सेहत-फिटनेस

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11-Oct-2021 8:56 PM (59)

Health Benefits Of Banana: सुपर फूड कैटेगरी में शामिल केला दुनियाभर में काफी प्रचलित है. ये एक ऐसा फल है जो हर मौसम में और हर जगह आसानी से उपलब्‍ध होता है. यह अन्‍य फलों की तुलना में सस्‍ता भी है और इंस्‍टेंट एनर्जी देने के लिए ये बेस्‍ट फूड माना जाता है. केले में भरपूर विटामिन्‍स, मिनरल्‍स पाए जाते हैं जो छोटे बच्‍चों से लेकर बड़ों तक की सेहत के लिए काफी जरूरी हैं. मेडिकल न्‍यूज टूडे के मुताबिक, अगर इसका सेवन रेग्‍युलर किया जाए तो ब्‍लड प्रेशर को तो ठीक रखा ही जा सकता है साथ ही कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से भी खुद को बचाया जा सकता है. ऐसे में अगर आप इसे व्रत के दौरान भी खाते हैं तो ये आपको दिनभर एनर्जेटिक बनाए रखने में काफी मदद कर सकता है. इसके अलावा, आप इसे कच्‍चा और पका दोनों तरह से खा सकते हैं. कच्‍चा केला आप सब्‍जी या चिप्‍स के रूप में खा सकते हैं जबकि पके केले को आप डायरेक्‍ट या स्‍मूदी, शेक, सैंडविच आदि के तौर पर भी खा सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि केले के क्‍या क्‍या सेहत से जुड़े फायदे हैं.

केले के फायदे 

1.ब्‍लड प्रेशर रखता है नियंत्रित

अमेरिकन हार्ट असोसिएशन के मुताबिक, केले में भरपूर पोटैशियम होता है जो ब्‍लड प्रेशर को नियंत्रित करने में काफी कारगर है. ये कार्डियोवेस्‍कुलर सिस्‍टम को भी बेहतर तरीके से काम करने में मदद करता है. अगर लोग रोज एक मीडियम साइट का केला खाएं तो शरीर के जरूरत का 9 प्रतिशत पोटैशियम की आपूर्ति ये कर सकता है.

2.अस्‍थमा रखे दूर

एक शोध में पाया गया है कि इसमें पोटैशियम के अलावा भरपूर मात्रा में एंटीऑक्‍सीडेंट तत्‍व होते हैं जो बच्‍चों को अस्‍थमा की समस्‍या से दूर रखने में काफी अहम भूमिका निभा सकते हैं.

3.कैंसर से बचाव

केले में मौजूद कुछ खास एंटीऑक्‍सीडेंट लैक्‍टीन होते हैं जो सेल्‍स को फ्री रेडिकल्‍स से बचाने में काफी मदद करते हैं.  एक शोध में पाया गया कि जो बच्‍चे बचपन में केला, नारंगी खाते हैं उन्‍हें लिउकेमिया बढने का रिस्‍क कम होता है जो कैंसर का कारण होता है.

4.हार्ट के लिए हेल्‍दी  

केला में मौजूद फाइबर, पोटैशियम, फॉलेट, एंटीऑक्‍सीडेंट ये सभी हार्ट को हेल्‍दी रखने के लिए जरूरी तत्‍व हैं.  शोध के मुताबिक अगर हम भरपूर मात्रा में फाइबर का सेवन करते हैं तो एलडीएल यानी बैड कोलेस्‍ट्रॉल को कम किया जा सकता है.

5.डायबिटीज

अमेरिकन डायबिटीज असोसिएशन भी रोज केला खाने की सिफारिश करता है. यह डायबिटीज टाइप टू के रिस्‍क को कम करता है.

अन्‍य फायदे

-केला खाने से मेमोरी बूस्‍ट होता है.

-डायजेशन अच्‍छा होता है.

-किडनी स्‍टोन की संभावना कम होती है.

-स्‍ट्रोक के खतरे को करे कम.

(news18.com)


05-Oct-2021 8:27 AM (116)

Immunity help– अच्छी नींद से ना सिर्फ़ शरीर को आराम मिलता है बल्कि हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है. इन दिनों हर कोई वैक्सीन ले रहा है और अपनी इम्यूनिटी कोविड के विरुद्ध मजबूत कर रहा है. कई शोध बताते हैं कि इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए वैक्सीन के साथ अच्छी नींद का होना बेहद जरूरी है. इसके अलावा डायटिशियन रुजुता दिवेकर भी बार-बार अच्छी नींद के बारे में बहुत सारी सलाह सोशल मीडिया पर देती रहती हैं . यहां ऐसे सुझाव है जिनकी मदद से यह जान पाएंगे कि नींद कैसे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है.

वैक्सीन और नींद

इन दिनों वैक्सीन की जरूरत हर किसी को है और हर कोई ले भी रहा है. लेकिन वैक्सीन लेने के साथ अच्छी नींद का लेना भी बेहद जरूरी है. एक रिसर्च के मुताबिक h1n1 और हेपेटाइटिस की वैक्सीन लेने के दौरान,  जिन लोगों ने अच्छी नींद नहीं ली उनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पाई गई. वहीं जिन्होंने अच्छी नींद ली उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर थी. जरूरी है कि जब भी कोई वैक्सीन लें तो अपने शरीर को आराम दें. वैक्सीन लेने के बाद अच्छी नींद लेना कतई ना भूलें.

संक्रमण और नींद

संक्रमण तब होता है जब हमारा शरीर गंभीर रूप से बीमार होने वाला होता है. ऐसे में हमारी बॉडी संक्रमण की प्रक्रिया करके हमें बताती है. रिसर्च के हिसाब से अगर नींद पूरी नहीं होती है तो इंफेक्शन यानी संक्रमण की आशंका भी ज्यादा होती है. इसलिए जरूरी है कि भरपूर नींद लें और शरीर को स्वस्थ रखें.
अच्छी नींद के लिए ये करें

अब हम यह तो जान चुके हैं कि नींद हमारे लिए क्यों और कितनी जरूरी है. इसलिए जरूरी है कि आप सोने के लिए अपने कमरे को आरामदायक और सुकून भरा बनाएं. सोने के पहले कमरे की लाइट मध्यम, कमरा ठंडा होना चाहिए. इसके अलावा आपके मैट्रेस यानि गद्दे आपके बैक यानि पीठ को अच्छे से सपोर्ट करने वाले हों.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.) (news18.com)


17-Sep-2021 9:04 AM (76)

Body Clock: अस्थमा के मरीजों की हालत अक्सर रात में क्यों बिगड़ जाती है? माना जाता है कि सोते समय अन्य शारीरिक गतिविधियों के कारण रात में यह दिक्कत बढ़ती है. हालांकि, यह पूरा सच नहीं है. दैनिक जागरण में छपी ख़बर के अनुसार, अमेरिका के ब्रिघम और वूमन हॉस्पिटल और ओरेगॉन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दो सर्कैडियन प्रोटोकॉल का यूज करते हुए सर्कैडियन सिस्टम यानी बॉडी क्लॉक की भूमिका का पता लगाया है. रिसर्च का रिजल्ट द प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

कैसे प्रभाव डालता है सर्कैडियन सिस्टम (बॉडी क्लॉक)?
सर्कैडियन सिस्टम या बॉडी क्लॉक टाइम और डेली रूटीन के हिसाब से शरीर के विभिन्न हिस्सों को लूज (शिथिल) बनाता है. अस्थमा के 17 मरीजों पर किए गए टेस्ट में वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन लोगों का सर्कैडियन सिस्टम रात में उनके फेंफड़ों को ज्यादा लूज कर देता है, उनमें अस्थमा के अटैक का खतरा ज्यादा रहता है. सर्कैडियन सिस्टम में किसी खामी के कारण दिन के किसी अन्य समय पर भी अस्थमा का खतरा बढ़ सकता है.

अस्थमा से पीड़ित 75 प्रतिशत लोग रात में अस्थमा की गंभीरता का अनुभव करते हैं. एक्सरसाइज, एयर टेंप्रेचर, पोश्चर और नींद के साथ-साथ कई बिहेवियर भी अस्थमा की सीरीयस कंडीशन का कारण बन जाते हैं. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस हालिया रिसर्च के नतीजे अस्थमा के इलाज का नया रास्ता खोलने में सहायक हो सकते हैं.

रिसर्च में क्या आया सामने
ओरेगन इंस्टीट्यूट ऑफ ऑक्यूपेशनल हेल्थ साइंसेज के प्रोफेसर और निदेशक संबंधित सह- लेखक स्टीवन ए शी (Steven A. Shea) ने कहा, “हमने देखा कि जिन लोगों को सामान्य रूप से सबसे खराब अस्थमा है, उनको रात में पल्मोनरी फंक्शन में सबसे बड़ी सर्कैडियन-प्रेरित ड्रॉप्स से परेशानी होती है. उन लोगों की स्लीप साइकिल में भी बड़े बदलाव थे. हमने यह भी पाया कि ये परिणाम मेडिकल रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि जब लैब में स्टडी की गई, तब लक्षण वाले ब्रोन्कोडायलेटर इनहेलर का यूज रात के दौरान दिन की तुलना में चार गुना अधिक था.”

घड़ी जैसा सर्कैडियन सिस्टम
दिमाग का एक खास हिस्सा सर्कैडियन सिस्टम को कंट्रोल करता है. दिन के समय के हिसाब से शरीर की गतिविधियों को निर्धारित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. व्यक्ति की दिनचर्या के हिसाब से किसी निश्चित समय पर भूख या नींद इसी कारण लगती है. (news18.com)


07-Sep-2021 5:15 PM (406)

सवाल है कि क्या आपके पास रोजाना 15 से 30 मिनट पैदल चलने का वक्त है? अगर निकाला जाए तो ऐसा करना कठिन नहीं होगा क्योंकि इससे होने वाले फायदे जानेंगे तो हैरान रह जाएंगे.

बिना पसीना बहाए, हैवी वर्कआउट करने की जगह सिर्फ पैदल चलने से काफी फायदे हैं. ऐसा हम नहीं बल्कि कई रिसर्च और डॉक्टरों का मानना है. जानिए महज 15-30 मिनट का पैदल चलना आपको कितनी बीमारियों से बचा सकता है. और इसकी मदद से आपके व्यक्तित्व में कितना बदलाव आएगा?

1. दिमाग की सेहत भी रहेगा फिट
पैदल चलने का असर आपको दिमाग पर भी दिखेगा. स्टडी के मुताबिक पैदल चलने से एंडोर्फिन (दिमाग और तंत्रिका तंत्र में मौजूद हॉर्मोन) में इजाफा और स्ट्रेस लेवल में गिरावट आती है.

2. तेज वाक से दिल भी होगा खुश
अमेरिकन हर्ट एसोसिएशन के मुताबिक रनिंग के जैसे वॉक करना भी दिल के लिए अच्छा है. ये दिल में सर्कुलेशन बढ़ाता, कैलेस्ट्रॉल कम करता और ब्लड प्रेशर को स्थिर रखता है.

3. फेफड़ों तक पहुंचेगी ज्यादा ऑक्सीजन
पैदल चलने से फेफड़े मजबूत होते हैं क्योंकि इससे ऑक्सीजन का शरीर में ज्यादा बहाव होता है. इससे न सिर्फ फेफेड़े स्वस्थ्य होते हैं बल्कि बीमारियों से बचते हैं.

4. डायबिटीज का खतरा भी कम 
रिसर्च में सामने आया है कि जो लोग वॉक करते हैं उनके शरीर में ग्लूकोज की मात्रा, दौड़ने वालों की तुलना में 6 गुना ज्यादा होता है. इससे डायबिटीज़ का खतरा भी कम होता है.

5. जिम में पसीना बहाने से बेहतर 
10 हजार स्टेप्स रोजाना चलने से शरीर की अतिरिक्त चर्बी को घटाया जा सकता है. वॉक से शरीर के मसल्स टोन फिट रहते हैं. इससे मांसपेशियां चुस्त रहती हैं. वॉक करना जिम में पसीना बहाने से कहीं ज्यादा आसान है.

6. ज्वाइंट्स और हड्डियां मजबूत
30 मिनट की वॉक से आपकी हड्डियां और ज्वाइंट्स भी मजबूत होते हैं. मजबूत ज्वाइंट्स, चोटों का खतरा कम रहता है. अर्थराइटिस फाउंडेशन के मुताबिक वॉकिंग बहुत फायदेमंद है.

7. बॉडी रहेगी लचीली
बढ़ती उम्र के साथ ज्यादा एक्सरसाइज़ कई बार कमर के लिए नुकसानदायक हो जाती है. लेकिन वॉक करने से कमर का दर्द और लचक में काफी फायदेमंद साबित रहती है. इससे शरीर की न सिर्फ स्ट्रैंथ बल्कि लचीलापन में भी राहत मिलती है. (news18.com)


07-Sep-2021 1:26 PM (114)

भोपाल: लाल भिंडी का स्वाद क्या आपने चखा है. ज्यादातर लोग अपने घरों में हरी भिंडी खाते हैं. लाल भिंडी देखने और सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन खाने में स्वादिष्ट और पौष्टिक होती है. बता दें कि भोपाल के खजूरीकलां गांव में उगी लाल भिंडी आजकल सबकी जुबान पर है. यहीं के एक किसान मिश्रीलाल राजपूत कुछ समय पहले बनारस के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ वेजिटेबल रिसर्च सेंटर में गए थे. इसी दौरान उन्हें लाल भिंडी के बारे में पता चला और उन्होंने अपने खेत में लाल भिंडी उगाकर भी दिखा दी. वैसे लाल भिंडी यूरोपीय देशों की फसल है, लेकिन अब ये भारत में भी उगने लगी है.

भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान ने इसकी देशी किस्म काशी लालिमा तैयार की है. ये किस्म आसानी से तैयार नहीं हुई, इसे तैयार करने में 8 से 10 साल का समय लगा. भोपाल के किसान मिश्रीलाल वाराणसी से 2400 रुपये में 1 किलो लाल भिंडी का बीज लेकर आए और इसी साल जुलाई के पहले हफ्ते में उन्होंने ये बीज बाए. फिर क्या था, फसल आनी शुरू हुई तो आसपास के किसानों के लिए ये कौतूहर का विषय बन गया. क्योंकि यहां के  लोगों ने पहली बार लाल भिंडी देखी थी. बता दें कि हरी भिंडी की तुलना में इस भिंडी की फसल 45 से 50 दिनों में तैयार हो जाती है. एक पौधे में करीब 50 भिंडी तक पैदा हो जाती है. एक एकड़ जमीन में 40 से 50 क्विंटल लाल भिंडी का उत्पादन हो सकता है. मौसम अच्छा रहा तो ये उत्पादन बढ़कर 80 क्विंटल तक  हो सकता है.

किसान मिश्रीलाल राजपूत ने बताया कि ये भिंडी वो सामान्य बाजार में नहीं बेंचेगे. ये भिंडी स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत फायदेमंद है तो बड़े मॉल्स और सुपरमार्केट में बेचेंगे.  उन्होंने बताया कि बाजार में इसकी कीमत 350 से 400 रुपये में 250 से 500 ग्राम है. एक किलो भिंडी की कीमत 800 रुपये है.

सबसे अच्छी बात इस फसल की ये है कि इसमें मच्छर या अन्य कीड़े नहीं लगते, क्योंकि इसका रंग लाल है. हरे रंग की सब्जियों में क्लोरोफिल पाया जाता है, जो कीटों को पसंद होता है. यही वजह है कि इस लाल भिंडी में कीट नहीं लगते. दूसरी खासियत ये हैं कि इसमें एंथोसाइनिन नाम का एक खास तत्व होता है, जो गर्भवती महिलाओं, चमकदार स्किन और बच्चों के मानसिक विकास के लिए उपयोगी है. यही नहीं लाल भिंडी से हृदय रोग, डायबिटीज और कोलेस्ट्रोल की परेशानियां भी कम होती हैं. (ndtv.in)
 


07-Sep-2021 12:24 PM (68)

 

Vegan Diet: आज कल वीगन डाइट का चलन काफी ज़ोरों पर है. फिट रहने और वजन कम करने के लिए ये डाइट फिटनेस इंडस्ट्री में काफी फॉलो की जाती है. लेकिन बहुत से नॉर्मल लोग ऐसे भी हैं जो वीगन डाइट और इसके फायदे-नुकसान के बारे में नहीं जानते हैं. तो आइये आज हम आपको बताते हैं कि वीगन डाइट क्या है और इसके क्या फायदे और नुकसान हो सकते हैं. आइये जानते हैं इस बारे में.

क्या है वीगन डाइट

वीगन डाइट एक ऐसी डाइट है जिसमें पशु या उनके ज़रिये तैयार किये गए किसी उत्पाद को नहीं खाया जाता है. इनमें डेयरी प्रोडक्ट, दूध, शहद, पनीर, मक्खन, अंडे और मांस जैसी चीजें शामिल हैं. इस डाइट में केवल फलीदार पौधे, अनाज, बीज, फल, सब्ज़ियां, नट्स और ड्राए फ्रूट्स शामिल होते हैं. बहुत लोग इसे वेजिटेरियन डाइट कहते हैं लेकिन यह वेजिटेरियन डाइट से काफी अलग है क्योंकि वेजिटेरियन डाइट में पनीर, मक्खन और दूध, दही जैसी चीजें खाने की मनाही नहीं होती है.

वीगन डाइट के फायदे

वीगन डाइट में एंटी-ऑक्सीडेंट से भरपूर चीज़ें शामिल होती हैं. ये चीजें शरीर का जल्दी बीमार होने से बचाव करती हैं. वीगन डाइट रक्तचाप और मधुमेह जैसी बीमारियों को दूर रखने में भी मदद करती है.

वीगन डाइट में कोलेस्ट्रोल की मात्रा बिल्कुल नहीं होती है. साथ ही इसमें संतृप्त वसा भी काफी कम मात्रा में होती है. इसकी वजह से कई बीमारियों का जोखिम कम होता है. साथ ही दिल के स्वास्थ को बेहतर बनाये रखने में भी ये मदद करती है.

इस डाइट की वजह से पशु-पक्षियों की ज़िंदगी भी सुरक्षित रहती है.

वीगन डाइट पर्यावरण की रक्षा करने में भी मददगार साबित होती है. इसके साथ ही ये आपके कार्बन फुटप्रिंट को भी कम करने में मददगार होती है.

वीगन डाइट आपकी कैलोरी सेवन को कम और प्रोटीन सेवन को बढ़ाकर आपके वजन को कम करने में मदद करती है.

वीगन डाइट के नुकसान

वीगन डाइट के कुछ नुकसान भी हैं. अपनी डाइट से पूरी तरह से पशु उत्पादन चीजों को हटा देने से शरीर में कई तरह के पोषक तत्वों की कमी हो सकती है.

शरीर को कैल्शियम और ओमेगा-3 जैसे विटामिन और मिनरल्स भी नहीं मिल पाते हैं, जो कि ज्यादातर मांस और डेरी प्रोडक्ट्स से प्राप्त होते हैं.

शरीर में पर्याप्त पोषक तत्वों की आपूर्ति के लिए अन्य स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है. जिसके चलते पाचन तंत्र खराब होने की संभावना रहती है.

पर्यावरण और पशु-पक्षियों की सुरक्षा और पर्यावरण के अनुकूल डाइट करने के चलते आपको शारीरिक कमज़ोरी हो सकती है.

आप अगर बाहर खाना खाने के शौक़ीन हैं तो आपके लिए बाहर खाना नामुमकिन सा हो जायेगा, क्योंकि ऐसे कम ही रेस्टोरेंट हैं जो वीगन डाइट परोसते हैं. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

(news18.com)


27-Aug-2021 3:27 PM (192)

कोविड-19 के जिन मरीजों को अस्पताल से छुट्टी मिल गई, उनमें से लगभग आधे मरीज अभी भी कम से कम एक लगातार लक्षण से पीड़ित हैं.

  (dw.com)

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल द लांसेट फ्राइडे में प्रकाशित शोध में कहा गया है कि कोविड-19 के लिए अस्पताल से छुट्टी मिलने वाले लगभग आधे मरीज अभी भी कम से कम एक लगातार लक्षण से पीड़ित हैं. एक साल बाद भी उनमें थकान या मांसपेशियों में कमजोरी रहती है.

महामारी के दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों की बेहतर समझ के लिए किए गए चीनी शोध के मुताबिक कोविड-19 के जिन मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, उनमें से आधे के करीब एक साल बाद भी थकान और सांस की तकलीफ से जूझ रहे हैं.

द लांसेट फ्राइडे में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि कोविड-19 के लगभग आधे मरीजों को अस्पताल से छुट्टी मिलने के एक साल बाद भी वे लगातार कम से कम एक लक्षण से पीड़ित हैं. शोध में कहा गया- मरीजों में सबसे अधिक बार थकान या मांसपेशियों में कमजोरी के लक्षण पाए गए.

एक साल बाद भी गंभीर असर
गंभीर कोविड इंफेक्शन होने के बाद हफ्तों या महीनों तक उसका असर झेलने वाले लाखों लोग हैं. ऐसे लोगों को सुस्ती और थकान से लेकर ध्यान भटकने या सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण हो सकते हैं. लॉन्ग कोविड के रूप में जानी जाने वाली स्थिति पर अब तक के सबसे बड़े शोध में कहा गया है कि निदान के एक साल बाद भी तीन रोगियों में से एक को सांस की तकलीफ है. बीमारी से अधिक गंभीर रूप से प्रभावित रोगियों में यह संख्या और भी अधिक है. 

द लांसेट ने अध्ययन के साथ प्रकाशित एक संपादकीय में कहा, "बिना किसी सिद्ध उपचार या पुनर्वास मार्गदर्शन के लंबे समय तक कोविड मरीजों की सामान्य जिंदगी को यह फिर से शुरू करने और काम करने की क्षमता को प्रभावित करता है."

संपादकीय में कहा गया, "अध्ययन से पता चलता है कि कई मरीजों के लिए कोविड-19 से पूरी तरह से ठीक होने में एक साल से अधिक समय लगेगा."

मध्य चीनी शहर वुहान में जनवरी और मई 2020 के बीच कोरोना वायरस के लिए लिए अस्पताल में भर्ती लगभग 1,300 लोगों पर यह शोध किया गया. कोरोना महामारी वुहान से ही फैला था जिसने करोड़ों लोगों को संक्रमित किया और जो कि 40 लाख से अधिक लोगों की मौत का जिम्मेदार है.

शोध के मुताबिक कम से कम एक लक्षण वाले रोगियों की हिस्सेदारी छह महीने के बाद 68 प्रतिशत से घटकर 12 महीने के बाद 49 प्रतिशत हो गई.

लॉन्ग कोविड एक और चुनौती
शोध कहता है कि छह महीने के बाद 26 प्रतिशत रोगियों में सांस लेने में तकलीफ 12 महीने के बाद बढ़कर 30 प्रतिशत हो गई. शोध में पाया गया कि प्रभावित पुरुषों की तुलना में प्रभावित महिलाओं में थकान या लगातार मांसपेशियों में कमजोरी से पीड़ित होने की संभावना 43 प्रतिशत अधिक है.

लेकिन शोध ने कहा कि रोग निर्णय से पहले काम करने वाले 88 प्रतिशत रोगी एक साल बाद अपनी नौकरी पर लौट आए थे.

संपादकीय में लिखा गया है, "लॉन्ग कोविड पहले क्रम की एक आधुनिक चिकित्सा चुनौती है." इस स्थिति को समझने और इससे पीड़ित रोगियों की बेहतर देखभाल के लिए और अधिक शोध करने की जरूरत है.

एए/वीके (एएफपी)


02-Aug-2021 1:13 PM (338)

1964 के टोक्यो ओलंपिक खेलों के बाद एक घड़ी निर्माता ने बड़ी मात्रा में कदम गिनने वाली मशीनों का निर्माण किया. यहीं से रोजाना 10 हजार कदम चलने का लक्ष्य पैदा हुआ, जो अब ग्लोबल सोच और फिटनेस ट्रैकिंग का हिस्सा बन गया है.

 डॉयचे वैले पर अविनाश द्विवेदी  की रिपोर्ट

ज्यादातर फिटनेस ट्रेकिंग डिवाइस में एक पैमाना होता है, जो बताता है कि स्वस्थ रहने के लिए रोजाना 10 हजार कदम चलना जरूरी है. लेकिन हाल ही में आई एक रिपोर्ट से पता चलता है कि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक वजह नहीं है बल्कि यह पैमाना संयोग और विज्ञापन का नतीजा मात्र है.

हार्वर्ड के टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में महामारी विज्ञान के प्रोफेसर डॉ आई-मिन ली ने गिनकर कदम चलने और इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया है. वह इसके पीछे की पूरी कहानी बताते हैं.

उनके मुताबिक 10 हजार कदम चलने का लक्ष्य 1960 के दशक में जापान में प्रचलित हुआ. 1964 के टोक्यो ओलंपिक खेलों के बाद जापान में फिटनेस के प्रति लोगों की रुचि बढ़ गई थी और इसी का फायदा उठाने के लिए यहां एक घड़ी निर्माता ने बड़ी मात्रा में पीडोमीटर (कदम गिनने वाली मशीन) की निर्माण किया, जिसमें जापानी भाषा में इस तरह नाम लिखा था कि जैसे कोई टहलते हुए आदमी की कलाकृति हो.

मशीन का जो नाम था, उसका एक मतलब 10 हजार कदम भी होता है. यहीं से एक ऐसा लक्ष्य पैदा हुआ, जो न सिर्फ दशकों से चला आ रहा है बल्कि अब ग्लोबल सोच और फिटनेस ट्रैकिंग का हिस्सा भी बन गया है.

भारत में चर्चित है 10 हजार कदम का फॉर्मूला
ऐसा नहीं है कि टहलने का अच्छे स्वास्थ्य से संबंध नहीं है. जानकार मानते हैं कि टहलना स्वस्थ दिल, स्वस्थ हड्डियों और पूरे शरीर की फिटनेस से जुड़ा हुआ है. बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में फिजियोलॉजी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर डॉ कुमार सर्वोत्तम कहते हैं, "अगर कोई हफ्ते में 5 दिन 10 हजार कदम चलता है तो इसे 30 मिनट की सामान्य वर्जिश के बराबर माना जा सकता है. हालांकि यह बात सभी लोगों के शरीर पर एक ही तरह से लागू नहीं होती है क्योंकि शरीर की बनावट, खान-पान की आदतें और अन्य शारीरिक क्रियाएं भी मायने रखती हैं."

वहीं भारतीय न्यूट्रीशियनिस्ट निधि पांडेय कहती हैं, "मैं इस धारणा का समर्थन करती हूं और अपने क्लाइंट्स को 10 हजार कदम चलने के लिए प्रेरित करती हूं. कम से कम इससे लोगों के दिमाग में काम के दौरान अपनी कुर्सियों से उठकर चलने का खयाल बना रहता है. इस लक्ष्य के चलते वे थोड़ा कम लक्ष्य हासिल कर पाते हैं."

8 हजार कदम तक ही स्वास्थ्य को फायदा
साल 2019 में ली और उनके सहकर्मियों ने अपनी एक स्टडी में पाया कि एक महिला जो अपनी उम्र के 70वें दशक में है, वह अगर मात्र 4400 कदम भी चलती है, तो एक महिला जो प्रतिदिन मात्र 2700 कदम चलती है, उसके मुकाबले उसकी मौत की संभावना 40 फीसदी कम हो जाती है.

इसी तरह उन महिलाओं की मौत की संभावना अपेक्षाकृत और कम रही, जो 5 हजार कदम से ज्यादा चल रही थीं लेकिन यह फायदे 7500 कदम प्रतिदिन से ज्यादा चलने पर नहीं बढ़े. यानी वे बुजुर्ग महिलाएं जो करीब 5 हजार कदम ही चल रही थीं, उनके बहुत कम चलने वाली महिलाओं के मुकाबले ज्यादा जीवित रहने की संभावना थी.

कदमों की संख्या के प्रभाव को लेकर एक ऐसी ही स्टडी पिछले साल 5 हजार मध्य उम्र के पुरुषों और महिलाओं पर की गई. अलग-अलग समुदायों से आने वाले लोगों पर की गई इस स्टडी में पाया गया कि अधिक जीने के लिए 10 हजार कदम चलने की कोई बाध्यता नहीं है.

इस स्टडी में सिर्फ यह साबित किया जा सका कि रोजाना 8 हजार कदम चलने वाले लोगों की समय से पहले मौत की संभावना, उन लोगों से आधी हो जाती है, जो रोजाना सिर्फ 4 हजार कदम चलते हैं. इसी स्टडी में पता चला कि 10 हजार या उससे ज्यादा चलने का कोई शारीरिक नुकसान नहीं है लेकिन इससे कोई फायदा भी नहीं है.

रोजाना 10 हजार कदम चलना नामुमकिन
वैसे भी शायद ही हम कभी 10 हजार कदम के लक्ष्य को पूरा कर पाते हैं. एक हालिया स्टडी में पता चला है कि अमेरिका और कनाडा सहित कई पश्चिमी देशों में औसतन लोग रोजाना 5 हजार कदम से भी कम चलते हैं.

मान लेते हैं कि हम रोजाना 10 हजार कदम चलने भी लगें तो यह प्रक्रिया लंबे समय तक जारी नहीं रहेगी. बेल्जियम के गेंट में साल 2005 में स्थानीय लोगों पर इस लक्ष्य से जुड़ी एक चर्चित स्टडी की गई.

660 लोगों पर की गई इस स्टडी में लोगों को 1 साल तक रोजाना 10 हजार कदम चलने का लक्ष्य दिया गया था. इस स्टडी में सिर्फ 8% लोग ही रोजाना 10 हजार कदम चलने में सफल रहे.

वहीं चार साल बाद जब स्टडी का फॉलोअप लिया गया तो पता चला कि कोई भी अब इतना नहीं चल रहा था. ज्यादातर लोग चलने में उसी स्तर पर लौट चुके थे, जितना वे स्टडी शुरू होने से पहले चला करते थे.

टहलना संपूर्ण व्यायाम नहीं
अमेरिका जैसे कुछ देश जो स्वास्थ्य से जुड़े दिशा-निर्देश जारी करते हैं, वे कदमों के बजाए समय को पैमाना बनाते हैं. मसलन अमेरिकी सरकार सलाह देती है कि एक व्यक्ति को हफ्ते भर में 150 मिनट यानी ढाई घंटे व्यायाम करना चाहिए. रोजाना के हिसाब से देखें तो करीब 20-25 मिनट.

स्पष्ट कर दें कि यह व्यायाम दिन के कामों से अलग होना चाहिए. कदमों को लेकर स्टडी करने वाले ली कहते हैं, "इस समय को कदमों में बदलें तो हफ्ते में कुल 16 हजार कदम होते हैं यानी रोज के करीब 2000-3000 कदम. इसे दूरी में बदलें तो करीब 1 मील या 1.6 किमी की दूरी."

ली कहते हैं कि एक सामान्य व्यक्ति अपने दिन भर के काम-काज के लिए करीब 5 हजार कदम रोजाना चलता है. अगर वह 2-3 हजार कदम और चलने लगे तो यह उसके स्वस्थ रहने के लिए अच्छा होगा. यानी किसी इंसान के लिए दिन भर में 7-8 हजार कदम चलना सबसे बेहतर है.

वैसे, ज्यादातर फिटनेस एक्सपर्ट सिर्फ टहलने को ही संपूर्ण व्यायाम नहीं मानते हैं लेकिन यह जरूर कहते हैं कि जब आप बाकायदा व्यायाम न कर पा रहे हों तो इतना भी काफी है. (dw.com)
 


27-Jul-2021 5:30 PM (160)

 

केनबरा. कॉफी को लेकर एक नई रिसर्च चौंकाती है. ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों का कहना है कि रोजाना 6 कप से अधिक कॉफी पीते हैं, तो इसका सीधा असर ब्रेन पर पड़ता है. ज्यादा कॉफी पीने वालों में याद्दाश्त घटने (डिमेंशिया) का खतरा 58 फीसदी तक रहता है. इससे स्ट्रोक का डर भी बना रहता है.

दरअसल, कॉफी में कैफीन नाम का तत्व पाया जाता है. यह सीधे दिमाग के नर्वस सिस्टम पर अपना असर छोड़ता है. नतीजा इंसान रिलैक्स महसूस करने लगता है. लेकिन, जब इसकी मात्रा जरूरत से ज्यादा हो जाती है, तो ये दिमाग पर बुरा असर छोड़ने लगता है. इससे व्यक्ति को नींद न आने की दिक्कत होती है.

वहीं, एक और रिसर्च में कॉफी से आंखों में नुकसान की बात कही गई है. न्यूयॉर्क स्थित माउंट सिनाई के आइकन स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने यह रिसर्च की है. यह रिसर्च ऑप्थेलमोलॉजी नामक जर्नल में छपी है. इस रिसर्च में बताया गया है कि बहुत अधिक मात्रा में कैफीन का इस्तेमाल ग्लूकोमा की आशंका बढ़ा सकता है. रिसर्च के अनुसार, ग्लूकोमा की वजह हमारे खान-पान की आदतें और आनुवांशिक हो सकती हैं. शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि जिन लोगों के परिवार में किसी व्यक्ति को ग्लूकोमा है तो ऐसे लोगों को कैफीन का इस्तेमाल कम करना चाहिए.

अन्य कारण ये भी है कि चाय-कॉफी का ज्यादा सेवन करने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ता है, जो कि आंखों की रोशनी में धुंधलापन का कारण बनता है. कैफीन से ग्लूकोमा होने का सीधा संबंध नहीं है लेकिन यह आंखों में इस तरह की परिस्थितियां बना देता है कि उससे ग्लूकोमा होने का खतरा बढ़ जाता है. (news18.com)


13-Jul-2021 8:13 PM (318)

क्या आपने कभी पहले इतनी खूबसूरत गोभी देखी है. अगर नहीं देखी तो अब देख लीजिए, क्योंकि ये है दुनिया की सबसे विचित्र दिखने वाली गोभी. इसके इतने अनोखे दिखने का कारण  है इसके पिरामिड जैसी आकृति वाला टूटा हुआ फूल. वैज्ञानिकों को अब जाकर इसकी वजह पता चल सकी है कि आखिर क्यों ये गोभी दिखने में इतनी अनोखी है.

साइंस न्यूज के मुताबिक, फ्रेंच नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च के साइंटिस्ट फ्रांस्वा पार्सी और उनके साथियों ने अब यह पता लगा लिया है कि रोमनेस्को कॉलीफ्लावर के फूल इतने विचित्र क्यों होते हैं. इन लोगों ने अपने अध्ययन में पता लगया कि ये गोभी और रोमनेस्को कॉलीफ्लावर में बीच में जो दानेदार फूल जैसी आकृतियां दिखती हैं, वो वाकई में फूल बनना चाहती हैं. लेकिन, फूल बन नहीं पाती. इस वजह से वो कलियों जैसे बड्स में रह जाती हैं. इस वजह से उनकी शक्ल ऐसी दिखती है.

इस गोभी को रोमनेस्को कॉलीफ्लावर कहते हैं. इसके अलावा इसे रोमनेस्को ब्रोकोली के नाम से भी जाना जाता है. बॉटनी यानी वनस्पति विज्ञान की भाषा में इसका नाम ब्रेसिका ओलेरासिया है. जानकारी के मुताबिक, इस प्रजाति के तहत सामान्य गोभी के फूल, पत्ता गोभी, ब्रोकोली और केल जैसी सब्जियां उगती हैं. रोमनेस्को कॉलीफ्लावर सेलेक्टिव ब्रीडिंग का उत्कृष्ट उदाहरण हैं.

फ्रांस्वा पार्सी ने बताया कि रोमनेस्को कॉलीफ्लावर फूल की तरह अपनी पहचान बनाना चाहता है, लेकिन ये असफल होता है. सामान्य गोभी और रोमनेस्को में अंतर सिर्फ इतना ही है कि रोमनेस्को के हर फूल अलग-अलग दिखते हैं, जबकि गोभी के आपस में सटे और ज्यादा चिपके हुए होते हैं. रोमनेस्को कॉली से ज्यादा फूल निकलते हैं, इसलिए वो गोभी से अलग दिखते हैं.

रोमनेस्को कॉलीफ्लावर को खाया जाता है. इसका सबसे पहला उपयोग 16वीं सदी में इटली के कुछ प्राचीन दस्तावेजों में मिलता है. यह आमतौर पर हरे रंग का होता है. इसका स्वाद लगभग मूंगफली जैसा होता है. पकने के बाद यह और स्वादिष्ट लगता है. इसका उपयोग सब्जियों और सलाद में किया जाता है.

रोमनेस्को कॉलीफ्लावर के यही अविकसित फूल वापस से शूट्स बन जाते हैं, वो फिर से फूल बनने का प्रयास करते हैं, लेकिन असफल होते हैं.... यह प्रक्रिया इतनी ज्यादा बार होती है कि एक बड के ऊपर दूसरा, उसके ऊपर तीसरा और फिर इसी तरह ये पिरामिड जैसी हालत बना लेते हैं. ये हरे पिरामिड जैसी आकृति बना लेते हैं.रोमनेस्को कॉलीफ्लावर में भरपूर मात्रा में विटामिन C, विटामिन K, डायटरी फाइबर्स और कैरोटिनॉयड्स होते हैं. ये सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है. अमेरिका और यूरोपीय देशों में इसकी खेती भी की जाती है. इसकी खेती से किसानों को काफी फायदा होता है. (ndtv.in)


12-Jul-2021 2:46 PM (204)

खुद को फिट रखने की चाह में लोग बहुत-कुछ कर रहे हैं. इसी में एक तकनीक है, रोजाना 10 हजार कदम पैदल चलना. अक्सर इसे बेहद फायदेमंद बताया जाता रहा. लेकिन क्या वाकई लोग रोज इतने कदम चलते हैं? नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों, जैसे अमेरिका और कनाडा में ज्यादातर वयस्क कोशिश के बाद भी रोज 5 हजार से कम स्टेप्स तय करते हैं. तो क्या फिट रहने के लिए हर दिन 10 हजार कदम चलना जरूरी है या इसके बगैर भी स्वस्थ रहा जा सकता है?

फिटनेस ट्रैक करने वाले उपकरण अक्सर बताते हैं कि एक वयस्क को हर दिन 10 हजार कदम चलना चाहिए. बहुत से लोग इसपर भरोसा करते हैं और चलने की कोशिश भी करते हैं. कुछ कामयाब होते हैं तो ज्यादातर ये टारगेट पूरा कर ही नहीं पाते. अगर आप भी इनमें से हैं तो परेशान होने की जरूरत नहीं. दरअसल 10 हजार कदम का विज्ञान से कम और संयोग से ज्यादा वास्ता है.

हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में प्रोफेसर डॉ एई मिन ली के मुताबिक, 10 हजार कदम का कंसेप्ट जापान में साठ के दशक में शुरू हुआ था. 1964 में टोक्यो में ओलंपिक के दौरान जापान में सेहत को लेकर लोग काफी कुछ करने लगे थे. तब एक घड़ी निर्माता कंपनी ने ऐसा पेडोमीटर बनाया, जिसपर एक पुरुष चलना हुआ दिखता था, साथ में जापानी भाषा में लिखा था- 10 हजार कदम. ये वॉक का एक टारगेट था, जो यूं ही दिया गया था लेकिन कुछ सालों के भीतर ये दुनियाभर में फैल गया.

फिटनेट के लिए आने वाले ट्रैकर बगैर किसी शोध के डालने लगे कि रोज 10 हजार कदम चलना सेहत के लिए फायदेमंद है. हालांकि विज्ञान कहता है कि सेहतमंद रहने के लिए रोज इतने कदम चलने की जरूरत नहीं. इंडियन एक्सप्रेस में इस बारे में विस्तार से बताया गया है.

एक स्टडी पिछले साल ही की गई. इसमें अलग-अलग देशों से लगभग 5 हजार लोगों ने हिस्सा लिया. युवा से अधेड़ उम्र के इन लोगों के बारे में दिखा कि जो लोग रोज 8 हजार कदम चल रहे थे, दिल के दौरे या इसी तरह की बीमारी से उनकी मौत की आशंका, उनके बराबर थी, जो काफी कम चलते थे. इसका मतलब ये नहीं कि 10 हजार या ज्यादा-कम चलने से कोई नुकसान है, बल्कि बात ये है कि ज्यादा चलने से आप ज्यादा स्वस्थ रहेंगे, ये बात गैर-वैज्ञानिक है.

देखा जाए तो कम ही लोग रोज 10 हजार कदम चल पाते हैं. कनाडा और अमेरिका में सेहत के लिए काफी सचेत लोगों पर हुई एक स्टडी में पाया गया कि अगर इतने कदमों का टारगेट लंबे समय के लिए दिया जाए तो लोग चलना ही बंद कर देते हैं. खुद को टारगेट देकर फिर उसे पूरा न कर पाने से तनाव बढ़ता है, जिससे कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. यही कारण है कि वैज्ञानिक अब 10 हजार कदमों की बजाए छोटे टारगेट पर काम करने को कह रहे हैं. इसके साथ ही व्यायाम और संतुलित भोजन काफी हद तक लाइफस्टाइल के कारण होने वाली बीमारियों से दूर रखता है.

स्टडी के दौरान पाया गया कि अमेरिका और कनाडा जैसे विकसित देशों में लोग ज्यादा आलसी हैं. ये बात पहले भी निकल चुकी है. दो साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें देशों की रैंकिंग जारी कर बताया गया कि उनके नागरिक शारीरिक रूप से कितने सक्रिय हैं. इसमें युगांडा के नागरिक सबसे ज्यादा मेहनती और एक्टिव माने गए. इसकी केवल 5.5 प्रतिशत आबादी पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं है.

168 देशों की सूची में अमेरिका समेत कई संपन्न देश काफी पीछे रहे. उनके यहां आधी से ज्यादा वयस्क आबादी शारीरिक व्यायाम नहीं करती है. भारत में भी हाल खास बेहतर नहीं. हम इसकी रैंकिंग में 117 वें स्थान पर रहे. रिसर्च के अनुसार हमारी आबादी का 34 प्रतिशत पर्याप्त सक्रिय नहीं है.

इससे पहले अमेरिका की स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने भी एक रिसर्च ने भी भारत को भी दुनिया के सबसे आलसी देशों की सूची में डाला था. भारत इन देशों में 39वीं रैंकिंग पर था. हमारे यहां लोग औसतन एक दिन में 4297 कदम चलते हैं. हर दिन सबसे ज्यादा चलने में हांगकांग के लोग हैं. हांगकांग में लोग रोज औसतन 6880 कदम चलते हैं. वहीं इंडोनेशिया के लोग महज 3513 कदम ही चलने के साथ सबसे कम एक्टिव देशों में आए. (news18.com)


11-Jul-2021 2:55 PM (148)

नई दिल्ली, 11 जुलाई | बारिश का मौसम बारिश के साइडिफेक्ट ला सकता है, यह उच्च आद्र्रता के स्तर को भी साथ लाता है जो त्वचा के स्वास्थ्य के लिए बुरा हो सकता है। बेसिक क्लींजिंग टोनिंग और मॉइस्चराइजिंग कभी-कभी विशेष रूप से इस मौसम में पर्याप्त नहीं होते हैं क्योंकि नमी और नीरसता हमारे संकट को बढ़ा देती है। कोलकाता में साल्ट लेक स्थित काया क्लिनिक की सलाहकार और त्वचा एक्सपर्ट डॉ सोहम भट्टाचार्य ने स्वस्थ और चमकती त्वचा के लिए कुछ त्वचा देखभाल सुझाव दिए है।

नियमित रूप से त्वचा की देखभाल विशेष रूप से मानसून के दौरान, आद्र्र मौसम में बहुत महत्वपूर्ण है।

आप क्लीन्जर और फेस वॉश का उपयोग कर सकते हैं जो साबुन मुक्त होते हैं, जिनमें आपकी त्वचा के लिए कोमल तत्व होते हैं। अल्कोहल मुक्त टोनर के साथ इसका पालन करें। मानसून के लिए जोजोबा तेल युक्त मॉइस्चराइजर का उपयोग कर सकते हैं।

अपनी त्वचा के प्रकार के अनुसार 15 से 50 तक के एसपीएफ वाले सनस्क्रीन को कभी न भूलें। सनस्क्रीन हमेशा बाहरी या हल्के एक्सपोजर से 20 मिनट पहले लगाना चाहिए।

इस मौसम के लिए क्लींजिंग और टोनिंग के बाद रात में हमेशा विट सी फॉमूर्ला वाला सीरम लगाएं और उसके बाद हल्की नाइट क्रीम लगाएं।

हमेशा आंखों के नीचे के क्षेत्र पर विशेष ध्यान दें और रात में इसे हाइड्रेट और पोषित रखें, जिसमें सक्रिय सोया और राइस पेप्टाइड्स युक्त ब्राइटनिंग और फमिर्ंग आई सीरम हो।

जैसा कि हम में से अधिकांश लोगों को इस मौसम में थोड़ा अधिक पसीना आता हैं, अपनी त्वचा और शरीर को हाइड्रेट रखने की कोशिश करें। एंटीऑक्सिडेंट, सलाद, फल, सब्जियों के रस से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करें। एक स्वस्थ कसरत व्यवस्था बनाए रखें।

आरामदायक कपड़े अधिमानत सूती या लिनन पहनें।

एल ऑकिटेन के राष्ट्रीय प्रशिक्षक देबाबनी गुहा सुझाव देते हैं,

छूटना कुंजी है। - हफ्ते में कम से कम दो बार एक्सफोलिएट करें और उसके बाद जेल बेस्ड मास्क लगाएं। मेरी प्राथमिकता हमेशा रात में स्क्रब और मास्क का उपयोग करना है क्योंकि तब त्वचा आराम करती है और उसके बाद सुबह प्रभाव शानदार होता है!

साथ ही दिन में दो बार स्किनकेयर रेजिमेंट का इस्तेमाल करना न भूलें।

एक प्राकृतिक फेस उयाल (तेल) का प्रयोग करें जो त्वचा की कोशिकाओं को पोषण देता है और कोशिकाओं को नरम चमकदार दिखने के लिए मोटा होने में मदद करता है। (आईएएनएस)
 


09-Jul-2021 6:01 PM (132)

 

World Population Day 2021 : हर साल 11 जुलाई को दुनिया भर में वर्ल्‍ड पॉपुलेशन डे मनाया जाता है. इसका उद्देश्‍य दुनियाभर में आबादी से जुड़ी समस्‍याओं के प्रति लोगों को जागरुक करना है. जागरुकता के तहत फैमिली प्‍लानिंग, जेंडर इक्‍वैलिटी, गरीबी, मेटरनल हेल्‍थ और मानवाधिकार से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की जाती है. हमारे देश के लिए भी बढ़ती आबादी कई समस्‍याओं का कारण बनती जा रही है. इसकी वजह बर्थ कंट्रोल से जुड़ी जानकारियों का अभाव भी माना जाता है. दरअसल हमारे देश में बर्थ कंट्रोल के रूप में सबसे ज्‍यादा प्रचलन नसबंदी, कॉन्डम और गर्भनिरोधक गोलियां ही हैं. जबकि एनएचएसयूके के मुताबिक, ऐसे बहुत से गर्भनिरोधक तरीके भी हैं जिनके बारे में लोगों की जागरूकता सीमित है. तो आइए आज जानते हैं कि बर्थ कंट्रोल के अन्य क्‍या क्‍या तरीके हैं जिसे आसानी से अपनाया जा सकता है.

1.कॉन्डम का प्रयोग

यह लेटेक्स या पॉलीयूरिथेन से बना हुआ पुरुष गर्भनिरोधक का तरीका है जो बर्थ कंट्रोल के साथ साथ यौन संचारित रोगों जैसे एचआईवी/एड्स से भी सुरक्षित रखता है.

2.फीमेल कॉन्डम का प्रयोग

यह गर्भनिरोधक स्त्रियों की योनि में लगाया जाता है जो स्पर्म को कॉन्डम के अंदर रखता है और उसे यूट्रस के अंदर जाने से रोकता है. यह भी यौन संचारित रोगों से बचाव करता है.

3.डायाफ्राम का प्रयोग

डायाफ्राम दरअसल लेटेक्स या सिलिकॉन से बना हुआ एक लचीली रिम वाला कप होता है जो डॉक्‍टरों की सलाह लेकर योनि के अंदर फिट किया जाता है जिससे अंडे फ़र्टिलाइज़ ना हो सके. बता दें कि सेक्स के बाद डायाफ्राम को कम से कम 6 घंटों तक योनि के भीतर ही रखा जाता है.

4.वजाइनल रिंग का प्रयोग

यह एक छोटी सी प्लास्टिक की रिंग होती है जिसे योनि के अंदर लगाया जाता है.  वजाइनल रिंग एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टोजेन जैसे हारमोंस को लगातार रक्त में मिलाती रहती है जिससे प्रेगनेंसी को रोका जा सकता है.

5.इंट्रायूटरिन डिवाइस का प्रयोग

यह लंबे समय तक चलने वाला गर्भनिरोध है.  यह कॉपर और हार्मोनल दोनों प्रकार के होते हैं और तीन साल से बारह साल तक इसे इस्तेमाल किया जा सकता है.

6.गर्भनिरोधक गोलियों का प्रयोग

गर्भनिरोधक गोलियां दरअसल दो प्रकार की होती हैं. एक है संयुक्त गोली जिसमें एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टोजेन हार्मोन होते हैं जबकि दूसरा है जिसमें केवल प्रोजेस्टोजेन हार्मोन होते हैं.  इन दोनों को दिन में एक बार रोज सेवन करना होता है.

7.इमरजेंसी गर्भनिरोधक गोलियां

इसे असुरक्षित यौन संबंध होने पर 72 घंटों के भीतर लेना होता है.  इसमें मौजूद हार्मोन सिंथेटिक होता है इसलिए यह शरीर के लिए हार्मफुल भी होता है.

8.पुरुष नसबंदी

एक एक छोटा सा ऑपरेशन होता है जिसमें पुरुषों की उस ट्यूब को काट दिया जाता है जो स्पर्म को वृषण से लिंग तक पहुंचाता है.  इस प्रक्रिया के बाद सेक्स पर कोई भी असर नहीं पड़ता. यह उपाय स्थाई है.

9.महिला नसबंदी

यह भी एक स्थाई उपाय है जिसमें ऑपरेशन की मदद से फैलोपियन ट्यूब को अवरुद्ध कर दिया जाता है जिससे अंडे गर्भ तक नहीं पहुंचते और महिला गर्भवती नहीं होती.

10.गर्भनिरोधक इंजेक्शन

इसे एक महीने में या फिर तीन महीने में एक बार डॉक्टर की सलाह पर लगवाना पड़ता है.  यह गर्भनिरोधक गोलियों की तरह ही काम करता है.  इसका असर 8 से 13 सप्ताह तक बना रहता है.

11.गर्भनिरोधक प्रत्‍यारोपण

गर्भनिरोधक प्रत्यारोपण छोटी और पतली प्लास्टिक की रॉड होती है जिसे महिला की बांह की अंदरूनी त्वचा में फिट किया जाता है.  इसमें ईटोनोगेस्ट्रेल हार्मोन होते हैं जो धीरे-धीरे रक्त में मिलता रहता है.  यह अधिकतर 4 साल तक के लिए गर्भावस्था से सुरक्षा प्रदान करता है.

12.गर्भनिरोधक पैच

यह एक प्रकार का गर्भनिरोधक पैच होता है जिसे महिला अपने पेट, पीठ, बाँह और कूल्हे पर लगा सकती हैं.  इसमें एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोजेन हार्मोन होते हैं जो अंडों को अंडाशय से बाहर नहीं निकलने देते. एक पैच तीन सप्ताह तक सुरक्षा प्रदान करता है. (news18.com)


27-Jun-2021 8:57 AM (295)

बचपन में ट्रेन का सफर...यानी खूब सारी मूंगफली खाने की आजादी. जी हां, दरअसल मूंगफली ना केवल स्‍वाद में बेहतरीन होती है, ये सेहत के मामले में भी कई ड्राइफ्रूट्स से आगे है. वेबएमडी के मुताबिक, कई लोग इसे ड्राइफ्रूट समझते हैं लेकिन दरअसल ये फलियों जैसे सोयाबीन, मटर, दाल आदि के वर्गीकरण में आता है. इसका प्रयोग हम भूनकर, चटनी के रूप में या अन्‍य तरीके से भी करते हैं लेकिन अगर आप इसे रात भर पानी में भिगोकर सुबह इसका सेवन करें तो यह सेहत को कहीं ज्‍यादा फायदा पहुंचा सकता है. आइए जानते हैं कि इसके क्‍या क्‍या फायदे हैं.

हार्ट को रखता है हेल्‍दी

मूंगफली में कार्डियो प्रोटेक्टिव गुण पाया जाता है. ऐसे में जो लोग इसका नियमित सेवन करते हैं उन्‍हें दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम होता है. यह कोलेस्‍ट्रॉल को ठीक करता है और स्‍मॉल ब्‍लड क्‍लॉट की समस्‍या को होने से रोकता है जिससे हार्ट अटैक और स्‍ट्रोक का खतरा नहीं होता.
इसे भी पढ़ें : फलों और सब्जियों के छिलकों में भी हैं कई गुण, भूलकर भी न फेंकें, जानें फायदे

ब्रेन को रखता है हेल्‍दी

मूंगफली में ओमेगा-3 फैटी एसिड पाया जाता है. यह एक ऐसा फैटी एसिड है जो दिमाग की कार्यक्षमता को बढ़ाता है जिससे  मेमोरी अच्‍छी होती है. ऐसे में बच्‍चों को नाश्‍ते में रोज सुबह भीगी हुई मूंगफली नियमित रूप से खिलाना चाहिए.

स्किन के लिए अच्‍छा

मूंगफली में एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाई जाती है जो स्किन को एजिंग से बचाता है और स्किन को हेल्‍दी रखने में मदद करता है.

बॉडी बिल्डिंग के लिए

जो लोग बॉडी बिल्डिंग करते हैं उन्‍हें रोज सुबह भीगी मूंगफली का सेवन करना काफी फायदेमंद हो सकता है. इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन होता है जो मसल्‍स को बनने में मदद करता है.

पाचनतंत्र को रखता है ठीक

इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर होता है जो पाचन क्रिया को सुचारू रूप से चलाने में मददगार  होता है. इसका सेवन करने से आपका पाचन तंत्र ठीक तरह से काम करता है और पेट से जुड़ी कई समस्याएं दूर रहती हैं. (news18.com)


25-Jun-2021 12:37 PM (154)

पर्याप्त नींद इंसान के शरीर की जरूरत है. डॉक्टर भी सामान्य इंसान को 6 से 8 घंटे की नींद लेने की सलाह देते हैं. पर्याप्त नींद लेने से बॉडी क्लॉक सही रहती है और इसका प्रभाव हमारी पूरी जीवनशैली पर व्यापक तरीके से पड़ता है. वहीं अगर रात में बेहतर नींद नहीं आती है तो यह कई सारी शारीरिक और मानसिक समस्याओं की वजह बन सकता है. सीएनएन हेल्थ पर प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जो लोग रात में ठीक से नहीं सो पाते हैं या कम नींद लेते हैं उनमें डिमेंशिया नामक बीमारी होने का रिस्क काफी बढ़ जाता है. इसके अलावा भी कम नींद लेने से बॉडी क्लॉक पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिसके कारण कई ऐसे कारण पैदा हो जाते हैं जो जल्दी मौत की वजह बनते हैं.

इस सिलसिले में हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मेडिसिन इंस्ट्रक्टर रेबिका रोबिन्सन का कहना है कि स्टडी में जो तथ्य सामने आए हैं उन्हें देखते हुए ऐसा लगता है कि हर रात की नींद हमारे जीवन के लिए बेहद अहम है. पूरी नींद लेने से हमारा न्यूरोलॉजिकल सिस्टम ठीक तरह से काम करता है और असमय मौत का खतरा भी काफी कम हो जाता है. विश्व भर में कम नींद लेने के कारण और डिमेंशिया के कारण जल्दी होने वाली मौतों के बीच की कड़ी एक्सपर्ट्स के लिए वाकई परेशान करने वाला है.

वर्ल्ड स्लीप सोसायटी का इस सिलसिले में कहना है कि विश्व की 45 प्रतिशत जनसंख्या के लिए कम नींद लेना वाकई सेहत के लिए काफी खतरनाक है. रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि, 5 से 7 करोड़ अमेरिकी नागरिक स्लीप डिसऑर्डर, स्लीप एप्निया, इंसोमेनिया और रेस्टलेस लेग सिंड्रोम जैसी बीमारियों का शिकार है. सीडीएस ने इसे पब्लिक हेल्थ प्रॉब्लम करार दिया है. इसकी वजह है कि कम नींद लेने की इस समस्या का जुड़ाव शुगर, स्ट्रोक, कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों और डिमेंशिया से भी है.

एक्सपर्ट्स ने इस स्टडी के लिए साल 2011 से 2018 के बीच कई लोगों की स्लीपिंग हैबिट का डाटा जुटाया और इसकी जांच की. यह बात सामने आई कि जिन लोगों की अनिद्रा की शिकायत थी उन्हें लगभग हर रात ऐसे परेशानियों को झेलना पड़ रहा था. बता दें कि जर्नल ऑफ स्लीप रिसर्च में छपी इस शोध का विश्लेषण नेशनल हेल्थ एंड एजिंग स्टडी द्वारा किया गया है. (news18.com)


25-Jun-2021 12:36 PM (126)

 

बहुत सारे लोग नहाते समय बॉडी क्लीनिंग के लिए लूफा का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन इसके इस्तेमाल का सही तरीका नहीं जानते हैं. जिसकी वजह से शरीर को वो फायदे नहीं मिल पाते हैं जो कि मिलने चाहिए. अब आप सोच रहे होंगे कि लूफा के इस्तेमाल से भला क्या फायदे हो सकते हैं. तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि लूफा इस्तेमाल करने के कई सारे फायदे होते हैं. आइये जानते हैं इसके बारे में.

ब्लड सर्कुलेशन बेहतर बनाता

नहाते समय लूफा का इस्तेमाल करने से बॉडी में ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है. जब आप लूफा के ज़रिये अपने स्किन की क्लीनिंग करते हैं तो ये स्क्रब के तौर पर बॉडी मसाज का काम करता है जो ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाता है. इससे स्किन में कसाव आता है जिससे स्किन में चमक भी बढ़ती है.

डेड स्किन हटाता

लूफा बॉडी के डेड स्किन सेल्स को हटाकर नए सेल्स बनाने में मदद करता है. इससे स्किन कोमल और मुलायम होती है साथ ही इससे स्किन में ग्लो भी आता है.

बॉडी क्लीन कर स्किन पोर्स खोलता 

पसीने और धूल-मिट्टी की वजह से बॉडी पर गंदगी जमा हो जाती है. लूफा इस गंदगी को हटाकर स्किन को क्लीन करता है. इससे स्किन पोर्स भी खुलते हैं जिसकी वजह से मुंहासे और दाने जैसी दिक्कत भी नहीं होती है.

बॉडी के बैक पार्ट्स क्लीन करता

नहाते समय बॉडी के बैक पार्ट्स को अच्छी तरह से अपने हाथों से क्लीन करना बहुत मुश्किल होता है. क्योंकि वहां हाथ पहुंचना आसान नहीं होता है. खासकर पीठ पर. लूफा आपकी बॉडी के बैक पार्ट्स को भी अच्छी तरह से क्लीन करता है. जिससे गंदगी के साथ बैक्टीरिया भी दूर होते हैं.

ऐसे करें इस्तेमाल

ड्राई लूफा को बॉडी पर कभी इस्तेमाल न करें. इससे स्किन रगड़ सकती है और रैशेज़ हो सकते हैं. लूफा को इस्तेमाल करने से पहले इसको सबसे पहले पानी से भिगो लें. जब ये अच्छी तरह से भीग जाये तब इस पर थोड़ा सा लिक्विड बॉडी वॉश लगाएं. फिर इसके ज़रिये अपनी बॉडी को हल्के हाथों से स्क्रब करें. अगर आप लिक्विड बॉडी वॉश का इस्तेमाल नहीं करते हैं तो आप पहले बॉडी पर बाथ सोप लगा लें फिर इससे पूरी बॉडी को स्क्रब करें.

लूफा के इस्तेमाल में बरतें ये सावधानियां

नहाने के बाद लूफा को अच्छी तरह से धोकर सूखने रख दें वरना इस पर फंगस होने और बैक्टीरिया पनपने का खतरा होता है.

हर हफ्ते लूफा को डिटॉल या सेवलॉन के पानी से ज़रूर साफ़ करें.

अगर आप नेचुरल लूफा का इस्तेमाल करते हैं तो इसको हर महीने बदलना न भूलें.

अगर प्लास्टिक का लूफा इस्तेमाल करते हैं तो इसको दो-तीन महीने पर ज़रूर बदल दें.

अपने लूफा को किसी और के साथ कभी शेयर न करें.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.) (news18.com)


15-Jun-2021 9:30 AM (214)

 

कोरोना महामारी के दौर में हर कोई फेफड़ों को मजबूत बनाने की सलाह ले रहा है. फेफड़ा हमारे शरीर को शुद्ध ऑक्सीजन से भरता है और इसी पर शरीर की प्रत्येक गतिविधियां निर्भर करती हैं. ऐसे में अगर व्यायाम की मदद से हम इन्‍हें मजबूत रखें तो कोरोना संक्रमण के बाद भी शरीर में ऑक्सीजन के बेहतर आपूर्ति के लिए फेफड़े पहले से तैयार रहेंगे. इसके लिए आप ब्रीदिंग एक्सरसाइज, कार्डियो एक्सरसाइज आदि कर इसकी कैपेसिटी को बढ़ा सकते हैं और लाइफस्टाइल में बदलाव लाकर अपने फेफड़ों को सपोर्ट दे सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि हम अपने फेफड़ों की कैपेसिटी को बढ़ाने के लिए  डेली रुटीन में किन गतिविधियों को शामिल करें.

इस तरह करें ब्रीदिंग एक्‍सरसाइज

एक हाथ अपनी छाती पर और दूसरा पेट पर रखें. नाक से सांस लेते समय फेफड़ों में हवा खींचे और ध्यान दें कि इस समय पेट फूलता जाए.  इसके बाद, सांस को छाती में भर लें. इसे 5 से 20 सेकंड तक होल्ड करें और फिर पेट संकुचित होने तक मुंह से धीरे-धीरे सांस छोड़ते जाए. इसे पांच बार रिपीट करें. इससे आपको पता चलेगा कि एक बार में आप कितनी हवा खींच सकते हैं. इससे ज्यादा गहरी सांसे भरना सीखने में भी मदद मिलेगी. रोज सांस रोकने की समय सीमा को बढ़ाते जाएं.

कार्डियोवास्कुलर एक्सरसाइज करें

दिन में कम से कम 30 मिनट तक कार्डियो एक्सरसाइज करें. ऐसी कार्डियो चुनें जो आपकी हार्ट रेट बढ़ा दे और जिससे सांस तेजी से चलने लगें. कार्डियो, हार्ट को मजबूती देते हुए फेफड़ों के फंक्शन को सुधार देता है. एक स्ट्रोंग हेल्दी हार्ट रक्त को ज्यादा बेहतर तरीके से पंप कर सकता है और ऑक्सीजन को पूरे शरीर में ले जा सकता है. इसके लिए आप एरोबिक्स, साइकिलिंग, दौड़ें, डांस करें वॉटर एरोबिक्स करें और जम्पिंग जैक और लेग लिफ्ट्स करें.

हंसें और गाएं

हेल्‍दी फेफड़ों के लिए जोर जोर से हंसना और गाना जरूरी है. ये आपके फेफड़ों की क्षमता तो बढ़ाते ही हैं आपके शरीर में ज्यादा से ज्यादा फ्रेश एयर जाती है. गाना गाने से डायाफ्राम की मांसपेशियां काम करती है, जिससे फेफड़ों की कैपिसिटी बढ़ती है.

फूंकने वाला इंस्ट्रूमेंट बजाएं

विंड इंस्ट्रूमेंट्स मनोरंजन तो करता ही है आपके फेफड़ों की नियमित एक्सरसाइज भी कराता है. लकड़ी की बांसुरी या बांस के इंस्ट्रूमेंट का इस्तेमाल करें. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.) (news18.com)


25-May-2021 7:29 PM (274)

 

कोरोना संक्रमण से देशभर में अफरातफरी है वहीं कई राज्‍यों में ब्‍लैक फंगल ने आतंक मचा रखा है. यह पाया जा रहा है कि जिन लोगों को डायबिटीज की समस्‍या है वे ब्‍लैक फंगल की चपेट में अधिक आ रहे हैं. ऐसे में खुद को डायबिटीज से बचने और अपना ब्‍लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने के लिए लोग हर संभव प्रयास कर र‍हे हैं. हालांकि डायबिटीज को लाइफस्‍टाइल मॉडिफिकेशन और मेडिकेशन की मदद से कंट्रोल किया जा सकता है लेकिन मेडिकल न्‍यूज टुडे के मुताबिक, कुछ घरेलू उपाय हैं जिनको अपनाकर आप टाइप टू डायबिटीज में सुधार ला सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि अपने ब्‍लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने के लिए किन घरेलू उपायों की मदद ले सकते हैं.

1.एलोवेरा का प्रयोग

एलोवेरा एक ऐसा प्‍लांट है जिसका कई अलग अलग चीजों में प्रयोग किया जाता है. ज्‍यादातर लोग इसे स्किन केयर के लिए प्रयोग करते हैं लेकिन आपको बता दें कि यह डायबिटीज टाइप टू को कम करने में काफी कारगर है. इसमें एंटीऑक्सिडेंट गुण होते हैं जो बीटा सेल्‍स को रिपेयर करने में काफी काम आते हैं. इसका प्रयोग आप स्‍मूदी या कैप्‍सूल के रूप में कर सकते हैं.

2.दालचीनी का सेवन
घर घर की रसोई में मिलने वाली दालचीनी का सेवन ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल रख सकता है. ऐसे में आप सुबह की चाय से पहले इसका रोजाना सेवन करें. अगर आप 1 ग्राम दालचीनी का सेवन रोज करते हैं तो यह आपको डायबिटीज से दूर रख सकता है.

3.सहजन के पत्तियों का प्रयोग

सहजन का आयुर्वेद में काफी महत्‍व है. इसे मोरिंगा भी कहा जाता है. आयुर्वेद के मुताबिक, अगर आप सहजन के फलों के साथ साथ उनकी पत्तियों का भी सेवन करें तो यह आपके ब्‍लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखता है और आप डायबिटीज से बचे रहते हैं. जिन लोगों को डायबिटीज की समस्‍या है वे भी इसके सेवन से अपने ब्‍लड शुगर लेवल को कंट्रोल रख सकते हैं.

4.नीम की पत्तियां

नीम की पत्तियों में इंसुलिन रिसेप्टन सेंसिटिविटी बढ़ाने का गुण होता है. यही नहीं, यह शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को भी ठीक रखने में मदद करता है जिससे आपका ब्लड शुगर कंट्रोल में रहता है. ऐसे में डायबिटीज के मरीजों को  रोजाना खाली पेट नीम की पत्तियों का रस पीना चाहिए. जिन लोगों को डायबिटीज नहीं है वह भी अगर इसका सेवन करें तो डायबिटीज से बचे रह सकते हैं.

5.तुलसी के पत्‍तों का प्रयोग

अगर आप डायबिटीज से बचना चाहते हैं तो आपको रोज खाली पेट 2 से 3 तुलसी की पत्तियों को चबाना चाहिए. दरअसल इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सिडेंट तत्‍व पाए जाते हैं जो शरीर में इंसुलिन रिलीज करने और स्‍टोर करने वाली कोशिकाओं को हेल्‍दी रखने में मदद करता है.

6.मेथी का प्रयोग

मेथी भी घर घर के किचन में मिलता है. ऐसे में अगर आप चाहें तो इसका रोजाना सेवन कर ब्लड शुगर को कंट्रोल कर सकते हैं. आप अगर रात को सोने से पहले एक गिलास पानी में 1 चम्मच मेथी दाना भिगो कर रख दें और सुबह खाली पेट इस पानी का सेवन करें तो यह काफी फायदेमंद है. (news18.com)


25-May-2021 8:05 AM (204)

Eye Healthcare Tips : हमारा देश कोरोना महामारी के भयानक दौर से गुजर रहा है. रोजाना हजारों लोग जान से हाथ धो रहे हैं.  ऐसे में घर के अंदर ही लोगों की जिंदगी कैद हो गई है. दफ्तर का काम हो या स्‍कूल कॉलेज, सारी चीजों के लिए लैपटॉप और मोबाइल पर निर्भरता बढ़ी है. यही नहीं, शारीरिक गतिविधियां भी पहले की तुलना में कई गुना कम हो गई हैं. आर्टीफीशियल लाइट्स के अंदर 24 घंटे रहना हमारी आंखों की सेहत को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं. ऐसे में कुछ बुनियादी बातों को अगर हम फॉलो करें तो अपना और परिवार के अन्‍य सदस्‍यों की आंखों का ख्‍याल रख सकते हैं.

1.ब्रेक दें आंखों को

आर्टीफीशियल ब्‍लू लाइट्स से ब्रेक आंखों के लिए बहुत जरूरी है. आप दिनभर में कम से कम 4 से 5 बार अपनी खुली बालकनी या खिड़कियों पर जाने की आदत डालें. अगर आपके पास बालकनी नहीं है तो एक कप चाय या कॉफी या जूस के साथ अपनी खिड़की के पास खड़े होकर दूर तक निहारें. आप ऐसा 2 से 3 मिनट तक कर सकते हैं.

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2.कूलिंग जरूरी

स्‍क्रीन पर आंखों को टिकाएं. आंखों के आस पास की नसें और टिश्‍यू तनाव में आ जाती हैं. ऐसे में इन्‍हें रिलैक्‍स करना बहुत जरूरी है. आप इसके लिए खीरे का टुकड़ा या रूई में गुलाबजल डालकर आंखों पर रखें और 5 मिनट तक ऐसे ही रिलैक्‍स करें. इससे आसपास के सेल्‍स हाइड्रेट होंगे और थकान दूर होगी.

3.फिटनेस के लिए निकालें समय

बॉडी के साथ साथ आंखों की फिटनेस भी जरूरी है. इसके लिए कुछ आई एक्‍सरसाइज करें. अपनी आंखों को चारों तरफ़ गोल-गोल घुमाएं. दस बार ऐसा करें. इसके बाद आंखों को दस बार ऊपर और नीचे घुमाएं. अपनी पलकों को लगातार झपकाएं और फिर आंखें दबाकर बंद करें. दस तक गिनें और आंखें खोलें.

4.कम रोशनी में मोबाइल टीवी से रहें दूर

अगर आप अंधेरे घर में लैपटॉप या मोबाईल पर काफी देर से काम करते हैं तो आपकी यह आदत आंखों को अतिरिक्‍त तनाव देता है. आई एक्‍सपर्ट की मानें तो हमेशा बैठकर, खास दूरी से और रोशनी में ही इनका प्रयोग करें. टीवी के साइड बैठने की बजाय बिलकुल सामने बैठकर ही देखें.

5.भोजन में शामिल करें ये चीजें

प्‍लांट बेस्‍ड भोजन आंखों के लिए अच्‍छे होते हैं. इसके अलावा, तरह तरह के बेरीज़, रंगबिरंगे फल, फिश, अंडे आदि का प्रयोग करें. जिंक, विटामिन ए, एंटीऑक्‍सीडेंट रिच फूड आदि का रोजाना सेवन करें.

6.ब्‍लड ग्‍लूकोज और ब्‍लड प्रेशर को रखें मेंटेन

अपने ब्‍लड ग्‍लूकोज लेवल को मेंटेन रखें. इनकी वजह से आंखों में कई समस्‍याएं शुरू हो सकती हैं. इसके अलावा घर पर भी एक्टिव रहें और हेल्‍दी भोजन करें. ऐसा करने से वजन नियंत्रित रहेगा और ब्‍लड प्रेशर भी ठीक रहेगा. ये सभी हेल्‍दी आई साइट के लिए बहुत जरूरी है.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)


24-May-2021 8:09 AM (211)

कोरोना संक्रमण का दौर जारी है. लोग कोरोना से बचने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं. यही नहीं, संक्रमण से बचने के लिए बताए जा रहे खान पान और लाइफ स्‍टाइल को भी लोग फॉलो कर रहे हैं. जिन लोगों को कोरोना हो चुका है और वे रिकवरी प्रोसेस में हैं उन्‍हें डाइट में पनीर खाने की सलाह दी जा रही है. दरअसल पनीर को सुपरफूड की कैटेगरी में रखा गया है जो कोरोना से रिकवरी में प्रोटीन की कमी को पूरा करता है. यह हमारे बोन्‍स और मसल्‍स के साथ साथ हमारे ब्रेन के लिए भी बहुत ही फायदेमंद है. हेल्‍थशॉट्स के मुताबिक, यह कोरोना रिकवरी में काफी फायदेमंद साबित हो रहा है.

शरीर के लिए क्‍यों जरूरी है पनीर

कोरोना संक्रमण से रिकवरी के लिए शरीर को प्रोटीन की बहुत आवश्‍यकता होती है. प्रोटीन डैमेज टिशू को जल्‍दी ठीक करता है जिससे रिकवरी फास्‍ट होता है. ऐसे में  पनीर प्रोटीन से भरपूर होता है और इसमें मौजूद अमीनो एसिड  खतरनाक पैथोजन से सुरक्षा प्रदान करता है. ऐसे में जो लोग रिकवरी प्रोसेस में हैं उन्‍हें रोजाना 75 से 100 ग्राम पनीर का सेवन जरूर करना चाहिए.

कब खाएं पनीर

अगर आप चाहें तो पनीर का सेवन कभी भी कर सकते हैं लेकिन अगर आप इसे ब्रेकफास्‍ट और लंच से 1 घंटा पहले खाएं तो यह काफी फायदेमंद होगा. इसके अलावा, आप इसे रात को सोने से 1 घंटे पहले भी खा सकते हैं. इससे आपको भरपूर एनर्जी मिलेगी और शरीर को जरूरत के हिसाब से प्रोटीन भी मिल पाएगा. इसे पचाना भी आसान होता है.

अत्‍यधिक पनीर भी खतरनाक

अगर आप जरूरत से ज्‍यादा पनीर खाएंगे तो यह आपके सेहत के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है. बता दें कि पनीर दूध से बना होता है जिसके अ‍धिक सेवन से कोलेस्‍ट्रॉल बढ़ने का खतरा हो सकता है.

पनीर के अन्‍य फायदे

पनीर में प्रोटीन के अलावा कैल्शियम, फॉस्फोरस, फोलेट, विटामिन डी जैसे न्यूट्रीएंट्स होते हैं जो बच्चों और बड़ों की सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद है. इसमें मौजूद कैल्शियम और फॉस्फोरस हड्डियों के लिए जरूरी हैं और आर्थराईटिस जैसी बीमारियों के बचाव में सहायक है. इसमें पाया जाने वाला सेलेनियम नामक एंटी ऑक्सीडेंट लंबे समय तक हेल्दी रखता है और बॉडी में एजिंग को स्लो करता है.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.) 

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