विचार / लेख
-आशीष कान्ति घोष
वैचारिक संघर्ष के वो कठिन दिन : आशीष कान्ति घोष
भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के इतिहास में कई ऐसे दौर आए हैं जिन्हें उनके ‘कठिन दिन’ कहा जा सकता है। इन कठिन परिस्थितियों ने ही इन दलों को वैचारिक और संगठनात्मक रूप से मजबूती दी। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित इस दल का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस के विकल्प के रूप में एक राष्ट्रवादी विचारधारा को खड़ा करना था। कांग्रेस के प्रभुत्व के बीच एक नया विकल्प खड़ा करना बेहद चुनौतीपूर्ण था।
इसका मुख्य संकल्प और उद्देश्य राष्ट्रवादी विचारधारा, सांस्कृतिक एकता और एक सशक्त भारत का निर्माण करना था।जनसंघ का संकल्प मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित था।
अखंड भारत- जनसंघ का सबसे प्रमुख संकल्प ‘अखंड भारत’ था। एक देश, एक विधान, एक निशान, एक प्रधान:कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए यह जनसंघ का सबसे बड़ा नारा और संकल्प था।
राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकता- यह भारतीय संस्कृति और सभ्यतागत चेतना पर आधारित राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना चाहता था।एकात्म मानववाद: पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित ‘एकात्म मानववाद’ को अपना मूल दर्शन माना, जो सर्वांगीण विकास पर जोर देता है ।
अंत्योदय- समाज के अंतिम व्यक्ति के विकास का संकल्प।
धारा 370 का विरोध-कश्मीर में अलग विधान का कड़ा विरोध और राष्ट्र की एकता के लिए 370 को हटाने का संकल्प। डॉ. मुखर्जी ने इन आदर्शों की प्राप्ति के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, प्रमुख कठिन समय और संघर्ष के चरण निम्नलिखित हैं:-
भारतीय जनसंघ के शुरुआती संघर्ष सीमित चुनावी सफलता- शुरुआती दौर (1951-1952)
स्थापना- 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में हुई।
पहला चुनाव (1951-52): जनसंघ ने अपना पहला आम चुनाव ‘दीपक’ चुनाव चिह्न के साथ लड़ा।
परिणाम- पार्टी को केवल 3 सीटें और लगभग 3.06 फीसदी वोट मिले। डॉ. मुखर्जी खुद कलकत्ता दक्षिण-पूर्व सीट से निर्वाचित हुए थे
डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन (1953)- पार्टी के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन ने पार्टी को नेतृत्व के गहरे संकट में डाल दिया था। उनके बाद दीनदयाल उपाध्याय ने महासचिव के रूप में संगठन को संभाला।
विस्तार और उदय (1957-1971)
1950 और 60 के दशक में जनसंघ ने उत्तर भारत के राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान) में अपनी पैठ बढ़ानी शुरू की।
1957 का चुनाव- सीटों की संख्या बढक़र 4 हुई। इसी चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार संसद पहुँचे।
1962 का चुनाव- पार्टी ने 14 सीटें जीतीं।
1967 का चुनाव- यह जनसंघ के लिए एक बड़ा मोड़ था, जहाँ पार्टी ने 35 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई।
दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु (1968)- पार्टी के प्रमुख विचारक और तत्कालीन अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मुगलसराय स्टेशन पर रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा आघात थी।
1971 का चुनाव- इंदिरा गांधी की ‘गरीबी हटाओ’ लहर के बावजूद जनसंघ 22 सीटें बचाने में सफल रहा।
आपातकाल और जनता पार्टी में विलय
इमरजेंसी का दौर (1975-77)- आपातकाल के दौरान जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सहित लगभग सभी बड़े नेता जेल में डाल दिए गए थे। पार्टी पर कड़ा प्रतिबंध था और कार्यकर्ता भूमिगत होकर संघर्ष कर रहे थे।
आपातकाल (Emergency) के बाद, जनसंघ ने कांग्रेस के विरोध में अन्य दलों के साथ मिलकर जनता पार्टी का गठन किया।
सरकार में भागीदारी-1977 के चुनावों में जनता पार्टी की जीत हुई और अटल बिहारी वाजपेयी (विदेश मंत्री) व लालकृष्ण आडवाणी (सूचना एवं प्रसारण मंत्री) जैसे नेता सरकार का हिस्सा बने।
दोहरी सदस्यता का विवाद- 1977 में जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ, लेकिन आरएसएस के साथ ‘दोहरी सदस्यता’ के मुद्दे पर विवाद गहरा गया। इसी विवाद के कारण जनता पार्टी टूट गई और नेताओं को वहां से अलग होना पड़ा।
1980 - भाजपा की स्थापना- दोहरी सदस्यता के विवाद के कारण पूर्व जनसंघ के सदस्य जनता पार्टी से अलग हो गए और 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नींव रखी गई, जिसे जनसंघ का ही आधुनिक स्वरूप माना जाता है।
भाजपा के शुरुआती कठिन वर्ष सिर्फ दो सीटें (1984)- 6 अप्रैल 1980 को भाजपा के गठन के बाद 1984 के लोकसभा चुनावों में पार्टी अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई, जब वह केवल 2 सीटें ही जीत सकी। खुद अटल बिहारी वाजपेयी ग्वालियर से चुनाव हार गए थे।
वाजपेयी युग (1996-2004)- 1996 में सबसे बड़ी पार्टी बनी और वाजपेयी जी के नेतृत्व में पहली बार केंद्र में 13 दिन, फिर 13 महीने और बाद में 5 साल की सरकार चली।
दशक का संघर्ष (2004-2014)- ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे के बावजूद 2004 में हार के बाद भाजपा 10 सालों तक सत्ता से बाहर रही। इस दौरान पार्टी को अपनी रणनीति और नेतृत्व ममोदी युग (2014-वर्तमान)- 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत (282 सीटें) हासिल की। 2019 और 2024 (हृष्ठ्र के साथ) में यह जीत और अधिक मजबूत हुई।
सफलता के मुख्य कारण-बूथ प्रबंधन- भाजपा की सफलता के पीछे जमीनी स्तर (बूथ मैनेजमेंट) पर कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत है।विचारधारा: हिंदुत्व और राष्ट्रवाद (धारा 370, राम मंदिर, समान नागरिक संहिता) पर अडिगता।
नेतृत्व- नरेंद्र मोदी का करिश्माई नेतृत्व, जो देशव्यापी जन अपील का दावा करता है
विस्तार- राज्यों और स्थानीय निकायों में भाजपा ने लगातार अपनी उपस्थिति बढ़ाई है।यह इतिहास यह दर्शाता है कि विचारधारा और बूथ-स्तर के संगठन के मेल ने भाजपा को एक छोटी पार्टी से भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्ति में बदल दिया है
इन चुनौतियों के बावजूद, भाजपा ने अपनी विचारधारा (एकात्म मानववाद) और संगठन पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे वह आज संसद में बहुमत वाली दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन पाई है।
भाजपा की जीत और डॉ. मुखर्जी की विरासत भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी संभावित जीत को डॉ. मुखर्जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में देखती है:-
वैचारिक प्रतिष्ठा- बंगाल डॉ. मुखर्जी की जन्मभूमि है, इसलिए यहाँ सत्ता प्राप्त करना भाजपा के लिए केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि एक ‘वैचारिक प्रतिष्ठा’ का विषय है।
धारा 370 का उन्मूलन- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह अक्सर उल्लेख करते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा धारा 370 को हटाना डॉ. मुखर्जी के दशकों पुराने संकल्प को पूरा करना है।
2026 के चुनावों का संदर्भ: हालिया चुनावी रैलियों में भाजपा नेताओं ने दावा किया है कि राज्य में भाजपा की सरकार बनने पर डॉ. मुखर्जी के बंगाल की समृद्धि और शरणार्थी समस्याओं के समाधान के सपनों को साकार किया जाएगा।


