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जब भारतीय फुटबॉल टीम को मिला था वल्र्ड कप में हिस्सा लेने का मौका, लेकिन क्यों नहीं खेली टीम
12-Jun-2026 8:22 PM
जब भारतीय फुटबॉल टीम को मिला था वल्र्ड कप में हिस्सा लेने का मौका, लेकिन क्यों नहीं खेली टीम

-प्रदीप कुमार

2026 का फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल 11 जून से शुरू हो रहा है। पहली बार वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल की मेजबानी तीन देश मिल कर रहे हैं। 11 जून से 19 जुलाई तक होने वाले इस मुक़ाबले आयोजन अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा संयुक्त तौर पर कर रहे हैं।

तीन देशों के 16 शहरों में 104 मैचों के बाद दुनिया को पता चलेगा कि वर्ल्ड कप का बादशाह कौन बनेगा। अमेरिका के तेरह, मेक्सिको के तीन और कनाडा के दो शहरों में ये मुक़ाबले होंगे।

इस आयोजन के साथ मेक्सिको, वर्ल्ड कप की तीन बार मेज़बानी करने वाला दुनिया का पहला देश बन जाएगा। इससे पहले 1970 और 1986 के वर्ल्ड कप का आयोजन मेक्सिको कर चुका है।

वैसे फ़ुटबॉल की दुनिया में बादशाहत के लिए होने वाले घमासान में यह पहला मौक़ा है जब दुनिया भर की 48 टीमों के बीच मुक़ाबला होगा। इससे पहले के सात वर्ल्ड कप आयोजनों के दौरान दुनिया की सर्वश्रेष्ठ 32 टीमों के बीच मुकाबला होता था।

यानी इस बार दुनिया भर से 16 और देशों को वर्ल्डकप में हिस्सा लेने का मौक़ा मिल रहा है। पिछली वर्ल्ड कप के 64 मैचों की तुलना में ज़्यादा मुक़ाबले भी खेले जा रहे हैं। ऐसे में फीफा का अनुमान है कि इस बार कम से कम छह अरब दर्शक इन मुक़ाबलों को देखेंगे। यानी चार साल पहले क़तर में खेले गए वर्ल्ड कप आयोजन से एक अरब ज़्यादा दर्शक इन मुक़ाबलों का आनंद लेंगे। वल्र्ड कप के 23वें आयोजन में दुनिया के चार देश, केप वर्डे, कुरासाओ, जॉर्डन और उज़्बेकिस्तान की फुटबॉल टीमें अपना डेब्यू करने वाली हैं।

लेकिन भारतीय खेल प्रेमियों के लिए इसमें कोई उत्साह की बात नहीं है, क्योंकि अब तक भारत इस टूर्नामेंट में एक बार भी हिस्सा नहीं ले पाया है।

फीफा, भारत और 1950 का वो साल...

भारत फुटबॉल वर्ल्ड कप में कभी हिस्सा नहीं ले पाया हो, लेकिन आज की पीढ़ी के कम ही खेल प्रेमियों को मालूम होगा कि एक मौका ऐसा भी आया था, जब भारत वर्ल्ड कप फुटबॉल में हिस्सा ले सकता था।

यकीन करना भले मुश्किल हो लेकिन हक़ीक़त यही है कि भारतीय फ़ुटबॉल टीम आज से 76 साल पहले यानी 1950 में ब्राज़ील में खेले जाने वाले वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने वाली थी, लेकिन भारतीय टीम इसमें हिस्सा नहीं ले सकी।

दरअसल दूसरे विश्व युद्ध के चलते 1942 और 1946 में वल्र्ड कप फुटबॉल का आयोजन नहीं हो सका था।

1950 में 12 साल के इंतज़ार के बाद वल्र्ड  कप का आयोजन होने वाला था। ब्राज़ील में होने वाले वल्र्ड कप के लिए महज 33 देशों ने क्वालिफाइंग राउंड में खेलने पर सहमति जताई थी।

क्वालिफ़ाइंग ग्रुप 10 में भारत को बर्मा (म्यांमार) और फिलीपींस के साथ जगह मिली थी। लेकिन बर्मा और फिलीपींस ने क्वालिफाईंग राउंड से अपना नाम वापस ले लिया था। यानी भारत बिना खेले ही वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफ़ाई कर गया था। इतिहास बहुत दूर नहीं था। भारतीय टीम को पहली बार वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल में अपना करतब दिखाने के लिए टिकट मिल चुका था।

भारत हिस्सा लेता तो कैसा प्रदर्शन करता?

1950 के वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल का जब फ़ाइनल राउंड ड्रॉ तैयार हुआ, तो भारत को पूल -3 में स्वीडन, इटली और पराग्वे के साथ जगह मिली।

अगर भारत इस टूर्नामेंट में हिस्सा लेता, तो उसका प्रदर्शन कैसा होता?

इस बारे में दिवंगत फुटबॉल पत्रकार नोवी कपाडिय़ा ने वर्ल्ड कप फुटबॉल की गाइड बुक में लिखा है, उस दौर में पराग्वे की टीम बहुत मजबूत नहीं थी।

इटली ने अपने आठ मुख्य खिलाडिय़ों को टीम में अनुशासनहीनता के चलते शामिल नहीं किया था। टीम इतने बुरे हाल में थी कि ब्राज़ील पहुँचने के बाद टीम के कोच विटोरियो पोज्ज़ो ने इस्तीफा दे दिया था।

स्वीडन की टीम भारत के मुक़ाबले बहुत अच्छी स्थिति में थी। इस लिहाज से देखें तो भारत ग्रुप में दूसरे नंबर पर हो सकता था लेकिन टीम को बेहतरीन एक्सपोजऱ मिलता।

कैसी थी भारतीय फ़ुटबॉल की प्रतिष्ठा

1950 में भारतीय फ़ुटबॉल का बहुत ज़्यादा इंटरनेशनल एक्सपोजऱ नहीं था लेकिन टीम की प्रतिष्ठा अच्छा गेम खेलने वाले मुल्क के तौर पर थी।

इसकी झलक भारतीय टीम ने 1948 के लंदन ओलंपिक खेलों में भी दिखाई थी। फ्रांस जैसी मजबूत टीम से भारत महज 1-2 के अंतर से हारा था। उस दौर में टीम के फॉरवर्ड और ड्रिब्लर के खेल की बदौलत भारतीय फुटबॉल अपनी पहचान बनाने में जुटा था।

अहमद खान, एस रमन, एमए सत्तार और एस मेवालाल जैसे खिलाड़ी के लोग फैंस थे। लंदन ओलंपिक में भारत के ये तमाम खिलाड़ी नंगे पाँव फुटबॉल खेलने उतरे थे। हालाँकि राइट बैक पर खेलने वाले ताज मोहम्मद बूट पहन कर खेले थे।

ब्राज़ील वल्र्ड कप में क्यों नहीं हिस्सा ले सकी टीम

1950 के वल्र्ड कप में भारतीय फुटबॉल टीम ने आखिर क्यों नहीं हिस्सा लिया, इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलता है।

हालाँकि ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ) ने जो अधिकारिक वजह बताई थी, उसके मुताबिक, टीम चयन में असहमति और अभ्यास के लिए पर्याप्त समय नहीं होने के चलते टीम ने नाम वापस लिया था। लेकिन इसको लेकर सालों तक कई चर्चाएँ होती रही हैं, इनमें सबसे ज़्यादा चर्चा इस बात की हुई कि भारतीय खिलाड़ी नंगे पांव फ़ुटबॉल खेलना चाहते थे और फ़ीफ़ा को यह मंज़ूर नहीं था।

लेकिन नोवी कपाडिय़ा के अलावा वरिष्ठ खेल पत्रकार जयदीप बसु की हाल में आई किताब भी इस वजह को बहुत विश्वसनीय नहीं मानती है।

जयदीप बसु की संपादित किताब ‘बॉक्स टू बॉाक्स : 75 ईयर्स ऑफ द इंडियन फुटबॉल टीम’ में लिखा है, ‘फीफा के भारतीय खिलाडिय़ों के नंगे पांव खेलने पर आपत्ति का कोई सवाल ही नहीं था।’

लंदन ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले सात-आठ खिलाडिय़ों के हवाले से जयदीप बसु ने लिखा है, ‘उस टीम में शामिल सात-आठ खिलाडिय़ों के ट्रैवल बैग में स्पाइक बूट रखे हुए थे और ये खिलाडिय़ों के लिए अपनी पसंद का मामला था।’

दरअसल यह वह दौर था, जब फुटबॉल खिलाड़ी अपने पांव पर मोटी पट्टी बांध कर खेलना पसंद करते थे और 1954 तक यह चलन दुनिया के कई दूसरे देशों में भी मौजूद था।

क्या फंड की कमी थी वजह

भारत के वल्र्ड कप फुटबॉल में हिस्सा नहीं लेने की एक वजह आर्थिक भी मानी जाती है। लेकिन यह दावा भी सच नहीं जान पड़ता है।

जयदीप बसु ने अपनी पुस्तक में बताया है कि ब्राजील तक जाने के लिए टीम के ख़र्चे का मुद्दा था, लेकिन इसका हल निकल आया था।

उन्होंने लिखा है कि उस वक्त भारत की तीन राज्य स्तरीय फुटबॉल संघ ने खर्चे में हिस्सेदारी देने का भरोसा दिया था।

इतना ही नहीं नोवी कपाडिय़ा ने अपनी पुस्तक बताया है कि मार्च और अप्रैल महीने में ब्राजील ने भारतीय फुटबॉल संघ से संपर्क कर टीम के ख़र्चे का अधिकांश हिस्सा चुकाने का भरोसा दिया था।

 नोवी कपाडिय़ा की पुस्तक के मुताबिक़ ब्राज़ील के इस भरोसे की दो वजहें थीं- एक तो स्कॉटलैंड, फ्रांस, तुर्की और चेकोस्लोवाकिया की टीमों ने भी फुटबॉल वल्र्ड कप से अपना नाम वापस ले लिया था और दूसरा ब्राजील चाहता था कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की देश की टीम ब्राजील में फुटबॉल खेले।

जयदीप बसु की पुस्तक के मुताबिक भारत ने 16 मई, 1950 को वल्र्ड कप जाने वाली टीम का ऐलान कर दिया था। भारत के प्रस्तावित कार्यक्रम के मुताबिक भारतीय टीम 15 जून को ब्राजील के लिए रवाना होती और भारत का पहला मैच 25 जून को पराग्वे के साथ खेला जाना था।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसे जयदीप बसु भारतीय फ़ुटबॉल दुनिया का सबसे बड़ा रहस्य बताते हैं, जिसका कोई हल नहीं मिल सका है।

हालांकि नोवी कपाडिया और जयदीप बसु की पुस्तकों से यह जाहिर होता है कि ना तो उस दौर के भारतीय फुटबॉल खिलाड़ी और ना ही फ़ुटबॉल अधिकारी इस मौके की अहमियत को समझ पाए थे।

दरअसल उस वक़्त भारतीय हॉकी टीम ओलंपिक खेलों की चैम्पियन टीम बन चुकी थी और हर खेल के खिलाड़ी के लिए लोकप्रियता का अंतिम पैमाना वही था। ऐसे में भारतीय फ़ुटबॉल टीम में खेलने और खेल को चलाने वाले, दोनों लोगों के लिए ओलंपिक खेलों में बेहतर प्रदर्शन पर ध्यान ज़्यादा था।

इसके अलावा 1951 का एशियाई खेलों का आयोजन भी दिल्ली में होना था। मेजबान टीम के तौर पर भारत का उद्देश्य इसमें बेहतर प्रदर्शन करना था।

यहाँ यह ध्यान देने की जरूरत है कि 1950 तक दुनिया भर में वल्र्ड कप फुटबॉल की लोकप्रियता उतनी नहीं हुई थी, जितनी बाद के सालों में होती गई। तब यह एक ग्लैमर रहित खेल टूर्नामेंट था।

नियमों की जानकारी का अभाव

यह भी ज़ाहिर होता है कि नियमों की जानकारी के अभाव के चलते भी भारत के फुटबॉल अधिकारियों ने ऐसा फ़ैसला लिया होगा।

दरअसल वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल में हिस्सा लेने वाले खिलाडिय़ों को तब प्रोफ़ेशनल खिलाड़ी का टैग मिल जाता था।

खिलाडिय़ों के प्रोफेशनल होने का मतलब ये था कि उन्हें ओलंपिक और एशियाई खेलों में हिस्सा लेने की मंज़ूरी नहीं मिलती। क्योंकि उन दिनों में इन टूर्नामेंटों में हिस्सा लेने वाले खिलाडिय़ों को अमैच्योर होना होता था। हालांकि इस नियम से बचाव के रास्ते भी मौजूद थे, जैसे कि हंगरी, रूस और अन्य सोशलिस्ट देश वल्र्ड कप फुटबॉल में हिस्सा लेने वाले खिलाडिय़ों को सेना का सदस्य बता कर दावा करते थे कि सेना का सदस्य प्रोफेशनल नहीं हो सकता।

लेकिन संभवत: इतनी जानकारी उस समय भारतीय फुटबॉल के अधिकारियों को नहीं थी।

हो सकता है कि एशियाई खेलों और ओलंपिक खेलों में हिस्सेदारी से हटा दिए जाने के डर से ही भारतीय फुटबॉल संघ ने 1950 के वल्र्ड कप में हिस्सा नहीं लेने का फैसला किया हो।

लेकिन यह फैसला ऐसा ब्लंडर साबित हुआ, जिसका दंश पिछले 76 सालों से भारत के खेल प्रेमियों को साल रहा है, यह टीस हर चार साल पर होने वाले वर्ल्ड कप फुटबॉल के दौरान कुछ ज़्यादा हो जाती है। (bbc.com/hindi)


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