सेहत-फिटनेस

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27-Feb-2021 2:18 PM 19

जर्मन शोधकर्ता स्ट्रोक या दिल के दौरे का जल्दी पता लगाने के लिए वायरलेस रडार सिस्टम का इस्तेमाल कर रहे हैं.

डॉयचे वैले पर अलेक्जांडर फ्रॉएंड का लिखा

जर्मनी की टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ हैम्बर्ग के प्रोफेसर अलेक्सांडर कोएल्पिन का विचार है कि अगर किसी रडार का इस्तेमाल समुद्री जहाज का पता लगाने, हाइवे पर गाड़ियों की रफ्तार का पता लगाने और हवाई जहाज की ऊंचाई का पता लगाने के लिए किया जा सकता है, तो संपर्क-रहित इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल मेडिसिन और चिकित्सा के क्षेत्र में भी किया जा सकता है. वे कहते हैं, "रेडियो सेंसर में मेडिकल और चिकित्सा से जुड़े परीक्षणों को अधिक सुविधाजनक, सुरक्षित और अधिक कुशल बनाने की काफी संभावनाएं हैं.”

उदाहरण के तौर पर, रडार के जरिए सांस लेने की दर और दिल की धड़कन का पता लगाकर ऐसे लोगों को खोजने का विचार नया नहीं है, जिन्हें जिंदा दफन किया गया है. हालांकि, यूरोप में पहली बार कोएल्पिन और उनकी टीम ने मेडिसिन के क्षेत्र में इस्तेमाल के लिए रडार सिस्टम को विकसित किया है. साथ ही, अस्पताल में भर्ती रोगियों पर परीक्षण करके दिखाया है.

इंस्टीट्यूट ऑफ हाई फ्रीक्वेंसी टेक्नोलॉजी में इस टीम ने रोगियों की मेडिकल मॉनिटरिंग के लिए काफी ज्यादा संवेदनशील सेंसर सिस्टम को विकसित किया है. इस नई रडार टेक्नोलॉजी की मदद से दिल की धड़कन और सांस दोनों का लगातार विश्लेषण किया जा सकता है.

क्लासिक इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम की मदद से दिल की धड़कन का पता इलेक्ट्रोड और केबल के जरिए लगाया जाता है जो रोगी के शरीर और मशीन से जुड़े रहते हैं. वहीं, रडार टेक्नोलॉजी के जरिए बिना किसी संपर्क के और रिमोट की मदद से, रोगी की निगरानी की जा जाती है.

कोएल्पिन ने जिस रडार सिस्टम को विकसित किया है वह कपड़ों, बेड कवर और यहां तक कि गद्दों के माध्यम से दिल की धड़कन और सांस लेने की दर का पता लगा सकता है और उन्हें निगरानी वाले उपकरणों तक पहुंच सकता है. वे कहते हैं, "हमारे रडार सेंसर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेब छोड़ते हैं जो शरीर से रिफ्लेक्ट होते हैं. यह कुछ इस तरह से काम करता है: हृदय से पंप किया गया खून, पल्स वेब के तौर पर नसों से गुजरता है जिससे शरीर में कंपन होती है. हम इसे सेंसर की मदद से माप सकते हैं. साथ ही, इससे हृदय प्रणाली के चिकित्सा से जुड़े कई पहलुओं को तय कर सकते हैं.”

जब ह्रदय, नसों के जरिए खून को पंप करता है, तो शरीर की त्वचा में हल्का खिंचाव होता है और वह बढ़ जाती है. इसकी वजह से ही कलाई पर ऊंगली रखकर पल्स को मापा जाता है. नया रडार सिस्टम त्वचा में होने वाले इस खिंचाव का पता लगा सकता है और उसका विश्लेषण कर सकता है.

यह सेंसर इतने सटीक हैं कि वे हृदय की गति, हृदय के तनाव और पल्स वेव वेलॉसिटी को सटीक तौर पर माप सकते हैं. इसका इस्तेमाल धमनियों को सख्त होने और इस तरह के स्ट्रोक के खतरों का पता लगाने के लिए किया जा सकता है. अगर दिल नियमित तौर पर धड़कना बंद कर देता है या इसमें किसी तरह की समस्या होती है, तो नया डिवाइस इसकी चेतावनी देता है. इसका मतलब यह है कि हार्ट अटैक जैसे संभावित खतरों से बचने और जिंदगी को बचाने के लिए, पहले से ही इलाज शुरू किए जा सकते है.

फिलहाल इस रिसर्च प्रोजेक्ट में समय से पहले जन्में बच्चों और नवजात शिशुओं की मेडिकल निगरानी के लिए ध्यान दिया जा रहा है. कोएल्पिन कहते हैं, "अभी हम मुख्य तौर पर मिर्गी के दौरे की बीमारी पर ध्यान दे रहे हैं. माना जाता है कि अचानक होने वाली मौत में 20 प्रतिशत मौत मिर्गी के दौरे की वजह से होती है. समस्या यह है कि बच्चों को आने वाले इन दौरों का इलाज नहीं हो पाता क्योंकि इसे पता लगाने का कोई उपकरण नहीं है.”

दूर से मापने के लिए सेंसर का इस्तेमाल करके बच्चों की लगातार निगरानी की जाती है. इससे उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं होती है. इस तरह से दौरे का पता लगाया जा सकता है और समय रहते उसका इलाज किया जा सकता है.

कोएल्पिन कहते हैं कि कोराना वायरस महामारी के दौर में भी इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल काफी उपयोगी साबित हो सकता है, "हम दिल की धड़कन, सांस लेने की दर के साथ-साथ शरीर के तापमान को भी दूर से माप सकते हैं. इसका मतलब यह है कि कोरोना वायरस के संभावित संक्रमण के संबंध में किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य की पूरी जांच की जा सकती है.” वे कहते हैं कि इस तरीके से संपर्क में आए बिना जांच हो सकती है और स्वास्थ्य कर्मियों के बीच संक्रमण फैलने का खतरा कम हो सकता है.

हाल ही में विकसित हुआ हार्ट रडार चार दिन पहले मरीजों की मौत के बारे में पता लगा सकता है. इस तरह से मरीजों और उनके रिश्तेदारों को पता चल सकता है कि एक दूसरे को अलविदा कहने का समय कब आने वाला है.


23-Feb-2021 10:39 AM 85

हर रसोई में पाई जाने वाली छोटी सी दालचीनी न जाने कितने गुणों से भरपूर होती है. इसका पौधा जितना छोटा है, इसके गुण उतने ही ज्यादा होते हैं. दालचीनी की सूखी पत्तियां तथा छाल मसाले  के रूप में खाने का स्वाद बढ़ाते हैं और लोगों को सेहमंद बनाएं रखते हैं. इसकी छाल थोड़ी मोटी, चिकनी तथा हल्के भूरे रंग की होती है. दालचीनी खून को साफ करता है, वजन घटाता है और साथ ही कई बीमारयों को कोसों दूर भगाता है. दिन भर की थकान से होने वाले सिर दर्द से लेकर माइग्रेन के दर्द तक सभी बीमारियों का इलाज इसके पास है. आइए जानते हैं दालचीनी के ऐसे ही कुछ फायदों के बारे में.

पेट की समस्या करे दूर
लोगों को अक्सर पेट से जुड़ी कई प्रकार की समस्याएं हो जाती हैं और पाचन तंत्र गड़बड़ाते ही शरीर में न जाने कितनी नई बीमारियां होने लगती हैं. इसके लिए एक चम्मच शहद के साथ थोड़ा सा दालचीनी पाउडर मिलाकर खाने से पेट दर्द और एसिडिटी में आराम मिलता है. साथ ही भोजन भी आसानी से पच जाता है.

वजन कम करने में मददगार

आज के समय में बढ़ता वजन लोगों की सबसे बड़ी समस्या है, लेकिन ये छोटी सी दालचीनी आपके बढ़ते वजन को कम करने में मदद कर सकती है. इसके लिए नाश्ते के आधे घंटे पहले एक गिलास पानी में एक चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर उबालें. फिर इसे कप में डालकर दो बड़े चम्मच शहद मिलाकर पिएं. इस प्रक्रिया को रात में सोने से पहले भी दोहराएं.

दिल का रखे ख्याल
दालचीनी आपके दिल का ख्याल रखने में भी आपकी मदद करता है. इसके लिए दालचीनी पाउडर और शहद का पेस्ट बनाकर रोटी के साथ खाएं. इससे धमनियों में कोलेस्‍ट्रॉल जमा नहीं होगा, जिससे हार्ट संबंधी बीमारियों की संभवना भी कम हो जाएगी. जिन लोगों को दिल से जुड़ी कोई बीमारी है, उनके लिए ये उपाय रामबाण है.

त्वचा के लिए फायदेमंद
अपनी सुगंध से सबको आकर्षित करने वाली दालचीनी त्‍वचा के लिए भी बेहद फायदेमंद है. त्वचा में न जाने कितनी तरह की समस्याएं हो जाती हैं, जैसे खाज, खुजली. इसके लिए दालचीनी पाउडर में शहद मिलाकर इसका लेप बनाकर लगाएं और सूखने पर अच्छे से धो लें. दालचीनी के पाउडर में थोड़ा सा नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लगाने से पिंपल्स भी दूर होते हैं.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.) (news18.com)


22-Feb-2021 8:20 AM 69

हेल्‍दी और फिट बॉडी की चाह हर‍ किसी को होती है. इसके लिए लोग जिम जाते हैं, मॉर्निंग वॉक और जॉगिंग करते हैं. अनहेल्‍दी फूड्स को खाने से परहेज करते हैं और डायट प्‍लान को फॉलो करने की कोशिश करते हैं. महीनों की मेहनत के बाद परफेक्‍ट शेप में आ भी जाते हैं, लेकिन कुछ दिनों के बाद लाइफ स्‍टाइल को लेकर कैजुअल हो जाते हैं जिसका नतीजा होता है दुबारा वही भारी भरकम शरीर. ऐसे में हम किस तरह से खुद को हमेशा शेप में और फिट रख सकते हैं, यह जानना ज़रूरी है.

दरअसल एक फीमेल बॉडी को दिनभर में लगभग 1200 कैलोरीज़ और मेल बॉडी को लगभग 1500 कैलोरीज़ की ज़रूरत होती है. इतनी कैलोरी के साथ आप एक एक्टिव लाइफ लीड कर सकते हैं और अपने वेट को भी कंट्रोल कर सकते हैं. यहां आपके लिए 10 ऐसे ही टिप्‍स दिए गए हैं जिन्‍हें फॉलो कर आप खुद को मोटापे से हमेशा दूर रख पाएंगे.

1.भोजन में सब्ज़ियों और फलों को शामिल करें.

2.चोकर वाला गेहूं, ज्वार और बाजरा जैसे कॉम्लेक्स कार्बोहाइड्रेट्स फूड का इनटेक ज़्यादा करें.
3. ब्रेड, नूडल्स, मैकरॉनी और पास्ता जैसे मैदा और उससे बने प्रोडक्ट्स को रेगुलर ना खाएं.

इसे भी पढ़ें : अट्रैक्टिव बॉडी चाहिए तो जरूर करें प्‍लैंक एक्‍सरसाइज, जानें इसके बड़े फायदे

4. जहां तक हो सके फैट और कोलेस्ट्रोल रिच फूड को कम खाएं.

5. हो सके तो भोजन में मीठा या चीनी कम लें .आइसक्रीम आदि बिलकुल ना खाएं.

6. कच्ची सब्ज़ियां जैसे टमाटर, खीरा आदि सलाद के तौर पर खूब खाएं. ये आपके शरीर को जरूरी विटामिन्स, मिनरल्स और फाइबर देंगी .

7. फाइबर इनटेक बढ़ाएं. यह आपके डाइजेशन को बेहतर बनाए रखेगा. साथ ही फाइबर मोटापे और दिल संबंधी परेशानियों को कंट्रोल रखने में भी हेल्‍प करता है.

8. भोजन में कच्‍चा नमक बिलकुल कट कर दें. यही नहीं सब्‍जी, दाल आदि में भी अधिक नमक लेने से बचें.

इसे भी पढ़ेंः आयरन की कमी दूर करती है उड़द की दाल, जानें इसके कमाल के फायदे

9. किसी भी मील को स्किप ना करें. रोज़ाना टाइम से खाएं और ओवर ईटिंग से बचें.रोज़ाना 6 से 8 गिलास पानी पिएं और भरपूर फाइबर वाले फलों का सेवन करें.

10. एक्टिव लाइफ लीड करें. रेगुलर एक्सरसाइज़ करें. दिन में 20 से 40 मिनट ब्रिक्स वॉकिंग और पीटी एक्‍सरसाइज जरूर करें. 

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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20-Feb-2021 5:26 PM 60

केला खाने में बेहद स्‍वादिष्‍ट और शरीर के लिए भी कई तरह से फायदेमंद होता है. इसी तरह केले के फूल में भी औषधीय गुण होते हैं. यह फॉस्फोरस, कैल्शियम, पोटैशियम, तांबा, मैग्नीशियम और लोहा आदि पोषक तत्‍वों से भरपूर होता है. ऐसे में यह कई रोगों से बचाने में मददगार होता है. भारत के कुछ क्षेत्रों में केले की फूल की सब्जी भी बना कर खाई जाती है. यह भी बहुत स्‍वादिष्‍ट बनती है. वहीं सेहत के लिए भी यह कई तरह से फायदेमंद होता है. आप भी जानें इसके फायदों के बारे में-

संक्रमण करता है दूर
नेटमेड्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक केले का फूल प्राकृतिक तरीके से संक्रमण का इलाज करने में प्रभावी है. केले के फूल में इथेनॉल होता है, जो रोगजनक बैक्टीरिया के विकास को रोकने में मददगार होता है.

पीरियड्स में मिलेगा आराम

केले का फूल दर्द पेट से भी राहत दिलाने में मददगार होता है. इसके अलावा इसके नियमित इस्तेमाल से पीरियड्स में होने वाली अत्यधित ब्लीडिंग की समस्या भी दूर होती है. दही के साथ इसका सेवन करने से ये फूल शरीर में प्रोजेस्टेरोन हार्मोन को बढ़ाता है और रक्तस्राव को कम करते है.

मूड बेहतर करता है
केले के फूल में मैग्नीशियम होता है. यह चिंता को कम करता है और मूड बेहतर बनाने में मददगार होता है. यह प्राकृतिक अवसादरोधी के रूप में काम करता है.

महिलाओं के लिए फायदेमंद
केले का फूल जहां पाचन बेहतर करता है और मूड बेहतर करता है, वहीं यह स्तनपान कराने वाली मांओं के लिए भी फायदेमंद माना जाता है. यह दूध के स्राव को बढ़ाता है.

हाजमा करता है बेहतर
केले का फूल कई तरह से फायदेमंद होता है. यह पाचन शक्ति को दुरुस्त बनाए रखता है. साथ ही एसिडिटी और पेट-दर्द की समस्या को भी दूर करने में मददगार होता है.

खून की कमी करेगा दूर
एनीमिया यानी शरीर में खून की कमी आज आम समस्‍या है. ऐसे में केले का फूल फायदेमंद होता है. इसका सेवन शरीर में आयरन की कमी नहीं होने देता और रक्त की कमी की पूर्ति करने में मददगार होता है.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. news इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें) (news18.com)
 


12-Feb-2021 12:37 PM 49

अक्‍सर लोग चावल खाना पसंद करते हैं, मगर कई बार वजन बढ़ने के डर से इसे नहीं खाते. ऐसे में ब्राउन राइस आपके लिए बेहतर विकल्‍प हो सकता है. ब्राउन राइस सेहत के लिए कई तरह से फायदेमंद होता है. अगर इसकी तुलना सफेद चावल से की जाए तो यह कहीं ज्‍यादा पौष्टिक होता है. साथ ही कई बीमारियों के खतरे को कम करने में मददगार भी होता है. इसमें मैगनीज, फास्फोरस, सेलेनियम और आयरन की भरपूर मात्रा पाई जाती है. कैलोरी कम होने के साथ इसके कई अन्‍य फायदे भी हैं.

डायबिटीज से बचाव
वेबएमडी की एक रिपोर्ट के मुताबिक कुछ अध्ययन बताते हैं कि ब्राउन राइस जैसे साबुत अनाज का प्रति दिन सेवन टाइप 2 डायबिटीज से बचाव करने में मददगार होता है. सफेद चावल की तुलना में ब्राउन राइस में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है. जिसकी वजह से ब्लड शुगर लेवल बढ़ता नहीं है.

दिल को रखता है सेहतमंद
हेल्‍थलाइन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्राउन राइस हृदय के स्‍वास्‍थ्‍य को बेहतर बनाए रखता है. यह फाइबर और फायदेमंद यौगिकों से भरपूर है, जो हृदय रोग के जोखिम को कम करने में मददगार होते हैं. आजकल दिल संबंधी बीमारियां युवाओं में भी होने लगी हैं. ऐसे में बेहद जरूरी है कि कोलेस्ट्रॉल संतुलित रखा जाए. वरना ये आपकी नसों को ब्लॉक कर देता है और दिल की बीमारियों का कारण बनता है. ब्राउन राइस के पानी में अनसेचुरेटेड ऑयल होता है, जो कि कोलेस्ट्रोल को कम करने में मदद करता है.

दिमाग को स्‍वस्‍थ रखता है
आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में हमें कई तरह की मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इससे कई मानसिक बीमारियों का खतरा रहता है. हो जाती हैं. ब्राउन राइस में मैगनीज मौजूद पाया जाता है. ये पोषक तत्व उन फैटी एसिड और हार्मोन्स के निर्माण में मदद करता है, जो नर्वस सिस्टम को फायदा पहुंचाते हैं.

ये भी पढ़ें - रोजाना दाल खाने से पाचन रहता है दुरुस्‍त, जानें इसके 5 फायदे

वजन घटाने में मददगार
सफेद चावल की तुलना में ब्राउन राइस में कैलोरीज काफी कम होती हैं. ऐसे में यह वजन घटाने में मददगार होता है. ब्राउन राइस में फाइबर अत्यधिक मात्रा में होता है, जो मेटाबॉलिज्म को स्वस्थ बनाए रखता है.  (news18.com)


30-Jan-2021 12:39 PM 43

एक नए अध्ययन के अनुसार मोटापा मानसिक स्वास्थ्य पर अतिरिक्त बोझ डालता है. भारत में भी डिमेंशिया का खतरा बढ़ता जा रहा है. स्वास्थ्य के प्रति आम भारतीय परिवार का नजरिया भी इसके बढ़ते कदमों की वजह बन रहा है.
    
     डॉयचे वैले पर स्वाति बक्षी का लिखा-

अमरीका के बेहद मशहूर हास्य अभिनेता रॉबिन विलियम्स की पत्नी ने उनकी मौत से जुड़े अनसुलझे सवालों और अटकलों का जवाब देने की अपनी कोशिश को एक डॉक्यूमेंट्री की शक्ल दी है, रॉबिन्स विश. ये कहानी रॉबिन विलियम्स की मौत से पहले गुजरे कुछ महीनों को समेटते हुए, डिमेंशिया से जूझ रहे एक बेहद फुर्तीले दिमाग वाले इंसान के बिखरते दिमाग की कहानी बयां करती है. कई महीनों तक डिमेंशिया से पैदा हुई दिक्कतों से जूझते हुए विलियम्स ने 2014 में, तिरसठ साल उम्र में आत्महत्या कर ली और उनकी मौत के बाद ही ये पता चल पाया कि उनका दिमाग किस कदर इस बीमारी की चपेट में था.

दरअसल ये कहानी किसी की भी हो सकती है. खासकर भारत में जहां साठ बरस से ऊपर के करीब चालीस लाख लोग डिमेंशिया से जूझ रहे हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2035 में ये आंकड़ा दोगुना हो जाएगा. डिमेंशिया बढ़ती उम्र से जुड़ा हुआ रोग है लेकिन इसके लक्षणों को बुढ़ापे का असर मान लेना ही एक ऐसी गलतफहमी है जो रोगी के जीवन को धीरे-धीरे निगलती जाती है. खास बात ये है कि भारत समेत दुनिया भर में पुरुषों के मुकाबले औरतों में ये बीमारी ज्यादा पाई जाती है. सबसे बड़ी चुनौती तो इस बात को समझने की है कि आखिर ये बीमारी है क्या? न्यूरोलॉजिस्ट यानी तंत्रिका तंत्र विशेषज्ञों की राय में इस बीमारी से निपटने में दवाओं से ज्यादा बीमारी को पहचानने की समझ और सेहत की तरफ हमारा नजरिया अहम भूमिका निभा सकते हैं. साथ ही भारतीय जीवन के कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू हैं जो इस बीमारी के बढ़ते शिकंजे की जड़ में हैं.

क्या है डिमेंशिया
डिमेंशिया किसी एक बीमारी का नाम नहीं है बल्कि ये कई बीमारियों या यूं कहें कि कई लक्षणों के समूह को दिया गया एक नाम है. अल्जाइमर इस तरह की सबसे प्रमुख बीमारी है जो बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करती है. डिमेंशिया के लक्षणों का मूल संबंध इंसानी दिमाग की ज्ञान या सूचनाओं संबंधी प्रक्रियाओं जैसे याददाश्त, रोजमर्रा के सामान्य काम करने की शारीरिक क्षमता, भाषा-ज्ञान, सोचना-समझना, हिसाब-किताब और सामान्य बर्ताव से है. आम-तौर पर डिमेंशिया को सिर्फ याददाश्त से जोड़ कर देखा जाता है लेकिन ये इस बीमारी का सिर्फ एक स्वरूप है. यहां समझने वाली बात ये है कि इंसानी दिमाग का काम सिर्फ यादें संजोने तक सीमित नहीं है.

अभी तक इलाज नहीं
रोजमर्रा की जिंदगी में जो चीजें हमें बहुत सामान्य लगती हैं वो सब दिमागी करामात ही है. मसलन चाय का एक कप बनाने की पूरी प्रक्रिया सही तरह से पूरी करना - पानी उबालना, चायपत्ती, चीनी और दूध डालना और अपने स्वाद के मुताबिक चाय बनाना. ये आसान लगने वाली जटिल दिमागी प्रक्रियाएं है जिसमें चीजों को पहचानने के अलावा उनकी माप और चाय में क्रमानुसार डालना भी शामिल है. अगर किसी को डिमेंशिया हो तो वो ये बेहद छोटा लगने वाला काम नहीं कर सकेगा.

दिल्ली के भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान (एम्स) के न्यूरोलॉजी विभाग में प्रोफेसर डॉ एमवी पद्मा श्रीवास्तव बताती हैं कि "दिमाग ऐसी छह मानसिक प्रक्रियाओं का घर है जिनसे हमारी जिंदगी चलती है. यादाश्त इनमें से सिर्फ एक प्रक्रिया है. रोजमर्रा के जीवन में हम जो भी करते हैं उनकी क्रमवार समझ, दिमागी गतिविधियों का दूसरा अहम पहलू है जैसे चाय बनाने या बर्तन धोने का तरीका. तीसरी मानसिक प्रक्रिया है भाषा. बोली जा रही भाषा को समझना, सही शब्दों का चुनाव कर उसका सटीक जवाब देना, सोचिए ये दिमाग का कितना बड़ा काम है. इसी तरह हमारा सामान्य व्यवहार जैसे सोना, उठना, काम पर जाना किसी को चकित नहीं करता लेकिन दरअसल उसका हर दिन सामान्य होना ही हमारे दिमाग के सही तरह से काम करने की पहचान है.'

यहां पर ये समझना भी जरूरी है कि डिमेंशिया का खतरा बढ़ती उम्र के साथ ही बढ़ता है. यानी अगर आप युवा हैं, तनाव और दबाव में बातें भूल जाते हैं तो ये खतरे की घंटी भले ही ना हो लेकिन साठ बरस के पार अगर किसी व्यक्ति में, रोज के काम-काज या रास्ता भूलने, रुचियों और लोगों से मिलने-जुलने के सामान्य व्यवहारों में बदलाव दिखने लगे तो उसकी वजह जानने के लिए डॉक्टर के पास जाना जरूरी है. हालांकि डिमेंशिया को एक डीजेनेरेटिव यानी लगातार बिगड़ने वाली बीमारी कहा जाता है जिसको रोक सकने वाले इलाज मौजूद नहीं हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि ये लक्षण हमेशा एक ही स्थिति की तरफ इशारा कर रहे हों. इसका मतलब ये भी है कि ये बदलाव शायद किसी और वजह से हों जैसे किसी दवाई का बुरा प्रभाव या फिर शरीर में किसी विटामिन की कमी हो, जिन्हें वक्त रहते ठीक किया जा सकता हो.

वजहें क्या हैं
अनिंद्य सेनगुप्ता, लंबे समय तक भारतीय सूचना सेवा में अधिकारी रहे हैं और तीन साल पहले उनके पिता में डिमेंशिया के शुरूआती लक्षणों का पता चला था. अपने दिवंगत पिता के बारे में वो बताते हैं, "मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में थे और रिटायरमेंट के बाद उन्होने सोचा कि अब जिंदगी में बहुत काम कर लिया इसलिए बस आराम ही किया जाए. धीरे धीरे उन्होंने अपनी पसंद की चीजें जैसे किताबें पढ़ना या लोगों से मिलने जाना भी बहुत कम कर दिया. उन्होंने खुद को काफी अलग-थलग सा कर लिया. मेरी मां को भी लगा कि बस ये उम्र का तकाजा है लेकिन ऊपर से स्वस्थ दिखने वाले मेरे पिताजी दिमागी तौर पर बिखर रहे थे. हमें अंदाजा ही नहीं था कि ये डिमेंशिया की शुरुआत हो सकती है लेकिन सच यही था.'

एक पढ़े-लिखे सजग मध्यमवर्गीय परिवार के शख्स से ये बातें सुनकर स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है. डिमेंशिया में मामला सिर्फ बीमारी का नहीं है, क्योंकि बीमारी अपनी पकड़ बनाने के रास्ते में बहुत से निशान छोड़ती है, उन निशानों को ना पहचान पाना, पीड़ित और परिवार दोनों के लिए मुश्किलें कहीं ज्यादा बढ़ा देता है. एक बात खास तौर पर समझने की है कि ये अचानक पैदा होने वाली बीमारी नहीं है. ये एक धीमी प्रक्रिया है और वृद्धावस्था में लक्षण दिखने की वजह से इसे उम्र बढ़ने की सामान्य प्रक्रिया मान लिया जाता है. इसका अर्थ है कि एक तरफ तो बीमारी के मेडिकल कारण हैं लेकिन स्वास्थ्य के प्रति आम भारतीय परिवार का नजरिया भी इसके बढ़ते कदमों की वजह बन रहा है.

डॉक्टर पद्मा श्रीवास्तव कहती हैं कि डिमेंशिया के दो मुख्य रूप हैं. एक, वैस्क्युलर डिमेंशिया जिसकी वजह ब्रेन सेल यानी दिमाग की कोशिकाओं में रक्त संचार में आई रुकावटों से होने वाला नुकसान है. ये भारत जैसे दक्षिण एशियाई देशों में बड़ा कारण है क्योंकि ब्लड प्रेशर या रक्त संचार को प्रभावित करने वाली दूसरी बीमारियां यहां काफी सामान्य हो गई हैं. दूसरा रूप है, मिक्सड यानी मिश्रित डिमेंशिया जिसमें रक्त संचार में रुकावट से हुए नुकसान के साथ ही दिमाग में प्रोटीन का जमाव होता है जो दिमाग की प्रक्रियाओं में गड़बड़ी पैदा करता है.” हालांकि किस व्यक्ति पर इसका असर कैसा होगा ये बता पाना मुश्किल है क्योंकि इसका गहरा संबंध बीमारी से पहले के जीवन से जुड़ा हुआ है. यानी लोग अपने जीवन में कितना स्वस्थ और सक्रिय हैं व दिमाग को चुस्त रखने के लिए कुछ करते हैं या नहीं.

पुरुषों से ज्यादा महिलाएं चपेट में
इसी से जुड़ी हुई बात ये है  कि ना सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया भर में मर्दों के मुकाबले औरतें इस बीमारी की चपेट में ज्यादा हैं. सवाल लाजमी है कि क्या इसकी वजह सिर्फ मेडिकल ही है या सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचा भी इसमें अपनी भूमिका निभाता है. ये बात तो छिपी नहीं है कि आमतौर पर भारतीय परिवारों में सेहत, प्राथमिकता में नीचे रहती है और बात महिलाओं की सेहत से जुड़ी हो तो उस पर बात करना किसी क्रांति से कम नहीं. इस बीमारी के लक्षण आने की वजहें शरीर के अंदर भी मौजूद हैं, जिन पर काबू कर सकते हैं और बाहरी माहौल में भी, जो शायद हमारे बस में ना हों. इसीलिए जितनी समझ पैदा की जाए, उतना ही अपने को और अपनों को इससे दूर रखने की कोशिश की जा सकती है.

बंगलुरू के मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के न्यूरोलॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मनोज कहते हैं कि "महिलाओं में डिमेंशिया होने के कारणों में शारीरिक के साथ सामाजिक ढांचे की बड़ी भूमिका है. एक राय ये भी है कि महिलाओं की लाइफ स्पैन यानी जीवन-अवधि ज्यादा है इसलिए उनमें उम्र बढ़ने के साथ होने वाली बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है. हालांकि दूसरे प्रमुख कारणों में हॉर्मोन, जेनेटिक ढांचा और महिलाओं की सामाजिक भूमिका भी है. इसके साथ ही औरतों को पढ़ने लिखने और काम-काज के अवसर कम मिलते रहे हैं जो दिमाग में कॉगनिटिव रिजर्व या ज्ञान और सूचनाओं का भंडार जमा करते हैं. पढ़े-लिखे लोगों के मुकाबले गैर-पढ़े लिखे लोगों में डिमेंशिया के लक्षण कहीं ज्यादा प्रभावी रूप में सामने आते हैं.'

कम किया जा सकता है खतरा
बढ़ती उम्र के साथ जोड़कर देखे जाने वाली बीमारियों को नियति मानने वाली मानसिकता से बाहर निकलना शायद दिमाग को डिमेंशिया से बचाने की ओर पहला कदम होगा. हर बूढ़े होते इंसान के लिए याददाश्त की दिक्कतों या रिटायरमेंट के बाद का वक्त अकेले बिताने की मजबूरियों से भरा होता है, ये मानना सबसे बड़ी दिक्कत है. दूसरी बात है, सेहतमंद खान-पान और दिनचर्या  जिससे लोग वाकिफ हैं लेकिन शायद तब तक गंभीरता से नहीं लेते जब तक परेशानियां शुरू ना हो जाएं. डॉ. पद्मा कहती हैं कि बेहिसाब शराब और सिगरेट नहीं पीनी चाहिए, ये तो सबको पता है लेकिन मोटापा, पूरी नींद ना लेना और दिमाग को आराम देने की जरूरत, इन सबकी भी बेहद अहम भूमिका है. आप कसरत करें, दिमाग को शांत करने की कोशिश करें, कुछ हासिल करने की दौड़ में खुद को इतना तनाव ना दें कि शरीर में बीमारियां पैदा होने लगें. अगर ख्याल रखेंगे तो रोग के लक्षणों को ठीक से समझने में भी मदद मिलेगी.'

यहां जरूरत इस बात पर जोर देने की भी है कि अगर घर में कोई बुजर्ग हैं तो उनकी सेहत का ख्याल कैसे रखा जा रहा है. डिमेंशिया में रोगी से ज्यादा, आस-पास के लोगों की भूमिका है क्योंकि शायद इंसान को खुद अहसास ना हो लेकिन साथ में रहने वाले लोग या नजदीकी दोस्त, उनकी दिनचर्या को बारीकी से देखकर उसमें आए बदलाव को महसूस कर सकते हैं. डॉ. मनोज मानते हैं कि "कुछ बातें जो बचाव में मदद कर सकती हैं वो है अपने रक्तचाप और डायबिटीज पर कड़ी नजर, धूम्रपान और शराब पर लगाम की जरूरत तो है ही लेकिन असल में मसला लोगों में जागरूकता बढ़ाने का भी है.' (dw.com)


27-Jan-2021 3:49 PM 56

विवेक त्रिपाठी 

गोरखपुर, 27 जनवरी | सुनहरे शकरकंद के साथ अब गोरखपुर में लाल पत्ता गोभी आपकी सेहत के लिए कारगर साबित हो सकती है। गोरखपुर से 40 किलोमीटर दूर जानीपुर कस्बे के प्रगतिशील किसान इंद्रप्रकाश सिंह इसकी खेती कर रहे हैं। सिर्फ रंगीन होना ही इस गोभी की खूबी नहीं है। इसमें पाए जाने वाले तत्व खून की कमी के खिलाफ सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। कैंसर जैसे रोगों से सुरक्षा देते हैं। इसमें विटामिन, कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि पोषक तत्व पाए जाते हैं।

इंद्रपकाश सिंह राज्य के प्रगतिशील किसानों में शुमार हैं। सब्जियों की खेती में नवाचार के लिए वह जिले और प्रदेश स्तर के कई सम्मान भी पा चुके हैं। उन्होंने अपने एक मित्र से लाल गोभी के बारे में सुना। आदतन उन्होंने इसके बाजार के बारे में जानकारी इकट्ठा की। मंडी के कारोबारियों ने बताया कि रंगीन होने के कारण लगन सलाद के रूप में इसकी ठीक-ठाक मांग निकल सकती है। इसके बाद उन्होंने नर्सरी के लिए बीज की तलाश शुरू की। काफी प्रयास के बाद उनको वाराणसी से यह उपलब्ध हो सका।

फिलहाल उनकी नर्सरी के पौधे शीघ्र ही गोभी की तरह आकार लेने लगेंगे। वह बताते हैं कि जब उन्होंने इसके बारे में पढ़ा तो लगा कि इसकी खेती के लिए पूर्र्वाचल की कृषि जलवायु अनुकूल है। लिहाजा इस साल उन्होंने करीब एक बीघे में इसकी खेती की है। उनकी फसल जिस समय अप्रैल में तैयार होगी, उस समय लगन का समय होगा। ऐसे में उनको उम्मीद है कि उनकी गोभी की मांग और भाव दोनों ठीक रहेंगे। अगर ऐसा हुआ तो अगले साल वह इसकी खेती को और विस्तार देंगे।

इंद्र प्रकाश सिंह सब्जियों की खेती करते हैं। आलू उनकी विशेष फसल है। इसी से उनकी पहचान बनी है। गेंहू, धान वह खाने भर का ही उगाते हैं। इस साल वह पत्ता गोभी की एक ऐसी किस्म भी लगाने जो रहे हैं जो मई में तैयार होगी। आकार में यह गोल की बजाय चौकोर होगी।

कृषि वैज्ञानिक केंद्र , गोरखपुर के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक, उद्यान, डॉ. एसपी सिंह ने बताया, "सामान्य पत्ता गोभी में एक कीड़ा होता है, जो छेद कर देता है। सब्जी खराब कर देता है। लेकिन इस लाल पत्ता गोभी में अभी यह देखने को नहीं मिला। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सिडेंट कैल्शियम और आयरन की मात्रा भी ज्यादा है। यह अन्य बीमारियों के लिए भी लाभकारी है। आने वाले समय में इसका बाजार धीरे-धीरे बढ़ रहा है।"

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि इसमें मुख्य रूप से फाइटोकेमिकल्स, एंटीऑक्सिडेंट पाया जाता है, जो पोषक तत्वों का खजाना है। इसमें थायमिन, राइबोफ्लेविन, फोलेट, कैल्शियम, मैंगनीज, मैग्नीशियम, लोहा और पोटेशियम के अलावा विटामिन सी, ए, ई, बी और फाइबर मिलते हैं। स्वाभाविक है कि इसके सेवन से कई तरह की विटामिंस, मिनिरल्स की कमीं की भरपाई होती है। शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।  (आईएएनएस)
 


17-Jan-2021 10:07 AM 59

हर रसोई में पाई जाने वाली छोटी सी दालचीनी न जाने कितने गुणों से भरपूर होती है. इसका पौधा जितना छोटा है, इसके गुण उतने ही ज्यादा होते हैं. दालचीनी की सूखी पत्तियां तथा छाल मसाले (Spices) के रूप में खाने का स्वाद बढ़ाते हैं और लोगों को सेहमंद बनाएं रखते हैं. इसकी छाल थोड़ी मोटी, चिकनी तथा हल्के भूरे रंग की होती है. दालचीनी खून को साफ करता है, वजन घटाता है (Weight Loss) और साथ ही कई बीमारयों को कोसों दूर भगाता है. दिन भर की थकान से होने वाले सिर दर्द से लेकर माइग्रेन के दर्द तक सभी बीमारियों का इलाज इसके पास है. आइए जानते हैं दालचीनी के ऐसे ही कुछ फायदों के बारे में.

पेट की समस्या करे दूर

लोगों को अक्सर पेट से जुड़ी कई प्रकार की समस्याएं हो जाती हैं और पाचन तंत्र गड़बड़ाते ही शरीर में न जाने कितनी नई बीमारियां होने लगती हैं. इसके लिए एक चम्मच शहद के साथ थोड़ा सा दालचीनी पाउडर मिलाकर खाने से पेट दर्द और एसिडिटी में आराम मिलता है. साथ ही भोजन भी आसानी से पच जाता है.

वजन कम करने में मददगार

आज के समय में बढ़ता वजन लोगों की सबसे बड़ी समस्या है, लेकिन ये छोटी सी दालचीनी आपके बढ़ते वजन को कम करने में मदद कर सकती है. इसके लिए नाश्ते के आधे घंटे पहले एक गिलास पानी में एक चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर उबालें. फिर इसे कप में डालकर दो बड़े चम्मच शहद मिलाकर पिएं. इस प्रक्रिया को रात में सोने से पहले भी दोहराएं.

दिल का रखे ख्याल

दालचीनी आपके दिल का ख्याल रखने में भी आपकी मदद करता है. इसके लिए दालचीनी पाउडर और शहद का पेस्ट बनाकर रोटी के साथ खाएं. इससे धमनियों में कोलेस्‍ट्रॉल जमा नहीं होगा, जिससे हार्ट संबंधी बीमारियों की संभवना भी कम हो जाएगी. जिन लोगों को दिल से जुड़ी कोई बीमारी है, उनके लिए ये उपाय रामबाण है.

त्वचा के लिए फायदेमंद

अपनी सुगंध से सबको आकर्षित करने वाली दालचीनी त्‍वचा के लिए भी बेहद फायदेमंद है. त्वचा में न जाने कितनी तरह की समस्याएं हो जाती हैं, जैसे खाज, खुजली. इसके लिए दालचीनी पाउडर में शहद मिलाकर इसका लेप बनाकर लगाएं और सूखने पर अच्छे से धो लें. दालचीनी के पाउडर में थोड़ा सा नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लगाने से पिंपल्स भी दूर होते हैं.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें. (news18)


16-Jan-2021 10:11 AM 196

दिल की बीमारी आज भी बहुत बड़ी संख्या में लोगों की जानें ले रही है, इस बीमारी के बारे में कुछ काम की बातें

ज्ञान विज्ञान में चिकित्सा विज्ञान जितनी मानव समाज की सेवा करता है उतना शायद ही कोई अन्य क्षेत्र कर सकता हो। चिकित्सा के क्षेत्र में वैकसीन और नयी नयी दवाएं बनीं जिसकी वजह  से बहुत  से रोगों से लड़ना संभव हुआ है।

इसी तरह नये ज़माने में नयी नयी दवाओं की वजह से महामारियों और रोगों के कारण मृत्यु दर में कमी आयी है और पूरी दुनिया में आयु की औसत दर में वृद्धि  हुई है।  संक्रमण से पैदा होने वाली बीमारियों  को क़ाबू करना आसान है क्योंकि उसकी वजह स्पष्ट होती है लेकिन संक्रमण के अलावा जो बीमारियां होती हैं उनका इलाज काफी मुश्किल होता है क्योंकि उसकी वजहें कई होती हैं। इस प्रकार की बीमारियों  की जो  वजह होती हैं अगर उनकी पहचान कर ली जाए और उन्हें खत्म कर दिया जाए तो फिर बीमारी को 80 प्रतिशत तक  खत्म किया जा सकता है। हार्ट अटैक, ब्रेन हैमरेज और शुगर जैसे रोग इसी श्रेणी में हैं। खान पान का सही न होना, मोटापा, व्यायाम से दूरी, धूम्रपान, ब्लड प्रेशर और इसी प्रकार के कई कारक, मनुष्य में ह्रदय रोग का कारण बनते हैं।  

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार सन 2015 में पूरी दुनिया में 56.4 मिलयन लोग जो हर साल मरते हैं उनमें से 15 मिलयन लोग दिल की बीमारियों और ब्रेन हैमरेज से मरते हैं। इस तरह से यह पता चलता है कि दिल की बीमारी की वजह से सब से अधिक लोग मरते हैं। दिल की भूमिका शरीर में इतनी महत्वपूर्ण है कि अगर वह स्वस्थ न हो तो फिर जीवन मुश्किल हो जाता है। दिल की बीमारी के लिए न कोई आयु होती है और न ही स्त्री पुरुष होने की वजह से कोई फर्क़ पड़ता है। किसी को भी किसी भी आयु में दिल की बीमारी हो सकती है। इस लिए अगर सतर्क रहा जाए और स्वास्थ्य पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाए तो इस बीमारी से बचा जा सकता है या कम से कम उसका ख़तरा काफी कम किया जा सकता है। इस से बचने के लिए सब से ज़रूरी यह है कि हमें इस बीमारी के कारणों के बारे में सटीक और सही मालूमात हो। 

दिल की बीमारी में सब से अधिक और प्रचलित समस्या, रगों का बंद हो जाना है। दिल तक खून पहुंचाने वाली अस्ली रग बंद हो जाती है तो अचानक ही सीने में दर्द शुरु होता है और फिर हार्ट अटैक हो जाता है। इसी तरह दिल की धड़कन में समस्या पैदा हो जाती है। यह भी एक प्रकार की दिल की बीमारी है। इन्सान का दिल एक मिनट में 60 से 100 बार धड़कता है और इस प्रकार से पूरे शरीर में खून पहुंचता है। कभी कभी एसा होता है कि उसकी धड़कन में समस्या पैदा हो जाती है, अर्थात कभी धड़कन तेज़ तो कभी कम होने लगती है। जब दिल शरीर के हर हिस्से में पर्याप्त खून और आक्सीजन नहीं पहुंचा पाता तो इसका मतलब यह है कि दिल सही रूप से काम नहीं कर पा रहा है और जब वह सही रूप से काम नहीं करता तो खून दिल में जमने लगता है और धीरे धीरे दिल का साइज़ बढ़ने लगता है। इस बीमारी में ग्रस्त लोगों के चेहरे, आंखों  के आस पास और पैरों में सूजन होती है और उन्हें आराम करते और सोते समय भी सांस लेने में तकलीफ होती है। 

कभी कभी दिल के वाल्व खराब हो जाते हैं यह भी एक प्रकार की दिल की बीमारी है। यह वाल्व खून को निर्धारित दिशा में भेजते हैं लेकिन अगर उसमें खराबी हो जाती है तो फिर रक्त प्रवाह में विघ्न पैदा हो जाता है।अगर इस बीमारी का इलाज न हो तो धीरे धीरे खून पंप करने की दिल की क्षमता प्रभावित होती है। इस बीमारी का कारण कभी जीन्स हो सकते हैं या फिर हाई ब्लड प्रेशर, शुगर, मोटापा और संक्रमण आदि इस बीमारी की वजह बन सकता है। 

दिल की कुछ बीमारियां एसी भी हैं जो पैदाइशी होती हैं लेकिन अच्छी बात यह है कि हालिया दशकों में  ह्रदय के जन्मजात रोगों में कमी आयी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जीन्स के अलावा , संक्रमण, शराब और कुछ दवाएं इस बात का कारण बनती हैं कि बच्चा मां की कोख में  दिल की बीमारी में ग्रस्त होकर पैदा हो। 

दिल की बहुत सी बीमारियों को सही समय पर उनकी पहचान करके और सही रूप से उपचार करके ठीक किया जा सकता है। बेहोशी, तेज़ या धीरे धीरे दिल की धड़कन, पैरों, कलाइयों और पेट में अचानक सूजन दिल की बीमारियों के लक्षण होते हैं। अगर किसी को इस प्रकार की कोई समस्या आती है तो उसे तत्काल रूप से डाक्टर के पास जाना चाहिए क्योंकि दिल की बहुत सी बीमारियां सही समय पर उपचार से ठीक हो जाती हैं। अनुमति दें खुदा हाफिज।  (parstoday)


31-Dec-2020 12:11 PM 75

-अनंत प्रकाश

भारतीय मौसम विभाग ने दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई इलाक़ों में बुधवार से लेकर अगले कुछ दिनों तक शीत लहर चलने और तापमान काफ़ी कम रहने की सूचना दी है.

इन इलाक़ों में दिल्ली एनसीआर, हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ शामिल हैं जहां बीते कुछ दिनों से तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस के आसपास दर्ज किया जा रहा है.

मौसम विभाग ने सुबह के समय खुली जगहों पर न जाने की सलाह दी है.

इसके साथ ही स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ऐसा करने पर हाइपोथर्मिया और फ्रॉस्टबाइट जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं.

हाइपोथर्मिया होने पर आपका शरीर एक असामान्य रूप से कम तापमान पर पहुंचने के बाद काम करना बंद कर देता है. वहीं, फ्रॉस्टबाइट यानी ठंड से शरीर के कुछ हिस्से जैसे कि पैर की उंगलियां, हाथों की उंगलियां, चेहरा और पलकें आदि सुन्न हो सकती हैं.

मौसम विभाग की ख़ास चेतावनी
मौसम विभाग ने अपनी निर्देशिका में शराब नहीं पीने की सलाह भी दी है. क्योंकि मौसम विभाग के मुताबिक़, शराब पीने से शरीर का तापमान गिरता है.

बीबीसी ने इस बारे में भारतीय मौसम विभाग के क्षेत्रीय पूर्वानुमान केंद्र के प्रमुख कुलदीप श्रीवास्तव से बात करके ऐसी चेतावनी जारी करने की वजह पूछी.

ये भी पढ़ें: किसान आंदोलनः कड़ाके की ठंड में खुले आसमान तले फ़रियाद - ग्राउंड रिपोर्ट

श्रीवास्तव बताते हैं, “दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में अभी शीत लहर की समस्या चल रही है. ऐसे में तापमान चार डिग्री या उससे कम दर्ज किया जा रहा है. इस स्थिति में आपको सुबह के समय घर से बाहर निकलने से बचना चाहिए. वहीं, अगर सफ़र कर रहे हैं तो सुबह के समय धुंध की वजह से विज़िबिलिटी भी कम रहती है. ऐसे में फॉग लाइट का इस्तेमाल करें और गाड़ियां धीमे चलाएं. और इस दौरान शराब न पिएं क्योंकि वो शरीर का तापमान और गिराता है.”

शराब न पीने की चेतावनी क्यों?
मौसम विभाग इससे पहले 25 तारीख़ को जारी अपनी निर्देशिका में भी शराब न पीने की हिदायत दे चुका है.

ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर मौसम विभाग ऐसी चेतावनी क्यों दे रहा है.

बीबीसी ने जब ये सवाल पूछा तो कुलदीप श्रीवास्तव ने बताया, “इस पहलू पर मेडिकल क्षेत्र के विशेषज्ञों ने शोध किया है. और उसके आधार पर ही आईएमडी ये चेतावनी जारी कर रहा है.”

दुनिया में कई मुल्क ऐसे हैं जहां तापमान बेहद कम मतलब दस डिग्री से लेकर माइनस बीस से तीस डिग्री के बीच रहता है लेकिन वहां शराब का उपभोग कहीं ज़्यादा रहता है. इनमें रूस, बेलारूस और लिथुआनिया जैसे देश आते हैं जहां तामपान बेहद कम रहता है. ये देश दुनिया में शराब उपभोग के मामले में सबसे ऊपर हैं.

इसके साथ ही एक आम धारणा ये है कि शराब पीने से शरीर में गर्माहट आती है.

ऐसे में सवाल उठता है कि आईएमडी की इस चेतावनी में कितना दम है कि सर्दियों में शराब पीने से बचना चाहिए.

बीबीसी ने इस मामले की तह में जाने के लिए मेडिकल क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों से बात की ताकि ये समझा जा सके कि सर्दियों में शराब पीने पर आपके शरीर में क्या होता है.

क्या कहता है विज्ञान?
इंसानी शरीर का मूल तापमान 37 डिग्री सेल्सियस होता है. लेकिन जब आपके आसपास का तापमान घटने लगता है तो शरीर ऊर्जा का इस्तेमाल अपने मूल तापमान को बनाए रखने के लिए करता है.

लेकिन जब शरीर का तापमान तय सीमा से नीचे गिरने लगता है तो आप हाइपोथर्मिया के शिकार होते हैं.

मौसम विभाग की चेतावनी के मुताबिक़, दिल्ली एनसीआर, पंजाब, हरियाणा में इस वक़्त जो तापमान है, उसमें ज़्यादा देर तक रहने पर हाइपोथर्मिया के शिकार हो सकते हैं.

सरल शब्दों में कहें तो जब शरीर का कोर टेंपरेचर एक सीमा से ज़्यादा गिरने लगता है तो आप हाइपोथर्मिया के शिकार होने लगते हैं.

अब बात करते हैं कि कम तापमान वाली जगह पर शराब पीने का शरीर पर क्या असर पड़ता है.

दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल की सीएमओ डॉ ऋतु सक्सेना शराब और सर्दी के कनेक्शन को कुछ इस तरह समझाती हैं.

वो कहती हैं, “जब आप शराब पीते हैं तो शराब के आपके शरीर में जाने के बाद वेजो डायलेशन होता है. इसकी वजह से आपके हाथ, पैरों की रक्त वाहिकाओं का विस्तार होता है, उनमें पहले से ज़्यादा खून का प्रवाह होने लगता है. इसकी वजह से आपको गर्माहट का अहसास होता है. इसीलिए लोगों को लगता है कि पश्चिमी देशों में लोग शराब इसलिए ज़्यादा पीते हैं, क्योंकि वहां ठंड ज़्यादा पड़ती है."

"लेकिन असल में शराब की वजह से हाथ पैरों में खून की मात्रा बढ़ती है तो ऐसा लगता है कि गर्मी लग रही है. इस अहसास के आधार पर ही लोग सर्दियों के कपड़े जैसे मफ़लर, जैकेट, हैट, स्वेटर आदि उतार देते हैं. लेकिन जब वे ऐसा कर रहे होते हैं तभी उनकी बॉडी का कोर टेंपरेचर गिर रहा होता है. और हमें उस बारे में जानकारी नहीं मिलती है जो कि हमारे शरीर के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकता है.”

लेकिन अगर शराब से गर्मी पैदा नहीं होती है तो गर्माहट लगती क्यों है.

मैक्स हेल्थकेयर में इंटरनल मेडिसिन विभाग में सह निदेशक, डॉ. रोमेल टिक्कू इस गुत्थी को सुलझाते हुए कहते हैं, “अक्सर आपने देखा होगा कि जो लोग ज़्यादा शराब पीते हैं, उनका चेहरा लाल-लाल सा रहता है. क्योंकि शराब की वजह से उनके बाहरी अंगों जैसे कि चेहरे, हाथ, पैर की रक्त धमनियों में ख़ून का प्रवाह बढ़ जाता है. इससे गर्मी लगती है क्योंकि ख़ून शरीर के आंतरिक हिस्सों से बाहर की ओर जाता है जिससे कोर बॉडी टेंपरेचर कम हो रहा होता है."

"इसलिए, ठंड के मौसम में जब आप शराब पीते हैं, और ज़्यादा पीते हैं तो आपके शरीर का कोर बॉडी टेंपरेचर कम होता जाता है. खून का प्रवाह बढ़ने से आपके शरीर में पसीना आता है जिससे शरीर का तापमान और कम होता जाता है. ऐसे में ठंड के मौसम में अगर आप शराब पीते हैं तो आपको दिक्कत हो सकती है.”

जानलेवा हो सकती है शराब?
डॉ. ऋतु सक्सेना की मानें तो सर्दियों के मौसम में शराब पीने और ज़्यादा शराब पीने से आपकी जान भी जा सकती है.

वो कहती हैं, “अगर सर्दियों में आपने बहुत ज़्यादा शराब पी ली तो सबसे पहली बात ये होगी कि आप ठीक से कपड़े नहीं पहनेंगे. शराब की वजह से आपके दिमाग़ पर जो असर होगा, उससे ये होगा कि आपको पता नहीं चलेगा कि आप किस हालत में हैं. और इसी स्थिति में जब आपके शरीर का कोर टेंपरेचर 37 डिग्री सेल्सियस से नीचे जाता रहेगा तो धीरे-धीरे हाइपोथर्मिया का असर दिखना शुरू हो जाएगा. हाइपोथर्मिया से व्यक्ति कोमा में जा सकता है और उसकी जान भी जा सकती है.”

वहीं, अगर उन मुल्कों की बात की जाए जहां कम तापमान है और शराब ज़्यादा पीने का चलन है तो रूस ऐसे ही देशों में से एक है.

और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च कहती है कि रूस में जहां वोदका का सेवन काफ़ी सामान्य है, वहां शराब के अधिक उपभोग की वजह से जीवन प्रत्याशा में कमी आई है. (bbc.com)
 


28-Dec-2020 3:04 PM 57

नई दिल्ली. दुनियाभर में कोरोना वायरस का संक्रमण तेजी से फैल रहा है. कोरोना वायरस से होने वाले प्रभाव को लेकर विशेषज्ञ हर दिन नई जानकारी दे रहे हैं. डॉक्टरों के मुताबिक कोरोना वायरस से इंसान में न्यूमोथोरैक्स की दिक्कत हो रही है. आसान भाषा में समझा जाए तो कोरोना वायरस के कारण मरीज के फेफड़े इतने कमजोर हो जा रहे हैं कि उनमें छेद हो जा रहा है. वैज्ञानिकों ने कहा कि हम इस बात को लेकर इसलिए ज्यादा चिंतित हैं क्योंकि इसका अभी तक कोई इलाज नहीं मिल सका है.

कोरोना वायरस की वजह से फेफड़ों में फाइब्रोसिस हो रहा है. इसका मतलब है कि हवा वाली जगह पर म्यूकस का जाल बन रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक जब फाइब्रोसिस की संख्या बढ़ जाती है तो न्यूमोथोरैक्स यानी फेफड़े में छेद हो जाता है. डॉक्टरों ने बताया कि गुजरात में कोरोना से संक्रमित कुछ मरीजों में इस तरह की दिक्कत देखने को मिली है. ये सभी मरीज 3 से 4 महीने पहले कोरोना से ठीक हुए थे लेकिन इनके फेफड़ों में फाइब्रोसिस की शिकायत मिली है.

इन मरीजों को सीने में तेज दर्द औऱ सांस लेने में दिक्कत होने की वजह से अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है. प्राइवेट अस्पताल में इलाज करा रहे मरीजों के डॉक्टरों ने बताया कि कोरोना की वजह से हुए फाइब्रोसिस जब फट जाते हैं तो फेफड़ों में न्यूमोथोरैक्स शुरू हो जाता है. डॉक्टरों के मुताबिक न्यूमोथोरैक्स में फेफड़े के चारों तरफ की बाहरी दीवार और अंदरूनी परतें इतनी कमजोर हो जाती हैं कि उनमें हीलिंग की क्षमता कम हो जाती है. डॉक्टरों के मुताबिक फेफड़े इतने कमजोर हो जाते हैं कि उनमें छेद हो जाता है.

मरीज को किस तरह की होती है दिक्कत
न्यूमोथोरैक्स के मरीजों को सीने में तेज दर्द, सांस लेने में दिक्कत, सीने में जकड़न और अपच की शिकायत होती है. फाइब्रोसिस के कारण फेफड़े की नई लेयर इतनी पतली और कमजोर हो जाती है कि हीलिंग के दौरान फट जाती है. कई बार इस पर सही समय पर अगर काबू न पाया जाए तो मरीज की मौत भी हो जाती है. (news18.com)


20-Dec-2020 1:54 PM 95

रिसर्च में बताया गया है प्रेग्नेंसी से पहले सिर्फ महिला ही नहीं बल्कि उसके पति की सेहत का भी महत्व है. शोधकर्ताओं ने नतीजा निकाला कि पिता में मेटाबोलिक सिंड्रोम के जितने ज्यादा लक्षण होंगे, मिसकैरेज का खतरा उतना ही ज्यादा बढ़ जाएगा.

शोधकर्ताओं ने महिलाओं के प्रिगनेन्सी से पहले पति की सेहत और मिसकैरेज के बीच संबंध का पता लगाया है. रिसर्च में बताया गया है प्रिगनेन्सी से पहले सिर्फ महिला ही नहीं बल्कि उसके पति की सेहत का भी महत्व है. अमेरिका में शोधकर्ताओं ने 2009-2016 के लगभग 10 लाख प्रिगनेन्ट महिलाओं के डेटाबेस का विश्लेषण और मेडिकल रिकॉर्ड से उनके पतियों की सेहत की जांच-पड़ताल कर खुलासा किया.

प्रेग्नेंसी से पहले पति की सेहत भी बहुत जरूरी

उन्होंने बताया कि रिसर्च के दौरान ये बात सामने आई कि मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रोल से पीड़ित पुरुषों की पत्नियों में मिसकैरेज का खतरा सेहतमंद पुरुषों की पत्नियों के मुकाबले 27 फीसद ज्यादा होता है. उन्होंने कहा कि आम तौर पर प्रिगनेन्सी से पहले सिर्फ महिलाओं पर ध्यान देने का चलन है मगर ये पहली बार है जिससे पिता की सेहत और मिसकैरेज के बीच संबंध का पता चलता है.

शोधकर्ताओं ने पुरुषों की बीमारियों के साथ-साथ गर्भ पर असर डालने वाले अन्य कारणों जैसे मां की उम्र, सेहत, वजन और पति या पत्नी में से किसी को धूम्रपान की आदत को ध्यान में रखा. परीक्षण में शामिल 4.6 फीसदी पुरुषों की उम्र 45 साल से ज्यादा थी और उनमें से 23.1 फीसदी पुरुष पत्नियों की प्रेगनेन्सी से पहले मेटाबोलिक सिंड्रोम का शिकार थे. परीक्षण के दौरान 1 लाख 72 हजार 999 महिलाओं को मिसकैरेज या जन्म के दर्दनाक हादसे से गुजरना पड़ा.

मिसकैरेज का 27 फीसद बढ़ जाता है खतरा- रिसर्च

शोधकर्ताओं ने नतीजा निकाला कि पिता में मेटाबोलिक सिंड्रोम के जितने ज्यादा लक्षण होंगे, मिसकैरेज का खतरा उतना ही ज्यादा बढ़ जाएगा. रिसर्च से ये भी पता चला कि मिसकैरेज का खतरा मां की उम्र में वृद्धि और विभिन्न बीमारियों का शिकार होने की सूरत में भी बढ़ता है और इस दौरान भी पिता की सेहत और मिसकैरेज के बीच संबंध बरकरार रहता है. रिसर्च के नतीजे ह्यूमन रि-प्रोडक्शन नामी पत्रिका में सामने आए हैं. (abplive.com)


10-Dec-2020 2:15 PM 116

नई दिल्ली, 10 दिसंबर | रूसी अधिकारियों द्वारा स्पुतनिक-5 वैक्सीन की खुराक मिलने के बाद दो महीने तक शराब के सेवन से परहेज करने की सलाह दिए जाने के बाद अब भारत में भी स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने गुरुवार को कहा कि यह कोविड-19 के मरीजों के लिए एक निवारक उपाय है। विशेषज्ञों के मुताबिक, एल्कोहल के सेवन के खिलाफ जारी किए गए निषेधाज्ञा का मकसद प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाए रखने से है।

गुरुग्राम में फोर्टिस अस्पताल में न्यूरोलॉजी के प्रमुख और निदेशक डॉ. प्रवीण गुप्ता ने आईएएनएस को बताया, "रूसी अधिकारियों ने कोविड का टीका लेने वाले मरीजों के लिए कुछ अजीबोगरीब सुझाव दिए हैं, जिससे शायद कोविड के संक्रमण से अधिक बचा जा सकेगा।"

उन्होंने आगे कहा, "या तो उनका मानना है कि वैक्सीन दो महीने बाद जाकर अपना काम शुरू करेगा या फिर इसकी कोई सटीक व्याख्या नहीं है कि क्यों लोग टीकाकरण के बाद भी इतने लंबे समय तक सावधानी बरत कर रखेंगे।"

रूस में शराब का सेवन लोग आमतौर पर किया करते हैं, ऐसे में इस तरह के किसी निवारक उपाय को अपनाने से यहां की आबादी तो प्रभावित होगी ही और साथ में आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह देश को काफी प्रभावित करेगा और इससे वैक्सीन के प्रति लोग की राय भी बदलेगी।(आईएएनएस)
 


20-Nov-2020 7:46 PM 109

एफएओ के मुताबिक एंटीबायोटिक सहित एंटीमाइक्रोबियल दवाओं का लम्बे समय से इस्तेमाल किया जा रहा है और उनका गलत इस्तेमाल भी हो रहा है

दुनिया में बेहतर से बेहतर दवाएं उपलब्ध होने के बावजूद विभिन्न संक्रमण से लोगों, पशुओं और पौधों की मौत हो रही है, क्योंकि सूक्ष्मजीवीरोधी प्रतिरोधक क्षमता (एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस) बढ़ती जा रही है। विश्व एंटीमाइक्रोबियल जागरूकता सप्ताह के मौके संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की ओर से जारी एक बयान में यह बात कही है।

एफएओ के मुताबिक एंटीबायोटिक सहित एंटीमाइक्रोबियल दवाओं का लम्बे समय से इस्तेमाल किया जा रहा है और उनका गलत इस्तेमाल भी हो रहा है, जिससे सूक्ष्मजीवीरोधी प्रतिरोधक क्षमता का तेजी से फैलाव हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार बैक्टीरिया संक्रमणों की रोकथाम और उनका उपचार करने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें एंटीमाइक्रोबियल के तहत ही शामिल किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी का कहना है कि इंसान व जानवरों की बजाय बैक्टीरिया में सूक्ष्मजीवीरोधी प्रतिरोधक (एएमआर) क्षमता विकसित हुई है और वे बैक्टीरिया लोगों व जानवरों को संक्रमित कर सकते हैं। ऐसे बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण पर काबू पाना और उपचार करना अन्य बैक्टीरिया की तुलना में मुश्किल होता है।

एफएओ का कहना है कि अगर इस समस्या से नहीं निपटा गया तो एएमआर के कारण करोड़ों लोग चरम गरीबी, भुखमरी और कुपोषण का शिकार हो सकते हैं।

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि एएमआर की वजह से सामान्य संक्रमण का इलाज भी मुश्किल हो जाता है और बीमारी के फैलने, उसके गंभीर रूप धारण करने या मौत होने का खतरा बढ़ जाता है।

बैक्टीरिया, वायरस, फफूंद या परजीवी में समय के साथ आने वाले बदलाव और दवाओं का उन पर असर न होने की वजह से सूक्ष्मजीवीरोधी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह वैश्विक स्वास्थ्य और विकास के लिए एक बड़ा बनता जा रहा है। इंसान, पशुओं और खेती में दवाओं का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल और स्वच्छ पानी व साफ-सफाई की कमी से दुनिया भर में एएमआर का जोखिम बढ़ा है।

एफएओ के मुताबिक एएमआर नियामकों और निरीक्षण की कमी के कारण एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल बढ़ रहा है और डॉक्टरी नुस्खे के बिना और ऑनलाइन बिक्री के कारण खराब गुणवत्ता व फर्जी उत्पादों का भी इस्तेमाल बढ़ रहा है।

यूएन की स्वास्थ्य एजेंसी ने एएमआर को उन 10 सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों की सूची में शामिल किया है, जो मानवता के समक्ष चुनौती के रूप में मौजूद हैं। इससे वैश्विक स्वास्थ्य, विकास, सतत विकास लक्ष्यों और अर्थव्यवस्था पर खासा असर पड़ने की आशंका है।

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि अगर एएमआर पर काबू नहीं किया गया तो अगली महामारी बैक्टीरिया के कारण हमारे सामने आ सकती है, जो ज्यादा घातक होगी और जिसके इलाज में दवाएं काम नहीं आएंगी। ‘विश्व एंटीमाइक्रोबियल जागरूकता सप्ताह’ के जरिये आम लोगों, स्वास्थ्यकर्मियों और नीतिनिर्धारकों में एएमआर की चुनौती और उसका मुकाबला करने के लिए सर्वश्रेष्ठ उपायों के प्रति जागरूकता फैलाई जा रही है।

क्या आप जानते हैं?
- दवा-प्रतिरोधक बीमारियों के कारण हर वर्ष कम से कम सात लाख लोगों की मौत होती है।

- अगले 10 सालों में बढ़ती जनसंख्या और इंसानी जरूरतों को पूरा करने के लिए पशुओं में एंटीमाइक्रोबियल का इस्तेमाल दोगुना होने के आसार हैं।

- इन 10 वर्षों में लगभग ढाई करोड़ लोग एएमआर के कारण चरम गरीबी का शिकार हो सकते हैं। (downtoearth.org.in)


16-Nov-2020 6:21 PM 146

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और अमेरिका की संस्था सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन की एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 2019 में खसरा बीमारी के कारण दो लाख से ज्यादा मौतें हुई, जबकि पिछले 23 साल में सबसे अधिक मामले सामने आए।

इस रिपोर्ट के मुताबिक एक दशक में वैक्सीन की पर्याप्त पहुंच न होने के कारण खसरा के मामलों में वृद्धि हुई। वर्ष 2016 में खसरा के कारण होने वाली मौतों में रिकॉर्ड गिरावट देखने को मिली थी, लेकिन 2019 में उसकी तुलना में 50 फीसदी की वृद्धि हुई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में खसरा के साढ़े आठ लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं।

हालांकि इस वर्ष 2020 में कम मामले देखने को मिले हैं, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण वैक्सीन के प्रयासों को झटका लगा है।

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ) की कार्यकारी निदेशक हेनरीएटा फोर ने आगाह किया है कि कोरोनावायरस संकट से पहले दुनिया खसरे के संकट से जूझ रही थी और यह अभी टला नहीं है।

खसरा की पूरी तरह रोकथाम की जा सकती है लेकिन इसके लिए समय रहते 95 फीसदी बच्चों को खसरा वैक्सीन की दो खुराकें बच्चों को दी जानी चाहिए।

पहली खुराक एमसीवी1 की कवरेज में विश्व भर में पिछले एक दशक से ज्यादा समय से रूकावट आई है और अब यह 84-85 फीसदी तक सीमित है।

रिपोर्ट बताती है कि एमसीवी2 की कवरेज में वृद्धि हो रही है, लेकिन यह अभी 71 प्रतिशत तक ही सम्भव हो पाई है।

एक रिपोर्ट में कहा गया था कि पिछले कुछ समय के दौरान कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य, मैडागास्कर, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, जॉर्जिया, समोआ, यूक्रेन, उत्तर मैसेडोनिया सहित अन्य देशों में बड़ी संख्या में खसरा के मामले सामने आये हैं।

गौरतलब है कि बीते सप्ताह यूनीसेफ और डब्ल्यूएचओ ने खसरा और पोलियो के बढ़ते मामलों को कम करने के लिए एक साझा अपील जारी की थी। जिसमें कहा गया था कि अगले तीन साल में 25 करोड़ डॉलर की धनराशि की जरूरत होगी, ताकि खसरा के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता की कमियों को दूर किया जा सके।(https://www.downtoearth.org.in/hindistory)


08-Nov-2020 1:47 PM 161

कोई व्यक्ति अगर हर दिन पेपर कप में औसतन तीन बार चाय या कॉफी पीता है, तो वह 75,000 छोटे सूक्ष्म प्लास्टिक के कणों को निगलता है. आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा.
नई दिल्ली. प्लास्टिक वाली गिलास को सेहत के लिए खतरनाक मानकर हम सभी ने पेपर वाले कप में चाय पीना शुरू कर दिया है, लेकिन सच ये है कि डिस्पोजेबल पेपर कप (Disposable Paper Cups) में रखी जाने वाली चाय भी आपकी सेहत को बिगाड़ सकती है. आईआईटी खड़गपुर (IIT Kharagpur) के वैज्ञानिकों ने एक बड़ा खुलासा किया है, जिसके मुताबिक यदि एक व्यक्ति प्रतिदिन पेपर कप में औसतन तीन बार चाय या कॉफी पीता है, तो वह 75,000 छोटे सूक्ष्म प्लास्टिक (Micro-plastic) के कणों को निगलता है.

रिसर्च में इस बात की पुष्टि हुई है कि कप के भीतर के अस्तर में इस्तेमाल सामग्री में सूक्ष्म-प्लास्टिक और अन्य खतरनाक घटकों की उपस्थिति होती है और उसमें गर्म तरल पदार्थ परोसने से पदार्थ में दूषित कण आ जाते हैं. पेय पदार्थों के सेवन के लिए डिस्पोजेबल पेपर कप लोकप्रिय विकल्प साबित हुआ है. लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि पेपर कप के भीतर आमतौर पर हाइड्रोफोबिक फिल्म की एक पतली परत होती है जो ज्यादातर प्लास्टिक (पॉलीथीन) और कभी-कभी सह-पॉलिमर से बनी होती है.

देश में पहली बार किए गए अपनी तरह के इस शोध में सिविल इंजीनियरिंग विभाग की शोधकर्ता और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुधा गोयल तथा पर्यावरण इंजीनियरिंग एवं प्रबंधन में अध्‍ययन कर रहे शोधकर्ता वेद प्रकाश रंजन और अनुजा जोसेफ ने बताया कि 15 मिनट के भीतर यह सूक्ष्म प्लास्टिक की परत गर्म पानी की प्रतिक्रिया में पिघल जाती है.

डिस्पोजल पेपर कप कितना खतरनाक?
प्रोफेसर सुधा गोयल ने कहा, ‘हमारे रिसर्च के अनुसार एक पेपर कप में रखा 100 मिलीलीटर गर्म तरल (85-90 ओसी), 25,000 माइक्रोन-आकार (10 माइक्रोन से 1000 माइक्रोन) के सूक्ष्म प्लास्टिक के कण छोड़ता है और यह प्रक्रिया कुल 15 मिनट में पूरी हो जाती है.

ये सूक्ष्म प्लास्टिक आयन जहरीली भारी धातुओं जैसे पैलेडियम, क्रोमियम और कैडमियम जैसे कार्बनिक यौगिकों और ऐसे कार्बनिक यौगिकों, जो प्राकृतिक रूप से जल में घुलनशील नहीं हैं में, समान रूप से, वाहक के रूप में कार्य कर सकते हैं. जब यह मानव शरीर में पहुंच जाते हैं, तो स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकते हैं.

शोधकर्ताओं ने शोध के लिए दो अलग-अलग प्रक्रियाओं का पालन किया. पहली प्रक्रिया में, गर्म और पूरी तरह स्‍वच्‍छ पानी (85–90 ◦C; pH~6.9) को डिस्पोजेबल पेपर कप में डाला गया और इसे 15 मिनट तक उसी में रहने दिया गया. इसके बाद जब इस पानी का विश्‍लेषण किया गया, तो पाया गया कि उसमें सूक्ष्म-प्लास्टिक की उपस्थिति के साथ-साथ अतिरिक्त आयन भी मिश्रित हैं.

जबकि, दूसरी प्रक्रिया में, कागज के कपों को शुरू में गुनगुने (30-40 डिग्री सेल्सियस) स्‍वच्‍छ पानी (पीएच/ 6.9) में डुबोया गया और इसके बाद, हाइड्रोफोबिक फिल्म को सावधानीपूर्वक कागज की परत से अलग किया गया और 15 मिनट के लिए गर्म एवं स्‍वच्‍छ पानी (85–90 °C; pH~6.9) में रखा गया. इसके बाद इस प्लास्टिक फिल्‍म के गर्म पानी के संपर्क में आने से पहले और बाद में उसमें आए भौतिक, रासायनिक और यांत्रिक गुणों में परिवर्तन की जांच की गई.

प्रो. गोयल ने कहा कि एक सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं ने बताया कि चाय या कॉफी को कप में डाले जाने के 15 मिनट के भीतर उन्‍होंने इसे पी लिया था. इसी बात को आधार बनाकर यह शोध समय तय किया गया. सर्वेक्षण के परिणाम के अलावा, यह भी देखा गया कि इस अवधि में पेय अपने परिवेश के तापमान के अनुरूप हो गया.

तो फिर चाय किसमें पीना चाहिए? 

इस स्थिति से बचने के लिए क्या पारंपरिक मिट्टी के उत्पादों का डिस्पोजेबल उत्‍पादों के स्‍थान पर इस्‍तेमाल किया जाना चाहिए, इस सवाल पर आईआईटी खड़गपुर के निदेशक प्रो. वीरेंद्र के तिवारी ने कहा, “इस शोध से यह साबित होता है कि किसी भी अन्‍य उत्‍पाद के इस्‍तेमाल को बढ़ावा देने से पहले यह देखना जरूरी है कि वह उत्‍पाद पर्यावरण के लिए प्रदूषक और जैविक दृष्टि से खतरनाक न हों.”

“हमने प्लास्टिक और शीशे से बने उत्‍पादों को डिस्पोजेबल पेपर उत्‍पादों से बदलने में जल्‍दबाजी की थी, जबकि जरूरत इस बात की थी कि हम पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की तलाश करते. भारत पारंपरिक रूप से एक स्थायी जीवन शैली को बढ़ावा देने वाला देश रहा है और शायद अब समय आ गया है, जब हमें स्थिति में सुधार लाने के लिए अपने पिछले अनुभवों से सीखना होगा.” (https://hindi.news18.com)


06-Nov-2020 5:59 PM 79

भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय का कहना है कि कोरोना महामारी के दौरान इस बीमारी से पीड़ित 30 फ़ीसद लोग अवसाद या डिप्रेशन का शिकार हुए हैं.

स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना महामारी की वजह से तनाव के बढ़ते मामलों को देखते हुए दिशानिर्देश जारी किए हैं. दिशानिर्देश कई शोध रिपोर्ट के आधार पर तैयार किए गए हैं.

कोरोना वायरस महामारी ने दुनिया भर में लोगों की मानसिक स्थिति पर गहरा असर डाला है.

इस बीमारी ने स्वास्थ्य सेवाओं पर ज़बरदस्त दबाव तो डाला ही है साथ ही मेंटल हेल्थ केयर व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां पेश की हैं.

स्वास्थ्य मंत्रालय और मेंटल हेल्थ इंस्ट्टीयूट ऑफ़ न्यूरोसाइंस की गाइडलाइन्स ने कोविड महामारी में मानसिक रूप से प्रभावित होने वाले लोगों के तीन समूहों का ज़िक्र किया है .
पहले समूह में वो लोग है जों कोरोना-19 से पीड़ित हुए हैं. इसके मुताबिक़ जो मरीज़ कोविड-19 से संक्रमित हुए थे उन्हें मानसिक दिक्क़तें आ सकती हैं. कोविड से पीड़ित होने वालों में 30 फ़ीसद लोगों में अवसाद या डिप्रेशन और 96 प्रतिशत में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसआर्डर (PTSD) जैसी समस्या देखी जा रही है, और ये समस्या बढ़ भी सकती है.

दूसरे समूह में वो मरीज़ हैं जो पहले से ही मानसिक रोग से पीड़ित हैं या थे. इनमें कोविड की वजह से वे पुरानी स्थिति में लौट सकते हैं. इतना ही नहीं इस समूह के मरीज़ों की स्थिति और ख़राब होने के साथ-साथ वे नई मानसिक समस्या से भी ग्रसित हो सकते हैं.

तीसरा समूह आम लोगों का है. आम लोग अलग-अलग तरह की मानसिक समस्या जैसे तनाव, चिंता, नींद की कमी, हैल्यूस्लेशन या अजीब ख्याल आना जिनका सच्चाई से कोई वास्ता न हो जैसी समस्याएं झेल रहे हैं. इस समूह के लोगों में आत्महत्या तक के ख्याल भी आ रहे हैं.

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली (एम्स) में मनोचिकित्सक श्रीनिवास राजकुमार कहते हैं कि ये शोध काफ़ी चिंताजनक है क्योंकि आम मानसिक बीमारियों के मुक़ाबले ये आंकड़ा कहीं ज्यादा हैं. लेकिन शोध के लिए आंकड़े कहां से लिए गए हैं, वो स्पष्ट नहीं है. वो कहते है कि एम्स कोविड ट्रामा सेंटर में काफ़ी बंदोबस्त किए गए हैं जहां मनोचिकित्सक लागातार मरीज़ों से बातचीत कर रहे हैं और जैसी शोध में बातें आई हैं वैसी ही समस्याएं अस्पताल में भर्ती मरीज़ के साथ भी हैं.

उनके अनुसार,''कोविड के मरीज़ों में असुरक्षा की भावना रहती है कि वे अपने परिवार के पास लौट पाएंगे या नहीं. नींद नहीं आने की शिकायत भी आम है. वहीं ये भी देखा गया है जो मरीज़ ठीक होकर जा चुके हैं वे डिप्रेशन, एंग्जाइटी और पैनिक एटैक की समस्याओं के साथ हमारे पास वापस आ रहे है. वे कहते हैं कि नींद में उन्हें लगता है कि वे आईसीयू में हैं और बीप की आवाज़े सुन रहे हैं या लोगों से घिरे हुए हैं. ऐसी समस्या लेकर आने वालों की उम्र 20- 40 के बीच है. ऐसे में जहां ज़रूरत हैं, वहां दवाईयां दे रहे है और इनका इलाज कर रहे हैं''.

दिल्ली की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. पूजाशिवम जेटली का कहना है कि कोविड के दौरान लोगों का मानसिक स्वास्थ्य एक चिंता का विषय है और उनके पास क़रीब 50-60 प्रतिशत ऐसे मामले आ रहे हैं जहां लोग अकेलापन, एंगज़ाइटी, मूड में उतार-चढ़ाव और एकाग्रता की कमी महसूस कर रहे हैं.

वे कहती हैं कि कोविड की वजह से अनिश्चितता का माहौल है. रोज़ नए आंकडे आते हैं, नए मामले सामने आ रहे है और अभी तक इसका कोई पुख़्ता इलाज सामने नहीं आया है, तो लोगों के मन में दहशत बैठी हुई है.

उनके अनुसार, ''लोगों की रोज़ की ज़िंदगी में बदलाव आया है, उसका असर भी मानसिक सेहत पर पड़ा है. लोगों की नौकरियां चली गईं हैं, अस्थिरता का माहौल है, वर्क फ्रॉम होम की वजह से घर में अलग तरह की डिमांड बढ़ गई है जिसमें बच्चों, बुज़ुर्गों की देखरेख करने के साथ-साथ घर संभालना शामिल है. लोग आपस में मिल नहीं पा रहे हैं, बाहर जाकर रिलेक्स करने या मनोरंजन के ज़रिए बंद हो गए हैं, हालांकि अब अनलॉक हुआ है चीज़ें खुली हैं लेकिन फिर भी लोगों में डर है और ऐसे में मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर के लिए एक माहौल बन रहा है.''

हालांकि सरकार ने मानसिक स्थिति से निपटने के लिए कई दिशानिर्देश जारी किए जिनमें कहा गया है कि कोरोना के मरीज़ों के इलाज करने वाले अस्पतालों में एक मनोचिकित्सक शारीरिक रूप से या टेलीफ़ोन के ज़रिए कंसल्टेंसी के लिए मौजूद रहेगा. एनजीओ जो मेडिकल के क्षेत्र में काम कर रहे हैं, उनसे मदद ली जाएगी. कोविड का कोई मरीज़ अगर मानसिक रोगी है तो उसे भर्ती होने के 24 घंटे के भीतर मनोचित्सिक देखेगा.

डॉ. श्रीनिवास राजकुमार कहते हैं कि सरकार ने दिशानिर्देश तो जारी किए हैं लेकिन जैसे पूरी दुनिया में अब केवल मनोचिकित्सकों पर निर्भरता को छोड़ कर दूसरे डॉक्टरों को भी मेंटल हेल्थ केयर के मामलों से निपटने के प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं, वैसे ही प्रशिक्षण अब भारत में डॉक्टरों को दिए जाने की ज़रूरत हैं.

वो कहते हैं कि भारत में मेंटल हेल्थ से जुड़े क़ानून है लेकिन अब इस क्षेत्र में निवेश करने की ज़रूरत है क्योंकि मनोरोगियों से निपटने के लिए मनोचिकित्सकों की संख्या पर्याप्त नहीं है.

डॉ पूजाशिवम जेटली कहती है कि जिस तरह से कोविड के दौरान लोगों में डिप्रेशन या एंगजाइटी के मामले आ रहे हैं, इससे भविष्य में भयावह स्थिति बन सकती है. क़दम नहीं उठाए गए तो ऐसे मामले बढ़ेंगे ही क्योंकि लोग इसे एक समस्या के तौर पर समझ नहीं पा रहे हैं और मदद भी नहीं ले रहे हैं.

वे मानती है कि सरकार के साथ-साथ सोसायटी एक बड़ी भूमिका निभा सकती है. यहां समुदाय के लोग अपनी दिक्क़तें साझा कर सकते हैं क्योंकि ये सिर्फ़ किसी व्यक्ति या परिवार की समस्या नहीं है बल्कि कई लोग ऐसी ही समस्याओं से जुझ रहे हैं. एक दूसरे से समाधान पर चर्चा करना मददगार साबित हो सकता है.(https://www.bbc.com/hindi)


26-Sep-2020 2:40 PM 83

विश्व गर्भ निरोधक दिवस

लखनऊ, 26 सितम्बर (आईएएनएस)| छोटे और सुखी परिवार के लिए लोगों में परिवार नियोजन के प्रति रुझान बढ़ रहा है। अनचाहे गर्भ के जोखिम से महिलाओं को उबारने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और स्वास्थ्य विभाग का परिवार कल्याण कार्यक्रमों को जन-जन तक पहुंचाने पर पूरा जोर है। स्थायी और अस्थायी गर्भनिरोधक साधनों की मौजूदगी के बाद भी अनचाहे गर्भधारण की यह स्थिति किसी भी ²ष्टिकोण से उचित नहीं प्रतीत होती, क्योंकि इसके चलते कई महिलाएं असुरक्षित गर्भपात का रास्ता चुनती हैं जो बहुत ही जोखिम भरा होता है। महिलाओं को इन्हीं जोखिमों से बचाने के लिए हर साल 26 सितंबर को विश्व गर्भनिरोधक दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन-उत्तर प्रदेश के अपर मिशन निदेशक हीरा लाल का कहना है कि गर्भ निरोधक साधनों को अपनाकर जहां महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सकता है वहीं मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को भी कम किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि गर्भ निरोधक साधनों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा युवा दम्पति को यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर सूचित विकल्प देकर अपने परिवार के प्रति निर्णय लेने में सक्षम बनाना है। नवविवाहित को पहले बच्चे की योजना शादी के कम से कम दो साल बाद बनानी चाहिए ताकि इस दौरान पति-पत्नी एक दूसरे को अच्छे से समझ सकें और बच्चे के बेहतर लालन-पालन के लिए कुछ पूंजी भी जुटा लें। इसके अलावा मातृ एवं शिशु के बेहतर स्वास्थ्य के लिहाज से भी दो बच्चों के जन्म के बीच कम से कम तीन साल का अंतर अवश्य रखना चाहिए।

प्रदेष में तिमाही गर्भनिरोधक इंजेक्शन अंतरा और गर्भनिरोधक गोली छाया की बढ़ती डिमांड को देखते हुए घर के नजदीक बने हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर तक इसकी सुविधा को मुहैया कराया जा रहा है । 'नई पहल' परिवार नियोजन किट आशा कार्यकर्ताओं द्वारा नव विवाहित जोड़ों को मिशन परिवार विकास के अंतर्गत लिए गए 57 जिलों में उपलब्ध कराई जा रही है । गर्भ निरोधक साधन कंडोम की लगातार उपलब्धता बनाए रखने के लिए सभी जिलों के चयनित स्थानों पर कंडोम बॉक्स लगाए गए हैं।

प्रदेश के 13 जिलों में एक अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक 'दो गज की दूरी, मास्क और परिवार नियोजन है जरूरी' अभियान चलाया जाएगा। यह अभियान आगरा, अलीगढ़, एटा, इटावा, फतेहपुर, फिरोजाबाद, हाथरस, कानपुर नगर, कानपुर देहात, मैनपुरी, मथुरा, रायबरेली और रामपुर जिले में चलाया जाएगा।

कोविड-19 के चलते बड़ी संख्या में प्रवासी कामगारों की घर वापसी से भी अनचाहे गर्भधारण की स्थिति को भांपते हुए क्वेरेंटाइन सेंटर से घर जाते समय प्रवासी कामगारों को गर्भ निरोधक सामग्री प्रदान की गई।

पिछले तीन साल के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो गर्भ निरोधक साधनों को अपनाने वालों की तादाद हर साल बढ़ रही थी किन्तु 2020-21 सत्र की शुरुआत ही कोविड के दौरान हुई, जिससे इन आंकड़ों का नीचे आना स्वाभाविक था किन्तु अब स्थिति को सामान्य बनाने की भरसक कोशिश की जा रही है । पुरुष नसबंदी वर्ष 2017-18 में 3,884, वर्ष 2018-19 में 3,914 और 2019-20 में 5,773 हुई ।

महिला नसबंदी वर्ष 2017-18 में 25,8182, वर्ष 2018-19 में 281955 और 2019-20 में 295650 हुई । इसी तरह वर्ष 2017-18 में 300035, वर्ष 2018-19 में 30,52,50 और 2019-20 में 35,87,64 महिलाओं ने पीपीआईयूसीडी की सेवा ली । वर्ष 2017-18 में 23,217, वर्ष 2018-19 में 16,13,65 और 2019-20 में 34,45,32 महिलाओं ने अंतरा इंजेक्शन को चुना।


21-Sep-2020 1:00 PM 50

लखनऊ , 21 सितम्बर (आईएएनएस)| विश्व अल्जाइमर दिवस 21 सितंबर को मनाया जाता है। यह बीमारी एक उम्र के बाद लोगों में होने लगती है, जिसमें लोग चीजों को याद नहीं रख पाते हैं। हेल्दी लाइफ स्टाइल और नशे से दूरी जैसे एहतियात बरतकर अल्जाइमर और डिमेंशिया से बचा जा सकता है। उम्र बढ़ने के साथ ही तमाम तरह की बीमारियां हमारे शरीर को निशाना बनाना शुरू कर देती हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख बीमारी बुढ़ापे में भूलने की आदतों (अल्जाइमर्स-डिमेंशिया) की है। ऐसे बुजुगोर्ं की तादाद बढ़ रही है। इसीलिए इस बीमारी की जद में आने से बचाने के लिए हर साल 21 सितम्बर को विश्व अल्जाइमर्स-डिमेंशिया दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य जागरूकता लाना है ताकि घर-परिवार की शोभा बढ़ाने वाले बुजुगोर्ं को इस बीमारी से बचाकर उनके जीवन में खुशियां लायी जा सके। 

किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के मनोचिकित्सा विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. आदर्श त्रिपाठी का कहना है कि बुजुगोर्ं को डिमेंशिया से बचाने के लिए जरूरी है कि परिवार के सभी सदस्य उनके प्रति अपनापन रखें। अकेलापन न महसूस होने दें, समय निकालकर उनसे बातें करें, उनकी बातों को नजरंदाज न करें बल्कि उनको ध्यान से सुनें। ऐसे कुछ उपाय करें कि उनका मन व्यस्त रहे, उनकी मनपसंद की चीजों का ख्याल रखें। निर्धारित समय पर उनके सोने-जागने, नाश्ता व भोजन की व्यवस्था का ध्यान रखें। 

अमूमन 65 साल की उम्र के बाद लोगों में यह बीमारी देखने को मिलती है। वृद्घावस्था में मस्तिष्क के ऊ तकों को नुकसान पहुंचने के कारण ये बीमारी होती है। मस्तिष्क में प्रोटीन की संरचना में गड़बड़ी होने के कारण इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। ये एक मस्तिष्क से जुड़ी बीमारी है, जिसमें व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी याददाश्त खोने लगता है। इस बीमारी में व्यक्ति छोटी से छोटी बात को भी याद नहीं रख पाता है। जब यह बीमारी अत्यधिक बढ़ जाती है तो व्यक्ति को लोगों के चेहरे तक याद नहीं रहते हैं। अभी तक इस बीमारी का कोई सटीक इलाज नहीं मिला है।

डाक्टर ने बताया कि इस भूलने की बीमारी पर नियंत्रण पाने के लिए जरूरी है कि शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के साथ ही मानसिक रूप से अपने को स्वस्थ रखें। नकारात्मक विचारों को मन पर प्रभावी न होने दें और सकारात्मक विचारों से मन को प्रसन्न बनाएं। पसंद का संगीत सुनने, गाना गाने, खाना बनाने, बागवानी करने, खेलकूद आदि जिसमें सबसे अधिक रुचि हो, उसमें मन लगायें तो यह बीमारी नहीं घेर सकती।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली की तरफ से अभी हाल ही में जारी एक एडवाइजरी में कहा गया है कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में करीब 16 करोड़ बुजुर्ग (60 साल के ऊ पर) हैं । इनमें से 60 से 69 साल के करीब 8़ 8 करोड़, 70 से 79 साल के करीब 6़ 4 करोड़, दूसरों पर आश्रित 80 साल के करीब 2़ 8 करोड़ और 18 लाख बुजुर्ग ऐसे हैं, जिनका अपना कोई घर नहीं है या कोई देखभाल करने वाला नहीं है।


20-Sep-2020 1:33 PM 39

न्यूयॉर्क, 20 सितंबर (आईएएनएस)| अमेरिकी शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन से पता चला है कि कैंसर के लिए किए जाने वाले कुछ उपचारों से रोगियों के कोविड-19 संक्रमित होने पर मृत्यु की आशंका बढ़ सकती है। यूरोपियन सोसाइटी फॉर मेडिकल ऑन्कोलॉजी वर्चुअल कांग्रेस 2020 में सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा पेश किए गए अध्ययन में कैंसर के ऐसे तरीकों के बारे में बताया गया जो रोगी के कोरोनावायरस संक्रमित होने पर उस पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं। 

यूसी कॉलेज ऑफ मेडिसिन में हेमटोलॉजी ऑन्कोलॉजी विभाग में मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर त्रिशा वाइज-ड्रेपर ने कहा, "ऐसे मरीज के अस्पताल में भर्ती होने की आशंका 40 प्रतिशत तक होती है। साथ ही उनमें गंभीर श्वसन बीमारी होने और मृत्यु की आशंका होती है।"

कोविड -19 और कैंसर के संबंध पर किए गए पिछले अध्ययन में टीम ने पाया था कि उम्र, लिंग, धूम्रपान करने और सक्रिय कैंसर सहित अन्य स्वास्थ्य स्थितियों में मृत्यु की आशंका बढ़ा देती हैं। 

ड्रेपर ने आगे कहा, "अब हमने 3,000 से अधिक मरीजों के बीच एंटी-कैंसर ट्रीटमेंट के समय और कोविड-19 संबंधित जटिलताओं के बीच संबंध की जांच की थी। इसमें विशेष तौर पर एंटी-सीडी 20 मोनोक्लोनल एंटीबॉडी प्राप्त करने वालों की मृत्यु की आशंका अधिक थी, जो आमतौर पर कुछ लिम्फोमा में सामान्य बी कोशिकाओं को समाप्त करने के लिए उपयोग किया जाता है।"

कोविड-19 डायग्नोस होने से पहले के एक साल में एंडोक्राइन थेरेपी को छोड़ दें तो कैंसर का ट्रीटमेंट नहीं ले रहे रोगियों की तुलना में सक्रिय कैंसर उपचार ले रहे रोगियों की मृत्यु संख्या अधिक रही।

उन्होंने कहा, "यह उन रोगियों के लिए अच्छी खबर नहीं है जो कैंसर से लड़ रहे हैं। इसके अलावा भी कैंसर के रोगियों में किसी भी स्थिति या कारण के चलते मृत्यु की आशंका सामान्य आबादी की तुलना में अधिक है। इसमें वो लोग शामिल हैं, जिनका पिछले साल इलाज नहीं चल रहा था।"

लेखकों ने कहा कि उन्हें इस विषय पर और अधिक शोध करने की जरूरत है क्योंकि वे रोगियों के समूह पर महामारी के प्रभाव की जांच करना जारी रखना चाहते हैं।


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