विचार / लेख
3 जून विश्व साइकिल दिवस
-दिलीप कुमार पाठक
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब हर व्यक्ति समय की कमी और तनाव की शिकायत करता है, तब एक बेहद साधारण और किफायती समाधान हमारे सामने खड़ा दिखाई देता है। वह समाधान है - साइकिल। आज 3 जून को पूरी दुनिया ‘विश्व साइकिल दिवस’ मना रही है। यह दिन किसी आधुनिक आविष्कार का जश्न नहीं, बल्कि उस सादगी और उपयोगिता को याद करने का अवसर है, जिसे हमने विकास की अंधी दौड़ में कहीं पीछे छोड़ दिया है। जब पूरी दुनिया महंगे ईंधन, ट्रैफिक जाम और जहरीले धुएं से हांफ रही है, तब साइकिल एक सुगम साधन की तरह नजर आती है। यह कोई साधारण सवारी नहीं, बल्कि बिना धुएं वाली वह मूक क्रांति है जो व्यक्ति की सेहत, जेब और धरती तीनों को एक साथ संवार सकती है।
आजकल की जीवनशैली को देखें तो हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आती हैं। घर से महज दो कदम दूर सब्जी की दुकान या दूध की डेयरी तक जाने के लिए भी लोग तुरंत मोटरसाइकिल या कार की चाबी उठा लेते हैं। नतीजा यह हुआ है कि शहरों की हवा भारी हो चुकी है, सडक़ों पर पैदल चलने की जगह नहीं बची और इंसानी शरीर बीमारियों का घर बनता जा रहा है। लोग शारीरिक रूप से खुद को फिट रखने के लिए हर महीने जिम में हजारों रुपये खर्च करते हैं और एक ही जगह खड़े होकर ट्रेडमिल पर दौड़ते हैं। जबकि इसका सबसे आसान और प्राकृतिक विकल्प हमारी दिनचर्या में ही छुपा है। सुबह या शाम को सिर्फ आधा घंटा साइकिल चलाना दिल को मजबूत करता है, मानसिक तनाव को कम करता है और शरीर को ऊर्जा से भर देता है।साइकिल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह समाज में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करती। इसके लिए न तो महंगे पेट्रोल-डीजल की जरूरत होती है और न ही किसी भारी-भरकम मेंटेनेंस या सर्विसिंग के खर्च की। यह आत्मनिर्भरता और बचत का सबसे पहला और सच्चा पाठ पढ़ाती है।
आज जब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याएं पूरी दुनिया के लिए चुनौती बनी हुई हैं, तब साइकिल जमीन पर उतरकर इसका व्यावहारिक समाधान देती है। अगर किसी भी शहर का हर तीसरा व्यक्ति अपने छोटे-मोटे स्थानीय कामों के लिए गाडिय़ों को छोडक़र साइकिल का इस्तेमाल करना शुरू कर दे, तो वायु प्रदूषण और ट्रैफिक की समस्या काफी हद तक हल हो सकती है।कई विकसित देशों ने इस बात को गहराई से समझा है और साइकिल को अपनी मुख्य जीवनशैली का हिस्सा बनाया है। वहाँ बड़े-बड़े अधिकारी और सजग नागरिक गर्व से साइकिल से दफ्तर जाते हैं। हमारे देश में भी अब धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है और शहरों में साइकिलिंग ग्रुप्स का चलन देखने को मिल रहा है। हालांकि, इस बदलाव को एक राष्ट्रव्यापी मुहिम बनाने के लिए हमें अपनी मानसिकता और बुनियादी ढांचे दोनों में सुधार करना होगा।
आज भी हमारे शहरों की सडक़ें सिर्फ बड़ी और तेज रफ्तार गाडिय़ों के हिसाब से बनाई जाती हैं। साइकिल चालकों के लिए अलग सुरक्षित लेन न होने के कारण लोग सडक़ों पर निकलने से कतराते हैं। सरकारों को शहरी नियोजन में साइकिल ट्रैक को प्राथमिकता देनी होगी। इसके साथ ही, समाज को इस संकुचित सोच से भी बाहर निकलना होगा कि साइकिल सिर्फ उन लोगों के लिए है जो गाड़ी नहीं खरीद सकते। साइकिल चलाना पिछड़ेपन की नहीं, बल्कि एक बेहद जागरूक, समझदार और आधुनिक नागरिक होने की पहचान है। इस विश्व साइकिल दिवस पर हमें केवल औपचारिक संदेश भेजने के बजाय एक छोटा सा व्यावहारिक संकल्प लेना चाहिए। तय करें कि सप्ताह में कम से कम एक या दो दिन हम अपनी गाडिय़ों को आराम देंगे और नजदीकी कामों के लिए साइकिल की सवारी करेंगे। जब आपकी साइकिल का पहिया घूमता है, तो देश की सेहत और पर्यावरण का पहिया भी सही दिशा में आगे बढ़ता है।
(लेखक पत्रकार हैं)


