सेहत / फिटनेस

Date : 20-Jul-2019

अपेन्डिक्स का दर्द बारिश के मौसम में और अधिक बढ़ जाता है, इसलिए इस मौसम में सावधानी और जरूरी हो जाती है। विशेषज्ञों से बातचीत पर आधारित आलेख

अपेन्डिक्स लगभग चार-पांच इंच लंबी एक बंद और पतली नली होती है। यह वहां स्थित होती है, जहां छोटी आंत और बड़ी आंत मिलती हैं। सामान्यतया यह पेट के दाएं भाग में नीचे की ओर होती है। अपेन्डिक्स की वैसे हमारे लिए कोई उपयोगिता नहीं है। अपेन्डिक्स का संक्रमण घातक हो सकता है, इसलिए इसे सर्जरी कर निकाल दिया जाता है।

क्या है अपेन्डिसाइटिस
अपेन्डिसाइटिस का अर्थ है अपेन्डिक्स का संक्रमण। ऐसा माना जाता है कि इसकी शुरुआत तब होती है, जब अपेन्डिक्स का दूसरा किनारा अवरुद्ध हो जाता है। यह ब्लॉकेज अपेन्डिक्स में म्युकस के जमाव के कारण हो सकता है या मल के सेकम से अपेन्डिक्स में प्रवेश करने के कारण हो सकता है। म्युकस या मल कड़ा हो जाता है और ओपनिंग को ब्लॉक कर देता है। ब्लॉकेज होने के पश्चात जो बैक्टीरिया सामान्यतया अपेन्डिक्स में होते हैं, वे अपेन्डिक्स की दीवार पर आक्रमण (संक्रमित) करने लगते हैं। इससे अपेन्डिक्स में सूजन आ जाती है। इसी संक्रमण को अपेन्डिसाइटिस कहते हैं। अपेन्डिसाइटिस अकसर 10 से 30 वर्ष की आयु वर्ग के बीच में होता है। यह समस्या महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक सामान्य होती है, लेकिन बहुत अधिक चिंता की बात नहीं होती।

क्या हैं कारण
अपेन्डिसाइटिस लिम्फोइड फॉलिकल का आकार बढ़ने और चोट आदि लगने से भी हो सकता है। जब अपेन्डिक्स में रुकावट आती है, तब बैक्टीरिया इसमें तेजी से बढ़ने लगते हैं। इससे पस का निर्माण होने लगता है। दबाव बढ़ने से उस स्थान की रक्त नलिकाएं भी दब सकती हैं।

कैसे शुरू होता है दर्द
इसका दर्द पेट में हल्की मरोड़ के साथ शुरू हो सकता है। बहुत कम मामलों में ऐसा देखा जाता है कि इसके लक्षण दिखाई देने के 24 घंटों के भीतर अपेन्डिक्स फट जाए। हालांकि जिन लोगों में लगातार 48 घंटे तक अपेन्डिसाइटिस के लक्षण दिखाई देते हैं, उनमें से 80 प्रतिशत लोगों में यह फट जाता है। ऐसी स्थिति घातक हो सकती है।

सर्जरी ही है उपचार 
अपेन्डिसाइटिस का एकमात्र उपचार सर्जरी है। सर्जरी के पारंपरिक तरीके में एक बड़ा-सा लंबा कट लगाया जाता है। दूसरा तरीका है लैप्रोस्कोपी(इसमें 3-5 मिलीमीटर के छेद किये जाते हैं और शरीर के अंदर देखने के लिए दूरबीन का प्रयोग किया जाता है)। यह एक दिन की प्रक्रिया है।

लक्षणों को जानें
- पेट के निचले भाग में दर्द
- भूख न लगना
- जी मिचलाना
- उल्टी होना
- डायरिया की शिकायत
- कब्ज रहना
- हल्का बुखार रहना।

बढ़ जाता है खतरा
भारत में अपेन्डिक्स के अधिकतर मामले बरसात के मौसम में ही देखे जाते हैं। इन दिनों बारिश होने के कारण वातावरण में अत्यधिक नमी होती है। इस मौसम में बैक्टीरिया और वायरस का संक्रमण बढ़ जाता है, जिस कारण अपेन्डिसाइटिस के मामले भी अधिक होते हैं। इसलिए इस मौसम में ताजा खाना खाएं तथा साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। 

 

 


Date : 20-Jul-2019

हार्ट अटैक की चपेट में सिर्फ बुजुर्ग और अधेड़ ही  नहीं बल्कि युवा भी आ रहे हैं। दिल तक खून पहुंचाने वाली नसों में वसा (कोलेस्ट्रॉल) जमने के कई मामले नौजवानों में सामने आए हैं। डॉक्टर इसका  सबसे बड़ा कारण प्रदूषण, धूम्रपान और बेढंगी जीवनशैली को मान रहे हैं। यह खुलासा लारी कॉर्डियोलॉजी विभाग के शोध में हुआ है। पेश है रिपोर्ट

केजीएमयू के लारी कॉर्डियोलॉजी की इमरजेंसी में दिल का दौरा पड़ने के बाद भर्ती कराए गए 24 युवा मरीजों पर शोध किया गया है। इन युवाओं की उम्र 20 से 25 साल के बीच थी। छह माह शोध चला। लारी कॉर्डियोलॉजी विभाग के डॉ. गौरव चौधरी और डॉ. शरद चन्द्रा के निर्देशन में शोध हुआ।

डॉ. गौरव चौधरी ने बताया कि आमतौर पर नसों में वसा जमने की प्रक्रिया 30 साल की उम्र के बाद से शुरू होती है। यह प्रक्रिया 20 से 25 साल चलती है। यदि व्यक्ति ने संतुलित जीवन जीया तो दिल का दौरा पड़ने के खतरे को टाला जा सकता है। वहीं जो लोग धूम्रपान करते हैं और अधिक प्रदूषण वाले क्षेत्र में रहते हैं उन्हें हार्ट अटैक का खतरा ज्यादा होता है। शोध में शामिल मरीज आलमबाग, नाका, चारबाग, इंदिरानगर, विकासनगर आदि क्षेत्रों के निवासी हैं।

नसों के भीतरी हिस्सा का लिया गया चित्र: डॉ. गौरव ने बताया कि भर्ती युवाओं के दिल की जांच की गई। जिसमें दौरा पड़ने की पुष्टि हुई। कारणों का पता लगाने के लिए ओसीटी (ऑप्टिकल कोहरेंस टोमोग्राफी) जांच कराई गई। इसमें जांघ या हाथ की नस में कैथेटर दिल की नसों तक पहुंचाया गया। कैथेटर के भीतर फाइबर ऑप्टिक तकनीक से दिल की नसों के भीतरी हिस्से का चित्र लिया है। अभी एंजियोग्राफी में नसों के बाहर से बीमारी का पता लगाया जाता है। ओसीटी से बीमारी का और सटीक पता लगाना आसान हो गया है। जांच में युवाओं में कोरोनरी आर्थिरो इस्कलोसिस बीमारी की पुष्टि हुई। अभी तक यह बीमारी बुजुर्ग या फिर 50 की उम्र पार करने वालों में देखने को मिलती थी। 

बीमारी का पता लगाना आसान

एंजियोग्राफी में खून का थक्का, वसा का जमाव की स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट नहीं होती है। ऐसे कई बार डॉक्टर स्टंट डाल देते हैं या फिर खून पतला करने की दवा देते हैं। इस दौरान मरीज को दिक्कत होती है तो दोबारा एंजियोग्राफी करनी पड़ती है। ओसीटी में बीमारी का सटीक पता लगाना आसान हो गया है।

ठीक मिला लिपिड प्रोफाइल
दिल का दौरा पड़ने वाले मरीज की यदि खून की जांचें कराई जाएं तो लिपिड प्रोफाइल गड़बड़ आता है। डॉ. शरद चन्द्रा के मुताबिक भर्ती युवा मरीजों के लिपिड प्रोफाइल की जांच एकदम ठीक पाई गई। प्रदूषण इनकी बीमारी का कारण हो सकता है।

लक्षण
दिल का दौरा पड़ने पर मरीज को सीने में तेज दर्द होता है

बाएं हाथ में भी दर्द होता है ’  

खूब पसीना आता है

बैठे-बैठे सांस फूलने लगती है 

 


Date : 17-Jul-2019

कई बार अनियमित दिनचर्या व गलत खान-पान की वजह से शरीर में विषैले पदार्थ जमा हो जाते हैं। अगर ये शरीर से बाहर नहीं निकले तो सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं। आइए, हम आपको बताते हैं कि कैसे प्राकृतिक उपायों को अपनाकर उन्हें शरीर से बाहर निकाल सकते हैं -
1 अदरक : अदरक में एंटी इंफ्लेमेटरी गुण होते है जो मेटाबॉलिज्म को दुरुस्त रखने के साथ ही शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर करने में मदद करते है।

2 लहसुन : लहसुन को एक प्राकृतिक डिटॉक्सिफाइंग एजेंट माना जाता है। इसमें पाए जाने वाले एलिसिन में एंटी वायरल, एंटी बैक्टीरियल, एंटी फंगल और एंटी ऑक्सिडेंट के गुण होते हैं।
3 शहद, नींबू और गर्म पानी : शरीर के विषैले पदार्थों को बाहर करने का ये भी एक असरदार तरीका है। इसके लिए आप रोजाना सुबह शहद और नींबू के साथ गर्म पानी पिएं।

4 फाइबर युक्त चीजे खाएं : अपने खाने में साबुत अनाज, सब्जियां और फलों को शामिल करके भी शरीर से विषैले पदार्थों को करे सकते है।
5 एलोवेरा जूस : इसका नियमित सेवन करने से भी शरीर के जहरीले रसायन बाहर होने में मदद मिलती हैं। इसके लिए रोजना सुबह एलोवेरा का जूस पीया जा सकता है। 


Date : 10-Jul-2019

लगभग सभी लोगों के पेट में थोड़ी बहुत चर्बी होती है, लेकिन जब यह चर्बी 5 प्रतिशत से अधिक हो जाती है तो इसका इलाज जरूरी हो जाता है. यदि ऐसा होने की वजह ज्यादा शराब पीना नहीं है तो इसे नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर डिजिज (NAFLD) कहते हैं और यह प्राय: मोटापा या खाने की कुछ आदतों से जुड़ा होता है.
वर्तमान विश्लेषण के लिए शोधकर्ताओं ने 2,588 मरीजों के डाटा का अध्ययन किया जो कि वजन घटाने के लिए 22 क्लिनिक ट्रायल दे रहे थे. शोधकर्ताओं ने 15 में व्यावहारिक रूप से वजन घटाने के कार्यक्रमों का अध्ययन किया. छह अध्ययन दवाओं और एक वजन घटाने के लिए की गई सर्जरी पर की गई. अध्ययन में यह भी देखा गया कि क्या उन हस्तक्षेपों से NAFLD के लिए बायोमार्कर में सुधार होता है जो गंभीर जटिलताओं की संभावना का अनुमान लगाने में मदद कर सकते हैं.
अध्ययन में ये भी पाया गया कि जिन्होंने कम वजन घटाने या नहीं घटाने का समर्थन किया, उनकी तुलना में ज्यादा वजन घटाने का समर्थन करने वालों की सेहत में काफी सुधार देखा गया. ज्यादा वजन घटाने का समर्थन करने वालों के खून में लीवर एंजाइम की मात्रा तथा ब्लड शुगर में सुधार और हार्मोन इंसुलिन या इंसुलिन प्रतिरोध के प्रति संवेदनशीलता कम हुई.
ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता और अध्ययन के प्रमुख लेखक दिमित्रियोस कूटूकिडिस ने कहा, "यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि वजन घटाने से लीवर की हालत में सुधार होता है. हमने पाया कि वजन कम होने से ब्लड शुगर के लेवल में नियंत्रण और इंसुलिन प्रतिरोध में कमी के माध्यम से NAFLD में सुधार हुआ है, लेकिन अभी इसे अच्छे से समझने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है."
वजन कम करने के अलग-अलग दृष्टिकोण इस बात पर प्रभाव नहीं डालते हैं कि लीवर में फाइब्रोसिस, या दाग पहले की तुलना में बेहतर हुआ या खराब. शोधकर्ताओं ने अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन की पत्रिका जेएएमए इंटरनल मेडिसीन में कहा कि कम से कम आधे लोग मोटापे से ग्रस्त हैं. ऐसे में दुनिया भर में चार वयस्कों में से एक में NAFLD होता है. इसका कोई इलाज नहीं है. डॉक्टर यह सलाह देते हैं कि कैलोरी को कम कर वजन कम करें और अधिक से अधिक व्यायाम करें. वे कभी-कभी वजन कम करने के लिए सर्जरी या दवाओं के इस्तेमाल की भी सलाह देते हैं. शोध के नए नतीजों के अनुसार NAFLD से प्रभावित लोगों के लिए क्लिनिकल गाइडलाइन को बदलने और वजन कम करने की सलाह दी गई है.
अध्ययन की एक सीमा यह भी है कि छोटे छोटे अध्ययनों में वजन घटाने की विभिन्न अवधियों और विभिन्न तरीकों से लीवर की बीमारी की जांच के मामलों का आकलन किया गया है. कैलिफोर्निया के सैन फ्रांसिस्को विश्वविद्यालय में फैटी लीवर क्लिनिक के निदेशक डॉ डेनियल ब्रैंडमैन ने कहा, "खाने की आदत में बदलाव और व्यायाम में वृद्धि से वजन कम किया जा सकता है, जो कि फैटी लीवर में सुधार कर सकता है. आदर्श रूप से, रोगियों को अपने वजन में 7% की कमी और NAFLD में लंबे समय तक सुधार के लिए इस वजन को कम बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए. मरीजों में अपनी बीमारी को सुधारने या ठीक करने की क्षमता होती है. हालांकि, उन्हें पता होना चाहिए कि यह सिर्फ इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि लंबी दौड़ है. हालांकि वजन कम करना और आदतों में बदलाव करना कई मरीजों के लिए काफी मुश्किल होता है." आरआर/एमजे (रॉयटर्स)


Date : 09-Jul-2019

एक या दो हफ्तों तक अगर सिर्फ पानी, चाय और सूप के अलावा कोई ठोस भोजन ना लिया जाए, तो इससे शरीर को कोई फायदा मिलता है? वैज्ञानिक कहते हैं कि उपवास करने से फायदा होता है. लेकिन यह थ्योरी अब गलत साबित हो चुकी है कि इसके जरिए शरीर से जहरीले तत्व निकल जाते हैं. मेडीकुम हैम्बर्ग के पोषण विशेषज्ञ डॉक्टर मथियास रिडल का कहना है कि जिन चीजों की शरीर को जरूरत नहीं होती, वे पहले ही किडनी और लीवर के जरिए बाहर निकल जाते हैं, "लेकिन फास्टिंग का एंटीइनफ्लेमेट्री प्रभाव जरूर होता है, जो शरीर की मरम्मत करने की प्रक्रिया को बेहतर बनाता है."

उपवासरखने के सिर्फ एक दिन बाद ही शरीर एक तरह से फास्टिंग मोड में चला जाता है और फिर अपने अंदर मौजूद ग्लूकोज को इस्तेमाल करने लगता है. इससे ब्लड शुगर और इंसुलिन लेवल कम होने लगते हैं, शरीर का फैट घटने लगता है, पेट में जलन घटने लगती है और रक्तचाप भी बेहतर होता है. जर्मनी की एक अन्य पोषण विशेषज्ञ डॉ. अनेटे युंगहंस का इस बारे में कहना है, "कुछ मामलों में तो कोलेस्ट्रॉल का लेवल पहले के घटकर एक तिहाई रह जाता है." 
क्या आप यकीन मानेंगे कि कसरत भी फास्टिंग का हिस्सा है . दरअसल शरीर को प्रोटीन की जरूरत होती है. अगर खाने से प्रोटीन नहीं मिल रहा है, तो शरीर मांसपेशियों से प्रोटीन लेता है. ऐसे में फास्टिंग के दो दिन बाद मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगती हैं. डॉ. मथियास रीडल के अनुसार, "खासकर बुजुर्ग और कुपोषण के शिकार लोगों को काफी दिक्कत होती है, जिन्हें फिर से मांसपेशियां बनाने में समस्या होती है. इसलिए उपवास रखने के दौरान सावधानी की जरूरत है."
ऐसे में बार बार बीमार होने वाले या फिर दिल के मरीजों को सिर्फ डॉक्टर की देखरेख में ही फास्टिंग करनी चाहिए. और जरूरी नहीं है कि फास्टिंग का फायदा उठाने के लिए आपको कई दिन भूखा रहना पड़े. रिसर्चरों ने पता लगाया है कि कम अवधि में लेकिन नियमित रूप से खाना ना खाया जाए, तो वो भी फायदेमंद होता है. नैचुरोपैथी प्रैक्टिशनर डॉ. आंद्रेआस मिषाल्सेन का कहना है, "फास्टिंग का फायदा तो होता है, भले ही कुछ घंटों या फिर एक-दो दिन के लिए हो. पहले लोग सोचते थे कि हफ्ते भर फास्टिंग करेंगे. लेकिन इसका असर बहुत जल्दी शुरू हो जाता है."
इंटरवल फास्टिंग या इंटरमिटेंट फास्टिंग अच्छा आइडिया है. चूहों पर हुए प्रयोग दिखाते हैं कि हर दिन अगर 16 घंटे तक कुछ ना खाया जाए तो शरीर पर इसका वैसा ही असर होता है जैसा उपवास रखने से होता है. डायबिटीज विशेषज्ञ प्रोफेसर अनेटे शुरमन बताती हैं, "इंटरवल फास्टिंग आपके पाचनतंत्र को फिर से दुरुस्त करती है. चूंहों में हमने देखा है कि वे शुगर और फैट मेटाबोलिज्म के बीच बेहतर तरीके से विचरण कर सकते हैं. इससे फैट मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है." इससे चूहों के लीवर में कम जहरीले तत्व जमा हुए और चूहे अपने शरीर में बने इंसुलिन को बेहतर इस्तेमाल कर पाए. दोनों ही बातें डायबिटीज को रोकने में मददगार हैं. इंटरवल फास्टिंग वजन कम करने के लिए भी अच्छी है.

 

 

 


Date : 09-Jul-2019

शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि अक्करमेंसिया म्यूसिनीफिला जो मानव आंत्र में उपस्थित जीवाणु की एक प्रजाति है, पास्चुरीकरण के रूप में इसका उपयोग करने से यह विभिन्न हृदय रोग जोखिम कारकों से अधिक सुरक्षा प्रदान करती है. पत्रिका 'नेचर मेडिसिन' में प्रकाशित इस निष्कर्ष के मुताबिक, लौवेन यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम ने मानव शरीर में प्रभावी बैक्टीरिया पर अध्ययन किया. इसके लिए 42 प्रतिभागियों को नामांकित किया गया और 32 ने इस परीक्षण को पूरा किया. शोधकर्ताओं ने मोटे प्रतिभागियों को अक्करमेंसिया दिया, इन सभी में डायबिटीज टाइप 2 और मेटाबोलिक सिंड्रोम देखे गए. यानी इनमें दिल की बीमारियों से संबंधित जोखिम कारक थे.
प्रतिभागियों को तीन समूहों में बांट दिया गया- एक जिन्होंने जीवित बैक्टीरिया लिया और दो जिन्होंने पास्चुरीकृत बैक्टीरिया लिया- इन दोनों समूहों के सदस्यों में अपने खान-पान और शारीरिक गतिविधियों में परिवर्तन करने के लिए कहा गया. इन्हें अक्करमेंसिया न्यूट्रीशनल सप्लीमेंट के तौर पर दिया गया.
अक्करमेंसिया का सेवन इन प्रतिभागियों को तीन महीने तक लगातार करना था.
शोधकर्ताओं ने पाया कि इस सप्लीमेंट को खाना आसान रहा और जीवित और पास्चुरीकृत बैक्टीरिया लेने वाले समूहों में कोई साइड इफेक्ट नहीं देखा गया.
पास्चुरीकृत बैक्टीरिया ने प्रतिभागियों में डायबिटीज 2 और दिल की बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम कर दिया.
इससे लिवर के स्वास्थ्य में भी सुधार देखा गया, प्रतिभागियों के शारीरिक वजन में भी गिरावट (सामान्यतौर पर 2.3 किलो) देखी गई और इनके साथ ही साथ कोलेस्ट्रोल के स्तर में भी कमी आई.


Date : 06-Jul-2019

नई दिल्ली, 6 जुलाई । भाग-दौड़ भरी जिंदगी में स्वयं को सेहतमंद रखना किसी चुनौती से कम नहीं है। अक्सर देखने में आता है खुद को फिट रखने के लिए लोग जिम में जमकर पसीना बहाते हैं और उसके बाद भी उनके वजन में फर्क नहीं पड़ता। आखिर ऐसा क्यों होता है? एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इसकी वजह बताई है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, वर्तमान जीनवशैली में वजन बढऩा आम बात सी हो गई है, जिसे घटाने के लिए लोग अपने-अपने स्तर पर प्रयास करते हैं। लेकिन जाने-अनजाने वे अपनी दिनचर्या में कुछ ऐसा बदलाव कर लेते हैं जो उल्टा उनका ही दुश्मन बन जाती है, जिसके चलते वजन घटाने के उनके सारे प्रयास व्यर्थ साबित होते हैं। शोधकर्ताओं ने कहा कि लोग अक्सर व्यायाम के बहाने ज्यादा खाना खाने लगते हैं, या वे लोग अपने अन्य दैनिक क्रियाकलाप कम कर देते हैं, जिसका उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पड़ता है। अध्ययन के दौरान कुछ ऐसे लोग भी मिले जिनका वजन अन्य की अपेक्षाकृत कुछ कम हुआ। शोधकर्ताओं ने कहा कि इन लोग की सफलता अन्य लोगों के लिए एक पाठ हो सकती है।
कैसे किया अध्ययन
इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 18 से 61 वर्ष के 171 ऐसे लोगों को शामिल किया जो जिम जाकर व्यायाम नहीं करते थे। शोधकर्ताओं ने कुछ लोगों को सामान्य जीवन जीने को कहा गया, जबकि कुछ लोगों को व्यायाम शुरू करवाया गया। व्यायाम करने वाले लोगों को भी दो समूहों में बाटा गया। एक समूह को व्यायाम के जरिये सप्ताह में करीब 700 कैलोरी घटानी थी, वहीं दूसरे समूह को 1,760 कैलोरी कम करनी थी।
दैनिक क्रियाकलाप हैं जरूरी
अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग व्यायाम नहीं कर रहे थे, उनमें कोई अंतर नहीं देखा गया। वहीं, जो लोग व्यायाम कर रहे थे उनका वजन बहुत कम घटा पाया गया क्योंकि उन्होंने व्यायाम करने के बाद ज्यादा आहार लेना शुरू कर दिया था और अपनी दिनचर्या भी उन्होंने बदल दी थी। इससे उनके शरीर में व्यायाम का कोई फायदा नहीं देखा गया। करसत करने से लोग पतले होते हैं यह तो सभी जानते हैं। लेकिन मनुष्य का मेटाबोलिजम (उपापचय) हमेशा इसे सिद्ध नहीं करता। कई पुराने अध्ययन बताते हैं कि जिन लोगों ने वजन घटने के लिए नए व्यायाम शुरू किया था, उनका वजन कम होने की बजाय कई गुना बढ़ गया क्योंकि उन्होंने अपने दैनिक क्रियाकलापों 30 से 40 फीसद तक कम कर दिए थे।
कैसे हो सकता है फायदा 
शोधकर्ताओं ने बताया कि यदि आप वास्तव में अपना शरीर फिट रखना चाहते हैं तो आपको कसरत के साथ-साथ अपने दैनिक क्रियाकलाप भी पूर्ववत ही रखने होंगे। साथ ही अपने भोजन से ऐसे आहारों को दूर रखना होगा जो वजन बढ़ाते हैं। शोधकर्ताओं ने कहा कि यदि आप ज्यादा कैलोरी वाले खाद्य-पदार्थों का सेवन करते हैं तो आपको यह भी तय करना होगा कि उस कैलोरी को कैसे बर्न (कम) करना है। तब जाकर आप अपने वजन पर कंट्रोल पा सकते हैं। (जागरण)

 


Date : 06-Jul-2019

जयपुर। एचआईवी जिसका नाम सुन कर भी लोग काँप जाते हैं । एचआईवी एक प्रकार का वायरस होता है जो की हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम को खत्म करता है । इस वायरस के कारण हो रहे इन्फेक्शन के बढ़ जाने पर यह एड्स का रूप ले लेता है । एचआईवी एक संक्रामक रोग है जो की कुछ क्रियाओं के कारण ही फैलता है । यह एस संक्रामक रोग है जो की छूने से , साथ खाना खाने से नही फैलता ।इस इन्फेक्शन के कारण हमारा शरीर इतना ज्यादा कमजोर हो जाता है की हमको बाकी और बीमारियाँ भी बहुत तेज़ी से घेर लेती है । इस बीमारी पर हुए शोध पर शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है की जिन लोगों को यह इन्फेक्शन है उनको अपनी सेहत का ध्यान और भी ज्यादा रखने की आवश्यकता आई । क्योंकि यह इन्फेक्शन हार्ट फैलियर और स्ट्रोक का खतरा बढ़ा देता है ।

इस इन्फेक्शन के कारण हमारा शरीर इतना ज्यादा कमजोर हो जाता है की हमको बाकी और बीमारियाँ भी बहुत तेज़ी से घेर लेती है । इस बीमारी पर हुए शोध पर शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है की जिन लोगों को यह इन्फेक्शन है उनको अपनी सेहत का ध्यान और भी ज्यादा रखने की आवश्यकता आई । क्योंकि यह इन्फेक्शन हार्ट फैलियर और स्ट्रोक का खतरा बढ़ा देता है ।
अमेरिका के इमोरी यूनिवर्सिटी के प्रफेसर और इस स्टडी के लीड ऑथर अल्वारो अलॉन्सो ने कहा, ‘हमारी स्टडी के नतीजे इस बात का समर्थन करते हैं कि वैसे लोग जो HIV इंफेक्शन से पीड़ित हैं उन्हें स्मोकिंग से दूर रहना चाहिए और हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना चाहिए ताकि दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे को कम किया जा सके।
शोध की मानें तो नॉन-इंफेक्टेड लोगों की तुलना में एचआईवी से पीड़ित मरीजों में हार्ट फेलियर का खतरा 3.2 गुना अधिक और स्ट्रोक का खतरा 2.7 गुना अधिक था। साथ ही शोध में यह बात भी सामने आई है की इस इन्फेक्शन का खतरा 50 साल की उम्र से कम लोगों में ही ज्यादा पाया गया ।

 

 

 


Date : 05-Jul-2019

आगरा। मानसून के शुरू होते ही बुखार अपना कहर बरपाने लगेगा। घर-घर चरपाई बिछ जाएंगी। इस मौसम में डेंगू, मलेरिया समेत चिकनगुनिया के मरीज तेजी से बढ़ते है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों में गतवर्ष चार मरीजों में चिकनगुनिया की पुष्टि हुई थी। बाकि, कई मरीजों को इस बीमारी से जूझना पड़ा था। डॉक्टर बताते हैं कि बीमारी से बचने का एकमात्र उपाय रोकथाम है। जिसको अपनाकर हम बीमारी को खुद से एवं अपने परिवार से दूर भगा सकते है।

मानसून के दौरान फैलता है चिकनगुनिया
एक्सपर्ट बताते हैं कि चिकनगुनिया वायरल इंफेक्शन के कारण मानसून में आम तौर पर होने वाली बीमारिसों में से एक है। यह बीमारी मनुष्यों में चिकनगुनिया वायरस ले जाने वाले मच्छरों के काटने के कारण तेजी से फैलती है। इन मच्छरों में एडीज इजिप्ती और एडीज एल्बोपिक्टस मच्छर है, जो वायरस को मनुष्य के शरीर में पहुंचाते है। यह मच्छर आमतौर पर दिन और दोपहर के समय में काटते हैं। यह घर के अंदर भी पैदा हो सकते है।
पिछले वर्ष चार मरीजों में हुई थी पुष्टि
चिकनगुनिया डेंगू और मलेरिया की तरह मानसून के मौसम में अपना कहर दिखाना शुरू करता है। इसके मच्छर दिन में काटते हैं। पिछले वर्ष स्वास्थ्य विभाग में दर्ज आकंड़ो के अनुसार चार मरीजों में चिकनगुनिया की पुष्टि हुई थी। इस बार संक्रामक रोग माह नियंत्रण अभियान के तहत लोगों को जागरूक किया जा रहा है, जिससे लोग खुद का बचाव कर बीमारियों से दूर रहें। शहर के सबसे बड़े स्वास्थ्य केन्द्र एसएन मेडिकल कॉलेज में चिकनगुनिया की निशुल्क जांच की जाती है।

चिकनगुनिया के लक्षण

-तेज बुखार
-जोड़ों में तेज दर्द
-सिर में तेज दर्द
-चक्कर आना
-उल्टी होना
-शरीर में जकड़न होना
-रैशेज या चकते पड़ जाना
-मांसपेशियों में खिचाव और दर्द होना
चिकनगुनिया से बचाव
-घर के आसपास सफाई रखें
-कहीं भी पानी को जमा न होने दें
-खाने पीने के सामान को ढक कर रखें
-फुल बाजू के कपड़े पहनें
-तुलसी का पौधा लगाने से लारवा इनका नष्ट हो जाता है
-खाने से पहले हाथों को अच्छे से धोएं
-ज्यादा से ज्यादा आराम करें
-ऑयली और स्पाइसी खाने से परहेज करें


Date : 05-Jul-2019

शरीर को फिट और हेल्दी रखने के लिए जितनी जरूरत शारीरिक गतिविधि बनाएं रखने की होती है उतनी ही जरूरत हेल्दी डाइट और नेचुरल सप्लीमेंट्स की भी होती है। प्रोटीन, विटामिन्स के अलावा और भी बहुत से नेचुरल सप्लीमेंट्स होते हैं जो शरीर की कई समस्याओं को कम करने में मदद करते हैं। तनाव, डिप्रेशन, थकावट के अलावा और भी कई समस्याएं होती हैं जो इन नेचुरल सप्लीमेंट्स की मदद से ठीक हो सकती हैं। आइए जानते हैं कौन से नेचुरल सप्लीमेंट्स किन समस्याओं को कम करने में मदद करते हैं।
विटामिन सी, ई और ए: विटामिन सी, ई और ए आपकी स्किन के लिए बेहद फायदेमंद होता है। इसके अलावा बीटा केरोटिन और जिन्क भी त्वचा की समस्याओं को दूर करने के लिए आवश्यक होते हैं। ये नेचुरल सप्लीमेंट्स आपकी त्वचा की बढ़ती उम्र के लक्षणों को कम करने में मदद करते हैं।
विटामिन-बी: विटामिन-बी आपके मेटाबॉलिज्म को बूस्ट करने में मदद करता है जिससे आपकी शरीर को एनर्जी मिलती है और थकावट दूर होती है। इसके अलावा यह आपकी कॉग्नीटिव फंक्शन को बूस्ट करता है जिससे तनाव, चिंता और डिप्रेशन जैसी परेशानी दूर होती है।
विटामिन-डी और कैल्शियम: 
विटामिन-डी और कैल्शियम आपकी हड्डियों और मांसपेशियों के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं। साथ ही यह आपके हार्ट प्रॉब्लम्स, ऑस्टियोपोरोसिस, डायबिटीज और कैंसर के खतरे को भी कम करने में मदद करता है।
ओमेगा-3 फैटी एसिड: ओमेगा-3 फैटी एसिड आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत करने में मदद करता है। साथ ही यह आपके जोड़ों के दर्द को भी कम करने में मदद करता है। इसके अलावा ओमेगा-3 वाले फूड्स को खाने से हृदय भी स्वस्थ रहता है।
एंटीऑक्सीडेंट: एंटीऑक्सीडेंट बेहद पावरफुल नेचुरल सप्लीमेंट्स होता है। यह आपकी आंखों के स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इसके अलावा एंटीऑक्सीडेंट आंखों की रोशनी को भी बढ़ाता है।

 


Date : 04-Jul-2019

 

विटामिन डी की कमी आपको कई तरह से प्रभावित कर सकती है। इसमें कमजोरी, थकान, जरूरत से ज्‍यादा नींद, हड्डियों में दर्द के अलावा डिप्रेशन जैसी कई समस्‍याएं शामिल हैं। लेकिन हाल में 'जर्नल ऑफ हाइपरटेंशन' में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, शोधकर्ताओं ने जन्म से 18 वर्ष तक के 775 बच्चों की जांच की। जिसमें उन्‍होंने 6 से 18 साल के उन बच्चों की तुलना की, जो पर्याप्त विटामिन डी के स्तर के साथ पैदा हुए थे, तो उन्होंने पाया कि विटामिन डी की कमी वाले बच्चों में लगभग 60 प्रतिशत हाई ब्लड प्रेशर का खतरा अधिक था।
शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन बच्चों में बचपन में विटामिन डी का स्तर लगातार कम था, उनमें 3 से 18 साल की उम्र में बढ़े हुए हाई ब्‍लड प्रेशर का खतरा दोगुना था। इसके अलावा, शोध में यह भी पाया गया कि हाई सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर रीडिंग से डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर, ब्लड प्रेशर रीडिंग में दूसरे नंबर पर रहने पर भी हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है।
अध्ययन के प्रमुख लेखक गुओइंग वांग के अनुसार, 'हमारे निष्कर्ष इस संभावना को बढ़ाते हैं कि गर्भावस्था और शुरुआती बचपन यानि बच्‍चे के जन्‍म के बाद विटामिन डी की कमी को पूरा करना और इसकी जांच व उपचार से आने वाले समय में हाई ब्‍लड प्रेशर के खतरे को कम करने के लिए एक प्रभावी तरीका हो सकता है।'
हड्डियों को मजबूत बनाता है विटामिन डी
शरीर को मजबूत हड्डियों के लिए कैल्शियम की आवश्‍यकता होती है। ऐसे में मजबूत हड्डियों के लिए शरीर को कैल्शियम अवशोषित करने के लिए विटामिन डी महत्‍वपूर्ण होता है। विटामिन डी का सबसे अच्‍छा प्राकृतिक स्‍त्रोत सूर्य है। जब आप सूर्य की रौशनी के संपर्क में होते हैं और कुछ खाद्य पदार्थों, जैसे अंडे, सल्‍मन और दूध वाले उत्पादों में विटामिन डी पाया जाता है।  
हाई ब्‍लड प्रेशर की समस्‍या आजकल लोगों के बीच आम समस्‍या होती जा रही है। हाई ब्‍लड प्रेशर की समस्‍या दुनिया भर में लोगों में हृदय रोग का एक प्रमुख कारण है। बच्चों में मोटापे के साथ-साथ कम उम्र में हाई ब्‍लड प्रेशर की समस्‍या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हाई ब्‍लड प्रेशर होने और वयस्कता में हृदय रोग के विकास के लिए बचपन में हाई ब्‍लड प्रेशर एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है।

 

 

 

 


Date : 04-Jul-2019

100 ग्राम लौकी में लगभग 96% पानी और 1 ग्राम फैट होता है। फाइबर, विटामिन, राइबोफ्लेविन, जिंक, थायमीन, आयरन, मैग्नीशियम और मैग्नीज़ जैसे न्यूट्रिशन से भरपूर लौकी को पकाकर खाएं या इसका जूस पीएं, दोनों ही बहुत फायदेमंद है। डायबिटीज, ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के साथ ही ये मोटापा कम करने में भी है कारगर। जानेंगे इसके और दूसरे फायदे...    

पाचन में बेहतर
कब्ज होने की एक वजह भोजन में फाइबर की कमी भी होती है। लौकी को अपनी डाइट में शामिल कर आप काफी हद तक कब्ज से निजात पा सकते हैं। इसमें मौजूद फाइबर पेट की अंदरूनी सफाई करता है। इसके साथ ही अगर आपको एसिडिटी की प्रॉब्लम है तो लौकी का जूस पीना फायदेमंद रहेगा।

वजन कम करने में कारगर
लौकी में 96 प्रतिशत पानी होता है और प्रति 100 ग्राम लौकी में मात्र 12 कैलोरी। फाइबर की मौजूदगी बार-बार भूख लगने की समस्या को दूर करती है। तो अगर आप जल्द वजन कम करने की सोच रहे हैं तो लौकी को अपनी डाइट में करें शामिल और साथ ही इसका जूस भी पिएं।

रखें तरोताजा
लौकी का जूस पीने से सोडियम की कमी, मोटापे की समस्या, धूप में बार-बार प्यास लगने की समस्या को भी दूर किया जा सकता है। बहुत ज्यादा देर तक धूप में ट्रैवल करते हैं तो लौकी का सेवन आपको रखेगा तरोताजा और एक्टिव।

तनाव करता है कम
बिजी लाइफस्टाइल के साथ काम का प्रेशर बढ़ते तनाव की सबसे बड़ी वजहें हैं जिसे कम करने के लिए लोग तमाम तरह के ट्रीटमेंट्स पर डिपेंड हो रहे हैं लेकिन, क्या आप जानते हैं खानपान में भी जरूरी बदलाव करके इसे दूर किया जा सकता है। लौकी में मौजूद पानी की मात्रा बॉडी को रिफ्रेश रखता है जिससे तनाव में राहत मिलती है। इसके साथ ही कई सारे न्यूट्रिएंट्स शरीर को अंदरूनी रूप से स्ट्रॉन्ग रखते हैं। इससे तनाव और चिंता जैसी समस्याओं से राहत मिलती है।

सफेद बालों की समस्या करे दूर
रोजाना सुबह एक गिलास लौकी का जूस पीना बहुत ही फायदेमंद होता है। इससे बालों के असमय सफेद होने की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।

खूबसूरत स्किन के लिए
लौकी का जूस पेट की अंदरूनी सफाई करता है जिससे चेहरे पर धूप, धूल, और प्रदूषण से होने वाले कील-मुहांसों से छुटकारा मिलता है। जिससे स्किन खिली-खिली और खूबसूरत नजर आती है
 
ब्लड प्रेशर करे कंट्रोल
खाने को पका कर खाना या इसका जूस पीना, दोनों ही सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। ब्लड प्रेशर ही नहीं डायबिटीज़ के मरीजों के लिए भी लौकी है लाभकारी।  

 

 

 

 

 


Date : 02-Jul-2019

वॉशिंगटन। एक अध्ययन में पाया गया है कि जन्म से बचपन के दौरान जिन बच्चों में विटामिन डी की कमी होती है, उनमें सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर का जोखिम 60 फीसदी ज्यादा हो सकता है। ऐसे बच्चों के छह से 18 साल की उम्र तक इसकी चपेट में आने का ज्यादा खतरा रहता है।

ब्लड प्रेशर (बीपी) की उच्चतम रीडिंग को सिस्टोलिक जाहिर करता है। हाई सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर रीडिंग से हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। अमेरिका की जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के सहायक वैज्ञानिक गुयिंग वांग ने यह शोध किया है।
उन्होंने कहा कि हमारे अध्ययन से जाहिर होता है कि गर्भावस्था के दौरान ही विटामिन डी की कमी का उपचार कर बच्चों को जीवन में आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर के खतरे का सामना करने से बचाया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष 775 बच्चों पर किए गए एक अध्ययन के आधार पर निकाला है। इन बच्चों पर जन्म से लेकर 18 साल का होने तक नजर रखी गई थी।
शरीर की मजबूत हड्डियों के लिए जरूरी होता है कि वह कैल्शियम को अवशोषित कर सकें और इसके लिए विटामिन डी की जरूरत होती है। जब हम सूर्य के प्रकाश के संपर्क में होते हैं, तो हमारा शरीर इसे बनाता है। इसके साथ ही कुछ खाद्य पदार्थों जैसे अंडे, दूध उत्पादों और सालमन में यह पाया जाता है। यह विटामिन सप्लीमेंट के रूप में भी मिलता है।


Date : 02-Jul-2019

टाइप 2 डायबीटीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर में मौजूद हॉर्मोन इंसुलिन के प्रति शरीर रेस्पॉन्ड नहीं करता जिससे शरीर में मौजूद ग्लूकोज की मात्रा अनियंत्रित होकर बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। डायबीटीज के मरीज वजन कंट्रोल में रखें, तो इंसुलिन छूट सकता है और दवाएं भी 40 फीसदी तक कम हो सकती हैं। शुगर लेवल को मैनेज करने और बेहतर फिटनेस के लिए भी यह जरूरी है। 

ऐसे में हम आपको बता रहे हैं कुछ ऐसे फूड आइटम्स के बारे में जिन्हें खाने या पीने से शरीर में ब्लड शुगर का लेवल कम करने में मदद मिल सकती है। 
- रिसर्च में यह बात सामने आयी है कि हरी पत्तेदार सब्जियों में ऐंटिऑक्सिडेंट की मात्रा अधिक होती है इसलिए ये सब्जियां डायबीटीज के मरीजों के लिए रामबाण साबित हो सकती हैं। 
- कुछ स्टडीज में यह बात भी सामने आयी है कि गाभी जैसी दिखने वाली सब्जी केल (Kale) का जूस भी शरीर में ब्लड शुगर के लेवल को नियंत्रित करने के साथ-साथ बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। साथ ही केल का जूस उन लोगों के भी बेहद फायदेमंद है जो डायबीटीज के साथ-साथ हाई बीपी से परेशान हैं। 
- केल के अलावा जिन हरी पत्तेदार सब्जियों को डायबीटिक मरीजों को अपनी डायट में जरूर शामिल करना चाहिए वे हैं- पालक, पत्ता गोभी और बॉक चॉय। 
- जब बात ब्लड शुगर लेवल को कम करने की आती है तो कई स्टडीज में यह बात साबित हो चुकी है कि हल्दी में पाया जाने वाला करक्युमिन ब्लड शुगर कम करने में बेहद फायदेमंद होता है। 
डायबीटीज से पीड़ित मरीजों के लिए हेल्दी और बैलेंस्ड डायट खाने के साथ- साथ एक्सपर्टस ऐक्टिव लाइफस्टाइल रखने की भी सलाह देते हैं। ऐसा करने से मांसपेशियां ज्यादा मात्रा में ग्लूकोज का इस्तेमाल एनर्जी बनाने में करती हैं। साथ ही रेग्युलर ऐक्टिविटी करने से हमारा शरीर इंसुलनि को भी सही और असरदार तरीके से इस्तेमाल कर पाता है। ऐसे में आपको ज्यादा इंसुलिन लेने की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसे में हर हफ्ते कम से कम ढाई घंटे की ऐक्टिविटी बेहद जरूरी है। 


Date : 28-Jun-2019

इस बात की संभावना बहुत अधिक है कि आपके आसपास कोई न कोई डायबिटीज का शिकार हो. आज की दुनिया में, डायबिटीज इतनी आम बात हो गई है कि लोगों ने इसे एक बीमारी के तौर पर देखना बंद कर दिया है.

डायबिटीज सिर्फ ब्लड शुगर के लेवल को प्रभावित नहीं करता है बल्कि अगर इसे मैनेज नहीं किया जाए तो, इससे मोटापा, किडनी फेल होना और स्ट्रोक हो सकता है.
टाइप 1 डायबिटीज में, बॉडी इंसुलिन प्रोड्यूस नहीं करती. दूसरी ओर, टाइप 2 डायबिटीज में बॉडी इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाती है. इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है.
आयुर्वेद के अनुसार, डायबिटीज जिसे मधुमेह के नाम से भी जाना जाता है, एक बड़ी बीमारी या महा रोग है. यो एक चयापचय विकार (metabolic disorder) है. केवल ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करके इसका इलाज नहीं किया जा सकता है.
डायबिटीज के आयुर्वेदिक उपचार में यह सुनिश्चित करके ब्लड शुगर के लेवल को सही करना शामिल है कि बाद में कोई दिक्कत न आए.
आयुर्वेद में माना गया है कि आहार (डाइट) और विहार (लाइफस्टाइल) को बदलकर डायबिटीज कंट्रोल की जा सकती है. ये परिवर्तन किसी व्यक्ति के बॉडी के कॉन्स्टिट्यूशन या उसकी प्रकृति के अनुसार किए जाते हैं.
आयुर्वेद कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फूड्स खाने की सलाह देता है. ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) फूड प्रोडक्ट्स में कार्बोहाइड्रेट की एक रिलेटिव रैंकिंग है कि वे ब्लड शुगल के लेवल को कैसे प्रभावित करते हैं.
डायबिटिक लोगों के लिए ये सबसे पहला नियम है. मिठाई, चॉकलेट, कैंडी, चीनी और बहुत मीठे फलों से परहेज करें. नानास, अंगूर और आम जैसे फलों से खास तौर पर बचा जाना चाहिए. अगर ये चीजें खानी ही हैं, तो बहुत कम खाएं.
डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए, आयुर्वेद में कसैली चीजें खाने की सलाह दी जाती है. करेले जैसी चीजें इंसुलिन और ग्लूकोज के लेवल को बहुत अच्छी तरह से बैलेंस करने में मदद कर सकती हैं.
डॉ शर्मा का सुझाव है कि डायबिटीज के रोगियों को दूध और घी जैसे डेयरी प्रोडक्ट्स से बचना चाहिए क्योंकि वे पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं. इससे इंसुलिन का लेवल प्रभावित होता है.
डायबिटीज रोगियों को फिजिकली एक्टिव रहने और हमेशा बैठे रहने वाली लाइफस्टाइल से बचने का टार्गेट रखना चाहिए. टहलना और जॉगिंग जैसे हल्के एरोबिक एक्सरसाइज ब्लड शुगर के लेवल को कंट्रोल करने में मदद करेंगे. डॉ शर्मा कहते हैं:
एक और बात जो डायबिटीज के रोगियों को ध्यान में रखनी चाहिए, वह है रात में अच्छी नींद लेना. 6 से 8 घंटे की नींद लेना सबसे अच्छा है. समय पर सोना और जागना बहुत जरूरी है.


Date : 28-Jun-2019

नई दिल्ली: गर्मियों में धूप में अधिक देर तक बाहर रहने के कारण स्किन झुलझने के बारे में आपने अक्सर सुना होगा. गर्मियों में सनबर्न और टैनिंग बहुत ही आम समस्या है लेकिन क्या आपने कभी सन प्वाइजनिंग के बारे में सुना है. यह एक तरह का सनबर्न ही है लेकिन यह इसका सबसे गंभीर रूप होता है जो न केवल दर्दनाक होता है बल्किन स्किन और शरीर के अन्य हिस्सों के लिए काफी खतरनाक भी हो सकता है. 

आपको सन प्वाइजनिंग के संकेत पहचानने के तुरंत बाद डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. अगर आप सोच रहे हैं कि आपको इसके लक्षणों के बारे में कैसे पता चलेगा तो आपको बता दें कि आप खुद ही इन्हें आसानी से समझ सकते हैं. 
सन प्वाइजनिंग के लक्षण
यदि आपकी त्वचा पर सनबर्न हो गया है और यह अब तेजी से बढ़ रहा है तो आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करने की जरूरत है. इससे बचाव के लिए आप अपने शरीर का तापमान सामान्य बनाए रखें. वयस्कों के शरीर का सामान्य तापमान 97 से 99 डिग्री फेरेनाइट के बीच होता है. वहीं बच्चों का सामान्य तापमान आमतौर पर 97.9 से 100.4 के बीच होता है. अगर आपके शरीर का तापमान काफी अधिक कम है और आपको फ्लू जैसे लक्षण दिखने लग रहे हैं. या अगर आपको ठंडा पसीना आ रहा है और कपकपी फील हो रही है तो ये सब सन प्वाइजिंग के संकेत हैं. 
सन प्वाइजनिंग के कारण आपके शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की मात्रा कम हो जाती है जिस कारण आपको फ्लू के लक्षण नजर आने लगते हैं. आपको घबराहट जैसा भी महसूस हो सकता है. 
इतना ही नहीं सन बर्न बढ़ने से व्यक्ति के अंदर उलझन बढ़ने लगती है, बेहोशी सी छाने लगती है, तेज ठंड लगने लगती है और मिचली के साथ उल्टी भी आने लगती है. शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का कम होना इसका बहुत गंभीर संकेत होता है क्योंकि इसकी कमी से आपको कमजोरी महसूस होने लगती है.  
सन प्वाइजनिंग अगर स्किन पर बढ़ती जाती है तो इससे संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है. सन प्वाइजनिंग की वजह से स्किन इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ सकता है और स्किन में मवाद या पानी भरने के भी चांसेज रहते हैं. 
स्किन प्वाइजनिंग से बचने के लिए करें ये काम
सनबर्न या सन प्वाइजनिंग से बचने का सबसे पहला कारगर उपाय है कि आप तेज धूप में न जाएं. या जब भी आपको धूप में निकलना हो तो आप घर से निकलने से करीब 30 मिनट पहले सनस्क्रीन लगा लें और खूब सारा पानी पीके ही निकलें.   
सनस्क्रीन का एसपीएफ 30 या इससे ऊपर होना चाहिए. जब भी धूप में निकलें कॉटन के कपड़े पहनें. अपने शरीर को पूरा ढक कर रखें, सन एक्सपोज से खुद को बचाए रखने की कोशिश करें. 


Date : 26-Jun-2019

कामिनी मथाई 
नई दिल्ली, 26 जून । अनपॉलिश्ड माने जाने वाले महंगे और पैकेज्ड ब्राउन राइस हकीकत में सफेद हो सकते हैं और काफी पॉलिश किए हुए भी। इसके अलावा, कथित तौर पर डायबीटिक फें्रडली यानी शुगर के मरीजों के लिए बेहतर कहे जाने वाली वराइटी भी आधा उबले हुए चावल हैं। मद्रास डायबीटिक रिसर्च फाउंडेशन के फूड साइंटिस्टों ने सुपर मार्केट के 15 तरह के, हेल्दी, चावलों का टेस्ट किया। टेस्ट के नतीजे चौंकाने वाले थे। ज्यादातर मामलों में पैकेट पर जिन दावों का जिक्र किया गया, वे हकीकत से कोसों दूर पाए गए। 
एमडीआरएफ की फूड ऐंड न्यूट्रिशन रिसर्च साइंटिस्ट सुधा वासुदेवन हाल ही में जर्नल ऑफ डायबीटॉलजी में प्रकाशित एक स्टडी की सह-लेखिका हैं। उन्होंने बताया, हमारे पास काफी संख्या में डायबीटिक मरीज चावल की नई वराइटीज के साथ आ रहे थे, जिनके बारे में जीरो कोलेस्ट्रॉल और शुगरफ्री होने का दावा किया जा रहा था। ऐसे में हमने फैसला किया कि ऐसे लोकप्रिय चावलों में से 15 की जांच की जाए।
सबसे चौंकाने वाला नतीजा ब्राउन राइस के एक ब्रैंड का रहा, जिसका दावा था कि उसका ग्लिसेमिक इंडेक्स (जीआई) महज 8.6 है। वासुदेवन बताती हैं कि इंटरनैशनल त्रढ्ढ टेबल में किसी चावल में इतने कम जीआई का आजतक कभी कोई जिक्र ही नहीं आया है। चावल में निम्नतम जीआई करीब 40 के आस-पास पाया गया है। दरअसल, जीआई किसी खाद्य पदार्थ में कार्बोहाइड्रेट का स्तर बताता है। कार्बोहाइड्रेट से खून में ग्लूकोज का स्तर प्रभावित होता है। कम जीआई वाले खाद्य पदार्थ सेहत के लिए अच्छे माने जाते हैं। 55 से नीचे जीआई को कम माना जाता है। 44-69 जीआई को मध्यम और 70 से ऊपर को उच्च माना जाता है। कम जीआई वाले खाद्य पदार्थ न सिर्फ ब्लड शुगर घटाते हैं, बल्कि हृदय से जुड़ी बीमारियों और टाइप 2 डायबीटीज का भी खतरा कम करते हैं। दाल और सब्जियों में कम जीआई होता है, जबकि अनाजों में जीआई का स्तर आम तौर पर मध्यम होता है। 
स्टडी की एक और को-ऑथर एमडीआरएफ की फूड साइंटिस्ट शोभना शनमुगम ने बताया, जांच में चावल को आधा उबला हुआ ब्राउन राइस पाया गया। ये चावल अनपॉलिश्ड नहीं थे। आधे उबले होने की वजह से उनका कलर ब्राउन था। पकाते वक्त ये चावल और ज्यादा पानी सोखते हैं, जिससे उनमें स्टार्च का स्तर बढ़ता है। नतीजतन जीआई का स्तर भी बढ़ जाता है। 
वासुदेवन कहती हैं कि यह समझने की जरूरत है कि सभी ब्राउन राइस में कम जीआई होता है, जरूरी नहीं है। उन्होंने बताया, एक गलत धारणा है कि हाथ से कूटे गए चावल हेल्दी होते हैं, लेकिन जांच में पता चला कि इनमें भी करीब पॉलिश्ड वाइट राइस जितना ही जीआई है। वासुदेवन ने बताया कि ब्रान में काफी फैट होता है और इसे पकाना थोड़ा कठिन होता है। यही वजह है कि भारतीय इन्हें देर तक पकाते हैं। ब्राउन राइस में काफी पानी डाल देते हैं, जिसकी वजह से ब्रान लेयर टूट जाता है। एमडीआरएफ की सलाह है कि ब्राउन राइस को पकाते वक्त चावल और पानी का अनुपात 1:3 के बजाय 1:1.5 रखना चाहिए। 
वासुदेवन ने बताया कि कम पॉलिश किए गए चावलों में हाई जीआई होता है। उन्होंने कहा, आधे उबले हुए चावल भी पॉलिश्ड हैं, इसलिए वे उतने हेल्दी नहीं हैं। चावल को आधा इसलिए उबाला जाता है ताकि उसमें विटमिन बी बढ़ सके और ज्यादा वक्त तक खराब न हो, लेकिन इससे जर्म और ब्रान का लेयर हट जाता है जिस वजह से जीआई बढ़ जाता है। 
शुगरफ्री और जीरो कोलेस्ट्रॉल के दावे भी हकीकत से दूर हैं। जीरो कोलेस्ट्रॉल का दावा भ्रामक है। जहां तक शुगरफ्री चावल का दावा है तो शोभना ने बताया कि चावल में जो स्टार्च होता है, वह पाचन के वक्त ग्लूकोज में बदल जाता है। इस तरह कोई भी चावल शुगरफ्री हो ही नहीं सकता। 
इसलिए पैकेट पर छपे दावों पर मत जाइए और याद रखिए कि चावल को उचित मात्रा में ही खाएं। खासकर शुगर के मरीज जीरो कोलेस्ट्रॉल और शुगरफ्री जैसे दावों की बातों में न आएं। (टाईम्स न्यूज)
 

 


Date : 17-Jun-2019

पानी के बिना इंसान के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पानी के जरिए आपके शरीर में हर हफ्ते एक क्रेडिट कार्ड जितना प्लास्टिक दाखिल हो रहा है. एक रिपोर्ट के दावों की मानें तो 7 दिन के भीतर आपके शरीर में करीब 5 ग्राम प्लास्टिक जाता है. इसका सबसे बड़ा स्रोत बोतलबंद और नल से आने वाला वो पानी भी है जिसमें प्लास्टिक के छोटे-छोटे कण पाए जाते हैं.
वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) में प्रकाशित एक रिपोर्ट में पानी में प्लास्टिक होने का दावा किया गया है. यह रिपोर्ट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूकैसल और ऑस्ट्रेलिया समेत दुनियाभर में हुए 52 शोधों पर आधारित है. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की इंटरनेशनल डायरेक्टर जनरल मार्को लैंबरटिनी ने बताया कि प्लास्टिक से न सिर्फ महासागर बल्कि हम इंसान भी दूषित हो रहे हैं.
हर साल 250 ग्राम से ज्यादा प्लास्टिक-
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हमारे शरीर में हर सप्ताह प्लास्टिक के करीब 2000 छोटे कण प्रवेश करते हैं. हर महीने हम करीब 21 ग्राम प्लास्टिक निगल जाते है. जबकि एक साल में करीब 250 ग्राम से ज्यादा प्लास्टिक हमारे शरीर में दाखिल हो रही है. बता दें कि पहली बार किसी रिपोर्ट में पानी में प्लास्टिक होने की बात सामने आई है.
इन वजहों से भी निगल रहे प्लास्टिक-
यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूकैसल और ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ता शरीर में प्लास्टिक जाने के पीछे कई और चीजों को भी जिम्मेदार मानते हैं. इनमें से एक वजह समुद्र में रहने वाली शैलफिश भी है, जिसे खाने की वजह से शरीर में प्लास्टिक जा रहा है. इसके अलावा बीयर और नमक में भी प्लास्टिक होने का दावा किया गया है.
अमेरिका में इतना प्लास्टिक खा रहे लोग-
शोध में बताया गया है कि अमेरिका में 130 माइक्रोंस से भी छोटे करीब 45000 पार्टिकल्स हर साल इंसान के शरीर में प्रवेश करते हैं. यहां नल के पानी में बहुत ज्यादा प्लास्टिक फाइबर होता है। हालांकि यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट अंगालिया के प्रोफेसर ऐलेस्टर ग्रांट ने एजेंसी फ्रांस प्रेस से कहा, "पानी में प्लास्टिक होने की बात साबित हो चुकी है, लेकिन मुझे लगता है कि इससे इंसानों के स्वास्थ पर बहुत ज्यादा फर्क पड़ेगा." (aajtak)


Date : 11-Jun-2019

नई दिल्ली, 11 जून। एक एडिक्शन थेरेपिस्ट ने माता-पिता को यह चेतावनी दी है कि अपने बच्चे को स्मार्टफोन रखने की अनुमति देना कोकीन के एक ग्राम देने से भी अधिक हानिकारक साबित हो सकता है। हाल ही में लंदन के एक शिक्षा सम्मेलन में, हार्ले स्ट्रीट रिहैब क्लिनिक विशेषज्ञ मैंडी सालिगारी ने माता-पिता और शिक्षकों को बताया कि स्नैपचैट और इंस्टाग्राम आपके बच्चों के लिए एल्कोहल और ड्रग्स से भी अधिक खतरनाक हो सकते हैं और इनकी लत बेहद बुरी होती है। 
मैंडी सालिगारी ने यह भी कहा कि, मैं हमेशा लोगों को बोलती हूं कि जब आप अपने बच्चे को फोन या टैबलेट देते हैं तो आप समझ जाइए कि आप उन्हें वाइन की बोतल या फिर एक ग्राम कोकेन दे रहे हैं।
हार्ले स्ट्रीट थेरेपिस्ट ने बताया कि उनकी कई फिमेल क्लाइंट्स का यह मानना है कि अपने मोबाइल फोन से किसी को अपनी न्यूड फोटोज भेजना सामान्य है और माता-पिता या शिक्षक को इस बात का पता चलना सिर्फ एक मुद्दा है। सालिगारी ने कहा कि, मेरी जो 13 और 14 साल की क्लाइन्ट्स हैं वह लड़कियां हैं, जो सेक्सटिंग में शामिल हैं, और सेक्सटिंग को पूरी तरह से सामान्य बताती हैं।
सालिगारी ने कहा कि, अगर आप अपने बच्चों को आत्म-सम्मान बनाए रखने के बारे में सिखाते हैं तो उनका खुद को शोषण करने की संभावना कम होती है। शोध के अनुसार यह बात सामने आई है कि 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को डिजिटल टेक्नोलॉजी की लत को छुड़ाने के लिए उनका इलाज किया जा रहा है, जबकि हर 10 में चार माता-पिता का कहना कि बच्चों को फोन के इस्तेमाल को कंट्रोल करना मुश्किल होता है।
हाल ही में 1,500 माता-पिता के एक सर्वे में पाया गया है कि यूके के बच्चे सात साल की उम्र से ही अपना पहला मोबाइल फोन रखना शुरू कर देते हैं। साथ ही आठ वर्ष की आयु से टैबलेट और 10 वर्ष की आयु वाला स्मार्टफोन रखना शुरू कर देते हैं। हालांकि, चिकित्सक का मानना है कि बच्चों को फोन पर समय बिताना और वास्तविक जीवन के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद करना संभव है चाहे वह किसी उम्र के हों। (जनसत्ता)


Date : 23-May-2019

फेफड़ों का कैंसर (लंग कैंसर) तब होता है जब फेफड़ों में कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से ऊपर-नीचे होने लगती हैं। आमतौर पर इसके लक्षण प्रारंभिक चरण में सामने नहीं आते हैं। लगातार खांसी, सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द, गला बैठना, हड्डियों में दर्द, सिरदर्द, खांसते वक्त खून आना आदि फेफड़ों के कैंसर के लक्षण हैं। धूम्रपान फेफड़े के कैंसर के सबसे सामान्य कारणों में से एक है।
फेफड़ों का कैंसर मूल रूप से दो प्रकार के होता है पहला स्मॉल सेल लंग कैंसर और दूसरा नॉन  स्मॉल सेल लंग कैंसर। स्मॉल सेल लंग कैंसर आम नहीं है और अधिकतर उन लोगों को होता है जो धूम्रपान करते हैं। हालांकि नॉन  स्मॉल सेल लंग कैंसर नें अन्य सभी प्रकार के फेफड़ों के कैंसर आते हैं। जहां बात इसके उपचार की आती है तो डॉक्टर सीटी स्कैन और पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (पीईटी) स्कैन जैसे इमेजिंग परीक्षणों का उपयोग करते हैं। इसके अलावा, प्रयोगशाला परीक्षण के लिए फेफड़े के ऊतकों को लिया जा सकता है।
इस स्थिति का शुरू में निदान किसी का भी जीवन बचा सकता है। फेफड़ों का कैंसर संभावित रूप से शरीर के अन्य भागों में फैल सकता है और जान जाने का खतरा पैदा कर सकता है। इसके उपचार के लिए डॉक्टर सर्जरी, कीमोथेरेपी, विकिरण चिकित्सा या लक्षित चिकित्सा का प्रयोग करते हैं। फेफड़ों के कैंसर को रोकने के लिए आपको इसके जोखिम कारकों की ओर ध्यान देने की जरूरत है। इसलिए हम आपको ऐसे पांच जोखिम कारकों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें आप अपनी दिनचर्या से हटाकर स्वस्थ रह सकते हैं।
धूम्रपान
आपमें फेफड़ों के कैंसर का जोखिम आपके द्वारा रोजाना पीएं जाने वाली सिगरेट की संख्या पर निर्भर करता है। अगर आप रोजाना अधिक संख्या में सिगरेट पीते हैं तो आपमें फेफड़ों के कैंसर का जोखिम अधिक रहता है। वैसे धूम्रपान हमेशा से ही स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध होता है।
सिगरेट का धुआं भी है खतरनाक
अगर आप सिगरेट नहीं पीते लेकिन आपके समूह में कुछ लोग ऐसे हैं, जो नियमित रूप से धूम्रपान करते हैं और आप अक्सर उनके साथ रहते या घूमते हैं तो आप भी फेफड़ों के कैंसर की चपेट में आ सकते हैं क्योंकि सिगरेट से निकलना वाला धुआं भी हवा में घुलकर आपके भीतर जा रहा है, जो कि कैंसर का कारण बन सकता है।
पीने के पानी में मौजूद आर्सेनिक
जर्नल इनवायरमेंटल रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक पीने के पानी में मौजूद आर्सेनिक से भी फेफड़ों का कैंसर हो सकता है।
एसबेस्टस के संपर्क में आने से हो सकता है कैंसर
सामान्यतौर पर वे लोग, जो खदानों में काम करते हैं वे अधिकतर एसबेस्टस के संपर्क में आते हैं। एसबेस्टस कैंसरकारी तत्व है।  एसबेस्टस संभावित रूप से फेफड़ों के कैंसर का कारण बन सकता है।
परिवार में रहा हो फेफड़ों के कैंसर का इतिहास
अगर आपके परिवार के लोगों को फेफड़ों का कैंसर रहा है तो आप भी इस बीमारी का शिकार हो सकते हैं। दरअसल परिवार में कैंसर के रोगी होने का इतिहास आपके जीन से जुड़ा होता है। इसलिए घर के किसी सदस्य को हुई बीमारी, आपको भी हो सकती है।