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विद्या भैया : राजनीति की एक पूरी पीढ़ी का आखिरी प्रतिनिधि
11-Jun-2026 8:19 PM
विद्या भैया : राजनीति की एक पूरी पीढ़ी का आखिरी प्रतिनिधि

-दिनेश आकुला

उनकी मृत्यु के तेरह वर्ष बाद भी एक किस्सा मेरी स्मृतियों में आज भी उतना ही ताजा है।

रायपुर के लभांडी स्थित अपने निवास पर एक लंबी बातचीत के दौरान विद्या चरण शुक्ल ने मुझे 1977 की एक घटना सुनाई थी। आपातकाल समाप्त हो चुका था। कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी थी और देश में उसके खिलाफ गुस्सा था। दिल्ली में आयोजित एक संगीत समारोह में देश के कई बड़े नेता मौजूद थे। मंच पर पंडित भीमसेन जोशी प्रस्तुति दे रहे थे।

गाते-गाते उन्होंने एक पंक्ति छेड़ी—

‘जिस नगरी में दया धरम नाहीं, उस नगरी में रहना क्या।’

सभागार में मौजूद लोगों ने तुरंत इसका राजनीतिक संदर्भ समझ लिया। हंसी, तालियां और फुसफुसाहटों का दौर शुरू हो गया। उस समय आपातकाल के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक विद्या चरण शुक्ल पहली पंक्ति में बैठे थे। उन्होंने मुझे बताया था कि पहले तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि अचानक लोग क्यों प्रतिक्रिया दे रहे हैं। वे दाएं-बाएं देखने लगे। कुछ क्षण बाद उन्हें अहसास हुआ कि यह केवल एक भजन नहीं, बल्कि आपातकाल पर जनता का फैसला था।

सालों बाद जब वे यह घटना मुझे सुना रहे थे तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी। कोई कटुता नहीं थी। मानो वे स्वीकार कर चुके थे कि राजनीति में अंतत: इतिहास ही अंतिम निर्णय देता है।

मेरा विद्या चरण शुक्ल से परिचय 1994 में हुआ था। उस समय मैं स्नातक के प्रथम वर्ष में था और रायपुर के एक अंग्रेजी अखबार में प्रशिक्षु रिपोर्टर के रूप में काम शुरू किया था। इसके बाद लगभग दो दशकों तक उनसे अनगिनत मुलाकातें हुईं। कई बार घंटों तक चलने वाली बैठकों में उन्होंने भारतीय राजनीति के ऐसे किस्से सुनाए जिन्हें केवल वही बता सकते थे, क्योंकि वे उन घटनाओं के प्रत्यक्ष सहभागी रहे थे।

वे अक्सर 1957 के अपने पहले लोकसभा चुनाव की चर्चा करते थे। महासमुंद से दूसरी लोकसभा के लिए सांसद चुने जाने के साथ उनकी राष्ट्रीय राजनीति की यात्रा शुरू हुई थी। पांच दशकों से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने सत्ता के शिखर भी देखे और राजनीतिक एकांत भी। लेकिन एक बात कभी नहीं बदली-लोगों से उनका संवाद।

25 मई 2013 को झीरम घाटी में हुए माओवादी हमले और उसके बाद गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती होने तक मैंने उन्हें कभी गंभीर रूप से बीमार या अस्पताल में नहीं देखा था। वे उन नेताओं में थे जिन्हें देखकर लगता था कि समय भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

रायपुर के बाहरी इलाके लभांडी में स्थित उनका विशाल निवास हमेशा समर्थकों से भरा रहता था। चाहे वे 10 जनपथ की कृपा में हों या उससे बाहर, उनके दरबार में लोगों का आना-जाना कभी नहीं रुका। दोस्ती निभाना उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी। यही कारण था कि उन्होंने सोनिया गांधी के खिलाफ शरद पवार का साथ दिया, भले ही इसके कारण उन्हें कांग्रेस छोडऩी पड़ी।

राजनीति के अलावा भी उनका एक अलग व्यक्तित्व था।

वे अपने स्वास्थ्य को लेकर बेहद सजग रहते थे। अक्सर गर्व से कहते थे कि उनकी कमर कभी 32 इंच से ज्यादा नहीं हुई। सुबह योग, फिर तैराकी और उसके बाद ताजे जूस से भरा एक बड़ा जग उनका रोज का कार्यक्रम था।

लेकिन इस अनुशासन के बीच उनकी एक कमजोरी भी थी-समोसा।

उन्हें समोसे बेहद पसंद थे। उससे भी ज्यादा रोचक था उन्हें खाने का उनका तरीका। वे समोसे को चाय में डुबोकर खाते थे। पहली बार यह देखकर मैं हैरान रह गया था। कोलकाता में जीवन का बड़ा हिस्सा बिताने के बावजूद मैंने समोसा खाने का ऐसा अंदाज पहले कभी नहीं देखा था।

वे हँसते हुए कहते, ‘एक बार करके देखो, स्वाद की दुनिया बदल जाएगी।’

संगीत उनके जीवन का दूसरा बड़ा प्रेम था। जीवन के अंतिम दिनों तक वे संगीत सुनते रहे। हालांकि एक बात का उन्हें हमेशा अफसोस रहा। उन्हें लगता था कि इतिहास ने किशोर कुमार के गीतों पर लगे प्रतिबंध का दोष गलत तरीके से उनके सिर मढ़ दिया।

आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने किशोर कुमार से कांग्रेस की एक रैली में गाने का अनुरोध किया था। किशोर कुमार ने मना कर दिया। इसके बाद उनके गीत आकाशवाणी और दूरदर्शन से गायब हो गए।

विद्या चरण शुक्ल हमेशा इस निर्णय में अपनी भूमिका से इंकार करते रहे।

वे कहते थे, ‘यह आकाशवाणी का फैसला था। न संजय गांधी ने मुझसे कहा था और न मैंने कोई आदेश दिया था।’

फिर मुस्कराकर जोड़ते थे, ‘मैं कभी किशोर कुमार से मिला नहीं, लेकिन उनके गीत आज भी सुनता हूं।’

आपातकाल को लेकर उनकी आलोचना करने वालों की भी कमी नहीं थी।

2004 में प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण रायपुर आए थे। उन्होंने मुझसे कहा था कि आपातकाल के दौरान विद्या चरण शुक्ल संजय गांधी के सबसे प्रभावशाली सहयोगियों में थे। लक्ष्मण का आरोप था कि उनके कार्टूनों को लेकर उन्हें दिल्ली बुलाया जाता था और घंटों इंतजार कराया जाता था।

विद्या चरण शुक्ल इन आरोपों को सिरे से खारिज करते थे।

वे कहते थे, ‘मैं केवल यह सुनिश्चित करता था कि सरकार के खिलाफ नकारात्मक प्रचार न हो।’

सही कौन था, यह इतिहास तय करेगा, लेकिन इतना तय है कि आपातकाल की कहानी विद्या चरण शुक्ल के बिना अधूरी है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि वे वन्यजीवों के भी बड़े प्रेमी थे। नागपुर के मॉरिस कॉलेज से स्नातक करने के बाद उन्होंने ऑल्विन कूपर प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी शुरू की थी, जो मध्य भारत के जंगलों में वन्यजीव सफारी और फोटोग्राफी अभियानों का संचालन करती थी। खनन व्यवसाय में भी उनकी रुचि थी।

लेकिन उनकी असली पहचान राजनीति ही रही।

उन्होंने एक बार बताया था कि उनके पिता पंडित रविशंकर शुक्ल, जो अविभाजित मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे, ने अपने दोनों पुत्रों श्यामा चरण शुक्ल और विद्या चरण शुक्ल को बुलाकर पूछा था कि कौन किस स्तर की राजनीति करेगा। जब बड़े भाई श्यामा चरण शुक्ल ने प्रदेश राजनीति चुनी, तब विद्या चरण शुक्ल ने राष्ट्रीय राजनीति का रास्ता अपनाया।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहते हुए उन्होंने रायपुर को दूरदर्शन केंद्र दिलाया। उस समय यह देश का पांचवां दूरदर्शन केंद्र था। एक छोटे शहर के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में मैंने उन्हें बहुत कम बार गुस्से में देखा। लेकिन नवंबर 2000 उनमें से एक था।

छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हो चुका था। विद्या चरण शुक्ल को विश्वास था कि वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनेंगे। उन्होंने पूरी राजनीतिक रणनीति तैयार कर ली थी और बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन भी उनके साथ था।

लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने अजित जोगी को चुन लिया।

लभांडी स्थित उनके निवास पर उस दिन का माहौल आज भी याद है। दिग्विजय सिंह, गुलाम नबी आजाद और प्रभा राव उन्हें मनाने पहुंचे थे। समर्थकों का गुस्सा फूट पड़ा और धक्का-मुक्की में दिग्विजय सिंह की शर्ट तक फट गई। बाद में विद्या चरण शुक्ल को इस घटना के लिए माफी मांगनी पड़ी।

अजित जोगी को लेकर उनकी नाराजगी कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

वे अक्सर कहते थे, ‘केक किसी बाहरी व्यक्ति को मिल गया।’

उनकी तीन बेटियां थीं, लेकिन कोई पुत्र नहीं था। उन्होंने अपने भतीजे अमितेश शुक्ल को राजनीति में आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन चीजें वैसी नहीं हो सकीं जैसी वे चाहते थे।

वे अपनी निजता को लेकर बेहद सजग थे। रायपुर स्थित उनके घर के सामने बनने वाले एक पांच सितारा होटल को उन्होंने पांचवीं मंजिल की अनुमति नहीं मिलने दी, क्योंकि वहां से उनके स्विमिंग पूल का सीधा दृश्य दिखाई देता।

16 अगस्त 2002 की एक घटना मैं कभी नहीं भूल सकता।

मैं विवाह के लिए रायपुर आया हुआ था। विद्या चरण शुक्ल उस समय अमेरिका यात्रा पर थे। लेकिन उन्होंने अपनी यात्रा बीच में छोड़ दी और विवाह में शामिल होने के लिए लौट आए। यह उनके स्नेह का ऐसा प्रमाण था जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

 

11 जून 2013 को जब मेदांता अस्पताल से उनके निधन की खबर आई, मेरी नजर उस स्वारोवस्की मोर पर पड़ी जो उन्होंने विवाह उपहार के रूप में दिया था। वह अचानक एक सजावटी वस्तु से बढक़र स्मृतियों का प्रतीक बन गया।

झीरम घाटी में माओवादियों द्वारा चलाई गई गोलियों ने अंतत: उस नेता की जीवन यात्रा समाप्त कर दी, जो मानता था कि उसके भीतर अभी एक आखिरी राजनीतिक लड़ाई बाकी है। वे छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार को चुनौती देने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था।

हमारी आखिरी मुलाकातों में से एक, उनकी मृत्यु से लगभग तीन महीने पहले हुई थी।

उन्होंने मुझसे कहा था, ‘मैं अपनी आत्मकथा लिखना चाहता हूं।’

वे संजय गांधी के दौर से लेकर वर्तमान कांग्रेस राजनीति तक सब कुछ लिखना चाहते थे। वह किताब भारतीय राजनीति का एक अनमोल दस्तावेज होती।

लेकिन वह किताब कभी नहीं लिखी गई।

उनके साथ भारतीय राजनीति की एक पूरी चलती-फिरती लाइब्रेरी चली गई। दूसरी लोकसभा से लेकर इंदिरा गांधी, आपातकाल, कांग्रेस का उत्थान-पतन, छत्तीसगढ़ का निर्माण और आधुनिक भारतीय राजनीति के अनेक अध्याय उनकी स्मृतियों में सुरक्षित थे।

विद्या चरण शुक्ल पूर्ण नहीं थे। शायद कोई भी ऐसा राजनेता नहीं हो सकता जो आधी सदी तक सार्वजनिक जीवन में बना रहे। उनके प्रशंसक भी थे, आलोचक भी। लेकिन एक बात निर्विवाद है—उन्होंने भारतीय राजनीति पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।

तेरह साल बाद मुझे उनकी सबसे ज्यादा याद उनके पदों, मंत्रालयों या चुनावी जीतों की नहीं आती।

मुझे उनकी कहानियां याद आती हैं।

और वे कहानियां सुनाने का हुनर शायद सिर्फ विद्या भैया के पास था।

शांति से विश्राम कीजिए, विद्या भैया।


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