सेहत / फिटनेस

Date : 14-Jan-2020

व्रत या उपवास भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। यह धर्म से तो जुड़ा ही है, सेहत के लिए भी बहुत कारगर है। www.myupchar.com से जुड़ीं डॉ. मेधावी अग्रवाल के अनुसार, उपवास से पाचन तंत्र को फायदा पहुंचता और इससे वजन घटाया जा सकता है। इससे शरीर के विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जाते हैं। जिन लोगों को ब्लड प्रेशर की समस्या रहती है, उनके लिए उपवास फायदेमंद हो सकता है। साथ ही यह हार्ट को स्वस्थ्य रहता है। शरीर में संतुष्टि का भाव जगाता और व्यक्ति तरोताजा महसूस करता है।

www.myupchar.com से जुड़े डॉ. लक्ष्मीदत्त शुक्ला कहते हैं, 'जो लोग वजन घटाना चाहते हैं, उनके लिए उपवास रामबाण साबित हो सकता है। ऐसे लोगों को जल उपवास करना चाहिए। इससे 10 दिन में 6 किलो तक वजन कम किया जा सकता है।' उपवास करने के लाभ हैं तो सही तरीके से उपवास न करने के कुछ नुकसान भी हैं। इसलिए सोच-समझकर इसका फैसला करना चाहिए।

उपवास के लाभ
डॉ. अग्रवाल के मुताबिक उपवास शरीर के सिस्टम को साफ करता है, स्वास्थ्य बेहतर होता है, नींद का चक्र सुधरता है, पाचन तंत्र को थोड़ा आराम मिलने से शारिरिक प्रणालियां संतुलित हो जाती हैं, मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है और साथ ही फायदेमंद आहार ओर  शारीरिक पोषण तय करने संबंधी जानकारी मिलती है।

उपवास कब और कैसे रखें
यूं तो उपवास कभी भी रखा जा सकता है, लेकिन यदि स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या है तो इससे बचना चाहिए। उपवास के दौरान लोग तरह-तरह की चीजें खाते हैं या खाली पेट बहुत अधिक चाय पीते हैं। इससे फायदा होने के बजाए नुकसान हो सकता है। उपवास में सबकुछ खाना छोड़ सकते हैं या कुछ खाद्य पदार्थ छोड़ सकते हैं। उपवास एक दिन से लेकर कुछ हफ्तों तक का हो सकता है। उद्देश्य के अनुसार उपवास कई तरह के हो सकते हैं जैसे - कुछ लोग केवल पानी का सेवन करते हैं, कुछ पानी के साथ जूस और चाय का सेवन करते हैं। आमतौर पर जो उपवास रखा जाता है, उसमें लोग अन्न व मांसाहार से दूर रहते हैं। धार्मिक आस्था और मान्यताओं को ध्यान में रखकर किए जाने वाले उपवास में खाने-पीने की कुछ चीजें चलती हैं, कुछ नहीं।

उपवास के दौरान क्या खाएं
अगर उपवास का अर्थ पूरे समय भूखा रहना नहीं है तो उपवास के दौरान कुछ खास तरह की चीजें खाना सेहत के लिए फायदेमंद होता है। जैसे शकरकंद खाने से शरीर को विटामिन सी और पोटेशियम मिलता है। वहीं सेब उपवास के दौरान खाया जाने वाला बेहतरीन फल है। इससे न केवल वजन कम होता है बल्कि पेट भी भरा-भरा महसूस करता है। इसी तरह दूध का सेवन करने से शरीर को कैल्शियम मिलता है और हड्डियां मजबूत होती हैं। व्रत में अखरोट भी खाया जाता है। अन्य ड्राइ फ्रूट्स की तरह यह कैलोरी से भरपूर होता है। एक कप स्ट्राबेरी में 50 कैलोरी और तीन ग्राम फाइबर होता है। उपवास में इसका सेवन फायदेमंद है। उपवास में टमाटर का जूस कैंसर से बचाव करता है। सलाद खाना भी फायदेमंद है।
 
इन नुकसान से बचें
उपवास के दौरान सबसे बड़ा खतरा शरीर में पानी की कमी का होता है। कई लोग व्रत के दौरान सिर दर्द का अनुभव करते हैं। कुछ को सीने में जलन और कब्ज की शिकायत होती है। डायबिटीज के मरीजों को उपवास नहीं करना चाहिए। जिन लोगों को लो ब्लड प्रेशर की शिकायत होती है, उन्हें भी सावधान रहना चाहिए।

यदि वजन घटाने के लिए उपवास कर रहे हैं तो अपने ब्लड प्रेशर पर लगातार नजर रखें। इंसान जब खाना बंद कर देता है तो उसका पाचन तंत्र भी काम करना बंद कर देता है। इससे दिमाग और हार्ट की तुलना में शरीर धीमा होता जाता है। इस तरह शरीर को चलाने के लिए वसा से ऊर्जा मिलती है और चर्बी कम होना शुरू कर देती है।
 


Date : 28-Dec-2019

जिंदगी को भरपूर जीने के लिए जरूरी है स्वस्थ होना। यह सही है कि आज लगभग हर बीमारी के लिए पहले से कहीं बेहतर इलाज और सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि बीमारी को आमंत्रित किया जाए? कुछ तरीके दिल और दिमाग को स्वस्थ रखने के तरीके, ताकि आप भरपूर जीवन का लुत्फ उठा सकें।

स्ट्रोक एक बीमारी है जो दिमाग की ओर जा रही और दिमाग के अंदर मौजूद धमनियों पर असर डालती है। इसे दुनियाभर में टॉप टेन जानलेवा व विकलांगता देने वाली बीमारियों में माना जाता है। स्ट्रोक की स्थिति तब उभरती है जब दिमाग की तरफ खून के साथ ऑक्सीजन तथा पोषक तत्व ले जा रही ब्लड वेसल या तो किसी खून के थक्के के कारण बाधित (ब्लॉक) हो जाती है या यह वेसल किसी कारण से फट जाती है।
दिमाग और दिल का जुड़ाव

दिमाग की करीब 80 प्रतिशत बीमारियों का लिंक कार्डियोवैस्क्युलर डिसीज से जुड़ा होता है। साथ ही स्ट्रोक तथा मध्य आयु के दौरान दिमाग की क्षमताओं का कम होना, अस्वास्थ्यकर जीवनशैली से भी जुड़ा होता है। जाहिर है कि जीवनशैली का यही असंतुलन दिल पर भी भारी पड़ता है। नींद, खान-पान, मोटापा, व्यायाम नकरना, कम से कम शारीरिक गतिविधियों में संलग्न होना आदि वे कारण हैं जो दिल पर बुरा असर डालते हैं और यही दिमाग के लिए भी समस्या बन जाते हैं।

एक्सरसाइज करें

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कम से कम 150 मिनट प्रति हफ्ते का व्यायाम लाभदायक हो सकता है। वहीं धूम्रपान और शराब से दूरी बनाना भी बहुत अच्छा असर कर सकता है, दिल और दिमाग दोनों की सेहत पर।

अभी उठाइए सेहतमंद कदम

व्यायाम शुरू करने और स्वस्थ जीवनशैली को अपनाने की ओर कदम बढ़ाना कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। अगर आज तक आप समस्याओं से बचे हुए हैं तो इस बात की कोई ग्यारंटी नहीं कि आगे आपको कोई समस्या नहीं होगी। इसलिए आज से ही इरादा करें कि अपने दिल और दिमाग की सेहत के लिए छोटे-छोटे प्रयास शुरू करेंगे। कुछ बातें इसमें मदद कर सकती हैं। जैस नियमित जांच।

हाई बीपी, डायबिटीज, हृदय रोग या दिमाग संबंधी समस्याओं का पहले से परिवार में मौजूद होना आदि वे वजहें हैं जिनके लिए आपको 25 साल की उम्र से ही डॉक्टर से सालाना चेकअप करवाना जरूरी है। इस अवधि को आप डॉक्टर की सलाह से 2-3 साल में भी बदल सकते हैं अगर आप हर तरह से स्वस्थ हैं तो, लेकिन 40 वर्ष के बाद सामान्य स्वस्थ लोगों को भी नियमित सालाना चेकअप करवान जरूरी है, क्योंकि यही वह समय है जहां से आपके शरीर की प्राकृतिक शक्ति कम होनी शुरू हो सकती है। अगर सही समय पर ध्यान देंगे तो आप उम्र के साथ आने वाली कई समस्याओं से बच सकेंगे।


स्वस्थ खाएं और भरपूर नींद लें

नींद एक आवश्यक प्रक्रिया है जिसकी कमी दिल और दिमाग दोनों की कार्यप्रणाली पर असर डालती है। नींद की कमी या अनियमितता से याददाश्त, एकाग्रता और संतुलन आदि पर बुरा असर पड़ने के साथ ही यह बीपी, डायबिटीज जैसी कई समस्याओं को भी बुलावा दे सकती है। इसलिए कम से कम 7-8 घंटे की नियमित नींद जरूर लें। इसी तरह भोजन में हरी सब्जियों, फलों, साबुत अनाज की मात्रा बढ़ाने और नमक, शकर तथा अत्यधिक वसा की मात्रा को कम करने से दिल और दिमाग दोनों का भला होता है।

स्ट्रोक और ब्लड थिनर्स

ब्लड थिनर्स यानी खून को पतला करने वाली दवाएं जिन्हें एन्टीकोग्युलेंट्‌स भी कहा जाता है, स्ट्रोक से बचाव में बहुत महत्वपूर्ण साबित हुई हैं। खासकर उन लोगों में जिनको अनियमित हृदय की धड़कनों की समस्या अर्थात एट्रियल फिब्रलेशन होती है। इसस्थिति में दिल को खून पंप करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे लोगों में स्ट्रोक होने की आशंका 5 गुना अधिक हो जाती है।


Date : 25-Dec-2019

व्यक्ति कई तरह के भावनात्मक संकट का अनुभव करता है। वह उदास हो सकता है, चिंता सता सकती है। निराशा, ऊब, गुस्सा या किसी तरह की आत्मग्लानि से घिर सकता है। किसी भी तरह की मनोदशा में भावुक होना बुरी बात नहीं है लेकिन अतिभावुक होना परेशानी का कारण बन सकता है। भावनाएं जीवन का अहम पहलू हैं और भावनात्मक संवेदनशीलता का होना एक अच्छी बात है, लेकिन कुछ तरह की सेंसिटिविटी आखिर में आपके लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं। यह आपकी  सेहत के साथ खिलवाड़ कर सकती है।

अति भावुकता के नुकसान
किसी भी मामले में बहुत ज्यादा भावुकता लगातार रहे तो यह मानसिक बीमारी का रूप भी ले सकती है। इसलिए जरूरी है कि अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए अति भावुकता से बचा जाए। महिलाएं अति भावुकता की ज्यादा शिकार हो सकती हैं। कई महिलाएं छोटी-छोटी बातों पर भी विचलित हो जाती हैं या फिर अति भावुकता में उचित-अनुचित कदम उठा लेती हैं। जरा-जरा सी बात पर रो देना या मामूली बात को लेकर परेशान हो जाने वाली महिलाओं को मनोवैज्ञानिक अति भावुकता की श्रेणी में ही रखते हैं। कई बार अति भावुकता के कारण रिश्तों में तनाव इतने बढ़ जाते हैं कि सेहत पर बुरा असर डालते हैं। ऐसे में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का  सामना करना पड़ सकता है।

ये बीमारियां दे सकती है अति भावुकता
अति भावुकता से तनाव पैदा होने पर व्यक्ति के दिल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में सीने में दर्द की समस्या और हाई ब्लड प्रेशर की दिक्कत हो सकती है। ज्यादा इमोशनल होने से अनिद्रा की समस्या हो सकती है जिसके कारण शरीर में ऊर्जा की कमी होती है। यह भी ध्यान रखें कि अति भावुकता और तनाव के कारण गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिकल संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। पेट दर्द की शिकायत, मितली या उल्टी महसूस होने लगती है। पाचन संबंधी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। अति भावुकता से हुए तनाव की वजह से धीरे-धीरे व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी असर पड़ता है।

अति भावुकता से बचने के तरीके
अधिक भावुक होने से बचने के लिए आप कुछ तरीके जरूर अपना सकते हैं। सबसे पहले तो अपनी भावुकता की स्थिति को स्वीकार लें। आपको किसी भी परिस्थिति में जो भी महसूस हो रहा है, पहले तो उसका विरोध बंद करें। मनोवैज्ञानिक भावुकता को कोई समस्या नहीं मानते लेकिन हर बात पर भावुक होना या फिर आप जो महसूस कर रहे हैं, वही ठीक है, यह मान लेना गलत है। जैसे यदि आप किसी ऑफिस में जॉब करते हैं और आपका बॉस या आपके सहयोगी कभी हंसी-मजाक करते हैं या फिर कभी गुस्से में कोई बात कह देते हैं तो उस पर तुरंत अतिभावुक होकर प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए। बेहतर होगा कि आप अपने मन को शांत रख, कुछ देर सोचें कि मुझे क्या करना चाहिए या क्या बोलना चाहिए। एक बार आप तुरंत प्रतिक्रिया देना बंद कर देंगे तो अति भावुकता से बच पाएंगे।

अपने बारे में मूल्यांकन करें। अगर आप समझ नहीं पा रहे हैं कि आप ज्यादा सेंसिटिव हैं या नहीं तो कुछ तरीकों से खुद का मूल्यांकन कर सकते हैं। डायरी या जर्नल लिखना भी आपको इसमें मदद कर सकता है। अब हर बार, जब भी आपको लगे कि आप भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया दे रहे हैं, उसके बारे में तुरंत जब आप इमोशनल हुए, आप कैसा महसूस कर रहे थे, आपने क्या अनुभव किया, आप क्या सोच रहे थे, और उस परिस्थिति का सारा विवरण लिखकर रख लें। अब अगली बार जब भी आपको किसी तरह की भावना महसूस होती है, जैसे कि चिढ़ना, चिंता या गुस्सा, तो उस वक्त आप जो भी कर रहे हैं, उसे वहीं पर रोक दें और फिर आपके ध्यान को आपके किसी अच्छे अनुभव की तरफ केंद्रित कर दें।

अति भावुकता से बचने के लिए कुछ अभ्यास जरूरी है। रोजमर्रा की परिस्थियों में कोशिश करें कि किसी भी बात को लेकर अधिक भावुक न होएं। धीरे-धीरे अभ्यास के साथ आपको इस इमोशन को मैनेज करना आ जाएगा और सेहत पर होने वाले दुष्प्रभावों से बच पाएंगे।

 


Date : 20-Dec-2019

सर्दी का मौसम और शरीर की देखभाल दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। सर्दी के मौसम में अपनी फिटनेस लेवल को बढ़ाने का मौका रहता है। कभी-कभी आपके दिमाग में भी यह सवाल आता होगा कि आखिर शरीर की मसाज किस तेल से करना चाहिए ? खासकर सर्दियों में ‘बॉडी मसाज’ करने के लिए सबसे अच्छा तेल कौन सा होता है.? यह सवाल बेहद अहम होता है। ‘बॉडी मसाज’ बेहतर फिटनेस के लिए और थकान कम करने आसान तरीका है। सर्दी के मौसम में आयुर्वेद के अनुसार गरम तेल से ‘बॉडी मसाज’ करना बहुत फायदेमंद होता है। सर्दी के मौसम में सप्ताह में कम से कम 3 दिन ‘बॉडी मसाज’ कराने से कई फायदे होते हैं.
बॉडी मसाज’ से स्किन अच्छी तो होती ही है साथ में शरीर की मांसपेशियां भी मजबूत होती है। बॉडी मसाज से शरीर का रक्त संचार बेहतर होता है और इंसान का स्टे्स लेवल भी कम होता है। आइए जानते हैं सर्दी के मौसम में कौन-कौन से तेल मसाज के लिए उपयोग करना चाहिए। 
ऑलिव ऑयल
यह त्‍वचा में अच्‍छी तरह से समा जाता है और उसे नमी प्रदान करता है। यह तेल दर्द से राहत भी दिलाता है।

बादाम तेल
यह तेल हर तरह की त्‍वचा पर असर करता है पर यह अपना खास असर रूखी त्‍वचा पर दिखाता है।

सरसों का तेल
यह बॉडी ऑयल थकान भरी मासपेशियों का दर्द भगाने में लाभकारी होता है। यह हड्डियों को भी मजबूत करता है।

नारियल तेल
यह तेल त्‍वचा को पोषण देता है, उसे टाइट करता है और उसमें नमी भरता है।

अरंडी या केस्‍टर ऑयल
इस तेल के दोनों ही त्‍वचा और बालों पर अच्‍छे असर होते हैं। यह गाढा और चिपचिपा तेल हर तरह कि स्‍किन को सूट करता है। यह चेहरे से झुर्रियों को भी दूर करता है।

अंगूर के बीज का तेल
इस तेल से बिल्‍कुल भी एलर्जी नहीं होती और त्‍वचा पर इसके बहुत से फायदे भी हैं। अगर साफ और कोमल त्‍वचा चाहिये तो इससे बॉडी मसाज करें।

सूरजमुखी तेल
यह तेल कई सारे एसिड से भरा है जो कि हमारी त्‍वचा के लिये बहुत अच्‍छा माना गया है।


Date : 20-Dec-2019

कुछ महिलाओं को पीरियड्स के दिनों में काफी तकलीफों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस कारण से वह ना तो घर पर चैन से रह पाती हैं और ना ही ऑफिस में ही अपना काम ठीक से कर पाती हैं। पीरियड्स के दौरान महिलाओं को पेट दर्द, पेट में ऐंठन, कमर दर्द, सिर दर्द, तनाव (Periods cramps) का सामना करना पड़ता है। ये दर्द कुछ महिलाओं को इतने अधिक होते हैं कि उन्हें कुछ दवाओं का सेवन भी करना पड़ता है। यदि आप चाहती हैं कि पीरियड्स के दिनों में किसी भी तरह की शारीरिक समस्या बहुत ज्यादा परेशान ना करे, तो इसके लिए आप योगासन (yoga benefits in periods) का सहारा लें। चक्रासन (chakrasana) एक ऐसा आसन है, जिसके नियमित अभ्यास से पीरियड्स पेन, क्रैम्प आदि से छुटकारा पा सकती हैं। चक्रासन करने से इर्रेगुलर पीरियड्स (chakrasana in periods) की समस्या भी ठीक होती है। जानें, चक्रासन करने का सही तरीका और इससे होने वाले फायदे…
पीरियड्स में समस्याएं होने के कारण
बदलती जीवनशैली के कारण अक्सर कुछ महिलाओं को पीरियड्स में काफी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इर्रेगुलर पीरियड्स, पेट व कमर दर्द, तनाव आदि की महिलाएं शिकार हो जाती हैं। इर्रेगुलर पीरियड्स से अक्सर महिलाओं का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। महिलाओं की बदलती लाइफस्टाइल, खानपान की आदतें और बढ़ते प्रदूषण के कारण उनका मासिक चक्र बिगड़ जाता है। योगासन (chakrasana in periods), हेल्दी ईटिंग हैबिट्स अपनाकर पीरियड्स को नियमित कर सकती हैं।
चक्रासन करने की विधि (How To Do Chakrasana)
जमीन पर लेट जाएं। अब अपने घुटनों को मोड़ लें और अपने दोनों हाथों को अपनी गर्दन के पीछे ले जाएं। इसके बाद आप हाथों की हथेलियों तथा पैरों से कुछ बल लगाकर अपनी कमर वाले भाग को ऊपर उठाएं। इस स्थिति में आप स्थिर बनी रहें तथा धीरे-धीरे सामान्य रूप से सांस लेती रहें। अब आप धीरे-धीरे कमर को नीचे करें। इसके बाद पैरों को सीधा करें तथा उसके पश्चात अपने हाथों को पीछे से आगे सामान्य अवस्था में ले आएं। यह एक चक्र पूरा हुआ। इस प्रकार आप एक समय में 4 से 5 चक्र पूरे कर सकती हैं।
चक्रासन के लाभ (Chakrasana Benefits)
पीरियड्स की समस्याओं को दूर करने के साथ ही महिलाओं में होने वाली बांझपन की समस्या को भी दूर करता है चक्रासन। इसके अलावा चेहरे पर निखार लाता है। वजन कम करने में मदद करता है। इस आसन को हर दिन करने से चर्बी कम होती है। कमर दर्द से परेशान रहते हैं, तो इसका भी इलाज करता है यह आसन। इस आसन से रीढ़ की हड्डी लचीली बनती है। युवा अवस्था को लंबे समय तक बरकरार रखने में भी मदद करता है। आप जल्दी बूढ़े नहीं होंगे।


Date : 18-Dec-2019

नई दिल्ली, 18 दिसंबर । अगर आप भी टू यम मल्टीग्रेन चिप्स खाते हैं, वही जिसका भारतीय क्रिकेट कप्तान विराट कोहली ‘स्मार्ट स्नैक’ कहते हुए विज्ञापन करते हैं तो सावधान। आपको अच्छे स्वास्थ्य के लिए जितना नमक खाना चाहिए उससे कही अधिक एक ग्राम इस 30 ग्राम के चिप्स के पैकेट में है। यानी दिन भर में आपको जितना नमक खाना चाहिए उससे दोगुना इस 30 ग्राम के पैकेट में है। और यही कहानी भारत में बिकने वाले कई नमकीनों, सूप, नूडल्स और बर्गर, पिज़्जा की है। ऐसा सीएसई की रिपोर्ट में दावा किया गया है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवाइरन्मेंट ने प्रोसेस्ड फूड की जांच की जिसके नतीजे सुन कर आपके खतरे की घंटी बज जायेगी। भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, एफएसएसएआई ने जो जांच की तो उससे पता चला कि बाजार में बिक रहे सभी बड़े ब्रांड के नमकीन सरकार के तय मानको को पूरा नहीं करते। सीएसई की एन्वायरंनमेंट मॉनिटरिंग लैब ने सभी परीक्षण किए।
अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि जंक फूड में नमक, वसा, ट्रांस फैट की अत्यधिक मात्रा है जो मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय की बीमारियों के लिए जिम्मेदार है। संगठन का आरोप है कि ‘ताकतवर प्रॉसेस्ड फूड इंडस्ट्री और सरकार की मिलीभगत से जंक फूड 6 साल से चल रहे तमाम प्रयासों के बावजूद कानूनी दायरे में नहीं आ पाया है। जंक फूड बनाने वाली कंपनियां उपभोक्ताओं को गलत जानकारी देकर भ्रमित कर रही हैं और खाद्य नियामक मूकदर्शक बनकर बैठा हुआ है।’
सीएसई की प्रयोगशाला में 33 उत्पादों की जांच की गई। इनमें से 14 पैकेटबंद भोजन थे और 19 फास्ट फूड। इनमें नमक, वसा, ट्रांस फैट और कार्बोहाइड्रेट की जांच की गई।
सीएसई की प्रयोगशाला में 33 उत्पादों की जांच की गई। इनमें से 14 पैकेटबंद भोजन थे और 19 फास्ट फूड। इनमें नमक, वसा, ट्रांस फैट और कार्बोहाइड्रेट की जांच की गई। जांच के नतीजे इस प्रकार हैं
अध्ययन के अनुसार 30 ग्राम सर्विंग साइज (खाने के लिए अनुमति योग्य मात्रा) का दावा करने वाले चिप्स पैकेट का आकार सचमुच दावे के अनुरूप नहीं होता। उदाहरण के तौर पर लेज के 20 रुपए वाले ‘अमेरिकन स्टाइल क्रीम एंड ओनियन फ्लेवर’ का वजन 52 ग्राम है, जबकि उस पर सर्विंग साइज 30 ग्राम लिखा है। ज्यादा ऑफर वाले चिप्स आप ज्यादा खा सकते हैं इसलिए सोफे पर चिप्स का पैकेट लेकर आराम करने से पहले उसकी छपाई पर ध्यान दें और यह दिमाग लगाएं कि बिना स्वास्थ्य पर प्रभाव डाले कितना खाया जा सकता है।
सीएसई लैब ने चार प्रकार के नमकीनों को जांचा है। एक में उच्च मात्रा में नमक और वसा पाया गया है। हल्दीराम क्लासिक नट क्रैकर में नमक की मात्रा बहुत ज्यादा है। यह आरडीए मानकों से 35 फीसदी ज्यादा है। यह एक बार के भोजन में नमक की अनुमति दी गई मात्रा से भी ज्यादा है।
हल्दीराम की आलू भुजिया खाते ही आप रिकमेन्डेड डायटरी अलॉवेंस (आरडीए) मानकों द्वारा तय 21 फीसदी नमक खा लेते हैं, लेकिन ग्राहक किसी भी तरीके से यह नहीं जान सकता है कि इस नमकीन और चिप्स को खाते हुए वह कितनी मात्रा में नमक खा चुका है। सीएसई के जरिए जांचे गए 14 पैकेटबंद भोजन में 10 ने अपने उत्पादों में सोडियम के बारे में बताया है लेकिन नमक के बारे में नहीं। इससे ग्राहकों को भ्रामक सूचना मिलती है। तीन उत्पादों में न ही सोडियम और न ही नमक की मात्रा दर्शायी गई। सिर्फ एक उत्पाद में नमक अथवा सोडियम की मात्रा लिखी गई है।
सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण ने आरोप लगाया कि ‘हमने पाया कि पैकेज्ड खाने और फास्ट फूड के जो सैंपल हमने टेस्ट किए उन सभी में खतरनाक स्तर का नमक और वसा पाया गया है। उपभोक्ता होने के नाते हमारा अधिकार है कि हमारे खाने के पैकेट क्या है वो हमें पता हो। पर हमारा खाद्य नियामक, एफएएसएसआई ने अपने ही ड्राफ्ट लेबलिंग रेग्युलेशन को पारित नहीं किया है। ये स्वीकार्य नहीं है। ये हमारे जानने के अधिकार और स्वास्थ्य के अधिकार को ज़ोखिम में डालता है। ‘
संगठन के प्रोग्राम निदेशक अमित खुराना कहते हैं ‘क्या हम अपने मोटापे, मधुमेह और दिल की बिमारियों को बोझ को कम करने के बारे में गंभीर है। एफएसएसएआई का रुख तो इससे इतर दिखता है।’
सीएसई लैब ने चार प्रकार के नमकीनों को जांचा है। एक में उच्च मात्रा में नमक और वसा पाया गया है। हल्दीराम क्लासिक नट क्रैकर में नमक की मात्रा बहुत ज्यादा है। यह आरडीए मानकों से 35 फीसदी ज्यादा है। यह एक बार का समुचित खाना खाने में अनुमति योग्य नमक से भी ज्यादा है। वहीं, सिर्फ वेबसाइट पर ही 35 ग्राम इसकी सर्विंग साइज के बारे में लिखा गया है। यानी पैक खोलने से पहले ऑनलाइन जांचना एक बहुत ही दुश्वारी भरा काम है।
सीएसई का कहना है कि एफएसएसएआई के जुलाई 2019 के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन, जो कि काफी कमजोर किया हुआ नोटिफिकेशन है, में भी प्रावधान है कि खाद्य पदार्थो को लेबल किया जाए कि इसमें स्वास्थ्य मानकों के हिसाब से ज्यादा क्या सामग्री है। अगर उस तय मानक से ज्यादा सामग्री हो तो खाद्य पैकेट पर लाल निशान लगाना जरूरी होगा। पर किसी भी पैकेट पर लाल निशान नहीं लगा था। सीएसई का आरोप है कि ताकतवर फूड लॉबी के दबाव में एसा किया जा रहा है।(भाषा)

 


Date : 07-Dec-2019

कई लोग जहां वजन घटाने को लेकर परेशान हैं वहीं कुछ लोग अपने दुबले-पतले शरीर को पसंद नहीं करते हैं. दुबले-पतले लोग वजन बढ़ाने के लिए न जाने क्या-क्या ट्राई करते हैं लेकिन उनका वजन नहीं बढ़ता है. ऐसे में वह वजन कैसे बढ़ाएं घरेलू उपाय ढूंढते हैं. अपने दुबलेपन से परेशान कुछ लोग तो ये सवाल करते हैं कि किशमिश से वजन कैसे बढ़ाएं, शरीर का वजन कैसे बढ़ाएं (How To Gain Body Weight) लोग अपने पतलेपन से इतने परेशान हो जाते हैं कि वजन बढ़ाने के लिए आयुर्वेदिक दवा (Weight Gain Medicine) ढूंढने लगते हैं. तो कई लोग वजन बढ़ाने के लिए व्यायाम (Weight Gain Exercise) के बारे में जानकारी लेना चाहते हैं. जब आप खुद को कमजोर महसूस करते हैं तो आपका आत्मविश्वास भी कम होने लगता है. कई तो वजन बढ़ाने के लिए जिम शुरू कर देते हैं. आसानी से वजन बढ़ाने के क्या उपाय हो सकते हैं, और वजन बढ़ाने के लिए क्या खाना चाहिए. इनके लिए आपको कई सुझाव मिल जाएंगे, लेकिन अगर आपको हेल्दी तरीके से वजन बढ़ाना है तो हम आपको कुछ घरेलू नुस्खों के बारे में बता रहे हैं जो आसानी से वजन बढ़ाने में आपकी मदद कर सकते हैं.... 
1. जीरा 
जीरा तो हर घर के किचन में मौजूद होता है. यह एक सामान्य मसाला है, जिसके इस्तेमाल आप दाल, सब्जी आदि में तड़का, छौंक लगाते हैं. स्वाद के अलावा, जीरा का इस्तेमाल चिकित्सीय रूप में भी किया जाता है. यह इम्युनिटी सिस्टम को मजबूत करने में मददगार हो सकता है. साथ ही पाचन के लिए भी फायदेमंद हो सकता है और भूख को बढ़ाने में भी कारगर है.

2. शतावरी 
परंपरागत रूप से इसका कई स्त्री रोगों में लाभ पाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. यह वजन बढ़ाने में भी मदद कर सकता है. यह जड़ी-बूटी भूख बढ़ाने में भी कमाल हो सकती है. साथ ही इसके सेवन से थकान और तनाव भी दूर हो सकती है.

3. सौंफ 
सौंफ में भूख बढ़ाने वाले गुण मौजूद होते हैं. यह एनोरेक्सिया यानी भूख ना लगने की समस्या को भी दूर करने में भी कारगर है. इसके अलावा यह भूख भी बढ़ाता है. आप इसे अपने भोजन में भी मिला सकते हैं या फिर ऐसे भी चबाकर खा सकते हैं.

4. सफेद मुसली 
यह स्ट्रेंथ बढ़ाती है. कमजोरी को कम करने में मदद कर सकती है. यह मांसपेशियों को भी मजबूत बनाने में भी सहायक हो सकती है. इसे तनाव और अवसाद को कम करने के लिए भी प्राकृतिक उपाय के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. तनाव काफी हद तक भूख ना लगने का कारण बनता है.


Date : 07-Dec-2019

देहरादून, जेएनएन। करेला और वह भी मीठा। बात भले ही गले नहीं उतर रही हो, लेकिन है सोलह आने सच। वैसे यह करेला चीनी की तरह मीठा नहीं होता, लेकिन कड़वा न होने के कारण इसे मीठा करेला कहते हैं। पहाड़ में इसे ज्यादातर कंकोड़ा और कई इलाकों में परबल, राम करेला आदि नामों से भी जाना जाता है। कंकोड़ा ऊंचाई वाले इलाकों में अगस्त से लेकर नवंबर तक उगने वाली सब्जी है। पहाड़ में बरसात की सब्जियों के आखिरी पायदान पर यह लोगों के पोषण के काम आता है। हल्के पीले व हरे रंग और छोटे-छोटे कांटों वाली इस सब्जी मिनटों में तैयार हो जाती है। बनाने की प्रक्रिया भी अन्य सब्जियों की तरह ही है। हां! यह जरूर ध्यान रखें कि कढ़ाई में छौंकते-छौंकते और अल्टा-पल्टी कर हल्की भाप देते ही कंकोड़े की सब्जी बनकर तैयार हो जाती है।
कंकोड़े की की सूखी सब्जी जितनी जायकेदार होती है, उतनी ही आलण (बेसन का घोल) डालकर तैयार की गई तरीदार सब्जी भी। इसके अलावा कंकोड़े के सुक्सों की सब्जी भी बेहद स्वादिष्ट होती है। सीजन में आप कंकोड़ों को सुखाकर किसी भी मौसम में आप सुक्सों की सब्जी बना सकते हैं। सुक्सों को भिगोकर बनाई गई तरीदार सब्जी का भी कोई जवाब नहीं। सब्जी के साथ इसके बीज खाने में खराब लगते हैं। लेकिन, यदि बीजों को अलग से भूनकर खाने में आनंद आता है।
जब कंकोड़े छोटे-छोटे होते हैं तो उन्हें कच्चा भी खाया जा सकता है। कच्चे खाने में यह खूब स्वादिष्ट लगते हैं और ककड़ी (खीरा) की तरह हल्की महक देते हैं।
डायबिटीज में बेहद उपयोगी
कड़वा करेला जहां डायबिटीज का दुश्मन है, वहीं मीठा करेला यानी कंकोड़ा भी डायबिटीज की प्रभावशाली दवा है। सभी तरह के चर्म रोग व जलन में भी यह उपयोगी है। इसकी पत्तियों का रस पेट के कीड़ों को मारने सहायक है। कुष्ठ रोग में भी कंकोड़ा को लाभकारी माना जाता है। इसका स्वरस कील-मुहांसों को ठीक करने के भी काम आता है, जबकि इसकी जड़ को सुखाकर बनाया गए चूर्ण का लेप चर्म रोगों के लिए बहुत उपयोगी है।
आयरन व एंटीऑक्सीडेंट का खजाना  
एक शोध में पता चला है कि कंकोड़ा में न केवल पर्याप्त मात्रा में आयरन मौजूद है, बल्कि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले एंटीऑक्सीडेंट और खून को साफ करने वाले तत्व भी इसमें हैं। बता दें कि आयरन की कमी होने से एनीमिया, सिरदर्द, चक्कर आना, हीमोग्लोबिन बनने में परेशानी होना जैसी परेशानियां शरीर को पस्त कर देती हैं। इसके अलावा एंटीऑक्सीडेंट अक्सर अच्छे स्वास्थ्य और बीमारियों को रोकने का काम करते है। कंकोड़ा फाइबर, प्रोटीन और कॉर्बोहाइड्रेट की भी खान है। इसके पौधे पर बीमारियों का प्रकोप भी नहीं होता, जिस कारण यह पहाड़ों में खूब पनपता है। अब तो देहरादून व हल्द्वानी जैसे शहरों में कंकोड़ा मिलने लगा है।
रामजी ने खाया था, सो राम करेला नाम पड़ा
कंकोड़ा लौकी कुल की सब्जी है। इसका वैज्ञानिक नाम सिलेंथरा पेडाटा (एल) स्चार्ड है। इसका एक नाम राम करेला भी है। यह नाम कैसे पड़ा, इस बारे में किसी को जानकारी नहीं, लेकिन किंवदंती है कि भगवान राम ने वनवास के दौरान इसका सेवन किया था। सो, इसे राम करेला कहा जाने लगा।

 


Date : 04-Dec-2019

सर्दियों का मौसम नजदीक आते ही सर्द हवाएं त्वचा को रूखा बनाने लगती है। ऐसे में जरूरी है कि त्वचा की नमी बरकरार रखी जाएं और उसे ड्राय होकर फटने से बचाने के उपाय किए जाएं। हम आपको ऐसी 5 घरेलू चीजों के बारे में बता रहे हैं जिन्हें सर्दियों में त्वचा पर इस्तेमाल करने से त्वचा कोमल और मुलायम बनी रहेगी -
1. सर्दियों के मौसम में शरीर पर ऑलिव ऑयल से मसाज करें। यह स्किन के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है क्योंकि इसमे एंटीऑक्सीडेंट होते है। इसके अलावा इसमें विटामिन-ई भरपूर मात्रा में होता है जो त्वाचा को हाइड्रेटेड रखने में मदद कतता है।
2. सर्दियों के मौसम में त्वचा के रूखेपन को दूर करने के लिए आप एलोवेरा जेल का सहारा भी कर सकती हैं। यह आपकी त्वचा को नैचुरल नमी देने के साथ आपकी स्किन को गजब का निखार भी देगा।
3. इस मौसम में त्वचा के रूखेपन को दूर करने के लिए पपीता का इस्तेमाल भी अच्छा उपाय है। इसके लिए आप पपीते का पेस्ट बना कर चेहरे पर कुछ देर मसाज करें और फिर चेहरा लें।
4. स्किन को हेल्दी रखने में बादाम का तेल भी मदद करता हैं। अगर आपकी स्किन बहुत ज्यादा ड्राय है तो हफ्ते में दो बार इससे स्किन पर मालिश करें। यह आपकी स्किन की नमी बरकरार रखने में सहायक होता है।
5. सर्दियों में दही एक नैचुरल मॉइस्चराइज़र है। दही से चेहरे की मसाज करें और 20-25 मिनट के लिए छोड़ दें। इसे त्वचा पर लगाने से ड्रायनेस दूर हो जाती है। इसके बाद हल्के गुनगुने पानी से अपने चेहरे को धो लें।

 


Date : 04-Dec-2019

नई दिल्ली: स्वस्थ जीवन के लिए हड्डियों को मजबूत बनाए रखना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. सर्द मौसम में दिल्ली जैसे महानगर में प्रदूषण के कारण लोगों तक सूर्य की किरणों से मिलने वाले प्राकृतिक विटामिन-डी कम ही पहुंच पाती है. ऐसे में लोगों के शरीर में विटामिन-डी की कमी होना लाजमी है. इस बारे में फोर्टिस राजन ढल हॉस्पिटल के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के ऑर्थोस्कॉपी एंड स्पॉर्ट्स इंजुरी के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. विश्वदीप शर्मा ने कुछ प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डाला है.

दिन में धूप सेंकने के उचित समय और विटामिन-डी के पर्याप्त स्तर को बनाए रखने को लेकर कई शोध किए गए हैं.

आमतौर पर कहा जाता है कि शरीर का 20 प्रतिशत हिस्सा यानी बिना ढका हाथ और पैरों से प्रतिदिन 15 मिनट धूप का सेवन करने से विटामिन-डी अच्छी मात्रा में लिया जा सकता है. अगला प्रश्न यह है कि दिन का कौन सा पहर सूर्य की रोशनी के संपर्क में आने का सबसे उपयुक्त होता है. आम धारणा के अनुसार, सुबह का धूप और देर शाम का धूप सेवन के लिए उपयुक्त होता है, जबकि सच्चाई यह है कि सुबह 10 से दोपहर 3 बजे के बीच के दौरान धूप का सेवन मानव शरीर की त्वचा को विटामिन-डी प्रदान करता है. हालांकि धूप के सेवन के दौरान त्वचा पर सन-ब्लॉक क्रीम या लोशन नहीं लगे होने चाहिए.
दिल्ली जैसे शहर, जहां प्रदूषण के कारण लोगों तक धूप नहीं पहुंच पाती है, वहां लोग दुग्ध उत्पादों व आहार के जरिए विटामिन डी का सेवन कर सकते हैं. महिलाओं में विशेष रूप से प्री-मेनोपॉजल और पोस्ट-मेनोपॉजल की श्रेणी की महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोमलेशिया होने की संभावना होती है. वहीं खुद को पूरी तरह से ढकने वाली महिलाओं व सनक्रीम लगाने वाली महिलाओं में भी विटामिन-डी की मात्रा काफी कम होती है, क्योंकि उनकी त्वचा के अंदर धूप प्रवेश नहीं कर पाता है. वहीं बच्चों में विटामिन डी की कमी से रिकेट्स की समस्या होने लगती है.

बच्चों को शुरुआत में ही पर्याप्त आहार के साथ-साथ अच्छी धूप का सेवन कराना आवश्यक होता है. बच्चों को खास कर उन बच्चों को जिन्होंने मां का दूध पीना छोड़ दिया है, उन्हें विटामिन डी से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन कराना आवश्यक है.

वहीं सर्दियों में हड्डियों को स्वस्थ रखने में अच्छी मात्रा में कसरत करने से भी फायदा मिलता है. कसरत से हड्डियों का घनत्व बना रहता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है.


Date : 29-Nov-2019

थकान, तनाव और गिरती सेहत से बचने के लिए खाने में सोयाबीन का चलन तेजी से बढ़ा है। इतालियन खाने में अधिकता से इस्तेमाल होने वाला सोयाबीन अब शहरवासियों की पसंद बन रहा है। शहर में कई स्थानों पर सोया चाट कॉर्नर आपको नजर आएंगे। शादी समारोह और दावतों में सोयाचाप, सोयाकरी, फ्र ाई सोया का चलन बढ़ा है। स्ट्रीट फूड सेंटर्स पर भी लोग सोया से बने व्यंजनों को खाना पसंद कर रहे हैं। नॉनवेज के बाद अब सोया प्रोडक्ट डेयरी प्रोडक्ट के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल हो रहे हैं। अच्छी न्यूट्रीशन वैल्यू के कारण शाकाहारी परिवाराें में भी इसे पसंद किया जा रहा है। घरों में सोया बढ़ी, सोया दूध, टोफू और सोया चाप का प्रयोग आसानी से होने लगा है। सोयाबीन से बने व्यंजनों के  बढ़ते चलन और सोया के फायदों पर नजर डालती स्टोरी।
डेयरी प्रोडक्ट के साथ ले रहे सोया प्रोडक्ट
डेयरियों पर दूध, दही, घी, तेल और पनीर के साथ सोया के बने प्रोडक्ट मशहूर हो रहे हैं। लोग परिवार सहित सोयाबीन के बने प्रोडक्ट को खाना पसंद कर रहे हैं। शहर मेें शास्त्रीनगर, आबूलेन और साकेत में वे प्वाइंट्स हैं जहां आपको सोया उत्पाद आसानी से मिलेंगे। डेयरियों व दुकानों पर भी सोया के बने प्रोडक्ट काफी बिक रहे हैं।

नॉनवेज का अच्छा विकल्प
शुद्ध शाकाहारी लोगों को नॉनवेज की तरह न्यूट्रीएंट डाइट देने का काम सोयाबीन कर रहा है। लोगों के बीच सोया पदार्थों के प्रचलित होने का बड़ा कारण इसका स्वाद है। खाने में यह नॉनवेज का अनुभव कराता है, इसीलिए नॉनवेज खाने वाले लोग इसे स्वाद से खाते हैं। वहीं शाकाहारी लोग नॉनवेज से बचने और सेहत के लिए इसे इस्तेमाल कर रहे हैं।
 
250 ग्राम मिल्क पनीर, सोया पनीर में न्यूट्रीशन
कंटेंट            पनीर              टोफू (सोया पनीर)
प्रोटीन            27 ग्राम            20 ग्राम
कैलोरी             168             192
कार्बोहाइड्रेट     6.9 ग्राम         4.7 ग्राम
फैटी एसिड      2.9 ग्राम        12. ग्राम
ओमेगा थ्री         22 मिग्रा        804 मिग्रा
ओमेगा सिक्स    69 मिग्रा         6 मिग्रा
मिनरल्स             416 मिग्रा     882 मिग्रा
विटामिन         129 आईयू      214 आईयू


240 ग्राम मिल्क क्रीम, सोया क्रीम में न्यूट्रीशन
कंटेंट            सोया क्रीम            मिल्क क्रीम
प्रोटीन             2.4 ग्राम            5 ग्राम
कैलोरी            326                828
कार्बोहाइड्रेट    27.3 ग्राम     6.6 ग्राम
फैटी एसिड        23.9 ग्राम     88.8 ग्राम
ओमेगा थ्री        जीरो                1292 मिग्रा
ओमेगा सिक्स     52.8 मिग्रा     2006 मिग्रा
विटामिन             36 आईयू        3528 आईयू
मिनरल्स                21.6 मिग्रा        156 मिग्रा

250 ग्राम सोया मिल्क, मिल्क में न्यूट्रीशन
कंटेट            सोया मिल्क            मिल्क
प्रोटीन            6.3 ग्राम            8.2 ग्राम
कैलोरी                105                 102
कार्बोहाइड्रेट     12 ग्राम         12.7 ग्राम
फैटी एसिड        3.6 ग्राम         2.4 ग्राम
ओमेगा थ्री        182 मिग्रा        9.8 मिग्रा
ओमेगा सिक्स    1419 मिग्रा        73.2 मिग्रा
विटामिन            450 आईयू         478 आईयू
मिनरल्स            299 मिग्रा             290 मिग्रा

लाभकारी है सोयाबीन
डाइटीशियन कहते हैं कि सोयाबीन प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत है, जो रक्तचाप नियंत्रित करता है। सोयाबीन में अच्छे फाइबर होने के कारण यह पाचक और पेट को अच्छा रखता है। गर्भवती महिलाओं के लिए श्रेष्ठ आहार है। शरीर को संपूर्ण पोषक तत्वों की खुराक देता है। तनाव, थकान दूर करता है। नींद न आने की परेशानी दूर करता है, कैंसर के कारकों को रोकता है। त्वचा व बालों की सेहत बनाता है।

इन रूपों में हो रहा इस्तेमाल
रोस्टेड सोयाबीन, स्प्राउट्स सोयाबीन, सोया दाल, सोया चाप, सोया चूरा, सोया बड़ी, सोया मिल्क, सोया पनीर, सोया क्रीम, सोया घी, सोया दही, सोया भाजी आदि।  


Date : 22-Nov-2019

नई दिल्लीः वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन (WHO) के तहत वर्तमान समय में अस्थमा से 235 मिलियन से भी अधिक लोग जूझ रहे हैं. सांस लेने की तकलीफ मतलब अस्थमा के चलते 2015 में इस बीमारी से पूरी दुनिया में 3,38,000 लोगों की जान जा चुकी है. आंकड़ों के मुताबिक अस्थमा से हर दिन 900 लोगों की मौत हो रही है. यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें लोगों को सांस लेने में कठिनाई होती है और सांस लेने की नली में सूजन हो जाती है. जिसकी वजह से ऑक्सीजन को फेफड़ों तक पहुंचने में परेशानी होती है और सांस फूलने लगती है. अस्थमा की वजह से सांस लेने में तकलीफ होने के साथ ही सीने में जकड़न, खांसी और थकान महसूस होने लगती है. ऐसे में आपके आस-पास मौजूद ऐसी कई चीजें हैं, जिससे अस्थमा का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए इन बातों पर जरूर गौर करें.

स्मोकिंग
जो लोग सिगरेट पीते हैं, उनमें अस्थमा होने की संभावना औरों की अपेक्षा कहीं ज्यादा होती है. वहीं स्मोकिंग नहीं करने वाले लोग, जो स्मोकिंग करने वालों के संपर्क में रहते हैं उनमें भी अस्थमा होनी की संभावना बनी रहती है. मतलब, एक्टिव और पैसिव स्मोकिंग के संपर्क में रहने वाले लोगों में अस्थमा होने का खतरा और लोगों से कहीं ज्यादा रहता है.
वायु प्रदूषण
वायु प्रदूषण भी अस्थमा को बढ़ावा देता है. यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्र में रहने वाले लोगों में अधिक अस्थमा के रोगी पाए जाते हैं.
धूल
वातावरण में मौजूद धूल के कंण अस्थमा अटैक को बढ़ावा देते हैं. इसलिए बाहर निकलने से पहले अपनी नाक और मुंह को ढंकना ना भूलें. साथ ही ऐसी जगह जाने से बचें, जहां अधिक मात्रा में धूल-मिट्टी का खतरा हो. घर में मौजूद धूल भी अस्थमा का कारण बन सकती है, इसलिए समय-समय पर वैक्यूम क्लीनर से घर की धूल साफ करते रहें.
सर्दी और फ्लू
बार-बार सर्दी और फ्लू होने से भी अस्थमा का खतरा बढ़ सकता है. दरअसल, बार-बार सर्दी होने से स्वांस नली में सूजन आने लगती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ बढ़ने लगती है और धीरे-धीरे यह अवस्था अस्थमा में बदलने लगती है.


Date : 19-Nov-2019

हमारा दिल है कि मानता नहीं, बस दिन-रात जागता ही रहता है, काम करता रहता है। जब गर्भ में मौजूद भ्रूण चार सप्ताह का हो जाता है तो उसकी धड़कन शुरू हो जाती है और उसके बाद वह अपने अंतिम पल तक बस काम ही काम करता रहता है। ऐसे प्यारे दिल का खयाल हम नहीं रखेंगे तो भला और कौन रखेगा। जैसा कि हमारे साथ भी होता है आखिर दिल भी कभी न कभी तो थकान महसूस करता ही है, वह संकेत देता है, लेकिन हम कई बार उसे समझ नहीं पाते। हम उसका सही तरीके से खयाल नहीं रखते और फिर एक दिन उसकी मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। इस स्थिति को कार्डियोमायोपैथी कहा जाता है। तो आइए जानें हमारे सबसे महत्वपूर्ण और पूरी जिंदगी साथ देने वाले साथी की थकान के परिणाम कार्डियोमायोपैथी के बारे में- 
कार्डियोमायोपैथी
हमारा दिल तीन परतों से बना होता है। बाहरी परत (एपिकार्डियम), अंदरुनी परत (एंडोकार्डियम) और मोटी बीच की मांसपेशियों वाली परत (मायोकार्डियम)।
एम्स के डॉ. नबी दरिया वली के मुताबिक दिल संबंधी कोई घटना (कार्डियेक इवेंट) और कुछ दवाएं हमारे दिल की मांसपेशियों में संरचनात्मक या कामकाज के लिहाज से बदलाव ला देती हैं। इससे यह मांसपेशियां कमजोर पड़ जाती हैं। कार्डियोमायोपैथी का शिकार लोगों में यह मांसपेशियां मोटी और ज्यादा सख्त बन जाती हैं। कुछ मामलों में दिल की मांसपेशियों की जगह स्कार टिश्यू द्वारा ले ली जाती है। 
डॉ. वली बताते हैं कि कार्डियोमायोपैथी कई बार जिंदगी के दौरान विकसित होती है, जिसे एक्वायर्ड कार्डियोमायोपैथी कहा जाता है तो कई बार यह आनुवांशिक (इनहेरिटेड कार्डियोमायोपैथी) होती है। कार्डियोमायोपैथी के कम से कम चार मुख्य प्रकार हैं।  अमेरिकी अकादमी ऑफ फेमिली फिजिशियंस के मुताबिक इनमें से प्रति एक लाख वयस्कों में पांच और प्रति एक लाख बच्चों में से 0.57 लोग डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी के शिकार होते हैं। इसमें दिल के बाएं वेंट्रिकल का आकार बड़ा हो जाने के कारण खून की आपूर्ति बाधित हो जाती है। अधिकांश एथलीटों की मौत की वजह बनने वाला हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी दुनिया भर में प्रति 500 व्यक्तियों में से एक की मौत की वजह बनता है। 
आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2016 में कार्डियोमायोपैथी और मायोकार्डाइटिस (दिल की मांसपेशी में सूजन) भारत में 0.12 प्रतिशत मौत की वजह थे, जबकि 0.11 प्रतिशत मामले बीमारी या विकलांगता (डेली) में बिताए गए वर्षों की वजह रहे। कार्डियोवेस्कुलर यानी दिल से जुड़ी बीमारियां कुल मिलाकर भारत में उसी साल 28.1 प्रतिशत मौत की वजह जबकि 14.1 प्रतिशत डेली की वजह बनीं। 
हम जबकि आनुवांशिक तौर पर मिली कार्डियोमायोपैथी पर नियंत्रण नहीं साध सकते, हम एक्वायर्ड कार्डियोमायोपैथी को टालने के लिए कुछ ऐहतियाती कदम उठा सकते हैं। वैसा करने से पहले हमें समझना होगा कि आखिर हमारे दिल की मांसपेशियां क्यों कमजोर होती हैं। 
कार्डियोमायोपैथी की वजह
अनियंत्रित या लंबी अवधि की दिल की बीमारीः हाई ब्लडप्रेशर वक्त गुजरने के साथ हमारे दिल की मांसपेशियों में संरचनात्मक बदलाव करके उनके कामकाज के तौर-तरीकों को बदल सकता है। हार्ट अटैक भी हमारे दिल की मांसपेशियों को क्षतिग्रस्त करता है। लंबी अवधि तक दिल की तेज धड़कन (टेशिकार्डिया) और हार्ट के वॉल्व का काम नहीं करना हमारे दिल के कामकाज के तरीके को बदलने के संभावित खतरे हैं। 
मेटाबोलिक डिसऑर्डर्सः शरीर में कई बायोकेमिकल प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। इन प्रक्रियाओं में बाधा के कारण हमें डायबिटीज, मोटापे और हाइपोथायरोइडिज्म जैसे मेटाबोलिक डिसऑर्डर्स से दो-चार होना पड़ता है। इन पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो यह आगे चलकर कार्डियोमायोपैथी की वजह बन सकती हैं। 
शराब का व्यसनः शराब का व्यसन हमारे लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है और यह हमारे दिल के लिए भी अच्छी नहीं होती। ज्यादा अल्कोहल के सेवन से हमारे शरीर में ट्राइग्लिसराइड्स (खून में फैट्स) का स्तर बढ़ता है। यह कार्डियोमायोपैथी के अलावा हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट फैल्युअर और स्ट्रोक की भी वजह बन सकता है। 
कुछ दवाएंः दुर्भाग्यवश हर दवा के साथ साइड इफेक्ट्स का पुछल्ला होता ही है। उनमें से कुछ, खासतौर पर कैंसर की दवाएं, कार्डियोटॉक्सिक-दिल की मांसपेशियों को नुकसान पहुंचाने वाली-होती हैं। फिर भले ही उनका इस्तेमाल सही तरीके से क्यों न किया गया हो। जब डॉक्टर आपको कोई दवा दे तो उसके साइड इफेक्ट्स जान लेना बेहतर विकल्प है।
कुछ अन्य बीमारियांः निश्चित तौर पर कुछ बीमारियों का दिल की संरचना, कामकाज पर सीधा असर होता है। उदाहरण के लिए, सार्कोइडोसिस के कारण दिल की मांसपेशियों में छोटी-छोटी गांठें बन जाती हैं। दूसरी ओर एमिलोइडोसिस के कारण हमारे दिल की मांसपेशियों में असामान्य प्रोटीन का जमावड़ा हो जाता है।

 


Date : 19-Nov-2019

ब्लड शुगर:  एक बार डायबिटीज होने पर जिंदगीभर के लिए वह रोगी के लिए बोझ बन जाती है. इस बीमारी से ग्रसित लोगों को अपने खान-पान का खासा ध्यान रखने की जरूरत होती है. बादाम को डायबिटीज के लिए  (Almond For Diabtes) सुपरफूड्स (Superfoods) माना जाता है. ऐसे में डायबिटीज के मरीजों को ऐसी डाइट (Diet) लेनी चाहिए जो ब्लड शुगर लेवल (Blood Suagar Level) को कंट्रोल करने में मदद करे. वहीं ऐसे खाद्य पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए जो आपके शरीर में रक्त शर्करा के स्तर को बढ़ा सकते हैं. शरीर में ब्लड शुगर (Blood Sugar) सही होने पर डायबिटीज रोगियों को सामान्य जीवन जीने में मदद मिलती है. इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि डायबिटीज रोगियों के लिए भोजन (Food For Diabetes) क्या होना चाहिए. कुछ चीजें ऐसी हैं जो आपके शरीर में ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल में रखते हैं और आपकी डायबिटीज को भी कंट्रोल करने में मददगार हो सकते हैं.

बादाम सभी खाद्य पदार्थों में सबसे पोष्टिक माना जाता है जो डायबिटीज मरीजों के लिए काफी कारगर साबित होता है. बादाम में कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर में ब्लड शुगर लेवल (Blood Sugar Level) को बढ़ने से रोकता है और साथ ही डायबिटीज से प्रभावी ठंग से लड़ने में मदद कर सकता है. यहां जानिए डायबिटीज में कैसे है बादाम फायदेमंद और ब्लड शुगर को कंट्रोल करने के लिए बादाम का सेवन कैसे करना चाहिए...
बादाम सेहत के लिए पाए जाने वाले सभी नट्स में से पोष्टिक है और इसमें कई पोषक तत्व पाए जाते हैं और इसके अलावा ये कैलोरी से भी भरपूर होता है. डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए बादाम एक अच्छा खाद्य पदार्थ है. आपको बता दें कि बादाम में मैग्नीशियम पाए जाते हैं जो की सेहत के लिए काफी फायदेमंद है और साथ ही ये डायबिटीज मरीजों में ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करता है. अगर बादाम का अच्छी मात्रा में लंबे समय तक सेवन किया जाए तो ब्लड शुगर को कंट्रोल किया जा सकता है. इसके अलावा बादाम दिल के रोगों से निजाद दिलाने में भी मददगार हो सकता है.
बादाम शरीर में ग्लूकोज के लेवल को कंट्रोल करने में मदद करता है और साथ ही डायबिटीज रोगियों को हृदय के रोगों से बचा सकता है. बता दें कि बादाम में विटामिन ई और मैग्नीशियम पाए जाते हैं जो हड्डियों को मजबूत करने, और शरीर में सुचारू ठंग से खून के फ्लो में मदद कर सकते हैं. इसके साथ ही यह मांसपेशियों को भी मजबूत बनाता है. वहीं डायबिटीज रोगियों को कार्बोहाइड्रेट से भरपूर खाने का सेवन करना चाहिए. कार्बोहाइड्रेट शरीर में ग्लूकोज के लेवल को कम करता है.
डायबिटीज रोगियों को नमक वाले या भूने हुए बादाम का सेवन नहीं करना चाहिए. उन्होने यह भी कहा कि डायबिटीज रोगियों को कच्चे बादाम का सेवन करना चाहिए. इसका सेवन सुबह या शाम के नाश्ते के रूप में करना चाहिए. आपको बता दें कि बादाम में अधिक मात्रा में कैलोरी होती है इसलिए यदि आप अपने आहार में इसका सेवन करते हैं तो आपको वजन बढ़ाने से बचने के लिए अपने दूसरे आहारों में कैलोरी को कम करना होगा. यदि एक डायबिटीज रोगी सामान्य कैलोरी का सेवन कर रहे हैं, तो बादाम के सेवन से कुल कैलोरी की मात्रा अधिक हो जाएगी. इसलिए ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने के लिए बादाम के सेवन से पहले अन्य कैलोरी को कंट्रोल करना जरूरी है.


Date : 11-Nov-2019

कोलकाता: आयुर्वेद में किडनी (गुर्दे) की बीमारी का असरदार इलाज संभव है. आयुर्वेद की दवा गुर्दे को नुकसान पहुंचाने वाले घातक तत्वों को भी बेअसर करती है. कोलकात्ता में चल रहे भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान मेले में पहली बार आयुर्वेद दवाओं पर एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया जिसमें गुर्दे के उपचार में इसके प्रभाव पर चर्चा की गई. इस सत्र के दौरान एमिल फार्मास्युटिकल के कार्यकारी निदेशक संचित शर्मा ने आयुर्वेद के उपचार में प्रभावी दवा नीरी केएफटी के बारे में अब तक हुए शोधों का ब्यौरा पेश करते हुए कहा कि नीरी केएफटी गुर्दे में टीएनएफ अल्फा के स्तर को नियंत्रित करती है.

टीनएफ एल्फा परीक्षण से ही गुर्दे में हो रही गड़बड़ियों का पता चलता है तथा यह सूजन आदि की स्थिति को भी दर्शाता है. टीएनएफ अल्फा सेल सिग्नलिंग प्रोटीन है.शर्मा ने अपने प्रजेंटेशन में कहा कि नीरी के एफटी को लेकर अमेरिकन जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल रिसर्च में शोध प्रकाशित हो चुका है.
इस शोध में पाया गया कि जिन समूहों को नियमित रूप से नीरी केएफटी दवा दी जा रही थी उनके गुर्दे सही तरीके से कार्य कर रहे थे. उनमें भारी तत्वों, मैटाबोलिक बाई प्रोडक्ट जैसे क्रिएटिनिन, यूरिया, प्रोटीन आदि की मात्रा नियंत्रित पाई गई. जिस समूह को दवा नहीं दी गई, उनमें इन तत्वों का प्रतिशत बेहद ऊंचा था.
यह पांच बूटियों पुनर्नवा, गोखरू, वरुण, पत्थरपूरा तथा पाषाणभेद से तैयार की गई है.उन्होंने कहा कि जिन लोगों के गुर्दे खराब हो चुके हैं लेकिन अभी डायलिसिस पर नहीं हैं, उन्हें इसके सेवन से लाभ मिलता है. उन्हें डायलिसिस पर जाने की नौबत नहीं आती है.
उन्होंने यह भी कहा कि आयुर्वेद में कई उपयोगी दवाएं हैं. आयुर्वेद में उन बीमारियों का उपचार है जिनका एलोपैथी में नहीं है. लेकिन उन्हें आधुनिक चिकित्सा की कसौटी पर परखे जाने और प्रमाणित किये जाने की जरूरत है. इस दिशा में डीआरडीओ और सीएसआईआर ने कार्य किया है इस पर और ध्यान दिये जाने की जरूरत है.

 

 

 


Date : 11-Nov-2019

यूके में किए जा रहे एक शोध से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर आर्थिक समस्या  नहीं आई तो जल्द ही ऐसा रक्त परीक्षण उपलब्ध हो सकेगा, जिसके जरिए शरीर में स्तन कैंसर के लक्षण उभरने से पांच साल पहले ही होने की संभावना का पता चल सकता है। यह बात शोधकर्ताओं ने इस दिशा में किए जा रहे शोध के आधार पर अभी तक प्राप्त परिणामों को देखते हुए कहा है।
शोधकर्ताओं ने उन 90 मरीजों के रक्त के नमूने लिए जिनका स्तन कैंसर का इलाज चल रहा है,90 उन मरीजों के रक्त के नमूने लिए जो पूरी तरह स्वस्थ हैं। अब 800 मरीजों के नमूने लेकर उनका नौ अलग कारकों के अनुसार परीक्षण कर रहे हैं ताकि पूर्व में किए गए शोध की सटीकता को फिर से परखा जा सके और अलग दिशाओं में भी जांच को आगे बढ़ाया जा सके।
नॉटिंघम विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्र के अनुसार रक्त की जांच जरिए स्तन कैंसर का पता शुरुआती चरण में लगने से यह टेस्ट उन देशों के लोगों के लिए खासतौर पर उपयोगी साबित होगा, जो मध्यम और कम कमाई वाली श्रेणी में आते हैं। 
लाखों महिलाएं पीड़ित-
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल लगभग 21 लाख महिलाएं स्तन कैंसर का शिकार होती हैं। पिछले साल स्तन कैंसर के कारण दुनियाभर में छह लाख 27 हजार महिलाओं की मृत्यु हुई। यह अन्य प्रकार के कैंसर से होने वाली महिलाओं की मृत्यु का करीब 15 प्रतिशत है। 
आसान होगी जांच की प्रक्रिया-अलफतानी के अनुसार, हमें इस शोध पर आगे काम करने और इसे अधिक विकसित करने की जरूरत है। स्तन कैंसर से जुड़े इस शोध में हमारे लिए यह साफ है कि स्तन कैंसर होने से पहले ही इसके प्रारंभिक लक्षणों को पहचाना जा सकता है। 
- पिछले साल दुनियाभर में स्तन कैंसर से 06 लाख 27 हजार महिलाओं की मृत्यु हुई। 
-हर साल दुनियाभर में 21 लाख महिलाएं स्तन कैंसर से पीड़ित होती हैं।


Date : 07-Nov-2019

नई दिल्ली, 7 नवंबर । स्मार्टफोन, कंप्यूटर और होम अप्लायंसेज से निकलने वाली ब्लू लाइट का आपकी उम्र पर गहरा असर पड़ता है। इस ब्लू लाइट में ज्यादा समय तक रहने से नींद की दिक्कत और सर्केडियन जैसे डिसऑर्डर हो सकते हैं। एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि जब स्क्रीन आपकी आंखों की सीध नहीं होती है तब भी यह आपको नुकसान पहुंचा सकती है। ब्लू लाइट आपकी लंबी उम्र घटा सकती है या बुढ़ापे में तेजी ला सकती है। इस बारे में एजिंग ऐंड मेकैनिज्म्स ऑफ डिजीज जर्नल में पब्लिश हुई स्टडी के मुताबिक रुश्वष्ठ (लाइट एमिटिंग डायोड) से निकलने वाली ब्लू वेव लेंथ मस्तिष्क की कोशिकाओं और आंखों की पुतलियों को नुकसान पहुंचाती है। 
स्टडी कॉमन फ्रूट फ्लाई ड्रॉसोफिला मेलानोगैस्टर पर हुई थी। इस मक्खी का सेलुलर और डिवेलपमेंटल मेकैनिज्म दूसरे जानवरों और इंसानों की तरह होने से इसे स्टडी में शामिल किया गया था। अनुसंधानकर्ताओं ने इन मक्खियों को 12 घंटे तक ब्लू एलईडी लाइट में एक्सपोज किया, जिसकी वेवलेंथ होम अप्लायंसेज से निकलने वाली ब्लू लाइट के बराबर थी। उन्होंने मक्खियों पर उस लाइट के असर की पड़ताल की तो पाया कि लाइट से उनकी उम्र बढऩे की रफ्तार तेज हो गई। 
शोध जिन मक्खियों पर किया गया था, उनके मस्तिष्क की कोशिकाओं और आंखों की पुतलियों को एलईडी लाइट्स से नुकसान पहुंचा था। उनसे उनकी लोकोमोशन कैपेबिलिटीज यानी दीवारों पर चढऩे की क्षमता कम हो गई थी। इनमें कुछ म्यूटेंट फ्लाई को शामिल किया गया था, जिनकी आंखें नहीं बनी थीं। आंख नहीं होने के बावजूद ब्लू लाइट के चलते उन मक्खियों में ब्रेन डैमेज और लोकोमोशन डिसऑर्डर देखा गया था। इससे पता चलता है कि लाइट आंखों पर सीधी पड़े या नहीं, यह उन्हें पूरा नुकसान पहुंचा सकती है। 
स्टडी की लीड रिसर्चर और इंटीग्रेटिव बायोलॉजी की प्रोफेसर ने बताया, लाइट से मक्खियों की उम्र तेजी से बढ़ रही है यह जानकर पहले हमें काफी हैरानी हुई। हमने पुरानी मक्खियों में कुछ जींस चेक किए तो पाया कि जिन्हें लाइट में रखा गया था उनमें स्ट्रेस-रिस्पॉन्स और प्रोटेक्टिव जींस हैं। उसके बाद हमने पता लगाना शुरू किया कि आखिर लाइट में ऐसा क्या है जिससे मक्खियों को नुकसान पहुंच रहा है। फिर हमने लाइट के स्पेक्ट्रम पर गौर किया।
हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में टेक्नॉलजी का दखल काफी बढ़ गया है। बल्ब, ट्यूबलाइट और एंटरटेनमेंट डिवाइसेज के रूप में इलेक्ट्रिसिटी ने हमारी जिंदगी को आसान और मनोरंजक तो बनाया है, लेकिन ऐसे ही गैजट्स से आने वाली रोशनी हमारी सेहत पर बुरा असर भी डाल रही है। इसमें भी बड़ी चिंता का सबब ब्लू लाइट बन गई है। गैजट्स का अंधाधुंध इस्तेमाल करने से लोग अपनी आंखों की रोशनी भी गंवा सकते हैं। 
क्या है बचाव का तरीका? 
रिसर्चर्स का कहना है कि घंटों अंधेरे में बैठे रहने से बचना चाहिए और एंबर लेंस वाले चश्मे का इस्तेमाल करना चाहिए। ये चश्मे ब्लू लाइट को आंख तक नहीं पहुंचने देते और रेटीना को सुरक्षित रखते हैं। फोन, लैपटॉप और दूसरी डिवाइसेज को ब्लू एमिशन ब्लॉक करने के लिए भी सेट किया जा सकता है। (एजेंसियां)

 


Date : 04-Nov-2019

नई दिल्लीः दिल्ली-एनसीआर के साथ साथ बाकी राज्य भी गंभीर प्रदूषण से जूझ रहे हैं. प्रदूषण से बचने के लिए लोग तमाम तरह के उपाय भी सुझा रहे हैं. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने लोगों को सलाह दी है, कि वो गाजर खाएं क्योंकि गाजर में विटामिन ए होता है. जिससे ना सिर्फ रतौंधी की समस्या से निजात मिलती है. बल्कि प्रदूषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से भी बचा जा सकता है. हालांकि डॉक्टर्स स्वास्थ्य मंत्री के इस बयान से इत्तेफाक नहीं रखते.

बात करें गाजर की तो आप अक्सर गाजर की सलाद या दूसरे रूप में गाजर खाते होंगे लेकिन क्या कभी आपने गाजर के फायदों के बारे में जाना है. आज हम आपको गाजर के कुछ ऐसे फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं जो आपने पहले शायद ना सुने हो.

कैंसर से लड़ने में मददगार- गाजर विटामिन ए, सी और बी6 से भरपूर होती है. गाजर खाने से आप ब्रेस्ट कैंसर, लंग और कोलन कैंसर से बच सकते हैं.

दिल की सेहत के लिए है फायदेमंद - फाइबर और पोटैशियम से भरपूर गाजर खाने से आट्रीज फिट रहती हैं. साथ ही हाइपरटेंशन से बच जाते हैं. ब्लडप्रेशर नियंत्रि‍त करने और हार्ट फेलियर से बचाने में भी गाजर मददगार है.

वेट लॉस प्रोग्राम के लिए है बेहतर ऑप्शन- अगर आप वेट लॉस प्रोग्राम अपना रहे हैं तो गाजर आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है. कम कैलोरी वाले भोजन के रूप में, गाजर का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसे अपने डाइट में शामिल करने से आपको सारे जरूरी विटामिंस भी मिल जाएंगे और वजन भी नियंत्रित रहेगा. इसका इस्तेमाल आप सलाद के रूप में यो फिर सब्जी बनाकर भी कर सकते हैं.

हाइड्रेशन को रखता है मेनटेन- मिनरल्स युक्त गाजर के सेवन से हाइड्रेशन नियंत्रि‍त रहता है. खेल के दौरान पड़ने वाले क्रैम्स को मात देने में गाजर बहुत उपयोगी है. गाजर के सेवन से हेल्दी इलेक्‍ट्रोलाइट लेवल बॉडी में नियंत्रि‍त रहता है.

जल्दी नहीं आता बुढ़ापा- बुढ़ापे को मात देनी है तो भी गाजर खा सकते हैं. विटामिन से भरपूर गाजर खाने से सेल्स को जल्दी डैमेज होने से बचा सकते हैं.

गर्भपात रोकने में है मददगार-  फिटल इंफेक्शन और गर्भपात को रोकने में गाजर बेहद कारगर है. नई मांओं में दूध के प्रोडक्श‍न को भी बढ़ा सकते हैं. माहवारी के दौरान पड़ने वाले क्रैम्प्स को भी गाजर के सेवन से दूर किया जा सकता है. मीनोपोज के बाद होने वाली समस्याओं को भी गाजर के सेवन से दूर किया जा सकता है.

हेयर फॉल को रोकता है- बालों को हेल्दी रखना है या बालों की ग्रोथ जल्दी बढ़ानी है तो गाजर खानी चाहिए. बालों के गिरने की समस्या को भी गाजर खाकर दूर किया जा सकता है.

इसके अलावा भी गाजर खाने के हैं अनेकों फायदे........

आंखों की रोशनी के लिए गाजर बहुत अच्छी होती है.

रोजाना गाजर खाने से चश्मे का नंबर भी घट सकता है.

शरीर में प्रोटीन की कमी को दूर करने के लिए गाजर का जूस पीना चाहिए.

गाजर में मौजूद कैल्शियम से हड्डियों को मजबूत रखा जा रखा जा सकता है.

पेट की समस्याओं को दूर करने के लिए फाइबर युक्त गाजर का सेवन करना चाहिए.

ब्‍लड शुगर का लेवल सामान्य रखने के लिए गाजर से बेहतर कुछ नहीं.

कॉलेस्ट्रॉल का लेवल कम करने के लिए गाजर का सेवन करना चाहिए.

गाजर में विटामिन सी होता है जो मसूडों को मजबूत करता है और मुंह की दुर्गन्ध को दूर करता है.

गाजर की सलाद खाने या गाजर का जूस पीने से चेहरे पर चमक आती है.

गाजर खून को साफ करती है और इसे खाने से कील-मुंहासों की समस्या दूर होती है.
(एबीपी न्यूज)


Date : 24-Oct-2019

दिवाली के लिए घर की सफाई तो आप कई दिनों पहले से शुरू कर देते है, लेकिन क्या आपने कभी इन 5 चीजों को भी साफ करने पर ध्यान दिया है? अगर नहीं, तो जान लीजिए इन 5 चीजों के बारे में जिन्हें साफ करना बहुत जरूरी है वरना ये आपकी सेहत के लिए हानिकारक हो सकती हैं -
1 घर का मेन गेट -
बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि घर के मुख्य दरवाजे व मेन गेट को भी रोजना साफ करना चाहिए। ऐसा करने से घर में पॉजिटिविटी आने के साथ ही इंफेक्शन का खतरा भी कम होता है।
2 डिश टॉवेल -
जिस तौलिये से आप घर के बर्तनों को पोंछते हैं उसे डिश टॉवेल कहते है। उन्हें भी रोजाना साफ करना जरूरी होता है वरना गंदे डिश टॉवेल इस्तेमाल करने से बर्तन साफ होने की बजाय गंदे होंगे और बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ जाएगा।3 किचन और बाथरूम का फर्श -
इन दो जगहों पर गंदगी फैलने की सबसे ज्यादा आशंका रहती है। बाथरूम और किचन को व इनमें लगे सिंक को नियमित अच्छे एंटी-बैक्टीरियल लिक्व‍िड से साफ करें।
4 रिमोट कंट्रोल -
चाहे टीवी का रिमोट हो या एसी का, कई लोग इन्हें छूते है, कई बार खाते खाते हुए उन्हीं हाथों से रीमोट का इस्तेमाल करते है। जिस वजह से उनमें गंदगी चिपक जाती है।
5 महिलाएं अपने पर्स को रोजाना साफ करें -
महिलाएं अपने पर्स में कई तरह का सामान रखती है, दिनभर उसे अपने साथ ले जाते हुए यहां-वहां, रखने का काम पड़ता है। ऐसे में पर्स नीचे से काफी गंदा हो जाता है। गंदे पर्स को अगर आपने घर के सोफे या बेड पर रखा तो इंफेक्शन का खतरा खतरा होता है। इसलिए अपने पर्स को नीचे से व अदंर से अच्छी तरह से साफ रखें।

 


Date : 24-Oct-2019

नई दिल्लीः भारत में लगभग हर दूसरे-तीसरे घर में तुलसी का पौधा देखने को मिलता है. खासकर हिंदू संस्कृति को मानने वाले परिवारों में तो तुलसी के पौधे का खास महत्व होता है. क्योंकि हिंदु संस्कृति में यह पौधा पूज्यनीय होता है औ यही कारण है कि हर घर में इसकी पूजा भी होती है, लेकिन पौराणिक महत्व के साथ ही इसका औषधीय महत्व भी होता है. तुलसी के पौधे को स्वास्थ्य के लिहाज से काफी फायदेमंद माना गया है. वैसे तो तुलसी के कई गुणों के बारे में हम सभी जानते हैं, लेकिन कई ऐसे भी गुण हैं जिनके बारे में जानना चाहिए. तो चलिए बताते हैं आपको तुलसी के कुछ अनजाने फायदों के बारे में.

इम्यूनिटी बूस्ट करे
तुलसी में भरपूर मात्रा में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लिमेंट्री गुण होते हैं, जो इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं. रोजाना इसके सेवन से फ्लू का खतरा भी दूर होता है

तनाव कम करे
तुलसी पूरे दिन की थकान को झट से दूर कर देती है. अगर आप तनाव से परेशान हैं तो रोजाना रात को दूध में कुछ पत्ते तुलसी के डालकर उबाल लें और फिर इस दूध को पीएं. यह नर्वस सिस्टम को आराम पहुंचाता है और तनाव कम करता है.
इम्यूनिटी बूस्ट करे
तुलसी में भरपूर मात्रा में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लिमेंट्री गुण होते हैं, जो इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं. रोजाना इसके सेवन से फ्लू का खतरा भी दूर होता है.
महिलाओं में पीरियड्स संबंधी समस्याएं
महिलाओं में पीरियड्स के दौरान कई तरह की समस्याएं होती हैं. इसकी वजह से वे बहुत परेशान रहती हैं. ऐसे में तुलसी के बीज का इस्तेमाल काफी फायदेमंद होता है. पीरियड्स में अनियमितता को दूर करने के लिए तुलसी के पत्तों का नियमित सेवन करना चाहिए.
सर्दी-जुकाम दूर करे
तुलसी का काढ़ा सर्दी और जुकाम में बहुत कारगर होता है. काढ़ा बनाने के लिए तुलसी पत्ते को पानी में डालकर उसमें काली मिर्च और मिश्री मिलाकर अच्छे से मिला लें और उसका सेवन करें. यह सर्दी में बहुत कारगर होता है.