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‘उजाले अपनी यादों के...’, उर्दू शायरी को महफिलों से निकालकर अवाम तक पहुँचाने वाले बशीर बद्र नहीं रहे
29-May-2026 10:37 PM
‘उजाले अपनी यादों के...’, उर्दू शायरी को महफिलों से निकालकर अवाम तक पहुँचाने वाले बशीर बद्र नहीं रहे

-विष्णुकांत तिवारी

1971 में भारत पाकिस्तान समझौता (शिमला समझौता) हो रहा था। इसी दौरान जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी को एक शेर अर्ज किया।

‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों।’

यह सुनकर इंदिरा गांधी ने कहा था कि हमारा शेर हमीं को अर्ज कर रहे हैं।

यह कहानी सुनाते हुए डॉ। अंजुम बाराबंकवी भावुक हो उठे।

वे भोपाल में मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र के घर पहुंचे थे। बशीर बद्र का गुरुवार को भोपाल में निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे।

परिवार के मुताबिक़, उन्होंने दोपहर करीब 12 बजे अंतिम सांस ली।

बीबीसी से बात करते हुए उनकी पत्नी राहत बद्र ने निधन की पुष्टि की।

बशीर बद्र की दो शादियां हुई। उनकी पहली पत्नी से उनके दो बेटे और एक बेटी हैं। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने दूसरी शादी डॉक्टर राहत बद्र से की और उनके एक बेटे हुए तैय्यब बद्र।

तैय्यब बद्र के मुताबिक, ‘बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया से जूझ रहे थे और पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी। उन्हें लोगों को पहचानने में भी दिक्कत हो रही थी।’

उर्दू शायरी को आसान और बोलचाल की भाषा में नई पहचान देने वाले बशीर बद्र उन शायरों में रहे, जिनके शेर साहित्यिक महफिलों से निकलकर आम लोगों की जबान तक पहुंचे।

उनकी गज़़लों में मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों, बिछडऩे का गम और रोज़मर्रा की जि़ंदगी के अनुभव दिखाई देते थे। उनके कई शेर आज भी मुशायरों, सोशल मीडिया पोस्ट, राजनीतिक भाषणों और आम बातचीत में अक्सर सुनाई देते हैं।

उनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर लोग लगातार उनके शेर साझा कर रहे हैं। उनमें से एक शेर बार बार याद किया जा रहा है, जो उनके घर के बाहर भी तख़्ती में लिखा हुआ है-

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

न जाने किस गली में जि़ंदगी की शाम हो जाए।

‘डिमेंशिया का पता चला तो महफि़लों में जाना छोड़ दिया’

पिछले कई सालों से डिमेंशिया से जूझ रहे बशीर बद्र को जानने वाले लोग कहते हैं कि यह विडंबना ही थी कि करोड़ों लोगों को अपने शेर याद करा देने वाला शायर धीरे धीरे अपनी याददाश्त खोता चला गया।

उनके बेटे कहते हैं, ‘बशीर साहब को जब ये पता चला था कि उन्हें डिमेंशिया हो गया है तो उन्होंने मुशायरों में शरीक न होने का फैसला लिया। उन्होंने कहा था कि वो एक शोमैन हैं और वो चाहते हैं कि दुनिया उसी बशीर बद्र को याद रखे जिसकी पकड़ हर लफ्ज़़ पर बहुत मजबूत थी।’

मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी की मौजूदा निदेशक डॉ। नुसरत मेहदी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ‘उन्होंने मुश्किल शायरी को आसान अल्फाज़ में कहने का हुनर हासिल किया था। यही वजह है कि हिन्दी और उर्दू, दोनों भाषा के लोग उन्हें पसंद करते थे।’

डॉ. मेहदी ने बताया कि वह मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी में उनके साथ काम कर चुकी हैं। बशीर बद्र कभी इसी अकादमी के अध्यक्ष भी रहे थे।

बशीर बद्र ने शायरी के साथ साथ आलोचना और अकादमिक लेखन में भी महत्वपूर्ण काम किया। उनकी किताबों में ‘इकाई’, ‘इमेज’, ‘आमद’, ‘आहट’, ‘आस’ और ‘कुल्लियाते बशीर बद’ शामिल हैं।

वहीं ‘आजादी के बाद उर्दू गज़़ल का तनक़ीदी मुताला’ और‘बीसवीं सदी में गजल’ जैसी किताबों को उर्दू साहित्य में महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

पुरस्कार और सम्मान

अपने लंबे साहित्यिक जीवन में उन्हें पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार समेत कई सम्मान मिले। उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी और बिहार उर्दू अकादमी ने भी सम्मानित किया था।

साल 1980 में न्यूयॉर्क में उन्हें ‘पोएट ऑफ द ईयर’ चुना गया था। बशीर बद्र के नाम 18 हजार से अधिक अशआर दर्ज बताए जाते हैं।

डा. मेहदी के मुताबिक़, बशीर बद्र महिलाओं का बहुत सम्मान करते थे, ‘जब भी मैं उनके कमरे में जाती थी तो वो हमेशा खड़े हो जाते थे। वो कहते थे कि औरतों का सम्मान करना चाहिए।’

उन्होंने बताया कि दिसंबर में जब वह उनसे मिलने गई थीं, तब वह किसी को पहचान नहीं पा रहे थे।

उन्होंने कहा, ‘लेकिन कभी कभी लोग उनके सामने उनके शेर पढ़ते थे तो वो आगे की लाइन पूरी कर देते थे। उस वक़्त लगता था कि शायद वो ठीक हो जाएंगे।’

वह कहती हैं कि एक समय ऐसा था जब उनके बिना बड़े मुशायरे अधूरे माने जाते थे, ‘उन्हें उस हालत में देखना बहुत तकलीफ़ देने वाला था।’

ज़ाहिद हसन, उर्दू के जानेमाने शायर जिन्हें वसीम बरेलवी के नाम से जाता है उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ‘हमारा बहुत लंबा साथ रहा। बहुत कम लोगों का इतना गहरा साथ होता है। हम मुशायरों की दुनिया में साथ रहे। उनका जाना उर्दू शायरी के लिए और मेरे लिए बहुत बड़ी क्षति है।’

वसीम बरेलवी कहते हैं कि बशीर बद्र की शायरी, सुनने वाले और पढऩे वाले दोनों पर असर छोड़ती थी, ‘अगर वो स्वस्थ रहते तो दुनिया को उनसे और बहुत कुछ मिलता।’

‘पढऩे गए तो पता चला कि उनकी शायरी सिलेबस में हैं’

बशीर बद्र का जन्म 1935 में हुआ था। प्रमाणपत्रों में जन्म कानपुर में होना दर्ज है लेकिन परिजन बताते हैं कि बशीर बद्र का जन्म उत्तर प्रेश के मौजूदा आंबेडकर नगर जिले के बुकियां गांव में हुआ था।

उन्होंने 1969 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की।

बाद में उन्होंने ‘आजादी के बाद उर्दू गजल का तनक़ीदी मुताला’ विषय पर पीएचडी भी की, जिसे आज भी कई जगह पढ़ाया जाता है।

तैय्यब बद्र याद करते हुए कहते हैं, ‘अब्बा जब अलीगढ़ में पढऩे गए थे तो उन्हें वहां जाकर पता चला कि कॉलेज के सिलेबस में उनकी लिखी हुई शायरियां, गजलें पढ़ाई जा रहीं थीं। अब्बा को बहुत फक्र था इस बात पर।’

उन पर पीएचडी करने वाले डॉ। अंजुम बाराबंकवी कहते हैं कि बशीर बद्र उन शायरों में थे जिन्होंने नई उर्दू गज़़ल को नई दिशा दी।

उन्होंने बीबीसी से कहा, ‘उन्होंने समाज के दर्द को अपनी शायरी में जगह दी। भारत और पाकिस्तान के लगभग सभी बड़े गायकों ने उनकी गज़़लें गाईं।’

डॉ.अंजुम बाराबंकवी के मुताबिक़, ‘बशीर बद्र की लोकप्रियता सिर्फ साहित्यिक दुनिया तक सीमित नहीं थी। ‘मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के चुनाव प्रचार में बशीर साहब का एक शेर बहुत इस्तेमाल हुआ था। वह शेर था-

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।’

बशीर बद्र ने 1974 में मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में बतौर लेक्चरर काम शुरू किया और 80 के दशक के अंत तक वहां पढ़ाया।

पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित

साहित्य जगत में 1970 और 1980 के दशक को उनके रचनात्मक जीवन का सबसे अहम दौर माना जाता है। इसी दौरान उनकी शायरी ने देश और विदेश में पहचान बनाई।

उनके करीबी दोस्त और शायर मलिकज़ादा जावेद के मुताबिक़ बशीर बद्र ने उर्दू गजल को पारंपरिक इश्किया दायरे से बाहर निकालकर समाज और आम इंसान के अनुभवों से जोड़ा।

जावेद कहते हैं, ‘उन्होंने आधुनिक उर्दू शायरी में बदलाव किया। उनकी शायरी में समकालीन समाज दिखाई देता था।’

वह कहते हैं कि बशीर बद्र सिफऱ् शायरी ही नहीं, बल्कि मुशायरों की संस्कृति में भी बदलाव लेकर आए।

उनके अनुसार, ‘उस दौर में मुशायरों में शेरवानी, टोपी और कुर्ता पायजामा आम था। लेकिन वो जैकेट और टाई पहनकर मंच पर जाते थे।’

जावेद के मुताबिक, बशीर बद्र अपनी हाजिरज़वाबी और दोस्ती निभाने के लिए भी जाने जाते थे। वह बताते हैं कि एक बार उन्होंने एक बड़े भुगतान वाले मुशायरे को छोडकऱ उनकी शादी में शामिल होना पसंद किया था।

भोपाल के सामाजिक कार्यकर्ता और उनके प्रशंसक सैयद आबिद हुसैन कहते हैं कि बशीर बद्र की सबसे बड़ी ताक़त उनकी भाषा थी।

उन्होंने बीबीसी से कहा, ‘उनके शेर आम ज़बान में होते थे और लोग उन्हें आसानी से समझ लेते थे। ऐसे शायर बहुत कम होते हैं।’

भले ही बशीर बद्र को पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार समेत कई सम्मानों से नवाजा गया था, लेकिन उन्हें जानने वाले लोग कहते हैं कि उनकी सबसे बड़ी पहचान उनके शेर रहे, जिन्हें लोग अपनी जिंदगी के अलग अलग मौकों पर याद करते रहे।

उनके निधन के बाद शाम में अंतिम संस्कार के दौरान भी उनकी शायरी लोगों की बातचीत में पुरजोर शामिल रही। (bbc.com/hindi)


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