइवान पर हुए किसी झगड़े में बेवजह लपेटे में आ सकता है. हालांकि यह बात सिर्फ हवाई है और चीन फिलहाल ऐसा करने का इच्छुक नहीं दिखता लेकिन तारो आसो के इस बयान से चीन में खलबली मच गयी. चीन ने इस वक्तव्य पर कड़ा ऐतराज जताया और यह भी कहा कि ऐसे वक्तव्यों से चीन और जापान के कूटनीतिक संबंधों की बुनियाद पर चोट होती है. हालांकि तारो आसो की यह बात हवाई नहीं थी और जापान इस मसले पर पूरी गंभीरता से काम कर रहा है - यह अपने रक्षा श्वेत पत्र के जरिये जापान ने साफ कर दिया है.
‘वन चाइना नीति' के तहत चीन ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है. हालांकि कम्युनिस्ट चीन के जन्म के समय से ही जमीनी हकीकत यही है कि ताइवान का अपना अलग अस्तित्व रहा है. बावजूद इसके चीन ने ताइवान को मेनलैंड चीन में मिला लेने की कसम खा रखी है. माना जाता है कि चीनी सरकार की रणनीति यही है कि 2049 में जब चीन अपनी सौवीं वर्षगांठ मना रहा हो, तब तक ताइवान भी मेनलैंड चीन का हिस्सा बन जाय. इसी रणनीति के तहत चीन ने ताइवान मुद्दे को अपने ‘कोर इंटरेस्ट' की संज्ञा दी है.
2013 में शी जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद से चीन का ताइवान को लेकर रुख और कड़ा हो गया है. पिछले कुछ महीनों में चीन के आक्रामक रवैये में भी काफी बढ़ोत्तरी हुई है. ताइवान की सम्प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखने की जिम्मेदारी उठाए अमेरिका ने भी इस मोर्चे पर चीन के हर कदम का डट कर जवाब दिया है. साथ ही ताइवान की सैन्य और सामरिक दोनों ही मोर्चों पर मदद में भी कोई कमी नहीं रख छोड़ी है.
अमेरिका और चीन की के बीच बरसों से चली आ रही इस खींचतान में अब परिवर्तन आ रहे हैं जिनमें से एक बड़ा बदलाव है ताइवान को लेकर जापान का बदलता रूख. पड़ोस में बसे ताइवान को लेकर पिछले कुछ महीनों में जापान पहले से कहीं ज्यादा गंभीर हो रहा है. इसकी एक झलक कुछ ही हफ्ते पहले तब देखने को मिली जब जापान के उप प्रधानमंत्री तारो आसो ने कहा कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है तो ऐसी स्थिति में जापानी सेना को अमेरिका की मदद करनी चाहिए.
दक्षिण पूर्व सागर को लेकर भी श्वेत पत्र में चिंताएं जताई गई हैं. जापान का मानना है कि तेजी से दक्षिण चीन सागर में हथियारों की होड़ और द्वीपों का सैन्यीकरण चिंता का विषय है. हालांकि चीन, ताइवान, और इस क्षेत्र के मसले ही जापान की चिंता का सबब नहीं हैं. जापान की एक बड़ी चिंता इस जलवायु परिवर्तन और उससे जुड़े संकटों को लेकर भी है. पिछले कुछ वर्षों में जापान जलवायु परिवर्तन की वजह से आई आपदाओं की मार से बहुत परेशान है. इन आपदाओं से निपटने में मानवीय तकनीक बहुत कारगर नहीं सिद्ध हो रही है यही वजह है कि जापान ने इन मुद्दों को भी अपने रक्षा श्वेत पत्र में जगह दी है.
कोरियाई देशों का जिक्र
सुरक्षा चिंताओं की फेरहिस्त में जापान ने उत्तर कोरिया का भी जिक्र किया है. उसका मानना है कि उत्तरी कोरिया की मिसाइल डिफेंस क्षमताओं में बढ़ोत्तरी चिंता का विषय है. श्वेत पत्र में यह भी कहा गया है कि उत्तरी कोरिया के पास पहले से ही यह क्षमता मौजूद है कि वह जापान पर मिसाइलों से हमला कर दे.
अपने श्वेत पत्र में उत्तर कोरिया के साथ ही दक्षिण कोरिया को भी जापान ने लपेट लिया है. जापान और दक्षिण कोरिया के बीच स्थित दोकडो/ताकेशिमा द्वीप का भी जिक्र किया है और इसे अपना बताया है. जाहिर है इस कदम से दक्षिण कोरिया में नाराजगी है. दक्षिण कोरिया सरकार ने जापान की इस हरकत को तथ्यविहीन और भड़काऊ माना है. दक्षिण कोरिया ने चेतावनी दी है कि वह जापान की ऐसी किसी भी हरकत का मुंहतोड़ जवाब देगा. इस सिलसिले में दक्षिण कोरियाई विदेश मंत्रालय ने जापानी दूतावास के अधिकारी को भी तलब कर लिया.
इस श्वेत पत्र में भारत को ही काफी तरजीह दी गई है. फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक, क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग और भारत-आस्ट्रेलिया- जापान सामरिक और सैन्य सहयोग - सभी में भारत को एक महत्वपूर्ण और जिम्मेदार सहयोगी माना है. कुलमिलाकर जापान का यह नया रक्षा श्वेत पत्र इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की तेजी से बदली सामरिक परिस्थितियों का आकलन है - इन तमाम मुद्दों को जापान कैसे देखता है इसका श्वेत पत्र की मदद से एक और सटीक आंकलन करने में जानकारों को और मदद मिलेगी. (dw.com)
एक स्वतंत्र देश के रूप में दक्षिण सूडान के 10 वर्षों को व्यापक असुरक्षा, भयावह मानवीय संकट और भ्रष्टाचार के रूप में चिह्नित किया गया है.
डॉयचे वैले पर क्रिस्टीना क्रिपाल की रिपोर्ट
9 जुलाई 2011 को सूडान से अलग हुए दक्षिण सूडान की आजादी के बाद का उत्साह बहुत छोटा था. डेढ़ साल से भी कम समय में, संसाधन संपन्न यह देश घातक गृहयुद्ध में फंस गया जिसने करीब चार हजार लोगों की जान ले ली. गृहयुद्ध के परिणामस्वरूप, देश की 1.10 करोड़ की आबादी में से 16 लाख लोग मौजूदा समय में दक्षिण सूडान के भीतर ही विस्थापित हैं, जबकि 20 लाख से ज्यादा लोगों ने दक्षिण सूडान के बाहर अन्य देशों में शरण ली है.
आज, दक्षिण सूडान दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक है, जहां 80 लाख लोग यानी करीब दो तिहाई आबादी मानवीय सहायता पर निर्भर है.संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यानी यूनिसेफ ने इस हफ्ते की शुरुआत में चेतावनी दी थी कि दक्षिण सूडान अब तक का सबसे बुरा मानवीय संकट झेल रहा है. यूनिसेफ ने दक्षिण सूडान की दसवीं वर्षगांठ से पहले प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा है कि अकेले पांच साल से कम उम्र के करीब तीन लाख बच्चों के सामने भुखमरी का खतरा है.
रिपोर्ट में, यूनिसेफ ने जोर देकर कहा है कि कमजोर राज्य संरचनाओं, अत्यधिक गरीबी, सामाजिक और आर्थिक संकट, जलवायु परिवर्तन के परिणाम और कोविड-19 महामारी से लोगों का जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है.
आजादी के बाद जातीय संघर्ष
दक्षिण सूडान के विशेषज्ञ क्लेमेंस पिनाउड ने डीडब्ल्यू को बताया कि हॉर्न ऑफ अफ्रीका के रूप में पहचाने जाने वाले इस देश में बहुत कुछ "गलत" हो गया है. इंडियाना यूनिवर्सिटी में हैमिल्टन लुगर स्कूल ऑफ ग्लोबल एंड इंटरनेशनल स्टडीज की सहायक प्रोफेसर पिनाउड कहती हैं, "विभिन्न जातीय समूहों के नागरिकों के खिलाफ नरसंहार जैसी हिंसा संयुक्त राष्ट्र के सबसे युवा सदस्य राज्य के सामने प्रमुख मुद्दों में से एक है. पिनाउड के मुताबिक स्वतंत्रता के लिए दक्षिण सूडान की लड़ाई के दौरान, दक्षिण सूडान के प्रमुख जातीय समूह, डिंका के बीच वर्चस्व की मानसिकता बढ़ी. वो कहती हैं कि यह भावना जातीय वर्चस्व के रूप में बदल गई. आजादी के बाद से ही दक्षिण सूडान के राष्ट्रपति साल्वा कीर भी डिंका समुदाय से आते हैं.
साल 2013 में, कीर ने सबसे देश के उपराष्ट्रपति रीक मचर को बर्खास्त कर दिया जो देश के दूसरे सबसे बड़े जातीय समूह, नुएर से संबंध रखते थे. कीर ने माचर पर उनके खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाया. हालांकि सूडान से आजादी के लिए संघर्ष में दोनों एक साथ थे. माचर के निष्कासन ने देश को आधुनिक समय के सबसे क्रूर गृहयुद्धों में से एक की ओर धकेल दिया जिसमें नरसंहार, बलात्कार और बाल सैनिकों की भर्ती भी शामिल थी. गृहयुद्ध साल 2018 तक जारी रहा. इसके बाद प्रतिद्वंद्वियों के बीच एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए.
छिटपुट हिंसा अभी भी जारी है
हालांकि फरवरी 2020 में आखिरकार गठबंधन सरकार बनी लेकिन स्थानीय स्तर पर संघर्षों का दौर अभी भी जारी है. साल 2020 की दूसरी छमाही में प्रतिद्वंद्वी समुदायों के बीच हुई हिंसा में 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए.फरवरी 2021 में दक्षिण सूडान के बारे में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की जारी हुई रिपोर्ट में पाया गया कि ‘सशस्त्र राज्य और विपक्षी बलों के समर्थन से, जातीय आधार पर संगठित सशस्त्र समूहों और मिलिशिया द्वारा नागरिक आबादी के खिलाफ हमलों में तेजी आई है.' सशस्त्र बलों को भी जातीय आधार पर विभाजित किया गया है और राज्य की तुलना में विशिष्ट राजनेताओं के प्रति वे अधिक वफादार होते हैं.
नेतृत्व पर समझौता
पर्यवेक्षकों ने कीर और मचर दोनों पर शांति समझौते के पूर्ण कार्यान्वयन में देरी करने और अफ्रीकी संघ के साथ साझेदारी में युद्ध अपराध अदालत सहित जवाबदेही तंत्र की स्थापना को अवरुद्ध करके "वेटिंग गेम" खेलने का आरोप लगाया है.
पिनाउड कहती हैं, "यह एक ऐसी सरकार है जो नागरिकों को डराकर और विपक्ष के लोगों को खुश और अपने साथ रखकर काम करती है. सरकार का विरोध करने वाले लोगों के लिए विपक्ष में रहना बहुत मुश्किल है क्योंकि इसका मतलब है कि आपको सरकारी नियुक्ति या आदेश को अस्वीकार करना होगा.”
हालांकि कुछ विशेषज्ञ तब तक देश के लिए बहुत कम उम्मीद देखते हैं, जब तक मौजूदा राजनेता सत्ता में हैं. साउथ अफ्रीकन इंस्टीट्यूट ऑफ सिक्योरिटी स्टडीज में सीनियर रिसर्चर एंड्र्यूज अटा असामोआ कहते हैं, "आपको नेताओं की एक नई फसल को जगह देनी चाहिए जो एक नई मानसिकता के साथ संघर्ष के बाद दक्षिण सूडान की वास्तविकता और विविधता को प्रतिबिंबित करेंगे. उन्हें इस समय इसी की जरूरत है.”
सरकारी अधिकारियों की गहरी जेबें
देश में जिस तरह से हिंसा अपने चरम पर है, वैसे ही भ्रष्टाचार ने भी देश को अपनी गिरफ्त में ले रखा है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी अधिकारी "सार्वजनिक धन की लूट के साथ-साथ मनी लॉन्ड्रिंग, रिश्वतखोरी और कर चोरी में लिप्त हैं." रिपोर्ट के मुताबिक, "समय के साथ, भ्रष्टाचार इतना आम हो गया है कि इसने अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र और राज्य के हर संस्थान को संक्रमित कर दिया है.”रिपोर्ट के अनुसार, यह भ्रष्टाचार मानवाधिकारों के हनन को बढ़ावा दे रहा है और दक्षिण सूडान के जातीय संघर्ष का एक प्रमुख कारक है.
देश की व्यापक समस्याओं के बावजूद, यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करने में विफल हो रहा है. संघर्ष विश्लेषक अट्टा-असामोआ के मुताबिक, ऐसा इसलिए है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय दक्षिण सूडान के एक संकट से दूसरे संकट की ओर बढ़ते हुए थक गया है. इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय समुदाय सुधार को लेकर निराश नहीं है. वह दक्षिण सूडान के भविष्य के संबंध में खुद को "आशावाद और निराशावाद के बीच कहीं" मानता है. वो कहते हैं कि बाहरी दबाव महत्वपूर्ण है. उनके मुताबिक, "दक्षिण सूडान में स्थानीय लोगों पर ही यह सुनिश्चित करने का दायित्व है कि वे प्रगति को बनाए रखें और इसे जोड़ने की दिशा में काम करें. (dw.com)
ब्रिटेन में दो वैक्सीन लेने के बावजूद 100 से ज्यादा लोग कोविड-19 से मारे गए हैं. कुछ ऐसे ही मामले अन्य देशों में भी सामने आ रहे हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक इसके लिए डेल्टा वैरिएंट और लापरवाही जिम्मेदार है.
ब्रिटेन में कोविड के डेल्टा वैरिएंट के कारण 259 लोग मारे जा चुके हैं. मृतकों में 116 लोग ऐसे थे जिन्हें वैक्सीन की दो डोजें लगी थीं. ये जानकारी स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन आने वाले विभाग पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड (PHE) ने दी है.
भारत में भी ऐसे मामले सामने आए हैं. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने कोरोना से संक्रमित हुए ऐसे 677 लोगों नमूनों की जांच की, जिन्हें कोविशील्ड की एक या दोनों वैक्सीनें लग चुकी थी. वैक्सीन के बावजूद संक्रमित होने वालों में 86 फीसदी मामले डेल्टा वैरिएंट के थे. इनमें से 10 फीसदी से भी कम लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. मृतकों की संख्या 0.4 फीसदी बताई जा रही है.
अमेरिका में वैक्सीनेशन के बावजूद मृतकों की संख्या काफी ज्यादा है. अमेरिकी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के मुताबिक वैक्सीन लेने के बाद भी कोविड की वजह से दम तोड़ने वालों की संख्या 750 से ज्यादा है.
भीड़ भाड़ वाली जगहों पर सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन और मास्क पहनने में लापरवाही को भी इसका एक अहम कारक बताया जा रहा है.
वैक्सीन लगाना बहुत जरूरी
इन आंकड़ों के बावजूद वैक्सीन के असर को खारिज नहीं किया जा सकता. क्लीनिकल ट्रायलों के बाद भी यह बात साफ कही गई थी कि कोई भी वैक्सीन कोविड-19 के खिलाफ 100 फीसदी असरदार नहीं है. भारत, ब्रिटेन और अमेरिका के आंकड़े भी दिखाते हैं कि वैक्सीनों ने कोरोना से होने वाली मौतों को काफी हद तक कम किया है. साथ ही अस्पताल में भर्ती होने का रिस्क भी घटाया है.
जर्मनी के एक मशहूर वायरोलॉजिस्ट क्रिस्टियान ड्रॉस्टेन के मुताबिक, डबल वैक्सीनेशन के बाद भी कोविड से मरने वालों की गहन जांच होनी चाहिए. मृत्यु का असली कारण और प्रक्रिया समझनी जरूरी है.
जर्मनी के हैनोवर मेडिकल कॉलेज में इम्यूनोलॉजी के एक्सपर्ट गियोर्ग बेरेंस कहते हैं, "वैक्सीन बहुत अच्छे ढंग से बचाव करती है. 100 फीसदी सुरक्षा तो कोई भी वैक्सीन नहीं देती है."
आफत बना डेल्टा वैरिएंट
विज्ञान पत्रिका नेचर में छपे एक हालिया शोध के मुताबिक बायोनटेक-फाइजर की वैक्सीन डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ काफी असरदार है. लेकिन इस्राएल का डाटा बता रहा है कि ये वैक्सीन जितनी असरदार दूसरे वैरिएंटों के खिलाफ थी, उतना असर डेल्टा पर नहीं कर पा रही है. इस्राएल के स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक डेल्टा इंफेक्शन को पूरी तरह रोकने में बायोनेटेक-फाइजर वैक्सीन 64 फीसदी कारगर है.
इस सबके बावजूद टीके के कारण 93 फीसदी लोग गंभीर रूप से बीमार पड़ने और अस्पताल में भर्ती होने से बचे हैं. इस्राएल के स्वास्थ्य विभाग ने डीडब्ल्यू के पूछे जाने पर इससे ज्यादा जानकारी नहीं दी.
फाइजर और मॉर्डेना को लेकर चेतावनी
इस्राएल और कनाडा के बाद अमेरिका में भी बायोनटेक-फाइजर और मॉडेर्ना की वैक्सीन का एक साइड इफेक्ट सामने आ रहा है. एमआरएनए तकनीक से बनाई गई इन वैक्सीनों को लेने वाले कुछ किशोरों और युवा वयस्कों में दिल की सूजन के मामले सामने आए हैं. अमेरिकी सेना के मुताबिक जिन 23 सैनिकों में हार्ट इंफ्लेमेशन के मामले सामने आए उनकी औसत उम्र 25 साल है.
इन रिपोर्टों के बाद अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने बायोनटेक-फाइजर और मॉर्डेना की वैक्सीन पर दुर्लभ मामलों में हार्ट इंफ्लेमेशन की चेतावनी लगाने एलान किया है.
ओएसजे/एमजे (रॉयटर्स, एपी)
-अज़ीज़ुल्लाह ख़ान
"मैंने अपने पहले पति की मौत का बदला लेने की ठान ली थी और हत्यारे से दोस्ती की, फिर उससे शादी की और फिर आख़िरकार बदला ले लिया."
पाकिस्तान के क़बायली इलाक़े के बाजौर ज़िले की रहने वाली इस महिला को पुलिस ने गिरफ़्तार कर कोर्ट में पेशी के बाद चकदरा जेल भेज दिया है.
अभियुक्त महिला का कहना है कि वह अपने पति की मौत का बदला लेने के लिए तीन साल से कोशिश कर रही थीं और इसके लिए, उन्होंने पूरी योजना बनाई थी.
पुलिस को सूचना और कार्रवाई
बाजौर ज़िले के इनायत क़िले में लुइसिम थाने के इंस्पेक्टर विलायत ख़ान ने बीबीसी को बताया कि यह एक मुश्किल केस था, जिसके लिए उन्होंने कोशिश की और कामयाबी हासिल की.
अभियुक्त के पहले पति की तीन साल पहले मौत हो गई थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी हत्या की गई थी या उनकी प्राकृतिक मृत्यु हुई थी. अभियुक्त ने निजी तौर पर पता किया और इनका कहना है कि इनके पति को उनके दोस्त गुलिस्तान ने ज़हर का इंजेक्शन लगाकर मार दिया था.
थाने में उनकी मौत या हत्या का कोई मामला दर्ज नहीं है. पुलिस ने बताया कि तीन साल पहले इस इलाक़े में कोई पुलिस थाना नहीं था और न कोई ऐसा दस्तावेज़ मिला है, जिससे यह पता चले कि शाह ज़मीन की हत्या की गई थी.
पुलिस के मुताबिक़, दो दिन पहले उन्हें सूचना मिली थी कि गुलिस्तान नाम के शख़्स की गोली मारकर हत्या कर दी गई है.
पुलिस इंस्पेक्टर विलायत ख़ान का कहना था कि इस सूचना के बाद, उन्होंने पास की एक चेक पोस्ट पर पुलिस और अपने सूत्रों को कह दिया था कि उस जगह से कोई भी बाहर न जाने पाए और वह अपनी टीम के साथ पहुँच रहे हैं.
विलायत ख़ान ने बीबीसी को बताया, "जब हम वहां पहुँचे, तो बिस्तर पर ख़ून से लथपथ लाश पड़ी हुई थी, एक गोली सिर में लगी थी और एक गोली शरीर के दाहिने हिस्से में लगी थी. अभियुक्त मृतक के साथ बैठी थी. घर के बाहर और अंदर बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए थे. हमने लोगों को एक तरफ़ कर जाँच शुरू की और मौक़े पर से सबूत हासिल किए."
क़बायली महिला की अफ़ग़ान शाह ज़मीन से मोहब्बत
पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक़, अभियुक्त ने बताया कि उनके पहले पति अफ़ग़ानिस्तान के कुनार प्रांत के रहने वाले अफ़ग़ान शरणार्थी थे. महिला के अनुसार उनके पति पेशावर में काम करते थे और उनकी ज़िंदगी बहुत ही हंसी ख़ुशी के साथ गुज़र रही थी. पुलिस का कहना है कि उनकी एक बेटी भी थी.
पुलिस के अनुसार अभियुक्त ने अपने बयान में कहा है, "मेरे पति की गुलिस्तान नाम के एक शख़्स से दोस्ती थी. मेरे पति पेशावर से जो कुछ कमाते थे वो सब रखने के लिए गुलिस्तान को भेज देते थे, कि जब ज़रूरत पड़ेगी तो उससे पैसे वापिस ले लेगा. गुलिस्तान के साथ उनकी गहरी दोस्ती थी."
अभियुक्त के पति कुछ समय बाद वापस आए और गुलिस्तान से कहा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. मुझे मेरे पैसे वापस चाहिए, लेकिन गुलिस्तान ने पैसे नहीं लौटाए और कहा कि अभी पैसे नहीं हैं.
विलायत ख़ान के मुताबिक़, अभियुक्त ने अपने बयान में कहा, "गुलिस्तान ने मेरे पति को पैसे देने के बजाय ये कहा कि अगर तुम बीमार हो, तो मैं तुम्हारे लिए इनायत कली बाज़ार से दवा लाता हूं. गुलिस्तान दो इंजेक्शन और कुछ गोलियां लाया था. एक इंजेक्शन गुलिस्तान ख़ान ने नदी के किनारे शाह ज़मीन को लगा दिया और कहा कि दूसरा इंजेक्शन तुम बाद में घर पर लगा लेना और ये गोलियां भी खा लेना, आप इससे ठीक हो जाएंगे."
बयान में आगे कहा गया है, कि "इंजेक्शन लेने के बाद मेरे पति की हालत और भी ज़्यादा बिगड़ गई और वह ज़मीन पर गिर गए. वहां मौजूद लोग मेरे पति को अस्पताल ले गए और फिर मृत अवस्था में मेरे पति
बदले की योजना
अभियुक्त ने पुलिस को बताया कि इसके बारे में पता लगाया, तो लोगों ने बताया कि गुलिस्तान ने उसके पति को एक इंजेक्शन दिया था, जिसके बाद उनके पति की हालत बिगड़ गई थी.
उन्हें ऐसा लगा जैसे गुलिस्तान ख़ान ने उनके पति को मारा है और उस समय उन्होंने ये तय कर लिया था कि वह अपने पति का बदला ज़रूर लेंगी.
पुलिस के अनुसार, अभियुक्त ने बताया है कि पाँच-छह महीने तक वह अपने पति की मौत का बदला लेने की कोशिश करती रहीं, लेकिन उन्हें मौक़ा नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने फिर से योजना बनाई कि कैसे गुलिस्तान के क़रीब पहुँचें और फिर बदला लिया जाए.
पुलिस ने कहा कि अभियुक्त ने अपने बयान में कहा है कि उन्होंने फिर गुलिस्तान से शादी करने का फ़ैसला किया और उन्हें मैसेज भिजवाए. हालांकि गुलिस्तान पहले से शादीशुदा थे और उनका एक बेटा भी है, लेकिन उनके अनुसार उन्होंने गुलिस्तान ख़ान को लालच देकर राज़ी कर लिया था.
अभियुक्त महिला ने पुलिस को बताया कि उन्होंने गुलिस्तान से कहा कि "मेरे पास पैसे हैं. तुम एक गाड़ी ख़रीदो और उसमें घूमो. आप अपने वतन पर मज़दूरी करोगे और हम ख़ुशहाल ज़िंदगी गुज़ारेंगे."
महिला ने पुलिस को बताया कि पिछले साल बड़ी ईद से पहले, उन्होंने शादी कर ली थी और छह महीने तक वे कभी किसी के घर रहे, कभी गुलिस्तान की बहन के घर में रहे. इसके बाद महिला ने गुलिस्तान को कहा कि किराए पर अपना घर ले लेते हैं. कब तक दूसरों के यहां ज़िंदगी गुज़ारेंगे?
पुलिस ने महिला के बयान का हवाला देते हए कहा, "उन्होंने इनायत कली में तीन हज़ार रुपये प्रति माह के हिसाब से एक मकान किराए पर ले लिया. इसके बाद अभियुक्त महिला ने गुलिस्तान से कहा कि हम यहां अकेले रहते हैं, कोई चोर न आ जाए, इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए घर में एक पिस्तौल ज़रूर होनी चाहिए. गुलिस्तान साढ़े तेरह हज़ार रूपये में एक पिस्तौल ख़रीद लाया."
पुलिस के अनुसार महिला ने आगे कहा, "मेरे पहले पति की मृत्यु को तीन साल हो चुके हैं और दो साल तक मैं इस कोशिश में थी कि कब और कैसे बदला लिया जाए. जब घर में पिस्टल आ गई तो इसके इस्तेमाल करने के मौक़े की तलाश में थी."
घटना वाले दिन का ज़िक्र करते हुए अभियुक्त महिला कहती हैं, "मैं रात को जागती रही और रात को क़रीब एक बजे दूसरे कमरे में गई और पिस्तौल में गोलियां डालकर गुलिस्तान के कमरे में गई. गुलिस्तान सो रहा था मैंने उस पर गोली चलाई, लेकिन फ़ायर नहीं हो रहा था, पिस्तौल ने काम नहीं किया."
पुलिस के अनुसार, वह वापस दूसरे कमरे में गईं और पिस्तौल चेक की. इसके बाद दोबारा गुलिस्तान के कमरे में गई और पहला फ़ायर गुलिस्तान के सिर पर और दूसरा फ़ायर उसके शरीर के दाहिने तरफ़ किया. गोली मारने के बाद वह सूरज निकलने तक वहीं बैठी रहीं. सूरज निकलने पर उन्होंने बाहर लोगों को बताया कि किसी ने उनके पति को मार दिया है, इसके बाद लोग जमा हो गए और फिर पुलिस भी मौक़े पर पहुँच गई.
पुलिस अधिकारी विलायत ख़ान ने बताया कि पहले वह यही कहती रहीं कि उन्होंने हत्या नहीं की है, लेकिन जब पुलिस ने जाँच शुरू की, तो उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया और सब कुछ बता दिया और पिस्तौल के बारे में भी बताया, जोकि संदूक़ में पड़ी थी. पुलिस ने वह पिस्तौल, मारे गए गुलिस्तान के बेटे की मौजूदगी में बरामद किया है.
स्थानीय लोगों का कहना था कि गुलिस्तान एक अच्छे स्वभाव के व्यक्ति थे, वह स्थानीय स्तर पर अपना काम करते थे. पुलिस ने बताया कि अभियुक्त महिला को कोर्ट में पेश करने के बाद, उन्हें जेल भेज दिया गया है. (bbc.com)
बोगोटा, 17 जुलाई | हैती के न्याय मंत्रालय के एक पूर्व अधिकारी ने देश के राष्ट्रपति जोवेनेल मोइस की हत्या का आदेश दिया था। कोलंबिया के अधिकारियों ने यह जानकारी दी। कोलंबियाई पुलिस के निदेशक जनरल जॉर्ज लुइस वर्गास ने शुक्रवार को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा "जोसेफ फेलिज बडियो, जो न्याय मंत्रालय के एक अधिकारी थे और जनरल इंटेलिजेंस सर्विस के साथ भ्रष्टाचार विरोधी इकाई में काम करते थे, उन्होंने डबरनी कैपडोर (पूर्व कोलंबियाई सैन्य अधिकारी) और जर्मन रिवेरा (कोलम्बियाई सेना के पूर्व एजेंट) को हैती के राष्ट्रपति की हत्या करने के लिए कहा।"
वर्गास ने कहा कि बैडियो ने ऑपरेशन से 'स्पष्ट रूप से तीन दिन पहले' कैपडोर और रिवेरा को सूचित किया था कि आदेश मोइज को गिरफ्तार करने के लिए नहीं, बल्कि उसे मारने के लिए था।
गुरुवार को, कोलंबिया के राष्ट्रपति इवान डुके ने कहा कि देश की सेना के पूर्व सदस्यों ने हत्या में भाग लिया, जिन पर हैतियन न्यायिक प्रणाली द्वारा मुकदमा चलाया जाएगा।
ड्यूक ने कहा कि हत्या में कोलंबियाई भाड़े के सैनिकों के एक समूह के भाग लेने के बाद उनका प्रशासन हैतियन अधिकारियों के साथ 'सहयोग' कर रहा है।
हैती के राष्ट्रपति की 7 जुलाई को उनके आवास पर भाड़े के सैनिकों के एक कमांडो ने हत्या कर दी थी।
हैतियन राष्ट्रपति की हत्या में कम से कम 28 लोगों ने भाग लिया, जिनमें 26 कोलंबियाई और दो हैतियन अमेरिकी शामिल थे।(आईएएनएस)
-सुमी खान
ढाका, 17 जुलाई | प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन अंसार अल-इस्लाम और हेफाजत-ए-इस्लाम के शीर्ष नेता महमूद हसन गुनबी को बांग्लादेश की राजधानी ढाका में गिरफ्तार किया गया है।
रैपिड एक्शन बटालियन के लीगल एंड मीडिया विंग के निदेशक कमांडर खांडाकर अल मोइन ने आईएएनएस को बताया कि गुनबी को शुक्रवार शाम ढाका के तटबंध क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया।
गुनबी मासूम लड़के-लड़कियों को बहकाता था और कहता था कि इस्लाम का पालन करने के लिए खुद को आतंकवादी और आत्मघाती आतंकवादी सदस्य के रूप में पेश करना जरूरी है। उसने कबूल किया कि वह विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से लोगों को गुप्त रूप से आत्मघाती आतंकवादी बनाने के लिए सम्मोहित करना जानता है।
मदरसे के छात्र रिश्तेदारों, परिवार और दोस्तों से अलग रहते हैं। प्रशिक्षुओं को जीवन, समाज, राजनीति, संस्कृति और विज्ञान से दूर रखा जाता है। तब उनका मन धार्मिक गलत व्याख्याओं और सामान्य जीवन के प्रति घृणा से भयभीत हो जाता है। नतीजतन, प्रशिक्षु अपनी भावनाओं, बुद्धि, पारिवारिक संबंधों, न्यायिक ज्ञान आदि को खो देते हैं। इस तरह, किशोर अपना दिमाग खो कर खुद को क्रूर उग्रवादी के रूप में विकसित करते हैं।
5 मई को कानून प्रवर्तन एजेंसियों की छापेमारी में ढाका से गिरफ्तार किए गए आतंकवादी अल शाकिब (20) ने कबूल किया था कि वह गुनबी से प्रभावित था और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम के आत्मघाती हमलावर के रूप में खुद को बदलने और बाद में उसे आत्महत्या करने के लिए उकसाने में विशेष भूमिका निभाई थी।
आतंकवादी संगठन 'दावत ए इस्लाम' का सरगना गुनबी, हूजी, अंसारुल्लाह बांग्ला टीम, प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन इत्यादि के जरिए 'इस्लाम' के नाम से निर्दोष लोगों को आतंकवादी गतिविधि में शामिल करता था।
उसने आरएबी के साथ अपने इकबालिया बयान में खुद को अल कायदा से जुड़े आतंकवादी संगठन दावत ए इस्लाम बांग्लादेश का प्रमुख होने का दावा किया।
अभियान के दौरान 'जिहादी' किताबें और पर्चे बरामद किए गए।
कमांडर मोइन ने आईएएनएस को बताया कि गुनबी महिलाओं को आतंकवाद में शामिल होने के लिए प्रेरित करने की कोशिश कर रहा था।
उसके कई करीबी सहयोगी, सैफुल इस्लाम, अब्दुल हमीद, अनीसुर रहमान को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है।
गुनबी अपने फैलते उग्रवाद को छिपाने के लिए 'छाया संगठन' चलाता था। उन्हें दावत ए इस्लाम के 'मन्हाजी' सदस्य कहा जाता है। उन सदस्यों ने संगठन के भीतर उग्रवादी सदस्य बनाए।
उन्होंने विभिन्न मुद्दों पर उग्रवाद और आतंकवाद को भी उकसाया। उन्होंने 'दावत इस्लाम' के बैनर में अन्य धर्मों के अनुयायियों को शामिल करने और उग्रवाद में शामिल होने के लिए विशेष पहल की। इस मामले में, वे विशेष रूप से 'मनोवैज्ञानिक पश्चाताप' को जगाने के लिए एक रणनीति का उपयोग करते हैं।
गुनबी, हूजी के शीर्ष उग्रवादियों में से एक, पहली बार हूजी (बी) से जुड़ा था, जो एक इस्लामी आतंकवादी संगठन था, जो 1990 के दशक की शुरूआत से पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत के दक्षिण एशियाई देशों में सक्रिय था। बांग्लादेश में 2005 में आतंकवादी संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
बाद में, वह पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन जमात ए इस्लाम की छात्र शाखा और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (एबीटी) के संस्थापकों में से एक जसीम उद्दीन रहमानी के संपर्क में आया। रहमानी के करीबी सहयोगी के रूप में, उसपर दार्शनिक अविजित रॉय, बांग्लादेश के अन्य बुद्धिजीवियों और विचारकों जैसे राजीव, दीपोन की हत्या का आरोप भी है। (आईएएनएस)
काबुल, 16 जुलाई | देश भर में हाल ही में हुई हिंसा में कम से कम चार अफगान सुरक्षाकर्मी और 63 तालिबान आतंकवादी मारे गए हैं। सूत्रों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। एक स्थानीय स्वतंत्र निगरानी समूह, रिडक्शन इन वॉयलेंस (हिंसा में कमी) ने सोशल मीडिया पर कहा, समांगन प्रांत में गुरुवार रात रबातक सुरक्षा चौकी पर तालिबान के हमले में चार सुरक्षा बलों के जवान मारे गए हैं।
रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि गुरुवार रात भी, अफगान वायु सेना (एएएफ) ने उत्तरी साड़ी पुल प्रांत की राजधानी साड़ी पुल शहर के बाहरी इलाके में तालिबान की एक सभा को निशाना बनाया, जिसमें 11 आतंकवादी मारे गए और दो वाहन नष्ट हो गए।
इससे पहले गुरुवार को, मंत्रालय ने कहा था, बदख्शां प्रांत के शुहादा जिले में एएएफ द्वारा किए गए हवाई हमले में 20 तालिबान आतंकवादी मारे गए और 20 अन्य घायल हो गए।
बयान में कहा गया है कि मारे गए लोगों में शुहादा के लिए तालिबान के डिप्टी शेडो जिला प्रमुख थे। छह आतंकवादियों के वाहन और उनके गोला-बारूद की कुछ मात्रा को नष्ट कर दिया गया।
इसके अलावा, हेलमंद प्रांत की राजधानी लश्कर गाह के बाहरी इलाके में एएएफ के समर्थन से अफगान राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा बलों (एएनडीएसएफ) द्वारा किए गए एक सफाई अभियान में 32 तालिबान आतंकवादी मारे गए और 10 अन्य घायल हो गए।
इससे पहले शुक्रवार को तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने सोशल मीडिया पर कहा कि उन्होंने कुंदुज प्रांत में सामरिक हमले में सरकारी बलों के एक हेलीकॉप्टर को नष्ट कर दिया है।
उसने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक फोटो पोस्ट की।
हालांकि, अफगान सैन्य अधिकारियों ने अभी तक रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
जैसे-जैसे अमेरिका और नाटो सैनिक देश छोड़ रहे हैं, अफगानिस्तान में हिंसा बढ़ रही है। (आईएएनएस)
जर्मनी में अचानक हुई भारी बरसात के नतीजे सामने आए तो पता चला वह आम बारिश नहीं, एक आपदा थी. बहुत से घर गिरे, गाड़ियां कीचड़ में डूबीं और दर्जनों की मौत हो गई. आखिर हुआ क्या?
डॉयचे वैले पर महेश झा की रिपोर्ट-
मैं सालों से जर्मनी में रह रहा हूं, लेकिन बहुत कम ऐसी बरसात देखी और एक बरसात से हुआ ऐसा नुकसान तो मुझे याद ही नहीं है. जर्मनी के जो दो राज्य बरसात और उसके बाद आई बाढ़ से प्रभावित हैं, वे पहाड़ी इलाके हैं. वहां खेत हैं, जंगल हैं, छोटे छोटे पहाड़ी नाले हैं और नदियां हैं. पहाड़ी इलाकों में जब तेज बरसात होती है तो पानी तेजी से नीचे की ओर जाता है और अक्सर अपने साथ मिट्टी भी काटता जाता है.
ऐसी ही बरसात बुधवार को हुई. पहले तेज हवाओं की आहट, फिर हल्की हल्की बरसात और फिर तड़तड़ाती बारिश. और कुछ देर में ऊपर से नीचे आते पानी की रफ्तार बढ़ने लगी. छोटी धारा हो, नाला या नदी, सबसे पानी बढ़ने लगा और कुछ देर के बाद पानी सैलाब बन किनारे को भरने लगा और फिर घरों में घुसने लगा. सेलर डूब गए, वहां आम तौर पर रहने वाली हीटिंग की मशीनें और स्टोर का सामान भी. कई जगहों पर इस पानी में बिजली का करंट भी था. अधिकारियों ने ये चेतावनी देनी शुरू की कि वाशिंग मशीन में कपड़े न धोएं. सीवर में बाढ़ का मटमैला पानी भरा था, चेतावनी में यह भी कहा गया कि घर में अगर पानी भरा है, तो उसमें न दाखिल न हों, बिजली का करंट हो सकता है.
हुआ एक अलग तरह का अनुभव
और मुझे याद आ रहा था अपना बचपन. कितना खेला करते थे हम बरसात में और बरसात के पानी में. स्कूल का मैदान तो अक्सर बरसात में भर जाया करता था. कभी चिंता नहीं की कि उस पानी में न जाएं. बिजली उस जमाने में हर जगह हुआ ही नहीं करती थी, इसलिए करंट की चिंता करने की जरूरत नहीं थी. लेकिन फिर भी बरसात की सोच मेरे लिए इतनी खौफनाक कभी नहीं रही, जितनी पिछले दो दिन की घटनाओं को सुनने के बाद हो गई है.
पटना में पढ़ाई के दौरान अक्सर गंगा में पानी को बढ़ते, चढ़ते और उफनते देखा था. जर्मनी में गंगा जैसी कोई नदी नहीं. यहां की सबसे बड़ी नदी राइन है जो बॉन से होकर बहती है और आपने हमारे वीडियो में उसे अक्सर देखा भी होगा. बुधवार की बरसात के बाद तो हमेशा शांत रहने वाली नदियों का नजारा ही कुछ और था. बारिश से आने वाली मिट्टी की वजह से मटमैला रंग बिल्कुल जुलाई अगस्त की गंगा नदी के पानी जैसा. और तेज बरसात के कारण बदहवासी और उच्श्रृंखलता कोशी जैसी.
चूंकि जर्मनी में आम तौर पर ऐसी बरसात नहीं होती, इसलिए पहाड़ों पर घर बने हैं. जहां मोहल्ले बसे हैं, वहां तो पानी की निकासी का इंतजाम है, लेकिन निचले इलाकों में बसे घरों को खतरा तो रहता ही है. देहाती इलाकों में जहां छोटी छोटी बस्तियां हैं, वहां पानी की निकासी का पुख्ता इंतजाम नहीं. इसीलिए जब बुधवार की रात बरसात हुई तो नीचे की ओर जाते हुए पानी ने सारे बंधन तोड़ दिए. तेज पानी ने सड़कों को तोड़ दिया और उसके साथ आए कीचड़ ने बहुत से रास्तों को बंद भी कर दिया. बरसात ने क्या किया इसका पता बहुत से लोगों को गुरुवार सुबह चला. कुछ इलाकों में तो 24 घंटे में प्रति वर्गमीटर 158 लीटर पानी बरसा. अब संभालिए इस पानी को.
बहुत से शहर डूब गए, कई शहरों में मकानों के सेलर में पानी भर गया. कुछ मौतें तो मकान के जमीन के नीचे वाले माले में भरे पानी में बिजली के करंट से हुईं. कई घर गिर गए. बहुत से लोग लापता भी हैं. जर्मनी में इस समय स्कूलों में छुट्टियां चल रही हैं, बहुत से लोग छुट्टी पर निकले हुए हैं. इसलिए राहतकर्मी ये पता करने में लगे हैं कि लापता लोग बाढ़ का शिकार हुए हैं या कहीं और छुट्टियां बिता रहे हैं. सबसे बारे में पता चलने में समय लगेगा. तब तक अनिश्चितता बनी रहेगी और उसके साथ एक अजीब तरह का अहसास भी.
आपदा तो आपदा है, भले ही मदद मिले
लोग सकते में हैं. जो लोग बाढ़ से सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं, वे तो परेशान हैं ही, जो लोग सीधे प्रभावित नहीं हुए हैं, वे भी ये सवाल पूछ रहे हैं कि ऐसा हुआ क्यों? सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं लोगों की मदद करने में लगी हैं. पुलिस और फायर ब्रिगेड तो हैं ही फौरी मदद के लिए, जर्मनी में तैराकों की संस्था जर्मन जीवन रक्षा संघ के सदस्य भी मदद कर रहे हैं. लोगों को अपना घर छोड़कर इमरजेंसी शेल्टर में रहना पड़ रहा है. बहुत से लोगों को पता नहीं कि उनके घर की क्या हालत है और वे वहां कब लौट पाएंगे. असुरक्षा और अनिश्चितता का माहौल लोगों का चैन छीन रहा है.
दुनिया में हर जगह मौसम का मिजाज बदल रहा है. जर्मनी में भी पिछले सालों में तेज बरसात होने लगी है या अचानक तूफान आने लगा है. लोग भी इस पर बंटे हुए हैं. पर्यावरण की चिंता करने वालों का मानना है कि इसका बहुत कुछ जलवायु परिवर्तन से लेना देना है. ग्लोबल वार्मिंग का असर मौसम चक्र पर भी हो रहा है. जिन लोगों को पुरानी बातें याद रहती हैं, वे कहेंगे कि ऐसी घटनाएं पहले भी होती रही हैं. घटनाओं की याद उसके आयाम और उससे पड़े प्रभाव से जुड़ी होती है. हर घटना का असर एक जैसा नहीं होता इसलिए उसकी छाप भी अलग होती है. लेकिन ये तय है कि तूफान या अचानक तेज बरसात जैसी घटनाएं अक्सर होने लगी हैं.
जलवायु परिवर्तन को रोकना जरूरी
हर कोई पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन को रोकने की बात कर रहा है, लेकिन अगर आसपास देखिए और पूछिए कि उसके लिए हो कितना कुछ रहा है तो पता लगेगा कि शायद कुछ भी नहीं. हम अपनी जिंदगी जिए जा रहे हैं और लगातार उसे आसीन बनाने में लगे हैं, दूसरों की कीमत पर, भले ही उसका नाम पर्यावरण क्यों न हो. जर्मनी में कहर बरपाने वाला लो प्रेशर एरिया बैर्न्ड था. वह काफी समय तक एक ही इलाके में जमा हुआ था.
मौसमविज्ञानी ठीक से बताएंगे कि हाई और लो प्रेशर एरिया को पश्चिम से पूरब की ओर ले जाने वाली जेट स्ट्रीम लगातार कमजोर क्यों होती जा रही है. लेकिन ये हकीकत है. धरती के उत्तर और दक्षिणी हिस्से के तापमान की अंतर लगातार कम होता जा रहा है, और यही जेट स्ट्रीम को हवा देता रहा है. जेट स्ट्रीम कमजोर होगी और ये लो प्रेशर वाले बैर्न्ड को खदेड़ नहीं पाएगी तो उस जगह पर बरसात होगी और तेज बरसात के झटके लंबे समय तक होने वाली बरसात में बदल जाएंगे.
अब समय आ गया है कि जल्द से जल्द धरती को गर्म करने वाली गैसों के उत्सर्जन को कम करने के कदम उठाए जाएं. सरकारें सालों से गपशप और विचार विमर्श करने में लगी हैं और अपने अपने फायदे की सोच रही हैं. लेकिन ग्लोबल वार्मिंग ग्लोबल है, वह सिर्फ एक इलाके को गर्म नहीं कर रही है. सरकारों पर भी अब दबाव बनाने की जरूरत है. विकास के नाम पर पर्यावरण की चिंता नहीं की जाती, लेकिन उस विकास का क्या जिसके बाद इंसान ही न रहे. सरकारों को अपना काम करने दीजिए, हमें अपना काम करना चाहिए. यानि ग्लोबल वार्मिंग को रोकने का काम. (dw.com)
जर्मन एयरलाइंस लुफ्थांसा की उड़ानों में अब किसी को "देवियो और सज्जनो" जैसे शब्द नहीं सुनाई पड़ेंगे. कंपनी ने यात्रियों को महिला और पुरुष के नजरिए से देखना बंद कर दिया है.
डॉयचे वैले पर आशुतोष पाण्डेय की रिपोर्ट-
"लेडीज एंड जेंटलमैन, विमान में आपका स्वागत है" जर्मन एयरलाइंस लुफ्थांसा लैंगिक पहचान को संबोधित करने वाली ऐसी भाषा इस्तेमाल अब नहीं करेगी. एनाउंसमेंट के लिए तटस्थ शब्दों का प्रयोग किया जाएगा. यह बात लुफ्थांसा ग्रुप की सभी एयरलाइनों पर लागू होगी यानि ऑस्ट्रियन एयरलाइंस, स्विस और यूरोविंग्स भी तटस्थ एनाउंसमेंट करेंगे.
डीडब्ल्यू से बातचीत करते हुए कंपनी की प्रवक्ता आन्या स्टेंगर ने कहा कि विविधता कोई लफ्फाजी नहीं है, लुफ्थांसा के लिए यह हकीकत है, "अब से हम अपनी भाषा में भी इस रुख को जाहिर करेंगे."
लुफ्थांसा के क्रू मेम्बर अब "डियर गेस्ट्स," "गुड मॉर्निंग/इवनिंग" या "वेलकम ऑन बोर्ड" जैसी शब्दावली प्रयोग करेंगे. यात्रियों को कैसे संबोधित किया जाए, इसका फैसला विमान में मौजूद चालक दल के सदस्य करेंगे. क्रू मेम्बरों को मई में इसकी जानकारी दे दी गई थी. बदलाव को तुरंत अमल में लाया गया.
अलेक्जांड्रा शीले जर्मनी की बीलेफेल्ड यूनिवर्सिटी में समाज शास्त्र और अर्थशास्त्र की विशेषज्ञ हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, "यह कदम सांकेतिक स्तर पर काम करता है. इसे 'लैंगिक-संवेदनशीलता' वाले कदम के तौर पर भी देखा जा सकता है, जो सिर्फ दो लिंगों वाली सोच पर सवाल उठाता है."
ऐसी लिंग व्यवस्था से अलग सोचने वाले लोगों का हवाला देते हुए शीले ने कहा, "ऐसे लोग जो खुद को पुरुष/महिला से इतर देखते हैं और वे लोग भी जो द्विलिंगी सिस्टम पर सवाल उठाते हैं, उनके लिए भी 'लेडीज एंड जेंटलमैन/महिलाओं और पुरुषों' के बिना एनाउंसमेंट बेहतर हो सकती है."
लिंग रहित भाषा क्या है?
लुफ्थांसा ने लिंग की पहचान बताने वाली भाषा से परे ले जाने वाली जुबान का इस्तेमाल ऐसे समय में शुरू किया है, जब ज्यादा से ज्यादा संस्थाएं और कंपनियां जेंडर को लेकर संवेदनशील हो रही हैं. यूएन और यूरोपीय संघ जैसी बड़ी संस्थाओं ने भी अपने काम काज में लिंग रहित भाषा की गाइडलाइंस अपनाई हैं.
यूरोपियन इंस्टीट्यूट फॉर जेंडर इक्वैलिटी की परिभाषा के मुताबिक, लिंग तटस्थ भाषा, "एक ऐसी भाषा है जो किसी लिंग से संबंधित न हो और वह महिला और पुरुष के चश्मे के बजाए लोगों को इंसान के रूप में देखे."
यूरोपीय संसद भी भाषा में लैंगिक तटस्थता को लेकर एक हैंडबुक जारी कर चुकी है. उस किताब के मुताबिक, "लिंग-समावेशी भाषा राजनीतिक रूप सही होने से कहीं ज्यादा बड़ा विषय है." 2018 में रिलीज की गई यह किताब कहती है, "लैंगिक रूप से तटस्थ भाषा का मकसद उन शब्दों के चुनाव से बचना है जो किसी इंसान के सेक्स या सोशल जेंडर को आधार बनाते हुए शायद पक्षपाती, भेदभावपूर्ण और अपमानजनक हो सकते है."
जर्मन भाषा में ज्यादातर पेशों में लिंग की पहचान स्पष्ट तौर पर जाहिर करने वाले नाम है. पुरुष डॉक्टर को जर्मन में "आर्त्स्ट" कहा जाता है तो महिला डॉक्टर के लिए "आर्त्स्टिन" शब्द इस्तेमाल होता है. "स्टूडेंट" का अर्थ पुरुष छात्र से होता है और "स्टूडेंटिन" महिलाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
लैंगिक रूप से तटस्थ भाषा को लेकर लोगों की राय बंटी हुई है. तटस्थ भाषा के समर्थक कहते हैं कि लिंग सूचक नाम उन लोगों के साथ खिलवाड़ है, जो नहीं चाहते कि उन्हें सिर्फ पुरुष या महिला के रूप में पहचाना जाए. लिंग सूचक भाषा को वह सेक्सिट धारणा को मजबूत करने वाली मानते हैं. विरोधियों के मुताबिक व्याकरण में बदलाव भाषा पर हमला है.
सांकेतिक कदम काफी नहीं
अमेरिकी कार निर्माता कंपनी फोर्ड मोटर्स ने जुलाई 2021 की शुरुआत में अपने नियमों में बदलाव कर लैंगिक रूप से तटस्थ भाषा अपना ली. इसके बाद कंपनी "चेयरमैन" शब्द के बजाए "चेयर" कहा और लिखा करेगी.
अलेक्जांड्रा शीले कहती हैं कि लैंगिक रूप से संवेदनशील भाषा जैसे सांकेतिक कदम लैंगिक समानता के लिए जागरूकता को और ज्यादा बढ़ाने में मदद कर सकते हैं. संस्थानों के भीतर भी ज्यादा व्यावहारिक कदम उठने की जरूरत है.
वह कहती हैं, "संस्थानों में किस स्तर पर अलग अलग लिंगों का प्रतिनिधित्व कम है, किए गए काम को कैसे आंका जाता है और भुगतान कैसे होता है, इसकी समीक्षा करना अहम है. संस्थानों को एक ऐसी संस्कृति विकसित करने की जरूरत है जिसमें भेदभाव वाले कदम सार्वजनिक हों या फिर दिखें ही नहीं."
शीले की मांग है कि अगर किसी कंपनी में लिंग विशेष का प्रतिनिधित्व कम है तो उसे बढ़ाने के लिए कोटे का इस्तेमाल करना चाहिए. भेदभाव, काम को कमतर आंकने और अनुचित वेतन ढांचे से लड़ने के लिए कंपनियों को जेंडर ट्रेनिंग की शुरुआत करनी चहिए. (dw.com)
अंतरिक्ष यात्रा की दुनिया में अगले हफ्ते एक और अध्याय जुड़ेगा जब अमेरिकी उद्योगपति जेफ बेजोस उड़ान भरेंगे. लेकिन इस विमान में कोई पायलट नहीं होगा.
अंतरिक्ष में जाने के मामले में भले ही जेफ बेजोस को ब्रिटिश प्रतिद्वन्द्वी रिचर्ड ब्रैन्सन ने पछाड़ दिया हो, लेकिन अगले हफ्ते वह इतिहास बनाने जा रहे हैं जब दुनिया का पहला बिना पाइलट का विमान उड़ान भरेगा. एमेजॉन के पूर्व सीईओ जेफ बेजोस मंगलवार को अंतरिक्ष के छोर को छूने के लिए निकलेंगे तो उनकी कंपनी ब्लू ऑरिजन का न्यू शेपर्ड विमान अंतरिक्ष पर्यटन के क्षेत्र में एक और मील का पत्थर रखेगी. विमान में चालक दल के चार सदस्य तो होंगे लेकिन उनमें से पायलट कोई नहीं होगा.
11 मिनट लंबी इस उड़ान में जेफ बेजोस के साथ उनके भाई और उद्योगपति मार्क बेजोस, पूर्व पायलट 80 वर्ष से ऊपर की वॉली फंक और एक किशोर होगा. 60 फुट ऊंचा न्यू शेपर्ड एक पूरी तरह स्वचालित रॉकेट विमान है जिसे भीतर से नहीं चलाया जा सकता. इसलिए चालक दल में सारे नागरिक हैं और ब्लू ओरिजिन का कोई कर्मचारी या अंतरिक्ष यात्री इसमें सवार नहीं होगा.
कोई अंतरिक्ष यात्री नहीं
ब्लू ओरिजिन के अंतरिक्ष यात्री नासा के साथ काम कर चुके निकोलस पैट्रिक भी इस विमान में सवार नहीं होंगे. बेजोस कहते हैं कि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने के बाद इस ग्रह के साथ आपका रिश्ता बदल जाता है, इन्सानियत के साथ आपका रिश्ता बदल जाता है. अंतरिक्ष उद्योग के विश्लेषक टील ग्रूप मार्को केसर्स कहते हैं कि ऐसा पहली बार होगा जब एक पूरी तरह स्वचालित रॉकेट, बिना पायलट के उड़ान भरेगी.
पिछले हफ्ते ही रिचर्ड ब्रैन्सन ने अपनी कंपनी वर्जिन गैलक्टिक के रॉकेट विमान में अंतरिक्ष की यात्रा की है. रविवार को न्यू मेक्सिको स्थित हवाई अड्डे से उनके रॉकेट ने उड़ान भरी थी और एक घंटे से ज्यादा समय की यात्रा की. उस विमान में दो पायलटों के अलावा अंतरिक्ष यात्रियों को ट्रेनिंग देने वाले एक प्रशिक्षक और इस अभियान के मुख्य इंजीनियर भी शामिल थे.
न्यू शेपर्ड उड़ान के तरीके के लिहाज से भी वर्जिन गैलक्टिक से अलग है. वर्जिन गैलक्टिक एक रॉकेट के सहारे चलने वाले अंतरिक्ष यान था जिसे कैरियर प्लेन ने हवा में ले जाकर लॉन्च किया था. न्यू शेपर्ड रॉकेट की तरह खड़ा होगा और सीधे उड़ान भरेगा. वर्जिन गैलक्टिक की तरह न्यू शेपर्ड पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश नहीं करेगा बल्किन यात्रियों को लगभग 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर ले जाएगा. वहां से कैपस्यूल पैराशूट के सहारे वापसी करेगा. वर्जिन गैलक्टिक 86 किलोमीटर की ऊंचाई तक गया था.
21 साल का सफर
ब्लू ओरिजिन को निर्माण में दो दशक का वक्त लगा है. बेजोस ने 2000 में इस कंपनी की स्थापना की थी. कई साल पहले कंपनी ने फैसला किया कि वह अपने अभियान के लिए बिना पायलट के उड़ने वाला विमान इस्तेमाल करेंगे. कंपनी की सोच से परिचित एक व्यक्ति के मुताबिक उनका गणित बहुत साधारण है. वह कहते हैं, "अगर आप ऐसा सिस्टम बनाते हैं कि आपको पायलट या सह पायलट की जरूरत न पड़े, तो जाहिर है आप ऐसे ज्यादा यात्री ले जा पाएंगे जो टिकट के लिए पैसे देंगे.”
न्यू शेपर्ड में थह यात्री यात्रा कर सकते हैं. अंतरिक्ष यात्रा से पहले सवारियों को दो दिन का प्रशिक्षण दिया जाएगा. इन यात्रियों को विमान में बिठाने आदि के लिए दो कर्मचारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है जो हर तरह की परिस्थितियों को लिए यात्रियों को तैयार करेंगे. कैसर्स कहते हैं, "यह किसी मनोरंजन पार्क में झूले की सवारी करने जैसा है. आप बस भरोसा करते हैं कि सब कुछ जांच लिया गया होगा और ठीक ठाक है. बस फिर आप बैठते हैं और राइड का आनंद लेते हैं.” (dw.com)
वीके/सीके (रॉयटर्स, एएफपी)
यूरोपीय संघ की शीर्ष अदालत ने एक फैसले में कहा है कि कंपनियां कुछ परिस्थितियों में कर्मचारियों को हिजाब पहनने से रोक सकती हैं. हिजाब के मुद्दे ने पूरे यूरोप में तीखे विवाद को जन्म दिया है.
यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस ने गुरुवार को फैसला सुनाया कि कंपनियां कुछ शर्तों के तहत कर्मचारियों को सिर ढकने के लिए हिजाब पहनने पर रोक लगा सकती हैं. जर्मनी की दो मुस्लिम महिलाओं को कार्यस्थल पर हिजाब पहनने पर निलंबित कर दिया गया था. इन दोनों महिलाओं ने इसे कोर्ट में चुनौती दी थी.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, "कार्यस्थल में राजनीतिक, दार्शनिक या धार्मिक विश्वासों की अभिव्यक्ति के किसी भी प्रत्यक्ष रूप को पहनने पर प्रतिबंध को नियोक्ता द्वारा ग्राहकों के प्रति एक तटस्थ छवि पेश करने या सामाजिक विवादों को रोकने की आवश्यकता से उचित ठहराया जा सकता है."
दोनों महिलाओं को अल्टीमेटम
मुस्लिम महिलाओं में से एक धर्मार्थ द्वारा संचालित हैम्बर्ग में एक चाइल्डकेयर सेंटर में विशेष देखभालकर्ता के रूप में काम करती है. दूसरी महिला दवा की दुकान में कैशियर है.
अपनी नौकरी शुरू करने के समय उन्होंने हिजाब नहीं पहना था, लेकिन पैरेंटल लीव से वापस आने के वर्षों बाद उन्होंने ऐसा करने का फैसला किया.
अदालत के दस्तावेजों से पता चलता है कि महिलाओं को उनके संबंधित नियोक्ताओं द्वारा बताया गया था कि इसकी अनुमति नहीं है. और अलग-अलग बिंदुओं पर या तो निलंबित कर दिया गया था फिर बिना सिर ढके काम पर आने के लिए कहा गया था. उन्हें अलग काम पर भी रखा गया.
कोर्ट ने क्या कहा
कोर्ट ने केयर सेंटर की कर्मचारी के मामले में कहा कि उसके मामले में सिर ढकने से रोकने वाला नियम सामान्य तरीके से लागू किया गया था क्योंकि नियोक्ता ने एक ईसाई कर्मचारी को धार्मिक चिह्न क्रॉस को हटाने को भी कहा था.
दोनों मामलों में फैसला अब राष्ट्रीय अदालतों पर निर्भर करेगा कि कोई भेदभाव हुआ है या नहीं, और वही अंतिम फैसला सुनाएगा.
मुस्लिम महिलाओं द्वारा सिर पर पारंपरिक हिजाब पहनने को लेकर पिछले कुछ सालों में पूरे यूरोप में विवाद छिड़ गया है, जो मुसलमानों को एकीकृत करने पर तीखे विभाजन को रेखांकित करता है.
इस फैसले के बाद मुसलमानों के बीच भारी प्रतक्रिया देखने को मिल रही है.(dw.com)
एए/ (रॉयटर्स, डीपीए)
उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान शुक्रवार को अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ बैठक करेंगे और हो सकता है कि उन्हें सम्मेलन के लिए न्योता दें.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट-
पाकिस्तान ने 17-19 जुलाई से तीन दिवसीय अफगान शांति सम्मेलन की मेजबानी करने की घोषणा की है. दूसरी ओर तालिबान का कहना है कि उन्हें प्रस्तावित शांति सम्मेलन में आमंत्रित नहीं किया गया है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि पाकिस्तान पड़ोसी मुल्क में शांति के प्रयासों को नई गति देने के लिए अफगानिस्तान पर तीन दिवसीय सम्मेलन आयोजित कर रहा है.
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जाहिद हफीज चौधरी ने प्रस्तावित अफगान शांति सम्मेलन को स्थगित करने की खबरों को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि कई अफगान नेताओं ने सम्मेलन में अपनी भागीदारी की पुष्टि की है.
इससे पहले सूचना मंत्री फवाद चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री इमरान खान ने अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई से फोन पर बातचीत की और उन्हें सम्मेलन में शामिल होने का न्योता दिया.
तालिबान को न्योता नहीं?
अफगानिस्तान के तोलो न्यूज के मुताबिक अब्दुल्ला अब्दुल्ला, करीम खलीली, मोहम्मद यूनुस कानूनी, गुलबुद्दीन हिकमतयार, मोहम्मद हनीफ अतमार, सलाहुद्दीन रब्बानी, इस्माइल खान, अता मोहम्मद नूर, सैयद हमीद गिलानी, सैयद इशाक गिलानी, बत्तूर दोस्तम और मीरवाइज यासिनी समेत 21 प्रमुख अफगान नेता इस्लामाबाद में सम्मेलन के लिए आमंत्रित किए गए हैं. चौधरी के मुताबिक कई नेताओं ने पहले ही सम्मेलन में शामिल होने की पुष्टि कर दी है.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी इस वक्त उज्बेकिस्तान में हैं और दोनों नेताओं के बीच शुक्रवार को क्षेत्रीय संपर्कों पर बैठक तय है. इमरान गनी को अफगान शांति सम्मेलन के लिए न्योता भी दे सकते हैं.
हालांकि तालिबान के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया है कि आमंत्रितों में उन्हें शामिल नहीं किया गया है. प्रवक्ता का कहना है कि वे पहले ही कई बार पाकिस्तान का दौरा कर चुके हैं और शांति प्रक्रिया पर विस्तृत चर्चा कर चुके हैं.
पाकिस्तान के विदेश विभाग के प्रवक्ता जाहिद हफीज चौधरी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि पाकिस्तान हमेशा से अफगानिस्तान में स्थायी शांति और स्थिरता चाहता है. चौधरी के मुताबिक, "पाकिस्तान भविष्य में भी इस प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रतिबद्ध है. हालांकि, अंत में अफगानों को ही अपने भविष्य के बारे में फैसला करना है."
अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका
पाकिस्तान पर अफगानिस्तान में वर्चस्व के लिए लड़ रहे तालिबान की मदद करने के प्रयास करने के आरोप लगते रहे हैं और आगामी सम्मेलन उस धारणा को शांत करने का एक प्रयास नजर आता है.
पाकिस्तान ने ऐसे समय में शांति सम्मेलन की घोषणा की है जब अफगानिस्तान में हिंसा बढ़ रही है और तालिबान ने अफगानिस्तान के 85 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा करने का दावा किया है. तालिबान ने एक दिन पहले पाकिस्तानी सीमा के पास स्पिलन बोलदाक जिले पर कब्जा कर लिया था.
इस बीच एक अफगान अधिकारी ने कहा कि गुरुवार को पश्चिमी प्रांत में स्थानीय तालिबान नेताओं के साथ संघर्ष विराम हो गया है. तालिबान के लड़ाकों ने इस इलाके पर धावा बोल दिया था. बादगीस के गवर्नर हेसामुद्दीन शम्स ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "अफगान सुरक्षा बलों और तालिबान के बीच संघर्षविराम आज सुबह (15 जुलाई) करीब 10 बजे शुरू हुआ. संघर्षविराम की मध्यस्थता कबायली बुजुर्गों ने की थी." (dw.com)
उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान शुक्रवार को अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ बैठक करेंगे और हो सकता है कि उन्हें सम्मेलन के लिए न्योता दें.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट
पाकिस्तान ने 17-19 जुलाई से तीन दिवसीय अफगान शांति सम्मेलन की मेजबानी करने की घोषणा की है. दूसरी ओर तालिबान का कहना है कि उन्हें प्रस्तावित शांति सम्मेलन में आमंत्रित नहीं किया गया है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि पाकिस्तान पड़ोसी मुल्क में शांति के प्रयासों को नई गति देने के लिए अफगानिस्तान पर तीन दिवसीय सम्मेलन आयोजित कर रहा है.
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जाहिद हफीज चौधरी ने प्रस्तावित अफगान शांति सम्मेलन को स्थगित करने की खबरों को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि कई अफगान नेताओं ने सम्मेलन में अपनी भागीदारी की पुष्टि की है.
इससे पहले सूचना मंत्री फवाद चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री इमरान खान ने अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई से फोन पर बातचीत की और उन्हें सम्मेलन में शामिल होने का न्योता दिया.
तालिबान को न्योता नहीं?
अफगानिस्तान के तोलो न्यूज के मुताबिक अब्दुल्ला अब्दुल्ला, करीम खलीली, मोहम्मद यूनुस कानूनी, गुलबुद्दीन हिकमतयार, मोहम्मद हनीफ अतमार, सलाहुद्दीन रब्बानी, इस्माइल खान, अता मोहम्मद नूर, सैयद हमीद गिलानी, सैयद इशाक गिलानी, बत्तूर दोस्तम और मीरवाइज यासिनी समेत 21 प्रमुख अफगान नेता इस्लामाबाद में सम्मेलन के लिए आमंत्रित किए गए हैं. चौधरी के मुताबिक कई नेताओं ने पहले ही सम्मेलन में शामिल होने की पुष्टि कर दी है.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी इस वक्त उज्बेकिस्तान में हैं और दोनों नेताओं के बीच शुक्रवार को क्षेत्रीय संपर्कों पर बैठक तय है. इमरान गनी को अफगान शांति सम्मेलन के लिए न्योता भी दे सकते हैं.
हालांकि तालिबान के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया है कि आमंत्रितों में उन्हें शामिल नहीं किया गया है. प्रवक्ता का कहना है कि वे पहले ही कई बार पाकिस्तान का दौरा कर चुके हैं और शांति प्रक्रिया पर विस्तृत चर्चा कर चुके हैं.
पाकिस्तान के विदेश विभाग के प्रवक्ता जाहिद हफीज चौधरी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि पाकिस्तान हमेशा से अफगानिस्तान में स्थायी शांति और स्थिरता चाहता है. चौधरी के मुताबिक, "पाकिस्तान भविष्य में भी इस प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रतिबद्ध है. हालांकि, अंत में अफगानों को ही अपने भविष्य के बारे में फैसला करना है."
अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका
पाकिस्तान पर अफगानिस्तान में वर्चस्व के लिए लड़ रहे तालिबान की मदद करने के प्रयास करने के आरोप लगते रहे हैं और आगामी सम्मेलन उस धारणा को शांत करने का एक प्रयास नजर आता है.
पाकिस्तान ने ऐसे समय में शांति सम्मेलन की घोषणा की है जब अफगानिस्तान में हिंसा बढ़ रही है और तालिबान ने अफगानिस्तान के 85 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा करने का दावा किया है. तालिबान ने एक दिन पहले पाकिस्तानी सीमा के पास स्पिलन बोलदाक जिले पर कब्जा कर लिया था.
इस बीच एक अफगान अधिकारी ने कहा कि गुरुवार को पश्चिमी प्रांत में स्थानीय तालिबान नेताओं के साथ संघर्ष विराम हो गया है. तालिबान के लड़ाकों ने इस इलाके पर धावा बोल दिया था. बादगीस के गवर्नर हेसामुद्दीन शम्स ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "अफगान सुरक्षा बलों और तालिबान के बीच संघर्षविराम आज सुबह (15 जुलाई) करीब 10 बजे शुरू हुआ. संघर्षविराम की मध्यस्थता कबायली बुजुर्गों ने की थी." (dw.com)
गुरुवार को वॉशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल से मुलाकात की, जो पद पर रहते हुए दोनों नेताओं की संभवतया अंतिम मुलाकात थी.
बतौर चांसलर अपनी अंतिम अमेरिका यात्रा पर मैर्केल वॉशिंगटन में हैं. गुरुवार को दोनों नेताओं ने रूस के साथ एक पाइपलाइन योजना पर अपनी-अपनी असहमतियों के बावजूद कई मुद्दों पर सहमत होने की बात कही.
अमेरिका रूस के पाइपलाइन प्रोजेक्ट का विरोध करता है जबकि जर्मनी समर्थन. हालांकि दोनों नेताओं ने कहा कि वे रूस के आक्रामक और चीन के लोकतंत्र विरोधी रवैये के विरोध में साथ खड़े होंगे.
राजनीति से संन्यास लेने से पहल अपने आखिरी दौरे पर व्हाइट हाउस पहुंचीं मैर्केल की बाइडेन ने जमकर तारीफ की. उन्होंने कहा कि मैर्केल की जिंदगी जर्मनी की और दुनियाभर की अभूतपूर्व सेवा की एक मिसाल है.
अमेरिका की पिछली सरकार में डॉनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहते दोनों देशो के संबंधों में काफी खटास आ गई थी. लेकिन इस जनवरी में बाइडेन के पद संभालने के बाद से दोनों नेताओं ने पुरानी खाइयों को पाटने की कोशिश की है.
बाइडेन के पद संभालने के बाद व्हाइट हाउस का दौरा करने वालीं मैर्केल पहली यूरोपीय नेता हैं. उन्होंने कहा, "मैं मित्रता का सम्मान करती हूं."
असहमतियां
भले ही अमेरिका और जर्मनी पुराने सहयोगी हैं, लेकिन बदले भू-राजनीतिक हालात में दोनों पक्षों की असहमतियां स्पष्ट दिखाई दीं. खासकर नॉर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन को लेकर. रूस की यह पाइपलाइन बाल्टिक सागर के नीचे से रूस से जर्मनी तक बनाई जा रही है.
अमेरिका इस योजना को लेकर उत्साहित नहीं है क्योंकि उसे डर है कि रूस इसे यूक्रेन के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है. 11 अरब अमेरिकी डॉलर की यह योजना सितंबर में पूरी होने की संभावना है. हालांकि यह यूक्रेन के कुछ दूर से निकलेगी, जिस कारण उसे शुल्क नहीं मिलेगा.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने दोहराया कि उन्होंने जर्मनी के खिलाफ प्रतिबंध लगाने से इसलिए परहेज किया क्योंकि योजना अब पूरी होने ही वाली है. बाइडेन के इस फैसले की विपक्षी रिपब्लिकन के अलावा उनकी अपनी पार्टी के सदस्यों ने भी आलोचना की थी.
बाइडेन ने कहा कि वह और मैर्केल इस बात पर एकमत हैं कि रूस को ऊर्जा का इस्तेमाल एक भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा, "अच्छे दोस्त असहमत भी हो सकते हैं. पूर्वी यूरोप में नाटो सहयोगियों के खिलाफ रूस के आक्रामक रवैये के खिलाफ हम साथ खड़े हैं और खड़े रहेंगे."
जर्मनी और अमेरिका चीन के साथ व्यापारिक संबंधों को लेकर भी अलग-अलग मत रखते हैं. जर्मनी चीन के साथ व्यापार को लेकर उत्सुक है जबकि अमेरिका ने कई प्रतिबंध लगाकर चीन के खिलाफ कड़ा रुख जाहिर किया है.
मैर्केल ने भी असहमतियों का जिक्र किया लेकिन दोनों देशों के बीच सहमति और एकता पर जोर दिया. उन्होंन कहा, "हम सबके मूल्य समान हैं, अपने वक्त की चुनौतियों के प्रति हम सबकी प्रतिबद्धता समान है."
रिश्तों की गहराई
78 वर्षीय बाइडेन और 66 वर्षीय मैर्केल के पास दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने के लिए ज्यादा साझा वक्त नहीं है. 2005 से चांसलर मैर्केल इस सितंबर में पद छोड़ रही हैं और राजनीति से संन्यास ले रही हैं.
सितंबर में जर्मनी में आम चुनाव होंगे. सर्वेक्षण कहते हैं कि मैर्केल की पार्टी क्रिश्चन डेमोक्रैट्स को बढ़त मिलनी तय है लेकिन सरकार बनाने के लिए गठबंधन में वह किसे शामिल करेगी, यह अभी तय नहीं है. बाइडेन की डेमोक्रैटिक पार्टी के पास अमेरिकी कांग्रेस में कमजोर बहुमत है जिसे वह अगले साल होने वाले चुनावों में खो भी सकती है.
पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की सरकार में जर्मनी में राजदूत रहे जॉन एमरसन कहते हैं कि अमेरिका के लिए जर्मनी एक बहुत जरूरी सहयोगी है क्योंकि वह न सिर्फ नाटो सहयोगी और यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है बल्कि रूस, मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका के साथ संपर्कों और संबंधों में एक अहम पुल का काम भी करता है. जर्मनी में अमेरिका का सैन्य अड्डा भी है जहां 36 हजार सैनिक हैं.
वीके/एए (रॉयटर्स)
लेबनान के मनोनीत प्रधानमंत्री साद हरीरी ने नौ महीने के राजनीतिक गतिरोध के बाद राष्ट्रपति के साथ मतभेदों का हवाला देते हुए अपना पद छोड़ दिया है.
वो संकटग्रस्त लेबनान में सरकार बनाने में असफल रहे.
बुरी तरह आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से भी क़र्ज़ नहीं मिलने के बीच हरीरी का यूं पद छोड़ना, संकटग्रस्त लेबनान के लिए और मुश्किलें बढ़ा सकता है.
पद छोड़ने से पहले हरीरी ने कहा कि यह स्पष्ट था कि वह राष्ट्रपति माइकल इयोन के साथ कैबिनेट पदों को लेकर सहमत नहीं हो पाएंगे.
पिछली सरकार ने अगस्त में बेरूत में हुए भीषण विस्फोट के बाद इस्तीफ़ा दे दिया था. इस हादसे में 200 लोग मारे गए थे.
उस वक़्त से ही लेबनान गंभीर आर्थिक मंदी से जूझ रहा है और अब स्थिति और भी बदतर हो गई है.
लेबनान की मुद्रा पूरी तरह से बिखर गई है और उसकी क़ीमत कौड़ी के भाव हो गई है जिसके कारण महंगाई इस क़दर बढ़ चुकी है कि लोग अपने लिए खाना तक मुश्किल से ख़रीद पा रहे हैं. साथ ही ईंधन, बिजली और दवा की आपूर्ति भी कम हो रही है.
विश्व बैंक ने लेबनान की मौजूदा स्थिति के लिए लेबनान के राजनेताओं को ज़िम्मेदार ठहराया है कि वे ही आगे के रास्ते के लिए सहमत नहीं हुए.
दूसरे देशों ने लेबनान को तब तक के लिए सहायता देने से इनकार कर दिया है, जब तक वहां कोई नई सरकार नहीं बन जाती, जो सुधारों को लागू कर सके और भ्रष्टाचार से निपट सके.
साद हरीरी को संसद के सदस्यों ने पिछले अक्टूबर में एक नई सरकार बनाने के लिए नामित किया गया था. महज़ एक साल के भीतर ही उन्होंने आर्थिक संकट के कारण हो रहे सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बीच अपने पद को छोड़ दिया है.
पश्चिमी समर्थक सुन्नी मुस्लिम राजनेता ने वादा किया था कि वह बहुत जल्दी ही टेक्नोक्रेट्स या ग़ैर-पक्षपातपूर्ण जानकारों की एक कैबिनेट बनाएंगे और वो सुधारों को लागू करेगी.
लेकिन ईरान समर्थित चरमपंथी शिया हिज़्बुल्लाह आंदोलन के ईसाई सहयोगी राष्ट्रपति माइकल इयोन ने हरीरी के कई प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था.
हरीरी ने राष्ट्रपति और उनकी पार्टी पर नियुक्तियों को निर्धारित करके अपने सहयोगियों के लिए वीटो पावर हासिल करने का आरोप लगाया है. वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपति और उनकी पार्टी हरीरी पर भी यही आरोप लग रहे हैं.
बुधवार को उन्होंने 24 टेकनोक्रेटिक मंत्रियों की एक नई सूची सौंपी थी.
लेकिन गुरुवार को एक छोटी बैठक के बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा कि राष्ट्रपति ने "मौलिक" परिवर्तन का अनुरोध किया है, जिसे वह स्वीकार नहीं कर सकते.
उन्होंने कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति को पुनर्विचार के लिए और समय देने की मांग की थी लेकिन उन्होंने आगे कहा कि "यह स्पष्ट है कि हमारे बीच सहमति नहीं हो पाएगी."
हरीरी ने कहा, "इसलिए मैंने सरकार बनाने से ख़ुद को अलग कर लिया है. अल्लाह इस देश की मदद करें."
एक बयान में इयोन ने कहा, "अगर बातचीत का हर रास्ता बंद कर दिया गया है तो एक और दिन लेने का क्या ही फ़ायदा."
उन्होंने कहा कि वह जल्द ही हरीरी की जगह नए नाम के निर्धारण के लिए परामर्श करने के लिए दिन निर्धारित करेंगे.
लेबनान की धार्मिक सत्ता-साझेदारी प्रणाली के तहत, प्रधानमंत्री एक सुन्नी, राष्ट्रपति एक ईसाई और संसद का अध्यक्ष एक शिया होना चाहिए.
न्यूज़ एजेसी एपी ने अन-नाहर अख़बार के राजनीतिक मामलों के जानकार नबील बौ मोंसेफ के हवाले से लिखा है कि- हरीरी के इस्तीफ़े ने लेबनान के संकट को और बढ़ा दिया है.
वो कहते हैं कि फ़िलहाल जो हालात हैं उन्हें देखते हुए तो लगता है कि हम सरकार बनाने या साद हरीरी का विकल्प खोजने में सक्षम नहीं हो सकते हैं.
मोंसेफ़ कहते हैं कि हरीरी के पद से हटने से हो सकता है कि राष्ट्रपति माइकल इयोन अपनी जीत के तौर पर देखें लेकिन वास्तव में उन्होंने पूरे देश को संकट में झोंकने का काम किया है.
क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के बावजूद हरीरी और इयोन के बीच का गतिरोध ख़त्म नहीं हो सका.
यूरोपीय संघ की विदेश नीति के प्रमुख, जोसेप बोरेल ने पिछले महीने लेबनान की यात्रा के दौरान कहा भी था कि राजनीतिक नेताओं के बीच लड़ाई की मुख्य वजह केंद्र में सत्ता संघर्ष और अविश्वास है.
हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि लेबनान के सबसे शक्तिशाली सुन्नी मुस्लिम नेताओं में से एक हरीरी की जगह कौन ले सकता है.
लेबनान की सामुदाय आधारित राजनीतिक व्यवस्था के अनुसार, प्रधानमंत्री को सुन्नियों के रैंक से चुना जाता है.
हरीरी इससे पहले दो बार प्रधानमंत्री के रूप में काम कर चुके हैं. पहली बार 2009-2011 तक. दूसरी बार 2016 में. जब वह इयोन के साथ साझेदारी में आए, उस समय हरीरी ने राष्ट्रपति के लिए इयोन का समर्थन किया था. (bbc.com)
काबुल: अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद देश के अधिकतर हिस्सों पर कब्जा कर चुके तालिबान का रवैया भारत को लेकर काफी आक्रामक दिख रहा है। तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने दावा किया है कि भारत अफगान सेना को हथियार दे रहा है। इतना ही नहीं, तालिबान ने बातचीत की पहल से पहले भारत को अपनी निष्पक्षता साबित करने के लिए भी कहा है।
'भारत को साबित करनी होगी निष्पक्षता'
फॉरेन पॉलिसी मैगजीन से बातचीत में सुहैल शाहीन ने कहा कि अगर भारत तालिबान के साथ बात करना चाहता है तो उसे पहले अपनी निष्पक्षता साबित करनी होगी। सुहैल हाल में ही रूस में आयोजित शांति वार्ता को खत्म करते कतर की राजधानी दोहा स्थित तालिबान के राजनीतिक मुख्यालय लौटे हैं। इस दौरान तालिबान ने रूस की चिंताओं पर अपनी सफाई दी। तालिबान ने रूस से वादा किया है कि वह पूर्व सोवियत देश तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान की सीमाओं पर शांति बनाए रखेगा।
'विदेशियों की बनाई सरकार का पक्ष ले रहा भारत'
तालिबान के प्रवक्ता ने कहा कि भारत विदेशियों द्वारा स्थापित अफगान सरकार का पक्ष ले रहा था। वे हमारे साथ नहीं हैं। अगर वे अफगानों पर थोपी गई सरकार का समर्थन करने की अपनी नीति पर कायम रहते हैं, तो शायद उन्हें चिंतित होना चाहिए। वह एक है गलत नीति जो उनकी रक्षा नहीं करेगी। भारत शुरू से ही अफगानिस्तान में किसी भी सैन्य संगठन या मिलिशिया का समर्थन करने में चौकन्ना रहा है। नॉर्दन अलायंस को दी गई रक्षा मदद से भी भारत को बड़ी सीख मिली है।
अफगान सरकार को हथियार देने का लगाया आरोप
शाहीन ने आरोप लगाया कि भारत अफगान सरकार को हथियार दे रहा है, जिससे समूह परेशान है।
हमें अपने कमांडरों से रिपोर्ट मिली है कि भारत दूसरे पक्ष को हथियार मुहैया करा रहा है। यह कैसे संभव है कि वे तालिबान से बात करना चाहते हैं लेकिन व्यावहारिक रूप से वे काबुल को हथियार, ड्रोन, सब कुछ उपलब्ध करा रहे हैं? यह विरोधाभासी है।
रूस-चीन और ईरान के साथ तालिबान ने स्वीकारा संबंध
उन्होंने कहा कि हमारे रूस, ईरान और चीन के साथ एक या दो नहीं बल्कि कई वर्षों से राजनीतिक संबंध हैं। हमने कई बार उनसे मुलाकात की है और उन्हें आश्वासन दिया है कि हम अफगानी क्षेत्र को इन देशों के खिलाफ इस्तेमाल होने नहीं देंगे। चीन तो पाकिस्तान के सहारे कई साल से तालिबान के साथ गुपचुप बातचीत कर रहा है। जबकि, तालिबान का रूस के साथ संबंध बहुत पुराना है। (navbharattimes.indiatimes.com)
एक सरकारी अधिकारी के मुताबिक, तालिबान ने पकड़े गए 7,000 लड़ाकों की रिहाई के बदले अफ़ग़ानिस्तान में तीन महीने के संघर्ष विराम का प्रस्ताव रखा है.
अफ़ग़ान सरकार के मध्यस्थ नादेर नादरी ने इसे "बड़ी मांग" बताया है. सरकार इस पर क्या प्रतिक्रिया देगी, इसकी जानकारी फ़िलहाल नहीं दी गई है.
अमेरिकी सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान से हटने के बाद सरकार और तालिबान के बीच संघर्ष तेज हो गया है.
तालिबान ने हाल ही में दावा किया था कि उनके लड़ाकों ने अफगानिस्तान में 85% क्षेत्र को अपने कब्ज़े में ले लिया है. इस आंकड़े को स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना मुमकिन नहीं है और सरकार इन दावों को ख़ारिज कर रही है.
एक दूसरे अनुमान के मुताबिक तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के 400 ज़िलों में से एक तिहाई से अधिक पर नियंत्रित कर लिया है.
यूएन ब्लैक लिस्ट से नाम हटाने का अनुरोध
नादरी ने कहा कि तालिबान नेताओं ने ये भी अनुरोध किया था कि उनके नाम संयुक्त राष्ट्र की ब्लैक लिस्ट से हटा दिए जाएं.
बीबीसी संवाददाता लाइसे डौसेट के मुताबिक, पिछले साल 5,000 तालिबान कैदियों को रिहा किया गया था और ऐसा माना जाता है कि उनमें से कई युद्ध के मैदान में लौट चुके हैं, इससे देश में हिंसा बढ़ गई है.
गुरुवार को तालिबान लड़ाकों ने पाकिस्तान की सीमा पर स्थित अफ़ग़ान चौकियों को अपने कब्ज़े में लेने का दावा किया था.
बीबीसी पश्तो सेवा के अनुसार, तालिबान ने कहा कि उसने दक्षिणी कंधार प्रांत में डूरंड लाइन पर स्थित स्पिन बोल्डक ज़िले, स्थानीय व्यापार मार्ग और बाज़ारों पर कब्ज़ा कर लिया है.
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस बात की पुष्टि की है कि तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान से लगी सीमा पर एक चौकी पर क़ब्ज़ा कर लिया है.
अफ़ग़ान अधिकारियों ने इस बात से इनकार किया है कि पोस्ट अब उनके कब्ज़े में नहीं है.
इससे पहले अफ़ग़ानिस्तान के अधिकारियों ने इस्लाम कलां और तोरघुंडी के तालिबान के हाथों में जाने की पुष्टि की थी.
विदेशी सैनिकों के लौटने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद से, अफ़ग़ानिस्तान में परिस्थितियाँ लगातार बदल रही हैं. तालिबान ने दावा किया है कि अगर वो चाहे तो दो हफ्तों में पूरे मुल्क पर कब्ज़ा कर सकता है.
एक समझौते के तहत अमेरिका और नैटो सहयोगी देश तालिबान द्वारा अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में किसी भी चरमपंथी समूह को काम करने की अनुमति नहीं देने के की शर्त बदले में सभी सैनिकों को वापस लेने पर सहमत हुए थे.
लेकिन तालिबान अफ़ग़ान बलों से लड़ना बंद करने के लिए राजी नहीं हुआ था. तालिबान अब अफ़ग़ान सरकार के साथ बातचीत कर रहा हैं, जो वो पहले नहीं करता था. बातचीत बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही है और हमलों के रुकने के संकेत नहीं दिख रहे. (bbc.com)
जॉय चक्रवर्ती
दुबई, 15 जुलाई | महाराष्ट्र के ठाणे से ऑनलाइन टिकट खरीदने वाले एक भारतीय नागरिक ने दुबई ड्यूटी फ्री मिलेनियम मिलियनेयर ड्रॉ में 10 लाख डॉलर का प्रथम पुरस्कार जीता है।
बुधवार को, टिकट संख्या 0207, जो कि 363वें मिलेनियम मिलियनेयर ड्रा में चुनी गई थी, 36 वर्षीय नाविक (सीमैन) गणेश शिंदे की थी।
अभी पिछले हफ्ते ही एक भारतीय टैक्सी चालक ने नौ अन्य पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और श्रीलंकाई दोस्तों के साथ तीन अबू धाबी के बिग टिकट के लिए क्राउड फंडिंग की और दो करोड़ दिरहम का बड़ा पुरस्कार जीता।
दुबई और अबू धाबी ड्रॉ के अधिकांश विजेता या तो संयुक्त अरब अमीरात के निवासी हैं, या वे लोग हैं जो पर्यटकों के रूप में अमीरात का दौरा कर रहे हैं या किसी अन्य देश से होकर जा रहे हैं।
और भारतीय बहुत भाग्यशाली रहे हैं, जिन्होंने 1999 से अब तक 363 बार के रैफल को 181 बार जीता है।
लेकिन शिंदे का मामला दुर्लभ है, क्योंकि उन्होंने अपने देश से अपना टिकट ऑनलाइन खरीदा था।
शिंदे, जो ब्राजील में एक समुद्री फर्म में कार्यरत हैं, ने कहा कि वह कई बार दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से गुजर चुके हैं।
उन्होंने गल्फ न्यूज से कहा, यह अविश्वसनीय है। मैं अभी भी आश्चर्यचकित हूं। मुझे दुबई पसंद है और मुझे जल्द ही आने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा, मुझे एक नई कार, एक नया अपार्टमेंट चाहिए। मैं अपने बच्चे की शिक्षा के लिए पैसे बचाना चाहता हूं। इसलिए, सूची लंबी है। पुरस्कार राशि इन सभी उद्देश्यों की पूर्ति करेगी।
मिलेनियम मिलियनेयर ड्रॉ के साथ, दो लग्जरी वाहनों - एक रेंज रोवर स्पोर्ट एचएसई डायनेमिक 5.0 कार और एक बीएमडब्ल्यू आर नाइनटी स्क्रैम्बलर मोटरबाइक के लिए भी ड्रॉ आयोजित किया गया था।
ऑस्ट्रेलिया के एक प्रवासी, जस्टिन फ्रेंच ने लग्जरी कार रेंज रोवर जीती, जबकि 30 वर्षीय नेपाली प्रवासी 30 वर्षीय रोहित मोटे, जो एक सुपरमार्केट में काम करता है और अबू धाबी में रहता है, ने शानदार मोटरसाइकिल जीती है।(आईएएनएस)
बुधवार को ताजिकिस्तान में भारत और चीन के विदेश मंत्रियों की मुलाकात हुई, जिसमें भारतीय विदेश मंत्री ने चेतावनी दी कि चीन द्वारा मौजूदा स्थिति में एकतरफा बदलाव को स्वीकार नहीं किया जाएगा.
बुधवार को भारत के विदेश मंत्री ने चीनी विदेश मंत्री से मुलाकात की और भारत की चिंताएं साझा कीं. बातचीत के बाद भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक ट्वीट में कहा, "द्विपक्षीय संबंधों के लिए सीमांत इलाकों में शांति और स्थिरता की पुनर्स्थापना और उसका बने रहना बहुत जरूरी है.”
जयशंकर शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन के विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में हैं. वहां उन्होंने चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की. वांग यी ने भी शांति की जरूरत पर बल दिया और कहा कि चीन बातचीत से मसले सुलझाना चाहता है.
चीनी विदेश मंत्रालय ने वांग यी के हवाले से कहा, "चीन-भारत संबंध एक दूसरे को धमकाकर नहीं बल्कि यह साबित करने से परिभाषित होंगे कि एक दूसरे को हम आपसी सहयोग के मौके उपलब्ध कराएं. दोनों मुल्क साझीदार हैं, विपक्षी नहीं, और दुश्मन तो बिल्कुल नहीं.”
सालभर से जारी गतिरोध
भारत और चीन के बीच पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से गतिरोध जारी है. हालांकि मंत्री स्तर के अलावा स्थानीय कमांडरों के बीच और अन्य राजनेताओं के स्तर पर भी बातचीत हो चुकी है. जयशंकर ने बुधवार को कहा कि दोनों पक्ष वरिष्ठ सैन्य अफसरों की एक बैठक कराने पर सहमत हुए हैं.
पिछले साल चीन और भारत के सैनिकों के बीच एक विवाद हुआ था, जिसमें लाठियों, पत्थरों और लात-घूसों से एक दूसरे पर हमला किया गया. यह विवाद लद्दाख सीमा पर विवादित इलाके में हुआ था. इसमें भारत के 20 सैनिक मारे गए थे जबकि चीन ने कहा था कि उसके चार सैनिक हताहत हुए.
तब से दोनों मुल्कों के बीच तनाव लगातार बना हुआ है. दोनों पक्षों ने बड़े पैमाने पर सेना, तोपें और लड़ाकू विमान ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल' कही जाने वाली सीमा पर जमा कर लिए हैं. ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल' वह रेखा है, जो भारत और चीन के कब्जे वाले इलाकों को उत्तर में लद्दाख ले लेकर पूर्व में अरुणाचल तक बांटती है. अरुणाचल को चीन अपना इलाका बताता है. भारत का कहना है कि चीन ने विवादित इलाके में अपनी सेना की तैनाती बढ़ाई है, जिसके जवाब में उसने भी अपनी स्थिति को मजबूत किया है.
तनावपूर्ण शांति
बुधवार को भारत की सेना ने मीडिया में आ रहीं उन खबरों का खंडन किया कि चीनी सैनिकों के साथ हाल ही में पूर्वी लद्दाख में उसकी झड़प हुई है. भारतीय सेना की ओर से जारी एक बयान में कहा गया, "इस साल फरवरी में समझौता होने के बाद से दोनों ही तरफ से किसी भी इलाके पर कब्जा करने को लेकर कोई कोशिश नहीं हुई है. खबर में बताए गए गलवान या अन्य किसी भी इलाके में कोई झड़प नहीं हुई है.”
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद दशकों से जारी है. 1962 में दोनों देश एक युद्ध भी लड़ चुके हैं. पिछले साल के विवाद के बाद कई बार दोनों देशों के नेता मिल चुके हैं. पिछले साल सितंबर में रूस में हुई अपनी बैठक को याद करते हुए भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि पूर्वी लद्दाख में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर विवाद से दूर रहने का जो समझौता हुआ था, उसका पूरी तरह पालन होना चाहिए.
उन्होंने कहा कि इस साल पेंगोंग में विवाद को टालने की एक सफल कोशिश के बाद बाकी मुद्दों को हल करने के लिए सकारात्मक माहौल बनाने में मदद मिली है. भारत ने एक बयान में कहा, "हम उम्मीद करते हैं कि चीनी अधिकारी इस मकसद को हासिल करने के लिए हमारे साथ काम करेंगे. हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय यह मानता है कि अन्य इलाकों में मुद्दे अब भी उलझे हुए हैं.”
वीके/एए (रॉयटर्स, एएफपी)
तालिबान के लड़ाकों ने अफगानिस्तान में पाकिस्तान के साथ सीमा पर एक-दूसरे देश में आने-जाने वाला एक अहम रास्ता कब्जा लिया है. अमेरिकी फौजों के चले जाने के बाद तालिबान की यह बड़ी जीत मानी जा रही है.
तालिबान द्वारा जारी एक वीडियो में उनके कुरान की आयत लिखे सफेद झंडे को पाक सीमा से सटे वेश शहर पर क्रॉसिंग पर देखा जा सकता है, जहां अफगानिस्तान का झंडा होता था. सीमा के दूसरी ओर पाकिस्तान का चमन शहर है.
इस वीडियो में एक तालिबानी लड़ाका बोल रहा है, "दो दशकों तक अमेरिका और उनके पिट्ठुओं की क्रूरता सहने के बाद तालिबान ने यह दरवाजा और स्पिलन बोलदाक जिला कब्जा लिया है. मुजाहिदीन और उसके लोगों के मजबूत प्रतिरोध ने दुश्मन को यह इलाका छोड़ने पर मजबूर कर दिया है. जैसा कि आप देख सकते हैं, इस्लामिक अमीरात का झंडा है, वह झंडा जिसे फहराने के लिए हजारों मुजाहिदीन ने अपना लहू बहाया है.”
तालिबान की बड़ी जीत
अफगानिस्तान के दक्षिणी शहर कंधार के पास स्पिन बोलदाक जिले में पाकिस्तान सीमा पर यह क्रॉसिंग देश के दक्षिणी हिस्सों और पाकिस्तान की बंदरगाहों के बीच दूसरे सबसे व्यवस्त रास्ता है. अफगानिस्तान सरकार के आंकड़ों के मुताबिक यहां से हर रोज 900 ट्रक सीमा पार करते हैं.
अफगान अधिकारियों ने कहा है कि सरकार ने तालिबान को धकेल दिया है और जिले पर उन्हीं का कब्जा है. लेकिन नागरिक और पाकिस्तान अधिकारियों का कहना है कि क्रॉसिंग पर तालिबान का कब्जा बना हुआ है.
सीमा पर तैनात एक पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारी ने कहा, "पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान के व्यापार के लिए वेश बहुत अहमियत रखता है. और उसे तालिबान ने कब्जा लिया है.” चमन में पाक अधिकारियों ने कहा कि तालिबान ने रास्ते पर सारी आवाजाही रोक दी है.
हाल के दिनों में तालिबान ने हेरात, फराह और कुंदूज प्रांतों में सीमाओं पर कई अहम रास्तों पर कब्जा किया है. काबुल स्थित अफगानिस्तान चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इन्वेस्टमेंट के अध्यक्ष शफीकुल्ला अताई कहते हैं कि सीमा पर स्थित चौकियों पर कब्जे का अर्थ है कि तालिबान अब शुल्क वसूल सकता है.
20 वर्ष लंबा संघर्ष
2001 में अमेरिका द्वारा सत्ता से बाहर कर दिए जाने से पहले लगभग पांच साल तक तालिबान ने देश पर राज किया था. लेकिन 11 सितंबर 2001 के हमले के लिए अमेरिका ने अल कायदा को जिम्मेदार माना और उसे खत्म करने के लिए अफगानिस्तान पर हमला किया. तब तालिबान को सरकार से बाहर कर दिया गया. तब से तालिबान देश पर कब्जा पाने के लिए लड़ रहे हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ऐलान किया है कि सितंबर से पहले सारी अमेरिकी फौजों को स्वदेश बुला लिया जाएगा. अपने मुख्य सैन्य अड्डे बगराम को अमेरिकी सैनिक दो हफ्ते पहले ही खाली कर चुके हैं, जिसके बाद तालिबान के हौसले बढ़े हैं और वे तेजी से विभिन्न इलाकों पर कब्जा करते जा रहे हैं.
अमेरिकी अधिकारियों ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि इस महीने के आखिर में एक चार्टर्र विमान भेजा जाएगा और अमेरिकी सेना के साथ काम कर रहे ढाई हजार लोगों को अफगानिस्तान से निकाल लिया जाएगा. इस योजना को ‘ऑपरेशन अलाइज रिफ्यूज' नाम दिया गया है.
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने मंगलवार को उत्तरी प्रांत बाल्ख का दौरा किया और वहां की सुरक्षा हालात का जायजा लिया. 72 वर्षीय गनी नागरिकों से भी मिले और उन्हें भरोसा दिलाया कि "तालिबान की रीढ़ तोड़ दी जाएगी.”. तोलो न्यूज नेटवर्क की खबर के मुताबिक गनी ने दावा किया कि सरकारी फौजें जल्दी ही खोए इलाकों को तालिबान से छीन लेंगी.
उप राष्ट्रपति अमरुल्ला साले ने कहा है कि तालिबान बदख्शां प्रांत में एक अल्पसंख्य समुदाय के लोगों को धर्म बदलने या घरों से चले जाने के लिए मजबूर कर रहे हैं. ट्विटर पर उन्होंने कहा, "ये अल्पसंख्य किरगिज लोग हैं जो सदियों से वहां रह रहे हैं. वे अब ताजिकिस्तान में हैं और अपनी किस्मत का इंतजार कर रहे हैं.”
वीके/एए (रॉयटर्स, एएफपी)
अफगानिस्तान युद्ध को शुरू करने वाले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने पश्चिमी देशों के अफगानिस्तान छोड़ कर जाने को एक गलती बताया है. उन्होंने डॉयचे वेले से कहा कि इससे वहां की महिलाओं को "अकथनीय" नुकसान होगा.
जर्मनी के अंतरराष्ट्रीय प्रसारक डॉयचे वेले ने जब बुश से पूछा की अफगानिस्तान से पश्चिमी ताकतों का निकलना क्या एक गलती है, तो उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि हां ये एक गलती है, क्योंकि मुझे लगता है कि इसके परिणाम अविश्वसनीय रूप से खराब होंगे." अफगानिस्तान में युद्ध बुश के ही कार्यकाल में अमेरिका में 11 सितंबर, 2001 के हमलों के बाद शुरू हुआ था.
अमेरिका ने तालिबान के नेता मुल्ला उमर के सामने अंतिम शर्त रखी थी कि या तो वो अल-कायदा के नेता ओसामा बिन लादेन को सौंप दे और आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविरों को नष्ट कर दे या हमले के लिए तैयार हो जाए. उमर ने शर्त मानने से मना कर दिया था और अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों के एक गठबंधन ने अक्टूबर में आक्रमण कर दिया था.
'मैर्केल समझ गई थीं'
इस साल की शुरुआत में नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अफगानिस्तान से अमेरिका और नाटो की सेनाओं के निकलने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी. अब यह प्रक्रिया पूरी होने ही वाली है. तालिबान के लड़ाके एक एक कर के देश के कई जिलों पर कब्जा जमाते जा रहे हैं और उन्होंने देश के इलाके के एक बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया है.
डॉयचे वेले ने बुश का यह साक्षात्कार जल्द सत्ता छोड़ कर जाने वाली जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल के आखिरी अमेरिका दौरे के मौके पर किया. बुश ने प्रसारक को बताया कि मैर्केल ने अफगानिस्तान में सेनाओं की तैनाती का आंशिक रूप से समर्थन किया था "क्योंकि वो समझ गई थीं कि इससे अफगानिस्तान में युवा लड़कियों और महिलाओं के लिए काफी तरक्की हासिल की जा सकती थी."
मासूमों की बलि
बुश ने कहा, "तालिबान की क्रूरता की वजह से वो समाज कैसे बदल गया, यह अविश्वसनीय है...और अब अचानक...दुखद रूप से...मुझे डर है कि अफगान महिलाओं और लड़कियों का अकथनीय अनिष्ट होगा." 1990 के बाद के दशकों में तालिबान के शासन के दौरान महिलाओं को मोटे तौर पर उनके घरों के अंदर तक ही सीमित कर दिया गया था और लड़कियां शिक्षा हासिल नहीं कर सकती थीं.
अमेरिका और यूरोप के विरोध के बावजूद तालिबान ने इस्लामिक शरिया कानून एक अपने चरम प्रारूप को लागू किया. हालांकि लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा नहीं हुई. बुश ने कहा, "मैं दुखी हूं...लौरा (बुश) और मैंने अफगान महिलाओं के साथ काफी वक्त बिताया था और अब वो डरी हुई हैं. और मैं उन सब अनुवादकों और अमेरिकी और नाटो सैनिकों की मदद करने वाले उन सभी लोगों के बारे में सोचता हूं, तो मुझे लगता है कि वो सब वहीं छूट जाएंगे और इन अति क्रूर लोगों के हाथों बलि चढ़ा दिए जाएंगे. और इससे मेरा दिल टूट जाता है."(dw.com)
सीके/एए (एपी)
म्यांमार से सटे चीनी शहर में कोरोना के प्रकोप को खत्म करने के लिए व्यक्तिगत स्वास्थ्य कोड से जुड़ी चेहरे की पहचान तकनीक का प्रयोग शुरू किया गया है.
चीन दुनिया के सबसे अधिक सर्वेलांस करने वाले देशों में से एक है, जहां सरकार "सभी सार्वजनिक स्थानों को कवर करने" के लिए 20 करोड़ से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाने की जल्दी में है.
चीन में कोविड-19 का मुकाबला करने के लिए निगरानी का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया गया है, चीन पहला देश है जहां क्यूआर कोड की मदद से टेस्ट परिणाम को लॉग किया गया था और इससे ही कॉन्टैक्ट्स को ट्रैक किया जा सकता है.
यह पहली बार है कि सार्वजनिक रूप से इस बारे में रिपोर्ट किया जा रहा है कि फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की गतिविधि और स्वास्थ्य की स्थिति को ट्रैक करने के लिए किया जा रहा है. जब लोग आवासीय क्षेत्रों, सुपरमार्केट, परिवहन केंद्रों और अन्य सार्वजनिक स्थानों में दाखिल होते हैं और बाहर निकलते हैं.
शहर में एंट्री पर
चीन के युन्नान प्रांत के रुइली में अधिकारियों ने पत्रकारों को बताया, "जो भी रुइली के अंदर आता है और बाहर जाता है, उसे पार होने के लिए अपना (स्वास्थ्य) कोड और चेहरा स्कैन करना होगा है." मंगलवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक रुइली में पिछले एक सप्ताह में 155 मामले पाए गए, हाल के महीनों में सबसे खराब वायरस के प्रकोप वाले देशों में चीन भी है.
स्थानीय अधिकारियों ने एक बयान में कहा, "चेहरे की पहचान करने वाले कैमरे, स्मार्ट डोर लॉक्स और रोड बैरियर (पुलिस या सामुदायिक स्वयंसेवकों द्वारा संचालित) जैसे सुरक्षा उपकरण प्रमुख इलाकों में लगाए गए हैं." चीन के राष्ट्रीय रेडियो ने बताया कि स्कैनर व्यक्तियों के तापमान की भी जांच कर सकते हैं.
गोपनीयता पर सवाल
इस बात की कोई जानकारी नहीं कि डेटाबेस कितने समय तक रिकॉर्ड में रहेगा या फिर कोरोना के मामले काबू हो जाने के बाद अधिकारी सिस्टम को बंद कर देंगे. इस तकनीक की निगरानी शहर के महामारी निवारण कार्यबल द्वारा की जा रही है. रुइली की आबादी दो लाख 10 हजार से थोड़ी अधिक है. यह म्यांमार को जोड़ने वाला मुख्य शहर है. म्यांमार में एक फरवरी को हुए तख्तापलट के बाद चिंता बढ़ गई है कि लोग हिंसा से बचने के लिए इस शहर की ओर न आ जाएं.
युन्नान प्रांतीय स्वास्थ्य आयोग के मुताबिक पिछले सप्ताह दर्ज किए गए नए मामलों में से लगभग आधे म्यांमार के नागरिक थे, हालांकि यह साफ नहीं है कि उन्होंने शहर में प्रवेश कैसे किया. चीन में जब महामारी चरम पर थी, उस समय प्रमुख शहरों में पुलिस ने चेहरे की पहचान और इन्फ्रारेड कैमरों से लैस हेलमेट पहने जो पैदल चलने वाले लोगों के तापमान को मापते थे.
अधिकार समूहों ने चीन द्वारा हर जगह निगरानी की आलोचना की है और कहा है कि इसका इस्तेमाल अंसतोष को शांत करने और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है.
एए/वीके (एएफपी, रॉयटर्स)



