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बिहार पर 2004 की वह परदेसी हैडिंग, और आज के अँधेरे की खरी हकीकत!
15-Jun-2026 9:13 PM
बिहार पर 2004 की वह परदेसी हैडिंग, और आज के अँधेरे की खरी हकीकत!

-हेमंत कुमार झा

ब्रिटेन के चर्चित अखबार ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 21 फरवरी, 2004 को बिहार पर एक स्पेशल रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक था ‘एन एरिया ऑफ डार्कनेस’। इस रिपोर्ट में बिहार को भारत भूभाग के चित्र में एक अंधेरे धब्बे के रूप में रेखांकित किया गया था। रिपोर्टर ने इसके शीर्षक के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखक वी. एस.नायपॉल की 1964 में प्रकाशित कृति ‘एन एरिया ऑफ डार्कनेस’ से प्रेरणा ग्रहण की होगी।

इस रिपोर्ट में बिहार को भारत के सर्वाधिक पिछड़े, सर्वाधिक गरीब, सर्वाधिक ध्वस्त शिक्षा व्यवस्था, अति भ्रष्ट और अकुशल प्रशासनिक व्यवस्था, चिंताजनक कानून व्यवस्था वाले एक अंधेरे धब्बेनुमा इलाके के रूप में तो विश्लेषित किया ही गया था, इसके भविष्य को लेकर भी यह कह कर आशंकाएं व्यक्त की गई थी कि बिहार के लोग अपने को देश के सबसे अधिक पिछड़े, सबसे अधिक गरीब लोगों के रूप में देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं और प्रशासनिक महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार, शैक्षिक क्षेत्र में व्याप्त अराजकता और भ्रष्टाचार आदि को ‘नॉर्मल’ मान कर जीने और एडजस्ट करने के अभ्यस्त हो चुके हैं। उनमें राजनीतिक परिवर्तन की भूख है क्योंकि वे राजनीतिक रूप से जागरूक हैं लेकिन उनमें ऐसी इच्छाशक्ति का घोर अभाव है जो किसी समुदाय या किसी क्षेत्र के गुणात्मक विकास के लिए आवश्यक तत्व है। उनके दिलोदिमाग में भ्रष्ट राजनेताओं, भ्रष्ट अफसरों, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कब्र बन चुके अपने शैक्षिक संस्थानों के खिलाफ कोई प्रतिरोध की भावना जन्म नहीं लेती क्योंकि वे मान कर चलते हैं कि बिहार की और हम सबकी यही गति है।

उसी दौरान, यानी, इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के कुछ वक्त आगे या पीछे ‘इंडिया टुडे’ ने अपने एक संपादकीय में बिहार के संदर्भ में एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी की थी...‘बिहार अगर देश से अलग होने की मांग करेगा तो देश के बाकी लोग उसकी इस मांग का समर्थन ही करेंगे’। मतलब कि देश के बाकी हिस्से के लिए बिहार एक तिरस्कृत और किसी सुधार की इच्छाशक्ति से रहित एक अराजक, अनगढ़ राज्य है जो अगर भारत से अलग होना चाहे तो बाकी सारा देश यही कहेगा कि...‘जा भाई, तू अपना खुद ही जान ले।’

बाकी देश को मालूम है कि बिहारी चाहे जिस अवस्थिति में रहेगा, भूख और गरीबी से बिलबिलाते हमारे महानगरों में रिक्शा-टेम्पू चलाने, फर्श पर पोछा लगाने, गेट पर सिक्युरिटी गार्ड के रूप में खड़ा रहने, फैक्ट्रियों में ठेका मजदूरी आदि करने के लिए आएगा ही आएगा।

लगभग उसी दौरान, संभवत: 2003 के किसी महीने में, बिहार की तत्कालीन सत्ता पर काबिज लालू प्रसाद यादव के आह्वान पर पटना में एक अति चर्चित रैली हुई थी जिसका नाम था...‘तेल पिलावन लाठी भजावन रैली।’ इस रैली की खबरें ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा आदि के मीडिया में भी चली थी और इसके उन दिलचस्प दृश्यों को देश-विदेश के टेलीविजन मीडिया में खूब हास्यजनक तरीके से दिखाया गया था जिनमें गांवों, कस्बों से लोग मोटे मोटे ल_ लेकर रैली में शामिल होने पटना की सडक़ों पर चले जा रहे हैं और शहर के शांतिकामी लोग और व्यवसायीगण किसी संभावित उपद्रव से आतंकित हो अपने घरों और दुकानों के दरवाजों को बंद किए खिड़कियों से झांक रहे हैं।

माना जाता है कि लालू के समग्र पिछड़ावाद की राजनीति के ताबूत में अंतिम कील इसी रैली के माध्यम से ठोकी गई थी और बिहार के अति पिछड़े समुदाय ने नीतीश और भाजपा के गठजोड़ में अपना राजनीतिक ठिकाना तय कर लिया था।

तब से बीस-बाईस साल बीते। उस दौरान जन्मे बच्चे अब बालिग हो चुके। लेकिन बिहार...? बाकी देश दुनिया के बरक्स बिहार आज भी कहां खड़ा है?

नीतीश के ‘सुशासन’ ने बिहार में संगठित अपराध के तंत्र पर प्रहार तो किया किंतु उसके समानांतर नौकरशाही में संगठित भ्रष्टाचार का जो तंत्र खड़ा हो गया उसकी ओर से नीतीश जी या तो आँखें मूंदे रहे या यह भी कह सकते हैं कि विवश रहे। उनके बीस वर्ष और एक अल्प कालावधि में जीतन राम मांझी के कार्यकाल में बिहार देश के सर्वाधिक भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र के रूप में शुमार होता रहा।

पटना में रियल स्टेट की कीमतें देश के बड़े महानगरों के मुकाबले भी अधिक इसलिए हो गई क्योंकि छोटा बड़ा हर भ्रष्ट सरकारी अमला पटना में फ्लैट और जमीन खरीदने को अपनी कमाई की सार्थकता के रूप में लेने लगा।

भ्रष्ट सरकारी नौकरों के मकानों को जब्त कर उनमें स्कूल आदि खोलने की नीतीश कुमार की घोषणाएं कागजी ही साबित हुई। एकाध अफसरों के साथ ऐसा हुआ भी तो इसलिए कि ‘लॉबी’ ने उनसे राजनीतिक या निजी खुन्नस साधा।

कुल मिलाकर नीतीश कुमार के पूरे शासन काल में बिहार का प्रशासनिक अमला देश के सर्वाधिक भ्रष्ट तंत्र के रूप में चर्चित और ‘प्रतिष्ठित’ रहा और बिहार जनमानस ने इसके साथ ‘एडजस्ट’ कर लिया।

नियोजित शिक्षकों की नियुक्तियों में भ्रष्टाचार का खेल चला, खरीदार उसमें शामिल हो गए, बिहार स्तर की विभिन्न परीक्षाओं में पेपर लीक का खेल चला, खरीदार उसमें शामिल हो गए, हर वाजिब काम में पैसा का खेल सरकारी कार्यालयों में चलता रहा, बिहारी जनमानस इसे ‘नॉर्मल’ मान कर एडजस्ट करती रही, बने बनाए पुल पुलिया निर्माण के तुरंत बाद या निर्माण के दौरान ही धंसते, गिरते रहे, बिहारी जनमानस इन खबरों को चटखारे ले ले कर पढ़ता सुनाता रहा, सडक़ें निर्माण के दौरान ही जमींदोज होती रहीं, टूटती रहीं, लोग इन्हें नॉर्मल मान कर आगे बढ़ते गए।

 

भ्रष्ट राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र कैसी शैक्षिक संरचना का निर्माण करेगा?

बिहार के शैक्षिक संस्थानों की दुर्गति बढ़ती हो गई। जिन संस्थानों के साथ बिहार के नौनिहालों की तकदीर जुड़ी थी उन्हें अपने शिकंजे में लेकर भ्रष्ट तत्वों ने करोड़ों नौजवानों की शिक्षा के साथ खिलवाड़ किया और उन्हें मैट्रिकुलेशन, इंटरमीडिएट, ग्रेजुएशन से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन आदि की डिग्रियां तो दी लेकिन उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता के साथ ऐसा संगठित और सांस्थानिक अन्याय किया कि उनमें से अधिकतर नौजवान ऊंची डिग्रीधारी होने के बावजूद अकुशल मजदूर बनने के अलावा और किसी लायक नहीं बन पाए।

बीते बीस पच्चीस वर्षों में विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्तियों में पैसों के खेल की जितनी चर्चाएं चलीं वैसा पहले के दौर में कभी देखा या सुना नहीं गया था।

नतीजा, बिहार के विश्वविद्यालयों में हर स्तर पर भ्रष्टाचार का ऐसा घृणित खेल चलना शुरू हुआ जिसने शिक्षा के मंदिरों को तो कलंकित किया ही, लाखों नौजवानों के भविष्य को अंधेरों में धकेल दिया।

मतलब कि...एक ऐसा लंबा दौर गुजरा जिसमें कई अवसरों पर...किसी कॉलेज में प्राचार्य/प्रभारी प्राचार्य का पद खाली हुआ, उस पर नियमानुसार नियुक्ति के बदले पद को अघोषित नीलामी में डाल दिया गया और जिस खरीदार ने सेटिंग कर ली वह प्राचार्य पद पर काबिज हो गया और उसके बाद...जैसे कोई किसी मृत गाय बैलों की चमड़ी उधेड़ता है वैसे ही अवैध कमाई के लिए उन संस्थानों की चमडिय़ां उधेड़ी जाती रही। निर्लज्ज...निडर लूट। सब देखते रहे। तमाम प्राध्यापक, तमाम छात्र संगठनों के नेता, तमाम मीडिया, पूरा बिहार। यह महज एक उदाहरण है। ऐसे ही पदों की खरीद फरोख्त की खबरों को लेकर बिहार की उच्च शिक्षा का माहौल गूंजता रहा है पिछले कुछ वर्षों से।

पटना के अखबारों में बड़े बड़े हफऱ्ों में, कई कई कॉलमों में, अक्सर कई सबूतों के साथ कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में व्याप्त ऐसी लूट खसोट की खबरें प्रकाशित होती रहीं...सुशासन वाली टीम के कप्तान और उनके खिलाड़ी गण आँखें मूंदे रहे, राज्यपालों को शिकायती पत्र भेजे जाते रहे, वहां के अधिकारियों की नींद अक्सर कभी नहीं खुली।

नतीजा, बिहार की नई पीढ़ी के शैक्षणिक भविष्य को बर्बाद करने वाले ऐसे भ्रष्ट तत्व, जिन्हें कानून के दायरे में आना था, वे गर्दनें उठा कर बिहार की शैक्षणिक गरिमा को रौंदते रहे और उनमें से अधिकतर आज भी बड़े पदों पर काबिज हैं। नीतीश की सत्ता बदलने और भाजपा के सत्ता शिखर पर आने के बाद उनमें से अधिकतर अब ‘डायरेक्ट’ राष्ट्रवादी भी बन चुके हैं।

बिहार में बीपीएससी से परीक्षा लेकर स्कूल शिक्षकों की बहाली हुई। एक से एक प्रतिभावान लोग शिक्षक बने। लेकिन बिहार के नए शिक्षा मंत्री को संतोष नहीं है। उन्हें ‘क्वालिटी शिक्षक’ चाहिए। वे शिक्षकों की सेवा शर्तों में सुधार नहीं करेंगे, उन्हें सुविधाजनक और प्रेरक माहौल नहीं देंगे लेकिन उनकी क्वालिटी पर सवाल उठा देंगें। पता नहीं, उन्हें क्या चाहिए।

बिहार में रोजगार का भयानक संकट है। फैक्ट्रियां अगर नहीं हैं यहां तो फिलहाल खुलने वाली भी नहीं हैं। रोजगार के लिए पलायन यहां के करोड़ों नौजवानों के ललाट पर लिखा है। सवाल है कि... बिहार अपने नौजवानों को कैसी शिक्षा, कैसा स्किल दे कर रोजगार के बाजार में भेजता है?

इस सवाल का जवाब ढूंढने में न बिहार के राजनेताओं को दिलचस्पी है, न बिहार के प्रबुद्ध वर्ग को, न बिहार की जनता को।  बिहार के संस्थान हर वर्ष लाखों की संख्या में ऐसे ग्रेजुएट उगल रहे हैं जो बाहर जा कर अकुशल मजदूर बनने के सिवा और किसी लायक अपने को प्रस्तुत नहीं कर पाते। जो इस माहौल में भी बेहतर कर पा रहे हैं वे निजी संस्कार, निजी परिश्रम और अभिभावकों की निजी छाया के प्रभाव से ही संभव हो रहा है।

वरना.. बिहार की उच्च शिक्षा में पाखंड, खानापूरी और लकीर पीटने के सिवा और क्या हो रहा है? इस सवाल पर इस तंत्र से जुड़े हर बुद्धिजीवी को, हर छात्र संगठन को, हर जागरूक नागरिक को सोचना होगा। राजनेता यह सोचने लायक नहीं हैं। हमने ऐसे राजनेताओं को अपने माथे पर बिठा लिया है जिनसे हम इस विजन की उम्मीद कर ही नहीं सकते कि वे बिहार की शैक्षिक संरचना में किसी सकारात्मक पहल के सूत्रधार बन सकें।

यह पूरे बिहार को सोचना है। बिहार के नौजवानों के उद्धार के लिए सबसे आवश्यक है यहां की शैक्षणिक संरचना में क्रांतिकारी सुधार, निर्मम प्रहार। न जाने कितने भ्रष्ट राजनीतिक नेता और नेताइन भी उच्च शिक्षा में बड़े पदों पर काबिज हैं। उनकी रिपोर्ट अगर मीडिया ले तो लोगों की आँखें पथरा जाएं उनकी कारगुजारियों की खबरें पढ़ कर।

लेकिन, लंदन के ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने बाईस वर्ष पहले अपनी रिपोर्ट में बिहार में व्याप्त अंधेरों का जिक्र करते हुए जो टिप्पणी की थी उसी को बिहार के लोग चरितार्थ करते रहे और सब कुछ को ‘नॉर्मल’ मान अपनी तकदीर को ही कोसते रहें तो कोई परिवर्तन संभव नहीं।

‘एन एरिया ऑफ डार्कनेस’...बिहार आज भी इसी शीर्षक को धारण कर रहा है। क्या ऐसा ही नहीं है?


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