विचार / लेख

मीडिया में चल रही है नकली बहस
29-Nov-2020 6:43 PM 55
मीडिया में चल रही है नकली बहस

-कृष्ण कांत 

मीडिया इस पर बहस नहीं करता कि सरकार किसान विरोधी कानून क्यों लाई? मीडिया इस पर भी बात नहीं करता कि सरकार किसानों के संसाधन छीनकर कृषि बाजार को पूंजीपतियों का गुलाम क्यों बनाना चाहती है? मीडिया प्रोपेगैंडा पर बहस करता है कि किसानों को कोई 'भड़का' रहा है.

क्या मीडिया ने ईमानदारी से ये बताने की कोशिश की कि किसान संगठनों के विरोध के कारण जायज हैं? जनता की तरफ से दूसरी आवाज विपक्ष की हो सकती थी, अगर वह मुर्दा न होता!
नए कानून से कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका सीधा नुकसान किसानों को होगा.
इन तीनों कृषि कानूनों के आने से ये डर बढ़ गया है कि ये कानून किसानों को बंधुआ मजदूरी में धकेल देंगे.

ये विधेयक मंडी सिस्टम खत्म करने वाले, न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म करने वाले और कॉरपोरेट ठेका खेती को बढ़ावा देने वाले हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान होगा.
बाजार समितियां किसी इलाक़े तक सीमित नहीं रहेंगी. दूसरी जगहों के लोग आकर मंडी में अपना माल डाल देंगे और स्थानीय किसान को उनकी निर्धारित रकम नहीं मिल पाएगी. नये विधेयक से मंडी समितियों का निजीकरण होगा.
नया विधेयक ठेके पर खेती की बात कहता है. जो कंपनी या व्यक्ति ठेके पर कृषि उत्पाद लेगा, उसे प्राकृतिक आपदा या कृषि में हुआ नुक़सान से कोई लेना देना नहीं होगा. इसका नुकसान सिर्फ किसान उठाएगा.

अब तक किसानों पर खाद्य सामग्री जमा करके रखने पर कोई पाबंदी नहीं थी. ये पाबंदी सिर्फ़ व्यावसायिक कंपनियों पर ही थी. अब संशोधन के बाद जमाख़ोरी रोकने की कोई व्यवस्था नहीं रह जाएगी, जिससे बड़े पूंजीपतियों को तो फ़ायदा होगा, लेकिन किसानों को इसका नुक़सान झेलना पड़ेगा.

किसानों का मानना है कि ये विधेयक "जमाख़ोरी और कालाबाज़ारी की आजादी" का विधेयक है. विधेयक में यह स्पष्ट नहीं है कि किसानों की उपज की खरीद कैसे सुनिश्चित होगी. किसानों की कर्जमाफी का क्या होगा?
नए कानूनों से जो व्यवस्था बनेगी उसकी दिक्कत ये है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मंडियों के समाप्त होने के बाद बड़े व्यवसायी मनमाने दामों पर कृषि उत्पादों की खरीद नहीं करेंगे.

सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को बाध्यकारी और उसके उल्लंघन को कानूनी अपराध घोषित करना चाहिए था. यही किसानों की मांग है, लेकिन सरकार उनकी बात सुनने की जगह प्रोपेगैंडा फैलाने में लगी है. ये कृषि कानून स्पष्ट तौर पर किसानों के विरोध में और बड़े व्यावसायिक घरानों के पक्ष में हैं.

सरकार के पास पुलिस बल की ताकत है, हो सकता है सरकार लाठी और गोली चलाकर जीत जाए, लेकिन उस बर्बादी का क्या होगा जो इन कानूनों से संभावित है? सबसे पते का सवाल ये है कि आप अपनी जनता की बात सुनने की जगह जनता से ही भिड़ने की हिमाकत क्यों कर रहे हैं?

 

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