राष्ट्रीय
श्रीनगर, 13 फरवरी | जम्मू-कश्मीर में रात में शक्तिशाली भूकंप आया। भूकंप के जोरदार झटकों से लोग दहशत में आ गए और अपने घरों से बाहर निकलकर भागने लगे। तेज झटकों के कारण कई इमारतों में दरार पड़ने की खबरें हैं।
अधिकारियों ने अब तक भूकंप के कारण किसी के हताहता होने की सूचना नहीं दी है। भूकंप से घाटी में डर और दहशत का माहौल है।
भूकंप के दहशत के कारण घाटी में स्थानीय लोग सो नहीं पाए।
आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अधिकारियों ने कहा, शुक्रवार को रात 10.34 बजे जम्मू-कश्मीर में रिक्टर पैमाने पर 6.3 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया।
भूकंप का केंद्र ताजिकिस्तान में 31.57 डिग्री अक्षांश पर उत्तर में और 75.09 डिग्री देशांतर पर पूर्व में था।
कश्मीर में भूकंपों से होने वाली तबाही का इतिहास रहा है। (आईएएनएस)
-पुष्य मित्र
पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन की वजह से नेपाल में बारिश अनियमित भी हो गयी है और कम समय में अधिक मात्रा में होने लगी है
पिछले दो महीने से भीषण सूखे का सामना कर रहा लगभग पूरा उत्तर बिहार अचानक दो दिन से भीषण बाढ़ की चपेट में है। यहां गंडक, बागमती, कमला, कोसी और महानंदा समेत कई नदियां उफनाई हुई हैं और खतरे के निशान के ऊपर बह रही हैं। बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के आंक़ड़ों के मुताबिक कमला नदी पर बने तटबंध आठ जगह से ध्वस्त हो चुके हैं, कोसी में इतना पानी आया कि भीमनगर बराज के सभी 56 गेट खोलने पड़े, बागमती सीतामढ़ी और शिवहर में तबाही मचा रही है। कुल मिलाकर उत्तर बिहार के 12 जिलों की 19 लाख से अधिक आबादी अचानक आयी इस बाढ़ से प्रभावित हुई है। सरकार इस बाढ़ का कारण नेपाल में अचानक हुई भारी बारिश को बता रही है।
महानंदा को छोड़ दिया जाये तो उत्तर बिहार में बहने वाली सभी बड़ी नदियां नेपाल से ही बिहार के इलाके में प्रवेश करती हैं। हिमालय की शिवालिक श्रृंखला में इन नदियों का उद्गम है और वहां होने वाली तेज बारिश की वजह से इन नदियों में बाढ़ की स्थिति बनती है और पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन की वजह से वहां बारिश अनियमित भी हो गयी है और कम समय में अधिक मात्रा में होने लगी है।
11 से 13 जुलाई, 2019 के बीच पूर्वी नेपाल में 500 मिमि से अधिक बारिश हुई, सिमरा में तो शुक्रवार को एक ही दिन में 300 मिमि बारिश हुई और उसी दिन काठमांडू में 150 मिमि बारिश हुई। नेपाल से बिहार आने वाली नदियों गंडक, बागमती, कमला और कोसी का यह जल अधिग्रहण क्षेत्र है। महज तीन दिन में इतनी भारी बारिश की वजह से ये नदियां भर गयीं और नेपाल के बीरगंज, सोनबरसा, मलंगवा, जलेश्वरपुर, जनकपुर, सिरहा, गौर आदि इलाकों में बाढ़ की तबाही मचाते हुए उत्तर बिहार के इलाके में प्रवेश कर गयी।
एक ही साथ बाढ़ और सूखा दोनों झेलने के लिए क्यों अभिशप्त है उत्तर बिहार
इस तेज बारिश ने जरनल क्लाइमेट में जनवरी, 2017 में प्रकाशित उस रिपोर्ट की पुष्टि की है, जिसमें बता गया था कि नेपाल में पहाड़ी इलाकों के मुकाबले तराई के इलाके में उच्च मात्रा वाली बारिश की संभावना रहती है। यह रिपोर्ट 1981 से 2010 के बीच नेपाल में हुई बारिश का विश्लेषण कर बनायी गयी थी। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि नेपाल में भले ही तेज बारिश वाले दिन देखने को मिल रहे हैं, मगर बारिश के दिनों में कमी आ रही है। मतलब भले किसी एक रोज भारी बारिश हो जाये, मगर साल में बारिश वाले दिनों की संख्या घट रही है। खास तौर पर धीमी फुहार वाली बारिश अब कम देखने को मिल रही है, जिससे किसानों को फायदा हुआ करता है।
इस बाढ़ की वजह से इस बार नेपाल में काफी तबाही हुई है। अब तक 88 लोग मारे जा चुके हैं, हजारों लोग विस्थापित हो चुके हैं। जबकि इस मुकाबले उत्तर बिहार में इस बार मौतें कम हुई हैं, 21 लोग मृत हुए हैं, मगर निचले सतह पर होने की वजह से यहां बाढ़ का फैलाव अधिक है। नेपाल में हाल के वर्षों में इस तरह की बारिश आम हो गयी है। 2017 के मानसून में आयी ऐसी ही बाढ़ में 143 लोगों की मौत हुई थी और 80 हजार लोग बेघर हुए थे। उस साल उत्तर बिहार में भी इस बाढ़ ने भीषण प्रभाव छोड़ा था, 19 जिले के एक करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए थे, इनमें 514 लोगों की मौत हो गयी थी। 2014 में भी नेपाल में सौ से अधिक लोगों की बाढ़ के दौरान मौत हो गयी थी और दस हजार से अधिक लोग बेघर हो गये थे, उस साल बिहार के 20 जिले बाढ़ की चपेट में आये और 158 लोगों की मौत हुई।
नेपाल में पर्यावरण के मसले पर काम करने वाले लोग मानते हैं कि शिवालिक(स्थानीय भाषा में चूरे) शृंखला में पिछले कुछ दशकों में पत्थर का उत्खन और वनों की अंधाधुन कटाई की वजह से यह स्थिति उत्पन्न हुई है और इसका खामियाजा नेपाल के साथ-साथ उत्तर बिहार को भी भुगतना पड़ता है। नेपाल के हिमालय क्षेत्र में 90 के दशक से ही वनों की अंधाधुंध कटाई होने लगी। 1990 से 2005 के बीच नेपाल ने अपना एक चौथाई वन क्षेत्र खो दिया, 2002 के बाद वहां वनों की कटाई की गति थोड़ी कम हुई, मगर 2002 से 2018 तक 42,513 हेक्टेयर वन भूमि नेपाल गंवा चुका है।
नेपाल के तराई इलाके में पर्यावरण के मसले पर काम करने वाले चंद्र किशोर कहते हैं कि चूरे (शिवालिक) के इलाके में हाल के वर्षों में पत्थरों का उत्खनन भी खूब हो रहा है, ताकि नेपाल और पड़ोसी भारत में तेजी से बढ़ रहे निर्माण कार्य के लिए सामग्री उपलब्ध कराई जा सके। इस वजह से चूरे की स्थिति खराब हुई है। अब बारिश का पानी वहां अटकता नहीं तेजी से बहकर पहले नेपाल की तराई को तबाह करता है, फिर भारत को। रेत माफियाओं ने नदी के बेसिन को खोद-खोद कर गड्ढे में बदल दिया है। वह भी नदी के बहाव को अनियंत्रित करता है। हाल के दिनों में एक नया बदलाव यह देखा जा रहा है कि छोटी-छोटी नदियां जिन्हें हम भूल चुके थे और जिनके बेड में लोग घर बनाने लगे थे, वे मानसून में अचानक फिर से जिंदा हो जा रही है।
बिहार में नदियों के सवाल पर काम करने वाले रंजीव कहते हैं, दिक्कत यह भी है कि नेपाल से उत्तर बिहार के इलाकों में हर साल आने वाले इस आपदा को लेकर कोई वार्निंग सिस्टम विकसित नहीं हो पाया है। यह सच है कि नेपाल की सरकार और बिहार के बीच मौसम संबंधी सूचनाएं साझा नहीं होतीं। बिहार को हिमालय के क्षेत्र में होने वाली बारिश की जानकारी चाहिए होती है और नेपाल को इस इलाके में आने वाले तूफान और शीतलहर की। मगर बिहार का आपदा प्रबंधन विभाग अब तक ऐसा नहीं कर पाया है।
हालांकि हाल में बिहार सरकार का जल संसाधन विभाग एक्कु वेदर डॉट कॉम से मिली पूर्व सूचना के आधार पर नेपाल के क्षेत्र की बारिश के पूर्वानुमान को जारी करने लगा है, नेपाल का मौसम विभाग भी नियमित रूप से ट्विटर पर सूचनाएं जारी करता है। मगर स्थानीय प्रशासन संभवतः इन सूचनाओं को बहुत महत्व नहीं देता, इसलिए इस इलाके में बाढ़ से पूर्व की वार्निंग कभी ठीक से जारी नहीं होती। (downtoearth.org.in)
-अनिल अश्विनी शर्मा
2001 में जहां महिला किसानों की संख्या 2.53 करोड़ थी, वहीं 2011 में घटकर 2.28 करोड़ रह गई, जबकि खेतिहर महिला मजदूरों की संख्या में 85.34 लाख का इजाफा हुआ
इस वक्त पूरे देश सहित दुनिया की मीडिया में किसान आंदोलन की चर्चा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसमें चार सदस्यीय कमेटी बनाई है। हालांकि इनमें से एक सदस्य ने अपना नाम वापस ले लिया है। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के वकील एपी सिंह से कहा कि आंदोलन स्थल से महिला, बच्चे और बूढ़ों को घर भेज देना चाहिए। कोर्ट की इस बात से आंदोलन में शामिल होने आईं महिला किसान काफी नाराज हैं। उनका कहना है कि खेतों में महिलाएं, पुरुष किसानों से ज्यादा मेहनत करती हैं तो हम आंदोलन छोड़कर घर क्यों चले जाएं? महिला किसानों का कहना है कि बीज लगाने, निराई-गुड़ाई करने से लेकर खेती का 73 (आक्सफेम इंडिया ने यह बात अपने एक सर्वे में कही है) फीसदी काम महिला किसान करती हैं। इसीलिए हम आंदोलन स्थल से कहीं भी डिगने वाले नहीं हैं।
डाउन-टू-अर्थ ने आंदोलन के बहाने भारत में महिला किसानों की स्थिति की पड़ताल की है। आंकड़ों के आधार पर की गई इस पड़ताल में महिला किसानों को लेकर कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आई हैं। मसलन देश में महिला किसानों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज हो रही है, वहीं खेतिहर महिला मजदूरों की संख्या बढ़ रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 9.59 करोड़ किसान हैं। इनमें 7.30 करोड़ पुरुष और 2.28 करोड़ महिलाएं हैं। वहीं, देश में कुल 8.61 करोड़ ऐसे मजदूर हैं जो खेतों में मजदूरी करते हैं। इनमें 5.52 करोड़ पुरुष और 3.09 करोड़ महिलाएं हैं। इसके अलावा बागवानी, पशुपालन, मछली पालन जैसे व्यवसाय से कुल 80.95 लाख लोग जुड़े हैं। इनमें 25 लाख महिलाएं शामिल हैं।
खेतिहर महिला मजदूरों की संख्या को देखते हैं तो ये हैरान करने वाली बात है कि हमारे खेतों में 5-9 साल की उम्र की बच्चियां भी मजदूरी करती हैं। जनगणना 2011 के अनुसार देश में 1,20,701 बच्चियां हैं जो खेतिहर मजदूर हैं। संख्या के लिहाज से देखें तो सबसे ज्यादा 40-49 उम्र वर्ग की महिलाएं खेतों में मजदूरी करती हैं। इनकी संख्या 62.64 लाख है। इसके बाद 35-39 साल की 40.89 लाख, 25-29 उम्र की 39.54 लाख, 30-34 उम्र वर्ग की 38.67 लाख, 50-59 के बीच की उम्र वाली 37.18 लाख महिला खेतिहर मजदूर हैं। इसके बाद 20-24 साल के बीच 34.62 लाख, 60-69 साल की 22.31, 15-19 साल की 20.31, 70-79 उम्र की 4.95 लाख, 10-14 साल की 4.55 और 80 साल से ज्यादा उम्र की 1.21 लाख महिलाएं खेतों में मजदूर हैं।
2001 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में 10.36 करोड़ किसान थे। इनमें से 7.82 करोड़ पुरुष और 2.53 करोड़ महिला किसान थीं। वहीं, खेतिहर मजदूरों की संख्या 6.34 करोड़ थी। इनमें से 4.11 करोड़ पुरुष और 2.23 करोड़ महिलाएं शामिल थीं। आंकड़ों की तुलना करने पर सामने आता है कि 2001 से 2011 के बीच कुल खेतिहर मजदूरों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है। दोनों जनगणनाओं के बीच देश में 2,26,71,592 खेतिहर मजदूर बढ़े हैं।
महिला खेतिहर मजदूरों की बात करें तो 2001 में ये 2.23 करोड़ थीं जो 2011 में बढ़कर 3.09 करोड़ हो गईं। दूसरे शब्दों में कहें तो 2001 से 2011 के बीच देश में खेतिहर महिला मजदूरों की संख्या में 85.34 लाख का इजाफा हुआ है।
जनगणना 2011 के ही आंकड़े बताते हैं कि 2001 से 2011 के बीच महिला किसानों की संख्या घटी है और महिला खेतिहर मजदूरों की संख्या बढ़ी है। 2001 में जहां महिला किसानों की संख्या 2.53 करोड़ थी, वहीं 2011 में घटकर 2.28 करोड़ रह गई। यानी करीब 25 लाख महिला किसानों ने खेती का काम छोड़ दिया है। इससे साफ है कि या तो ये महिलाएं खेतों में मजदूर बन गईं या कोई दूसरे तरह का काम करने लग गईं। इसके अलावा देश में कुल किसानों की संख्या भी कम हो रही है। 2001 से 2011 के बीच भारत में 76.83 लाख किसान कम हुए हैं।
इन 10 सालों में 51.91 लाख पुरुष किसान कम हुए हैं और 1.41 करोड़ पुरुष खेतिहर मजदूर बढ़े हैं। विशेषज्ञों के अनुसार किसानों की कम होती संख्या और बढ़ते खेतिहर मजदूरों की संख्या में काफी निकट संबंध है। कृषि भूमि कम होती जा रही है, लेकिन 2001 में जो व्यक्ति थोड़ी भी जमीन का मालिक था, वो 2011 में भूमिहीन हो गया और खेतों में मजदूरी करने लगा। भारत में कुल 1,457 लाख कृषि भूमि स्वामित्व हैं। एग्रीकल्चर सेंसस 2015-16 के अनुसार 13.96 प्रतिशत महिलाओं का ही कृषि भूमि पर स्वामित्व है। ये 2010-11 में 12.79 प्रतिशत था। कुल कृषि भूमि में से 11. 72 फीसदी महिला किसान इसे ऑपरेट करती हैं।
भारत में छोटी, मझौली और बड़ी महिला किसानों पर औसतन एक हेक्टेयर से भी कम भूमि है। या यूं कहें कि महिलाओं का एक हेक्टेयर से भी कम कृषि भूमि पर स्वामित्व अधिकार (ऑपरेशनल होल्डिंग) है। महिला और पुरुषों को मिलाकर यह 1.08 हेक्टेयर है। वर्गीकरण करने पर और भी चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं। देश में 1.58 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि पर ही महिला कृषकों का स्वामित्व है। यह हाल तब है जब ग्रामीण भारत की 73 फीसदी से ज्यादा श्रमिक खेती का काम करती हैं। सिर्फ 5.43 लाख महिला किसानों पर 7.5 हेक्टेयर से 10 हेक्टेयर तक कृषि भूमि का स्वामित्व है। वहीं, सिर्फ 66 हजार ऐसी महिला कृषक हैं, जिनके नाम 20 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि है।
अनुसूचित जाति की महिला किसानों के पास औसतन 0.68 हेक्टेयर कृषि भूमि पर ही स्वामित्व है। वहीं, अनुसूचित जनजाति की महिला किसानों की स्थिति थोड़ी ठीक है। 1.23 हेक्टेयर औसतन भूमि एसटी महिलाओं के पास है। कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार 30.99 लाख महिला किसान देश में हैं, जिनके नाम एक से दो हेक्टेयर कृषि भूमि है। हिंदू उत्तराधिकार बिल 1956 के अनुसार यदि पुरुष की मृत्यु के बाद उसकी जमीन विधवा, बच्चे और मृतक की मां में बराबर बांटी जाएगी। यही कानून सिख, बौद्ध और जैन धर्मों के लिए है। वहीं, मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार विधवा महिला को एक चौथाई का हिस्सेदार संपत्ति में माना गया है, लेकिन सामाजिक रीति-रिवाजों के चलते ऐसा बेहद कम हो रहा है कि कानून के अनुसार महिलाओं को संपत्ति में हक मिल रहा हो। ऊपर के आंकड़ों से साफ है कि भारत में कानून भले महिलाओं को जमीन-जायदाद में से हिस्सा देता हो, लेकिन भारतीय समाज और उसके अपने कानून उन्हें उनके इस हक से वंचित रखते हैं।
ऑक्सफेम इंडिया के एक सर्वे (2018, सन ऑफ द सॉइल) के अनुसार खेती-किसानी से होने वाली आय पर सिर्फ 8 फीसदी महिलाओं का ही अधिकार होता है। मतलब कि खेती से होने वाली आय पर 92 फीसदी पुरुषों का कब्जा है। जबकि 73 फीसदी महिलाएं खेती-किसानी से जुड़ी हुई हैं।
महिलाओं को सरकारी रिकॉर्ड्स में किसान बताया ही नहीं जाता। सिर्फ 13 प्रतिशत महिलाएं कृषि भूमि पर स्वामित्व रखती हैं। इसीलिए 87 फीसदी महिलाएं सरकार की ओर से खेती पर मिलने वाले लोन, सब्सिडी का लाभ नहीं ले पाती हैं। इस संकट को ध्यान में रखते हुए साल 2011 में मनोनीत राज्यसभा सदस्य एमएस स्वामीनाथन (2007-13) संसद में वुमन फार्मर एनटाइटलमेंट बिल-2011 लेकर आए। 11 मई, 2012 को यह बिल राज्यसभा में पेश हुआ, लेकिन यह अप्रैल, 2013 में रद्द हो गया। 9 चैप्टर के इस बिल में महिला किसानों के हक, अधिकार और सरकारों की जिम्मेदारी तय करने की बातें थीं। इस बिल में महिला किसानों की परिभाषा जैसी बातें भी थीं। बिल के सेक्शन 2एफ के अनुसार वे महिलाएं जो गांवों में रहती हैं और मुख्य रूप से खेती के काम करती हैं, हालांकि कभी-कभी ये गैर-कृषि काम भी करती हैं, वे सभी महिलाएं किसान हैं। वहीं बिल में महिला किसानों को सर्टिफिकेट देने और इन सर्टिफिकेट्स को सबूत के तौर पर मान्यता देने की बात थी।
इसके अनुसार ग्राम सभा की मंजूरी के बाद ग्राम पंचायत महिला किसानों को ऐसे सर्टिफिकेट उपलब्ध कराए जिनसे यह साबित हो सके कि महिला खेती से जुड़ी हुई हैं। महिला किसान एनटाइटलमेंट बिल लाने के लिए नवंबर, 2018 में करीब 10 हजार महिला किसानों ने “दिल्ली चलो” का आह्वान किया था, लेकिन सरकार ने किसानों की मांगों पर खास ध्यान नहीं दिया। “किसान मुक्ति मार्च” का आयोजन ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति ने किया था। इसमें 200 से अधिक किसान संगठन शामिल हुए थे। महिला किसानों के इस मार्च की मुख्य मांगें लगभग वही थीं, जिनका स्वामीनाथन ने अपने बिल में जिक्र किया था। 2018 में ही खेती में लिंग आधारित भेदभाव को खत्म करने के लिए “ग्राम सभा से विधान सभा” के नाम से एक मार्च भी निकाला गया। यह मार्च 2006 में गोरखपुर पर्यावरण क्रिया समूह (जीईएजी) के शुरू किए अभियान अरो का ही हिस्सा था। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य खेती में वास्तविक रूप से योगदान करने वालों का सशक्तिकरण करना था।
एक अनुमान के मुताबिक किसानी में शामिल 52-75 फीसदी महिलाएं अपनढ़ या बेहद कम पढ़ी-लिखी हैं। उनमें जागरुकता की कमी है। इसीलिए अधिकतर महिलाएं अपने खेतों में बिना किसी मेहनताने के ही काम करती हैं। कृषि में पुरुष किसानों की मजदूरी महिला मजदूरों के मुकाबले में एक चौथाई तक ज्यादा होती है। पूरी दुनिया में कृषि क्षेत्र में 50 प्रतिशत योगदान ग्रामीण महिलाओं का है। खेती में महिलाओं की भूमिका को देखते हुए भारत में हर साल 13 अक्टूबर को महिला-किसान दिवस मनाया जाता है। एफएओ के आंकड़े कहते हैं कि देश के हिमालयी क्षेत्र में एक ग्रामीण महिला हर साल 3,485 घंटे प्रति हेक्टेयर काम करती हैं। इसके मुकाबले पुरुष केवल 1,212 घंटे ही काम करते हैं। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशम (एनएसएसओ) के आंकड़े कहते हैं कि 23 राज्यों में कृषि, वानिकी और मछली पालन में ग्रामीण महिलाओं का 50 प्रतिशत श्रम लगा होता है। बंगाल, तमिलनाडु, पंजाब और केरल जैसे राज्यों में ये 50 फीसदी है तो बिहार, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में महिलाओं का श्रम 70 फीसदी तक है। पूर्वोत्तर के राज्यों में यह 10 प्रतिशत है।
खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, भारतीय कृषि में महिलाओं का योगदान लगभग 32 प्रतिशत है। 48 प्रतिशत महिलाएं कृषि संबंधी रोजगार में शामिल हैं जबकि 7.5 करोड़ महिलाएं दूध उत्पादन और पशुधन प्रबंधन में उल्लेखनीय भूमिका निभा रही हैं। (downtoearth.org.in)
-चिंकी सिन्हा
मैंने ये बात स्कूल में बताई थी. मुझे लगता है कि मैं ये बात हर जगह कहती फिरती थी. मेरे पिताजी की दो माँएं थीं. ये कोई ऐसी बात नहीं थी, जो किसी ने पहले न सुनी हो.
बहुत से लोग दो-दो बीवियां रखते थे. इसकी तमाम वजहें भी होती थीं. किसी ने पहली पत्नी के बच्चा न होने के चलते दूसरी शादी कर ली. तो, किसी के बेटा न हुआ तो वो दूसरी औरत ब्याह लाया. कोई शादी के बाद किसी और के इश्क़ में गिरफ़्तार हुआ, तो उससे शादी कर ली. ऐसे बहुत से कारण होते हैं. लेकिन, मेरे मामले में जो बात थोड़ी अलग थी.
वो ये थी कि मेरी दूसरी दादी ईसाई थीं. मेरी ये ईसाई दादी, बड़े दिन या क्रिसमस पर हमारे लिए केक भेजा करती थीं. मुझे उन दिनों की कोई ख़ास याद तो नहीं है. बस इतना याद रह गया है कि मुझे अपनी एक ईसाई दादी होने पर बड़ा ग़ुरूर था.
एक बार जब मैं अपने ननिहाल गई, तो मैंने इतराते हुए अपनी नानी को बताया था, 'मेरे पिताजी की दो माँएं हैं.'
ये राज़ छुपाकर रखा जाता था, क्योंकि बहुत से परिवारों में किसी ग़ैर मज़हबी से शादी करके लक्ष्मण रेखा पार करने वाले को बिरादरी से बाहर कर दिया जाता था.
मगर, मोहब्बत तो मोहब्बत है और ये बात शायद मेरे ननिहाल वाले भी समझते थे. परिवार में बहुत सी बेटियां और पोतियां थीं, जिनका ब्याह किसी खाते-पीते और रसूख़ वाले घरों में करना होता था. ऐसे में लोगों को ये लगता था कि उनके किसी रिश्तेदार का एक ईसाई औरत से शादी करना कहीं मुश्किलें न खड़ी करे.
मेरी माँ की शादी के वक़्त मेरे ननिहाल वालों को ये बताया गया था कि वो जो दूसरी औरत है, जो औरों से बिल्कुल अलग दिखती है, वो असल में मेरी दादी की बहन है. लंबे समय तक मेरी माँ को भी ये क़िस्सा नहीं पता था. जब मैं अपनी माँ के पेट में थी और एक दिन मेरी दादी किसी काम से घर से बाहर गई थीं, तब मेरी बुआ ने माँ को इस बारे में बताया था.
परिवार का अनकहा नियम

पटना में मौजूद घर
CHINKI SINHA
अपनी नौकरी से रिटायर होने के बाद मेरे दादा की प्रेमिका हमारे परिवार के साथ रहने आ गई थीं. तब हमारे परिवार में कुछ मुश्किलें खड़ी हो गई थीं.
सबको हिदायत थी कि वो उन्हें भी उसी तरह सम्मान दें, जैसे हम अपनी दादी यानी दादा की क़ानूनी पत्नी को देते हैं. ये हमारे परिवार का अनकहा नियम था. जब तक हमारे दादा ज़िंदा रहे, तब तक इन नियमों का सख़्ती से पालन किया गया.
मेरे पिता और उनके दस भाई-बहन अपनी सगी मां को 'मैया' और दूसरी माँ को 'ममा' कहकर बुलाते थे. इसी तरह हमारी उन दादी का जो एक बेटा था, वो भी दोनों महिलाओं को ऐसे ही पुकारता था.
हम सब एक बड़े से ख़ानदान का हिस्सा थे और मिल-जुलकर रहते थे. मुझे कभी ये ख़याल नहीं आया कि उन दिनों में पटना जैसे शहर में रहते हुए कोई हिंदू परिवार इस बात को क्यों छुपाए कि उनकी एक दादी ईसाई हैं. ऐसा लगता था कि हमारे सिवा, सबको उनके बारे में पता है. हमने हालात को मंज़ूर कर लिया था.
हमें ये नहीं पता था कि वो कौन थीं. कहां से आई थीं. और, उन्होंने क्यों हमारे साथ रहने का फ़ैसला किया था.
हम उन्हें दादी माँ कहकर बुलाते थे. वो छोटी कद काठी की महिला थीं. उनके दांत बड़े-बड़े थे. आम तौर पर कोई बिहारी किसी महिला को ख़ूबसूरती के जिस पैमाने पर तौलता है, वो उस खांचे में फिट नहीं बैठती थीं.
मैं उम्मीद करती हूं कि अब वो सोच बदल गई होगी. पर मुझे याद है कि लोग उनकी बदसूरती के बारे में हमसे इशारों में बात किया करते थे.
इन बातों को सुनकर हम बच्चों को उन पर यक़ीन हो जाता था. उन्हें ग़ुस्सा बहुत आता था. वो धीरे-धीरे चलती थीं. लेकिन, मुझे उनकी चश्मा लगी सूरत आज भी बख़ूबी याद है. वो बड़ी मोटी ऐनक लगाती थीं. मेरी वो दादी हमेशा कलफ़दार सूती साड़ी पहना करती थीं और बड़े करीने से रहती थीं.

दादा और दादी की तस्वीर
CHINKI SINHA
मेरी पैदाइश से ठीक पहले वो अपने बेटे-बहू और उनके नवजात बच्चे, जो हमारा कज़िन है, के साथ किसी और जगह रहने चली गई थीं. वो एक नर्स थीं और किसी और शहर में सरकारी क्वार्टर में रहा करती थीं.
वो अक्सर हमारे घर आया करती थीं. जब पहली दफ़ा मेरे दादा उन्हें घर लेकर आए थे, तो उन्होंने अपनी पत्नी और हमारी दादी को बताया कि वो एक दोस्त की बेवा हैं और हमारे साथ ही रहेंगी.
दादा ने कहा था कि उनका छोटा बेटा भी परिवार के साथ ही रहेगा, क्योंकि उनका कोई और ठिकाना नहीं है. वक़्त के साथ-साथ परिवार को अंदाज़ा हुआ कि असल में वो महिला तो उनकी प्रेमिका हैं और वो बच्चा भी उन्हीं का है. और, परिवार को ये भी पता चला कि वो ईसाई हैं.
हमारी एक बुआ जो अब नहीं रहीं, वो अपनी इन आधुनिक सौतेली मां और उनके 'सेवा भाव' से बहुत प्रभावित हुई थीं. वो ख़ुद भी नई माँ की शागिर्द बनना चाहती थीं.
हमारे दादा ने उनसे कभी शादी नहीं की. लेकिन, हमेशा ही उन्हें दूसरी बीवी कहा गया और परिवार ने उन्हें पूरी इज़्ज़त दी. अब जो भी हो, मेरे लिए तो मेरी इन दो दादियों की कहानी बहुत अहम है. पहले तो ये समझने के लिए कि मैं कैसे परिवार से आती हूं. और, दूसरी वजह इश्क़ करने के पीछे की महिलावादी राजनीति को समझने की है.
मेरे दादाजी के कमरे में हमेशा दो बेड हुआ करते थे, जो एक दूसरे से लगकर रखे रहते थे. ये अपने आप में इस बात की गवाही थी कि उन्होंने मुहब्बत की थी. साथ ही साथ. इसके चलते परिवार को जो कुछ गंवाना पड़ा था, उसका भी ये सबूत था. हम जब भी इस मुद्दे को छेड़ते, तो हमें ये कहकर चुप करा दिया जाता था कि परिवार की इज़्ज़त का कुछ तो ख़याल करो.
गर्व है दो दादियों पर
अब 41 बरस की उम्र में आज मैं उन बंदिशों से आज़ाद हूँ. परिवार की ज़्यादातर लड़कियों की शादी हो चुकी है. हालांकि, मैं ख़ुद अकेली रहती हूं. और, यक़ीन जानिए मुझे इस बात से अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कोई क्या सोचता है.
तो अब मैं आपको ये कहानी सुना रही हूं. इसमें शर्मिंदगी की कोई बात ही नहीं है. बल्कि, सच तो ये है कि मुझे गर्व है कि मेरी दो दादियां थीं.

जवानी के दिनों में आंटीज
CHINKI SINHA
मुझे नहीं पता कि सच क्या है, पर कम से कम मुझे बताया तो यही गया था. मेरे दादा एक दिलकश नौजवां थे. वो पटना के मोईन-उल-हक़ स्टेडियम में फुटबॉल खेला करते थे. उनके पास मॉरिस माइनर कार हुआ करती थी. मेरे दादा पुलिस अधिकारी थे. हमारे परिवार को इस बात का बड़ा ग़ुरूर है कि उस ज़माने में हमारे दादा पटना के उन गिने-चुने लोगों में से एक थे जिनके पास कार हुआ करती थी.
मेरी दादी बड़ी गोरी-चिट्टी थीं. उनकी ख़ूबसूरती बेदाग़ थी. वो अफ़ग़ान स्नो क्रीम इस्तेमाल करती थीं. उनके दस बच्चे हुए थे. मेरी दादी पटना की रहने वाली थीं. उनके भाई भी उनसे बहुत लगाव रखते थे. उनकी सास भी उन्हें बहुत चाहती थीं. वो मेरी दादी को बहुत पढ़ाना चाहती थीं. लेकिन, घर में इतना काम होता था कि मेरी दादी को फ़ुर्सत ही नहीं मिलती थी.
एक बार मेरे दादा किसी अपराधी की तलाश में झारखंड गए थे. उस वक़्त झारखंड अलग राज्य नहीं बना था. वो बिहार का ही हिस्सा हुआ करता था. उनके घुटने में गोली लग गई थी. जिसके चलते मेरे दादा को इलाज के लिए कुछ वक़्त अस्पताल में भी रहना पड़ा था. वहीं, पर उनकी मुलाक़ात मेरी दूसरी दादी से हुई थी. वो एक नर्स थीं. उन्हें ही मेरे दादा की देख-भाल करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. वो अंग्रेज़ी बोलती थीं. मेरे दादा को उनसे प्यार हो गया. बाद में वो उन्हें अपने घर ले आए.
जब उनकी पोस्टिंग पटना में हुई, तो वो वहां के नर्सेज़ क्वार्टर में रहती थीं. लेकिन, वो तब भी हमारे घर आया करती थीं. लोग कहते हैं कि एक दिन मेरी दादी उनके पास गईं और अपने पान के डिब्बे से उन्हें पान भेंट किया.
मेरी दादी ने उनसे कहा कि हमें एक दूसरे को स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि इसमें हमारी कोई ग़लती नहीं है. मुझे लगता है कि मेरी दादी महिलावादी थीं, क्योंकि वो बहनापे में यक़ीन रखती थीं. और घरेलू मसलों के अलावा कई बार कुछ अन्य बातों की वजह से उनके नाज़ुक रिश्ते के टूटने का ख़तरा भले ही पैदा हुआ हो. लेकिन, दोनों ही ज़िंदगी भर एक-दूसरे की दोस्त बनी रही थीं.

दादा की तस्वीर
CHINKI SINHA
बुढ़ापे में मेरी दूसरी दादी की आंखों रौशनी चली गई थी. वो अपने पोते पोतियों या नौकरों को कहा करती थीं कि वो हाथ पकड़कर उन्हें हमारे घर ले चलें.
फिर वो दोनों साथ बैठ कर पान चबाते हुए शाम ढलने तक दुनिया जहान की बातें करती रहती थीं. ये सिलसिला तब टूटा जब मेरे चाचा ने उस मुहल्ले को छोड़कर, शहर में दूसरी जगह रहना शुरू किया. ममा को भी घर छोड़ना पड़ा.
मुझे लगता है कि ममा के जाने के बाद मेरी दादी अकेलापन महसूस करने लगी थीं. उनकी देख-भाल करने के लिए गंगाजली नाम की एक महिला रहती थी. आख़िर में उनकी याददाश्त भी चली गई. वो बमुश्किल ही चल पाती थीं. मेरी बुआ ने उनके बाल काट दिए थे. अपने आख़िरी दिनों में वो एक छोटी बच्ची जैसी दिखने लगी थीं. कटे हुए बाल, दुबली पतली काठी और मोटे चश्मे से ढंकी आंखें. एक रोज़ वो चल बसीं. और बस क़िस्सा तमाम.
आख़िरी इच्छा
मै उस समय स्कूल में थीं. ममा उनसे ज़्यादा दिन तक ज़िंदा रही थीं. मुझे नहीं पता कि वो अब भी चर्च जाया करती थीं या नहीं. लेकिन मुझे ये पता है कि उनकी आख़िरी इच्छा ये थी कि उन्हें जलाने के बजाय दफ़न किया जाए.
पर मैं उस मसले में नहीं पड़ना चाहती. मैं बस अपनी दोनों दादियों की वो तस्वीर याद करना चाहती हूं, जब दोनों साथ बैठकर बातें करती रहती थीं. कई बार एक दूसरे का हाथ भी पकड़ लेती थीं. उन दोनों को पान खाना बहुत पसंद था. जब हम बच्चों की सालगिरह आती थी, तो ममा पूरियां तलती थीं और मेरी सगी दादी मटन करी पकाया करती थीं.

पुराना रसोई घर
CHINKI SINHA
आज उन दिनों को याद करके, मैं ये कह सकती हूं कि मेरी दादी थोड़ी दुखी ज़रूरी हुई होंगी. उनके साथ छल हुआ था. लेकिन, उन्हें पता नहीं था कि वो इसके बदले में क्या करें. पहले तो उन्होंने इसका विरोध किया होगा. लेकिन, बाद में तो दोनों अच्छी सहेलियां बन गईं.
ममा और मेरी सगी दादी. वो मिल-जुलकर घर चलाती थीं. आख़िर उन दोनों ने ही एक मर्द को साझा करना जो सीख लिया था. उसके बाद उन्हें जोड़ने वाला मर्द बेमानी हो गया.
उस बात को याद करते हुए मुझे लगता है कि दोनों ही औरतें बड़ी तन्हा थीं. शायद मेरे दादा भी अकेलेपन के शिकार थे. मुझे याद है, मैं छोटी सी थी, जब वो बाथरूम में फिसलकर गिर पड़े थे और उनकी मौत हो गई थी. लोग कहते हैं कि उन्हें लकवा मार गया था.
मेरे दादा ऐसे इंसान थे, जिन्होंने अपनी ओर से पूरी कोशिश की. कोई कसर नहीं छोड़ी. वो दोनों औरतों का ख़याल रखते थे. दादाजी ने दोनों बीवियों के लिए पूरा इंतज़ाम किया था.
ख़ामोशी का वो क़रार तोड़ डाला

CHINKI SINHA
हमारे घर के सामने मौजूद ममा का घर
मुझे पूरी बात तो नहीं मालूम. लेकिन, मैं यही यक़ीन बनाए रखना चाहूंगी कि उन्होंने किसी से नाइंसाफ़ी नहीं की.
मेरी दादी, दादा के गुज़र जाने के कुछ बरस बाद तक ज़िंदा रही थीं. वो उसी कमरे में रहती थीं, जहां दो बिस्तर जोड़ कर लगे हुए थे. वो बिस्तर ठीक वैसे ही लगे रहे थे, जैसे इस क़िस्से के आग़ाज़ के वक़्त लगा करते थे.
मेरी नज़र में, मेरी कमज़ोर सी दिखने वाली दादी असल में बड़े मज़बूत इरादों वाली और तटस्थ महिला थीं.
मेरी दादी, मेरी मां से कहा करती थीं कि मर्द तो कुत्तों जैसे होते हैं. वो अपनों के प्रति कभी वफ़ादार नहीं होते हैं. शायद यही वजह है कि मुझे बिल्लियां पसंद हैं.
मैं समझती हूं कि मैंने अपनी ये कहानी इसलिए लिखी, ताकि ख़ुद को बता सकूं कि मैं ऐसी जगह से ताल्लुक़ रखती हूं, जहां हम मोहब्बतें निभाया करते हैं. और मेरे पास एक क्रॉस भी है. बल्कि दो हैं. जिन्हें मैं अपनी उन ममा की याद में अपने पास रखती हूं. मेरे पास मदर मेरी के भी चित्र हैं और क्रिसमस पर मैं अपने अपार्टमेंट को सितारों से सजाती हूं.
मैं अपनी ममा के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सकी थी. मैं बस ये उम्मीद करती हूं कि मेरी याददाश्त मेरा ये भरोसा बनाए रखेगी कि उन्होंने मेरी ममा की आख़िरी ख़्वाहिश का सम्मान किया होगा. मगर, याददाश्त एक बददुआ भी है. मेरी दादी का पीतल का वो डिब्बा आज भी मेरी ड्रेसिंग टेबल की शोभा बढ़ाता है, जिसमें वो पान रखा करती थीं.
मैंने धर्मनिरपेक्षता की विरासत उन्हीं से पाई है. मेरी दादी से. परिवार में और भी कई कहानियां थीं. लेकिन, ये क़िस्सा मेरी असल विरासत है. क्रिसमस का वो पेड़, ममा के चर्च जाने और केक बनाने की यादें.
ज़िंदगी के इस लंबे उतार-चढ़ाव के बावजूद न तो उन्होंने अपना नाम बदला और न ही मज़हब. फिर एक हिंदू और एक ईसाई महिला की दोस्ती और ये हक़ीक़त कि शायद उन दोनों ने एक ही इंसान से मोहब्बत की थी.
मुझे नहीं पता कि प्यार क्या होता है. लेकिन, मुझे ये ज़रूर लगता है कि इसका कोई न कोई ताल्लुक़ इज़्ज़त करने से ज़रूर है. हम ममा और उनके धर्म का सम्मान करते थे. बल्कि, हम इसका जश्न मनाते थे. बात बस इतनी सी है कि हम कभी इसकी चर्चा नहीं करते थे. लेकिन, आज मैंने ख़ामोशी का वो क़रार तोड़ डाला है. (bbc.com)
-सलमान रावी
नई दिल्ली, 12 फरवरी। रक्षा विशषज्ञों का मानना है कि चीन और भारत के बीच हुए समझौते के बाद जल्द ही पूर्वी लद्दाख में 'लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल' (वास्तविक नियंत्रण रेखा) यानी 'एलएसी' पर फ़िंगर-3 और फ़िंगर-8 के बीच के इलाके को फिर से 'नो मेंस लैंड' के रूप में बहाल कर दिया जाएगा.
लेकिन फ़िलहाल इस इलाके में ना तो चीन और ना ही भारत की सेना गश्त लगाएगी. ये व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक इस पर दोनों देशों की सेना के बीच कोई 'आम सहमति' नहीं बन जाती है.
सामरिक मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार अभिजीत अय्यर मित्रा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि 'सैटेलाइट' से जो तस्वीरें इस वक़्त मिल रही हैं उन्हें देखकर पता लग रहा है कि पेंगोंग-त्सो के दक्षिणी इलाके की तुलना में स्पांगुर के इलाके से चीन की 'पीपल्स लिबरेशन आर्मी' (पीएलए) तेज़ी से पीछे हट रही है.
उनका कहना है कि अब तक जो तस्वीरें सामने आयी हैं, उनके हिसाब से चीन की सेना दस किलोमीटर तक पीछे हट चुकी हैं.
अभिजीत अय्यर मित्रा के अनुसार, ''ये अच्छी पहल है क्योंकि अगर आँख में आँख डालकर पीछे हटने की कवायद की जाती तो फिर गलवान जैसे हालात का अंदेशा भी बढ़ जाता, इसलिए दोनों देशों की सेना अपने अपने स्तर पर ख़ुद ही समझौते का अनुसरण कर रही हैं.''

नवंबर 2019 से पहले की स्थिति होगी बहाल
अभिजीत अय्यर मित्रा ने कुछ साल पहले 'सैटेलाइट' की तस्वीरों के माध्यम से एलएसी यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा का अध्ययन किया था.
चीन और भारत की चर्चा करते हुए वो कहते हैं कि इस समझौते के अनुसार, एलएसी पर नवंबर 2019 से पहले की स्थिति बहाल की जायेगी.
इसका मतलब है कि चीन की सेना फ़िंगर 5 और 6 तक पीछे हट जायेगी जबकि भारत की सेना फ़िंगर 3 और चार तक पीछे हटेगी.
वो कहते हैं कि पैंगोंग में अभी ये देखना बाक़ी है जबकि चीन की सेना के जवानों ने फ़िंगर 4 और 5 के बीच पीछे हटना शुरू कर दिया है. ये बताना ज़रूरी है कि नवंबर 2019 से पहले की स्थिति वही है जो मार्च 2012 की स्थिति है.

आख़िर कैसे हुआ चीन राज़ी?
चीन ने मांग रखी थी कि भारत को फ़िंगर 3 और 4 के इलाके में सड़क और भवन के निर्माण के कामों को रोक देना चाहिए. अगर अभी तक जो जानकारी मिल रही है, भारत ने ऐसा नहीं किया है क्योंकि चीन ने भी अपने क़ब्ज़े वाले इलाके में जमकर टैंट भी लगाए हैं और निर्माण के काम भी किये हैं.
सामरिक मामलों के जानकार और लंदन स्थित किंग्स कॉलेज के प्रोफेसर हर्ष वी. पंत ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि दस महीनों तक टस से मस नहीं होने वाला चीन आख़िर पीछे हटने को तैयार ऐसे ही नहीं हो गया.
वो कहते हैं कि चीन ने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि भारत की सेना ने पूर्वी लद्दाख और कैलाश पर्वत के आसपास के ऊँचे पहाड़ी इलाकों पर मोर्चे संभाल लिए हैं.
वो कहते हैं, "ऊंची पहाड़ियों पर भारत की मोर्चेबंदी से चीन को भी परेशानी हो रही थी क्योंकि इस इलाके की भौगोलिक परिस्थिति और मौसम में अपने सैनिकों को ढालना चीन के लिए मुश्किल हो रहा था. वो बहुत लम्बे अरसे तक इसी तरह जमा नहीं रह सकता था और उसके लिए भी पीछे हटना मजबूरी ही थी."
और भी कई वजहें रहीं
भारत और चीन के बीच कमांडर स्तर की बातचीत तो लगातार चल ही रही थी, मगर पिछले दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी चीन के अपने समकक्षों के साथ दोनों देशों के बीच दस महीनों से चल रहे तनाव को कम करने के लिए बातचीत भी की.
बातचीत के बाद केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में कहा कि 'चीन के साथ पैंगोंग झील के उत्तर और दक्षिणी तट पर सेना के पीछे हटने का समझौता' हो गया है.
रक्षा मंत्री ने भी इस बात का ख़ुलासा किया कि भारत की सेना ने कई ऊंचे पहाड़ों पर मोर्चे संभाल रखे हैं.
उन्होंने कहा, "भारतीय सुरक्षा-बल अत्यंत बहादुरी से लद्दाख की ऊंची दुर्गम पहाड़ियों और कई मीटर बर्फ़ के बीच भी सीमाओं की रक्षा करते हुए अडिग हैं और इसी कारण वहाँ हमारी पकड़ बनी हुई है."
राजनाथ सिंह का कहना था कि टकराव वाले क्षेत्रों में 'डिसएंगेजमेंट' के लिए भारत चाहता है कि 2020 की 'फ़ॉरवर्ड डेप्लॉयमेंट्स' या आगे की सैन्य तैनाती जो एक-दूसरे के बहुत नज़दीक हैं, वो दूर कर दी जायें और दोनों सेनाएं वापस अपनी-अपनी स्थायी एवं पहले से मान्य चौकियों पर लौट जाएं.
उनका ये भी कहना था कि पैंगोंग झील के इलाक़े में चीन के साथ 'डिसएंगेजमेंट' के समझौते के अनुसार दोनों पक्ष अपनी आगे की सैन्य तैनाती को 'चरणबद्ध, समन्वय और प्रामाणिक' तरीक़े से हटाएंगे.
अब आगे क्या होगा?
चीन और भारत के बीच अगले दौर की बातचीत जल्द ही होने वाली है जिसमें दोनों देशों की सेना के बीच बाक़ी की औपचारिकताएं पूरी की जायेंगी.
रक्षा विशेषज्ञ अजय शुक्ला के अनुसार, पैंगोंग सेक्टर में चीन ने कुछ हथियारबंद गाड़ियों और टैंकों को पीछे ज़रूर कर लिया है लेकिन सैनिकों की 'पोज़िशन' में अभी तक कोई बदलाव नहीं दिख रहा है.
उन्होंने गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि चीन को फ़िंगर 4 तक पेट्रोलिंग करने का अधिकार दे दिया गया है जिसका मतलब ये होता है कि एलएसी की स्थिति फ़िंगर 8 से हटकर अब फ़िंगर 4 पर शिफ़्ट होती नज़र आ रही है.
शुक्ला का तर्क है कि चीन की सेना का असल मक़सद शुरुआत से ही पूर्वी लद्दाख में डेपसांग पर कब्ज़ा करना ही है. वो कहते हैं कि चीन की तरफ़ से डेपसांग के बारे में एक शब्द भी सुनने को नहीं मिला. उन्होंने इस बात पर शक ज़ाहिर किया है कि चीन की सेना का डेपसांग से पीछे हटने का कोई इरादा हो.
लेकिन सामरिक मामलों के जानकारों ने बीबीसी को बताया है कि अभी तो ये एक पहल है और अभी दोनों देशों क बीच कई और दौर की वार्ता होगी जिसमें डेपसांग और दूसरे कई अहम बिन्दुओं को उठाया जाएगा और उनका समाधान किया जाएगा. (bbc.com/hindi)
अनंत प्रकाश
मंगोलपुरी से, 12 फ़रवरी। उत्तर पश्चिमी दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में रिंकू शर्मा नाम के एक युवक की हत्या के बाद इस बात पर बहस छिड़ी है कि इस घटना की वजह क्या थी. सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर लोग लिख रहे हैं कि रिंकू को इसलिए मारा गया क्योंकि वह हिंदू था और उसका संबंध बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से था.
दिल्ली पुलिस का कहना है कि यह सांप्रदायिक हिंसा का मामला नहीं है, बल्कि आपसी रंजिश का मामला है जिसकी वजह से यह हत्या हुई है, पुलिस ने इस सिलसिले में चार लोगों को गिरफ़्तार किया है. इलाके में तनाव को देखते हुए वहाँ अर्धसैनिक बल की तैनाती की गई है.
दोपहर में क्या हुआ था?
शुक्रवार दोपहर रिंकू शर्मा के मोहल्ले मंगोलपुरी पहुंचने से पहले इस बीबीसी संवाददाता ने बाहरी दिल्ली के एडिशनल डीसीपी सुधांशू धामा से बात की.
धामा बताते हैं, "परसों रात को कुछ लड़के बर्थडे पार्टी के लिए मंगोलपुरी के इलाके में इकट्ठे हुए थे. इसी पार्टी के दौरान इन लोगों के बीच एक रेस्तरां को लेकर झगड़ा हुआ है. दोनों पक्षों की अलग-अलग रेस्तरां में हिस्सेदारी थी. मृतक की कोई हिस्सेदारी नहीं थी लेकिन इनके मित्र हैं सचिन और आकाश जिनका रेस्तरां था. इसके साथ ही चिंगू उर्फ जाहिद ने रोहिणी में एक रेस्तरां खोला था."

एडिशनल डीसीपी ने बताया कि मृतक रिंकू शर्मा के मित्र का रेस्तरां लॉकडाउन की वजह से बंद हो गया था. इसी मामले में झगड़ा शुरू हुआ था. झगड़ा बढ़ते-बढ़ते चिंगू उर्फ जाहिद वहां से चले गए. इसके बाद वह अपने मामा और तीन चार रिश्तेदारों को लेकर रिंकू के घर पहुंचे थे. जाहिद के मामा दानिश उर्फ़ लाली का घर मृतक के घर की गली में ही था. यहीं पर इनके बीच झगड़ा शुरू हुआ जिसके दौरान रिंकू को चाकू मार दिया गया. इसके बाद रिंकू को अस्पताल ले जाया गया जिसके बाद इलाज के दौरान रिंकू की मृत्यु हो गई.
धामा ने बताया, "इस मामले में शामिल लोगों को तभी गिरफ़्तार कर लिया गया था, इन चारों का आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. अभी तक इस मामले में किसी भी तरह का सांप्रदायिक एंगल सामने नहीं आया है. ये पूरी तरह एक व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता का मामला है. ये लोग एक दूसरे के पड़ोस में रहते थे और एक दूसरे को जानते थे, ऐसे में ऐसी कोई बात नहीं है कि सांप्रदायिक वैमनस्य का मामला हो."
हालांकि रिंकू के परिवार के कुछ लोगों ने मीडिया से यह बात कही है कि हत्या की वजह उसका हिंदू होना था, वह बजरंग दल का कार्यकर्ता था और राम मंदिर के निर्माण के लिए चंदा जुटा रहा था, ऐसा कहने वालों में रिंकू का छोटा भाई भी शामिल है.
क्या कहते हैं आम लोग?
दिल्ली पुलिस जानकारी मिलने के बाद बीबीसी संवाददाता मृतक के घर पहुंचा जहाँ राजनीतिक हस्तियों का आना-जाना लगा हुआ था. मौके पर पहुंचने पर बीजेपी सांसद हंसराज हंस, आम आदमी पार्टी की विधायक राखी बिड़ला और दिल्ली बीजेपी के प्रमुख आदेश गुप्ता वहां पहुंचते दिखे.
बीबीसी संवाददाता ने मृतक के घर पहुंचने की कोशिश की लेकिन राजनेताओं के आने की वजह से काफ़ी भीड़ मौजूद थी. ऐसे में पहले आम लोगों से बातचीत करने का फ़ैसला किया.

बीजेपी सांसद हंसराज हंस मृतक रिंकू के घर भी पहुंचे. TWITTER/HANSRAJHANSHRH
लोगों से बात करके ये समझने की कोशिश की कि क्या इस मोहल्ले में पहले भी कभी दोनों समुदायों के बीच सांप्रदायिक अशांति का माहौल पनपा है.
मृतक रिंकू के घर के पास रहने वाले एक शख़्स ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "इसे हिंदू-मुस्लिम का रंग दिया जा रहा है. यहां पर काफ़ी मुसलमान रहते हैं, देखिए आपके पीछे ही अज़ान की आवाज़ आ रही है. मैं यहां लगभग 40-45 सालों से रह रहा हूं, यहां कभी ऐसा नहीं हुआ."
इसी मोहल्ले में थोड़ा आगे बढ़ते हुए मैं एक मंदिर में पहुंचा जहां हमारी बात एक 50 वर्षीय महिला से हुई. उन्होंने कहा, "रिंकू बहुत अच्छा लड़का था. पंडित घर से था, मंदिर में आकर पूजा-पाठ किया करता था. कभी झंडे लगा देता था और जब दिख जाता था तो हालचाल पूछ लेता था. सीधा-सादा लड़का था. उसके घर वाले भी बहुत अच्छे हैं. ये बहुत बुरा हुआ है."
बीबीसी संवाददाता ने जब गिरफ़्तार किए गए लड़कों और उनके परिवार के बारे में पूछा तो महिला ने कहा, "हम कायस्थ हैं. हम उन लोगों से मतलब नहीं रखते. वे छोटी जाति हैं. हमारी गली में भी दो घर हैं. हम किसी तरह का मतलब नहीं रखते. इन लोगों के इस मोहल्ले में एक नहीं कई घर हैं. एक-एक के चार-चार लड़के हैं और सब के सब लड़ाई झगड़ा करने में आगे हैं." इन्हीं महिला ने हमें गिरफ़्तार किए गए लोगों के घर का रास्ता दिखाया.
मंदिर से लगभग पचास कदम की दूरी पर गुलाबी रंग से पुता हुए एक पुराना सा घर था जो कि अब खाली पड़ा है. यहां आस-पास खड़े लोगों ने बताया कि ये सारे लोग भाग गए हैं. वहीं रहने वाले महताब के पड़ोसियों से बात करने की कोशिश करने पर वहां मौजूद कई महिलाओं ने कहा कि अब काफ़ी डर लगता है कि भगवान का नाम लेने पर मार दिया जाएगा. महताब के घर के दाईं ओर स्थित घर में रहने वाली लगभग पचास वर्षीय ललिता से बात की तो उन्होंने भी यही बात की. लेकिन जब उनसे ये पूछा गया कि क्या कभी उन्हें धार्मिक आयोजन कराने पर अपने पड़ोसी (महताब के परिवार) की ओर से आपत्ति का सामना करना पड़ा तो इस पर उन्होंने कहा कि उनके साथ ऐसा कभी नहीं हुआ.

बीबीसी संवाददाता ने महताब के घर के सामने रहने वाले कई लोगों से बात की. यहां पर मौजूद दो लोगों ने नाम न बताने की शर्त पर स्पष्ट रूप से बताया कि वे जागरण आदि का आयोजन करते थे, सड़क पर ही खाना बनता था लेकिन कभी भी पेशे से दर्जी महताब के पिता या खुद महताब की ओर से आपत्ति नहीं की गई.
इन लोगों ने ये भी बताया कि इस घटना में जो चाकू इस्तेमाल किया गया था वो मृतक रिंकू शर्मा का था. ये बताते हुए हत्या के समय रिकॉर्ड किया गया वीडियो का हवाला दिया गया.
नाराज़ भीड़ का हमला
महताब के घर के बाहर उनके पड़ोसियों से बातचीत जारी ही थी कि तभी लाल और ग्रे स्वेटर पहने दो व्यक्तियों ने बीबीसी संवाददाता को घेरना शुरु कर दिया.
सबसे पहले ऊंची आवाज़ में धक्का-मुक्की करते हुए आक्रामक ढंग से धमकाने की कोशिश की गई, इसके बाद इन लोगों ने और लोगों को बुलाना शुरू कर दिया जिससे भीड़ बढ़ने लगी.
इन लोगों ने धमकी दी गई कि हाथ-पैर तोड़ दिए जाएंगे, यहीं कचूमर निकाल देंगे, चला जा यहां से. प्रेस कार्ड माँगने पर आईडी कार्ड दिखाया गया जिस पर बीबीसी का नाम देखते ही ये लोग और आग-बबूला हो गए.
ये सब कुछ मुख्य सड़क से सिर्फ 15 मीटर की दूरी पर हो रहा था लेकिन हर एक कदम मुख्य सड़क की ओर बढ़ाना भारी पड़ रहा था. बाहर जाने की कोशिश करते ही गालियाँ देती हुई भीड़ पीछे से आने लगती थी.
गली से बाहर जाते हुए पीठ पर घूंसों से वार भी किया गया. किसी तरह 15 मीटर का फ़ासला तय किया गया तो बीएसएफ़ के दो जवान दिखाई दिए. बीएसएफ़ के जवानों को देखकर बीबीसी संवाददाता ने राहत की साँस ली.
मुख्य सड़क पर मौजूद बीएसएफ़ के जवानों के पास पहुंचते ही उन्हें अपना आई कार्ड दिखाकर मदद की माँग की लेकिन जवानों ने हमलावरों को कुछ नहीं कहा. इसके बाद संवाददाता ने किसी तरह मुख्य सड़क पर आगे चलते हुए खुद को बचाने की कोशिश की. लेकिन तभी दो हमलावर अपने साथ भीड़ को लेकर सड़क तक आए और एक बार फिर हाथ पकड़कर गली के अंदर ले जाने की कोशिश की. इसी बीच एक टीवी पत्रकार ने बीबीसी संवाददाता का हाथ पकड़कर वहां से निकाला.
हमलावर भीड़ ने आम लोगों से उनका पक्ष रखने का अधिकार छीन लिया, अफ़सोस इस बात का है कि वो लोग जो दोनों पक्षों से परिचित हैं, वे हमलावर भीड़ के सामने बेहद असहाय होकर एक पत्रकार को अपने बीच से जान बचाकर निकल जाने की सलाह देते दिखे. (bbc.com/hindi)
नई दिल्ली, 12 फरवरी | भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) अपने 28 नवंबर, 2019 के उस आदेश पर पुनर्विचार कर सकती है, जिसमें उसने अमेजन और फ्यूचर कूपन्स के बीच समझौते को मंजूरी दी थी। गौरतलब है कि अपनी 2019 की फाइलिंग में अमेजन ने सीसीआई को यह नहीं बताया था कि जब उसने फ्यूचर कूपन्स में निवेश किया था तो उसने बिग बाजार और अन्य कंपनियों के प्रमोटरों को भारत में किसी अन्य रिटेलर के साथ साझेदार बनाने या सहयोग करने एवं बिक्री पर रोक लगाई थी।
सीसीआई ने जो मंजूरी प्रदान की थी वह सशर्त थी। सीसीआई अनुमोदन आदेश के बिंदु 16 में कहा गया है कि अगर अधिग्रहणकर्ता द्वारा दी जानकारी किसी भी वक्त गलत पाई गई तो उसी समय यह आदेश निरस्त हो जाएगा। इस अनुमोदन को अधिनियम के अन्य प्रावधानों के उल्लंघन के लिए आयोग के समक्ष बाद की कार्यवाही से किसी भी तरह से प्रतिरक्षा के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
अमेजन ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष कई बार गुहार लगाई कि वह अपने "पहले इनकार के अधिकार" को बरकरार रखने और रिलायंस समूह के साथ बिग बाजार व अन्य खुदरा व्यवसायों के विलय को रोकने की मांग कर रहा है।
बॉम्बे हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विक्रम ननकानी ने आईएएनएस को बताया कि अमेजन एक स्व-सेवारत विवाद को बढ़ाते हुए कानूनन अपनी स्थिति से संभावित रूप से समझौता कर चुका है। इस तरह यह संभावित रूप से विभिन्न नियामकों से जांच को आमंत्रित कर रहा है। इस बाबत ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने पहले ही एक जांच शुरू कर दी है। प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा 2019 में दी गई मंजूरी को संशोधित करने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
अमेजन ने अपनी 2019 की फाइलिंग में कहा था कि निवेशक (अमेजन) ने एफसीएल के व्यापार को मजबूत करने व बढ़ाने और कंपनी की वैल्यू में वृद्धि करने के उद्देश्य से एफसीएल में निवेश करने का फैसला किया है। इस उद्देश्य में कॉर्पोरेट ग्राहकों को लॉयल्टी कार्ड्स, कॉर्पोरेट गिफ्ट कार्ड और रिवॉर्ड कार्ड का विपणन और वितरण शामिल है।
इसने यह भी कहा था कि "प्रस्तावित संयोजन एफसीएल को डिजिटल भुगतान समाधानों और लॉन्च उत्पादों में वैश्विक रुझान सीखने का अवसर प्रदान करेगा.. इन-बिल्ट भुगतान तंत्र के उपयोग से ग्राहक आधारित और बढ़ी हुई लॉयल्टी प्राप्त हो सकती है"।
सीसीआई ने उसके आवेदन का अवलोकन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि फ्यूचर कूपन्स और अमेजन पे एक साथ काम करते हैं तो निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के लिए कोई खतरा नहीं है।
प्रवर्तन निदेशालय ने अमेजन पर एफडीआई कानूनों के उल्लंघन के लिए अपनी जांच शुरू कर दी है। हालांकि अमेजन ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष यह गुहार लगाई है कि इसका समझौता इसे किसी अन्य पार्टी को बिग बाजार और संबद्ध खुदरा व्यवसायों की बिक्री को प्रतिबंधित करने का अधिकार देता है।
सूत्रों ने कहा कि इस मामले की ईडी द्वारा जांच के बाद इस बात की संभावना प्रबल हो गई है कि सीसीआई भी ईडी के नक्शे कदम पर चल सकती है। (आईएएनएस)
भोपाल, 12 फरवरी | मध्य प्रदेश धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए धर्म स्वातं˜य अध्यादेश लागू हुए एक माह हो चुका है और इस अवधि में लव जिहाद के 23 मामले सामने आए हैं। राज्य के गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने सवांददाताओं से चर्चा के दौरान बताया कि बीते एक माह की अवधि में राज्य में 23 मामले धर्म स्वातं˜य अध्यादेश के तहत आए हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले सात भोपाल संभाग में सामने आए हैं। इसके अलावा जबलपुर व रीवा में चार-चार और ग्वालियर में तीन मामले दर्ज किए गए हैं।
ज्ञात हो कि राज्य में धर्म स्वातं˜य अध्यादेश जनवरी में अस्तित्व में आया है। इस कानून के तहत बहला फुसलाकर धर्म परिवर्तन कराकर विवाह करने या करवाने वाले को एक से 10 साल तक की सजा का प्रावधान है। (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 12 फरवरी । महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने शुक्रवार को केंद्र द्वारा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में निराश्रित महिलाओं के लिए लागू की जा रही तीन पेंशन योजनाओं से लोकसभा को अवगत कराया। ईरानी ने कहा कि पहली योजना 'इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना' के तहत, गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) परिवारों की विधवाओं को पेंशन प्रदान की जानी है। यह ग्रामीण विकास मंत्रालय के राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) के तहत एक उप-योजना है।
इस योजना के तहत, प्रति माह 300 रुपये की केंद्रीय सहायता विधवाओं को 40-79 वर्ष की आयु में प्रदान की जाती है और 80 वर्ष प्राप्त करने पर राशि बढ़ाकर 500 रुपये प्रति माह कर दी जाती है।
दूसरी योजना 'स्वाधार गृह योजना' है, जिसके तहत ट्रैफिकिंग की शिकार महिलाओं के लिए एक सहायक संस्थागत ढांचा प्रदान किया जाता है, ताकि वे अपने जीवन को सम्मान और ढृढ़ विश्वास के साथ जी सकें।
ऐसी महिलाओं को योजना के तहत आश्रय, भोजन, कपड़े, चिकित्सा देखभाल, कानूनी सहायता और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाना है।
तीसरी योजना 'विधवाओं के लिए घर' की स्थापना उत्तर प्रदेश में 1,000 विधवाओं की क्षमता के साथ की गई है, जहां इनके ठहरने, स्वास्थ्य सेवाओं, पौष्टिक भोजन, कानूनी और परामर्श सेवाओं का सुरक्षित स्थान प्रदान किया जाता है।
एनएसएपी योजनाओं के तहत लाभार्थियों की गणना 2004-05 अनुमानित गरीबी अनुपात के आधार पर की जाती है। (आईएएनएस)
उज्जैन, 12 फरवरी | मध्य प्रदेश में भाजपा के विधायकों की दो दिवसीय पाठशाला उज्जैन में चल रही है। इस दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर के पहले दिन सबसे ज्यादा जोर सत्ता और संगठन में समन्वय पर दिया गया। साथ ही विधायकों को हिदायत दी गई कि वे विनम्र रहें। भाजपा संगठन लगातार अपने कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों और मंत्रियों को समय-समय पर प्रशिक्षण देता रहता है। इसी क्रम में विधायकों को भी दो दिवसीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण के पहले दिन अधिकांश नेताओं का जोर सत्ता और संगठन में समन्वय पर तो रहा ही, साथ में पार्टी की रीति-नीति के मुताबिक काम करने पर जोर दिया गया।
भाजपा का विधायकांे का यह प्रशिक्षण इस लिहाज से महत्वपूर्ण है, क्योंकि 19 विधायक ऐसे हैं जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए हैं। इन विधायकों को भी पार्टी की रीति-नीति और कार्य व्यवहार से अवगत कराना खास मकसद माना जा रहा है।
प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा ने कहा कि, "आज प्रदेश का जो परि²श्य है और आपके क्षेत्र की जो परिस्थितियां हैं, हमें उन सभी का चिंतन करने की आवश्यकता है, क्योंकि एक ओर तो हम दिन-रात परिश्रम करके देश, प्रदेश और समाज के उत्थान का प्रयास कर रहे हैं, दूसरी ओर ऐसी तमाम शक्तियां हम पर चौतरफा हमला कर रही हैं, जो भारत को आगे बढ़ते देखना नहीं चाहतीं, ऐसी शक्तियों को सामूहिक समन्वय से परास्त करना है। इस सामूहिक समन्वय का अर्थ है, कि अपनी सरकारों के काम को समाज तक ले जाएं, कार्यकर्ता की मेहनत का सम्मान करें और आपस में शुद्ध सात्विक संबंधों का निर्माण करें।"
उन्होंने कहा कि प्रतिकूलता में संघर्ष से आगे बढ़ा जा सकता है, लेकिन अनुकूलता में हमारे कारण प्रतिकूलता खड़ी न हो, इसके लिए विनम्रता की आवश्यकता होती है। समन्वय और विचारधारा हमारी सफलता का आधार है और इसे स्थायित्व देने के लिए ही इस प्रकार के प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन किया जाता है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भाजपा अंधकार में प्रकाश फैलाने के लिए दीपक की भूमिका निभाने वाला दल है। पार्टी रूपी दीपक के प्रकाश में बढ़ोत्तरी करने और उसे तेज हवाओं से बचाने के लिए जो कांच लगाया जाता है, वह पार्टी का कार्यकर्ता है। जिस प्रकार से दीपक के कांच को बार-बार साफ करना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार से प्रशिक्षण वर्गों में कांच रूपी कार्यकर्ता को प्रशिक्षित करके उसे और पारदर्शिता एवं प्रमाणिकता के साथ काम करने के लिए तैयार किया जाता है।
प्रशिक्षण वर्ग के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने की। इससे पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा, प्रदेश सहप्रभारी पंकजा मुंडे, प्रदेश संगठन महामंत्री सुहास भगत, प्रदेश सह संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा, केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल, सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया, केंद्रीय मंत्री फग्गनसिंह कुलस्ते, राष्ट्रीय मंत्री ओमप्रकाश धुर्वे आदि ने दीप प्रज्जवलन कर वर्ग का शुभारंभ किया। (आईएएनएस)
गाजीपुर बोर्डर, 12 फरवरी | कृषि कानून के खिलाफ किसानों को प्रदर्शन करते हुए शुक्रवार को 80 दिन हो चुके हैं। हल्की ठंड में शुरू हुआ ये आंदोलन अब मौसम के साथ अपना तापमान बदल रहा है। तापमान बढ़ता देख किसान भी उसी हिसाब से तैयारियां करने लगे हैं। गाजीपुर बॉर्डर पर लगे टेंट में अब सुबह के बाद से ही उमस बढ़ने लगती है। बॉर्डर पर धीरे धीरे करवट बदल रहे मौसम के देख किसान उसी अनुसार खुद को ढाल रहे हैं। किसानों ने गर्मी के मौसम को देखते हुए टेंट में पंखे लगवाना शुरू कर दिए हैं, तो टेंट की ऊंचाई को भी बढ़ा रहे हैं और उसके अंदर अपने टेंट लगा रहे हैं, ताकि गर्मी की तपिश से सीधे पाला न पड़े।
दरअसल किसानों ने इस आंदोलन के दौरान बे मौसम बारिश और कड़ाके की ठंड को भी झेला लेकिन फिर भी अपने प्रदर्शन को जारी रखा, ऐसे में मौसम धीरे धीरे करवट बदल रहा है, हालांकि सुबह- शाम तो मौसम सर्द है, लेकिन दोपहर में काफी गर्मी बढ़ जाती है।
एक तरफ सरकार किसानों से बातचीत करने को तैयार है, वहीं किसानों का कहना है कि हम भी बातचीत चाहते हैं। लेकिन बातचीत करने की पहल कौन करे इस पर पेंच फंसा हुआ नजर आ रहा है।
किसान संगठन के नेता राकेश टिकैत 2 अक्टूबर तक इस आंदोलन को जारी रखने की बात कह चुके हैं। हालांकि बॉर्डर पर इसी को देखते हुए सरकार के खिलाफ लड़ाई की तैयारी चल रही है।
बढ़ती गर्मी को देख बॉर्डर पर खड़ी ट्रॉलियों में एसी नजर आने लगे हैं, और किसानों के अनुसार इस तरह की ट्रॉलियां और मंगाई जा रही हैं। ताकि गर्मी से निपटा जा सके।
किसानों द्वारा लगाए गए टेंट में भी बदलाव किए जा रहे हैं, इन पंडालों को ऊंचा किया जा रहा है ताकि गर्मी की तपिश से बचा जाए वहीं इन्ही पंडालों के अंदर छोटे टैंट लगाए गए हैं।
दरअसल अधिकतर टेंट तिरपाल से बने हैं या तो प्लास्टिक की पन्नियों से जिसके कारण सूरज की तपिश से इन टेंट में उमस बढ़ जाती है। जिसकी वजह से इन टेंट में रुकना नामुमकिन सा लगने लगा है।
यही वजह है कि गर्मी से बचाव और आंदोलन को जारी रखने के लिए बदलाव किए जा रहे हैं। हालांकि गर्मी से निपटने के लिए पंखे भी लगवाए जा रहे हैं।
उधर दूसरी ओर किसान संगठनों द्वारा किसान महापंचायतों का दौर भी जारी है। किसान संगठनों के अनुसार देशभर में किसानों से मिल रहे भारी समर्थन से यह तय है कि सरकार को तीन कृषि कानूनों को वापस करना पड़ेगा।
शुक्रवार को बिलारी और बहादुरगढ़ में आयोजित महापंचायतों में किसानों एवं लोगों का भारी समर्थन दिखाई दिया, इस दौरान किसान नेताओं ने कहा है कि, "रोटी को तिजोरी की वस्तु नहीं बनने देंगे और भूख का व्यापार नहीं होने देंगे।"
किसान नेताओं का कहना है कि, "सरकार की किसान विरोधी और कॉरपोरेट पक्षीय मंशा इसी बात से भी स्पष्ट होती है कि बड़े बड़े गोदाम पहले ही बन गए और फिर कानून बनाये गए।"
किसान संगठनों के अनुसार इस आंदोलन के दौरान अब तक 228 किसान शहीद हो चुके हैं। वहीं दूसरी ओर 14 फरवरी को, पुलवामा हमले के शहीदों को याद करते हुए, पूरे भारत के गांवों और कस्बों में मशाल जूलूस और कैंडल मार्च का आयोजन किया जाएगा।
आंदोलन में शहीद किसानों को श्रद्धांजलि भी दी जाएगी। जय जवान, जय किसान के आंदोलन के आदर्श को दोहराया जाएगा। (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 12 फरवरी | सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आंध्र प्रदेश से ओडिशा की एक याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें उसने दक्षिणी राज्य के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ अपने तीन 'विवादित क्षेत्र' वाले गांवों में पंचायत चुनावों की अधिसूचना जारी करने के लिए अवमानना कार्रवाई करने की मांग की है। न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति अनिरूद्ध बोस की पीठ ने इस मुद्दे पर तत्काल आदेश पारित करने से इनकार कर दिया। अदालत ने आंध्र प्रदेश सरकार से 19 फरवरी को इस मामले में जवाब देने को कहा है।
सुनवाई के दौरान ओडिशा सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील विकास सिंह ने कहा कि आंध्रप्रदेश उसके नियंत्रण वाले विवादित क्षेत्र में पंचायत चुनाव करा रहा है।
पीठ ने आंध्रप्रदेश के वकील महफूज ए. नाज्की से कहा कि ओडिशा की याचिका पर राज्य का जवाब दाखिल करें। पीठ ने मामले में अगले शुक्रवार को आगे की सुनवाई तय की है।
ओडिशा सरकार ने कहा कि विवाद के अंतर्गत आने वाले गांव ओडिशा के कोरापुट जिले के पोतांगी तालुका का हिस्सा हैं। कोटिया समूह में 21 गांव हैं, जो विवाद में उलझे हुए हैं। 1968 में शीर्ष अदालत द्वारा यथास्थिति आदेश पारित किया गया था और वही आदेश आज तक जारी है।
ओडिशा सरकार ने अपनी याचिका में कहा, "प्रशासनिक रूप से और अन्यथा, ओडिशा राज्य का इन गांवों पर नियंत्रण रहा है।"
ओडिशा सरकार ने याचिका में आरोप लगाया कि आंध्र प्रदेश सरकार ने अदालत की अवमानना करते हुए इस अदालत के आदेश का उल्लंघन किया है। (आईएएनएस)
शिमला, 12 फरवरी | हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के सात बार विधायक रहे सुजान सिंह पठानिया का शुक्रवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 78 वर्ष के थे। कांगड़ा जिले के फतेहपुर में अपने पैतृक आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वह वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में मंत्री भी थे। वह अभी फतेहपुर से कांग्रेस के मौजूदा विधायक थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी ओर एक बेटा भी है।
उनके परिवार वालों का कहना है कि अधिक आयु हो जाने के कारण उन्हें कई तरह की शारीरिक परेशानी थी। उनका अंतिम संस्कार शनिवार को किया जाएगा।
हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल बंडारु दत्तात्रेय और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने उनके देहावसान पर दुख व्यक्त किया है। (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 12 फरवरी | केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेद्र प्रधान ने शुक्रवार को केंद्रीय बजट 2021-22 का बचाव करते हुए कहा कि इससे लोगों पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ा है और यह ऐसे समय में आया है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोनावायरस महामारी की चपेट में है। उन्होंने यहां युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटन को पिछले वर्ष की तुलना में 137 प्रतिशत बढ़ाकर 2.23 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है, जिसमें कोरोना टीकाकरण के लिए भी 35,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
सरकार द्वारा प्रस्तावित विभिन्न कल्याणकारी उपायों को लोगों के बताने के भाजपा के ड्राइव के तहत युवाओं को संबोधित कर रहे थे।
मंत्री ने कहा, "स्वास्थ्य के लिए बजट में टीकाकरण के लिए 35,000 करोड़ रुपये का प्रावधान है। हम कई देशों को 'वसुधैव कुटुम्बकम' के भारतीय दर्शन के अनुरूप टीका लगाने में मदद कर रहे हैं।"
उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री की सलाह के आधार पर 'जान है तो जहान है' में नागरिकों के स्वास्थ्य और कल्याण का ध्यान रखा गया है।"
प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को आत्मनिर्भर भारत का बजट पेश करने के लिए धन्यवाद दिया।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने महामारी के दौरान प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के जरिए 80 करोड़ लोगों की देखभाल करने की जिम्मेदारी ली थी। (आईएएनएस)
कानूनों में कमियां हों या सामाजिक मान्यताएं, दुनिया भर में किसी ना किसी वजह से महिलाओं को जमीन का अधिकार हासिल करने में कई अड़चनों का सामना करना पड़ता है.
(dw.com)
एक नए अध्ययन में इस बात के सबूत सामने आए हैं कि जमीन पर अधिकार देने से ना सिर्फ महिलाओं को बल्कि समुदायों को भी जलवायु परिवर्तन के असर से बचाया जा सकता है. दुनिया में जितने लोग जीविका चलाने के लिए जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर पूरी तरह से निर्भर हैं उनमें आधे से ज्यादा आबादी महिलाओं की है. इसके बावजूद, अपनी जमीन से जीविका चलाने वाले किसानों में सिर्फ 14 प्रतिशत महिलाएं हैं. अफ्रीका और पूर्वी एशिया में ऐसी महिलाओं की संख्या और भी कम है.
निजी संस्था रिसोर्स इक्विटी और थिंक टैंक वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (डब्ल्यूआरआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार जहां महिलाओं के जमीन के अधिकारों को मान्यता मिली हुई है उन देशों में भी महिलाओं को कई तरह की रुकावटों का सामना करना पड़ता है.
डब्ल्यूआरआई के लिए काम करने वाली शोधकर्ता सेलिन साल्सेदो-ला वीना का कहना है, "महिलाओं के पास उनकी सामुदायिक जमीन के इतिहास की गहरी जानकारी होती है. उस जमीन पर काम करने के लिए जिम्मेदार होने की वजह से उन्हें यह मालूम होता है कि उसका प्रबंधन कैसे करना है और वो उपजाऊ रहे यह सुनिश्चित कैसे करना है."

भारत में एक महिला किसान खेतों में काम करती हुई.
लेकिन उन्होंने बताया कि इसके बावजूद नीतियां अक्सर जमीन या संपत्ति का अधिकार महिलाओं को देने पर केंद्रित नहीं होती. सेलिन मानती हैं कि सामुदायिक संसाधनों पर अगर महिलाओं को अधिकार दिए जाएंगे तो इससे उनके लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी और सूखे जैसे 'क्लाइमेट शॉक्स' के प्रति उन्हें मजबूती मिलेगी.
सेलिन के अनुसार, "जब महिलाओं को अधिकार दिए जाते हैं तो इससे उनके पूरे समुदायों को फायदे मिलते हैं. इन फायदों में खाद्य सुरक्षा, बच्चों के लिए स्वास्थ्य-शिक्षा में निवेश और भूमि का बेहतर प्रबंधन शामिल हैं. ये सब एक समुदाय की जलवायु परिवर्तन का मजबूती से सामना करने की क्षमता को बढ़ाने में योगदान देते हैं.
जैसे जैसे देश अपनी अपनी अर्थव्यवस्थाओं को कोरोना वायरस महामारी के असर से निकालने की कोशिश में आगे बढ़ेंगे, वैसे वैसे पहले से ज्यादा सामुदायिक संसाधनों का निजीकरण करने की जरूरत पड़ सकती है. इससे उन ग्रामीण समुदायों को नुकसान होगा जिनके पास आधिकारिक रूप से जमीन के अधिकार नहीं हैं.
समुदायों पर अध्ययन करने वाली सेलिन ने कहा कि इन संसाधनों पर अगर महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित किए जाएंगे तो इससे इन संसाधनों को बेहतर सुरक्षित रखा जा सकेगा. सेलिन ने कैमरून, मेक्सिको, इंडोनेशिया, नेपाल और जॉर्डन में समुदायों का अध्ययन किया है. इन सभी देशों में महिलाओं के पास ऐसे अधिकार हैं.
इंडोनेशिया के रिआऊ प्रांत में मोल्ल निवासियों का एक समुदाय है जिनके पास जंगलों का इस्तेमाल करने के अधिकार भी हैं. इस समुदाय ने युवाओं को जीविका के ज्यादा अवसर दिए हैं और जमीन को आधिकारिक रूप से महिलाओं के नाम करके जंगलों को व्यापारिक खेती से भी बचाया है.
कानूनी और सामाजिक रूप से मान्यता प्राप्त जमीन के अधिकार मिलने से घरों में और सामुदायिक फैसले लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका भी बढ़ जाती है. सेलिन कहती हैं, "महिलाएं सामुदायिक जमीन का इस्तेमाल कर मिल जुल कर काम शुरू कर सकती हैं जिनसे पूरे समुदाय का फायदा होगा. इस तरह के काम से समुदाय की कमाई भी बढ़ेगी जिस से सबकी स्वायत्तता और मुश्किल हालात का सामना करने की क्षमता भी बढ़ेगी."
सेलिन ने यह भी कहा, "जब ऐसा होता है तब लोकों की जीविका ज्यादा सुरक्षित होती है और समुदायों की बाहरी निवेशकों को 'हां' कहने की मजबूरी घट जाती है. वो 'ना' कहने के लिए भी और सशक्त महसूस करते हैं. चिआंग माई विश्वविद्यालय के मेकॉन्ग लैंड रिसर्च फोरम में संयोजक डेनियल हेवर्ड का कहना है कि परिवार और सामुदायिक दोनों ही स्तर पर जमीन के प्रबंधन में महिलाएं जो भूमिका निभाती हैं उसे मान्यता देने की "नैतिक जरूरत" है.
उनका कहना है, "महिलाएं जमीन की कुशल प्रबंधक होती हैं और कानूनी रूप से अगर उन्हें अपने अधिकार और नियंत्रण बढ़ाने के लिए सशक्त किया जाएगा तो उन्हें बाहर के खतरों का सामना करने वाले महत्वपूर्ण नेताओं के रूप में तब्दील किया जा सकता है."
सीके/एए (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)
नई दिल्ली, 12 फरवरी | बजट सत्र के पहले चरण के आखिरी दिन लोकसभा की कार्यवाही शनिवार अपराह्न् 4 बजे के बदले सुबह 10 बजे से होगी। कोविड-19 संकट के कारण इस सत्र के दौरान कार्यवाही अपराह्न् 4 बजे से हो रही थी। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने शुक्रवार को प्रश्नकाल पूरा होने के बाद इस बारे में घोषणा की। यह निर्णय सभी सांसदों के अनुरोध के बाद लिया गया है।
इस बजट सत्र की शुरुआत से, लोकसभा की कार्यवाही 29 जनवरी और 1 फरवरी को छोड़कर 4 बजे से आयोजित की जा रही थी। 29 जनवरी को संसद के संयुक्त बैठक में राष्ट्रपति के अभिभाषण था और एक फरवरी को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2021-2022 प्रस्तुत किया था।
इस वर्ष कोविड-19 महामारी के कारण बजट सत्र दो भागों में आयोजित किया जा रहा है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों के लिए बजट सत्र का पहला भाग 15 फरवरी को समाप्त होगा, जबकि दूसरा भाग 8 मार्च को शुरू होगा और 8 अप्रैल को समाप्त होने की उम्मीद है।
प्रारंभिक कार्यक्रम के अनुसार, राज्यसभा की बैठक सुबह 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक आयोजित की गई। जबकि लोकसभा की कार्यवाही समय शाम 4 बजे से रात्रि 9 बजे तक निर्धारित है। (आईएएनएस)
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा रैंकिंग में 78 प्रतिशत कोरोना वैक्सीनेशन के साथ बिहार पहले नंबर पर है. लेकिन कोरोना जांच में गड़बड़ी के मामले भी सामने आए हैं. इन आरोपों से पूरी प्रक्रिया पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया है.
डॉयचे वैले पर मनीष कुमार का लिखा-
कोरोना वैक्सीन लगाए जाने के मामले में 78.1 फीसद औसत टीकाकरण के साथ बिहार फिर एक बार फिर पहले पायदान पर है. इससे पहले भी 76.6 प्रतिशत वैक्सीनेशन कर बिहार ने अव्वल स्थान प्राप्त किया था. केंद्र सरकार द्वारा जारी हालिया रैंकिंग में बिहार के बाद मध्यप्रदेश की जगह त्रिपुरा आ गया है जहां 77.1 फीसद वैक्सीनेशन किया गया है. इससे पहले सात फरवरी तक मध्य प्रदेश ने लक्ष्य का 76.1 तो त्रिपुरा ने 76 प्रतिशत हासिल किया था. किंतु बिहार ने अपनी बढ़त बरकरार रखी. वहीं दूसरी तरफ यह बात भी सामने आ रही है कि सोशल डिस्टेंशिंग, मास्क और अब वैक्सीन के बाद भी कोरोना का खतरा पूरी तरह टला नहीं है.
हालांकि यह भी बात भी सच है कि राज्य में कोरोना के मामले अब काफी कम संख्या में सामने आ रहे हैं. बीते बुधवार को कोविड के 64 नए मरीज मिले और इसके साथ ही राज्य में संक्रमितों की कुल संख्या 2,61,511 हो गई है. इनमें 2,59,234 मरीज स्वस्थ हो गए जबकि अब तक 1520 लोगों की मौत हो चुकी है. वहीं कोरोना के एक्टिव मामलों की संख्या मात्र 755 रह गई है जबकि रिकवरी रेट 99.13 फीसद है. दूसरी तरफ ताजा आंकड़ों के अनुसार बिहार में 2 करोड़ 17 लाख 41 हजार 730 लोगों की कोरोना जांच हो चुकी है. वाकई, अन्य राज्यों की तुलना में ये आंकड़े भी काफी उत्साहवर्धक हैं और यह बताने को काफी हैं कि बिहार सरकार ने कोविड-19 पर काबू पाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. किंतु इसके साथ ही कोरोना जांच में गड़बड़ी का मामला भी सामने आया है.
जांच रिपोर्ट में फर्जीवाड़ा
बीते दिनों कई ऐसे मामले सामने आए जिनमें किसी को बिना जांच कराए कोरोना पॉजिटिव की रिपोर्ट मिली तो किसी को कोरोना निगेटिव होने की. इससे यह आरोप आम हो गया कि कहीं न कहीं कोरोना जांच रिपोर्ट डेटा में फर्जीवाड़ा किया गया. ऐसा ही एक मामला सदर अस्पताल, भागलपुर में सामने आया जहां चंद्रभानु नामक एक युवक अपने एक मित्र के कोरोना पॉजिटिव आने के बाद चार दोस्तों के साथ कोरोना जांच कराने पहुंचा. अन्य तीन ने अपना सैंपल दिया, किंतु किसी कारणवश चंद्रभानु सैंपल नहीं दे पाया. किंतु जब रिपोर्ट आई तो सैंपल नहीं देने वाले चंद्रभानु की भी रिपोर्ट भेज दी गई थी जो निगेटिव थी. हालांकि उसने इसकी शिकायत की और सक्षम पदाधिकारियों ने इसे तकनीकी भूल बताकर सुधार का भरोसा दिलाया.
इसी तरह का एक अन्य मामला भोजपुर जिले के बड़हरा प्रखंड में देखने को मिला जहां 70 वर्षीय शिवजनम सिंह को बिना स्वाब दिए ही कोरोना संक्रमित बता दिया गया था. इन्होंने कोरोना जांच शिविर में रजिस्ट्रेशन तो कराया था किंतु काफी इंतजार के बाद जब सैंपल नहीं लिया गया तो वे घर लौट गए थे. बांका जिले के शंभूगंज के कसबा गांव में भी बिना जांच के ही सात लोगों को कोरोना संक्रमित होने की रिपोर्ट भेज दी गई थी. इस गांव की रहने वाली नीलम देवी, निशा कुमारी, रितेश कुमार, रूपेश ठाकुर, उर्वशी बिहारी, मृत्युंजय ठाकुर व निरपेंद्र झा की शिकायत है कि वे जांच स्थल पर गए ही नहीं थे, तो नाम-पता व मोबाइल नंबर देने का तो सवाल ही नहीं होता. इसी गांव के एक ऐसे व्यक्ति को भी कोरोना पॉजिटिव बता दिया गया था जो गांव में मौजूद भी नहीं था. इसी तरह पूर्वी चंपारण के अरेराज में भी कई लोगों के मोबाइल फोन पर उनके कोरोना निगेटिव होने का मैसेज आया.
गलत नाम गलत फोन नंबर
इन मामलों से साफ है कि कहीं न कहीं किसी न किसी स्तर पर अनियमितता जरूर बरती गई, चाहे उद्देश्य जो भी रहा हो. हाल में ही मीडिया रिपोर्टों में भी यह सामने आया है कि कोरोना टेस्ट रिपोर्ट के आंकड़ों में नाम, उम्र और फोन नंबर में भारी पैमाने पर फर्जीवाड़ा किया गया है. पटना, जमुई व शेखपुरा जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में करीब 600 इंट्री में यह खुलासा हुआ है. यानी डेटा इंट्री और जांच रिपोर्ट, दोनों में ही गड़बड़ी हुई है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक पटना, शेखपुरा व जमुई के छह पीएचसी सेंटर में 16,18 व 25 जनवरी को कोरोना जांच के 588 इंट्री की जांच की गई तो पता चला कि डेटा प्रोटोकॉल को पूरा करने के लिए नाम, उम्र व मोबाइल फोन नंबर की पूरी डेटा इंट्री ही फर्जी थी. जब इन डेटा का मिलान किया गया तो पता चला कि जमुई जिले के बरहट की 230 इंट्री में 12, सिकंदरा की 208 इंट्री में 43 तथा जमुई सदर की 150 में 65 मामलों में ही कोरोना जांच को वेरिफाई किया जा सका.
यही हाल फोन नंबरों का भी रहा. बरहट में इन तीन विभिन्न तिथियों पर दर्ज क्रमश: 14,11 व 11 फोन नंबर गलत पाए गए. बरहट में ही एक ऐसा फोन नंबर मिला जिसे आरटी-पीसीआर टेस्ट के 26 मामलों में दर्ज किया गया था. यह फोन नंबर यहां से सौ किलोमीटर दूर बांका जिले के शंभूगंज निवासी मजदूर बैजू रजक का था. उसने इन लोगों से किसी तरह के संबंध से इनकार किया. इन 26 में 11 पुरुष, छह महिलाएं और नौ बच्चे थे. इसी शेखपुरा जिले के बरबीघा में 25 जनवरी को रिकार्ड किए गए आंकड़ों के अनुसार सोनाली कुमारी व अजीत कुमार की कोरोना जांच के लिए दर्ज फोन नंबर उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के एक मिष्टान्न विक्रेता का निकला जिसने पूछे जाने पर साफ तौर पर कहा कि मैं इनलोगों को नहीं जानता. कुछ नंबर तो ऐसे भी दर्ज थे जो उसी पीएचसी सेंटर के स्वास्थ्यकर्मियों के थे. रिपोर्ट में शेखपुरा के एक स्वास्थ्यकर्मी धमेंद्र कुमार का हवाला देते हुए साफ कहा गया है कि उसका फोन नंबर छह लोगों की जांच सूची में लिखा है जबकि इससे उसका कोई लेना-देना नहीं है. रिपोर्ट में मुंगेर जिले के असरगंज, जमुई के लक्ष्मीपुर के कई ऐसे लोगों का जिक्र है जिनके फोन नंबर का गलत इस्तेमाल कोरोना जांच रिपोर्ट के लिए दर्ज करने में किया गया.
शिकायतों की हो रही है जांच
इन अनियमितताओं के संबंध में जमुई के जिला कार्यक्रम प्रबंधक (डीपीएम) सुधांशु लाल का कहना था, "ऐसी शिकायतें हमें भी मिली हैं. बरहट पीएचसी के चिकित्सा प्रभारी का वेतन रोक दिया गया. दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी." वहीं शेखपुरा के डीपीएम श्याम कुमार निर्मल ने कहा, "आरंभिक दिनों में फोन नंबर को लेकर कुछ दिक्कतें थीं. यह जांच की जाएगी कि आखिरकार उत्तर प्रदेश का फोन नंबर कैसे इस्तेमाल किया गया." इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत का कहना है, "हर स्तर पर इसकी जांच की जाएगी. हमलोगों ने सभी संबंधित सिविल सर्जन से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा है. और अब हम इस तरह के जांच को आधार नंबर से लिंक करने पर विचार कर रहे हैं."
कोरोना जांच को लेकर बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव पहले भी सवाल उठाते रहे है. उन्होंने ट्वीट कर कहा भी, "मैंने पहले ही बिहार में कोरोना घोटाले की भविष्यवाणी की थी. जब हमने घोटाले का डेटा सार्वजनिक किया था तो मुख्यमंत्री ने हमेशा की तरह नकार दिया था." इन लापरवाहियों के संबंध में एक अवकाश प्राप्त स्वास्थ्य अधिकारी भी कहते हैं, "याद कीजिए, लॉकडाउन में जब लोग बिहार लौट रहे थे तब बस स्टैंड या स्टेशनों पर उनकी जांच के लिए थर्मल स्कैनिंग आदि जो व्यवस्था की गई थी वह भी विवादित ही रही. दरअसल अपनी गर्दन बचाने के लिए हड़बड़ी में कोई भी कर्मचारी ऐसी ही गलतियां करता है जो जगहंसाई की वजह बनतीं हैं." वास्तव में हर व्यवस्था में ऐसी गलतियों की गुंजाइश रहती है, किंतु भोजपुर जिले के सत्तर वर्षीय शिवजनम सिंह को बिना जांच के ही कोविड संक्रमित ठहराने से जो तकलीफ हुई है, उसकी भरपाई कौन करेगा.
पालतू कुत्तों के एक दूसरे के साथ खेलने की अधिक संभावना तब होती है, जब उनका मालिक वहां मौजूद रहता है. एक नए अध्ययन के मुताबिक कुत्ता ऐसा करते हैं क्योंकि वे अपने मालिक को लुभाना चाहते हैं.
कुत्तों और इंसानी रिश्ते पर नए शोध की मुख्य लेखक और पशु व्यवहार विज्ञान विशेषज्ञ लिंडसे मेहरकम कहती हैं कि हमारे कुत्ते अपने मालिक द्वारा रूचि के स्तर पर ध्यान देते हैं जो कि अच्छी तरह से स्थापित है. वे कहती हैं, "लेकिन हम किसी भी ऐसे शोध के बारे में नहीं जानते हैं जिसमें इंसानी दर्शक के प्रभाव को दिखाया गया हो जो प्रजातियों के व्यवहार को प्रभावित करते हैं. इस मामले में कुत्तों के बीच का खेल है."
मॉनमाउथ यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की सहायक प्रोफेसर मेहरकम की देखरेख में 10 जोड़े पालतू कुत्तों पर प्रयोग किया गया जो पिछले छह महीने से साथ रह रहे थे. कुत्तों के मालिक के मुताबिक दोनों दिन में कम से कम एक बार खेल खेलते थे. शोधकर्ताओं ने कुत्ते के जोड़े का तीन शर्तों के साथ वीडियो बनाया- जहां मालिक गैरहाजिर था, जहां मालिक मौजूद था लेकिन उन्हें अनदेखा कर रहा था और जहां मालिक मौजूद था और मौखिक प्रशंसा और दुलार कर रहा था. शोधकर्ताओं ने इस प्रयोग को ठोस बनाने के लिए प्रत्येक स्थिति को अगले कुछ दिनों में तीन बार दोहराया.
मेहरकम कहती हैं, "हमने पाया कि मालिक के मौजूद रहने से कुत्तों के बीच खेल सुविधाजनक बनता है." इंसान के ध्यान बढ़ने से कुत्तों के बीच कुश्ती, पीछा करना और कोमल रूप से काटने जैसे व्यवहार बढ़ जाते हैं. शोध के सह लेखक और एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी के क्लाइव वाइन के मुताबिक, "यह वास्तव में काफी हैरानी की बात है कि कुत्तों को जब भी एक दूसरे के साथ खेलने का मौका मिलता है वे खेलते हैं लेकिन जब कोई इंसान ध्यान देता है तो वे ज्यादा खेलना शुरू कर देते हैं."
एए/सीके (एएफपी)
चमोली जिले में ऋषिगंगा नदी के ऊपरी हिस्से में एक और झील बन गई है जिस से फिर से बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है. सात फरवरी को आई बाढ़ के बाद सुरंग में फंसे लोगों को निकालने का काम अभी चल ही रहा है.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा-
सात फरवरी को जहां चमोली जिले में आपदा आई थी उस जगह से थोड़ी दूर भूवैज्ञानिकों ने पाया है कि उस दिन हुए भूस्खलन की वजह से गिरी गाद ने ऋषिगंगा नदी को रोक दिया है. नदी को रोक दिए जाने से वहां पर एक झील बन गई है और अगर गाद से बना इस झील का बांध टूटा तो वहां फिर से बाढ़ आ सकती है. भूवैज्ञानिक अभी तक इस बात का पता नहीं लगा सके हैं कि इस झील में कितना पानी है और बांध कितना ऊंचा है.
उनका कहना है कि झील की लगातार निगरानी करने की जरूरत है क्योंकि अगर अचानक इसका बांध टूटा तो पहले के दुर्घटना स्थल पर बचाव कार्य में लगे राहतकर्मियों की जान को खतरा हो सकता है. गुरुवार को बचाव कार्य की जगह पर नदी का स्तर अचानक बढ़ता हुआ पाया गया था, जिसके बाद बचाव कार्य को एक घंटे के लिए रोक दिया गया था. अगर नई झील फट गई तो वहां के स्थानीय लोगों और राहतकर्मियों के लिए एक नई चुनौती पैदा हो जाएगी.
आपदा प्रबंधन टीमें अभी भी सुरंग के अंदर तक नहीं पहुंच पाई है और अंदर फंसे लोगों के जिंदा होने की संभावनाएं धूमिल होती जा रही हैं. अधिकारों का अंदाजा है कि कम से कम 34 लोग सुरंग में फंसे हुए हैं. 36 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है और कुल मिलाकर 204 लोग अभी तक लापता हैं. सुरंग के अंदर काफी मात्रा में पानी और गाद है और खुदाई की वजह से अचानक उसके बाहर आ जाने का खतरा भी है.
इसलिए आपदा प्रबंधन की टीमें पूरी सतर्कता के साथ काम कर रही हैं. रैणी गांव से आ रही रिपोर्टें बता रही हैं कि गांव के निवासी अभी भी डरे हुए हैं और रातें जंगलों में बिता रहे हैं. वो स्थान जहां से नंदा देवी ग्लेशियर से बर्फ और मिट्टी नदी में गिरी थी वहां तक अभी तक कोई भी नहीं पहुंच पाया है, क्योंकि रास्ते का एक पुल टूट गया है.
घटना के बारे में जो भी जानकारी अभी तक मिली है वो सैटलाइट से प्राप्त चित्रों से मिली है. घटना स्पष्ट रूप से कैसे हुई और उसके पीछे क्या क्या कारण हैं इन सारे सवालों का जवाब तब तक नहीं मिलेगा जब तक वैज्ञानिक उस स्थल तक पहुंच नहीं जाते और वहां अध्ययन नहीं कर लेते.
मध्य प्रदेश की व्यापारिक नगरी इंदौर नवाचारों के लिए पहचान बना चुका है. इसी क्रम में महिलाओं को विशेष सुविधाएं मुहैया कराने के मकसद से "शी कुंज" स्थापित किए गए हैं.
"शी कुंज" ऐसे सुविधा केंद्र हैं जहां महिलाओं को आवश्यक सुविधाएं मिल सकेंगी. महिलाओं का भीड़-भाड़ वाले इलाकों में आना जाना होता है और उनके लिए प्रसाधन की बेहतर सुविधा सुलभ नहीं हो पाती. इसी के मद्देनजर नगर निगम ने शहर के प्रमुख स्थानों पर "शी कुंज" स्थापित करने की योजना बनाई है. योजना के तहत चार जगहों पर "शी कुंज" शुरु भी हो गए हैं. यह वे सुविधा केंद्र है जहां महिलाओं को प्रसाधन, स्तनपान, शौचालय आदि की सुविधाएं एक साथ मिल सकेंगी.
बताया गया है कि अभी चार जगहों पर "शी कुंज" स्थापित किए गए है, शहर में कुल 25 जगहों पर यह केंद्र स्थापित करने की योजना है. इन सभी केंद्रों में महिलाओं को घर जैसी सुविधा मिलेगी. इंदौर नगर निगम आयुक्त और स्मार्ट सिटी की कार्यपालक निदेशक प्रतिभा पाल ने बताया कि स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के अंतर्गत शहर के भीड़ भरे इलाकों और बाजारों में महिलाओं की सुविधा के लिए "शी कुंज" बनाए गए हैं.
एक "शी कुंज" का कुल क्षेत्रफल 400 वर्ग फीट है. "शी कुंज" में आने वाली महिलाओं के लिए फीडिंग रूम बनाया गया है. इसमें बैठने के लिए सोफे भी लगाए गए हैं, इसके साथ ही महिलाओं के लिये सुविधा घर में सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री भी रखी गई है और महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड मशीन भी लगाई गई है. यह सब सुविधाएं मुफ्त रहेंगी. साथ ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए गार्ड की तैनाती भी की जाएगी. इंदौर नगर निगम और स्मार्ट सिटी के तहत कोई राशि व्यय नहीं की जाएगी, यह सुविधा घर सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर तैयार किया गया है.
मशीनीकरण का इस्तेमाल, नई शब्दावली, आर्थिक सहायता और कानून में बदलाव जैसे जरूरी काम करने के बाद भी जमीनी तस्वीर में सुधार आने में वक्त लगता है. अगर सुधार में और देरी हुई तो यह वक्त सफाई कर्मियों के लिए काल में ना बदल जाए.
डॉयचे वैले पर विवेक शर्मा की रिपोर्ट-
देश भर में सीवर और सैप्टिक टैकों की सफाई के दौरान होने वाली मौतें एक कड़वी सच्चाई हैं. इसे रोकने की दिशा में कानून लाया जा चुका है लेकिन अब मानसिकता में बदलाव लाने की दिशा में काम किया जा रहा है. इसी के तहत पिछले साल 19 नवंबर यानी विश्व टायलेट दिवस पर केंद्र सरकार ने तय किया कि शब्दावली में 'मैनहोल' शब्द को हटा कर 'मशीन-होल' का इस्तेमाल किया जाएगा. इसका मतलब यह है कि सीवर में अब इंसान नहीं बल्कि मशीनों को उतारा जाएगा क्योंकि सीवर की साफ सफाई के दौरान मरने वाले लोगों की संख्या में हर साल इजाफा हो रहा है.
जबसीवरहोलबनाकाल
देश के पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो मालूम पड़ता है साल 2019 में कुल 110 लोग देश में सीवर साफ करते हुए मौत का शिकार हुए. ये आंकड़ा पिछले पांच साल में सबसे ज्यादा है. जबकि साल 2018 में 68 और 2017 में 93 लोग मारे गए. वहीं राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के आंकड़ों के मुताबिक साल 2010 से 2020 के दौरान कुल 631 लोगों की सीवर में काम करने के दौरान मौत हुई है.
ऐसा ही एक हादसा 9 सितंबर 2018 को दिल्ली के विशाल के साथ हुआ. उनके भाई अंगद बताते हैं, "रविवार का दिन था. सैलरी मिलने के एक दिन पहले, उन्हें सिवेज ट्रीटमेंट प्लांट की सफाई के लिए उतरना पड़ा. उनके पास कोई मास्क या प्रोटेक्टिव किट नहीं थी, ना ही विशाल सीवर में कभी उतरे थे.” उस दुर्घटना में विशाल सहित पांच लोगों की मौत हुई थी. पांच जानों को लील लेने वाले सीवर में उतरने से पहले अगर मशीन और प्रोटेक्टिव उपकरणों का इस्तेमाल होता तो शायद यह हादसा टाला जा सकता था. अंगद बताते हैं, "किसी की जान जाने से अच्छा है मशीन का उपयोग, चाहे महंगा हो या सस्ता. 10 लाख रुपये हर्जाने के मिले हैं लेकिन हर्जाना कोई जान तो दे नहीं सकता. मैं यही चाहता हूं कि ऐसा आगे किसी के साथ ना हो.”
सफाई कर्मचारियों की तकलीफों को सुलझाने के लिए 1994 में देश में एक राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग का गठन हुआ था. पिछले कुछ वर्षों से आयोग सीवर के अंदर मरने वालों का रिकॉर्ड रखने और मुआवजा राशि जल्दी दिलवाने की दिशा में काम कर रहा है. लेकिन देश के दूसरे आयोगों की तरह सफाई कर्मचारी आयोग को भी ज्यादा मजबूत बनाने की बात चल पड़ी है. इस पर राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के पूर्व चेयरमैन मनहर वालजी भाई जालाकामानना है किआने वाले समय में आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए जिससे आयोग को और अधिकार मिल सकें.
क्या सिर्फ घोषणा करने से समस्या का समाधान निकल जाएगा? इस मसले पर कई वर्षों से काम कर रहे मैगसेसे अवार्ड विजेता बेजवाडा विल्सन का मानना है, "हर साल पूरे भारत में करीब 200 लोग मर रहे हैं. अगर राजनैतिक इच्छा शक्ति है तो इसका बजट और लाभ पाने वाले लोगों का विवरण बताना चाहिए. हमारे देश में 4680 टाऊन हैं और ये लोग सिर्फ 243 की बात कर रहे हैं, यह समस्या का सिर्फ 5 प्रतिशत है. पूरे सेनिटेशन सिस्टम का मशीनीकरण और मॉर्डनाइजेशन बहुत अहम है.”
समाज की मानसिकता में बदलाव भी जरूरी
इस काम में जान के जोखिम के अलावा दूसरा पहलू है जातिगत भेदभाव. तो क्या मशीनों के इस्तेमाल से जातिगत भेदभाव कम होगा? इस सामाजिक मसले पर दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सामाजिक विज्ञान के प्रोफेसर विवेक कुमार बताते हैं, "मशीनीकरण करने के बावजूद भी जाति स्टिगमा बना रहेगा. जब तक डिगनिटी ऑफ लेबर यानी श्रम की गरिमा नहीं होगी, आय नहीं बढ़ाएंगी, स्टिगमा बना रहेगा. सामाजिक स्टिगमा को दूर करने की जरूरत है. डिगनिटी ऑफ लेबर, समान व्यवहार और सैलेरी बढ़ाने से आएगी.” साथ ही प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं कि योजनाओं का प्रभावकारी क्रियान्वयन होना बहुत जरूरी है, "यह काम ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में होना चाहिए. इसके लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति होना चाहिए."
वहीं जाति आधारित कामों को खत्म करने पर दिल्ली के अंबेडकर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर दीपा सिन्हा कहती हैं, "श्रम को और गरिमापूर्ण बनाने के लिए मशीन का इस्तेमाल होना चाहिए. मशीनीकरण होने से सोशल स्टिगमा हटाने में मदद मिलेगी. कोई भी काम जाति आधारित नहीं होना चाहिए.”
मशीनीकरण होने से इस काम से जुड़े लोगों के रोजगार प्रभावित होने की आशंका है, जो कि एक चिंता का विषय है. इस मुद्दे पर जेएनयू के प्रोफेसर अमित थोरात बताते हैं, "मशीनीकरण बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था लेकिन इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि मशीनीकरण होने से इस क्षेत्र में निवेश तो बढ़ेगा, साथ ही मौजूदा काम कर रहे लोगों को भी मशीन चलाने की ट्रेनिंग मिलनी चाहिए ताकि उनका रोजगार प्रभावित ना हो.”
क्या है देश के सबसे स्वच्छ शहर का हाल
देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के नगर निगम ने सीवर साफ करने के लिए मशीनीकरण की शुरुआत कुछ साल पहले की है. इससे न केवल इस काम से जुड़े कर्मचारियों की जान का जोखिम कम हो गया है, बल्कि उनके घर वालों की चिंता भी मिट गई है. पिछले 42 साल से इंदौर शहर में मैनहोल साफ करने का काम कर रहे कमल बताते हैं, "पहले प्रोटेक्टिव उपकरण नहीं थे लेकिन अब हैं, अब बहुत सेफ्टी मिल गई है. डिसिल्टिंग मशीन 10 साल से आई है. रोबोट छह महीने पहले आया है. बहुत फर्क आया है. रोबोट से गाद निकाल लेते हैं, यह जोखिम वाला काम है. पहले परिवार वालों को डर लगा रहता था. अब घर वालों को चिंता नहीं रहती. मुझे होल में उतरे पांच साल हो गए हैं.”
रस्सी पर लटकती सफाई कर्मचारियों की जान
कोई कंमाडो सीन नहीं
यह किसी फिल्म का सीन नहीं है, बल्कि 110 मीटर की ऊंचाई पर खिड़कियां साफ करने वाले खास कर्मचारी हैं. साल में तीन बार प्रशिक्षित सफाई कर्मचारी हैम्बर्ग के एल्बफिलहार्मोनी इमारत की खिड़कियां साफ करते हैं.
कई बार जब मशीन काम नहीं कर पाती है तो उन्हें सीवर में उतरना पड़ता है. पर अब पूरे सुरक्षा उपायों के साथ ही यह काम होता है. इसी काम से जुड़े हुए इंद्रजीत बताते हैं, "पहले डिसिल्टिंग मशीनें और रोबोट मशीनें नहीं थी. हर दिन नीचे उतरना पड़ता था. लेकिन मास्क और सेफ्टी बेल्टी के साथ उतरते थे. अब 99 प्रतिशत मशीनें काम कर देती हैं. मशीन के आने से जान का खतरा कम हो गया है.” मशीनीकरण की वजह से इंदौर के तकरीबन पौने दो लाख सीवर होल साफ करने में आसानी हो गई है. 8 वर्षों से नगर निगम के लिए मशीन ऑपरेट और ड्राईव करने का काम कर रहे कमल जहाजपुरिया बताते हैं, "भरी लाइनों के अंदर उतरना नामुमकिन होता था. लेकिन डिसिल्टिंग मशीन से अंदर की साफ-सफाई बिना इंसान के उतरे ही हो जाती है. यह मशीन वरदान साबित हुई है.”
अब इंसान की जगह रोबोट ने इस काम की जिम्मेदारी ले ली है. रोबोटिक मशीन ऑपरेट करने वाले भुजीराम बताते हैं, "मशीन में लगी बाल्टी में कैमरे लगे रहते हैं, जिससे सीवर में जाने के बाद अंदर मौजूद वेस्ट की मात्रा बाहर लगी एलसीडी स्क्रीन पर दिखाई देती है. इसकी वजह से किसी इंसान को नीचे जाने की जरूरत नहीं होती. इसे ऑपरेट करना भी सरल है. रोबोटिक मशीन से करीब 30 मेनहोल रोज साफ किए जा सकते हैं.” नगर निगम के मशीनीकरण के कार्य पर और रोशनी डालते हुए निगम आयुक्त प्रतिभा पाल बताती हैं, "नगर निगम के पास जेटप्रेशर मशीन, डिसिल्टिंग मशीन हैं, प्रेशर मशीन की फ्लीट है, पांच रोबोटिक मशीनें भी हैं. इसके अलावा स्थानीय तौर पर डिजाइन किए गए उपकरण भी हैं जिनके माध्यम से सैकंडरी लाइन की साफ-सफाई की जाती है. अब 10 रोबोटिक मशीनें और शामिल की जानी हैं."
इन सभी कदमों को उठाए जाने के बाद जहां एक ओर उम्मीद जगती है, तो दूसरी ओर आशंका के बादल भी मंडराते हैं. उम्मीद इस बात की है कि अब सीवर की सफाई में किसी इंसान की जान ना जाए. लेकिन मशीनीकरण का इस्तेमाल, नई शब्दावली, आर्थिक सहायता और कानून में बदलाव जैसे जरूरी काम करने के बाद भी जमीनी तस्वीर में सुधार आने में वक्त लगता है. अगर सुधार में और देरी हुई तो यह वक्त सफाई कर्मियों के लिए काल में ना बदल जाए.
देश की जेलों में बंद कुल कैदियों में से करीब 66 फीसदी लोग अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग यानी ओबीसी के हैं. यह जानकारी राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने एक सवाल के लिखित जवाब में दी है.
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट-
गृह राज्य मंत्री रेड्डी के मुताबिक, "देश की जेलों में 4,78,600 कैदी हैं जिनमें 3,15,409 कैदी एससी, एसटी और ओबीसी के हैं. ये आंकड़े राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों पर आधारित हैं.” रेड्डी ने बताया कि करीब 34 फीसद कैदी ओबीसी वर्ग के हैं जबकि करीब 21 फीसद अनुसूचित जाति से और 11 फीसद अनुसूचित जनजाति से हैं. ये आंकड़े इन वर्गों की जनसंख्या के मुकाबले काफी ज्यादा है.
लैंगिक आधार पर देखें तो पुरुष कैदियों की संख्या करीब 96 फीसद और महिला कैदियों की संख्या महज चार फीसद है.सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, एससी और ओबीसी श्रेणियों के कैदियों की अधिकतम संख्या उत्तर प्रदेश की जेलों में है, जबकि मध्य प्रदेश की जेलों में अनुसूचित जनजाति समुदाय के सबसे ज्यादा कैदी हैं.
एनसीआरबी ने पिछले साल अगस्त में साल 2019 के आंकड़े जारी किए थे जिनके मुताबिक, देश भर की जेलों में बंद दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय के लोगों की संख्या देश में उनकी आबादी के अनुपात से कहीं ज्यादा है. यही नहीं, एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, देश की जेलों में बंद विचाराधीन मुस्लिम कैदियों की संख्या दोषी ठहराए गए मुस्लिम कैदियों से ज्यादा है.
रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 के आखिर तक देश भर की जेलों में 21.7 फीसद दलित बंद थे जबकि जेलों में अंडरट्रायल कैदियों में 21 फीसदी लोग अनुसूचित जातियों से थे. हालांकि जनगणना में उनकी कुल आबादी 16.6 फीसदी है. आदिवासियों यानी अनुसूचित जनजाति के मामले में भी जनसंख्या और जेल में बंद कैदियों का अंतर ऐसा ही है.
देश के कुल दोषी ठहराए गए कैदियों में एसटी समुदाय की हिस्सेदारी 13.6 फीसद है, जबकि जेलों में बंद 10.5 फीसद विचाराधीन कैदी इस समुदाय से आते हैं. राष्ट्रीय जनगणना में देश की कुल आबादी में एसटी समुदाय की हिस्सेदारी 8.6 फीसदी है. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, मुस्लिम समुदाय का देश की आबादी में 14.2 फीसद हिस्सा है, जबकि जेलों में बंद कुल कैदियों में 16.6 फीसदी मुस्लिम समुदाय के हैं.
विचाराधीन कैदियों की सूची में मुस्लिम समुदाय के 18.7 फीसद लोग हैं. आंकड़ों के मुताबिक, विचाराधीन कैदियों के मामले में मुस्लिम समुदाय के लोगों की संख्या और अनुपात दलितों और आदिवासियों से भी ज्यादा है. एनसीआरबी के साल 2015 के आंकड़ों से तुलना करने पर पता चलता है कि विचाराधीन मुस्लिम कैदियों का अनुपात साल 2019 तक कम हुआ है लेकिन दोषियों का प्रतिशत बढ़ गया है. साल 2015 में जहां देश भर की जेलों में करीब 21 फीसद मुस्लिम कैदी विचाराधीन थे जबकि करीब 16 फीसद कैदी दोषी पाए गए थे.
बढ़ती जा रही है जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या
कितनी जेलें
2019 में देश में कुल 1,350 जेलें थीं, जिनमें सबसे ज्यादा (144) राजस्थान में थीं. दिल्ली में सबसे ज्यादा (14) केंद्रीय जेलें हैं. कम से कम छह राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में एक भी केंद्रीय जेल नहीं है.
कुछ समय पहले कुछ निजी संस्थानों की मदद से तैयार की गई इंडियन जस्टिस रिपोर्ट 2020 भी सामने आई थी जिसमें देश की जेलों में बंद कैदियों संबंधी आंकड़ों का जिक्र है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की जेलों में बंद कैदियों की कुल संख्या का करीब 69 फीसद हिस्सा उन कैदियों का है जो विचाराधीन हैं. यानी उनके मुकदमे अभी अदालतों में चल रहे हैं और यदि अदालत उन्हें निर्दोष करार देती है तो वो जेल से छूट जाएंगे.
यूपी में डीजीपी रह चुके रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी डॉक्टर वीएन राय कहते हैं कि ये आंकड़े बताते हैं कि हमारी न्याय व्यवस्था भी दोषरहित नहीं है. उनके मुताबिक, "आंकड़ों से पता चलता है कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली न सिर्फ दोषपूर्ण है बल्कि गरीबों के भी खिलाफ है. जो लोग अच्छे वकील रख सकते हैं, उन्हें आसानी से जमानत मिल जाती है. आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को छोटे-छोटे अपराधों के लिए भी लंबे समय तक जेल में बंद रहना पड़ता है. ऐसे कितने लोग हैं जो सालों-साल जेल में रहने के बाद अदालत से बरी हो गए.”
जेलों में बंद कैदियों के सामाजिक आंकड़ों के अलावा देश के जेलों की हालत भी बहुत अच्छे नहीं है और जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदी भरे हुए हैं. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदियों का बंद होना है. जेलों की स्थिति पर दो साल पहले जारी की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक, 31 दिसंबर 2017 तक भारत में कुल 1,361 जेल हैं, जिनकी कुल क्षमता 3,91,574 कैदियों की है. लेकिन इन जेलों में क्षमता से कहीं ज्यादा यानी 4,50,696 कैदी बंद हैं. यही नहीं, रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015 से लेकर 2017 के बीच राष्ट्रीय स्तर पर जेलों की कुल संख्या में 2.85% की कमी भी आई है. साल 2015 में जेलों की संख्या जहां 1,401 थी, वहीं साल 2017 में यह घटकर सिर्फ 1,361 रह गई. लेकिन इस दौरान भी कैदियों की संख्या में बढ़ोत्तरी जारी रही.
-भूमिका राय
साइबर क्राइम को रोकने और 'राष्ट्र हित' में सरकार के साथ मिलकर काम करने के लिए स्वयंसेवक या वॉलंटियर्स तैयार किए जाएंगे.
सरकार ने विस्तार से इसकी ज़रूरत के बारे में बताया है लेकिन साइबर क़ानून और निजता के अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ताओं ने इस पर गहरी चिंता और आशंकाएँ जताई हैं.
सरकार का कहना है कि अभी यह प्रोग्राम परीक्षण के तौर पर जम्मू-कश्मीर में शुरू किया गया है, वहाँ मिलने वाली रिपोर्ट के बाद उसके आधार पर ही इस प्रोग्राम पर आगे काम किया जाएगा.
वॉलंटियर नियुक्त करने के पीछे क्या है सोच?
इंडियन साइबर क्राइम कॉर्डिनेशन सेंटर साइबर क्राइम के ख़िलाफ़ नोडल प्वाइंट के तौर पर काम करता है. इसकी स्थापना गृह मंत्रालय के तहत की गई है. इसका मक़सद व्यापक स्तर पर साइबर अपराधों से निपटना है.
इस सेंटर का मुख्य उद्देश्य साइबर क्राइम की रोकथाम और उसकी जांच में आम लोगों की भागीदारी को बढ़ाना भी है.
गृह मंत्रालय के मुताबिक, इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए साइबर क्राइम वॉलंटियर प्रोग्राम को तैयार किया गया है. यह प्रोग्राम 'देश सेवा' और साइबर क्राइम के ख़िलाफ़ लड़ाई में योगदान करने के इच्छुक नागरिकों के लिए तैयार किया गया है.
सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि वॉलंटियर इंटरनेट पर मौजूद ग़ैर-क़ानूनी और 'राष्ट्र विरोधी' कंटेंट की पहचान करने, उसे रिपोर्ट करने और उसे साइबर नेटवर्क से हटाने में एजेंसियों की मदद करेंगे.
ये साइबर वॉलंटियर्स ऐसी किसी भी सामग्री को रिपोर्ट कर सकते हैं जो इनमें से किसी पहलू से जुड़ा कंटेंट हो--
भारत की संप्रभुता और अखंडता के ख़िलाफ़
भारत की सेना के ख़िलाफ़
राज्य की सुरक्षा के ख़िलाफ़
विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के ख़िलाफ़
सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने के ख़िलाफ़
सांप्रदायिक सौहार्द के लिए ख़तरा होने पर
बाल यौन शोषण से जुड़ा कंटेंट होने पर
राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर मौजूद जानकारी के मुताबिक़ इस प्रोग्राम का मक़सद इंटरनेट पर मौजूद चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी और ग़ैर-क़ानूनी सामग्री को हटाने में सरकार की मदद करना है लेकिन क्या सब कुछ इतना सीधा-सरल है?
ढेर सारे सवाल और चिंताएँ
सबसे पहला सवाल तो ये है कि ज़्यादातर बातें व्याख्या पर आधारित हैं, अलग-अलग लोगों की व्याख्या उनकी विचारधारा, जानकारी, समझ और पूर्वाग्रह आदि से प्रभावित हो सकती है. कौन सी टिप्पणी या पोस्ट 'राष्ट्र हित' में है या नहीं, कौन सी पोस्ट 'राज्य की सुरक्षा के ख़िलाफ़' है या नहीं, ये ऐसी बातें हैं जिनका फ़ैसला वॉलंटियर्स पर छोड़ा जाना किस हद तक सही होगा?
सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत मनचंदा कहते हैं, "पहली समस्या तो यह है कि आपने उन बिंदुओं को तो बताया है कि किसके ख़िलाफ़ लिखने पर शिकायत हो सकती है लेकिन जो बिंदु दिये गए हैं, उनका आयाम बहुत बड़ा है, उनकी व्याख्या और परिभाषा क्या होगी."
मनचंदा वैचारिक पूर्वाग्रहों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "दूसरी समस्या यह है कि किन लोगों को नियुक्त किया जा रहा है, कैसे किया जा रहा और किस आधार पर किया जा रहा है इसे लेकर पारदर्शिता नहीं है."
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं, "इसे लेकर अभी उतनी स्पष्टता नहीं है. इसमें अभी पारदर्शिता और जवाबदेही जैसी चीज़ों की ज़रूरत है."
पवन दुग्गल कहते हैं, "अगर इस प्रोग्राम को चलाना है तो विस्तार से इसके प्रावधान लाने होंगे ताकि चेक एंड बैलेंस बना रहे और कहीं ना कहीं अंकुश रहे. वरना तो कोई भी किसी से दुश्मनी निकालने के लिए इन वॉलंटियर्स के पास जा सकता है."
पवन दुग्गल के अनुसार, हम सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो है लेकिन उस पर कुछ मदों को लेकर अंकुश लगाए जा सकते हैं लेकिन ये रीज़नेबल रिस्ट्रिक्शन कौन तय करेगा?
उनके मुताबिक़, "साइबर वॉलंटियर जिनके पास क़ानून को समझने की योग्यता ना हो, उनके पास अनुभव ना हो तो वो क़ानून की बारीकियों को नहीं समझ पाएंगे. ऐसे में इस बात की भी आशंका बढ़ जाती है कि शिकायतों की बाढ़-सी आ जाए."
हर्ष मंदर कहते हैं, "साइबर वालंटियर्स की आर्मी बनाकर सरकार लोगों पर नज़र रखने को जायज़ ठहरा रही है. ये बेहद चिंताजनक है, क्योंकि यह नाज़ी जर्मनी की याद दिलाता है जहां लोगों को जासूस बनने और अपने पड़ोसियों की जानकारी देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था ताकि समाज में लोगों के बीच की दूरियां और बढ़ाई जा सकें".
पवन दुग्गल कहते हैं, "वॉलंटियर्स के लिए अनिवार्य योग्यता पर काम करने की आवश्यकता है, वरना तो हर कोई ही वॉलंटियर ही होगा और फिर ये सिस्टम काम कैसे करेगा, बता पाना मुश्किल है. वो मानते हैं कि ऐसे में इसका दुरुपयोग होने की आशंका भी बढ़ जाती है."
सरकार की ओर से अब तक दी गई जानकारियाँ
राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर साइबर स्वयंसेवकों के बारे में जो जानकारी दी गई है वो इस तरह हैं--
यह विशुद्ध रूप से एक वॉलंटियर प्रोग्राम है और कोई भी वॉलंटियर इसका इस्तेमाल किसी व्यवसायिक लाभ के लिए नहीं कर सकता.
इस प्रोग्राम के तहत किसी भी तरह का आर्थिक लाभ नहीं दिया जाएगा. न ही उन्हें कोई पद दिया जाएगा और न ही पहचान पत्र.
इस प्रोग्राम से संबंधित लोग कोई भी सार्वजनिक बयान जारी नहीं कर सकेंगे.
वॉलंटियर गृह मंत्रालय के नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे.
इस प्रोग्राम के नाम से सोशल अकाउंट बनाने, जानकारी साझा करने, बयान जारी करने की मनाही है.
अगर आप इस प्रोग्राम को लेकर कुछ काम करते हैं तो उसे गोपनीय रखना होगा.
वॉलंटियर के लिए अनिवार्य है कि वो रजिस्ट्रेशन के दौरान अपनी सही जानकारी दे.
भारतीय क़ानून के दायरे में रहते हुए काम करना होगा.
नियम और शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में पंजीकरण नहीं किया जाएगा.
साथ ही अगर क़ानून के प्रावधानों को तोड़ने का दोषी पाया जाएगा तो कार्रवाई का प्रावधान भी है.
सरकार को अंदाज़ा रहा होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा भी उठेगा और निजता का भी, इसीलिए सभी वॉलंटियर्स से अपील की गई है कि वे सबसे पहले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 को ज़रूर पढ़ें. अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की आज़ादी की व्याख्या करता है.
विचारों की पहरेदारी नहीं है ये?
साइबर और टेक्नॉलजी मामलों के विशेषज्ञ निखिल पाहवा कहते हैं, "मेरे हिसाब से तो ये साइबर विजिलांटिज़्म जैसा लग रहा है." यानी वैसी ही स्थिति हो सकती है जैसी गोरक्षा के नाम पर जुटे स्वयंसेवकों की वजह से हुई है.
निखिल पाहवा कहते हैं, "जैसे पुलिस है, कोर्ट है इनके पास समझ होती है कि क्या सही है, क्या ग़लत है. लेकिन अगर आप साइबर निगरानी के लिए ऐसे अनजान लोगों को नियुक्त करते हैं और कहते हैं कि तुम पता लगाओ कि किसने ग़ैर-क़ानूनी काम किया है, तो उनके पास क्या ये जज करने की क्षमता होगी?"
निखिल पाहवा कहते हैं, "पिछले कुछ सालों से सरकार की कोशिश जारी है कि वो सोशल मीडिया मॉनिटरिंग टेंडर निकाले. लेकिन महुआ मोइत्रा के सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद ये ख़ारिज हो गया था."
वो कहते हैं कि "ये वॉलंटियर वाला जो सिस्टम है वो ऐसा कि वॉलंटियर को पावर तो है लेकिन कोई जवाबदेही नहीं. जो वॉलंटियर हैं उनकी कोई बेसिक क्वालिफ़िकेशन होनी चाहिए."
पाहवा के हिसाब से सबसे अहम बात ये है कि "किसको चुना जाएगा और किसे रिजेक्ट किया जाएगा, ऐसा करने का आधार क्या होगा, इसके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है. सरकार की ओर से इस मामले में कोई पारदर्शिता नहीं है. यह बात भी समझ नहीं आ रही है कि आख़िर इन लोगों को क्यों कहा जा रहा है कि वो गोपनीय रखें कि वो इस प्रोग्राम का हिस्सा हैं, जैसे पुलिस वाला भी तो वर्दी पहनता ही है ताकि लोगों को पता चले कि वो पुलिसवाला है. तो ये काम छिपकर क्यों किया जा रहा है?"
सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक भारत का कोई भी नागरिक शर्तें पूरी करने के बाद वॉलंटियर बन सकता है. वॉलंटियर के पंजीकरण की प्रक्रिया सरकारी साइट पर कुछ इस तरह है--
भारत का कोई भी नागरिक अपने को वॉलंटियर के तौर पर रजिस्टर कर सकता है.
www.cybercrime.gov.in पर जाकर खुद को रजिस्टर कर सकते हैं.
सबसे पहले एक लॉग-इन आईडी बनानी होगी. अपने राज्य का नाम बताना होगा. मोबाइल नंबर देना होगा. इस मोबाइल नंबर पर ही एक ओटीपी आएगा जिसे देने के बाद लॉन-इन कर सकेंगे.
रजिस्ट्रेशन के पहले चरण में उस व्यक्ति से जुड़ी जानकारियां मांगी जाएंगी, जिसमें रेज़्यूमे, पहचान पत्र, घर के पते का दस्तावेज़ और पासपोर्ट साइज़ फ़ोटो अपलोड करनी होगी.
साइबर वॉलंटियर बनने के लिए पहले पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना होगा
रजिस्ट्रेशन के दूसरे चरण में कारण बताना होगा कि आख़िर क्यों आप साइबर वॉलंटियर बनना चाहते हैं. साइबर वॉलंटियर बनने के लिए किसी वेरिफ़िकेशन की ज़रूरत नहीं है. फ़ाइनल सबमिशन के बाद आप अगर इंटरनेट पर कोई ग़ैर-क़ानूनी सामग्री देखते हैं तो उसे सीधे www.cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट कर सकते हैं.
इस प्रोग्राम में साइबर वॉलंटियर के अलावा दो और कैटेगरी हैं, साइबर वॉलंटियर (जागरूकता) और साइबर वॉलंटियर एक्सपर्ट, इन दोनों कैटेगरी में रजिस्ट्रेशन करने पर वेरिफ़िकेशन कराना होगा जो केवाइसी जैसी प्रक्रिया है.
नई दिल्ली, 12 फरवरी| सरकार ने शुक्रवार को भारतीय व चीनी सैनिकों के डिसइंगेजमेंट पर मीडिया में गलत सूचनाओं और सोशल मीडिया पर इस बारे में बेकार की बातों पर कड़ी आपत्ति जताई है। इससे पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दावा किया था कि भारत ने अपनी जमीन चीन को दे दी है। चीन और भारत ने गुरुवार को पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा से पीछे हटना शुरू किया, जिससे दोनों एशियाई दिग्गजों के बीच नौ महीने तक चलने वाला गतिरोध समाप्त हो गया।
हालांकि, मीडिया के कुछ वर्गों ने दावा किया है कि भारत ने पैंगॉन्ग झील क्षेत्र में फिंगर 3 और 4 के बीच के क्षेत्र का खो दिया है, जिस पर पिछले साल दोनों पक्षों के बीच आमना-सामना हुआ था।
एक बयान में, रक्षा मंत्रालय ने कहा कि लद्दाख में भारतीय क्षेत्र फिंगर 4 तक होने का दावा 'स्पष्ट रूप से गलत' है।
इस बात को दोहराते हुए कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के दोनों सदनों को अपने बयान में इस तथ्य को स्पष्ट रूप से बताया है।
रिकॉर्ड के बारे में सीधे बताते हुए, मंत्रालय ने कहा कि भारत के क्षेत्र को भारत के नक्शे द्वारा दर्शाया गया है और इसमें 1962 के बाद से चीन के अवैध कब्जे में मौजूद 43,000 वर्ग किमी से अधिक की जमीन भी शामिल हैं। यहां तक कि भारतीय धारणा के अनुसार वास्तविक नियंत्रण रेखा फिंगर 8 के पास है, फिंगर 4 पर नहीं।
बयान में कहा गया है, "इसलिए भारत ने चीन के साथ मौजूदा समझौते सहित फिंगर 8 तक गश्त के अधिकार को बनाए रखा है।"
पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट पर दोनों पक्षों के स्थायी पोस्ट दीर्घकालीन और सुव्यवस्थित हैं। मंत्रालय ने कहा कि भारतीय की तरफ, यह फिंगर 3 के पास धन सिंह थापा पोस्ट है और चीन की तरफ यह फिंगर 8 है।
मंत्रालय ने कहा कि मौजूदा समझौते में दोनों पक्षों द्वारा आगे की अग्रिम तैनाती को समाप्त करने और इन स्थायी पोस्टों पर तैनाती जारी रखने का प्रावधान है।
सरकार ने कहा कि भारत ने इस समझौते के परिणामस्वरूप किसी भी क्षेत्र को नहीं गंवाया है।
मंत्री के बयान ने यह भी स्पष्ट किया कि हॉट स्प्रिंग्स, गोगरा और देपसांग सुलझाए जाने वाली पुरानी समस्या है। सरकार ने कहा कि बाकी मुद्दों को पैंगोंग त्सो से जवानों की वापसी के बाद 48 घंटे के भीतर उठाया जाएगा।
मंत्रालय ने कहा, "जो लोग हमारे सैन्य कर्मियों के बलिदान पर संदेह करते हैं, वे वास्तव में उनका अपमान कर रहे हैं।" (आईएएनएस)
सरोज सिंह
पश्चिम बंगाल चुनाव में 'राम' नाम की ना सिर्फ़ एंट्री हो चुकी है, बल्कि अब इसे एक मुद्दे के तौर पर पेश किया जा रहा है.
हालाँकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव अभी कुछ महीने दूर हैं, लेकिन बीजेपी की चुनावी रैलियों में 'जय श्रीराम' नारे हर दिन सुनने को मिल रहे हैं.
गुरुवार को गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल के दौरे पर थे. उन्होंने वहाँ जनता को रैली में संबोधित करते हुए कहा, "बंगाल के अंदर माहौल ऐसा कर दिया गया है कि 'जय श्रीराम' बोलना गुनाह है. अरे! ममता दीदी, बंगाल में जय श्रीराम नहीं बोला जाएगा, तो क्या पाकिस्तान में बोला जाएगा?"
इसके बाद उन्होंने रैली में मौजूद लोगों से 'जय श्रीराम' के नारे लगवाए और ख़ुद भी लगाए.
ये पहला मौक़ा नहीं है, जब बीजेपी 'जय श्रीराम' के नारे के सहारे तृणमूल कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रही है.
गुरुवार को बीबीसी ने तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा से आने वाले बंगाल चुनाव को लेकर एक विस्तृत इंटरव्यू किया.
सांसद महुआ मोइत्रा से बीबीसी से पूछा, "आख़िर तृणमूल कांग्रेस को 'जय श्रीराम' के नारे से दिक़्क़त क्या है?
महुआ मोइत्रा ने जवाब दिया, "हमें दिक़्क़त नहीं हैं. लेकिन हम क्या बोलेंगे और कैसे अपने धर्म को फ़ॉलो करेंगें, ये हमारा निजी मामला है. जय श्री राम, जय माँ काली, जय माँ दुर्गा बोलने में किसी को कोई दिक़्क़त नहीं है. हम माँ दुर्गा की पूजा करते हैं, माँ काली की पूजा करते हैं, सिंह की सवारी करते हैं. कोई हमें ये नहीं बता सकता कि हम कैसे हिंदू धर्म को मानें. जिनको जय श्रीराम बोलना है, उनको बोलने दें. लेकिन आप आज जय श्रीराम क्यों कहते हैं? आप ख़ुद को हिंदू स्थापित करने के लिए नहीं कहते हैं. आप ये इसलिए बोलते हो क्योंकि देश के अल्पसंख्यक घबरा कर, डर कर दुम पीछे करके छिप जाएँगे. हमें दिक़्क़त इस बात से है."
साफ़ है उनका इशारा बीजेपी की तरफ़ था.
पहली बार लोकसभा में चुन कर आई महुआ मोइत्रा, संसद में अपने भाषणों की वजह से हमेशा से चर्चा में रहती हैं.

SANJAY DAS/BBC
कब-कब नाराज़ हुईं ममता
संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान उन्होंने जो भाषण दिया, उसमें 'जय श्रीराम' का नाम लिए बिना उन्होंने कहा, "आज केंद्र सरकार ने सुभाष चंद्र बोस के 'जय हिंद' के नारे को एक धार्मिक नारे से बदल दिया है."
पिछले महीने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125 जयंती के मौक़े पर आयोजित भारत सरकार के कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री इस नारे से इतना नाराज़ हो गई कि उन्होंने अपना भाषण ही नहीं दिया.
जब महुआ मोइत्रा से इस बारे में पूछा गया कि क्या ममता बनर्जी का ऐसा करना ठीक था, तो उन्होंने कहा, "मुख्यमंत्री पर मैं टिप्पणी नहीं कर सकती हूँ. लेकिन उन्होंने जो किया वो बिल्कुल सही थी. ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं. जिस कार्यक्रम में वो शामिल हो रही थीं, वो केंद्र सरकार का कार्यक्रम था. केंद्र सरकार चाहती है तो संविधान में संशोधन करे, उनके पास बहुमत है. 'सेक्युलर' शब्द को संविधान से हटा दे. हिंदू राष्ट्र बना दे, फिर कोई दिक़्क़त नहीं होगी. जब तक हमारे संविधान में सेक्युलर शब्द है, आप किसी सरकारी कार्यक्रम में धार्मिक नारे नहीं लगा सकते."
ग़ौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में राम के नाम पर राजनीति पिछले कुछ समय से चल रही है.
वर्ष 2018 में रामनवमी के मौक़े पर पश्चिम बंगाल के आसनसोल, रानीगंज, पुरुलिया, 24 परगना में हिंसा फैली थी, जिसने सांप्रदायिक रंग ले लिया था. इसमें कई लोगों की जान भी गई थी.
2019 में ममता बनर्जी तृणमूल के एक धरना कार्यक्रम में शामिल होने के लिए उत्तर 24-परगना ज़िले के नैहाटी जा रही थीं, उस समय भी उनके काफ़िले के गुज़रते समय जय श्रीराम का नारा लगाया गया था. जिसके बाद वो काफ़ी ग़ुस्से में आ गई थी. उससे पहले पूर्वी मिदनापुर में भी ऐसा ही वाक़या सामने आया था.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी क्या वाक़ई घेर रही है टीएमसी को
लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में 'जय श्रीराम' के नारे का काट भी ढूँढ लिया है.
चुनाव से पहले तृणमूल ने नारा दिया है, 'हरे कृष्णा हरे हरे, तृणमूल घोरे घोरे'.
इस बारे के विधानसभा चुनाव में बीजेपी अगर 'राम' नाम के सहारे है, तो तृणमूल कांग्रेस 'कृष्ण' के नाम के सहारे चल रही है.
पार्टी का नया नारा, हिंदू वोट बैंक को अपने तरफ़ करने का नया तरीक़ा तो नहीं हैं?
इस सवाल के जवाब में महुआ कहती हैं, "ये केवल चुनावी नारा है, इलेक्शन स्लोगन है. हमें आपका (बीजेपी का) स्लोगन नहीं बोलना है. हम अपना स्लोगन कहेंगे. मैं जिस ज़िले से आती हूँ, नदिया से, वहाँ श्री चैतन्या हर घर में वास करते हैं."
राम किसी एक के नहीं हैं. वो बीजेपी के नहीं हैं. वो आरएसएस के नहीं हैं. राम सबके हैं. लेकिन सब अपना निर्णय ले सकते हैं कि राम की पूजा वो कैसे करना चाहते हैं. घर में बोलना चाहें या सड़क पर बोलना चाहें. लेकिन जब हम चाहेंगे, तब हम बोलेंगे, कोई हमें इस बात के लिए विवश नहीं कर सकता कि वो जब चाहेंगे तब ही हमें राम बोलना हैं."
पश्चिम बंगाल में दूसरे नंबर पर बीजेपी या वामपंथी पार्टियाँ?- ग्राउंड रिपोर्ट
हालाँकि बीजेपी ममता की जय श्रीराम के नारे से नाराज़गी को अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ रही है. ममता बनर्जी की सरकार पर इससे पहले भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं.
महुआ ने इसका भी जवाब दिया.
उन्होंने कहा, "पश्चिम बंगाल में एक भी स्कीम ऐसा नहीं है, जो सिर्फ़ मुसलमानों के लिए हो. अल्पसंख्यकों के लिए बंगाल में जो बजट है, वो आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्यों से बहुत कम है. हमारे यहाँ 28 फ़ीसदी मुसलमान रहते हैं. हम किसी का तुष्टिकरण नहीं करते. करीमपुर इलाक़े में मुसलमान बहुसंख्यक हैं. तो किसी स्कीम में ग़रीब को घर देंगें और मुसलमानों को मिलेगा, तो आप ये नहीं कह सकते कि हमने मुसलमानों को घर दिया है. हम ये नहीं कह सकते आपका नाम राम है, तो घर देंगे और रहीम है, तो नहीं देंगे. 10 में छह घर अगर मुसलमानों को मिला, तो ये तुष्टिकरण नहीं है. ये सबकी देखभाल करने की एक प्रक्रिया का हिस्सा है."
आने वाले विधानसभा चुनाव में कई जानकारों का मानना है कि बंगाल में लड़ाई बीजेपी और तृणमूल के बीच ही सिमट कर रह गई है. हालाँकि लेफ़्ट और कांग्रेस ने भी अपने गठबंधन की घोषणा कर दी है. लेकिन महुआ को भी लगता है कि लेफ़्ट और कांग्रेस का इन चुनावों में कोई भविष्य नहीं हैं.
बीबीसी के साथ इंटरव्यू में उन्होंने माना कि बंगाल में बीजेपी नंबर दो पार्टी हो गई है. और तृणमूल का मुक़ाबला सिर्फ़ बीजेपी से है.
महुआ मोइत्रा का मानना है कि नए कृषि क़ानून का नुक़सान बीजेपी को पश्चिम बंगाल में भी होगा. इनसे पश्चिम बंगाल के किसान भी नाराज़ है. दिल्ली से दूर होने के कारण वहाँ के किसान भले ही दिल्ली आकर धरना नहीं दे रहे हों, लेकिन नाराज़गी वहाँ भी है. (bbc.com)


