सेहत / फिटनेस

Date : 19-Sep-2019

शहद और दूध दोनों को अगर अलग-अलग अगर लेते हैं, तो यह जान लीजिए कि इन्हें साथ में लेना सेहत के लिए ज्यादा लाभकारी होगा। गुनगुने दूध में शहद मिलाकर लेने से कई फायदे होते हैं। आइए, आपको उन्हीं फायदों के बारे में बताए -

1 रोजाना दूध के साथ शहद मिलाकर पीना, आपकी शारीरिक और मानसिक सेहत के लिए लाभकारी है। यह दोनों प्रकार की क्षमताओं में इजाफा करने में सहायक है।
2 अगर नींद न आने या कम नींद की समस्या है, तो रातको सोते समय गर्म दूध में शहद का प्रयोग करें, इससे नींद भी बेहतर होगी और आप रिलेक्स महसूस करेंगे।
3 पाचन क्रिया को दुरुस्त करने के लिए दूध में शहद डालकर पीना एक बढ़िया उपाय है। इससे कब्ज की समस्या भी हल हो जाएगी।
4 दूध आपको प्रोटीन और कैल्शियम के अलावा कई जरूरी पोषक तत्व देता है और शहद इम्यून सिस्टम व प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है। दोनों मिलकर एक बेहतरीन सेहत विकल्प साबित होते हैं।
5 तनाव दूर करने के लिए यह बेहतरीन उपाय है। इसके अलावा हल्‍के गुनगुने दूध में शहद मि‍लाकर पीने से प्रजनन क्षमता और शुक्राणुओं की संख्या में वृद्धि होती है।

 

 


Date : 19-Sep-2019

ई-सिगरेट यानी इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट को ड्रग्स मानते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को इसे देशभर में बैन कर दिया। अब भारत के किसी भी हिस्से में ई-सिगरेट को बनाना, बेचना, इस्तेमाल करना, स्टोर करना और इनका विज्ञापन तक करना अपराध होगा। पहली बार पकड़े जाने पर 1 साल तक की सजा या 1 लाख रुपये जुर्माना या दोनों हो सकते हैं और दोबारा पकड़े गए तो 3 साल की सजा औऱ 5 लाख तक का जुर्माना हो सकता है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देशभर में खासकर युवाओं की सेहत पर ई सिगरेट के खतरनाक असर को देखते हुए इसे बैन करने का फैसला लिया है। तो आखिर ई-सिगरेट किस तरह से हमारी सेहत को नुकसान पहुंचाती है,  -सिगरेट बैटरी से चलने वाले ऐसी डिवाइस है जिनमें लिक्विड भरा रहता है। यह निकोटीन और दूसरे हानिकारक केमिकल्‍स का घोल होता है। जब कोई व्यक्ति ई-सिगरेट का कश खींचता है तो हीटिंग डिवाइस इसे गर्म करके भाप में बदल देती है। इसीलिए इसे स्‍मोकिंग की जगह vaping (वेपिंग) कहा जाता है।

दिल की बीमारी का खतरा
अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियॉलजी में छपे जर्नल के मुताबिक, ई-सिगरेट में निकोटिन की मात्रा भले ही कम हो लेकिन इसमें मौजूद फ्लेवरिंग से ब्लड वसेल के काम करने की क्षमता प्रभावित होती है जिसे दिल की बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है।

निकोटीन की लत
ई-सिगरेट में निकोटीन और दूसरे हानिकारक केमिकल्स का घोल होता है। निकोटीन अपने आप में ऐसा नशीला पदार्थ है जिसकी लत लग जाती है। इसलिए विशेषकर हृदय रोगियों को ई-सिगरेट से दूर रहना चाहिए। वैज्ञानिक शोधों में यह कहा गया है कि यह दिल की धमनियों को कमजोर भी करता है। इसकी लत पड़ जाती है इसलिए इसे छोड़ने पर विदड्रॉल सिंड्रोम और डिप्रेशन की समस्‍या हो सकती है।गर्भवती के लिए नुकसानदायक
गर्भवती महिलाओं के लिए वेपिंग बहुत खतरनाक है इससे उनके गर्भस्‍थ शिशु पर बुरा असर पड़ता है। छाटे बच्‍चों के आसपास इसे पीना ठीक नहीं क्‍योंकि हानिकारक भाप उनके दिमागी विकास पर असर डालती है।

खुशबूदार केमिकल से कैंसर की आशंका
इसमें निकोटीन के अलावा जो खुशबूदार केमिकल भरा होता है वह गर्म होने पर सांस के साथ फेफड़ों में जाता है और फेफड़ों के कैंसर की आशंका बढ़ जाती है।

दिखावे के लिए पीते हैं ज्यादातर युवा
एक सर्वे के मुताबिक ज्यादातर युवा ई-सिगरेट का सेवन दिखावे के लिए करते हैं। कई लोगों को ऐसा लगता है कि ई-सिगरेट के नुकसान कम है इसलिए वे इसका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन हकीकत ये है कि इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट भी सेहत के लिए कई तरह से नुकसानदेह है।


Date : 17-Sep-2019

दुनिया भर में हार्ट अटैक मौत के मुख्य कारणों में से एक है। कई मामलों में हार्ट अटैक से मरीज की मौके पर ही मौत हो जाती है। हालांकि, अगर सही समय पर मेडिकल हेल्प मिल जाए तो वह बच सकता है। लेकिन हार्ट अटैक के बाद हार्ट मसल्स काफी कमजोर हो जाती हैं। एक रिसर्च के अनुसार Vitamin E हार्ट अटैक से मांस-पेसियों में होने वाले नुकसान से बचा सकता है।
यह रिसर्च ऑस्ट्रेलिया के बेकर हार्ट ऐंड डायबीटीज इंस्टिट्यूट में किया गया है। रिसर्चर पीटर का कहना है कि विटमिन ई के ऐंटी-ऑक्सिडेंट और ऐंटी-इनफ्लेमेटरी गुणों की वजह से यह हार्ट की मांस-पेसियों के लिए फायदेमंद है। अभी यह रिसर्च चूहों पर की गई है। चूहों को ऐल्फा टोकोफीरोल (विटमिन ई का सबसे तेज प्रकार) दिया गया। इसके बाद उनके हार्ट पर इसका असर देखा गया।
इसमें पाया गया कि विटमिन ई देने के बाद चूहों का हार्ट फंक्शन काफी बढ़ गया। इसमें खराब हो चुके टिशू को भी ठीक करने की भी क्षमता है। अब रिसर्चर्स इंसानों पर यह रिसर्च करने का प्लान कर रहे हैं। एक रिसर्चर ने बताया है कि फिलहाल ऐसी कोई दवा उपलब्ध नहीं है जिससे हार्ट अटैक के बाद डैमेज हुए टिशू को ठीक किया जा सके। ऐसे में इस रिसर्च के बाद कार्डियॉलजिस्ट्स में नई उम्मीद जगी है।

  


Date : 17-Sep-2019

आपने अक्सर सुना होगा कि कम सोना सेहत के लिए हानिकारक है। ना केवल शारीरिक बल्कि मानसिक सेहत पर भी हमें कम या ज्यादा सोने के नुकनास झेलने पड़ते हैं। अगर आप रोज 7-8 घंटे से ज्यादा सोते हैं तब भी आपको कई तरह की समस्याओं और बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। आइए, इनमें से ही कुछ बीमारियों पर एक नजर डालते हैं...
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में हुई एक स्टडी में सामने आया है कि जो लोग हर रोज 9-10 घंटे सोते हैं, उन्हें भी नींद से जुड़ी कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। साथ ही जो लोग 7 घंटे से कम सोते हैं उन्हें भी कई हेल्थ प्रॉब्लम्स के साथ सुबह तरोताजा होकर ना उठ पाने की समस्या का सामना करना पड़ता है।
13 वर्ष पुराने एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि जो लोग बहुत अधिक सोते हैं, उनमें कम उम्र में मौत का खतरा बढ़ जाता है। अगर आपको इस आदत के साथ ही डायबिटीज या हर्ट डिजीज भी है तो यह खतरा और अधिक बढ़ जाता है।
स्टडी में सामने आया कि जो महिलाएं हर रोज 9 से 11 घंटे सोती हैं, उनमें 8 घंटे सोनेवाली महिलाओं की तुलना में कोरॉनरी हर्ट डिजीज होने का खतरा कहीं अधिक बढ़ जाता है। हालांकि इसका कारण अभी तक सामने नहीं आ पाया है। यह स्टडी 72 हजार महिलाओं पर की गई।
तय समस से अधिक सोनेवाले लोगों में सिरदर्द की शिकायत अक्सर बनी रहती है। ऐसा ब्रेन के न्यूरोट्रांसमीटर के प्रभावित होने से होता है। जो लोग दिन में अधिक सोते हैं, उनमें यह समस्या रात में सोनेवाले लोगों की तुलना में अधिक होती है।
एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि जो लोग हर दिन 9-10 घंटे या इससे भी अधिक सोते हैं, उनमें इस आदत के लगातार 6 साल तक बने रहने पर मोटापे से ग्रसित होने की संभावना 21 प्रतिशत तक अधिक होती है, उन लोगों की तुलना में जो 6 से 8 घंटे सोते हैं।
एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि जो लोग हर दिन 9-10 घंटे या इससे भी अधिक सोते हैं, उनमें इस आदत के लगातार 6 साल तक बने रहने पर मोटापे से ग्रसित होने की संभावना 21 प्रतिशत तक अधिक होती है, उन लोगों की तुलना में जो 6 से 8 घंटे सोते हैं।

 


Date : 14-Sep-2019

गेहूं को रिफाइंड करके तैयार किए जाने वाले खाद्य पदार्थों में दलिया भी शामिल है, दलिया खाने में स्वादिष्ट होने के साथ स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है। विभिन्न पोषक तत्वों से भरपूर दलिया अपने आप में संपूर्ण आहार है। आहार-विशेषज्ञ ओट्स को सुपरफूड की श्रेणी में रखते हैं और नियमित दलिया खाने की सलाह देते हैं। इसे 5 से 70 साल तक, हर उम्र के लोगों के लिए फायदेमंद माना जाता है। इसमें फाइबर की मात्रा अधिक होने के कारण यह आसानी से पच जाता है। एक स्वस्थ व्यक्ति दिन में एक कटोरी दलिया खा सकता है। बेहतर होगा कि नमकीन दलिया बनाते समय एक मुट्ठी मूंग धुली दाल और एक कटोरी पसंदीदा मिक्स सब्जियां डालकर पकाएं। इससे प्रोटीन और विटामिन प्रचुर मात्रा में मिलेंगे। नमकीन दलिया के साथ दही का सेवन ज्यादा फायदेमंद है। मीठे दलिया में दूध, ड्राई फ्रूट्स और पसंदीदा फल मिलाकर खाने से इसकी पौष्टिकता बढ़ जाती है।

  • दलिया में मौजूद फाइबर, कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट और मैग्नीशियम से डायबिटीज टाइप-2 के मरीजों में ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। ये तत्व ऐसे एंजाइम बनाते हैं, जिनकी वजह से भोजन धीरे-धीरे पचता है। इससे ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है। यह रक्त में ग्लूकोज को कम मात्रा में रिलीज करता है और इंसुलिन के स्तर को नियंत्रित रखता है।
  • फैट फ्री या लो कैलरी वाला दलिया ऊर्जा का अच्छा स्रोत है। दलिया में मौजूद प्रोटीन और विटामिन पूरे दिन आपको ऊर्जावान बनाए रखने में मदद करते हैं। इसलिए आहार विशेषज्ञ नाश्ते में एक कटोरी दलिया के सेवन को सेहत के लिहाज से फायदेमंद मानते हैं।
  • प्रतिरोधक क्षमता सुधारे – दलिया में मौजूद फाइबर आसानी से अवशोषित हो जाता है, जो व्हाइट ब्लड सेल्स को मजबूत बनाता है। इससे प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनती है। दलिया से मिलने वाले मैग्नीशियम, सेलिनियम और जिंक शरीर को संक्रमण से लड़ने में मदद करते हैं। सुपाच्य गुणों के कारण मरीजों को दलिया खाने की सलाह दी जाती है।
  • वजन को रखे नियंत्रित – वसा रहित व कम कैलरी वाला होने के कारण दलिया वजन को नियंत्रित रखता है। गेहूं से बना दलिया फाइबर, कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। नियमित रूप से दलिया का सेवन करने से पेट देर तक भरे होने का एहसास कराता है।
  • दांतों को दे मजबूती- दलिया में कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस आदि भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो हमारी हड्डियों और दांतों के स्वास्थ्य के लिए मददगार साबित होते हैं। नियमित रूप से दलिया खाने से शरीर को भरपूर पोषण मिलता है। बढ़ती उम्र में हड्डियों की कमजोरी और जोड़ों में दर्द होने की आशंका बढ़ जाती है, जिसे नियंत्रित रखने के लिए दलिये का सेवन कर सकते हैं।
  • एनीमिया से बचाए- इसमें मौजूद प्रोटीन, आयरन, मैग्नीशियम शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को बनाए रखते हैं। इससे शरीर में खून की कमी यानी एनीमिया की आशंका नहीं रहती।
  • बॉडी बिल्डिंग में सहायक- दूध मिलाकर बनाया गया मीठा दलिया प्रोटीन से भरपूर होता है, जो बॉडी बिल्डिंग के शौकीनों के लिए फायदेमंद होता है। प्रोटीन शरीर के विकास और मसल्स के निर्माण के अलावा शरीर को मजबूती प्रदान करने में मदद करता है।
  • त्वचा को बनाए खूबसूरत- दलिया में मौजूद विटामिन बी मेटाबॉलिज्म को ठीक रखने में मदद करता है। यह त्वचा और बालों को स्वस्थ बनाता है। इसे दूध में मिलाकर त्वचा पर स्क्रब करने से रूखी या बेजान त्वचा में चमक आ जाती है। इसका फेसपैक लगाने से त्वचा मुलायम और खूबसूरत होती है।
  • दलिए में मौजूद एंटी-ऑक्‍सीडेंट तत्व शरीर को डिटॉक्सीफाई करने में मदद करते हैं, जिससे शरीर के सभी कार्य सुचारू रूप से चलते हैं और इससे मेटाबॉलिज्म भी तेज होता है, जो वेट लूज के लिए बहुत जरूर है।
  • रोजाना दलिया खाने से कॉर्डियोवैस्कुलर बीमारियां दूर रहती हैं। साथ ही इसमें घुलनशीन और अघुलनशील दोनों तरह के फाइबर होते हैं, जो कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल करते हैं। इसके अलावा दलिया धमनियों को ब्लॉक होने से बचाता है और रक्त के प्रवाह को बेहतर बनाता है।
  • आयरन की मात्रा कम होने से शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर भी कम हो जाता है। मगर रोजाना 1 कटोरी दलिया खाने से शरीर में आयरन की कमी नहीं होती। इसके अलावा दलिया खाने से शरीर का तापमान भी मेंटेन रहता है।
  • कब और कैसे करें दलिया का सेवन?
  • सुबह के समय दलिया खाने से सारा दिन शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है, इसे अलावा शरीर में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए नाश्ते में खाया गया दलिया बहुत फायदेमंद साबित होता है। नमकीन दल‍िया को सब्जियों के साथ बनाया जाता है तो कुछ लोग इसे मीठा भी पसंद करते हैं। वैसे चीनी की जगह दल‍िया को स‍िर्फ दूध के साथ भी लिया जा सकता है।
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Date : 14-Sep-2019

गेहूं आम भारतीय परिवारों का मुख्य आहार है, खासकर उत्तर भारत में। इसको पीसकर इसके आटे से गरमागरम चपातियाँ व दूसरे तमाम व्यंजन तो बनाए ही जाते हैं, इसका अपना अलग औषधीय महत्व भी होता है तथा चिकित्सा जगत में इसके औषधीय प्रयोग भी किए जाते हैं। गेहूँ का वानस्पतिक नाम ट्रेइटीकम सैटाइवम (Triticum sativum) है। गेहूं में 68 से 70% तक कार्बोहाइड्रेट, 8 से 24% तक प्रोटीन तथा 1 से 2% वसा एवं 1.5 से 2% तक राख़ होती है। गेहूँ के दाने कड़े या मुलायम और सफेद या या लाल होते हैं। कड़े दाने वाले गेहूं में प्रोटीन अधिक और स्टार्च कम होता है। खाने के लिए कड़े दाने वाले गेहूं का उपयोग किया जाता है और सफेद गेहूँ अच्छा समझा जाता है। गेहूँ के चोकर में लौह, कैल्सियम, फॉस्फोरस, पोटेशियम, मैग्नीशियम आदि खनिज पदार्थ पाये जाते हैं। इसीलिए गेहूँ के आटे की अपेक्षा उसके चोकर का या चोकर सहित आटे का चिकित्सा में अधिक महत्व है जिसे सामान्यतः लोग आटे से छानकर अलग करके पशुओं को खिला देते हैं।

  • गेहूं के आटे का चोकर विशेष रूप से कब्ज आदि की शिकायत में अत्यन्त लाभप्रद सिद्ध होता है। चोकर की रोटी बनवाकर खाने से कब्ज में आराम मिलता है।
  • बवासीर के रोगी के लिए भी चोकर की रोटी फायदेमन्द रहती है।
  • पेचिश आदि की शिकायत में भी चोकर की रोटी फायदा करती है।
  • त्वचा की सफाई व स्नान आदि में भी महिलाएँ गेहूं के आटे का प्रयोग करती हैं। इसे उबटन के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।
  • जलने पर गेहूं के आटे को गूँथ कर जले हुए स्थान पर लगाने से फफोले पड़ने की संभावनाएँ घट जाती हैं, और तीव्र जलन से भी आराम मिलता है।
  • नया पैदा हुआ गेहूं थोड़ा गरम होता है। यह दस्तावर भी होता है। इसलिए इसे धोकर इस्तेमाल करना चाहिए।
  • शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति यदि रोजाना तीन-चार गिलास गेहूं की पत्तियों का रस पीएं, तो वह जल्दी ही हष्ट-पुष्ट हो सकता है।
  • गेहूं के अंकुरित दानों को चबाने से मुंह की दुर्गन्ध तो दूर होती ही है, दांत और मसूढ़े भी इससे मजबूत होते हैं।
  • शारीरिक श्रम करने वालों को इसका सेवन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यह काफी ऊर्जा देता है।
  • गेहूं के आटे की पुल्टिश बांधने से फोड़ा-फुन्सी आसानी से फूट जाते हैं और रोगी को पीड़ा का सामना नहीं करना पड़ता है।
  • मन्दाग्नि या भूख कम लगना – गेहूँ के चोकर युक्त आटे में अजवायन और हल्का-सा नमक डालकर बनायी गयी रोटियां भुनी हुई हींग से युक्त सब्जी के सूप या साबुत मूंग की दाल के साथ खाने से भूख खुलकर लगने लगती है।
  • गला खराब होना- एक कटोरी पानी में एक मुट्ठी गेहूं का चोकर डालकर कटोरी पर ढक्कन लगा कर इसे उबालें। फिर इसमें दूध और चीनी मिला लें। इसे चाय की तरह पूंट-घूट पीने से गला ठीक हो जाता है और आवाज साफ निकलने लगती है।
  • खांसी- एक सप्ताह तक सुबह-दोपहर-शाम दिन में तीन बार एक-एक कप गेहूँ की चाय बनाकर रोगी को पिलाने से सूखी और तर दोनों प्रकार की खांसी दूर हो जायेगी। गेहूं की एक कप चाय बनाने के लिए 15 ग्राम दलिया, जरा-सा सेंधा नमक 250 ग्राम पानी में उबालें । 50-60 ग्राम पानी शेष रह जाने पर उसमें एक चम्मच शहद और एक चम्मच दूध मिला देने से एक कप गेहूँ की चाय तैयार हो जाती है।
  • ज्वर- रोगी को औषधि के रूप में सुबह दोपहर शाम आधा-आधा गिलास गेहूं घास का रस पिलाते रहने एवं भोजन के रूप में छिलकों सहित मूंग की पतली दाल में हल्का-सा नमक मिलाकर खिलाते रहने से बुखार के रोगी को लाभ मिलता है |
  • गेहूं की रोटी को एक ओर सेंक लें और दूसरी ओर कच्ची रखें। कच्ची ओर तिल का तेल लगाकर उसे दर्द वाले स्थान पर बांध दें। इससे दर्द दूर हो जायेगा।
  • गठिया- रोगी को सुबह-शाम 30-30 ग्राम गेहूँ-घास का रस पिलाते रहने तथा भोजन के रूप में सोयाबीन से तैयार दूध और रोटी खिलाते रहने से कुछ ही दिनों में गठिया रोग से राहत मिलती है ।
  • पेशाब में जलन – रात को 15 ग्राम गेहूं 250 ग्राम पानी में भिगोकर रख दें। सुबह इसे छान कर पानी में 25 ग्राम मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब की जलन दूर हो जाती है।
  • स्तनों की सूजन, इसे आम भाषा में थनैला कहा जाता है जिसमें दर्द भी होता है। चोकर को थोड़े से सिरके में पकाकर इसके सहने योग्य गर्म रह जाने पर स्तनों पर इसका लेप करते हैं। लेप सुख जाने पर स्तनों को गर्म पानी से ही धोयें और स्तनों पर पुनः लेप चढ़ा कर पट्टी बांध दे। दो-तीन लेपों से ही सूजन उतर जाती है और दर्द दूर हो जाता है।
  • सूजन- मुट्ठी भर गेहूं थोड़े अधिक पानी में डालकर उबालें । इस गर्म-गर्म पानी से सूजन वाली जगह को दिन में दो-तीन बार सेंकने से सूजन बहुत कम हो जाती है।
  • मोच आना -गेहूँ के आटे और हल्दी को तेल में भूनकर पुल्टिस बनाकर मोच वाले भाग पर बांध देने से मोच में बहुत लाभ पहुंचता है।
  • हड्डी टूट जाना -गेहूं के चोकर के हलवे में गुड़ मिलाकर खाने से टूटी हड्डी जल्दी जुडती है।
  • मुंहासे -एक सप्ताह तक सोने से पहले 1 से 2 चाय की चम्मच भर गेहूं के चोकर के पानी से चेहरे की धुलाई करने से मुंहासे मिट जाएंगे और चेहरा निखर आयेगा।
  • आग से जल जाने पर- गेहूं का आटा गूंथ कर उसका जले हुए स्थान पर लेप करने से अथवा गेहूं-घास के रस में साफ कपड़े की पट्टी तर करके उसे जले हुए स्थान पर लपेट देने से जलन शान्त होती है, दर्द दूर होता है और जख्म शीघ्र ही भरने लगता है। गेहूं-घास के रस से तर रखने के लिए दिन में 2-3 बार पट्टी बदल देनी चाहिए।
  • चर्म रोगों में : गेहूँ के दानों को तवे पर खूब अच्छी तरह भून लें, जब वे राख की तरह हो जाएँ तो इन्हें खरल में खूब बारीक पीस लें। इस बारीक राख को शुद्ध सरसों के तेल में अच्छी तरह मिलाकर पीडित स्थान पर लगाएँ, इसके लगातार प्रयोग से कई पुराने चर्मरोग भी ठीक हो जाते हैं।
  • उत्तम पाचन के लिए : गेहूँ का थोड़ा-मोटा आटा (चोकर सहित) गूंधकर एक घंटा तक रख छोड़े, फिर इस आटे की रोटियाँ बनाकर सब्जी, दाल या दही आदि के साथ खाएँ तो खाना जल्दी पच जाता है, पेट में अपच या गैस नहीं बनती है। पेट में कब्ज भी नहीं बनती है।
  • जोड़ों का दर्द : गेहूँ को तवे पर खूब भून लें, इसे पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से 10 ग्राम राख रोजाना सुबह शहद के साथ चाटें। इसके सेवन से टूटी हड्डी जुड़ने में मदद मिलती है। कमर तथा जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है।
  • कीट-दंश के लिए : कोई जहरीला कीट या ततैया, मधु मक्खी आदि काट ले तो गेहूं के आटे में सिरका मिलाकर प्रभावित स्थान पर आटे का लेप कर दें तो सूजन व दर्द कम हो जायेगा |
  • निम्नलिखित विधियों द्वारा गेहूं के चोकर का हलवा या बर्फी बनाकर इसे चिकित्सीय उपयोग में लाया जा सकता है।
  • चोकर का हलवा – 250 ग्राम गेहूं के चोकर को पानी में डालकर डेढ़-दो घण्टों के लिए रख दें। फिर इसे हाथों में मसलकर फिर से छानकर कुछ देर के लिए ढक कर रख दें जिससे यह गाढ़ा होकर नीचे तली में बैठ जाए। अब पानी को निथार कर अलग कर दें और तली में बैठे गाढ़े सत्त्व में बूरा या चीनी मिला कर भून लें। इसमें पानी मिलाने की आवश्यकता होने पर निथारा हुआ पानी ही मिलाएं, बस चोकर का हलवा तैयार हो जाता है।
  • चोकर की बर्फी – चोकर का लेई-जैसा हलवा घी से चुपड़ी थाली में फैलाकर उस पर छोटी इलायची का चूरा बुरक कर ठण्डा होने के लिए रख दें। ठण्डा होने पर इसे बर्फी के समान टुकड़ों में काट लें।

Date : 09-Sep-2019

हमारी जिंदगी को मायने देते हैं रिश्ते। जिंदगी को जिंदगी होने का अहसास कराते हैं रिश्ते। जिंदगी में कुछ इस तरह रच बस जाते हैं ये हैं ये रिश्ते कि जिंदगी का पर्याय बन जाते हैं। देखा जाए तो, जिंदगी रिश्तों के ताने-बाने के सिवाय और है ही क्या। और इस फिर अगर रिश्तों का असर हमारी सेहत पर पड़ने लगे, तो हैरानी कैसी।
हमारे जीवन में रिश्तों की काफी अहमियत होती है। रिश्ते हमारी जिंदगी को पूर्ण बनाते हैं। लेकिन, रिश्ते अगर ठीक न चल रहे हों तो उसका असर हमारी सेहत पर भी नजर आने लगता है। यहां रिश्ते हमें मजबूत बनाने की बजाए हमारी तबीयत को नुकसान पहुंचाने लगते हैं। कोई रिश्ता परफेक्ट नहीं होता, उनमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। लेकिन, रिश्तों में अगर परेशानियां आने लगें तो इसका असर हमारे मानिसक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ने लगता है।
कई शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि मजबूत रिश्ता किसी इनसान को बीमारियों से बचाने का काम करता है। जब इनसान किसी मजबूत रिश्तों में होता है तो वह सेहतमंद आदतें अपनाने के लिए प्रेरित होता है। इसका सकारात्मतक असर उसकी उम्र पर भी होता है। वहीं रिश्तों की परेशानियां व्यक्ति का मानसिक तनाव बढ़ा देती हैं। इसका प्रभाव आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है। मनोवैज्ञानिक मेरिएन त्रोइनी के अनुसार ऐसी कई सारे कारण है जिसका असर हमारी सेहत पर पड़ता है, जैसे हमारा एक दूसरे के प्रति व्यवहार या एक दूसरे की आदतें। इसलिए अगर आप किसी को डेट कर रहे हैं, किसी रिश्ते में जुड़ने जा रहे हैं या शादीशुदा हैं तो कुछ खास बातों का विशेष खयाल रखें।
अवसाद की समस्या
अगर किसी वजह से रिश्ते। अपनी मनचाही मंजिल तक नहीं पहुंच पाते तो इसके चलते कई लोग अवसाद का‍ शिकार हो जाते हैं। ब्रिटेन में हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में स्पष्ट हुआ है कि कम उम्र के पुरुष इतने मजबूत नहीं होते कि वे असफल रिश्तों का दर्द सकें।

वजन में बढ़ोत्तरी
रिश्तों में तनाव आपके वजन को प्रभावित करता है। साल 2012 में किए गए एक सर्वे के मुताबिक जो लोग अपनी शादी से खुश थे उनमें वजन की बढ़ोत्तरी देखी गई और लेकिन जब उन्हीं लोगों की शादी मुश्किल में पड़ी तो उनके वजन में गिरावट दर्ज की गई। क्योंकि जब आप खुश रहते हैं तो अच्छे आदतों को अपनातें हैं और रिश्तों में तनाव व असंतुष्ट होने पर खाने व सोने की आदतों में बदलाव के कराण वजन बढ़ने लगता है।

तनाव व बैचेनी
आलिंगन प्यार जताने का सबसे अच्छा तरीका माना जाता है। विएना विश्वविद्यालय के शोध में इसके इसके स्वास्थ्य संबंधी फायदे भी सामने आए हैं । यह तनाव कम करने में मददगार है। शोध के मुताबिक जब आप अपने साथी को गले लगाते हैं, तो इससे रक्त में एक हार्मोन ऑक्सीटोसिन का स्राव होता है। इससे उच्च रक्तचाप में कमी आती है, तनाव और बेचैनी कम होती है और इससे आपकी स्मरण शक्ति भी बेहतर होती है।

ब्लड प्रेशर पर असर
उचित खान-पान ना होना, हमेशा तनावग्रस्त रहने के असर आपके ब्लड प्रेशर पर पड़ सकता है। बिर्घम यंग यूनिवर्सिटी शोधोंकर्ताओं के मुताबिक खुशहाल शादीशुदा लोगों में परेशान शादीशुदा लोगों के मुकाबले रक्तचाप की शिकायत कम होती है। रिश्तों में तनाव के कारण हमारे शरीर से स्ट्रेस हार्मोंन निकलते हैं और हृदय गति बढ़ जाती है जिसकी वजह से बल्ड प्रेशर बढ़ सकता है।

हृदय स्वास्थ्य
शादीशुदा जिंदगी में खुशी रहने से खासतौर से पुरुषों में हृदय संबंधी रोगों से मुक्ति मिलती है। अगर आप रिश्तों में किसी तरह का तनाव झेल रहें हैं तो हार्ट अटैक की संभावना बढ़ जाती है। अमेरिकन जर्नल साइकोमैटिक मेडिसीन, 2007 के मुताबिक रिश्तों में लंबे समय तक चलने वाली तकरार कई हृदय समस्याओं का कारण बन सकती है। जिसमें हार्ट अटैक भी शामिल है।

कैंसर रोग से निजात
साल 2009 में 38 लाख कैंसर रोगियों पर किए गए अध्ययन के मुताबिक खुशहाल शादीशुदा लोग कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ने में ज्यादा सक्षम होते हैं। जो लोग एकेले जीवन व्यतीत करते हैं उनमें यह क्षमता कम पाई जाती हैं। तनाव व अलगाव का नकारात्मक असर उनके शरीर पर देखा जा सकता है।


Date : 09-Sep-2019

नई दिल्ली : ग्रीन टी को स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है. बदलती लाइफस्टाइल को काम के बढ़ते दवाब के बीच पिछले कुछ सालों में ग्रीन टी पीने का चलन तेजी से बढ़ा है. एक नियत मात्रा में प्रतिदिन ग्रीन टी का सेवन आपकी सेहत के लिए कई तरह से फायदेमंद रहता है. कई शोध में भी ग्रीन टी सेहत के लिए फायदेमंद बताई गई है. जरूरत से ज्यादा ग्रीन टी आपके शरीर को नुकसान भी पहुंचा सकती है, इसलिए जरूरी है कि आप अधिक मात्रा में ग्रीन टी का सेवन नहीं करें. शायद आप ग्रीन टी पीने से होने वाले असली फायदों के बारों में नहीं जानते हो. आगे जानिए ग्रीन पीने से होने वाले फायदों के बारे में.

त्वचा में चमक
शायद ही आपको पता हो कि ग्रीन टी में एंटी एजिंग तत्व पाया जाता है, इसका सेवन करने से चेहरे की झुर्रियां कम होती है. इसके साथ ही आपके चेहरे पर हमेशा चमक और ताजगी बनी रहती है. इसके अलावा इसे पीने से आप चुस्त-दुरुस्त रहते हैं.

मानसिक शांति
यदि आप कुछ काम करने के बाद मानसिक रूप से थकान महसूस करने लगते हैं तो ग्रीन टी आपके लिए अच्छी रहेगी. ग्रीन टी में थेनाइन तत्व होता है, जिसमें एमिनो एसिड बनता है. एमिनो एसिड शरीर में ताजगी बनाए रखता है और आपको थकावट महसूस नहीं होती. जिससे आपको हमेशा मानसिक शांति मिलती है.
दांतों के लिए वरदान
आजकल युवा और बुजुर्गों में दांतों में पायरिया और केविटी की समस्या तेजी से बढ़ रही है. ग्रीन टी में पाया जाने वाले कैफीन दांतों में लगे कीटाणुओं को मारने में सक्षम होता है. बैक्टीरिया कम होने से आपके दांत लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं.

नॉर्मल ब्लडप्रेशर
भागदौड़ भरी जिंदगी और ऑफिस की टेंशन के बीच उच्च रक्तचाप की परेशानी तेजी से बढ़ी है. उच्च रक्तचाप शरीर में अन्य कई बीमारियों का कारण हो सकता है. इसलिए यदि आपको ब्लड प्रेशर की समस्या है तो ग्रीन टी पिए. इसे पीने से आपकी यह परेशानी नॉर्मल रहेगा. रक्तचाप सामान्य रहने से आपको गुस्सा भी नहीं आएगा.

कोलेस्ट्रॉल घटाएं
दिल के रोगियों के लिए ग्रीनटी का सेवन बहुत फायदेमंद साबित होता है. ग्रीन टी शरीर में बेड कोलेस्ट्रॉल को कम करके गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मददगार होती है. यदि आप ऑयली भोजन करते हैं तो आपको नियमित रूप से ग्रीन टी का सेवन करना चाहिए.

त्वचा में चमक
शायद ही आपको पता हो कि ग्रीन टी में एंटी एजिंग तत्व पाया जाता है, इसका सेवन करने से चेहरे की झुर्रियां कम होती है. इसके साथ ही आपके चेहरे पर हमेशा चमक और ताजगी बनी रहती है. इसके अलावा इसे पीने से आप चुस्त-दुरुस्त रहते हैं.

मानसिक शांति
यदि आप कुछ काम करने के बाद मानसिक रूप से थकान महसूस करने लगते हैं तो ग्रीन टी आपके लिए अच्छी रहेगी. ग्रीन टी में थेनाइन तत्व होता है, जिसमें एमिनो एसिड बनता है. एमिनो एसिड शरीर में ताजगी बनाए रखता है और आपको थकावट महसूस नहीं होती. जिससे आपको हमेशा मानसिक शांति मिलती है.

दांतों के लिए वरदान
आजकल युवा और बुजुर्गों में दांतों में पायरिया और केविटी की समस्या तेजी से बढ़ रही है. ग्रीन टी में पाया जाने वाले कैफीन दांतों में लगे कीटाणुओं को मारने में सक्षम होता है. बैक्टीरिया कम होने से आपके दांत लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं.

नॉर्मल ब्लडप्रेशर
भागदौड़ भरी जिंदगी और ऑफिस की टेंशन के बीच उच्च रक्तचाप की परेशानी तेजी से बढ़ी है. उच्च रक्तचाप शरीर में अन्य कई बीमारियों का कारण हो सकता है. इसलिए यदि आपको ब्लड प्रेशर की समस्या है तो ग्रीन टी पिए. इसे पीने से आपकी यह परेशानी नॉर्मल रहेगा. रक्तचाप सामान्य रहने से आपको गुस्सा भी नहीं आएगा.

कोलेस्ट्रॉल घटाएं
दिल के रोगियों के लिए ग्रीनटी का सेवन बहुत फायदेमंद साबित होता है. ग्रीन टी शरीर में बेड कोलेस्ट्रॉल को कम करके गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मददगार होती है. यदि आप ऑयली भोजन करते हैं तो आपको नियमित रूप से ग्रीन टी का सेवन करना चाहिए.

डायबिटीज में फायदेमंद
यदि आपके शरीर में शुगर लेवल बढ़ रहा है तो ग्रीन टी का सेवन आपको बहुत फायदा पहुंचाएगा. इसके अलावा जिन रोगियों को डायबिटीज की दिक्कत हैं तो उन्हें प्रतिदिन सुबह उठकर एक कप ग्रीन टी पीनी चाहिए. इससे आपके शरीर में मौजूद शुगर का लेवल कंट्रोल में रहेगा. मधुमेह रोगियों को भोजन के बाद ग्रीन टी का सेवन करना चाहिए.

वजन कम करें
वजन कम करने में ग्रीन टी काफी हद तक सहायक है. ग्रीन टी पीने से आपके शरीर का मेटाबॉलिज्म बढ़ता है, जिससे पाचन क्रिया संतुलित रहती है. ऐसा होने से व्यक्ति का अतिरिक्त वजन कम होता है.

 


Date : 07-Sep-2019

आज हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी बात को लेकर तनाव में रहता है। अगर कहा जाए कि व्यक्ति के तनाव के पीछे समस्याओं से ज्यादा उसका खान-पान जिम्मेदार है तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। जी हां, आजकल लोग पोषण से ज्यादा स्वाद के लिए भोजन करते हैं। जबकि व्यक्ति का आहार ऐसा होना चाहिए जो उसके शारीरिक विकास के साथ-साथ उसके  मानसिक पोषण का भी ध्यान रखें। ऐसा इसलिए क्योंकि आप जिस तरह का भोजन करेंगे वैसी ही आपकी दिमागी सेहत होगी। तो आइए आपको बताते हैं 5 ऐसे सुपर फूड जो आपकी दिमागी सेहत का ध्यान रखते हुए आपको स्ट्रेस से रखेंगे कोसों दूर।    

खूब पानी पिएं-
आपको तनाव दूर करने के लिए सबसे पहले पानी पीने की आदत डालनी होगी। व्यक्ति को दिनभर में कम से कम 8 गिलास पानी पीना चाहिए। ऐसा करने से शरीर में डिहाइड्रेशन की समस्या नहीं होती है। हाल ही में हुए एक शोध में भी यह पाया गया कि डिहाइड्रेशन व्यक्ति के मेंटल कॉन्सेंट्रेशन लेवल को बिगाड़ देता है।

नाश्ता ना भूलना-
सुबह का नाश्ता शरीर के मेटाबॉलिज्म को बनाए रखने का काम करता है। सेहत से जुड़े एक शोध में बताया गया है कि जो लोग सुबह का नाश्ता किसी मिस नहीं करते हैं उनमें न करने वालों की तुलना में डिप्रेशन की संभावना 30 प्रतिशत तक कम होती है।

विटामिन डी-
विटामिन डी दिमाग और शरीर दोनों को पोषण देने का काम करता है। जिसकी वजह से व्यक्ति को डिप्रेशन यानि मानसिक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता। मनोविशेषज्ञों ने पाया है कि विटामिन डी जिन लोगों में कम होता है, उनमें डिप्रेशन ज्यादा पाया जाता है। जबकि इसकी जरुरतभर भर मात्रा लेने वाले लोगों में डिप्रेशन कम होता है। विटामिन डी का सबसे अच्छा स्रोत सूरज की किरणें हैं। हफ्ते में दो बार 30 मिनट सूरज के सामने खड़े रहने से आपको इसका लाभ मिल सकेगा। 

ओमेगा 3-
मूड लिफ्टिंग से परेशान लोगों को अपनी डाइट में ऐसी चीजों को शामिल करना चाहिए जिसमें ओमेगा 3 फैटी एसिड पाया जाता हो। ओमेगा 3 फैटी एसिड अवसाद के इलाज के लिये कारगर है। ये न व्यक्ति का अवसाद दूर करता है बल्कि अस्थमा और गठिया को भी ठीक करने का काम करता है। मछली, अखरोट, अलसी के बीज, ऑलिव ऑयल और गाढ़े हरे रंग की पत्तेदार सब्जियों में ओमेगा 3 फैटी एसिड काफी मात्रा में पाया जाता हैं। 

कैफीन की मात्रा कम करें-
तनाव को लाइफ से दूर भगाने के लिए आपको कैफिन से दोस्ती तोड़नी होगी। जी हां कैफीन उन लोगों में पैनिक अटैक की संभावना को बढ़ा देता है, जिनको ऐंग्जाइटी डिसऑर्डर है। 

 

 

 


Date : 07-Sep-2019

स्तनपान यानि कि ब्रेस्‍टफीडिंग मां और बच्‍चे दोनों के स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़ी है। इसलिए कभी भी स्‍तनपान करवाना अचानक छुड़ाना मां व बच्चे दोनो की सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए हमेशा इस बारे में डाक्टर या घर में मौजूद बड़े जानकारों से सलाह जरूर ले लेनी चाहिए। इससे स्तन में गाँठ, सूजन या ब्रेस्‍ट इंफेक्‍शन जैसी समस्या हो सकती है। इसलिए धीरे-धीरे बच्‍चे को हल्‍के खाने के साथ दूध की मात्रा कम करते हुए सुनियोजित तरीके से दूध छुड़ाना शुरू करें। स्तनपान माँ एवं उसके बच्चे के बीच के सम्बन्ध को और गहरा बनाता है और यह एक एकदम से छुड़वाना दोनों के मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर भी प्रभाव भी डाल सकता है। स्तनपान छुड़ाने में धैर्य से काम लें।

अगर आपका बच्चा 6 महीने से ऊपर का हो चुका है तो उसे स्तनपान कराना कम कर दे। ऐसे में बच्चे की भूख बढ़ने लगती है। स्तनपान कराने के साथ साथ अन्य तरल पदार्थों को देना भी शुरू कर दें। इससे बच्चे को जरूरी पोषण भी मिलता रहेगा और स्तनपान को छुड़ाने में भी मदद मिलेगी। अगर आप बच्चे को दिन में 6 बार स्तनपान कराती है तो कम से कम 2 बार अन्य भोजन दे। 6 से 7 महीने पर बच्चों के दांत आना शुरू हो जाते है। तब आप स्तनपान के साथ साथ चबाने में आसान और सुपाच्य  हो। बच्चे को विभिन्न स्वादों और प्रकारों से अवगत कराएं, ताकि उसे माँ के दूध के अलावा दूसरे तरह के भोजन में भी दिलचस्पी हो।

स्तनपान छुड़ाने की शुरूआत रात के समय से करें। दिन में अच्छे ये एक बार स्तनपान करा दें। रात में बच्चे के सोने से पहले उसे ठीक तरह से खाना खिलाए ताकि वह स्तनपान ना कर सके। रात में स्तनपान करना बच्चों की आदत होती है, ऐसे में उसे बहलाने की कोशिश करें। बच्चा जब 6 माह का होता है तो यह माँ का दूध छुड़ाने का सबसे सही समय होता है, इसके बाद भी यदि आप पिलाती हैं तो बच्चे के माँ का दूध पीने की अधिकतम उम्र डेढ़ वर्ष होती है।

बच्चे को केला, गले चावल, उबली दाल,दूध के साथ खिचड़ी आदि खिलाना शूरू कर सकते है। सेब का छिलका उतार कर उसको मसल कर खिलाए। बच्चों की डाइट के बारे में एक बार डॉक्टर्स से भी जानकारी जरूर ले लें।

अगर आप किसी तरह का मेडिकेशन ले रही है तो बेहतर है कि बच्चे का दूध जल्द से जल्द छुड़ा दे। क्योंकि स्तनपान के जरिए आपकी दवाई का प्रभाव बच्चे पर भी पड़ता है। साथ ही अगर आप नौकरी करती है तो भी आपको स्तनपान जल्दी बंद कराकर आहार देने की आदत डाले। ताकि आपकी अनुपस्थिति में बच्चा भूखा ना रहें।

 


Date : 04-Sep-2019

नई दिल्ली: आमतौर पर स्मार्टफोन के उपयोग के नकारात्मक प्रभावों के बारे में लोगों को बात करते देखा जाता है, लेकिन हाल ही में शोधकर्ताओं ने कुछ ऐसा पाया है जिसके मुताबिक टीनएजर्स का अपने फोन पर या ऑनलाइन वक्त बिताना मानसिक स्वास्थ्य के लिए उतना भी बुरा नहीं है. नॉर्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर माइकेलिन जेन्सन ने कहा है, "आम धारणा के विपरीत कि स्मार्टफोन और सोशल मीडिया युवक-युवतियों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है, हम इस विचार के लिए ज्यादा सपोर्ट नहीं देख रहे हैं कि फोन और ऑनलाइन बिताए गए वक्त का संबंध मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़े जोखिम से है."
क्लिनिकल साइकोलॉजिकल साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 10 से 15 साल तक के उम्र के बीच 2,000 से अधिक टीनएजर्स पर परीक्षण किया. शोधकर्ताओं ने दिन में तीन बार इन किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित लक्षणों के रिपोर्ट को इकट्ठा किया और इसके साथ ही हर रोज वे फोन या ऑनलाइन जितना समय बिताते थे उसके बारे में भी रात को रिपोर्ट तैयार किया जाता था.इन रिपोर्ट को जब बाद में देखा गया तो शोधकर्ताओं ने पाया कि डिजिटल तकनीक के अत्यधिक उपयोग का संबंध खराब मानसिक स्वास्थ्य से नहीं है. शोधकर्ताओं ने कहा कि रिपोर्ट में जिन युवाओं के अधिक टेक्सट मैसेज भेजने की सूचना मिली वे उन युवाओं की तुलना में अच्छा महसूस कर रहे थे जिन्होंने कम मैसेज भेजा. तकनीक के अत्यधिक उपयोग के खिलाफ सलाह देते हुए विशेषज्ञों ने इसका उपयोग जिम्मेदारी के साथ करने पर जोर दिया.
मनोवैज्ञानिक और नोएडा में फोर्टिस मेंटल हेल्थ प्रोग्राम के निदेशक समीर पारेख के मुताबिक, एक युवा की जिंदगी इनडोर और आउटडोर गतिविधियों के साथ अच्छी तरह से संतुलित होना चाहिए और पढ़ाई व मस्ती के बीच भी संतुलन का होना बेहद आवश्यक है. "टीवी, इंटरनेट, सोशल मीडिया का इस्तेमाल लिमिट में किया जाना आवश्यक है और यह कभी भी दोस्तों से बातचीत, फैमिली टाइम, खेल या पढ़ाई पर भारी नहीं पड़ना चाहिए. इनमें संतुलन होना चाहिए. दोस्तों से बात करने के लिए फोन का इस्तेमाल करना अच्छा है, लेकिन छात्रों को सामने से मिलकर दोस्तों से बात करने को भी महत्व देना चाहिए."
शरीर ही नहीं दिमाग के लिए भी जहर है शराब, पुरुषों से ज्यादा महिलाओं के लिए हानिकारक
उन्होंने आगे कहा, "सोशल मीडिया का इस्तेमाल सकारात्मकता के साथ विचारों को व्यक्त करने के लिए किया जा सकता है. इसके साथ ही सोशल मीडिया से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए बच्चों को कुछ स्किल्स की जानकारी होना चाहिए." बड़ों को एक बेहतर रोल मॉडल बनकर बच्चों के समग्र जीवनशैली को एक बेहतर रूप देने में उनकी मदद करनी चाहिए.

 


Date : 04-Sep-2019

डायबिटीज एक क्रॉनिक व मेटाबॉलिक विकार है, जो दो तरह का होता है टाइप-1 और टाइप-2। यह ब्लड शुगर के हाई व लो लेवल को दर्शाता है। हालांकि सबसे आम टाइप 2 डायबिटीज है, जो आजकल काफी देखने को मिल रहा है। यह तब होता है जब शरीर में पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बनाता है। वहीं टाइप 1 डायबिटीज में अग्न्याशय खुद से बहुत कम मात्रा में या इंसुलिन पैदा ही नहीं करता है। 
लोगों में बढ़ रही है डायबिटीज की समस्या
अध्ययन के अनुसार, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और थायराइड की समस्‍या लोगों में चरम पर हैं, 2017 से 2018 तक, 45 साल से कम उम्र के लोगों में डायबिटीज 40 प्रतिशत तक बढ़ गया है, और इसी अवधि में कोलेस्ट्रॉल में 40 प्रतिशत की कुल वृद्धि देखी गई है।
डायबिटीज को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता लेकिन सही लाइफस्टाइल और डाइट से इसे कंट्रोल किया जा सकता है कि क्यों शरीर में शुगल लेवल बढ़ने या कम होने से हृदय, रक्त वाहिकाओं, आंखों, गुर्दे और नसों को नुकसान हो सकता है। साथ ही इससे कई और बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
शुगर को कंट्रोल करने के लिए सबसे जरूरी है हेल्दी डाइट क्योंकि आप जो भी खाते हैं वो रक्त शर्करा को प्रभावित करता है। आज हम आपको कुछ ऐसे ही फूड्स के बारे में बताएंगे, जो डायबिटीज को कंट्रोल में करने में मदद करेंगे।
ब्रोकली 
ब्रोकली एंटीऑक्सिडेंट, विटामिन, खनिज और फाइबर से भरपूर होता है। इसमें क्रोमियम भी होता है, जो ब्लड शुगर को कंट्रोकरने में मदद करता है। आप इसे सब्जी, सूप या सलाद के रूप में खा सकते हैं। इसके अलावा आप इसे कच्चा भी खा सकते हैं।
दही
शोध के अनुसार, जो लोग कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं, उनमें इंसुलिन प्रतिरोधी बनने की संभावना कम होती है। मधुमेह रोगियों के लिए, दही को नाश्ते के तौर पर आहार में शामिल किया जा सकता है। हालांकि सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि कुछ वेरिएंट में चीनी होती है, जो हानिकारक हो सकती है।
दालचीनी
दालचीनी ब्लड में शुगर की मात्रा कम करती है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट की भी भरपूर मात्रा होती है। दालचीनी में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है। खाने में दालचीनी का इस्तेमाल करने से डायबिटीज की समस्या को कंट्रोल किया जा सकता है।
ग्रीन-टी
रोजाना ग्रीन टी पीजिए क्योंकि इसमें एंटी ऑक्सीडेंट होता है जो कि शरीर में फ्रीरैडिकल्स से लड़ाई करता है और ब्लड शुगर लेवल को मेंटेन करता है लेकिन ध्यान रहे ग्रीन टी में चीनी ना डालें।
बेरीज
ब्लूबेरी में हार्ट-हैल्दी फ्लैवोनोइड्स, फाइबर और एंथोकाइनिन जैसे तत्व होते हैं, जो टाइप 2 डायबिटीज से बचाए रखते है। वहीं रस बेरी में विटामिन सी, फाइबर, एंथोकाइनिन और एलाजिक एसिड होते हैं, जो इंसुलिन और ब्लड शुगर लेवल को कम करते हैं। 
एवोकाडो
एवोकाडो में अच्छी वसा होती है, जो टाइप2 डायबिटीज को बढ़ाने की संभावना 25% कम करती है। साथ ही इससे कोलेस्ट्राल भी कंट्रोल में रहा है, जिससे आप दिल की बीमारियों से बचे रहते हैं।
डायबिटीज रोगियों के लिए अन्‍य आहार 
-हाई फाइबर फूड्स जैसे जई और साबुत अनाज जो कोलेस्ट्रॉल और रक्त शर्करा के स्तर को कम करते हैं।
-गाजर को भी शामिल कर सकते हैं, क्योंकि उनमें बीटा-कैरोटीन होता है जो डायबिटीज के खतरे को कम और शुगर को कंट्रोल करता है।
-दूध, और फल जैसे पपीता, सेब, संतरा, नाशपाती और अमरूद को भी शामिल करें। मैदा, सूजी (सूजी का आटा), नूडल्स और पास्ता से बचें।
बेशक डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए यह सबसे बेहतर ऑप्शन्स है लेकिन अपनी डाइट और दिनचर्या में किसी भी तरह का बदलाव करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें। साथ ही नियमित एक्सरसाइज करें और भरपूर पानी पीएं।

 

 

 


Date : 27-Aug-2019

कई स्टडीज में सामने आ चुका है कि पालतू जानवर का होना व्यक्ति की सेहत को कई तरह से फायदा पहुंचा सकता है। अब हाल ही में अमेरिका में हुई एक रिसर्च में सामने आया है कि अगर आपके पास पातलू जानवर के रूप में डॉग है तो इससे दिल को सेहतमंद बनाए रखने में ज्यादा मदद मिलती है। 
मेयो क्लिनिक प्रोसीडिंग्स-इनोवेशन, क्वॉलिटी ऐंड आउटकम्स में प्रकाशित स्टडी के लिए शोधकर्ताओं ने 1,769 लोगों पर रिसर्च की। इनमें से कोई भी पहले से दिल की बीमारी का मरीज नहीं था। इनमें उन लोगों को शामिल किया गया जिनके पास पेट्स थे और नहीं थे।
रिसर्च के दौरान इन सभी की बॉडी मास इंडेक्स, डायट, फिजिकल ऐक्टिविटी, स्मोकिंग स्टेटस, ब्लड प्रेशर, ब्लड ग्लूकोज और कलेस्ट्रॉल के पॉइंट्स पर मार्किंग दी गई। शोधकार्ताओं ने इसके बाद स्टडी में शामिल पेट ओनर्स की कार्डियोवस्क्युलर हेल्थ की तुलना उन लोगों से की जिनके पास पातलू जानवर नहीं थे। 
इस दौरान सामने आया कि वे लोग जिनके पास पालतू जानवर थे उनकी दिल की सेहत उन लोगों के मुकाबले ज्यादा अच्छी थी जिनके पास कोई भी पेट नहीं था। खासतौर से ऐसे लोग जिनके पास पेट के रूप में डॉग था उनका दिल ज्यादा सेहतमंद पाया गया। इसके पीछे की वजह यह मानी जा रही है कि डॉग्स अन्य पालतू जानवरों के मुकाबले ज्यादा फिजिकली ऐक्टिव होते हैं जिससे उनके ओनर्स भी ऐक्टिव बने रहते हैं, यह उनकी दिल की सेहत को बनाए रखने में मदद करता है। 
स्टडी के मुताबिक, डॉग के कारण मेंटल स्ट्रेस कम करने और समाज में घुलने-मिलने की समस्या भी दूर होती है। ये फैक्टर्स दिल की सेहत को भी प्रभावित करते हैं। इनमें पॉजिटिव चेंज हार्ट के लिए काफी अच्छा साबित हुआ है। 

 


Date : 27-Aug-2019

सप्ताह में एक दिन उपवास करने से कई गंभीर बीमारियों का खतरा कम होता है। एक शोध में यह दावा किया है। एक दूसरे शोध में यह दावा किया गया कि कम कैलोरी खाने से संक्रमण से लडऩे वाली प्रतिरोधी कोशिकाएं सुपरचार्ज हो जाती हैं और बीमारियों को दूर रखने में मदद करती हैं।

आहार में बदलाव फायदेमंद-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीज और न्यूयॉर्क की द माउंट सिनाई हेल्थ सिस्टम के शोधकर्ताओं की टीम ने कहा कि शोध के परिणाम के बाद डॉक्टर संक्रमण और कुछ तरह के कैंसरों के मरीजों को पांरपरिक इलाज के साथ आहार का चार्ट भी दे सकते हैं।


Date : 25-Aug-2019

कई बार लोग काम या किसी अन्य वजह से यूरिन को बहुत देर तक रोके रहते हैं, लेकिन उन्हें अहसास भी नहीं होता कि ऐसा करके वह अपने शरीर को कितना बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं। कई स्टडीज में सामने आया है कि अगर व्यक्ति लगातार यूरिन को रोकता रहता है तो उसके बॉडी पार्ट्स को नुकसान हो सकता है जो गंभीर रूप लेते हुए खतरनाक साबित हो सकते हैं।
ज्यादा देर यूरिन को रोकने पर ब्लैडर पर प्रेशर बढ़ता है जो दर्द का कारण बन सकता है। यह दर्द किडनी तक भी पहुंच सकता है। इस स्थिति में यदि व्यक्ति सोचे की यूरिन रिलीज करने के बाद उसे दर्द से राहत मिल जाएगी तो ऐसा नहीं होता क्योंकि यूरिन रोकने के कारण उठे दर्द को जाने में काफी टाइम लगता है।
बार-बार यूरिन रोकना ब्लैडर के साइज को बढ़ा सकता है और उसकी मसल को स्ट्रेच कर सकता है। इससे यूरिन पर कंट्रोल करने की क्षमता प्रभावित होती है। इतना ही नहीं कई स्थितियों में यूरिन को रिलीज करने में भी ब्लैडर को परेशानी होती है। यह समस्या गंभीर रूप भी ले सकती है और सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है।
यूरिन रोकने के कारण यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन का भी डर रहता है। दरअसल, टॉइलट नहीं जाने पर बैक्टीरिया को बढ़ने का मौका मिल जाता है, जो ब्लैडर के अंदर तक भी पहुंच सकता है। यह संक्रमण बढ़ने पर कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।
यूरिन रोकने पर न सिर्फ किडनी पर प्रेशर बढ़ता है बल्कि उस पर स्कार भी बना सकता है जो भविष्य में किडनी संबंधी गंभीर बीमारियों की जड़ बन सकता है। कुछ स्टडीज में कहा गया है कि यूरिन रोकना किडनी स्टोन की वजह भी बन सकता है।

 


Date : 24-Aug-2019

गर्दन में दर्द की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। शरीर का पॉस्चर ठीक न होने की वजह से गर्दन की मांसपेशियों र्में ंखचाव आ जाता है। कंप्यूटर के लगातार बढ़ते प्रचलन ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है, क्योंकि लोग लगातार घंटों कंप्यूटर पर झुककर काम करते रहते हैं। समय रहते उपचार न कराया जाए, तो सर्वाइकल पेन केवल गर्दन तक ही सीमित नहीं रहता है, बल्कि शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल जाता है। सर्वाइकल यानी गर्दन में दर्द की शिकायत करने वालों की संख्या आजकल तेजी से बढ़ रही है। इसे नजरअंदाज किया गया, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। इससे बचाव के बारे में बता रहे हैं मनोज शर्मा

सर्वाइकल पेन
गर्दन में दर्द की समस्या को डॉक्टरी भाषा में सर्वाइकल पेन कहते हैं। गर्दन से होकर गुजरने वाली सर्वाइकल स्पाइन के जोड़ों और डिस्क में समस्या होने से सर्वाइकल पेन हो जाता है। ऐसा हड्डियों और कार्टिलेज में टूट-फूट होने से होता है। उम्र बढ़ने के अलावा कई और कारण जैसे गर्दन में चोट लग जाना, लिगामेंट्स कड़े हो जाना, शारीरिक सक्रियता की कमी, अपनी गर्दन को असुविधाजक स्थिति में लंबे समय तक होल्ड करना आदि भी इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। कुछ लोगों को सर्वाइकल के कारण गर्दन में इतना तेज दर्द होता है कि उन्हें रोजमर्रा के अपने कार्य करने में भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।  इसके अलावा इसके और भी कारण हो सकते हैं। 

क्या हैं लक्षण
’गर्दन की मांसपेशियां में कड़ापन हो जाना और उनमें खिंचाव आना।
’गर्दन में दर्द होना।
’दर्द तब और बढ़ जाता है, जब गर्दन को लंबे समय तक एक ही स्थिति में होल्ड कर के रखें। जैसे ड्रार्इंवग या कंप्यूटर पर काम करना आदि।  
’हाथों, पैरों और पंजों में झुनझुनी, सुन्नपन या कमजोरी महसूस होना।
’सिर के पिछले भाग और कंधों में दर्द होना।
’शरीर का संतुलन बनाने और चलने में परेशानी होना।
’मांसपेशियों में ऐंठन।
’ब्लैडर और बाउल पर नियंत्रण न रह पाना। 

क्या हैं कारण
’कंप्यूटर और मोबाइल के लगातार इस्तेमाल से मांसपेशियों में खिंचाव आ जाना।
’पढ़ते या काम करते समय गर्दन का पॉस्चर सही न रखना।
’उम्र बढ़ने के साथ गर्दन के जोड़ों में 
टूट-फूट होना।
’ऑस्टियोआथ्र्राइटिस के कारण गर्दन की हड्डियां क्षतिग्रस्त हो जाना।
’दुर्घटना या चोट लगने के कारण मांसपेशियों और ऊतकों में खिंचाव आ जाना या कशेरुकाएं विकृत हो जाना।
...तो डॉक्टर से संपर्क करें

अधिकतर गर्दन के दर्द नियमित रूप से व्यायाम करने और अपना पॉस्चर सही रखने से ठीक हो जाते हैं। अगर न ठीक हो, तो डॉक्टर को दिखाएं। 
’दर्द बढ़ जाए, तो डॉक्टर को दिखाएं।
’बिना आराम के दर्द लगातार कई दिनों तक बना रहे, तो डॉक्टर को दिखाएं।
’दर्द गर्दन से बांहों और पैरों तक फैल जाए, तो डॉक्टर को दिखाएं।
’सिर दर्द, कमजोरी, हाथों और पैरों में सुन्नपन और झुनझुनी आ जाए, तो डॉक्टर से संपर्क करें।

क्या हैं उपचार
सर्वाइकल पेन की समस्या मामूली है, तो उसे जीवनशैली में बदलाव लाकर ठीक किया जा सकता है, लेकिन स्थिति गंभीर होने पर आर्थोपेडिक सर्जन 
या स्पाइन सर्जन को दिखाएं। इसे एक्स-रे, सीटी स्कैन और एमआरआई के द्वारा आसानी से पहचाना जा सकता है और इसे उपचार के द्वारा ठीक भी किया जा सकता है। 
दवाएं और इन्जेक्शन
क्षतिग्रस्त तंत्रिकाओं के कारण होने वाले दर्द, ऊतकों की सूजन और मांसपेशियों की ऐंठन को कम करने के लिए कई दवाएं बताई जाती हैं। दर्द को कम करने के लिए स्टेरॉयड के इन्जेक्शन दिए जाते हैं। 
सर्जरी
फिजिकल थेरेपी और दवाओं से भी सर्वाइकल पेन ठीक नहीं होता है, तो सर्जरी की सलाह दी जाती है।

कैसे बचें
’बैठते, चलते, कंप्यूटर पर काम करते समय अपना पॉस्चर सही रखें।
’नियमित रूप से व्यायाम करें।
’मोबाइल फोन को अपने कान और कंधे के बीच में फंसाकर बात न करें।

’मोबाइल फोन के अत्यधिक इस्तेमाल से बचें।
’हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए कैल्शियम और विटामिन डी का सेवन पर्याप्त मात्रा में करें।
’सोने के लिए सही तकिए का इस्तेमाल करें। 

फिजिकल थेरेपी
फिजिकल थेरेपी में गर्दन के दर्द के कड़ेपन को दूर करने के लिए विशेषज्ञ की देखरेख में कुछ खास तरह के व्यायाम कराए जाते हैं। गर्दन के दर्द को दूर करने के लिए सही पॉस्चर के बारे में बताया जाता है।

स्पाइनल ट्युबरकलोसिस
कशेरुकाओं के क्षतिग्रस्त होने और हड्डियों में फ्रैक्चर होने के कारण स्पाइन का संक्रमण हो सकता है। स्पाइनल ट्युबरकलोसिस के कारण एक से अधिक कशेरुकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। स्पाइन कॉलम विकृत होने से कई स्पाइनल विकृतियां हो सकती हैं। स्पाइनल ट्युबरकलोसिस के कारण स्पाइनल कैनाल भी संकरी हो सकती है, जिससे तंत्रिका तंत्र से संबंधित समस्याएं हो जाती हैं। अगर समय रहते इसका उपचार न कराया जाए, तो स्पाइनल कॉर्ड के दबने से शरीर का निचला भाग लकवाग्रस्त हो सकता है।    

स्पाइनल कॉर्ड का ट्यूमर
स्पाइनल ट्यूमर स्पाइनल कैनाल या स्पाइन की बोन्स में विकसित हो सकता है। जब कोशिकाएं असामान्य रूप से विकसित और विभाजित होकर स्पाइनल कॉर्ड या स्पाइनल कॉलम में एक पिंड या गुच्छा बना लेती हैं, तो इसे स्पाइल ट्यूमर कहते हैं। स्पाइनल ट्यूमर के कारण दर्द होता है, तंत्रिका तंत्र से संबंधित समस्याएं हो जाती हैं और कभी-कभी पैरालिसिस भी हो जाता है। 

स्पाइनल आथ्र्राइटिस
स्पाइनल आथ्र्राइटिस गर्दन और कमर के निचले हिस्से के जोड़ों और डिस्क के कार्टिलेज में टूट-फूट होने से होता है। कई बार इसके कारण स्पाइनल कॉलम से निकलने वाली तंत्रिकाओं पर दबाव पड़ता है, जिससे हाथों या पैरों में दर्द और कमजोरी महसूस हो सकती है।   

सर्वाइकल माइलोमैलेसिया
सर्वाइकल माइलोमैलेसिया में स्पाइनल कॉर्ड दब जाती है, जिससे स्पाइनल कॉर्ड का वॉल्यूम कम हो जाता है और वो मुलायम हो जाता है। इससे पूरे शरीर में समस्या हो सकती है। इसके कारण दर्द, सांस लेने में परेशानी, मांसपेशियों में कमजोरी महसूस होना, तंत्रिका तंत्र की कार्यप्रणाली बिगड़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। 

(क्यूआरजी हेल्थ सिटी के न्यूरोसर्जरी विभाग के डायरेक्टर डॉ. विक्रम दुआ से की गई 
बातचीत पर आधारित)

 

 

 


Date : 24-Aug-2019

खाने में पोषक तत्वों की कमी स्वास्थ्य खराब होने की मुख्य वजह होती है। बुजुर्ग इस चीज से खासतौर पर ज्यादा प्रभावित होते हैं वहीं माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी बीमारी से रिकवर होना मुश्किल बना देती है। जरनल ऑफ पोस्ट अक्यूट ऐंड लॉन्ग टर्म केयर मेडिसिन में छपी एक स्टडी की मानें तो कुछ खास माइक्रोन्यूट्रिएंट्स सीनियर सिटिजंस या बुजुर्गों के लिए बेहद जरूरी होते हैं और इनकी कमी से वे अंदर से कमजोर हो जाते हैं और उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे गिरता जाता है। 

इस कंडिशन को फ्रैलिटी भी कहते हैं। यह बुढ़ापे की स्थिति होती है जिसमें बुजुर्गों की सेहत और काम करने की क्षमता गिरती जाती है। किसी बीमारी के बाद रिकवर होने की क्षमता भी कम हो जाती है।माइक्रोन्यूट्रिएंट्स शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व हैं जिनमें विटमिन्स और मिनरल्स शामिल होते हैं। विटमिन्स से शरीर को एनर्जी और ऐंटीऑक्सिडेंट्स मिलते हैं, इम्यून सिस्टम सही रहता है इसके साथ ही ब्लड क्लॉटिंग और दूसरे फंक्शंस भी रेग्युलेट होते हैं। वहीं मिनरल्स बोन हेल्थ, फ्लुइड बैलेंस जैसे कई जरूरी काम करते हैं। 
आइरिश लॉन्गिट्यूडिनल स्टडी ऑन एजिंग की तरफ से हुई एक रिसर्च के मुताबिक, ल्यूटीन, जिआजैंथी, फोलेट, विटमिन डी, बी और बी 12 की कमी की वजह से फैलिटी की कंडिशन हो जाती है। 

हमारा शरीर ज्यादातर माइक्रोन्यूट्रिएंट्स नहीं बना पाता इनको हम खाने के जरिए लेते हैं। हर तरह के फूड में अलग तरह के माइक्रोन्यूट्रिएंट्स होते हैं इसलिए हमें खाने में अलग-अलग तरह के फूड्स शामिल करने चाहिए। विटमिन डी और विटमिन बी12 जैसे कुछ माइक्रोन्यूट्रिएंट्स शाकाहारी खाने में नहीं मिलते तो इनके लिए सप्लिमेंट लेना होता। सबसे जरूरी बात इनकी कमी होने पर कुछ खास लक्षण नहीं दिखाई देते लिहाजा आपको स्क्रीनिंग कराते रहना चाहिए। 

 


Date : 23-Aug-2019

आपने विटामिन-ई के बारे में कई बार सुना होगा कई फलों, तेलों और ड्रायफ्रूट्स में विटामिन-ई पाया जाता है और यह सेहत के साथ-साथ सौंदर्य के लिए भी बेहद लाभदायक होता है। खासतौर पर सोयाबीन, जैतून, तिल के तेल, सूरजमुखी, पालक, ऐलोवेरा, शतावरी, ऐवोकेडो के अलावा कई चीजों में वि‍टामिन-ई की मात्रा मौजूद होती है।
जानिए विटामिन ई के ऐसे ही 10 लाभ-

1 बेहतरीन क्लिंजर - विटामिन-ई का उपयोग कई तरह के सौंदर्य प्रसाधनों में किया जाता है। इसका अहम कारण है, कि यह एक बेहतरीन क्लिंजर है, जो त्वचा की सभी परतों पर जमी गंदगी और मृत कोशिकाओं की सफाई करने में सहायक है।

2 आरबीसी निर्माण - शरीर में रेड ब्‍लड सेल्‍स यानि लाल रक्‍त कोशिकाओं का निर्माण करने में विटामिन-ई सहायक है। प्रेग्‍नेंसी के दौरान विटामिन- ई का सेवन बच्‍चे को एनीमिया यानि खून की कमी से बचाता है।

3 मानसिक रोग - एक शोध के अनुसार विटामिन-ई की कमी से मानसिक रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। शरीर में विटामिन-ई की पर्याप्‍त मात्रा मानसिक तनाव और अन्य समस्‍याओं को कम करने में मदद करती है।

4 एंटी एजिंग - विटामिन-ई में भरपूर एंटी ऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो त्वचा पर बढ़ती उम्र के असर को कम करते हैं। इसके अलावा यह झुर्रियों को भी कम करने और रोकने में बेहद प्रभावकारी है।

5 हृदय रोग - शोध के अनुसार जिन लोगों के शरीर में विटामिन ई की मात्रा अधिक होती है, उन्हें दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है। यह मेनोपॉज के बाद महिलाओं में होन वाले हार्ट स्ट्रोक की संभावना को भी कम करता है।

6 प्राकृतिक नमी - त्वचा को प्राकृतिक नमी प्रदान करने के लिए विटामिन-ई बेहद फायदेमंद है। इसके अलावा यह त्वचा में कोशिकाओं के नवनिर्माण में भी सहायक है।

7 यूवी किरणों से बचाव - सूरज की हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाने में विटामिन-ई महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सनबर्न की समस्या या फोटोसेंसेटिव होने जैसी समस्याओं से विटामिन-ई रक्षा करता है।

8 विटामिन-ई का प्रयोग करने पर अल्जाइमर जैसी समस्याओं का खतरा कम होता है, इसके अलावा यह कैंसर से लड़ने में भी आपकी मदद करता है। एक शोध के अनुसार जिन लोगों को कैंसर होता है, उनके शरीर में विटामिन-ई की मात्रा कम होती है।

9 विटामिन ई की पर्याप्त मात्रा डायबिटीज के खतरे को कम करने में मदद करती है। यह ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम, इम्यून सिस्टम को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ एलर्जी से बचाव में भी उपयोगी होता है।

10 यह कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम करता है और शरीर में वसीय अम्लों के संतुलन को बनाए रखने में सहायता करता है। इसके साथ ही यह थायराइड और पिट्यूटरी ग्रंथि‍ के कार्य में होने वाले अवरोध को रोकता है।


Date : 23-Aug-2019

किडनी शरीर से अतिरिक्त पानी के साथ बॉडी में मौजूद हानिकारक और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालकर खून साफ करने का काम करती है। मौजूदा समय में व्यस्त और खराब जीवनशैली व खानपान की गलत आदतों के कारण लोगों की कम उम्र में किडनी संबंधी समस्याएं होने लगी हैं। बाद में यही दिक्कतें किडनी फेल होने का कारण बनती है।
हालांकि डॉक्टरों की मानें तो किडनी फेल होने से पहले ही शरीर में इसके लक्षण दिखने लगते हैं। ऐसे में अगर समय रहते इन लक्षणों को पहचान लिया जाए तो किडनी फेल होने की बीमारी से बचा जा सकता है।शरीर का वजन अचानक बढ़ना और अन्य अंगों में सूजन आना किडनी के खराब होने का एक संकेत है इसलिए ध्यान रखें कि आपके हाथ-पैर या किसी अन्य अंग में सूजन न आए। अगर किसी कारणवश सूजन आ रही है तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।
आपके लिए इस बात का ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि जब आप पेशाब कर रहे हों तो उस वक्त खून न आए। पेशाब करते समय उसमें खून आना किडनी खराब होने का एक संकेत हो सकता है।
अगर आपको बार-बार पेशाब या फिर कम पेशाब आ रहा है तो आपको इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बार-बार पेशाब आना किडनी के अस्वस्थ होने का एक कारण है। 
अगर आपको बार-बार पेशाब या फिर कम पेशाब आ रहा है तो आपको इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बार-बार पेशाब आना किडनी के अस्वस्थ होने का एक कारण है। 

 


Date : 22-Aug-2019

इलेक्ट्रॉनिक गैजट्स के इस्तेमाल, गलत लाइफस्टाइल और तनाव के कारण हैदराबाद के करीब 79 फीसदी लोग अनिद्रा की बीमारी के जूझ रहे हैं। एक निजी कंपनी द्वारा हैदराबाद समेत देश के प्रमुख शहरों में कराए गए एक सर्वे में इस बात का पता चला है कि बड़े शहरों का एक बड़ा वर्ग इन्साम्निया यानि की अनिद्रा की बीमारी के कारण परेशान है। वहीं इस परेशानी के लिए इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स खासकर मोबाइल के इस्तेमाल को एक प्रमुख वजह माना गया है। 
मोबाइल सिर्फ अनिंद्रा ही नही बहुत बिमारियो की जड बनता जा रहा है
Wakefit.co नाम की कंपनी द्वारा हैदराबाद में हुए सर्वे के बाद अनिद्रा की बीमारी से परेशान लोगों से जुड़े कुछ आंकड़े जारी किए गए हैं। सर्वे की रिपोर्ट में यह कहा गया है कि हैदराबाद के करीब 79 फीसदी लोग इन्साम्निया की बीमारी से ग्रस्त हैं। सर्वे में यह पता चला है कि औसतन हैदराबाद के 48 फीसदी लोग रात 11 से 1 बजे के बीच में सोते हैं और इनमें एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो सोते वक्त अपने स्मार्टफोन का इस्तेमाल करता है। इसके अलावा 25 फीसदी लोग ऐसे हैं जो कि हर रात सिर्फ 7 घंटे की नींद ही ले पाते हैं। 
89 फीसदी लोगों को रात में नींद टूटने की शिकायत 
कंपनी के सर्वे के दौरान हैदराबाद के 89 फीसदी लोगों ने यह माना है कि रात के सोते वक्त 1-2 बार उनकी नींद जरूर टूटती है। इसके अलावा 81 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिन्हें अक्सर काम करते वक्त नींद आने की शिकायत रहती है और वह हफ्ते में 1-3 दिन काम के वक्त नींद के कारण परेशान भी होते हैं। 15 मार्च को वर्ल्ड स्लीप डे के मौके पर कंपनी ने हैदराबाद के अलावा बेंगलुरु, दिल्ली, मुंबई में भी करीब 18 हजार लोगों के बीच ऐसे ही सर्वे किए हैं। 
90 प्रतिशत लोग सोने से पहले करते हैं फोन का इस्तेमाल 
सर्वे में 90 फीसदी से अधिक लोगों ने यह माना है कि वह सोने से पहले अपने स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा कई लोगों ने इन्साम्निया के कारण थकावट और बैक पेन जैसी दिक्कतों के होने की बात भी स्वीकार की है। सर्वे कराने वाली कंपनी Wakefit.co के सह संस्थापक अंकित गर्ग कहते हैं कि अनिद्रा की बीमारी आज बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की एक कॉमन समस्या बन गई है। इन्साम्निया के कारण ना सिर्फ लोगों को कामकाज में परेशानी होती है, बल्कि कई लोगों को हाई ब्लड प्रेशर और उलझन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।