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लखीमपुर खीरी यानी संविधान स्थगित संविधान स्थगित यानी लखीमपुर खीरी
10-Oct-2021 5:16 PM (95)
लखीमपुर खीरी यानी संविधान स्थगित संविधान स्थगित यानी लखीमपुर खीरी

-चिन्मय मिश्र

‘‘मैं एक उद्देश्य लेकर सन् 1914 के अंत में अफ्रीका से भारत लौटा था। वह उद्देश्य था- जीवन के हर क्षेत्र में हिंसा और झूठ के बजाए सत्य और अहिंसा का मानव मात्र में प्रचार करना। सत्याग्रह के सिद्धांत की कभी पराजय नहीं होती।’’
-महात्मा गांधी
कुचला जाना जब मुहावरे से निकलकर यर्थाथ बनता हैं तो लखीमपुर खीरी में स्वयं को चरितार्थ करता है। यह कोई साधारण घटना नहीं है। इस घटना ने यह जतलाने की कोशिश की है कि भारत में संविधान ‘‘स्थगित’’ हो गया है। इस काल में उस पर अमल करने की प्रतिबद्धता लगातार अर्थहीन घोषित की जा रही है। आप पैदल जा रहे हों, यासडक़ पर प्रदर्शन कर रहे हों, तो आपसे चर्चा की आवश्यकता नहीं है। कुचल दिया जाना इससे बेहतर विकल्प है। संविधान स्थगित है, इसलिए संविधान की उद्देशिका भी स्थगित है, जो सामाजिक, आर्थिक राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता के साथ ही साथ व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता की बात करती है। स्थगित है भारत के नागरिकों को संविधान प्रदत मौलिक अधिकार। स्थगित है समता का अधिकार। स्थगित है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार। स्थगित है शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का अधिकार। स्थगित है अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण का अधिकार। स्थगित है कुछ दशाओं में गिरफ्तारी से संरक्षण का अधिकार। स्थगित है शोषण के विरूद्ध अधिकार। स्थगित है धार्मिक कार्यो के प्रबंध की स्वंतत्रता का अधिकार। स्थगित है भारत में कहीं भी निर्बाध आवागमन का अधिकार। स्थगित हैं अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकार।

तो साहब सब स्थगित है। लखीमपुर से 125 किलोमीटर दूर स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव में घरों की चभियां दी जा रहीं हैं, लेकिन उजड़े घरों की बात नहीं होती। चिथड़े-चिथड़े हुए मनुष्यों की बात नहीं होती। जश्न भले ही आजादी का ही क्यों न हो क्या यहअपने नागरिकों की दुर्दशा की स्वीकारोक्ति का माध्यम नहीं बन सकता? न मालूम क्यों इस लोमहर्षक घटना पर महेश कटारे की कहानी ‘‘मुर्दा स्थगित’’ याद आ गई है। कहानी एक शासन प्रमुख की बेटी के विवाह की शोभायात्रा से शुरू होती है। घोषणा हो चुकी है हुजूर की पुत्री ससुराल जाएगी, सारा शहर रोएगा। कर्तव्य पालन में अखबार चौकस थे। खबर फैला दी गई। कहानी बताती है, सवाल उठता है, लोकतंत्र। क्या चीज है यह ? आदरणीय यह एक शब्द भर है जिसे उछाला जा सकता है, चुभलाया जा सकता है। इसके नाम से तुम विरोधी पर हमला कर सकते हो। ताकत हो तो लतिया भी सकते हो। लोकतंत्र समाजवाद वगैरह आज के, ‘अल्लाहो अकबर’ और ‘हर-हर महादेव’ हैं। कहानी के अंत में हलचल मचती है कि क्योंकि गरीब की मृत्यु हो गई है। पुलिस वाले मंत्रणा कर रहे है कि यह कोई राजनीतिक साजिश तो नहीं है कि मुर्दा समय पर खड़ा हो जाए। परंतु मुर्दा तो वास्तव में मुर्दा ही है। शोभायात्रा निकलती है। पुलिस इस तरह से स्वयं को तैनात करती है कि मुर्दा न दिखे। परंतु युवराज की नजर वहां खड़े घुटमुंड, सफेद कपड़ा डाले बच्चे पर पड़ती है। युवराज मुस्कराते हैं उसे देख! बच्चा अचकचा जाता है। वह भी मुस्कराता है और चौंककर लडक़ा अपने हाथों के फूल उस शोभायात्रा पर उछाल देता है। कहानी यहां खत्म नहीं होती। शायद यहीं से शुरू होती है। मुर्दा स्थगित है। शवयात्रा स्थगित है। शवदाह स्थगित है। शोभायात्रा जारी है। समारोह जारी है। लखनऊ में भी चल रहा है। दिल्ली में भी चल रहा है। शोक तो यह देश भूल गया है। शोक अब नितांत व्यक्तिगत बनकर रह गया है। जितना बड़ा शोक, उतना बड़ा मुआवजा। इसके बाद तो शोक मुक्त हो जाइये। मुस्कराइये। अपने भाग्य पर इतराइये। आपको कम से कम मुआवजा तो मिल गया वरना! वरना क्या?भारतेंदु हरिशचंद्र का नाटक अंधेर नगरी पढ़ लीजिए सब समझ जाएंगें। आपको विश्वास हो जाएगा कि कुछ रचनाएं कालातीत होती हैं। भले ही उनकी पृष्ठभूमि राजतंत्र की हो, लेकिन वे वर्तमान लोकतंत्र पर भी खरी उतरती हैं।

भारत में जो कुछ घट रहा है, वह वास्तव में लगातार इतिहास के पुनरावलोकन की ओर धकेल रहा है। भविष्य कहीं नजर नहीं आ रहा। वर्तमान हमेशा अतीत को दोहरता नजर आ रहा है। यह भयानक है। एक फिल्मस्टार के बेटे की जमानत का इसलिए विरोध होता है कि वह प्रभावशाली है और सबूतों से छोड़छाड़ कर सकता है। वहीं देश के गृह राज्यमंत्री के बेटे की गिरफ्तारी इसलिए नहीं होती क्योंकि मुख्यमंत्री का कहना है कि पुख्ता सबूतों पर ही गिरफ्तारी होगी। भाईये लोग इतने अशक्त हैं कि सबूतों से छेड़छाड़ नहीं कर सकते। चश्मदीद गवाहों से इतना डरते हैं कि बीमार हो गए और घर में आराम करने लगते हैं। पुलिस भी इन शक्तिहीन लोगों के प्रति बेहद संवेदनशील है। वह उनकी निद्रा में व्यवधान नहीं डालती। घर के बाहर समन चस्पा कर देती है। नियत दिनांक और समय पर मंत्री सुपुत्र नहीं पहुंचते। सर्वोच्च न्यायालय थोड़ा गुस्सा दिखाता है तो दूसरा समन दे दिया जाता है। वे अगले दिन 11 बजे थाने पहुंचने का समय दे देते हैं। इतना ही नहीं जांच के लिए पहुंच कर हम सबको कृतार्थ भी कर देते हैं। वे बेहद शालीनता का परिचय देते हुए सफेद बुर्राक कपड़ों (शायद खादी के हो) में पहुंचते हैं। सवाल है कानून-व्यवस्था संभालने वालों की निष्पक्षता और नीयत का।

कपड़ों से एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाचक्र याद आ रहा है। भारत में भी इसे दोहराने का आरंभिक दौर प्रारंभ हो गया है। पिछले कुछ वर्षों से इस परिस्थिति में उछाल सा आया भी है। यह है इटली में फाजिस्म के उत्कर्ष के दौरान गठित युवाओं का समूह जिसे ‘‘ब्लेकशर्ट’’ (काली कमीज) नाम दिया गया था। ब्लेक शर्ट का पहला दस्ता जिसे एक्शन स्चयड कहा गया था। इसकी शुरुआत मार्च 1919 में हुई थी। सन् 1920 के अंत तक इस ब्लेकशर्ट ने अपने कार्यवाही शुरू कर दी थी। इस दौरान इन्होंने समाजवादियों के साथ ही साथ कम्युनिस्टों, रिपब्लिकनों, कैथोलिक, ट्रेड यूनियन नेताओं और हजारों नागरिकों को मारा। इन्हीं की वजह से सन् 1922 में मुसोलिनी सत्ता में आया। इसके अगले ही साल ब्लेकशर्ट को राष्ट्रीय मिलिशिया (नागरिक सेना या अन्य पेशे वाले लोग जो लड़ाई के समय सिपाही का काम करें) में परिवर्तित कर दिया गया। ज्यादा विस्तार में जाना बेहद लोकहर्षक हो जाएगा। गौर करिए मुंबई में क्रूज पर नारकोटिक्स ब्यूरो के छापे में सत्ताधारी दल से जुड़े लोग आरोपियों को पकड़ कर ले जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। क्या पहले कभी किसी राजनीतिक दल का पुलिस कार्यवाही में इतना सीधा हस्तक्षेप देखा है? यह बेहद खतरनाक स्थिति है जो संविधान व कानून के स्थगित होने का प्रमाण दे रही है। देश भर में हो रहे मॉब लिंचिंग जिसका स्वरूप अब सिर्फ सांप्रदायिक नहीं रह गया है भारत में ब्लेकशर्ट के आगमन की सूचना तो नहीं है? लखीमपुर खीरी में जीप से कुचले गए लोगों के प्रति व वहां मारे गए अन्य व्यक्तियों के प्रति सत्ताधारी दल के मुखियाओं की चुप्पी भी बहुत कुछ समझा रही है।

शासन व्यवस्था या तंत्र के चरमराने को उसके एकपक्षीय होने से समझा जा सकता है। इसके पीछे सीधा समन्तव्य यही होता है कि बजाए आक्रामक होने के दूसरे पक्ष की नितांत अवहेलना करना शरू कर दिया जाए। मजेदार बात यह है कि भारत में मीडिया का अधिकांश हिस्सा भी एकपक्षीय हो गया। ऐसा तभी होता है कि जब व्यक्ति अपने आत्मसम्मान और गरिमा का अंतिम संस्कार कर दे। गांधी कहते हैं कि कायरता सबसे बड़ी हिंसा है। किसी हिंसक मनुष्य के किसी दिन अहिंसक बनने की आशा हो सकती है मगर बुजदिल के लिए ऐसी कोई आशा नहीं होती। निहत्थों और बेकसूर लोगों पर जीप चढ़ाने वाले हिंसक से ज्यादा कायर है। उनका लोकतांत्रिक मूल्यों में कोई विश्वास नहीं है। उसकी एक वजह यह भी है कि वे अपने आसपास कायरों का बोलबाला देख रहे हैं। आम जनता के साथ अन्याय करने वाले प्रत्येक कायर को समाज नए सिरे से प्रतिष्ठित कर रहा है। हमारी संवेदनाएं दिनों दिन मरती जा रहीं हैं। हम एक तरह से संज्ञाशून्य होते जा रहे हैं। हमें किसी अन्य का दर्द महसूस ही नहीं होता। इसे कंडीशनिंग या अनूकूलता भी कहा जा सकता है। हांगकांग के रेस्टारेंट में एक पानी भरे जार में मछली को डाल दिया जाता है और नीचे आग जला दी जाती है। पानी नीचे से धीरे-धीरे गरम होता है। मछली आंच महसूस करती है और शनै: शनै: ऊपर आती जाती है वह छटपटाती भी नहीं। पानी गरम होता जाता है और इस क्रम में वह एकदम ऊपर पहुंचती है। अपना मुंह पानी से बाहर निकालती है। परंतु तब तक वह उबल चुकी होती है। बाहर निकाल कर हमें परोस दी जाती है। हम भी इसी तरह परोसे जा रहे हैं। कायराना हिंसा के उबलते पानी में हम बिना छटपटाए, बिना विचलित हुए शिकार हो रहे हैं, किसी का आहार बन रहे हैं।

लखीमपुर खीरी की घटना हमें यह भी समझा रही है कि भारत में अब सत्याग्रह की क्षमता संभवत: किसानों में ही बची है। इतनी बड़ी घटना हो जाने के बावजूद उनका शांत बना रहना हमें समझा गया है कि ये समुदाय अपने लक्ष्यों के प्रति किस हद तक समर्पित है। गौरलतब हैं मौन सबसे सशक्त अभिव्यक्ति और आवाज है। किसान आंदोलन और किसानों ने भारतीय शासन तंत्र को यह जतला दिया है कि वे बदलाव की लड़ाई लड़ रहे हैं, निजी स्वार्थों की नहीं। इस पूरे घटनाक्रम में हमारे मध्यवर्ग की चुप्पी बता रही है कि वे भारत की मुख्यधारा से बाहर हैं और महज अपने निजी हित और स्वार्थ तक सीमित हैं।

लखीमपुर खीरी में कुचले जाने वाले मुहावरे का यथार्थ में परिवर्तित हो जाना हमें समझा रहा है कि जीवन के प्रत्येक आयाम से हिंसा की विदाई करना ही होगी। शासन तंत्र को यह समझना होगा कि असंतोष का विप्लव में परिवर्तन एकाएक नहीं हो जाता। असंतोष लगातार बढ़ रहा है। और यदि उसकी अनदेखी करते रहेंगे तो विस्फोटक स्थिति अब बहुत दूर नहीं है। जीप से कुचला जाना कोई साधारण घटना नहीं है। यह लोकतंत्र को शाब्दिक और वास्तविक दोनों अर्थों में कुचलने का दुस्साहस है। गृह राज्यमंत्री का त्यागपत्र न देना राजनीति में व्याप्त अनैतिकता को अधिक स्पष्ट कर रहा है। विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों की इस विवाद में नजरबंदी और नाकाबंदी ढहती व्यवस्था का प्रतीक है, जो सच्चाई से आँखे नहीं मिला सकती। उम्मीद करते है, लखीमपुर - खीरी कुचले जाने का आखिरी उदाहरण होगा। फिराक गोरखपुर कहते हैं,

जिसे कहते हैं दुनिया कामयाबी वाए नादानी,
उसे किन कीमतों पर कामयाब इंसान लेते हैं।

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