विचार / लेख
-देवेन्द्र नाथ शर्मा
आदिवासियों के लिए पेड़ मात्र वृक्ष नहीं, बल्कि देवस्वरूप हैं। इसलिए वे पेड़ों की पूजा-अर्चना करते हैं। उनका सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन पूरी तरह पेड़ों और जंगलों के इर्द-गिर्द घूमता है।
आज विकास के नाम पर जंगलों में बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जा रहे हैं, जिससे आदिवासी समाज भयभीत है। वे डरे-सहमे यह देख रहे हैं कि कब सरकार और कॉरपोरेट की मिलीभगत से उनके जंगलों पर कुल्हाड़ी चल जाए। ग्राम सभाओं की फर्जी सहमति लेकर जंगलों की कटाई के अनेक उदाहरण उनके सामने हैं।
वन विभाग के स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से जंगलों में अवैध पेड़ कटाई तो दशकों से जारी रही है, लेकिन अब विकास की आड़ में बड़े पैमाने पर हो रही कटाई ने आदिवासी समाज को गहरी चिंता में डाल दिया है। कई जिलों में आदिवासी अब जागरूक होकर पेड़ों की अवैध कटाई और सरकारी अनुमति से कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा बड़े स्तर पर वनों की कटाई के विरुद्ध एकजुट हो रहे हैं।
वे अच्छी तरह जानते हैं कि उनका अस्तित्व इन जंगलों और पेड़ों से ही जुड़ा है। पेड़ों की कटाई से न केवल उनका जनजीवन बुरी तरह प्रभावित होगा, बल्कि उन्हें विस्थापन का दंश भी झेलना पड़ेगा। साथ ही, देवतुल्य पेड़ों पर आश्रित वन्य जीव, पशु-पक्षी भी जीवन संकट में पड़ जाएंगे।
इसीलिए पिछले एक दशक में स्थानीय आदिवासी समूहों द्वारा जंगलों की रक्षा को लेकर कई आंदोलन किए गए हैं। उन्हें अब यह समझ आ चुकी है कि पर्यावरण और पेड़ों को बचाने की लड़ाई उन्हें खुद लडऩी होगी। सरगुजा, बस्तर संभाग के विभिन्न जिलों तथा रायगढ़ जैसे क्षेत्रों में यह आंदोलन तेजी से गति पकड़ रहा है।
राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के अवसर पर जगदलपुर जिले के मुख्यालय में आदिवासी क्षेत्र की 20 से अधिक ग्राम सभाओं के प्रतिनिधियों ने ‘महाग्रामसभा’ का आयोजन किया। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के उद्देश्य से एकजुट हुए इन प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कहा कि जंगलों से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग तभी तक संभव है, जब तक उनका संरक्षण सुनिश्चित रहे। जंगल केवल लकड़ी या वनोपज का स्रोत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के समस्त जीवों का निवास, पोषण और जीवन का आधार हैं। आदिवासियों का संपूर्ण जीवन और आजीविका जंगलों पर ही निर्भर है।
इसी क्रम में बस्तर के दंतेवाड़ा जिले में आलनार पहाड़ी से 7 जून को जल, जंगल और जमीन बचाने के उद्देश्य से हजारों आदिवासियों की पदयात्रा शुरू हो चुकी है, जो कई गांवों से होते हुए 11 जून को दंतेवाड़ा पहुंचेगी।
इसके पहले से सरगुजा संभाग में 1,70,000 हेक्टेयर में फैला मध्य भारत का फेफड़ा माने जाने वाला हसदेव अरण्य के जंगलों में पेड़ों की कटाई के विरुद्ध व्यापक जन आंदोलन दस वर्षों से चल ही रहा है । यह आंदोलन ‘हसदेव हरण बचाओ संघर्ष समिति’ के नेतृत्व में स्थानीय आदिवासी समुदायों द्वारा लगातार चलाए जा रहा है । गत अक्टूबर में स्थानीय आदिवासी समुदाय द्वारा वन सत्याग्रह किया गया और खनन की स्वीकृति को रद्द करने के लिए ग्रामीणों ने 300 किलोमीटर की पदयात्रा भी की। इन लोगों का मानना है की खनन परियोजनाओं के चलते लाखों पेड़ों की कटाई से हाथियों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। स्थानीय आदिवासियों का मानना है कि इन जंगलों को कटना उनकी हजारों साल पुरानी संस्कृति व आजीविका का अंत तथा जंगलों की जैव विविधता की समाप्ति है।


