सेहत / फिटनेस

23-May-2020

पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं

-अंजलि मिश्रा

अंतरर्राष्ट्रीय बही-खातों का हिसाब रखने वाली संस्था, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का कहना है कि सारी दुनिया जल्दी ही आर्थिक महामंदी का सामना करने जा रही है. कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते कई महीनों से बंद आर्थिक गतिविधियों के बाद वह ऐसा नहीं कहता तो आश्चर्य की बात होता. लेकिन जानकार यह आशंका भी जता रहे हैं कि कोरोना संकट सिर्फ पूरी दुनिया की आर्थिक व्यवस्था को ही नहीं बल्कि राजनीति, देशों के आपसी संबंधों से लेकर हमारे सामाजिक-व्यक्तिगत संबंधों तक को बदलने वाला साबित हो सकता है.

एक कड़वा सच यह भी है कि इनमें से ज्यादातर बदलाव नकारात्मक हो सकते हैं और भारत भी इनसे अछूता नहीं रहने वाला है. लेकिन इन तमाम बड़े-बड़े दावों और आशंकाओं के बीच कुछ छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव भी हैं, जिन्हें पिछले दिनों भारतीय समाज ने बहुत गंभीरता और तेजी के साथ अपनाया है. ये बदलाव इसलिए ध्यान खींचते हैं क्योंकि सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाला हमारा देश कई बार सही व्यवहार करने के मामले में बड़े ढीठ स्वभाव का दिखता रहा है. ऐसे में बीते कुछ सप्ताहों में यहां के एक बड़े हिस्से में आए ये पांच बदलाव बेहद मामूली होते हुए भी सुखद ठहराए जा सकते हैं.

हाथों की सफाई

मनोविज्ञान इंसानों के कभी-कभी ऑप्टिमिस्टिक बायस या अति-आशावादी रवैया दिखाने की बात कहता है. अति-आशावादी रवैया रखने वाले लोग किसी भी विपरीत परिस्थिति में यह मानकर चलते हैं कि वे बाकी लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं. हर इंसान कम या ज्यादा इसका शिकार होता ही है और यही वजह है कि दुनिया के ज्यादातर लोगों को लगता है कि उन्हें तो कोरोना वायरस का संक्रमण हो ही नहीं सकता है. यह अति-आशावाद भारतीयों की भी सबसे बड़ी खूबी (या खामी) कहा जा सकता है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण साफ-सफाई के लिए अब तक रहा हमारा लापरवाह रवैया है. मसलन, ऑफिस में काम करने के दौरान हम भारतीय दसियों चीजों को हाथ लगाने, लैपटॉप-फोन चलाने, नाक और सिर खुजलाने के अलावा भी जाने क्या-क्या करते रहते हैं. लेकिन जैसे ही कोई सहकर्मी खाने-पीने की कोई चीज आगे करता है, लपककर यह कहते हुए ले लेते हैं, मेरे हाथ तो साफ ही हैं! लेकिन कोरोना संकट ने हमें अपने हाथों को साफ रखना सिखा दिया है. हालांकि अभी ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है इतने थोड़े समय में यह आदत हर भारतीय के जीवन का स्थायी हिस्सा बन गई है. लेकिन कोरोना संकट अभी लंबा चलने वाला है और उम्मीद की जा सकती है कि इसके खत्म होने तक हाथों से लेकर घर तक की साफ-सफाई हम में से कइयों के जीवन का एक स्थायी अंग बन चुकी होगी.

छींकते या खांसते हुए आसपास वालों का ख्याल करना

छींकने को हमारे यहां अनैच्छिक क्रिया कहकर, जो कि यह है भी, लोग अक्सर मनमाने तरीके से जोर-जोर से छींकते देखे जा सकते हैं. ऐसा करते हुए वे अक्सर इस बात का भी ख्याल नहीं करते हैं कि उनका ऐसा करना कुछ लोगों को कितना असहज कर सकता है. कोरोना संकट के दौरान बरती जाने वाली अतिरिक्त सावधानी का असर यह हुआ है कि अब लोग रूमाल, टिश्यू, मास्क या कुहनी के सहारे बहुत संभलकर छींकते-खांसते दिखाई देते हैं. दिलचस्प यह है कि पहले सर्दी-जुकाम का मरीज अक्सर इस बात से परेशान रहता था कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है और लोग उसे कह रहे हैं कि अरे बस जुकाम ही तो हुआ है. लेकिन अब लोग जुकाम को इतनी गंभीरता से लेने लगे हैं कि किसी को दो-चार बार छींक या खांसी आ जाने पर ऐसी नज़रों से देखा जाता है जैसे सामने वाले ने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो. और मरीज कुछ इस तरह के भाव देता रह जाता है कि बस जुकाम ही तो है. ऐसे में किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए लोग साधारण सर्दी-जुकाम में भी अतिरिक्त सावधानी बरतते नजर आने लगे हैं.

अपनी बारी आने का इंतज़ार करना

कोरोना संकट की शुरूआत से ही सबसे ज्यादा ज़ोर फिजिकल डिस्टेंसिंग पर दिया जा रहा है. अब भी किसी सार्वजनिक स्थान पर खड़े लोगों को एक-दूसरे से कम से कम तीन फीट की दूरी पर खड़े होने की सलाह दी जा रही है. इसकी वजह से पिछले कुछ समय से सब्जी और राशन की दुकानों पर भी लंबी-लंबी लेकिन अनुशासनबद्ध कतारों को देखा जा सकता है. इसमें दोहरा अनुशासन यह है कि इन कतारों में भी लोग उन जगहों पर ही खड़े हो रहे हैं जहां पर उन्हें एक-दूसरे से दूर रखने वाले गोले बने होते हैं. सबसे दिलचस्प नज़ारा पिछले दिनों उन शराब की दुकानों पर दिखाई दिया जहां पहले हर वक्त भगदड़ सी मची रहा करती थी. कोरोना वायरस के प्रकोप की वजह से इन दुकानों पर भी लोग सैकड़ों मीटर लंबी लाइनों में शांति से अपनी बारी का इंतज़ार करते दिखाई दिए. ऐसा माना जा रहा है कि कोरोना प्रकोप शांत होने के बाद जीवन में जो बदलाव होंगे उसमें फिजिकल डिस्टेंसिंग एक ज़रूरी हिस्सा बनकर हमेशा के लिए रह जाने वाला है. ऐसे में हो सकता है कि हमारा समाज भी स्थायी तौर पर अपनी बारी का इंतजार करने वाला समाज बन जाये.

खाने-पीने या बाकी जरूरी सामान की बरबादी से बचना

आंकड़ों की मानें तो, सामान्य परिस्थितियों में लगभग 20 करोड़ लोग भारत में रोज़ाना भूखे पेट सोते हैं. वहीं, एक लाख क्विंटल खाना हर साल हमारे देश में डस्टबिन में फेंक दिया जाता है. इस भयावह आंकड़े में होटलों या सामाजिक आयोजनों में बरबाद होने वाले खाने के साथ-साथ वह खाना भी शामिल है जो मध्यवर्गीय घरों में बासी या बचा हुआ कहकर कूड़ेदानों या नालियों के हवाले कर दिया जाता है. कोरोना संकट के चलते खाने-पीने की चीजों की कमी का डर अब इनकी बरबादी कम होने की वजह भी बन रहा है. कुछ मध्यवर्गीय गृहणियों से हुई सत्याग्रह की अनौपचारिक बातचीत में उनका कहना था कि अब वे इस बात का ख्याल रखती हैं कि घर में उतना ही खाना बने जितना कि खपत हो सके और अगर कुछ बचता है तो पहले वह खत्म हो.


इसके अलावा, कई फिल्मी-सोशल मीडिया हस्तियों समेत आम लोगों का एक बड़ा तबका अक्सर यह कहता रहा है कि ईएमआई की सुविधा और हर समय मौजूद रहने वाले ऑनलाइन विकल्पों के चलते, वे तमाम ऐसी चीजें भी खरीद लेते थे जिनकी सही मायनों में उन्हें जरूरत ही नहीं है. लॉकडाउन ने बेज़ा खरीदारी की लत के शिकार ऐसे लोगों को भी होश में आने का मौका दे दिया है. यानी, यह कहा जा सकता है कि बहुत सारे लोग अब दाना-पानी से लेकर पैसों तक को बरबाद न करने का सबक कोरोना संकट के चलते सीख रहे हैं.

परिजनों या करीबी लोगों के संपर्क में रहना

लॉकडाउन के चलते करीब दो महीने से ज्यादा वक्त से अपने घरों में बंद लोग फोन और इंटरनेट के जरिए ही अपने परिवार और दोस्तों से जुड़ पा रहे हैं. लेकिन खास बात यह है कि वे ऐसा कर खूब रहे हैं. वे लोग जो कभी व्यस्त होने या फिर घरवालों को वरीयता न देने के चलते कभी-कभार ही उनसे संपर्क करते थे, अब घर की खैर-खबर नियमित तौर पर लेते दिखने लगे हैं. इतना ही नहीं, कई लोग तो अपने भूले-बिसरे दोस्तों और रिश्तेदारों को भी खोज-खोजकर उनका हालचाल जानने के बहाने खुद को व्यस्त और खुश रखने की कोशिश करते दिख रहे हैं. यह देखना दिलचस्प है कि एक ऐसे समय में जब लोग आपस में मिल तक नहीं पा रहे हैं, एक-दूसरे को अपेक्षाकृत ज्यादा समय दे रहे हैं.

इसके अलावा भी, कुछ ऐसे लोग जिनकी उपस्थिति हमारी रोजमर्रा का हिस्सा थी, जैसे हाउस-हेल्प, सफाईकर्मी, डिलीवरी बॉय या छोटे-मोटे काम करने वाले और कई लोग, उनका भी महत्व इस कठिन समय में समझ आने लगा है. इसलिए उनसे संपर्क रखने, उनकी मदद और सम्मान करने की ज़रूरत भी एक बड़ा तबका महसूस करता दिखने लगा है. कुल मिलाकर, आधुनिकता के चलते एकल परिवारों या अकेले होने को तरजीह देने वाले, हमारे आसपास के कई लोग अब यह बात स्वीकार करते दिखने लगे हैं कि अपने लोगों के करीब रहना, एक सोशल सर्कल का होना और जिंदगी आसान बनाने वाले कई लोगों की उपस्थिति हमारे लिए कितनी ज़रूरी है. (satyagrah.scroll.in)


19-May-2020

अगर आप दफ्तर जाने लगे हैं या आपको किसी आवश्यक काम से यात्रा करनी है तो भोजन से जुड़ी सावधानियां जानना आपके लिए आवश्यक है। बाहरी वातावरण में लोगों की मौजूदगी के कारण वहां भोजन करते समय ज्यादा सतर्क रहना होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन व अमेरिकी एजेंसी सीडीसी ने कार्यक्षेत्र व यात्रा के दौरान भोजन के समय सावधानी बरतने के विशेष निर्देश जारी किए हैं।

लंच टाइम में इन बातों का रखें ध्यान-
लंचटाइम में सहकर्मियों संग वक्त बिताने की आदत में कुछ बदलाव लाने होंगे। आप इस वक्त मास्क नहीं पहन सकते इसलिए आपसी सूझबूझ से भोजन करने का अलग-अलग वक्त तय करें ताकि शारीरिक दूरी बनी रहे। अपने भोजन व बर्तन को साथियों के साथ साझा न करें क्योंकि अगर दूसरे व्यक्ति के हाथ या बर्तन में वायरस लगा है तो आपके लिए खतरा पैदा हो जाएगा। अलग-अलग समय पर कैफेटेरिया में जाएं ताकि वहां भीड़ न लगे।

भोजन से नहीं फैलता संक्रमण-
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्पष्ट किया है कि भोजन और पानी से संक्रमण फैलने से जुड़े अब तक कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं। पर यह संभव है कि बाजार से खरीदकर लाते समय उस भोजन सामग्री की सतह पर कोरोना वायरस मौजूद हो।

पैकेटबंद सामग्री में बरतें सावधानी-
अगर आप पैकेटबंद भोजन खाने वाले हैं तो उस पैकेट को पहले धो लें ताकि उसकी सतह पर अगर वायरस लगा है तो हट जाए। फिर साबुन व पानी से 20 सेकंड तक हाथ धोएं और भोजन निकालें और सावधानीपूर्वक खाएं। क्रमश:

यात्रा के दौरान बाहर का न खाएं-
अगर आप यात्रा कर रहे हैं तो रास्ते में भोजन करने से बचें। छाछ, नींबू पानी आदि पी सकते हैं। घर में बना ऐसा भोजन लेकर चलें। खाना खाने से पहले और बाद में हाथ जरूर धोएं। भोजन के लिए कम भीड़ वाला और स्वच्छ स्थान ढूंढें।

घर का भोजन सबसे सुरक्षित-
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, घर में भोजन उचित तापमान पर पकाए जाने से उस खाद्य सामग्री की सतह पर अगर किसी बाहरी कारण से कोरोना वायरस मौजूद रह गया था तो वह पूरी तरह नष्ट हो जाता है।

इसलिए है सावधानी की जरूरत- 
टिफिन पैक होने से उसे बैग में रखकर दफ्तर ले जाने और लंच करने तक के वक्त में उसकी सतह ऐसे कई स्थानों के संपर्क में आ सकती है, जहां कोरोना वायरस मौजूद हो। बाहर भोजन करते समय ज्यादा सावधानी बरतनी होगी।

ये 4 तरीके अपनाकर ही खाएं- 
-सफाई : 
जहां भोजन करना है, उस सतह की सफाई और इस्तेमाल से पहले व बाद में बर्तन की सफाई सुनिश्चित करें। फल व सलाद धोकर खाएं लेकिन अंड्डा आदि न धोएं। 
-भोज्य पदार्थ अलग करना : 
कच्चा और पकाकर खाने वाली भोजन सामग्री को अलग-अलग टिफिन या कंटेनर में ही लेकर घर से चलें। 
-गर्म करना : 
घर में पका भोजन ही दफ्तर या यात्रा करने के दौरान खाने के लिए लेकर जाएं। माइक्रोवेब की सुविधा है तो भोजन उचित तापमान पर 30 से 60 सेकंड तक गर्म करें। 
-फ्रीज करना : 
ऑफिस के फ्रीज तापमान चार डिग्री और रेफ्रीजरेटर का तापमान -17 डिग्री तक रख सकते हैं।


19-May-2020

इस वक्त कोरोना वायरस से लड़ने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। कोविड-19 की दवा बनाने के लिए वैज्ञानिक व शोधकर्ता लगातार अपने प्रयास कर रहे हैं और इस बात से हम सभी वाकिफ हैं कि अभी कोरोना की दवा नहीं बनी है। लेकिन यदि आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत है तो आप कोरोना जैसी बीमारी को मात दे सकते हैं। हमारे शरीर में इम्युनिटी ही कोरोना से निपटने के लिए कारगर है इसलिए हमें सारा ध्यान अपनी इम्युनिटी को बढ़ाने पर देना चाहिए। यदि आप इस इस महामारी को मात देना चाहते हैं तो हमें यह सीखने की बहुत आवश्यकता है कि किन चीजों से इम्युनिटी बढ़ती है और किन चीजों से इम्युनिटी घटती है?
यदि आप नियमित योग करते हैं तो यह आपकी इम्युनिटी को मजबूत करने के लिए बहुत कारगर सिद्ध होगा। इसलिए इसका अभ्यास नियमित करें।
अगर आप रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना चाहते हैं तो अपनी दिनचर्या में व्यायाम या किसी खेल को शामिल करें। यह आपके स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है।
घर का बना शुद्ध भोजन व हरी सब्जियां

अपनी डाइट में पौष्टिक आहार लें। घर का बना हुआ ताजा खाना खाने से आप स्वस्थ रहते हैं और शरीर रोगों से लड़ने के लिए तैयार रहता है तथा आपकी इम्युनिटी मजबूत होती है। साथ ही हरी सब्जियां का सेवन जरूर करें।

आंवला (किसी भी रूप में खाएं)

आंवले का सेवन आपके लिए बहुत जरूरी है। यह आप किसी भी रूप में खा सकते हैं।
फल (खासकर खट्टे फल)

फल को अपनी डाइट में शामिल करें, खासकर खट्टे फल जिनमें अम्लीय तत्व प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जैसे संतरे, ग्रेपफ्रूट, मौसंबी, नीबू, नारंगी, संतरे आदि। यह विटामिन सी का सबसे अच्छा स्रोत माना जाता है।
तुलसी

प्रतिदिन तुलसी की चाय पीने से रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी वृद्धि होती है, साथ ही तुलसी के पत्तों को अच्छी तरह सुबह के समय चबाकर भी आप खा सकते हैं।
रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए इन्हें जरूर शामिल करें

दालें, गुड़, शुद्ध तेल। कोई भी रिफाइंड बिलकुल भी इस्तेमाल में न लाएं। दूध, दही, लस्सी व घी इन्हें अपनी डाइट में जरूर शामिल करें। ध्यान रहे, दही का सेवन आपको रात में नहीं करना है।

अब जानते हैं उन चीजों के बारे में, जो आपकी इम्युनिटी को कमजोर बनाती हैं।

मैदा व इससे बनी चीजें, जो आपके स्वास्थ्य को बहुत नुकसान पहुंचाती हैं। इनसे दूरी बनाएं, जैसे ब्रेड, नॉन, भटूरे, बर्गर, पिज्जा, जलेबी, समोसा, कचोरी, पाव (पाव भाजी वाला) इत्यादि बिलकुल भी न खाएं।
चीनी बिलकुल नहीं खाएं।

कोई भी जंकफूड न खाएं। इनसे दूरी बनाना ही बेहतर।

एल्युमीनियम के बर्तनों में खाना बनाना बंद करें।


10-May-2020

नई दिल्ली, 10 मई । अब तक हमें यह पता था कि मोटे लोगों में दिल की बीमारी, कैंसर और टाइप-2 टायबिटीज जैसे बीमारियों को होने का जोखिम ज़्यादा होता है। लेकिन अब शुरुआती रिसर्च में यह भी पता चला है कि मोटे लोगों को कोविड-19 के संक्रमण का ख़तरा भी ज़्यादा हो सकता है।
क्या इसके कोई प्रमाण मिले हैं?
इस सवाल का जवाब हालांकि कई प्रकार के अध्ययनों के बाद ही पक्के तौर पर मिल सकता है लेकिन विशेषज्ञों ने इन कुछ आँकड़ों के आधार पर इसका जवाब ढूंढने की कोशिश की है।
- ब्रिटेन में 17 हजार लोगों के ऊपर किए गए अध्ययन से पता चला है कि जो लोग मोटापे के शिकार थे और जिनका बॉडी-मास इंडेक्स 30 से ऊपर था, उनमें 33 फीसदी मृत्यु दर ज़्यादा है।
- एक दूसरे अध्ययन में ऐसे लोगों में मृत्यु दर दोगुनी पाई गई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर इनमें दिल की बीमारी और डायबिटीज जैसी दूसरी वजहें शामिल कर ली जाए तो यह आँकड़ा और अधिक हो जाता है।
- ब्रिटेन के आईसीयू में भर्ती हुए लोगों के ऊपर किए गए अध्ययन से यह बात सामने आई है कि वहाँ भर्ती कऱीब 34.5 प्रतिशत लोग ओवरवेट थे और 31.5 प्रतिशत मोटे थे और सात प्रतिशत मोटे और बीमार दोनों थे जबकि 26 प्रतिशत लोगों की बीएमआई सामान्य थी।
पूरी दुनिया को इस वक्त एक चीज का पूरी शिद्दत से इंतज़ार है- वैक्सीन।
शरीर के वजन और उनकी लंबाई का अनुपात बीएमआई कहलाता है। बीएमआई से हम किसी व्यक्ति के ओवरवेट, मोटे और स्वस्थ्य होने का पता लगाते हैं।
वल्र्ड ओबेसिटी फेडरेशन का कहना है कि जिन लोगों को कोरोना वायरस का संक्रमण हो रहा है, उनमें से बड़ी फीसदी उन लोगों की है जिनकी बीएमआई 25 से ऊपर है। अमरीका, इटली और चीन में हुए शुरुआती अध्ययनों से भी यही पता चला है कि अधिक बीएमआई एक अहम कारक है।
इसके अलावा अधिक उम्र के लोगों में भी कोरोना संक्रमण में गंभीर रूप से बीमार पड़ जाने का जोखिम तो है ही।
मोटे लोगों को क्यों है अधिक ख़तरा?
जितना अधिक वजन आपका होगा उतना ही ज्यादा चर्बी आपके शरीर में होगी और उतने ही कम आप फिट होंगे। इससे आपके फेफडों की क्षमता पर असर पड़ता है। इससे आपके रक्त तक ऑक्सिजन पहुँचने में दिक्क़त होती है और फिर इससे रक्त के प्रवाह और दिल पर असर पड़ता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो के प्रोफेसर नवीद सत्तार बताते हैं, अधिक वजन वाले लोगों को अधिक ऑक्सीजन की जरूरत होती है। इससे उनके सिस्टम पर अधिक जोर पड़ता है। कोरोना जैसे संक्रमण के दौरान यह खतरनाक हो सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ रिडिंग के डॉक्टर ड्यान सेलाया कहते हैं, अधिक वजन वाले शरीर में महत्वपूर्ण अंगों को ऑक्सिजन की कमी से जूझना पड़ता है।
यह एक कारण है कि क्यों अधिक वजन वाले या फिर मोटे लोगों को आईसीयू में ऑक्सिजन देने की अधिक जरूरत पड़ती है और उनकी किडनी का भी विशेष ख्याल रखना पड़ता है।
मोटे लोगों में कैसे संक्रमण का जोखिम ज्यादा होता है?
वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि कोशिकाओं में मौजूद एसीइ-2 नाम का एन्जाइम कोरोना वायरस के शरीर में प्रवेश करने का मुख्य रास्ता है।
यह एन्जाइम बड़े पैमाने पर फैटी कोशिकाओं में पाया जाता है तो जो लोग अधिक वजन वाले होते हैं, उनमें यह चूंकि फैटी कोशिकाएँ ज़्यादा होती हैं इसलिए उनके संक्रमित होने का जोखिम ज़्यादा होता है।
क्या इम्यून सिस्टम पर भी असर पड़ता है मोटापा का?
संक्रमण से हम कितना प्रभावित होंगे इसकी सबसे महत्वपूर्ण वजह है हमारा इम्यून सिस्टम। यह वायरस के हमले के दौरान हमारे शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बतलाता है। मोटे लोगों में निश्चित तौर पर यह प्रतिरोधी क्षमता बहुत अच्छी नहीं होती है।
यह संक्रमण के दौरान मैक्रोफेज फैटी कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त कर देता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक इससे साइटोकीन स्ट्रॉम शरीर में पैदा होता है। यह एक तरह का रिएक्शन होता है जो जानलेवा भी हो सकता है। यह शरीर प्रतिरोधक क्षमता के अत्यधिक सक्रिय होने की वजह से होता है।
डॉक्टर ड्यान सेलाया बताते हैं कि एक खास तरह की फैट कोशिका को मैक्रोफेज आसानी से अपना शिकार बना लेता है। यही वजह है कि काले और अफ्ऱीकी लोग जिनमें इस तरह की कोशिका ज़्यादा होती हैं, उनमें डायबिटीज के मरीज़ अधिक होते हैं और वायरस का संक्रमण उन्हें आसानी से हो जाता है।
मोटापे के साथ दूसरी समस्याएँ भी आती हैं।
मोटापे के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी दूसरी समस्याएँ भी आती हैं मसलन फेफड़ों का कमजोर हो जाना, किडनी प्रभावित होना और टाइप-2 डायबिटीज का शिकार होना।
रक्त के थक्के भी जम सकते हैं। ऐसी स्थिति में शरीर पर अधिक ज़ोर पड़ता है। कोरोना से संक्रमित होने के बाद इन सभी वजहों से भी ऐसे मरीज़ों में जोखिम बढ़ जाता है।
मोटे लोगों को अस्पताल में भी केयर करने में दिक्क़तें ज़्यादा आती हैं। अधिक वजन की वजह से उनकी स्कैनिंग करने या फिर उन्हें घुमाने में भी समस्या होती है। इसलिए स्वस्थ्य रहने के लिए कम और संतुलित खाना खाएं। नियमित तौर पर व्यायाम करें।
तेज़ रफ़्तार में चलना, जॉगिंग और साइकलिंग बेहतर विकल्प है। आप सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए भी यह कर सकते हैं।(बीबीसी)
 


07-May-2020

अगर आपको लगता है कि सेक्‍स करने के तुरंत बाद आप प्रेगेनेंट हो सकती हैं तो ऐसा नहीं है। जानिए कि सेक्‍स करने के बाद गर्भधारण में कितना समय लगता है। सेक्स करने के बाद प्रेगनेंट होने में लगता है इतना समयसेक्‍स के बाद ही प्रेग्‍नेंसी होती है, ये बात तो साफ है लेकिन क्‍या आप ये जानते हैं कि सेक्‍स करने के कितने समय या दिनों बाद कंसीव होता है? 

जी हां, ऐसा नहीं है कि सेक्‍स करने के तुरंत बाद ही आप कंसीव कर लेती हैं। अब आपके मन में भी ये सवाल उठ रहा होगा कि आखिर प्रेग्‍नेंट होने के लिए सेक्‍स करने के बाद कंसीव करने में कितना समय लगता है। तो चलिए जानते हैं कि कंसीव करने की प्रक्रिया क्‍या है और इसमें कितना समय लगता है। 
कंसेप्‍शन में कितना समय लगता है
सेक्‍स के तीन मिनट बाद कंसेप्‍शन (गर्भधारण) हो सकता है या इसमें पांच दिन का समय भी लग सकता है। जब महिला का एग फैलोपियन ट्यूब में पुरुष के स्‍पर्म से मिलता है तो इसे फर्टिलाइजेशन कहते हैं। फर्टिलाइजेशन के लिए महिला ओवुलेशन पीरियड में होनी चाहिए। फर्टिलाइजेशन के पांच से दस दिनों के बाद इंप्‍लांटेशन होता है।

जब एग गर्भाशय की लाइनिंग तक पहुंच जाता है तब वह भ्रूण बनाने लगता है। इसे इंप्‍लांटेशन कहते हैं। सेक्‍स करने के कुछ मिनटों के अंदर ही फर्टिलाइजेशन हो सकता है लेकिन इसमें हो सकता है कि आपको इसमें तीन दिन भी लग जाएं।

सेक्‍स करने के बाद कंसीव करने का समय
अध्‍ययनों में पाया गया है कि स्‍पर्म को फैलोपियन ट्यूबों के जरिए गर्भाशय ग्रीवा तक पहुंचने में दो से तीन मिनट का समय लगता है। फैलोपियन ट्यूब में ही स्‍पर्म एग से मिलता है। अगर महिला के शरीर में एग तैयार हो तो सेक्‍स के बाद कंसेप्‍शन में ज्‍यादा से ज्‍यादा तीन मिनट लग सकते हैं।

माना जाता है कि महिलाओं के प्रजनन तंत्र में स्‍पर्म पांच दिनों तक रह सकता है। इसका मतलब है कि ऐसा जरूरी नहीं है कि आप सेक्‍स करने वाले दिन ही प्रेगनेंट हो जाएं। अगर आपने सोमवार के दिन संभोग किया है और आप गुरुवार को ओवुलेट होती हैं तो सेक्‍स करने के कई दिनों बाद आपका कंसेप्‍शन हो सकता है।

हर महिला में गर्भधारण अलग होता है
चूंकि, हर महिला का मासिक चक्र और शरीर अलग होता है इसलिए गर्भधारण का समय भी इनमें अलग हो सकता है। ऐसे कई कारक हैं जो महिलाओं के गर्भधारण करने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें उम्र, स्‍वास्‍थ्‍य स्थिति, प्रजनन अंगों एवं तंत्र का स्‍वस्‍थ होना और आप कितनी बार सेक्‍स करते हैं, शामिल है।

कुछ महिलाएं सेक्‍स करने के बाद जल्‍दी प्रेगनेंट हो जाती हैं तो कुछ महिलाओं को ज्‍यादा समय लगता है।

सेक्‍स के बाद इंप्‍लांटेशन में कितना समय लगता है?

जब स्‍पर्म एग तक पहुंचकर उसे निषेचित करते हैं, तब कंसेप्‍शन होता है। जब फर्टिलाइज एग (जो कि भ्रूण का रूप ले चुका होता है) गर्भाशय की लाइनिंग तक पहुंचता है, तब इंप्‍लांटेशन होता है। ये सब होने तक आप गर्भवती नहीं होती हैं। वहीं फर्टिलाइजेशन होने के तुरंत बाद इंप्‍लांटेशन नहीं होता है।

कई लोगों को लगता है कि फर्टिलाइजेशन गर्भाशय में होता है लेकिन ऐसा नहीं है। फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया फैलोपियन ट्यूब में होती है।

कंसेप्‍शन के बाद भ्रूण को गर्भाशय की लाइनिंग तक पहुंचकर इंप्‍लांट होने के लिए विकास के कई चरणों से गुजरना पड़ता है। इसे फैलोपियन ट्यूब से गर्भाशय में भी जाने की जरूरत होती है। इस प्रक्रिया में कुछ दिन लग जाते हैं। वहीं इसके बाद होने वाला इंप्‍लांटेशन फर्टिलाइजेशन के पांच से दस दिनों के बाद होता है।

जैसा कि हमने ऊपर भी बताया कि सेक्‍स करने के कुछ मिनटों या लगभग पांच दिनों के बाद फर्टिलाइजेशन हो सकता है। इस हिसाब से सेक्‍स करने के पांच या ज्‍यादा से ज्‍यादा पंद्रह दिनों के बाद इंप्‍लांटेशन हो सकता है।

सेक्‍स के बाद प्रेग्‍नेंसी के लक्षण कब दिखते हैं?

सेक्‍स करने के कुछ मिनट या दिनों बाद फर्टिलाइजेशन होते ही आपको प्रेग्‍नेंसी के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। जब तक भ्रूण का इंप्‍लांटेशन नहीं होता, तब तक प्रेग्‍नेंसी के लक्षण दिखने शुरू नहीं होते हैं। वहीं इंप्‍लांटेशन के समय पर भी प्रेग्‍नेंसी के लक्षण नहीं दिखते हैं। वहीं कुछ महिलाओं को पीरियड्स की तारीख गुजरने के कुछ दिनों बाद तक भी प्रेग्‍नेंसी के लक्षण महसूस नहीं होते हैं।

सेक्‍स के बाद लगभ्‍ग सात दिनों के अंदर आपको प्रेग्‍नेंसी महसूस हो सकता है। आमतौर पर प्रेग्‍नेंसी के लक्षण सेक्‍स करने के बाद दो से चार हफ्तों के अंदर दिखाई देते हैं।

इस तरह आप समझ सकती हैं कि सेक्‍स करने के बाद कितनों दिनों में आप गर्भवती हो सकती हैं। (नवभारतटाइम्स)
 


01-May-2020

मेडिटेशन अर्थात ध्यान। ध्यान करना बहुत ही सरल है। मात्र 5 मिनट का ध्यान चमत्कारिक लाभ दे सकता है। आओ जानते हैं कि कोराना संकट के दौर और लॉकडाउन में ध्यान करना क्यों जरूरी है।

1. ध्यान का अर्थ : ध्यान के कई अर्थ है। ध्यान का मूल अर्थ है जागरूकता, अवेयरनेस, होश, साक्ष‍ी भाव और दृष्टा भाव।
विचारों पर नियंत्रण है ध्यान। लेकिन ध्यान का अर्थ स्मरण और एकाग्रता को भी माना जाता है। सही मायने में ध्यान से आप रिफ्रेश और रिचार्ज हो जाते हैं।


2. ध्यान क्यों : निरोगी रहने के लिए ध्यान करना जरूरी है। ध्यान से उच्च रक्तचाप नियंत्रित होता है। सिरदर्द दूर होता है। ध्यान से शरीर में स्थिरता बढ़ती है। यह स्थिरता शरीर को मजबूत करती है। ध्यान से मन और मस्तिष्क शांत रहता है। ध्यान आपके होश पर से भावना और विचारों के बादल को हटाकर शुद्ध रूप से आपको वर्तमान में खड़ा कर देता है।

डॉक्टर कहते हैं कि डर से आपकी प्रतिरोधक क्षमता पर असर पड़ता है। इसीलिए कहा गया है कि ध्यान से शरीर में प्रतिरक्षण क्षमता (इम्यून) का विकास होता है। ध्यान करने से तनाव नहीं रहता है। दिल में घबराहट, भय और कई तरह के विकार भी नहीं रहते हैं।

3. कैसे करें ध्यान?
ध्यान करने के लिए सबसे पहले स्नान आदि से निवृत्त होकर कुश आसन पर सुखासन में आंखे बंद करके बैठ जाएं। बस आपको 5 मिनट तक के लिए आंखें बंद करके रखना है। इस दौरान शरीर को हिलाना डुलाना नहीं है।

इस दौरान आंखों के सामने के अंधेरे को देखते रहना और श्वासों के आवागमन को महसूस करते रहना है। इस दौरान आपके भीतर कई विचार आएंगे और जाएंगे। उन्हें होशपूर्वक देखें कि एक विचार आया और गया फिर ये दूसरा विचार आया। बस यही करना है। मानसिक हलचल को बस देखें। श्वास की गति अर्थात छोड़ने और लेने पर ही ध्यान देंगे तो मनसिक हलचल बंद हो जाएगी। आप पर देखें और समझें कि क्यों में व्यर्थ के विचार कर रहा हूं?

आप ये भी कर सकते हैं कि बार की आवाजों को ध्यान से सुनते रहें। ध्यान दें, गौर करें कि बाहर जो ढेर सारी आवाजें हैं उनमें एक आवाज ऐसी है जो सतत जारी रहती है- जैसे प्लेन की आवाज जैसी आवाज, फेन की आवाज जैसी आवाज या जैसे कोई कर रहा है ॐ का उच्‍चारण। अर्थात सन्नाटे की आवाज। इसी तरह शरीर के भीतर भी आवाज जारी है। ध्यान दें। सुनने और बंद आंखों के सामने छाए अंधेरे को देखने का प्रयास करें। बस प्रतिदिन पांच मिनट तक यही करना है। एक दिन स्वत: ही ध्यान घटित होगा।


01-May-2020

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), जोधपुर के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के मुताबिक धूम्रपान करने वाले लोग कोरोना वायरस संक्रमण की कगार पर हो सकते हैं। तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने की कोरोना वायरस की प्रकृति के आधार पर यह दावा किया गया है।

इस अध्ययन ने उन लोगों को भी आगाह किया है, जिनमें कोविड-19 के लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं लेकिन उनके सूंघने की क्षमता कम हो गई और खाते वक्त स्वाद आना कम हो गया है। लोगों को ये लक्षण महसूस होते ही स्व पृथक-वास में रहना चाहिए और विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए।

अमेरिकन केमिकल सोसाइटी द्वारा प्रकाशित प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय जर्नल में ‘कोविड-19 महामारी की न्यूरोलॉजिकल अंतर्दृष्टि’ शीर्षक वाले अध्ययन के मुताबिक संक्रमित लोगों की सूंघने और स्वाद पाने की क्षमता कम होना उन्हें उनके पूरी तंत्रिका तंत्र को और उनके मस्तिष्क की अंदरूनी संरचना को विनाशकारी प्रभाव के साथ वायरस के संक्रमण के लिए आसान निशाना बना देता है।

रोगियों के मस्तिष्क की जांच करने का सुझाव-
अध्ययन दल का नेतृत्व सुरजीत घोष ने किया है जो आईआईटी जोधपुर में प्राध्यापक हैं। घोष ने कहा कि कोविड-19 रोगियों का न्यूरोलॉजिकल संक्रमण की जद में आना धूम्रपान जैसी चीजों से बढ़ सकता है। एक प्रायोगिक अध्ययन के मुताबिक धूम्रपान मानव ग्राही और निकोटिनिक ग्राही के बीच संपर्क के चलते कोविड-19 के संक्रमण के खतरे को बढ़ा सकता है। अध्ययन दल ने कोविड-19 संक्रमित रोगियों के मस्तिष्क की जांच करने और उसका विश्लेषण करने का सुझाव दिया है।

अध्ययन में कहा गया है कि जब कोविड-19 रोगियों के मस्तिष्क की जांच की जाती है, तब उम्रदराज व्यक्ति और पहले से किसी बीमारी से ग्रसित व्यक्ति पर धूम्रपान के पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करने से कोविड-19 रोगियों पर धूम्रपान के अतिरिक्त खतरे को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।


27-Apr-2020

वेबक्लूजिव

दस्ताने पहनने से बढ़ सकता है कोरोना का खतरा


कोरोना वायरस के डर से लोगों ने मास्क और दस्ताने खरीद तो लिए हैं लेकिन ये डिस्पोजेबल ग्लव्स क्या वाकई आपको वायरस से बचा सकते हैं? ऐसा ना हो कि ये दस्ताने ही आपकी बीमारी का कारण बन जाएं.
    
अलेक्जांडर फ्रॉएंड

धीरे धीरे अब कई देश लॉकडाउन से बाहर आने की कोशिश कर रहे हैं. लॉकडाउन के दौरान भी जब लोग जरूरत का सामान लेने घर से बाहर निकलते हैं तो ज्यादातर लोगों की कोशिश होती है कि मास्क और दस्ताने पहन कर ही निकला जाए. यही वजह है कि कई देशों में तो दुकानों पर अब ना मास्क मिल रहे हैं और ना ही डिस्पोजेबल ग्लव्स. बीमारी से बचने के लिए दस्तानों का इस्तेमाल जाहिर सी बात है. अब तो सब जानते हैं कि कोरोना वायरस कैसे फैलता है. किसी संक्रमित व्यक्ति के आपके आसपास खांसने या छींकने पर आपको संक्रमण हो सकता है. या फिर खांसने और छींकने के दौरान मुंह से निकले ड्रॉपलेट अगर किसी सतह पर पड़ें और आप उस सतह को हाथ लगा दें और फिर गलती से अपने हाथ से चेहरा, आंखें, नाक या मुंह को छू लें तो भी संक्रमण हो सकता है.

ऑपरेशन के दौरान डॉक्टर ग्लव्स पहनते हैं. बीमार लोगों की देखभाल के दौरान नर्स भी ग्लव्स पहनती हैं. मकसद यह होता है कि इलाज करने वाला मरीज के खून या शरीर से निकलने वाले किसी भी तरल के संपर्क में ना आए. बैक्टीरिया या वायरस से ये बहुत ही कम वक्त के लिए ही बचा पाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि ग्लव्स जिस मैटीरियल से बने होते हैं वह पोरस होता है. जितनी ज्यादा देर तक इन्हें पहन कर रखा जाएगा कीटाणुओं के दस्ताने के भीतर घुस कर त्वचा में पहुंचना उतना आसान होता रहेगा. यही वजह है कि अस्पताल में काम करने वाले लोग बार बार दस्ताने बदलते हैं और हर बार उन्हें उतारने के बाद डिसइन्फेक्टेंट से अपने हाथ अच्छी तरह साफ करते हैं. यानी ग्लव्स पहनने का मतलब यह नहीं होता कि हाथ धोने से छुट्टी मिल गई.

ग्लव्स के झांसे में ना आएं
डिस्पोजेबल ग्लव्स विनायल, लेटेक्स या फिर नाइट्राइल के बने होते हैं. इन्हें पहन कर सुरक्षा का अहसास तो होता है. लेकिन यह अहसास आपको धोखा दे सकता है. जब लोग सामान खरीदने के लिए ग्लव्स पहन कर घर से बाहर निकलते हैं तो कोशिश जरूर करते हैं कि चेहरे को हाथ ना लगाएं लेकिन चूक तो हो ही सकती है. और खरीदारी के दौरान अगर आप ग्लव्स पहन कर अपने फोन को छू रहे हैं तो वायरस आसानी से आपके फोन की सतह पर फैल सकता है. फिर घर जा कर आप भले ही दस्ताने उतार कर फेंक दें लेकिन फोन को तो दोबारा हाथ में लेंगे ही. और वायरस को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि शरीर के अंदर नंगे हाथों से जाना है या ग्लव्स के जरिए.

इन कारणों से डॉक्टर अब मांग कर रहे हैं कि लोगों को इस बारे में जागरूक किया जाए कि दस्तानों का गलत इस्तेमाल संक्रमण के खतरे को और भी ज्यादा बढ़ा सकता है. वैसे भी डिस्पोजेबल ग्लव्स पहन कर हाथों में पसीना जल्दी आने लगता है. बैक्टीरिया और वायरस को फैलने के लिए यही तो चाहिए. जर्मनी के डॉक्टर मार्क हानेफेल्ड ने तो ट्विटर और फेसबुक पर यहां तक लिखा, "सार्वजनिक जगहों पर मेडिकल ग्लव्स पहनना बंद कीजिए. यह स्वास्थ्य से जुड़ी बहुत बड़े स्तर पर हो रही गड़बड़ी है. ग्लव्स के नीचे गर्म और नम माहौल में रोगाणु आसानी से बढ़ते हैं. उन्हें उतारने के बाद हाथों को डिसइन्फेक्ट ना कर के आप अपने हाथों पर गटर लिए घूम रहे हैं. मुबारक हो!"

क्या है सही इस्तेमाल का तरीका?
जर्मनी के एक अन्य डॉक्टर येंस मैथ्यूस का भी यही मानना है. जर्मन रेडियो एसडब्ल्यूआर3 को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "आपको वायरस से बचाने की जगह यह उल्टा काम कर रहे हैं." मैथ्यूस का कहना है कि साफ हाथ की तुलना में एक डिस्पोजेबल ग्लव कई गुणा ज्यादा बैक्टीरिया जमा कर सकता है. इसी तरह एक वैज्ञानिक डॉक्टर जैकलीन गिल ने भी सोशल मीडिया पर ग्लव्स के इस्तेमाल को ले कर अपनी चिंता व्यक्त की. अपनी पोस्ट में उन्होंने विस्तार से समझाया कि डिस्पोजेबल ग्लव्स को सही तरीके से कैसे इस्तेमाल करना है और इनके गलत इस्तेमाल से क्या खतरा हो सकता है.

ऑस्ट्रियन सोसायटी फॉर हॉस्पिटल हाइजीन के अध्यक्ष डॉक्टर ओयान असादियान भी सालों से डिस्पोजेबल ग्लव्स के गलत इस्तेमाल को ले कर चेतावनी देते रहे हैं. एक जर्मन विज्ञान पत्रिका से बात करते हुए उन्होंने कहा, "रोजमर्रा की जिंदगी में तो मैं ग्लव्स पहनने की हिदायत उस मेडिकल स्टाफ को भी नहीं दूंगा जिसे पूरी तरह ट्रेनिंग नहीं मिली है. ग्लव्स के सही इस्तेमाल के लिए अच्छी खासी जानकारी और तजुर्बे की जरूरत होती है. उन्हें इस तरह से उतारना होता है कि ग्लव्स के कीटाणु ग्लव्स पर ही रहें और हाथों, कलाइयों या फिर आस्तीन पर ना लगें."

इसलिए अगर आप खुद को और अपने आसपास वालों को कोरोना वायरस से बचाना चाहते हैं तो डिस्पोजेबल ग्लव्स के इस्तेमाल से बचें. कोरोना वायरस से बचना है, तो साबुन से अच्छी तरह हाथ धोएं, लोगों से उचित दूरी बनाए रखें और घर पर रहें. अगर फिर भी आपका मन नहीं मानता है और आप इनका इस्तेमाल करना ही चाहते हैं तो इस्तेमाल के फौरन बाद इन्हें फेंक दें. ध्यान रहे इन्हें लापरवाही से इधर उधर पड़े ना रहने दें. और उतारने के बाद अच्छी तरह साबुन या डिसइन्फेक्टेंट से हाथ साफ करें.

जर्मनी का रॉबर्ट कॉख इंस्टीट्यूट मास्क और ग्लव्स दोनों के लिए यही हिदायत देता है कि इस्तेमाल के बाद इन्हें प्लास्टिक के थैले में कस कर बांध दें और फिर कूड़ेदान में डाल दें. अगर सुपरमार्केट में शॉपिंग कर रहे हैं तो बाहर निकलने के बाद इन्हें शॉपिंग कार्ट या शॉपिंग बास्केट में छोड़ने की लापरवाही हरगिज ना करें.

https://www.dw.com/hi/can-disposable-gloves-save-you-from-corona-virus/a-53126945


24-Apr-2020

अमरीकी विज्ञानियों का दावा - सूरज की किरणों में जल्दी खत्म हो जाता है कोरोना वायरस

वॉशिंगटन, 24 अप्रैल।  अमेरिका के अधिकारियों ने एक रिसर्च के हवाले से बताया है कि सूरज की किरणों के संपर्क में आते ही कोरोनावायरस जल्दी खत्म हो जाता है। हालांकि इस रिसर्च को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है क्योंकि बाहरी तौर पर इसका मूल्यांकन किया जा रहा है। होमलैंड सिक्योरिटी के साइंस एंड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट के एडवाइजर विलियम ब्रायन ने व्हाइट हाउस में पत्रकारों को बताया कि सरकारी वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च में पाया है कि सूरज की किरणों का पैथोगेन पर संभावित असर पड़ता है।

उन्होंने कहा, आज तक की हमारी रिसर्च में सबसे खास बात यह पता चली है कि सौर प्रकाश सतह और हवा में इस वायरस को मारने की क्षमता रखता है। तापमान और नमी में भी इसी तरह के नतीजे सामने आए हैं। ब्रायन ने मैरीलैंड स्थित नेशनल बायोडिफेंस एनालिसिस एंड काउंटर मेजर्स सेंटर की एक रिसर्च को भी प्रस्तुत किया। इसके अनुसार देखा गया कि 21 से 24 डिग्री सेल्सियस तापमान (20 फीसदी नमी) में करीब 18 घंटे में वायरस आधा खत्म हो गया था। दरवाजों के हैंडल और स्टेनलेस स्टील पर भी इसका असर इतना ही था। नमी को 80 फीसदी बढ़ाए जाने के बाद आधा वायरस 6 घंटे में खत्म हो गया। जब इसी परीक्षण को सूरज की किरणों के बीच किया गया तो इसे खत्म होने में दो मिनट लगे।

समान परिस्थितियों में हवा में यह वायरस डेढ़ मिनट में खत्म हो जाता है। ब्रायन ने अपनी बात यह कहते हुए खत्म की कि गर्मी के मौसम में इस तरह का वातावरण पैदा होगा कि यह वायरस लोगों में कम फैलेगा। उन्होंने इस बात को भी साफ किया कि यह हमारे लिए गैर-जिम्मेदाराना होगा कि अगर हम मानें कि गर्मी आते ही यह वायरस पूरी तरह से खत्म हो जाएगा और सब मुक्त हो जाएंगे और लोग इसके बचाव से जुड़ी गाइडलाइन को अनदेखा करेंगे। लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग व अन्य बचाव के तरीके फिर भी अपनाते रहने होंगे।

टेक्सास स्थित ए एंड एम यूनिवर्सिटी में बॉयोलॉजिकल साइंसेज के चेयरमैन बेंजामिन न्यूमैन ने इस बारे में कहा, अच्छा होगा अगर पता चले कि ये टेस्ट किस तरह से किया गया है और नतीजों को किस आधार पर मापा गया है। यह खराब तरीके से नहीं किया गया होगा क्योंकि वायरस को गिनने के कई तरीके होते हैं। ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे किस दृष्टिकोण से पढऩा चाहते हैं।

गर्म देशों में इस वायरस के फैलने के कम ही मामले सामने आए हैं। ऑस्ट्रेलिया में कोरोना के 7000 मामले सामने आए और 77 लोगों की मौत हुई। कई अन्य देशों में भी इस वायरस के फैलने के कम ही मामले सामने आए। अमेरिकी स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि भले ही कोविड-19 के मामले गर्मियों में धीमे हो जाते हैं, अन्य बीमारियों की तरह सर्दी में फिर से इसके बढऩे की संभावना है। फिलहाल इस पर रिसर्च चल रही है और जल्द सार्वजनिक तौर पर इसकी घोषणा की जाएगी। काफी समय पहले भी इस बारे में कहा गया था कि अल्ट्रावायलेट लाइट वायरस पर प्रभाव डालती है। (एनडीटीवी)


20-Apr-2020

जारिया गोवेट
नई दिल्ली, 20 अप्रैल। कोरोना वायरस से पैदा हुई महामारी यानी कोविड-19 का प्रकोप किस दवा से खत्म होगा? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए दुनिया भर के शोधकर्ता मेहनत कर रहे हैं।
अभी तक एक ही बात साफ है कि जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत है उन पर कोविड-19 का हमला घातक नहीं होता। अब बाजार इसी बात को भुनाने में लग गया है। प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के अनेक उपाय मीडिया, सोशल मीडिया पर सुझाए जा रहे हैं।
ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। हर महामारी के समय में ऐसी बातें होती रहती हैं। 1918 में जब स्पेनिश फ्लू फैला था तब भी इसी तरह की बातें हुई थीं और आज 2020 में भी ऐसा ही देखने को मिल रहा है। हालांकि इन सौ वर्षों में मेडिकल साइंस के लिहाज़ से इंसान ने काफ़ी तरक्की कर ली है।
हाल में इन दिनों एक अफवाह सोशल मीडिया पर खूब वायरल है। कहा जा रहा है कि ज़्यादा से ज़्यादा हस्तमैथुन से ब्लड सेल बढ़ते हैं। साथ ही ऐसे फल खाने की सलाह दी जा रही है जिनमें विटामिन-सी और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में हो। बहुत से लोग तो प्रो-बायोटिक्स लेने की सलाह भी दे रहे हैं। कोई कह रहा है कि ग्रीन-टी और लाल मिर्च से कोविड-19 के कमजोर किया जा सकता है।
रिसर्च कहती है कि सुपर फूड बाजार का फैलाया हुआ एक मिथक है। साइंस की रिसर्च में इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि इनसे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। अमरीका की येल यूनिवर्सिटी की इम्युनोलॉजिस्ट अकीको इवासाकी का कहना है कि प्रतिरोधक क्षमता के तीन हिस्से होते हैं-त्वचा, श्वसन मार्ग और म्यूकस झिल्ली। ये तीनों हमारे शरीर में किसी भी संक्रमण रोकने में मददगार हैं। अगर कोई वायरस इन तीनों अवरोधकों को तोड़कर शरीर में घुस जाता है, तो फिर अंदर की कोशिकाएं तेजी से सतर्कता बढ़ाती हैं और वायरस से लडऩा शुरू कर देती हैं।
अगर इतने भर से भी काम नहीं चलता है तो फिर एडॉप्टिव इम्यून सिस्टम अपना काम शुरू करता है। इसमें कोशिकाएं, प्रोटीन सेल और एंटीबॉडी शामिल हैं। शरीर के अंदर ये रोग प्रतिरोधक क्षमता उभरने में कुछ दिन या हफ्ता भर लग सकता है। एडॉप्टिव इम्यून सिस्टम कुछ खास तरह के विषाणुओं से ही लड़ सकता है।
हल्की खांसी, नजला, बुखार, सिरदर्द के लक्षण किसी वायरस की वजह से नहीं होते हैं। बल्कि ये हमारे शरीर की उस प्रतिरोधक क्षमता का हिस्सा होते हैं जो हमें जन्म से मिलती है। बलगम के जरिए बैक्टीरिया को बाहर निकालने में मदद मिलती है। बुखार, शरीर में वायरस के पनपने से रोकने का माहौल बनाता है। ऐसे में अगर किसी के कहने पर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली चीजों का सेवन कर भी लिया जाए, तो उसका असल में कोई फायदा होने नहीं वाला है।
अक्सर लोग मल्टी विटामिन के सप्लीमेंट इस उम्मीद में लेते रहते हैं कि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाएगी। रिसर्च कहती हैं कि जो लोग पूरी तरह सेहतमंद हैं उन्हें इसकी ज़रूरत ही नहीं।
अतिरिक्त सप्लीमेंट लेने की आदत का शिकार सिर्फ आम इंसान नहीं हैं। पढ़े-लिखे लोग भी इस जाल में फंस जाते हैं। मिसाल के लिए दो बार नोबेल अवॉर्ड विजेता लाइनस पॉलिंग जुकाम से लडऩे के लिए हर रोज 18,000 मिलीग्राम विटामिन सी लेने लगे। ये मात्रा शरीर की जरूरत से 300 गुना ज़्यादा थी। विटामिन-सी, नजला जुकाम से लडऩे में बहुत थोड़ी ही मदद कर पता है।
इसे लेकर बाजार का बिछाया हुआ मायाजाल ज़्यादा है। जानकारों का कहना है कि विकसित देशों में जो लोग संतुलित आहार लेते हैं, उन्हें अपने खाने से ही शरीर की जरूरत के मुताबिक विटामिन-सी मिल जाता है। वहीं विटामिन-सी का ज़्यादा सेवन गुर्दे में पथरी की वजह बन सकता है।
जानकारों के अनुसार जब तक शरीर में किसी विटामिन की कमी ना हो, तब तक किसी भी तरह का सप्लीमेंट हानिकारक हो सकता है। सिर्फ विटामिन-डी का सप्लीमेंट ही फायदेमंद साबित हो सकता है।
अकीका इवासाकी के मुताबिक बहुत सी स्टडी में पाया गया है कि विटामिन-डी की कमी से सांस संबंधी रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। इसकी कमी से ऑटो इम्युन वाली बीमारियां भी हो सकती हैं।
लोगों में विटामिन-डी की कमी का होना सिर्फ गरीब देशों की समस्या नहीं है, बल्कि पैसे वाले देशों में भी ये एक गंभीर मसला है। एक स्टडी के मुताबिक 2012 तक सारी दुनिया में करीब दस लाख लोग ऐसे थे जिनमें विटामिन-डी की कमी थी। विटामिन-डी की कमी उन लोगों में ज़्यादा होती है जो धूप से दूर घरों में अंदर रहते हैं।
हस्तमैथुन को लेकर सदियों से कई भ्रांतियां समाज में रही हैं। यहां तक कि वर्षों तक इसे कई बीमारियों की जड़ समझा जाता रहा। लेकिन मॉडर्न रिसर्च इसके स्वास्थ्य संबंधी कई फायदे गिनाते हैं। लेकिन ये दावा सरासर गलत है कि हस्तमैथुन कोविड-19 से बचाने में सक्षम है।
शरीर में व्हाइट सेल्स से विषैले ऑक्सीजन पदार्थ निकलते हैं, जो दुधारी तलवार की तरह काम करते हैं। एक तरफ तो ये शरीर में किसी बैक्टीरिया या वायरस को बढऩे से रोकते हैं, तो दूसरी ओर स्वस्थ कोशिकाओं को खत्म करते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर करते हैं। इसीलिए सभी कोशिकाओं को स्वस्थ और सुरक्षित रखने के लिए एंटी ऑक्सिडेंट की जरूरत होती है। हमें ये एंटी ऑक्सिडेंट काफी मात्रा में फलों, सब्जियों से मिल जाते हैं। इसके लिए अलग से सप्लीमेंट लेने की जरूरत नहीं है। एंटी ऑक्सिडेंट रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में कितने मददगार हैं, इस पर भी अभी रिसर्च जारी है। लेकिन, ये रिसर्च अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं।
कुछ बैक्टीरिया ऐसे होते हैं जो शरीर के दोस्त होते हैं। हमारी सेहत के लिए उनकी बहुत जरूरत होती है। कई बार शरीर में इन बैक्टीरिया की कमी हो जाती है। इसीलिए बाजार से प्रोबायोटिक्स के सप्लीमेंट लेने पड़ते हैं। संकट के इस दौर में कुछ वेबसाइट पर दावा किया जा रहा है कि प्रोबायोटिक्स कोविड-19 से लडऩे में मददगार है। ऐसे तमाम दावे झूठ हैं। इस दावे पर अभी तक कोई भी रिसर्च पक्के सबूत पेश नहीं कर पाई है।
अब सवाल ये है कि आखिर कोविड-19 से बचा कैसे जाए। इसके लिए फिलहाल तो यही जरूरी है कि जितना हो सके सोशल डिस्टेंसिंग और साफ सफाई का ध्यान रखिए। संतुलित आहार लीजिए। नियम से व्यायाम कीजिए। किसी वेलनेस एक्सपर्ट के बहकावे में आकर ख़ुद ही अपने डॉक्टर मत बनिए। परेशानी होने पर तुरंत डॉक्टर की सलाह लीजिए। (बीबीसी)
 


19-Apr-2020

लॉकडाउन में सभी अपने ही घरों में बंद होकर रह गए हैं। ऐसे में पूरा दिन घर होने से भूख ज्यादा लगती है। मगर कुछ अनहेल्दी चीजों को खाने से शरीर में कमजोरी आती है। इसके साथ ही बीमारियों के होने का खतरा बढ़ता है। इससे बचने के लिए डाइट में ऐसी चीजों को शामिल करना चाहिए जिससे इम्यूनिटी स्ट्रांग हो सके। तो चलिए जानते हैं घर बैठे इम्यूनिटी बढ़ाने के कुछ आसान से टिप्स...

ज्यादा देर भूखे न रहें
काफी समय तक भूखे रहने से जंक फूड खाने का दिल करता है। इसके साथ ही शरीर में कमजोरी आती है। इसलिए घर पर हैल्दी खाना बनाए। इसके साथ ही उसे समय पर और ठीक से खाएं।

शुगरी, जंक और पैक्ड चीजें खाने से बचें
भले ही ये खाने में टेस्टी हो। मगर ये शरीर के लिए नुकसानदायक होती है। यह सिर्फ कुछ देर तक ही भूख को मिटाता है। इसके अलावा इन चीजों का ज्यादा सेवन करने से व्यक्ति का तनाव बढ़ता है। ऐसे में उसके डिप्रेशन में जाने के चांचिस बढ़ते हैं।

बॉडी को हाइड्रेटेड रखें
शरीर को हाइड्रेटेड रखने के लिए रोजाना 7-8 गिलास पानी पीएं। इसके अलावा फ्रूट व सब्जियों का जूस, नींबू पानी, ओआरएस का घोल तैयार कर पीछे रहें। आप इसे घर भी पानी, चीनी व नमक मिलाकर बनाकर पी सकते हैं। शरीर के हाइड्रेटेड होने से चाय, कॉफी, कोल्डड्रिंक पीने की क्रेविंग कम रहती है।

एक्सरसाइज व योगा करें
डेली खुली और साफ हवा में योगा व एक्सरसाइज करना फायदेमंद होता है। यह बॉडी से खास हर्मोनल रीलिज करते हैं, जो सेहत के लिए अच्छे होते हैं। इसलिए रोजाना सुबह- शाम  योगा, एक्सरसाइज व सैर करते रहना जरूरी है।

फल व सब्जियों का करें सेवन
इनमें विटामिन, कैल्शियम, आयरन, एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी- बैक्टीरियल गुण होते हैं। इनका सेवन करने से  शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।


19-Apr-2020

यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार तुलसी में बीमारियों को ठीक करने की जबर्दस्त क्षमता है। तुलसी में संक्रमण को दूर करने के साथ-साथ तनाव और अन्य बीमारियों के खिलाफ प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती है। यह सर्दी-जुकाम के प्रभाव को कम कर देती है और बुखार का संक्रमण कम करने के साथ मलेरिया, चिकन पॉक्स, मीजल्स, एन्फ्लूएंजा और अस्थमा जैसी बीमारियों को भी ठीक कर देती है। 
 
तुलसी खासतौर पर दिल की रक्त वाहिकाओं, लीवर, फेफड़े, उच्च रक्तचाप तथा रक्त शर्करा को भी कम करने में मददगार साबित होती है। अत: संक्रमण के समय में तुलसी का काढ़ा बनाकर पीने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। 
 
सामग्री : 
 
तुलसी के सुखाए हुए पत्ते (जिन्हें छाया में रखकर सुखाया गया हो) 500 ग्राम, दालचीनी 50 ग्राम, तेजपान 100 ग्राम, सौंफ 250 ग्राम, छोटी इलायची के दाने 150 ग्राम और 25 ग्राम काली मिर्च ले लें। 
 
कैसे बनाएं यह काढ़ा, पढ़ें सरल विधि : 
 
सब पदार्थों को एक-एक करके इमाम दस्ते (खल बत्ते) में डालें और मोटा-मोटा कूटकर सबको मिलाकर किसी बरनी में भरकर रख लें। बस, तुलसी काढ़ा की सामग्री तैयार है। 2 कप चाय के लिए यह आधा छोटा चम्मच तुलसी का मिश्रण काफी है। 
 
दो कप पानी एक तपेली में डालकर गरम होने के लिए आग पर रख दें। जब पानी उबलने लगे तब तपेली नीचे उतार कर आधा छोटा चम्मच मिश्रण डालकर फौरन ढक्कन से ढंक दें। थोड़ी देर तक उबलने दें फिर छानकर कप में डाल लें। और थोड़ा गरम रहने पर ही फूंक मारकर इस काढ़े का सेवन करें। 


03-Apr-2020

जब सारा परिवार साथ होता है, तो उनके लिए संतुलित आहार बनाने का सुख ही कुछ और है। इन दिनों आप अपने घर के भोजन में हरी सब्जियों को जरूर शामिल करें। ये पोषण से भरपूर होती हैं।    

1-पालक एक तरह से हरी सब्जियों में सुपरवेजिटेबल कही जा सकती है। इसमें विटामिन ए, सी, फोलिक एसिड, कैल्शियम वगैरह क्य नहीं होता। इसे आप दाल में मिलाएं, पालक के कोफ्ते बनाएं, पालक पनीर तो सबका फेवरिट होता ही है, पालक को हल्का उबालकर उसे आटे में मिलाकर भरवां पराठे बनाएं। 
 
2-खीरा गर्मियों के लिए तो रामबाण मानिए। विटामिन ई से भरपूर खीरा त्वचा को निखारता है। शरीर में नमी बनाए रखता है और कब्ज में राहत देता है। खीरे का रायता, खीरे का सलाद या फिर यूं ही स्नैक्स के तौर पर खाएं। इसे वजन कम करने वाली डाइट में शामिल किया जाता है।
 
3-ब्रोकोली को डायबिटीज में आदर्श आहार माना जाता है। इसे कैंसररोधी कहा जाता है। इसे हल्का चलाते हुए ही पकाएं। इसे एग भुर्जी में डालें। इमली, मसाले व काली मिर्च और करी पत्ता डालकर चटपटा बनाएं या चीज के साथ सैंडविच में लगाकर दें।
 
4-परवल रक्त को शुद्ध करता है। शुगर के मरीजों को खासतौर पर परवल खाने की सलाह दी जाती है। परवल में एंटी-ऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो असमय बुढ़ापे के लक्षणों को दूर रखते हैं। भरवां परवल या आलू-परवल की सब्जी का तो जवाब ही नहीं है स्वाद में।

5-जुकीनी भी पोषण के मामले में कम फायदेमंद नहीं है। इस सब्जी की अच्छी बात यह है कि फ्रिज में यह काफी दिन टिकी रह जाती है और इसे आप सब्जी या सलाद, दोनों तरह से खा सकते हैं। इसमें पेक्टिन नामक तत्व पाया जाता है, जो शोधों की मानें तो दिल की सेहत के लिए फायदेमंद होता है। इसमें खूब फाइबर होता है, इसीलिएइसे वजन कम करने वाली डाइट में शामिल किया जाता है। हाईबीपी व एस्थमा के रोगियों के लिएभी यह अच्छी होती है।

 

 

 


27-Mar-2020

भारत में तेजी से कोरोना वायरस (Coronavirus) अपने पैर पसार रहा है। कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में समय-समय पर अपने हाथों को साबुन या सैनिटाइजर से धोकर इस वायरस के खतरे को कम किया जा सकता है। लेकिन उससे पहले ये जानना जरूरी है कि साबुन या सैनिटाइजर में से कोरोना से लड़ने के लिए सबसे मजबूत हथियार क्या है?

चीन के वुहान शहर में पैदा हुआ कोरोना वायरस अब तक से भी दुनियाभर के कई देशों को अपना शिकार बना चुका है। भारत में भी कोरोना वायरस तेजी से अपने पैर पसार रहा है। देश के चारों कोनों में जारी लॉकडाउन के बीच भी कोरोना वायरस के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। अब तक देश में संक्रमण के 724 मामलों की पुष्टि हो चुकी है, जिनमें से 19 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं, दुनियाभर में जानलेवा कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की तादाद बढ़कर पांच लाख से अधिक हो गई है और 22,000 से अधिक लोग इस महामारी के चलते दम तोड़ चुके हैं।

इस जानलेवा वायरस के फैलने के बाद शुरुआत से ही लोगों को साबुन या सैनिटाइजर से हाथ धोने की सलाह दे रहे हैं। COVID-19 से बचने के लिए कुछ लोगों का मानना है कि हैंड सैनिटाइजर-साबुन से बेहतर है। कुछ स्वास्थ्य-विशेषज्ञों का कहना कि कोरोना वायरस से बचने के लिए हाथों का बैक्टीरिया फ्री होना बेहद जरूरी है। इतना ही नहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि अपने हाथों को समय-समय पर साबुन से धोकर या हैंड सैनिटाइज़र का इस्तेमाल कर वायरस के खतरे को कम किया जा सकता है। (ये भी पढ़ें: Coronavirus And Asthama : कोरोना वायरस से अस्थमा के मरीजों को कितना खतरा, जानें क्या है डॉक्टरों की सलाह)

यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ वेल्स के प्रोफेसर पॉल थॉर्डर्सन के अनुसार, कोरोना वायरस से बचने के लिए साबुन को ज्यादा बेहतर विकल्प बताया गया है। वायरस में मौजूद लिपिड को साबुन आसानी से खत्म कर सकता है। आपको बता दें साबुन में फैटी एसिड और सॉल्ट जैसे तत्व होते हैं जिन्हें एम्फिफाइल्स कहा जाता है। साबुन में छिपे ये तत्व वायरस की बाहरी परत को निष्क्रिय कर देते हैं। जिससे संक्रमित होने का खतरा न के बराबर हो जाता है।

हैंड सैनिटाइज़र और साबुन दोनों में ही वायरस को मारने के सक्षम गुण हैं। लेकिन कोरोना वायरस के बढ़ते कहर से बचने के लिए सैनिटाइज़र से बेहतर साबुन है। क्योंकि साबुन में सैनिटाइज़र के मुकाबले वायरस को तेजी से मारने की क्षमता है।

हम में से ज्यादातर लोग दिन में कई बार मुंह को छूते हैं, ऐसी स्थिति में वायरस का जड़ से खात्मा होना बेहद जरूरी है। सैनिटाइज़र आपको वायरस से लड़ने के लिए तैयार तो करेगा लेकिन उसको जड़ से खत्म करने के लिए साबुन बेहतरीन विकल्प है।

यदि आप टॉयलेट या बाहर से कहीं से आकर अपने हाथों को सिर्फ पानी से धो लेते हैं तो ये बिल्कुल गलत तरीका है। वायरस चिपचिपा होता है, जो केवल पानी से हाथ धो लेने के बाद भी नहीं जाता है। इसलिए आप जब भी बाहर से आएं या किसी चीज को छुएं तो अपने हाथों को साबुन से धुलें। साबुन में फैटी एसिड और सॉल्ट जैसे पदार्थ होते हैं जो वायरस से लड़ने में अधिक सक्षम हैं।

आपने कई बार महसूस किया होगा कि साबुन से हाथ धोते-धोते आपकी स्किन थोड़ी ड्राइ हो गई है। दरअसल ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि साबुन काफी गहराई में जाकर कीटाणुओं को मार गिराने की शक्ति होती है। वहीं, हैंड सैनिटाइज़र केवल हाथ को गहराई से साफ़ करता है कीटाणुओं को जड़ से खत्म करने में ये इतना असरदार नहीं है।

सैनिटाइजर क्यों साबुन जितना प्रभावशाली नहीं है

जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी की एक शोध के अनुसार, लिक्विड या क्रीम के रूप में मौजूद सैनिटाइजर कोरोना वायरस से लड़ने में साबुन जितना बेहतर नहीं है। कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सिर्फ और सिर्फ वही सैनिटाइजर काम करेगा जिसमें एल्कोहल की मात्रा अधिक होगी। इसके अलावा घरों में इस्तेमाल होने वाला साबुन ज्यादा बेहतर है। इसलिए कोशिश करें कि अपनी उंगुलियों के बीच और नाखूनों के अंदर ठीक से साबुन लगाकर हाथ धोने की, क्योंकि तभी हम इस जानलेवा बीमारी को मात दे सकते हैं।


24-Mar-2020

कोरोना वायरस लगातार घातक होता जा रहा है। भारत में लोगों को जागरुक बनाया जा रहा है। समय-समय पर हाथ धोने की जरूरत के बारे में बताया जा रहा है। तमाम सावधानियों के बीच ऑफिस में भी साफ-सफाई का ख्याल रखना जरूरी है। कंपनियां अपने स्तर पर काम कर रही हैं, लेकिन हर कर्मचारी की भी जिम्मेदारी की है कि वह अपने लैपटॉप और डेस्क के आसपास सफाई रखे, ताकि कोरोना वायरस जैसे खतरे को टाला जा सके। एम्स के डॉ. अजय मोहन के अनुसार, कोरोना वायरस एक तरह का वायरल इन्फेक्शन है। इसकी कोई दवा नहीं है, लेकिन सावधानी बरतकर इसके संक्रमण से बचा जा सकता है।

ऐसे दफ्तरों में विशेष सावधानी की जरूरत है जहां बहुत सारे कर्मचारी एक ही हॉल में बैठकर काम करते हैं। यदि ऑफिस पूरी तरह से बंद है या सब तरफ कांच की दीवार है तो खतरा और बढ़ जाता है। जिन दफ्तरों में हवा आने-जाने की गुंजाइश नहीं है और साफ-सफाई का भी ख्याल नहीं रखा जाता है, वहां कोरोना जैसे संक्रमण का खतरा कई गुना है।

ऐसे करें काम की शुरुआत
काम की शुरुआत करने से पहले अपने बैठने की जगह को अच्छी तरह साफ करें या करवाएं। जिन-जिन चीजों को बार-बार छूते हैं जैसे लैपटॉप, कीबोर्ड, मोबाइल, डेस्क, रिमोट कंट्रोल, काउंटर टॉप और डोरनोब्स को साफ करवाएं। कोरोना वायरस फैलने के बाद सेनिटाइजर का इस्तेमाल बढ़ गया है। इन सभी चीजों को सेनिटाइजर या किसी अच्छे क्लीनिंग एजेंट से साफ करने के बाद ही काम शुरू करें। हर तीन घंटे में ऐसी साफ-सफाई जरूरी है।

काम करने के दौरान जब भी उठें, हाथ जरूर साफ करें। हाथ साबुन से धोएं और पानी नहीं है तो सेनिटाइजर का इस्तेमाल करें। कुछ भी खाने से पहले हाथ धोना बहुत जरूरी है। 

यह है छिंकने का सही तरीका
यदि खुद को सर्दी जुकाम हो रहा है तो खांसते या छिंकते समय मुंह पर रुमाल रखें। यदि रुमाल नहीं है तो हथेलियों के बजाए हाथ की कोहली और कंधे के बीच वाले हिस्से से मुंह को दबाते हुए खांसे। इससे जीवाणु फैलेगा नहीं। यही बात अपने साथी कर्मचारियों को बताएं। टिश्यू पेपर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन उपयोग के बाद टिशू पेपर को सीधे डस्टबिन में डालें।

बात करते समय एक हाथ दूर खड़े रहें
यह बात स्कूल में बच्चों को सिखाई जाती है। अब यह काम ऑफिस में करने का वक्त आ गया है। अपने साथी से बात करते समय एक हाथ दूर रहें। इससे कोरोना ही नहीं, किसी भी तरह का संक्रमण तेजी से नहीं फैलेगा। हाथ तो बिल्कुल न मिलाएं। नमस्ते करना बिल्कुल सही है।

जब तक कोरोना वायरस का कहर जारी है, संभव हो तो ऑफिस में मास्क पहनकर काम करें। कई कंपनियां अपनी तरफ से मास्क उपलब्ध करवा रही हैं। गीला होने पर मास्क तत्काल बदल दें। उपयोग किए जा चुके मास्क को दोबारा न लगाएं।

वॉश रूम में साफ-सफाई का ख्याल रखें। सुनिश्चित करें कि बाथरूम और टॉयलेट की नियमित साफ-सफाई की जा रही है। कैंटीन में भी यही बात लागू होती है। 
जिन साथी कर्मचारियों को सर्दी-जुकाम है, उन्हें सलाह दे कि वे घर से ही काम करें या छुट्टी लेकर आराम करें। उन्हें डराएं नहीं, लेकिन सावधानी बरतने के लिए प्रेरित करें। जो साथी महिला कर्मचारी प्रेगनेंट हैं, उन्हें घर पर ही आराम करने की सलाह दें।


24-Mar-2020

कोरोना से देश में अब तक करीब 500 लोग कोरोना वायरस से पॉजिटिव पाए गए हैं. 10 लोगों की मौत हो चुकी है. कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित महाराष्ट्र और केरल हैं. महाराष्ट्र में अब तक 97 और केरल में 95 केस सामने आए हैं. कोरोना की वजह से 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लॉकडाउन घोषित कर दिया गया है.

कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा खतरा बुजुर्गों को है. ऐसे समय में बच्चों का भी काफी ध्यान रखने की जरूरत है.  बुजुर्गों और बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है ऐसे में यह वायरस उन्हें आसानी से शिकार बनाता है. आइए जानते हैं कि आखिर कैसे कोरोना वायरस से बच्चों और बुजुर्गों का बचाव किया जा सकता है.कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा खतरा बुजुर्गों को है. ऐसे समय में बच्चों का भी काफी ध्यान रखने की जरूरत है.  बुजुर्गों और बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है ऐसे में यह वायरस उन्हें आसानी से शिकार बनाता है. आइए जानते हैं कि आखिर कैसे कोरोना वायरस से बच्चों और बुजुर्गों का बचाव किया जा सकता है.
1. बच्चों और बुजुर्गों को घर से बाहर न निकलने दें. यदि किसी कारणवश उन्हें बाहर जाना भी पड़ रहा है तो मुंह को मास्क से अच्छी तरह कवर करें.
2. बच्चों और बुजुर्गों को बार-बार हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करने की सलाह दें. इसके अलावा घर या बाहर किसी भी चीज को छूने के बाद अच्छे से हाथ धुलवाएं.
3. यदि घर में कोई पीड़ित व्यक्ति है तो बच्चों और बुजुर्गों को उनसे दूर रखें. अंजान व्यक्ति से तकरीबन 3 से 6 फीट की दूरी बनाए रखें.
4. बच्चों और बुजुर्गों के नाखून बिल्कुल न बढ़ने दें . ऐसी जगहों पर कीटाणु-बैक्टीरिया बड़ी आसानी से जगह बना लेते हैं.
5. बच्चों और बुजुर्गों को सार्वजनिक स्थलों या ज्यादा भीड़ वाली जगहों पर न ले जाएं. इससे वायरस की चपेट में आने का खतरा काफी बढ़ जाता है.
6. घर की वो चीजों जिन पर आप बार-बार हाथ लगाते हैं, उन्हें समय-समय पर सैनिटाइज करते रहें.
7. कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए अपने बच्चों और बुजुर्गों को सामान्य हाइजीन की आदतों के बारे में बताएं.
8. बच्चों और बुजुर्गों के इम्यून सिस्टम को दुरुस्त रखने के लिए उनकी डाइट में पौष्टिक आहार शामिल करें. कच्चा मांस या कच्ची हरी सब्जियां देने से परहेज करें.
9. घर में लॉकडाउन रहते हुए किसी भी बाहरी व्यक्ति को घर में दाखिल न होने दें. साथ ही रिश्तेदारों या दोस्तों के घर जानें से भी बचें.
10. कोरोना वायरस के बारे में बच्चों और बुजुर्गों समेत घर के अन्य सदस्यों को जागरूक करें और उन्हें मुंह पर मास्क पहनने और हाथ धोने जैसी बातें बताएं.

 

 

 

 


23-Mar-2020

लोगों के दिलों में कोरोना वायरस को लेकर दहशत इतनी बढ़ गई  है कि वे इस संक्रमण को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल कई अफवाहों पर आसानी से विश्वास करने लगे हैं। ऐसी अफवाहों से होने वाली टेंशन से लोगों को बचाने के लिए डब्लूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन ) ने कोरोना वायरस को लेकर दुनिया भर में फैले कुछ वायरल मिथक की सच्चाई बताने की कोशिश की है। हो सकता है इन वायरल अफवाहों के बीच कुछ ऐसी भी अफवाहें हो जिन्हें अब तक आप भी सच ही मान रहे हों। ऐसी ही अफवाहों के बीच आइए जानते हैं आखिर क्या है विश्व स्वास्थ्य संगठन की लोगों को सलाह।

गर्म मौसम में नहीं फैल सकता कोरोना?
कोरोना से फैली दहशत के बीच एक अफवाह सुनने को मिल रही है कि तापमान बढ़ने और मौसम के गर्म होने पर कोरोना वायरस खुद खत्म हो जाता है। इसलिए व्यक्ति को दिन में कई बार गुनगुने पानी से नहाना चाहिए। 
सच- डब्लूएचओ की मानें तो कोरोना का वायरस कहीं भी, किसी भी क्षेत्र में फैल सकता है। कोरोना संक्रमण का पर्यावरण या फिर किसी जलवायु से कोई संबंध नहीं है। तापमान बढ़ने से कोरोना के विषाणु का प्रभाव कम होगा या नहीं इसकी पुष्टि अभी तक किसी भी वैज्ञानिक ने नहीं की है। 

निमोनिया की दवाइयों से रोका जा सकता है कोरोना वायरस?
निमोनिया के टीके जैसे न्यूमोकोकल वैक्सीन और हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी वैक्सीन से कोरोना के वायरस नहीं मरते हैं। इसके पीछे वजह यह है कि कोरोना वायरस अभी वैज्ञानिकों के लिए बिल्कुल नया और अलग है। इसे रोकने के लिए उन्हें खास इसी वायरस के लिए टीका बनाना होगा। 

अल्कोहल या फिर क्लोरीन के छिड़काव से मिलेगी राहत?
अल्कोहल या क्लोरीन फर्श पर कीटाणुओं को मारने का काम कर सकते हैं और ये दोनों ही कोरोना वायरस को रोकने के लिए प्रभावी उपाय नहीं हैं। 

कोरोना के वायरस को हैंड ड्रायरसे खत्म किया जा सकता है?
जिन लोगों को यह लगता है कि वो कोरोना वायरस को हैंड ड्रायर की मदद से खत्म कर सकते हैं वे गलत हैं। कोरोना वायरस को खुद से दूर रखने के लिए डब्लूएचओ ने व्यक्ति को अपने हाथों को अल्कोहल मिश्रित साबुन या हैंड वॉश से अच्छे से धोने की सलाह दी है। 

कोरोना वायरस मच्छर के काटने से फैलता है?
कोरोना वायरस किसी मच्छर के काटने से फैलता है या नहीं, अभी तक इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है। कोरोना वायरस एक श्वसन वायरस है जो मुख्य रूप से एक संक्रमित व्यक्ति के खांसने-छींकने, उसकी लार की बूंदों के माध्यम से या नाक से दूसरे व्यक्ति को फैलता है। इस वायरस से खुद को बचाने के लिए अपने हाथों को बार-बार अल्कोहल वाले हैंड वॉश से अच्छे से रगड़कर साफ करें। इसके अलावा, खांसी और छींकने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ निकट संपर्क से बचें।

अल्ट्रावायलेट लाइट की मदद से कोरोना को खत्म किया जा सकता है?
बता दें, अल्ट्रावायलेट लाइट स्टरलाइजर का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अल्ट्रावायलेट लाइट के अधिक प्रयोग से त्वचा जल सकती है। 

लहसुन खाने से कोरोना वायरस के संक्रमण को रोका जा सकता हैय़
लहसुन खाने से व्यक्ति को सेहत से जुड़े कई फायदे मिलते हैं। लहसुन में रोगाणुरोधी गुण मौजूद होने से यह शरीर को कई रोग लगने से बचाता है। बावजूद इसके अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है कि लहसुन खाने से लोगों को कोरोनोवायरस से बचाया जा सका है।

खारे पानी से नाक साफ करने से कोरोना को रोका जा सकता है?
ऐसा नहीं कहा जा सकता कि खारे पानी से रोजाना नाक साफ करके आप खुद को कोरोना वायरस से बचा सकते हैं। हालांकि ऐसा करने से आपको सामान्य सर्दी से काफी हद तक जल्दी ठीक होने में मदद मिल सकती है। 

संक्रमित लोगों का पता लगाने में थर्मल स्कैनर कितने प्रभावी हैं?
थर्मल स्कैनर्स उन लोगों का पता लगाने में प्रभावी हैं, जिनमें कोरोनो वायरस के संक्रमण की वजह से बुखार जैसे लक्षण नजर आने लग गए हैं। हालांकि, ये उन लोगों का पता नहीं लगा सकते जो संक्रमित हैं लेकिन अभी तक उनमें बुखार जैसे लक्षण नहीं देखे गए हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि संक्रमित लोगों के बीमार होने और बुखार के विकसित होने से पहले 2 से 10 दिन लगते हैं।


23-Mar-2020

भोजन के बाद गैस, पेट फूलना और असुविधा होना एक सामान्य समस्या है। कई दफा लोग इसकी चर्चा नहीं करते। पर, यह समस्या खुलकर जीने भी नहीं देती। अगर आए दिन आप इससे दो-चार हो रही हैं तो इसका कारण और निवारण बता रही हैं स्वाति शर्मा। अरे मिश्रा जी एक रोटी में क्या बिगड़ जाएगा, खा लीजिए न। तिवारी जी की मेहमानवाजी मिश्रा जी पूरी रात नहीं भूल पाएंगे।

कहने को तो एक रोटी है...पर इससे क्या कुछ बिगड़ सकता है, इसे वे सभी जानते हैं जो मिश्रा जी की तरह गले पड़े भोजन का शिकार होते हैं। लेट नाइट पार्टी हो या टीवी देखते हुए स्नैक्स खाने की आदत...इन सभी आदतों में पहले मजा, बाद में सजा वाली कहानी सामने आती है। यानी गैस, अपच, पेट दर्द और पेट फूलना। कभी-कभार यह समस्या किसी को भी हो सकती है, लेकिन इसका आए दिन बने रहना आपके जीवन को प्रभावित करने लगता है तो कुछ उपयोगी कदम उठाने की जरूरत है। 

सामान्य गलतियां हैं मुख्य कारण-
हमारी जीवनशैली की चौपट स्थिति हमारे स्वास्थ पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से प्रभाव डाल रही है। गैस बनने, पेट फूलने जैसी समस्या का भी यही मुख्य कारण है। जो लोग सामान्य तौर पर रात में भारी भोजन करते हैं, उन्हें इस तरह की समस्या बनी रहती है। इसके अलावा भोजन करने में समय का विशेष महत्व भी होता है। इसमें हुई गड़बड़ी भी आपको गैस की समस्या से जूझने पर मजबूर कर सकती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि सिर्फ पौष्टिक भोजन का ही नहीं, बल्कि उसे खाने के समय का ख्याल भी रखना होगा। इसके अलावा लोगों को कुछ खास चीजों से एलर्जी होती है, जिसकी वजह से उन्हें पेट में भारीपन महसूस होने लगता है। यह समस्या स्मोकिंग करने वालों को भी परेशान करती है।

विशेष परिस्थितियां भी हैं जिम्मेदार-
कुछ चिकित्सकीय परिस्थियों के कारण भी आपको गैस और पेट फूलने की शिकायत हो सकती है। मधुमेह और रक्तचाप में खाई जाने वाली दवाइयों के कारण ऐसी परेशानी आ सकती है। इसके अलावा जिन लोगों को पित्त की थैली यानी गॉलब्लैडर में पथरी की शिकायत होती है, उन्हें भी गैस की समस्या होती है। अगर आप हृदय रोगी हैं तो आपको खासतौर पर ब्लोटिंग से बचने की जरूरत है। कई बार रोगी अटैक और गैस के दर्द में अंतर नहीं कर पाता। लिवर सिरोसिस के मरीजों को भी इसकी शिकायत होती है, लेकिन समस्या गंभीर हो तो चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है। इन सभी परिस्थितियों में घरेलू नुस्खों या खानपान में लगाम से काम नहीं चलता। 

खास स्थितियां-
गर्भावस्था के अंतिम महीनों में गैस बनने की समस्या आम है। पर, कभी-कभी गर्भावस्था के शुरुआती माह में भी गैस की समस्या हो जाती है। इसका बड़ा कारण कब्ज होता है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की चयापचय क्षमता में कमी आ जाती है, जिस कारण यह समस्या उभरती है। कई बार आयरन और कैल्शियम सप्लीमेंट्स से भी कब्ज और पेट फूलने जैसी समस्या होने लगती है।

अगर तकलीफ सामान्य है तो दवाइयों की कम डोज या खानपान में सुधार करके काम चल जाता है। समस्या ज्यादा हो तो खास दवाओं का सहारा लेना पड़ता है, साथ ही आयरन और कैल्शियम की जरूरत को भोजन से पूरा करने की कोशिश की जाती है। बच्चा होने के बाद इस समस्या का मुख्य कारण है वसा। पेट पर जमा अतिरिक्त चर्बी शरीर की अंदरूनी प्रणाली को प्रभावित करती है, जिससे पाचन तंत्र सही से काम नहीं कर पाता।

यूं पाएं निजात-
अगर आप इस समस्या से पीड़ित हैं, तो सबसे बड़ा इलाज है भोजन पर नियंत्रण। इस दौरान आपको बिना चबाने वाला भोजन ग्रहण करने की जरूरत है, यानी जो आसानी से पच जाए। समस्या होने पर टहलें, इससे एंडोर्फिन हार्मोन का स्राव बढे़गा और पाचन क्रिया तेज होगी। समस्या अधिक होने पर आपको दवाओं का सहारा लेना पड़ेगा।

अपनाएं बचाव के तरीके-
 यहां आप दुर्घटना से सावधानी भली वाला फॉर्मूला अपनाएं। सबसे पहले अपने भोजन पर गौर करें। ऐसी चीजों को पहचानें, जिनको ग्रहण करने से आपको ये समस्या आमतौर पर हो जाती है। आपको ग्लूटन, मूंगफली, खोया या दूध के अन्य उत्पाद जैसी किसी भी चीज से एलर्जी हो सकती है। इनके अलावा कुछ सामान्य-सी बातों को अपनाने से आप पेट फूलने की इस समस्या से बच सकती हैं:
-रात के भोजन और सोने के बीच कम से कम दो-तीन घंटे का अंतराल रखें। भोजन के तुरंत बाद लेटे नहीं, टहलें। इससे खाना पचने में आसानी होगी।
-खाली पेट चाय न पिएं। अगर पहली चाय के साथ कुछ नहीं खातीं तो उससे पहले गुनगुना पानी जरूर पिएं।
-त्योहारों में या गरिष्ठ खानपान के बाद गुनगुना पानी पिएं।
-भोजन में फाइबर की मात्रा बढ़ाएं। केला खाएं।
-तनाव से बचें। प्राणायाम कर सकती हैं।
-कुछ पेल्विक एक्सरसाइज (ताड़ासन, शलभासन) आपकी मदद कर सकती हैं।
(एमडी डॉ. नेहा यादव से बातचीत पर आधारित)


13-Mar-2020

तुलसी के बीजों को पानी में भिगोकर सेवन करने के फायदे कई होते हैं. यह तो आप जानते ही हैं तुलसी की पत्तियां और बीज एंटिऑक्सिडेंट्स का भरपूर स्रोत होते हैं. तुलसी के बीज के फायदे  दुगने करने के लिए आपको तुलसी के बीजों को पानी में भिगोकर खाने से जबरदस्त फायदे हो सकते हैं.
अगर आपको बताया जाए की एक चीज ऐसी है जिसे सिर्फ पानी में भिगोकर खाने से आपके स्वास्थ्य को कमाल के फायदे हो सकते हैं तो कौन नहीं इस एक चीज के बीजों का फायदा पानी में भिगोकर लेना चाहेगा. आपके मन में भी सवाल आ रहा होगा आखिर वह एक चीज है क्या? जी हां! हम तुलसी के बीजों (Basil Seeds) के बारे में बात रहे हैं. तुलसी के बीजों को पानी में भिगोकर सेवन करने के फायदे (Benefits Of soaked Basil Seeds) कई होते हैं. यह तो आप जानते ही हैं तुलसी की पत्तियां (Basil Leaves) और बीज एंटिऑक्सिडेंट्स का भरपूर स्रोत होते हैं. तुलसी के बीज के फायदे (Benefits Of Basil Seeds) दुगने करने के लिए आपको तुलसी के बीजों को पानी में भिगोकर (Soaked Basil Seeds In Water) खाने से जबरदस्त फायदे हो सकते हैं. तुलसी के बीज गुणों के भंडार होते हैं. तुलसी के बीजों में फाइबर (Fiber In Basil Seeds) की भी फरपूर मात्रा पाई जाती है. तुलसी के बीज न केवल डायबिटीज (Diabetes) के लिए बल्कि स्किन की देखभाल (Skin Care) के लिए भी फायदेमंद होते हैं. तुलसी के बीज आपका पाचन भी बेहतर कर सकते हैं.  (Basil Seed For Improve Digestion) इनका सेवन करने के लिए आप रात को तुलसी के बीज पानी में भिगों दें और सुबह खाली पेट इसका सेवन करें. ऐसा करने से आप कई बीमारियों से बच सकते हैं. यहां जानें तुलसी के बीजों को पानी में भिगोकर खाने के फायदों के बारे में...
ये होते हैं तुलसी के बीजों के फायदे |

1. डायबिटीज को कंट्रोल करने में फायदेमंद
तुलसी के बीजों को ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने के लिए फायदेमंद माने जाते हैं. टाइप 2 डायबिटीज के लिए तुलसी के बीज काफी असरदार माने जाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इन बीजों का सेवन करने से यह आपके मैटाबॉलिज्म को धीमा कर देते हैं और कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में बदलने में मदद करते हैं. डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए आपको तुलसी के बीजों को रात को दूध या पानी में भिगोकर रख देना और सुबह नाश्ते के साथ इनका सेवन करने से आपको फायदा खुद ही दिखने लगेगा! तुलसी के बीजों के पानी को हेल्दी ड्रिंक के रूप में किया जाता है. तुलसी के बीजों को डायबिटीज के लिए फायदेमंद मानने के पीछे कई शोध भी हो चुके हैं.

तुलसी के बीजों को पानी में भिगोकर सेवन करने से डायबिटीज में फायदा मिल सकता है
2. वजन घटाने के साथ घटाते हैं कमर की चर्बी
तुलसी के बीज न सिर्फ डायबिटीज के लिए बल्कि आपके वजन को भी घटा सकते हैं. तुलसी के बीजों का सेवन करने से आप कमर का फैट भी कम कर सकते हैं. तुलस के बीजों में डायटरी फाइबर काफी मात्रा में पायजा जाता है. जो आपको लंबे समय तक तृप्त रख सकते हैं. साथ तुलसी के बीजों को पानी में भिगोकर सेवन करने से आपको शरीर को डिटॉक्स करने में भी मदद मिल सकती है. 

3. पेट और पाचन के लिए कारगर
तुलसी के बीज आपके पेट और पाचन के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकते हैं. यह आपकी आंतों को साफ कर पेट के स्वास्थ्य को दुरुस्त बनाने में मदद कर सकते हैं. अगर आप एसिडिटी या पेट फूलने जैसी समस्या से परेशान रहते हैं तो आपको तुलसी के बीजों का सेवन पानी या दूध के साथ कर सकते हैं. ऐसा करने से पाचन में मदद मिल सकती है. इससे आपका पेट भी साफ रख सकता है. इनमें फाइबर होने की वजह से यह पाचन के लिए असरदार हो सकते हैं.

तुलसी के बीजों का सेवन पेट के स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद हो सकता है
4. मुंह में छाले या दुर्गध हटाने के लिए भी फायदेमंद
मुंह में छाले या दुर्गध हटाने के लिए तुलसी के बीजों को पानी में भिगोकर सेवन करने से आपको इससे छुटकारा मिल सकता है. अगर आपको भी ऐसी शिकायत रहती है तो आपको इन बीजों को अपनी डाइट में शामिल करना चाहिए. तुलसी के बीजों में एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल, एंटी-वायरल गुण होते हैं जो आपके लिए माउथ फ्रेशनर का काम भी कर सकते हैं.

इन तीन लोगों को तुलसी के बीजों के सेवन से बचना चाहिए
- अगर आपके शरीर में घाव हुआ है या सर्जरी हुई है तो तुलसी के बीजों का सेवन न करें. 
- गर्भवती महिलाओं और बच्चों तुलसी के बीजों का सेवन नहीं करना चाहिए. 
- किसी भी तरह की सर्जरी के कुछ समय तक इन बीजों का सेवन नहीं करना चाहिए.
-तुलसी के बीजों का सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें.