सेहत / फिटनेस

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Date : 11-Nov-2019

कोलकाता: आयुर्वेद में किडनी (गुर्दे) की बीमारी का असरदार इलाज संभव है. आयुर्वेद की दवा गुर्दे को नुकसान पहुंचाने वाले घातक तत्वों को भी बेअसर करती है. कोलकात्ता में चल रहे भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान मेले में पहली बार आयुर्वेद दवाओं पर एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया जिसमें गुर्दे के उपचार में इसके प्रभाव पर चर्चा की गई. इस सत्र के दौरान एमिल फार्मास्युटिकल के कार्यकारी निदेशक संचित शर्मा ने आयुर्वेद के उपचार में प्रभावी दवा नीरी केएफटी के बारे में अब तक हुए शोधों का ब्यौरा पेश करते हुए कहा कि नीरी केएफटी गुर्दे में टीएनएफ अल्फा के स्तर को नियंत्रित करती है.

टीनएफ एल्फा परीक्षण से ही गुर्दे में हो रही गड़बड़ियों का पता चलता है तथा यह सूजन आदि की स्थिति को भी दर्शाता है. टीएनएफ अल्फा सेल सिग्नलिंग प्रोटीन है.शर्मा ने अपने प्रजेंटेशन में कहा कि नीरी के एफटी को लेकर अमेरिकन जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल रिसर्च में शोध प्रकाशित हो चुका है.
इस शोध में पाया गया कि जिन समूहों को नियमित रूप से नीरी केएफटी दवा दी जा रही थी उनके गुर्दे सही तरीके से कार्य कर रहे थे. उनमें भारी तत्वों, मैटाबोलिक बाई प्रोडक्ट जैसे क्रिएटिनिन, यूरिया, प्रोटीन आदि की मात्रा नियंत्रित पाई गई. जिस समूह को दवा नहीं दी गई, उनमें इन तत्वों का प्रतिशत बेहद ऊंचा था.
यह पांच बूटियों पुनर्नवा, गोखरू, वरुण, पत्थरपूरा तथा पाषाणभेद से तैयार की गई है.उन्होंने कहा कि जिन लोगों के गुर्दे खराब हो चुके हैं लेकिन अभी डायलिसिस पर नहीं हैं, उन्हें इसके सेवन से लाभ मिलता है. उन्हें डायलिसिस पर जाने की नौबत नहीं आती है.
उन्होंने यह भी कहा कि आयुर्वेद में कई उपयोगी दवाएं हैं. आयुर्वेद में उन बीमारियों का उपचार है जिनका एलोपैथी में नहीं है. लेकिन उन्हें आधुनिक चिकित्सा की कसौटी पर परखे जाने और प्रमाणित किये जाने की जरूरत है. इस दिशा में डीआरडीओ और सीएसआईआर ने कार्य किया है इस पर और ध्यान दिये जाने की जरूरत है.

 

 

 


Date : 11-Nov-2019

यूके में किए जा रहे एक शोध से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर आर्थिक समस्या  नहीं आई तो जल्द ही ऐसा रक्त परीक्षण उपलब्ध हो सकेगा, जिसके जरिए शरीर में स्तन कैंसर के लक्षण उभरने से पांच साल पहले ही होने की संभावना का पता चल सकता है। यह बात शोधकर्ताओं ने इस दिशा में किए जा रहे शोध के आधार पर अभी तक प्राप्त परिणामों को देखते हुए कहा है।
शोधकर्ताओं ने उन 90 मरीजों के रक्त के नमूने लिए जिनका स्तन कैंसर का इलाज चल रहा है,90 उन मरीजों के रक्त के नमूने लिए जो पूरी तरह स्वस्थ हैं। अब 800 मरीजों के नमूने लेकर उनका नौ अलग कारकों के अनुसार परीक्षण कर रहे हैं ताकि पूर्व में किए गए शोध की सटीकता को फिर से परखा जा सके और अलग दिशाओं में भी जांच को आगे बढ़ाया जा सके।
नॉटिंघम विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्र के अनुसार रक्त की जांच जरिए स्तन कैंसर का पता शुरुआती चरण में लगने से यह टेस्ट उन देशों के लोगों के लिए खासतौर पर उपयोगी साबित होगा, जो मध्यम और कम कमाई वाली श्रेणी में आते हैं। 
लाखों महिलाएं पीड़ित-
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल लगभग 21 लाख महिलाएं स्तन कैंसर का शिकार होती हैं। पिछले साल स्तन कैंसर के कारण दुनियाभर में छह लाख 27 हजार महिलाओं की मृत्यु हुई। यह अन्य प्रकार के कैंसर से होने वाली महिलाओं की मृत्यु का करीब 15 प्रतिशत है। 
आसान होगी जांच की प्रक्रिया-अलफतानी के अनुसार, हमें इस शोध पर आगे काम करने और इसे अधिक विकसित करने की जरूरत है। स्तन कैंसर से जुड़े इस शोध में हमारे लिए यह साफ है कि स्तन कैंसर होने से पहले ही इसके प्रारंभिक लक्षणों को पहचाना जा सकता है। 
- पिछले साल दुनियाभर में स्तन कैंसर से 06 लाख 27 हजार महिलाओं की मृत्यु हुई। 
-हर साल दुनियाभर में 21 लाख महिलाएं स्तन कैंसर से पीड़ित होती हैं।


Date : 07-Nov-2019

नई दिल्ली, 7 नवंबर । स्मार्टफोन, कंप्यूटर और होम अप्लायंसेज से निकलने वाली ब्लू लाइट का आपकी उम्र पर गहरा असर पड़ता है। इस ब्लू लाइट में ज्यादा समय तक रहने से नींद की दिक्कत और सर्केडियन जैसे डिसऑर्डर हो सकते हैं। एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि जब स्क्रीन आपकी आंखों की सीध नहीं होती है तब भी यह आपको नुकसान पहुंचा सकती है। ब्लू लाइट आपकी लंबी उम्र घटा सकती है या बुढ़ापे में तेजी ला सकती है। इस बारे में एजिंग ऐंड मेकैनिज्म्स ऑफ डिजीज जर्नल में पब्लिश हुई स्टडी के मुताबिक रुश्वष्ठ (लाइट एमिटिंग डायोड) से निकलने वाली ब्लू वेव लेंथ मस्तिष्क की कोशिकाओं और आंखों की पुतलियों को नुकसान पहुंचाती है। 
स्टडी कॉमन फ्रूट फ्लाई ड्रॉसोफिला मेलानोगैस्टर पर हुई थी। इस मक्खी का सेलुलर और डिवेलपमेंटल मेकैनिज्म दूसरे जानवरों और इंसानों की तरह होने से इसे स्टडी में शामिल किया गया था। अनुसंधानकर्ताओं ने इन मक्खियों को 12 घंटे तक ब्लू एलईडी लाइट में एक्सपोज किया, जिसकी वेवलेंथ होम अप्लायंसेज से निकलने वाली ब्लू लाइट के बराबर थी। उन्होंने मक्खियों पर उस लाइट के असर की पड़ताल की तो पाया कि लाइट से उनकी उम्र बढऩे की रफ्तार तेज हो गई। 
शोध जिन मक्खियों पर किया गया था, उनके मस्तिष्क की कोशिकाओं और आंखों की पुतलियों को एलईडी लाइट्स से नुकसान पहुंचा था। उनसे उनकी लोकोमोशन कैपेबिलिटीज यानी दीवारों पर चढऩे की क्षमता कम हो गई थी। इनमें कुछ म्यूटेंट फ्लाई को शामिल किया गया था, जिनकी आंखें नहीं बनी थीं। आंख नहीं होने के बावजूद ब्लू लाइट के चलते उन मक्खियों में ब्रेन डैमेज और लोकोमोशन डिसऑर्डर देखा गया था। इससे पता चलता है कि लाइट आंखों पर सीधी पड़े या नहीं, यह उन्हें पूरा नुकसान पहुंचा सकती है। 
स्टडी की लीड रिसर्चर और इंटीग्रेटिव बायोलॉजी की प्रोफेसर ने बताया, लाइट से मक्खियों की उम्र तेजी से बढ़ रही है यह जानकर पहले हमें काफी हैरानी हुई। हमने पुरानी मक्खियों में कुछ जींस चेक किए तो पाया कि जिन्हें लाइट में रखा गया था उनमें स्ट्रेस-रिस्पॉन्स और प्रोटेक्टिव जींस हैं। उसके बाद हमने पता लगाना शुरू किया कि आखिर लाइट में ऐसा क्या है जिससे मक्खियों को नुकसान पहुंच रहा है। फिर हमने लाइट के स्पेक्ट्रम पर गौर किया।
हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में टेक्नॉलजी का दखल काफी बढ़ गया है। बल्ब, ट्यूबलाइट और एंटरटेनमेंट डिवाइसेज के रूप में इलेक्ट्रिसिटी ने हमारी जिंदगी को आसान और मनोरंजक तो बनाया है, लेकिन ऐसे ही गैजट्स से आने वाली रोशनी हमारी सेहत पर बुरा असर भी डाल रही है। इसमें भी बड़ी चिंता का सबब ब्लू लाइट बन गई है। गैजट्स का अंधाधुंध इस्तेमाल करने से लोग अपनी आंखों की रोशनी भी गंवा सकते हैं। 
क्या है बचाव का तरीका? 
रिसर्चर्स का कहना है कि घंटों अंधेरे में बैठे रहने से बचना चाहिए और एंबर लेंस वाले चश्मे का इस्तेमाल करना चाहिए। ये चश्मे ब्लू लाइट को आंख तक नहीं पहुंचने देते और रेटीना को सुरक्षित रखते हैं। फोन, लैपटॉप और दूसरी डिवाइसेज को ब्लू एमिशन ब्लॉक करने के लिए भी सेट किया जा सकता है। (एजेंसियां)

 


Date : 04-Nov-2019

नई दिल्लीः दिल्ली-एनसीआर के साथ साथ बाकी राज्य भी गंभीर प्रदूषण से जूझ रहे हैं. प्रदूषण से बचने के लिए लोग तमाम तरह के उपाय भी सुझा रहे हैं. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने लोगों को सलाह दी है, कि वो गाजर खाएं क्योंकि गाजर में विटामिन ए होता है. जिससे ना सिर्फ रतौंधी की समस्या से निजात मिलती है. बल्कि प्रदूषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से भी बचा जा सकता है. हालांकि डॉक्टर्स स्वास्थ्य मंत्री के इस बयान से इत्तेफाक नहीं रखते.

बात करें गाजर की तो आप अक्सर गाजर की सलाद या दूसरे रूप में गाजर खाते होंगे लेकिन क्या कभी आपने गाजर के फायदों के बारे में जाना है. आज हम आपको गाजर के कुछ ऐसे फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं जो आपने पहले शायद ना सुने हो.

कैंसर से लड़ने में मददगार- गाजर विटामिन ए, सी और बी6 से भरपूर होती है. गाजर खाने से आप ब्रेस्ट कैंसर, लंग और कोलन कैंसर से बच सकते हैं.

दिल की सेहत के लिए है फायदेमंद - फाइबर और पोटैशियम से भरपूर गाजर खाने से आट्रीज फिट रहती हैं. साथ ही हाइपरटेंशन से बच जाते हैं. ब्लडप्रेशर नियंत्रि‍त करने और हार्ट फेलियर से बचाने में भी गाजर मददगार है.

वेट लॉस प्रोग्राम के लिए है बेहतर ऑप्शन- अगर आप वेट लॉस प्रोग्राम अपना रहे हैं तो गाजर आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है. कम कैलोरी वाले भोजन के रूप में, गाजर का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसे अपने डाइट में शामिल करने से आपको सारे जरूरी विटामिंस भी मिल जाएंगे और वजन भी नियंत्रित रहेगा. इसका इस्तेमाल आप सलाद के रूप में यो फिर सब्जी बनाकर भी कर सकते हैं.

हाइड्रेशन को रखता है मेनटेन- मिनरल्स युक्त गाजर के सेवन से हाइड्रेशन नियंत्रि‍त रहता है. खेल के दौरान पड़ने वाले क्रैम्स को मात देने में गाजर बहुत उपयोगी है. गाजर के सेवन से हेल्दी इलेक्‍ट्रोलाइट लेवल बॉडी में नियंत्रि‍त रहता है.

जल्दी नहीं आता बुढ़ापा- बुढ़ापे को मात देनी है तो भी गाजर खा सकते हैं. विटामिन से भरपूर गाजर खाने से सेल्स को जल्दी डैमेज होने से बचा सकते हैं.

गर्भपात रोकने में है मददगार-  फिटल इंफेक्शन और गर्भपात को रोकने में गाजर बेहद कारगर है. नई मांओं में दूध के प्रोडक्श‍न को भी बढ़ा सकते हैं. माहवारी के दौरान पड़ने वाले क्रैम्प्स को भी गाजर के सेवन से दूर किया जा सकता है. मीनोपोज के बाद होने वाली समस्याओं को भी गाजर के सेवन से दूर किया जा सकता है.

हेयर फॉल को रोकता है- बालों को हेल्दी रखना है या बालों की ग्रोथ जल्दी बढ़ानी है तो गाजर खानी चाहिए. बालों के गिरने की समस्या को भी गाजर खाकर दूर किया जा सकता है.

इसके अलावा भी गाजर खाने के हैं अनेकों फायदे........

आंखों की रोशनी के लिए गाजर बहुत अच्छी होती है.

रोजाना गाजर खाने से चश्मे का नंबर भी घट सकता है.

शरीर में प्रोटीन की कमी को दूर करने के लिए गाजर का जूस पीना चाहिए.

गाजर में मौजूद कैल्शियम से हड्डियों को मजबूत रखा जा रखा जा सकता है.

पेट की समस्याओं को दूर करने के लिए फाइबर युक्त गाजर का सेवन करना चाहिए.

ब्‍लड शुगर का लेवल सामान्य रखने के लिए गाजर से बेहतर कुछ नहीं.

कॉलेस्ट्रॉल का लेवल कम करने के लिए गाजर का सेवन करना चाहिए.

गाजर में विटामिन सी होता है जो मसूडों को मजबूत करता है और मुंह की दुर्गन्ध को दूर करता है.

गाजर की सलाद खाने या गाजर का जूस पीने से चेहरे पर चमक आती है.

गाजर खून को साफ करती है और इसे खाने से कील-मुंहासों की समस्या दूर होती है.
(एबीपी न्यूज)


Date : 24-Oct-2019

दिवाली के लिए घर की सफाई तो आप कई दिनों पहले से शुरू कर देते है, लेकिन क्या आपने कभी इन 5 चीजों को भी साफ करने पर ध्यान दिया है? अगर नहीं, तो जान लीजिए इन 5 चीजों के बारे में जिन्हें साफ करना बहुत जरूरी है वरना ये आपकी सेहत के लिए हानिकारक हो सकती हैं -
1 घर का मेन गेट -
बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि घर के मुख्य दरवाजे व मेन गेट को भी रोजना साफ करना चाहिए। ऐसा करने से घर में पॉजिटिविटी आने के साथ ही इंफेक्शन का खतरा भी कम होता है।
2 डिश टॉवेल -
जिस तौलिये से आप घर के बर्तनों को पोंछते हैं उसे डिश टॉवेल कहते है। उन्हें भी रोजाना साफ करना जरूरी होता है वरना गंदे डिश टॉवेल इस्तेमाल करने से बर्तन साफ होने की बजाय गंदे होंगे और बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ जाएगा।3 किचन और बाथरूम का फर्श -
इन दो जगहों पर गंदगी फैलने की सबसे ज्यादा आशंका रहती है। बाथरूम और किचन को व इनमें लगे सिंक को नियमित अच्छे एंटी-बैक्टीरियल लिक्व‍िड से साफ करें।
4 रिमोट कंट्रोल -
चाहे टीवी का रिमोट हो या एसी का, कई लोग इन्हें छूते है, कई बार खाते खाते हुए उन्हीं हाथों से रीमोट का इस्तेमाल करते है। जिस वजह से उनमें गंदगी चिपक जाती है।
5 महिलाएं अपने पर्स को रोजाना साफ करें -
महिलाएं अपने पर्स में कई तरह का सामान रखती है, दिनभर उसे अपने साथ ले जाते हुए यहां-वहां, रखने का काम पड़ता है। ऐसे में पर्स नीचे से काफी गंदा हो जाता है। गंदे पर्स को अगर आपने घर के सोफे या बेड पर रखा तो इंफेक्शन का खतरा खतरा होता है। इसलिए अपने पर्स को नीचे से व अदंर से अच्छी तरह से साफ रखें।

 


Date : 24-Oct-2019

नई दिल्लीः भारत में लगभग हर दूसरे-तीसरे घर में तुलसी का पौधा देखने को मिलता है. खासकर हिंदू संस्कृति को मानने वाले परिवारों में तो तुलसी के पौधे का खास महत्व होता है. क्योंकि हिंदु संस्कृति में यह पौधा पूज्यनीय होता है औ यही कारण है कि हर घर में इसकी पूजा भी होती है, लेकिन पौराणिक महत्व के साथ ही इसका औषधीय महत्व भी होता है. तुलसी के पौधे को स्वास्थ्य के लिहाज से काफी फायदेमंद माना गया है. वैसे तो तुलसी के कई गुणों के बारे में हम सभी जानते हैं, लेकिन कई ऐसे भी गुण हैं जिनके बारे में जानना चाहिए. तो चलिए बताते हैं आपको तुलसी के कुछ अनजाने फायदों के बारे में.

इम्यूनिटी बूस्ट करे
तुलसी में भरपूर मात्रा में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लिमेंट्री गुण होते हैं, जो इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं. रोजाना इसके सेवन से फ्लू का खतरा भी दूर होता है

तनाव कम करे
तुलसी पूरे दिन की थकान को झट से दूर कर देती है. अगर आप तनाव से परेशान हैं तो रोजाना रात को दूध में कुछ पत्ते तुलसी के डालकर उबाल लें और फिर इस दूध को पीएं. यह नर्वस सिस्टम को आराम पहुंचाता है और तनाव कम करता है.
इम्यूनिटी बूस्ट करे
तुलसी में भरपूर मात्रा में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लिमेंट्री गुण होते हैं, जो इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं. रोजाना इसके सेवन से फ्लू का खतरा भी दूर होता है.
महिलाओं में पीरियड्स संबंधी समस्याएं
महिलाओं में पीरियड्स के दौरान कई तरह की समस्याएं होती हैं. इसकी वजह से वे बहुत परेशान रहती हैं. ऐसे में तुलसी के बीज का इस्तेमाल काफी फायदेमंद होता है. पीरियड्स में अनियमितता को दूर करने के लिए तुलसी के पत्तों का नियमित सेवन करना चाहिए.
सर्दी-जुकाम दूर करे
तुलसी का काढ़ा सर्दी और जुकाम में बहुत कारगर होता है. काढ़ा बनाने के लिए तुलसी पत्ते को पानी में डालकर उसमें काली मिर्च और मिश्री मिलाकर अच्छे से मिला लें और उसका सेवन करें. यह सर्दी में बहुत कारगर होता है.

 

 


Date : 21-Oct-2019

प्राचीन पद्धतियों से लेकर आज के इलाज तक बीमारियों के दौरान खान-पान के परहेज और विशेष पोषण की बात की जाती है। यही कारण है कि अक्सर कहा जाता है हर बीमारी की जड़ पेट में छुपी होती है। यानी पेट ठीक तो इम्युनिटी भी दुरुस्त। लक्षण जो उभरते हैं कई सारे ऐसे लक्षण पेट से जुड़े होते हैं जो शरीर में चल रही उथल- पुथल की ओर इशारा कर सकते हैं। इन बातों पर करें गौर समय-समय पर पेट आपको कई तरह के संकेत देता है। आपका दैनिक नित्यकर्म इस प्राकृतिक प्रक्रिया का नियमित होना भी आवश्यक है।
यूं हर एक का पेट कुछ न कुछ भिन्नता लिए होता है। इसलिए इस प्रक्रिया में भी कुछ भिन्नता हो सकती है। खासकर आजकल के माहौल में। सामान्यतः भोजन को आपकी पाचन प्रणाली से गुजरने में कुछ घंटों का समय लगता है। इसके बाद ही पचे हुए भोजन को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू होती है।लेकिन यदि शौच के आपके रूटीन में कोई परिवर्तन लगातार आ रहा है, कब्ज बनी हुई है या अन्य कोई समस्या है तो डॉक्टर से सलाह लें। कब्ज के पीछेडिहाइड्रेशन से लेकर थाइरॉइड की समस्या, फाइबर की कमी जैसे कई कारण हो सकते हैं।
इस नियमित प्रक्रिया का अनियमित होना मतलब अधिक समय तक पेट में पुराने भोजन का संग्रहण। ऐसे में पेट में सड़न पैदा होती है जो गंभीर समस्या बन सकती है। सही तरीका और सतर्कता अपने भोजन और दिनचर्या को लेकर नियमित होना पेट ही नहीं पूरे शरीर के लिहाज से अच्छा होता है।

 


Date : 21-Oct-2019

मोबाइल पर बीपी नापना भरोसेमंद नहीं है। आजकल लोग मोबाइल एप से बीपी नापते हैं। चूंकि प्रेशर धमनी में होता है, न कि शरीर की ऊपरी सतह पर। इसलिए डॉक्टर बीपी नापने के लिए मशीन को हाथ के बाजू में बांधकर प्रेशर देकर उसे कसते हैं। यह जानकारी शुक्रवार को डॉ. विराज सुवर्ण ने दी।
डॉक्टर के सामने गड़बड़ाता है बीपी : जापलिंग रोड स्थित एक होटल में एरिस लाइफ साइंसेज की ओर से इंडिया हॉर्ट स्टडी पर राजधानी के डॉक्टरों ने जानकारी दी। एरिस लाइफ साइंसेज के अध्यक्ष डॉ. विराज सुवर्ण ने बताया यूपी में 1961 लोगों पर एक सर्वे हुआ। इसमें 1345 पुरुष, 616 महिलाएं शामिल थीं।
सर्वे में सामने आया कि जो मरीज मोबाइल एप से बीपी नापने के बाद डाक्टर के पास जाकर बीपी चेक कराते हैं तो उनकी रीडिंग अलग होती है। यूपी में ऐसे 22 फीसदी लोगों के साथ होता है। डॉक्टर के सामने उनका बीपी गड़बड़ा जाता है। इसलिए बीपी को घर में भी मशीन से नापना चाहिए। 
41.7 फीसदी लोग गलत डायग्नोसिस के खतरे में- डिवाइन हॉर्ट सुपर स्पेशियलिटी के कॉर्डियोलॉजिस्ट डॉ. नकुल सिन्हा ने बताया स्टडी के आंकड़े बताते हैं कि भारतीयों में आराम की स्थिति में हृदय की धड़कन की दर (आरएचआर) औसत से अधिक है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है।
आरएचआर और दिल के बीच गहरे संबंध हैं। सर्वे के मुताबिक प्रदेश में 21.7 फीसदी प्रतिक्रियादाता व्हाइट कोट हाइपरसेंस्टिव, जबकि 20 फीसदी को मास्क्ड हाइपरटेंशन है।
वहीं, करीब 41.7 फीसदी लोग गलत डायग्नोसिस व मिस्ड डायग्नोसिस के खतरे में हैं। अजंता हॉस्पिटल के नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. दीपक दीवान ने बताया किडनी और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को स्वस्थ रखने में संतुलित बीपी होना जरूरी है। बीपी बढ़ने से अंगों को क्षति पहुंचती है।

 


Date : 16-Oct-2019

नई दिल्ली, 16 अक्टूबर : ऑफिस जाने वाले लोगों की जिंदगी से स्ट्रेस कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है. वर्किंग फील्ड का असर हमारे लाइफस्टाइल पर भी साफ दिखने लगा है. डिप्रेशन से मुक्त होने के लिए लोग काउंसलिंग और तरह-तरह की दवाइयों का इस्तेमाल करने लगे हैं जो सेहत के लिए और भी ज्यादा हानिकारक हो सकती हैं. अगर आप स्ट्रेस फ्री लाइफ जीना चाहते हैं तो कुछ खास बातों का ध्यान रखें.
अक्सर आपने लोगों को कहते सुना होगा कि मोबाइल फोन आने के बाद लोगों में स्ट्रेस की समस्या ज्यादा बढ़ी है. इसे स्विच ऑफ कर देना ही बेहतर विकल्प है. वास्तव में मोबाइल फोन से ज्यादा हमें थोड़ी देर के लिए खुद को स्विच ऑफ रखने की जरूरत है. दिन में कम से कम एक बार आपको ये ट्रिक जरूर आजमानी चाहिए.
दिनभर में एक वक्त ऐसा होना चाहिए जब आप ऑफिस के काम या जिंदगी में चल रही परेशानियों के बारे में न सोचें. मन को शांत रखें और दिमाग को परेशानियों से एकदम मुक्त कर दें. आंखें बंद करें और गहरी सांस लें. इससे आप अच्छा फील करेंगे और धीरे-धीरे ये अभ्यास आपके व्यवहार में शामिल हो जाएगा.
स्ट्रेस दूर करने के लिए करें ये काम-
- यदि आप लोगों के बीच रहकर अकेला महसूस करते हैं और यहां भी मानसिक अवसाद आपका पीछा नहीं छोड़ रहा है तो अच्छी चीजें पढ़ना-लिखना शुरू कर दें. आप चाहें तो पेंटिंग भी कर सकते हैं.
- कई बार रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि म्यूजिक स्ट्रेस को दूर करने में मददगार है. आप चाहें तो ये तरीका भी अपना सकते हैं.

- सुबह के वक्त रनिंग शुरू कर दीजिए. ताजा हवा में खुलकर सांस लेने से आपका दिमाग सही दिशा में दौड़ेगा और आप हर चीज को लेकर हाइपर नहीं होंगे.
- ऑफिस में मिलने वाले वीक ऑफ का सही इस्तेमाल करें. इस दिन को 'मी टाइम' के रूप में सेलिब्रेट करना शुरू कर दीजिए. आप चाहें तो दोस्तों के साथ मूवी देखने या स्पोर्ट्स एक्टिविटी में हिस्सा लेने जा सकते हैं. (aajtak)


Date : 13-Oct-2019

प्रेम और कलाओं से परिपूर्ण होने के कारण श्री कृष्ण ने इसी दिन महारास रचाया था. इस दिन विशेष प्रयोग करके बेहतरीन स्वास्थ्य, अपार प्रेम और खूब सारा धन पाया जा सकता है.

नई दिल्ली, 13 अक्टूबर : शरद ऋतु की पूर्णिमा काफी महत्वपूर्ण तिथि है. शरद पूर्णिमा आज है और चन्द्रमा इस दिन संपूर्ण, सोलह कलाओं से युक्त होता है. इस दिन चन्द्रमा से अमृत की वर्षा होती है जो धन, प्रेम और स्वास्थ्य तीनों देती है. प्रेम और कलाओं से परिपूर्ण होने के कारण श्री कृष्ण ने इसी दिन महारास रचाया था. इस दिन विशेष प्रयोग करके बेहतरीन स्वास्थ्य, अपार प्रेम और खूब सारा धन पाया जा सकता है. पर प्रयोगों के लिए कुछ सावधानियों और नियमों के पालन की आवश्यकता है.
शरद पूर्णिमा पर किन सावधानियों के पालन की आवश्यकता है?
- इस दिन पूर्ण रूप से जल और फल ग्रहण करके उपवास रखने का प्रयास करें
- उपवास रखें न रखें पर इस दिन सात्विक आहार ही ग्रहण करें तो ज्यादा बेहतर होगा
- शरीर के शुद्ध और खाली रहने से आप ज्यादा बेहतर तरीके से अमृत की प्राप्ति कर पायेंगे
- इस दिन काले रंग का प्रयोग न करें. चमकदार सफेद रंग के वस्त्र धारण करें तो ज्यादा अच्छा होगा
- अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस दिन क्या प्रयोग करें?
- रात्री के समय स्नान करके गाय के दूध में घी मिलाकर खीर बनायें
- खीर को भगवान् को अर्पित करके विधिवत भगवान् कृष्ण की पूजा करें
- मध्य रात्री में जब चन्द्रमा पूर्ण रूप से उदित हो जाए तब चंद्रदेव की उपासना करें
- चन्द्रमा के मंत्र "ॐ सोम सोमाय नमः" का जाप करें
- खीर को चन्द्रमा की रौशनी में रख दें
- खीर को कांच,मिटटी या चांदी के पात्र में ही रखें , अन्य धातुओं का प्रयोग न ही करें  
- प्रातः काल जितनी जल्दी इस खीर का सेवन करें उतना ही उत्तम होगा
- सबसे उत्तम है कि इस खीर का सेवन भोर में , सूर्योदय के पूर्व किया जाय
- प्रेम में सफलता के लिए इस दिन क्या प्रयोग करें ?
- शाम के समय भगवान राधा-कृष्ण की उपासना करें
- दोनों को संयुक्त रूप से एक गुलाब के फूलों की माला अर्पित करें
- मध्य रात्रि को सफेद वस्त्र धारण करके चन्द्रमा को अर्घ्य दें
- इसके बाद निम्न मंत्र का कम से कम 3 माला जाप करें -"ॐ राधावल्लभाय नमः"
- या मधुराष्टक का कम से कम 3 बार पाठ करें
- मनचाहे प्रेम को पाने की प्रार्थना करें
- भगवान को अर्पित की हुयी गुलाब की माला को अपने पास सुरक्षित रखें
- अपार धन की प्राप्ति के लिए इस दिन क्या प्रयोग करें?
- रात्री के समय मां लक्ष्मी के समक्ष घी का दीपक जलाएं
- इसके बाद उन्हें गुलाब के फूलों की माला अर्पित करें
- सफेद मिठाई और सुगंध भी अर्पित करें
- इसके बाद निम्न मंत्र का कम से कम 11 माला जाप करें
- "ॐ ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महालक्ष्मये नमः"
- आपको धन का अभाव नहीं होगा
(aajtak.in)


Date : 11-Oct-2019

एक शोध में पता चला है कि गर्भावस्था के अंतिम हफ्ते में गर्भवती महिलाओं का पीठ के बल सोना 10 सिगरेट पीने जितना खतरनाक हो सकता है। यह शोध ऑकलैंड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। 
ऑकलैंड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार, जो महिला अपने गर्भावस्था के त्रैमासिक अवधि के दौरान एक तरफ मुंह करके लेटने कीबजाय पीठ के बल लेटती है, तो उनके जन्म लेने वाले बच्चे का वजन कम होने की संभावना तीन गुना तक बढ़ जाती है।
बच्चे में कम हो जाती है रक्त की आपूर्ति-
वैज्ञानिकों का मानना है कि गर्भावस्था के अंतिम दिनों में पीठ के बल लेटने से बच्चे में रक्त की आपूर्ति कम हो जाती है। पीठ के बल लेटने पर मां के बड़े हुए गर्भ आकार की वजह से गर्भ नाल संकुचित हो जाती है।
गर्भवती के लिए व्यायाम करना बेहद जरूरी-
शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि किसी भी तरह की बीमारी से बचे रहने के लिए गर्भवती महिलाओं को नियमित रूप से व्यायाम करना भी जरूरी है। व्यायाम से उनका ब्लड शुगर नियंत्रित रहने के साथ-साथ मां और बच्चे में टाइप-2 डायबिटीज जैसी बीमारियों का खतरा भी कम होता है। इसके साथ ही स्वास्थ्य अधिकारी गर्भावस्था के दौरान ज्यादा से ज्यादा सक्रिय रहने की सलाह देते हैं और वजन को नियंत्रित रखने के लिए जंक फूड खाने से बचने के लिए कहते हैं।

 


Date : 11-Oct-2019

स्मार्ट गैजेट आज इंसान की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है. इसके बिना हमारे सभी काम अधूरे हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं आपकी पॉकेट में समाने वाला एक छोटा सा स्मार्टफोन बड़ी बीमारी का कारण बन सकता है. मोबाइल या लैपटॉप का गलत तरीके से इस्तेमाल कमर और गर्दन में दर्द की वजह बन रहा है.

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के कम्युनिटी मेडिसिन डिपार्टमेंट द्वारा ग्रामीण इलाकों में मरीजों पर किए गए एक शोध में यह बात सामने आई है. इस शोध में पता चला कि 60 प्रतिशत लोग मस्कुलोस्केल्टन डिसऑर्डर यानी जोड़ों के दर्द से परेशान थे. गैजेट का गलत तरह से इस्तेमाल करने से लोगों में जोड़ों के दर्द और सर्वाइकल जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं.
यह शोध 200 लोगों पर किया गया था जिसमें से 54 फीसदी को कमर दर्द की शिकायत थी. बता दें कि स्मार्टफोन की डिस्प्ले को 60 डिग्री से ज्यादा गर्दन मोड़कर देखने से अक्सर ऐसी शिकायतें होती हैं. इससे हमारी रीढ़ की हड्डी निरंतर मुड़ने की अवस्था में रहती है और बाद में यही दर्द का कारण बन जाती है.

कैसे करें बचाव?
अगर आप स्मार्टफोन या लैपटॉप के कारण बढ़ रही इस परेशानी से निजात पाना चाहते हैं तो कुछ खास बातों का ध्यान रखने की जरूरत है.

1. कंप्यूटर स्क्रीन से अपनी आंखों को करीब 80 सेंटीमीटर दूर रखें.

2. फोन को कान और कंधे के बीच फंसाकर बात न करें. ऐसे में ईयरफोन का इस्तेमाल ज्यादा बेहतर विकल्प होगा.

3. स्मार्टफोन पर चिपके रहने की बजाय थोड़ा वक्त अपनी फीजिक के लिए निकालें और करीब 20 मिनट टहलें.


Date : 04-Oct-2019

अस्थमा अटैक की वजह से खांसी, सीने में जकड़न, और सांस लेने में तकलीफ हो सकती है. अस्थमा का दौरा तब पड़ सकता है जब आप घर की धूल मिट्टी और तंबाकू के धुएं जैसी चीजों के संपर्क में आते हैं. इनहेलर्स का उपयोग करके इसे रोका जा सकता है.

धूम्रपान: जो लोग सिगरेट पीते हैं उन्हें अस्थमा होने की संभावना अधिक होती है. एक्टिव और पैसिव स्मोकिंग दोनों ही खांसी को और ज्यादा बदतर बनाते हैं.

धूल: आपके आस-पास के वातावरण में धूल के कण, ठंडी हवा, तापमान में बदलाव, नमी, खराब मौसम, बायोमास धुआं, भी अस्थमा अटैक को बढ़ावा दे सकते हैं.

वायु प्रदूषण: धुआं, ग्राउंड लेवल ओजोन, वाहनों से निकला धुआं और अन्य चीजें अस्थमा को बढ़ावा देती हैं. शहरी वातावरण में अस्थमा बढ़ने के पीछे वायु प्रदूषण मुख्य कारकों में से एक है

कॉकरोच: अध्ययनों से पता चला है कि जिन घरों में बच्चों के आसपास कॉकरोच के कण होते हैं, उनमें दूसरों की तुलना में बचपन में ही अस्थमा होने की संभावना अधिक होती है.

व्यायाम: कठिन एक्सरसाइज से अस्थमा से पीड़ित 80% लोगों में श्वास नली संकुचित हो सकती है. कुछ लोगों में अस्थमा के लक्षणों के लिए ये उत्तरदायी है. यदि आपको व्यायाम-प्रेरित अस्थमा है, तो आप इससे पहले पांच से आठ मिनट के भीतर सीने में जकड़न, खांसी और सांस लेने में कठिनाई महसूस करेंगे.

प्रिजर्वेटिव: खाद्य संरक्षक अस्थमा को बढ़ा सकते हैं. सल्फाइट एडिटिव्स, जैसे कि सोडियम बिस्ल्फाइट, पोटेशियम बिस्ल्फाइट, सोडियम मेटाबिसल्फ़ाइट, पोटेशियम मेटाबाइसल्फ़ाइट और सोडियम सल्फाइट, आमतौर पर खाद्य प्रसंस्करण में इस्तेमाल किए जाते हैं, ये अस्थमा को बढ़ा सकते हैं.


Date : 04-Oct-2019

आपको किसी तरह का दर्द नहीं होता और किसी तरह की सूजन भी नहीं होती है, लेकिन अक्सर आपके घुटने चटकते हैं या उनसे आवाज आती है। क्या आपको ऐसे में डॉक्टर के पास जाना चाहिए? डॉक्टर के पास जाने से पहले यह लेख पूरा पढ़ें, आपके लिए मददगार हो सकता है।

कई आवाजें, कई नाम
घुटनों से आने वाली आवाज को मेडिकल भाषा में 'पॉपिंग, स्नैपिंग, कैचिंग, क्लिकिंग, क्रंचिंग, क्रैकिंग, क्रैकलिंग, क्रीकिंग, ग्राइंडिंग, ग्रैटिंग और क्लंकिंग कहा जाता है। ये सभी टर्म पूरी तरह टेक्निकल हैं और इनका उपयोग आवाज कितनी बार आती है, कितने समय के लिए आती है और कितनी जोर से आती है, इस आधार पर किया जाता है। इसलिए 'क्रीक" और 'क्रैक" व 'ग्रिंड" और 'ग्रैट" के बीच अंतर करना आसान नहीं है। फिर भी कोशिश के जरिए घुटने से आने वाली आवाज को बहुत बारीकी से सुनना होता है।
अक्सर, आप इस तरह की आवाजें जिम में सुनते हैं, जबकि घुटनों से जुड़ा कोई अभ्यास या स्क्वैट्स किया जाता है।

कब यह हंसी की बात नहीं है
घुटनों से आने वाली आवाज में एक बीमारी की बुनियाद होती है और इसे नजरअंदाज करने पर आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए आवाज आने का कारण घुटने की मिनिस्कस या टियर इंज्यूरी हो सकता है। मिनिस्कस अंग्रेजी के सी-आकार की रबर जैसी डिस्क होती है जो घुटनों में कुशन या गद्दी की तरह काम करती है। यह किसी भी तरह के झटके को सहन करने की क्षमता देती है और घुटने से जुड़ी सभी हड्डियों पर वजन का बंटवारा संतुलित ढंग से कर देती है।

पॉपिंग की आवाज
सिर्फ चिकित्सा जगत के लोगों के लिए प्रकाशित पत्र 'क्लिनिक्स इन ऑर्थोपेडिक सर्जरी" में प्रकाशित एक लेख के अनुसार किसी भी खेल के दौरान घुटने के मुड़ जाने पर मिनिस्कस टिअर हो जाता है। युवाओं में किसी चोट के कारण घुटने के जोड़ खुल जाते हैं, जिस तरह हमारी उम्र बढ़ती है तो मिनिस्कस टिअर की आशंका बढ़ जाती है।
मायउपचार डॉट कॉम के साथ जुड़े चिकित्सक आयुष पांडे के अनुसार घुटने के जोड़ पर पड़ने वाले दबाव में बदलाव के कारण नाइट्रोजन के छोटे बुलबुले घुटने में पड़ जाते हैं। जब ये बुलबुले बहुत तेजी से बनते और फूटते हैं, तो उनसे पॉपिंग की आवाज आती है। हवा द्वारा उत्पन्न यह पॉपिंग घुटनों के जोड़ के अलावा अन्य जोड़ में भी होती है। यह हाथों की कोहनियों और अंगुलियों के जोड़ में होना बहुत स्वाभाविक है।

सायकोलॉजिकल पॉपिंग
एक अध्ययन के अनुसार इंफ्रापेटेलर प्लिका के 72 प्रतिशत मरीजों में सायकोलॉजिकल पॉपिंग और स्नैपिंग देखने को मिलती है। दस बरस के बहुत ज्यादा गतिमान बच्चे या डिस्कोइड मेनिस्कस की स्थिति में नियमित अंतराल पर पॉपिंग और स्नैपिंग बिना किसी दर्द के होता है और यह बताता है कि कुछ लोगों में यह सायकोलॉजिकल भी होता है। 2018 में हुआ एक अध्ययन बताता है कि घुटने से पॉपिंग की आवाज बिना दर्द के लोगों को ऑस्टियोआर्थ्राइटिस की सूचना देने का काम करती है।

गौर करें पॉपिंग की आवाज पर
घुटने से आने वाली पॉपिंग की आवाज पर हमेशा गौर करना चाहिए खासकर जब दर्द भी हो। घुटने के जोड़ संबंधी किसी भी दिक्कत से बचने के लिए तब अलग-अलग तरह की जांच जरूरी है। इनमें एमआरआई बहुत सामान्य है, ताकि जोड़ों का परीक्षण करने के साथ ही उसमें किसी भी तरह की असामान्यता का पता लगाया जा सके।
मिनिस्कस इंज्यूरी के प्रकरण में कई बार डॉक्टर टूटे हुए लिगामेंट को ठीक करने के लिए सर्जरी की सलाह भी देते हैं। सर्जरी के बाद भी बिना दर्द के घुटनों से पॉपिंग की आवाज आ सकती है क्योंकि घुटनों को सहारा देने वाली मांसपेशियां ठीक होने से पहले थोड़ी कमजोर रहती हैं। फिजिकल थेरेपी और घुटनों पर पट्टा पहनना न केवल घुटनों की पॉपिंग रोकने में मदद करता है, बल्कि चोट की आशंका को भी बहुत कम कर देता है।

कब जाएं डॉक्टर के पास
सामान्यत: घुटने की पॉपिंग से बहुत गंभीर 


Date : 03-Oct-2019

कल्पना कीजिए... सुबह-सुबह का समय... पक्षियों की चहचहाहट और हवा की मधुर सरसराहट के बीच आप भी बगीचे में ध्यान लगा रहे हैं, अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रीय कर रहे हैं... निश्चित ही यह एक सुखद अहसास है। यकीनन यह संगीत की ताकत है। वैसे भी कहा गया है कि संगीत मधुरता के साथ भावनाएं व्यक्त करने का ऐसा माध्यम है जो सीधा आत्मा को छूता है। संगीत को हमेशा से मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ा गया है। संगीत इन्सान को खुश, दुखी या तनावपूर्ण बना सकता है। इसीलिए कोई आश्चर्य नहीं कि प्राचीन समय से संगीत को एक मरहम के रूप में प्रयुक्त किया गया है। यहां तक कि मेडिसिन के जनक कहे जाने वाले हिप्पोक्रेट्स भी विभिन्न बीमारियों में म्यूजिक थेरेपी का इस्तेमाल करते थे। समय के साथ विज्ञान और तकनीक का विकास हुआ और आज इन्सान के पास इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि म्यूजिक एक असरदार दवा के रूप में काम कर सकता है। जानिए म्यूजिक थेरेपी के बारे में -

मैजिक ऑफ म्यूजिक
म्यूजिक वास्तव में विभिन्न वायब्रेशन्स की सीरीज है, जो साउंड क्रिएट करते हैं। चूंकि शरीर इन वायब्रेशन्स को ग्रहण करता है, इसलिए इससे कई शारीरिक बदलाव भी होते हैं। म्यूजिक के प्रकार पर निर्भर करते हुए ये बदलाव अच्छे या बुरे हो सकते हैं। जहां शांत संगीत तनाव घटाता है और बीमारियों से लडऩे की क्षमता बढ़ाता है, वहीं ज्यादा शोर वाला संगीत लोगों को गुस्सैल बनाता है और आत्महत्या वाले विचार पैदा करता है। हालांकि संगीत के शरीर पर होने वाले असर का अब तक अध्ययन जारी है।
संगीत के असर को समझने के लिए बेथ इजराइल मेडिकल सेंटर के लुईस आर्मस्ट्रॉन्ग सेंटर ऑफ म्यूजिक एंड मेडिसिन में एक रिसर्च की गई। इसमें 32 हफ्तों वाले 272 प्री-मैच्योर नवजात शिशुओं को शामिल किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि इन नवजात शिशुओं को जब किसी भी रूप में संगीत (गाना या इंस्ट्रूमेंटल) सुनाया गया तो उनकी हार्ट रेट धीमी पड़ गई। इसमें भी गाने के बोल वाला संगीत ज्यादा असरदार रहा। इससे बच्चों के शांत, लेकिन अलर्ट रहने की आदत भी बढ़ी। इसी स्टडी के लेखक जोनन लोवी के मुताबिक, म्यूजिक थेरेपी से माता-पिता का तनाव भी कम हुआ है।    

मनोवैज्ञानिक डेनियल जे. लेविटिन कहते हैं, 'आजकल शारीरिक बीमारियों के इलाज के लिए गाने, ध्वनि और लय का बेहतर उपयोग किया जाने लगा है। यह न केवल नवजात शिशुओं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और कैंसर के मैनेजमेंट में भी सहायक है।
डेनियल के अनुसार, हमें इस बात के पुख्ता प्रमाण मिल चुके हैं कि ऑपरेशन थिएटर से लेकर फैमिली क्लिनिक तक में  म्यूजिक हेल्थ-केयर की भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने अपनी एक किताब में विस्तार से बताया है कि किसी तरह संगीत सेहत को प्रभावित करता है।  
अनुसंधानकर्ताओं ने पाया है कि संगीत सुनने से शरीर में एंटीबॉडी इम्युनोग्लोबुलिन ए (आईजीए) का बनना तेज हो जाता है। साथ ही मारक क्षमता रखने वालीं सेल्स (कोशिका) बढ़ जाती है। इन सेल्स का काम विभिन्न वायरस के हमलों से रक्षा करना और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना है। साथ ही म्यूजिक तनाव तो कम करता ही है। यही कारण है कि म्यूजिक का संबंध रिलेक्सेशन से है।

क्या है म्यूजिक थेरेपी?
जब कोई मान्यता प्राप्त म्यूजिक थेरेपिस्ट अपने विभिन्न प्रकार के म्यूजिक की मदद से इन्सान को उसकी परेशानी या बीमारी से उबरने में सहायता करता है तो इसे म्यूजिक थेरेपी कहते हैं। म्यूजिक थेरेपिस्ट इस बात का गहरा जानकार होता है कि किस तरह संगीत लोगों में भावनात्मक प्रतिक्रियाएं पैदा कर उन्हें आराम और सुकून पहुंचा सकता है। म्यूजिक थेरेपिस्ट, इन्सान की बीमारी के हिसाब से उस म्यूजिकल स्टाइल का पता लगाता है, जो मरीज को ध्यान की अवस्था में पहुंचा सके और उसके लिए फिजिकल रिहेब सेशन के रूप में काम कर सके। है। म्यूजिक थेरेपिस्ट पता लगा लेते हैं कि मरीज को किस तरह का म्यूजिक पसंद है।
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की मैग्जीन 'हार्वर्ड हेल्थ पब्लिशिंग' में एक म्यूजिक थेरेपिस्ट हॉली चार्ट्रेंड का जिक्र है। ये हार्वर्ड से संबद्ध मैसेचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल में म्यूजिक थेरेपिस्ट हैं। उन्होंने सबसे पहले एक सिंगर को तैयार किया। वह एक महिला थी, जिसके मन में म्यूजिक की मदद से दूसरों की मदद करने का विचार आया और उसने म्यूजिक थेरेपिस्ट बनने का ठान लिया। वह कहती हैं, 'मेरे काम का सबसे अच्छा पक्ष यह देखना है कि जो शख्स अच्छा महसूस नहीं कर रहा है, संगीत उसकी जिंदगी में कितना बड़ा असर डाल सकता है।'
अमेरिकन जर्नल ऑफ होस्पाइस एंड पालिएटिव मेडिसिन' मैग्जीन में लिखा है कि म्यूजिक थेरेपी से तनाव घटता है, मरीज रिलेक्स महसूस करता है, उसे दर्द से मुक्ति मिलती है, इमोशनल सपोर्ट मिलता है और अच्छा महसूस होता है। इस अध्ययन में 57 मरीजों और 53 परिजन को म्यूजिक थेरेपी दी गई थी। मरीजों ने बताया कि उन्हें तनाव और दर्द से मुक्ति मिली है।
इस तरह म्यूजिक जिदंगी की गुणवत्ता तो बढ़ाता ही है, बीमारी व अन्य विकार से उबरने में भी सहायक है।


Date : 02-Oct-2019

माइग्रेन की समस्या यानी बार-बार होने वाला तेज सिर दर्द, जो दिमाग के आधे हिस्से में होता है और 1 दिन से लेकर तीन दिन तक बना रह सकता है। माइग्रेन से होने वाला सिर दर्द कई बार असहनीय होता है, डॉक्टर की सलाह ले अलावा आप नीचे बताए गए उपायों को भी आजमा सकते हैं, जो इस दर्द से राहत दिलाने में आपकी मदद करेंगे -

1 अंगूर का जूस पीएं :
अंगूर में कई डायटरी फाइबर, विटामिन ए, सी और कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं, जो माइग्रेन के दर्द से राहत दिलाने में मदद करते है। माइग्रेन का दर्द होने पर इसे मरीज को दिन में 2 बार पीलाएं।
2 अदरक :
अदरक तनाव और शारीरिक दर्द दूर करने में बहुत सहायता करता है, साथ ही ये माइग्रेन के दर्द में भी राहत पहुंचाता है। आप चाहे तो अदरक का रस और नींबू के रस को मिलाकर मरीज को दें या अदरक की चाय भी पीला सकते हैं।
3 दालचीनी :
माइग्रेन से सिर दर्द होने पर दालचीनी के पाउडर को पानी में मिलाकर पेस्ट बनाएं और माथे पर लगाएं। फिर आधे घंटे बाद इसे गुनगुने पानी से धो लें, इससे दर्द में राहत मिलेगी।
4 रोशनी से बचें :
जिन लोगों को माइग्रेन की समस्या हो उन्हें ज्यादा रोशनी के बीच नहीं रहना चाहिए क्योंकि इससे दर्द और बढ़ता है। इसलिए अपने आसपास की रोशनी को कम कर दें या कोई चश्मा पहन लें।
5 सिर की त्वचा पर मालिश करें :
माइग्रेन के दर्द से राहत पाने के लिए गर्दन को स्ट्रेच करना और सिर की त्वचा पर मालिश एक असरदार उपाय है। ऐसा करने से रक्त प्रवाह बढ़ता है और दर्द से राहत मिलती है।


Date : 02-Oct-2019

आमतौर पर यही माना जाता है कि पेडीक्योर पांवों की साफ-सफाई व उन्हें सुंदर बनाने के लिए किया जाता है। एक्सपर्ट का कहना है कि एक महीने में एक बार इसे जरूर करवाना चाहिए। दरअसल यह सिर्फ पैरों की खूबसूरती के लिए नहीं बल्कि सेहत के लिए भी बहुत जरूरी है। इससे पैरों में जमी गंदगी साफ हो जाती है। साथ ही आपकी महीने भर की थकान के अलावा पांव की मृत कोशिकाएं हट जाती हैं। फेशियल से जिस तरह चेहरे का ग्लो और नमी बरकरार रहती है, उसी तरह पेडीक्योर से पैरों व नाखूनों क ी नमी बनी रहती है। मेकअप आर्टिस्ट कंचन पोरवाल बता रही हैं पेडीक्योर कराने के तरीके व इसके फायदे के बारे में....।
ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने के साथ तनाव को करता है कम
बेहतर पेडीक्योर का एक अहम हिस्सा है फुट मसाज, जो ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाता है। साथ ही पैर और पिंडली से तनाव दूर करता है। पेडीक्योर के दौरान पैरों के नाखून को काटकर, ट्रिम करकर उनकी अच्छे से सफाई की जाती है। इससे पैरों में होने वाले इंफेक्शन से बचा जा सकता है। साथ  ही धूल और बैक्टीरिया भी साफ  हो जाते हैं, जिससे फंगस की ग्रोथ नहीं होती है और पैरों से बदबू भी नहीं आती।
फटी एड़ियों से मिलता है छुटकारा
अक्सर ऐसा होता है कि हम हाथों की सफाई तो कर लेते हैं, लेकिन पैरों को नजरअंदाज कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि पैरों में खासकर एड़ियों में नमी हो जाती है और उसमें दरारें पड़ने लगती हैं। नियमित रूप से पेडीक्योर करवाने से फटी एड़ियों की समस्या से छुटकारा मिल सकता है। पेडीक्योर के दौरान डेड स्किन सेल्स दूर किए जाते हैं। त्वचा पहले की तरह नर्म हो जाती है। डेड स्किन न हटाई जाए तो सेल्स एक जगह जमा होने लगते हैं और कॉर्न बन जाते हैं। यह काफी तकलीफदेह होता है। पेडीक्योर से इसके खतरे को कम किया जा सकता है।
घर में रखें ये सामान
नेल क्लीपर, नेल फाइल, नेल पॉलिश रिमूवर, क्यूटिकल क्रीम व पुशर, कॉटन पैड, टब पांव भिगोने के लिए, प्यूमिक स्टोन, एक्सपोलिएटिंग स्क्रब और टॉवल और मॉश्चराइजर।
ऐसे करें पेडीक्योर
सबसे पहले नेलपॉलिश हटाएं, गुनगुने पानी में 15 मिनट पैर डुबो कर रखें, प्यूमिक स्टोन से पैर रगड़ें और डेड स्किन हटाएं। 15 मिनट बाद नेल ट्रिम करें और पैर सुखाएं। नेल फाइलर व क्लिपर से नाखून को अच्छा सा शेप दें। इसके बाद क्टूटिकल क्रीम लगाकर कुछ देर छोड़ दें। इसके बाद स्क्रब करें। एक अच्छा सा मॉश्चराइजर लेकर पैरों की मालिश करें और नेल पेंट लगाएं।


Date : 28-Sep-2019

बदलते समय के साथ यह सफेद और मीठी चीज मनुष्य के लिए शत्रु की तरह बनती जा रही है। हालांकि सफेद शकर के मीठे की पूरी मात्रा को भोजन से हटा देना स्वास्थ्य पर अच्छा असर नहीं डालता। लेकिन लोग मीठे से पूरी तरह बचना चाहते हैं। शुगर डिटॉक्स का सहारा ऐसी ही स्थिति में लिया जाता है।

शुगर डिटॉक्स का असल मतलब है एक प्रकार की विशेष डाइट को फॉलो करना। यह डाइट शकर की विशेष भूख यानी क्रेविंग को नियंत्रित करने और वजन कम करने में मदद करती है। लेकिन क्या यह डाइट हर तरह से कारगर होती है, या फिर शकर की मात्रा को नियंत्रित करने में और कोई चीज मदद कर सकती है? जानिए इससे जुड़े कुछ तथ्य-

दिमाग के लिए पुरस्कार है शकर

दिमाग शकर को एक पुरस्कार की तरह लेता है। जब आप अक्सर काफी मात्रा में शकर खाते हैं तो इस पुरस्कार के एहसास को और ब़ढा देते हैं, ऐसे में इस लत से छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता है।

जब आप एक शकर से भरी चीज खाते हैं तो इसमें मौजूद शकर यानी सामान्य कार्बोहाइड्रेट्‌स आपके खून में पहुंचकर तुरंत ग्लूकोज में बदल जाते हैं और खून का शुगर लेवल झटके से बढ़ जाता है। ये सामान्य कार्बोहाइड्रेट्‌स फल, सब्जियों और डेयरी उत्पादों में भी मिलते हैं लेकिन चूंकि इन चीजों फाइबर और प्रोटीन भी होता है, इसलिए ये ग्लूकोज बनाने की प्रक्रिया को धीमा कर देते हैं। जबकि सोडा, सॉफ्टड्रिंक्स, कोल्डड्रिंक्स, शुगर सिरप आदि ऐसा नहीं करते। स्टार्चयुक्त पदार्थ भी इसी तरह शुगर का स्तर बढ़ाते हैं।

इस ग्लूकोज को शरीर की हर कोशिका तक पहुंचाने के लिए आपकी पैंक्रियास एक हार्मोन इन्सुलिन पैदा करती है। परिणामस्वरूप खून में शकर की मात्रा एकदम से कम होती है तथा व्यक्ति और अधिक शकर की तलाश करने लगता है। ताकि फिर से पहले जैसी उपहार वाली आनंद की अनुभूति कर सके। इन्सुलिन का असंतुलन ही डायबिटीज जैसी स्थितियों को भी पैदा करता है।

कुछ शुगर डिटॉक्स प्लान भोजन में से शकर को पूरी तरह हटा देते हैं। और लिक्विड को मुख्य डाइट बना देते हैं। मतलब ये फल, सब्जियों, डेयरी उत्पादों और रिफाइंड अनाज को खाने पर भी रोक लगा देते हैं। ऐसे में दो समस्याएं हो सकती हैं। पहली यह कि शरीर में शकर की कमी से दिक्कत पैदा हो सकती है। इससे कैल्शियम, विटामिन्स और फाइबर जैसी जरूरी चीजें शरीर को नहीं मिल पातीं। और दूसरे कुछ दिनों की रोक के बाद आप फिर से ढेर सारी शकर खाने की आदत की ओर लौट सकते हैं। डायबिटिक, हाई बीपी या अधिक वजन वाले लोगों को तो ऐसी डाइट से बिलकुल दूर रहना चाहिए, वरना स्थिति गंभीर हो सकती है।

अपनाएं यह तरीका

धीरे-धीरे शकर की आदत को कम करें। हर हफ्ते एक छोटी सी सीमा बनाएं। जैसे एक हफ्ते मिठाई को कम से कम करें, अगले हफ्ते अपने दूध, चाय, कॉफी आदि में कम से कम शकर डालना शुरू करें, कुकीज की जगह फल, योगर्ट आदि जैसी चीजों का उपयोग अधिक करें।
डायरेक्ट शुगर लेने से बचें। ऐसा करते-करते धीरे-धीरे आपकी शकर की आदत कम होती जाएगी।
पूरी तरह शकर के उपयोग को खत्म करने की बजाय हाई फाइबर और प्रोटीन वाले खाद्य को चुनें, इससे पेट लम्बे समय तक भरा रहेगा और बेवजह खाने की आदत से आप बच पाएंगे।
उदाहरण के लिए खूब सारी सब्जियां डालकर दलिया बनाएं, बजाय मीठा दलिया खाने के। इसके अलावा पैक्ड और डब्बाबंद खाद्य, सॉस, कैचअप, सलाद ड्रेसिंग या एक्स्ट्रा क्रीम वाली चीजों के सेवन से दूरी बनाएं। इन चीजों में शकर की मात्रा स्पष्ट दिखाई नहीं देती लेकिन तकलीफ देने वाली हो सकती है।
नियमित व्यायाम और फिजिकल एक्टिविटी को भी जीवन का हिस्सा बना लें। आर्टिफिशियल स्वीटनर का इस्तेमाल भी कम से कम करें। ये भले ही आपके मन को इस बात की राहत देते हों कि आप आप कम शकर खा रहे हैं, लेकिन असल में ऐसा होता नहीं।
यदि डिटॉक्स डाइट अपनानी भी हो तो जो भी खाएं उसमें भरपूर पोषण का संतुलन बनाएं। मतलब दिनभर में आपको जितनी कैलोरीज चाहिए उतनी आपके स्वस्थ भोजन से आनी चाहिए। यदि इसमें जरा सा भी असमंजस हो तो विशेषज्ञ से परामर्श लें।


Date : 28-Sep-2019

आइए एक स्थिति की कल्पना करते हैं। रेहान और निर्वाण दो भाई हैं। एक बार दोनों के बीच सच्चा प्यार करने, दिल टूटने और फिर प्यार में पड़ने को लेकर बात होती है। संवाद कुछ इस तरह है -  

रेहान इंटरनेट पर कुछ सर्फ करने में बिजी है और तभी छोटा भाई निर्वाण कमरे में प्रवेश करता है। निर्वाण कुछ उखड़ा-उखड़ा लग रहा है। वह सोफे पर बैठ जाता है।
रेहान पूछाता है, 'क्या चल रहा है भाई। तुम कुछ उदास लग रहे हो।'
निर्वाण जवाब देता, 'मुझे बात नहीं करनी।'
'क्यों?'
'मेरा दिल टूट गया है। समाइरा ने मेरा प्रपोजल ठुकरा दिया।'
'छोटी सी बात को कितना तूल दे रहा है। तुम्हारा टूटा दिल फिर जुड़ जाएगा। समाइरा को जाने दो। मुझे पक्का भरोसा है रबिहा तुम्हारा प्रपोजल मान लेगी।'
निर्वाण ने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए कहा- 'हां, फिंगर क्रॉस्ड मेरे भाई'...और रेहान भी हंस पड़ा।  
...तो आपने देखा कि दोनों युवा भाइयों ने दिल टूटने को कितनी हल्के में लिया, लेकिन यदि हम मेडिकल की भाषा में बोलें तो दिल टूटने ज्यादा दुखी बात दुनिया में कोई नहीं होती और मरीज को अस्पताल तक जाना पड़ सकता है। इसे ब्रोकन हार्ट सिंड्रॉम कहा जाता है। जानिए इसी बारे में -
ब्रोकन हार्ट सिंड्रॉम (BHS) या टाकोत्सुबो कार्डियोमयोपैथी, हार्ट की एक अस्थायी स्थिति है। ऐसा कई कारणों से हो सकता है जैसे - तनाव, बीमारी, सर्जरी या कुछ दुर्लभ मामलों में बहुत ज्यादा खुशी वाली खबर सुनने पर। मेयो क्लीनिक की वेबासाइट के अनुसार, अचानक बहुत ज्यादा पैसा मिलने से भी BHS हो सकता है।
महिलाओं में BHS की आशंका पुरुषों से ज्यादा होती है। BHS को कभी-कभी विडोहूड इफेक्ट भी कहा जाता है। दरअसल, महिलाएं अपने पार्टनर की तुलना में ज्याद साल तक जिंदा रहती हैं। जब पार्टनर दुनिया को अलविदा कह देता है तो इनका दिल टूट जाता है और ये गम में डूब जाती हैं,  इसीलिए विडोहूड इफेक्ट।
BHS में लोगों को हार्ट अटैक की तरह सीने में दर्द होता है। यही कारण है कि इसे कई बार हार्ट अटैक मान लिया जाता है, जो कि गलत है। हार्ट अटैक के विपरीत, BHS में हार्ट के एक हिस्से की पम्पिंग कुछ पल के लिए रुक जाती है, जबकि हार्ट का शेष हिस्सा सामान्य तरह से काम करता रहता है। अधिकांश लोग BHS से तेजी से उबर जाते हैं। 

अच्छी खबर, बुरी खबर
किसी प्रियजन की मृत्यु की खबर या अन्य कोई दुखद समाचार (जैसे अचानक से कैंसर होने का पता चलना), कोई  दुर्घटना, घरेलू हिंसा, हाई बी.पी या लो बी.पी होना, गहरा सदमा या यहां तक कि कोई ऐसी घटना जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर अत्यधिक तनाव हो सकता है, ये सब बीएचएस के कारण होते हैं।  
एक्सपर्ट कहते हैं कि इन हालात में, स्ट्रेस हार्मोन्स की बाढ़ आ जाती है और इसका असर रक्त धमनियों पर पड़ता है। परिणामस्वरूप हार्ट के बाएं वेंट्रिकल चैम्बर में ब्लड का आना-जान प्रभावित होता है।
सीने में दर्द और सांस फूलने जैसे BHS के लक्षणों का इलाज संभव है। कुछ दिन या हफ्तों बाद हालात सामान्य हो जाते हैं। वास्तव में BHS के शिकार लोग तेजी से रिकवर करते हैं और उनमें इसका असर लंबे समय तक नहीं रहता है।
BHS में मौत बहुत कम केस में होती है, लेकिन हार्ट फेल होने की 20 फीसदी आशंका रहती है। इसके धक्के के कारण  हार्ट की मांशपेशियां कमजोर हो जाती हैं और ब्लड पम्प करने की उनकी क्षमता खत्म हो जाती है। धड़कनो पर असर पड़ना, हायपरटेंशन और हार्ट फेल होना BHS की अन्य जटिलताएं हैं।

मत तोड़ो मेरा दिला
जिन मरीजों की किसी तरह की सर्जरी हुई है, पहले एक्सिडेंट हुआ है या घरेलू हिंसा के शिकार हुए हैं, उनमें BHS का खतरा ज्यादा रहता है। इनके अलावा तीन अन्य तरह के लोग होते हैं, जिनका दिल आसानी से टूट जाता है।
1. वे महिलाएं जो मेनोपॉज से गुजर चुकी हैं। ऐसी महिलाओं में BHS की आशंका युवा महिलाओं से ज्यादा होती है। कारण - एस्ट्रोजेन का स्तर घटना।
2. ऐसे लोग जो पहले न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर से गुजर चुके हैं। जैसे - मिरगी के मरीज और ऐसे लोग जिनके सिर में चोट लग चुकी है।
3. मानसिक रोगी, यानी डिप्रेशन और एंग्जायटी के शिकार।
तनाव के कारण BHS की नौबत आती है। इसलिए तनाव और उसके कारणों को समझें तथा रोकने का उपाय करें। ऐसी स्थिति में आमतौर पर डॉक्टर बेटा-ब्लॉकर्स या इस जैसे लंबे इलाज का सहारा लेते हैं, जो हार्ट पर स्ट्रेस हार्मोन्स के संभावित बुरे असर को रोकते हैं।
BHS को रोकने का कोई जांचा -परखा तरीका नहीं है। इसलिए खुद को शांत रखें। वही करें जो रेहान और निर्वाण ने किया था। पॉजिटिव साइड पर फोकस करें।


Date : 19-Sep-2019

शहद और दूध दोनों को अगर अलग-अलग अगर लेते हैं, तो यह जान लीजिए कि इन्हें साथ में लेना सेहत के लिए ज्यादा लाभकारी होगा। गुनगुने दूध में शहद मिलाकर लेने से कई फायदे होते हैं। आइए, आपको उन्हीं फायदों के बारे में बताए -

1 रोजाना दूध के साथ शहद मिलाकर पीना, आपकी शारीरिक और मानसिक सेहत के लिए लाभकारी है। यह दोनों प्रकार की क्षमताओं में इजाफा करने में सहायक है।
2 अगर नींद न आने या कम नींद की समस्या है, तो रातको सोते समय गर्म दूध में शहद का प्रयोग करें, इससे नींद भी बेहतर होगी और आप रिलेक्स महसूस करेंगे।
3 पाचन क्रिया को दुरुस्त करने के लिए दूध में शहद डालकर पीना एक बढ़िया उपाय है। इससे कब्ज की समस्या भी हल हो जाएगी।
4 दूध आपको प्रोटीन और कैल्शियम के अलावा कई जरूरी पोषक तत्व देता है और शहद इम्यून सिस्टम व प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है। दोनों मिलकर एक बेहतरीन सेहत विकल्प साबित होते हैं।
5 तनाव दूर करने के लिए यह बेहतरीन उपाय है। इसके अलावा हल्‍के गुनगुने दूध में शहद मि‍लाकर पीने से प्रजनन क्षमता और शुक्राणुओं की संख्या में वृद्धि होती है।

 

 


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