विचार / लेख

संग्रहालय में तब्दील होते पुस्तकालय..!
27-Apr-2026 8:22 PM
संग्रहालय में तब्दील होते पुस्तकालय..!

-देवेन्द्र नाथ शर्मा

छत्तीसगढ़ के एक सरकारी महाविद्यालय में विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर अपने ही महाविद्यालय के विद्यार्थियों को महाविद्यालय के ही पुस्तकालय का भ्रमण करवाया गया। विद्यार्थियों को रैक में रखी किताबों को दिखलाया गया, कुछ विद्यार्थियों ने पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं को अपने हाथों में लेकर देखा, पलटाया।

यहां कुछ सवाल खड़े होते हैं; एक तो यह कि विद्यार्थियों में न पुस्तकों के प्रति रुचि है और न ही पुस्तकालय के प्रति। साल भर के सत्र के बीत जाने के बाद में विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर यदि वे पुस्तकालय का भ्रमण कर रहे हैं तो यह सोचा जा सकता है कि इसके पहले पुस्तकालय का वे कितना उपयोग वे कर रहे या कर पा रहे होंगे? दूसरा, महाविद्यालयों में अब पुस्तकालय में बैठकर पढऩे की संस्कृति भी खत्म-सी होती जा रही है। न पाठक आते हैं और न ही पाठकों के लिए माकूल व्यवस्थाएं पुस्तकालय में होती है। निजी महाविद्यालयों में स्थिति थोड़ी बेहतर होती है किंतु गिनती के महाविद्यालय को छोडक़र सभी सरकारी महाविद्यालयों में पुस्तकालय अलमारी और रैंक्स में ही बंद या नजरबंद है। अधिकतर महाविद्यालयों में लाइब्रेरियन ही नहीं है, प्राध्यापक को अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। बच्चों के लिए बैठने की व्यवस्था का अभाव और पुस्तकालय से पुस्तकों का नियमित नियतकालिक लेन-देन का खंडित तरीके से होना, पुस्तकालय के प्रति विद्यार्थियों में अरुचि उत्पन्न करता है। दो दशकों से परीक्षा की तैयारी हेतु विद्यार्थियों की कुंजियों पर बढ़ी निर्भरता उन्हें पुस्तकालय से दूर करती हैं। महाविद्यालयीन पुस्तकालयों में नई किताबों व शोध पत्रिकाओं का हर वर्ष होने वाला नियमित क्रय लगभग बंद है। ऐसी स्थिति में पुस्तकालय हेतु नियमित आबंटन न होने से समृद्ध पुस्तकालयों वाले पुराने महाविद्यालयों में नई-नई पुस्तकों की खरीद न हो पा रही हैं और शोध व अन्य स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं का प्रदाय अवरुद्ध हो गया है। गत कुछ वर्षों में खुले नए सरकारी महाविद्यालयों में तो पुस्तकालय एक-दो अलमारी में ही सीमित है। न बैठने की जगह और न ही पुस्तकों के पढऩे की उपयुक्त व्यवस्था। ऐसी स्थिति में लगता है कि जहां अच्छे पुस्तकालय रहे हैं,  उन महाविद्यालय के पुस्तकालय अब एक संग्रहालय में तब्दील होते चले जा रहे हैं। जहां विद्यार्थियों को लाकर बताया जा सकेगा कि ऐसे पुस्तकालय हुआ करते थे जिसमें पुस्तक रखी जाती थी और विद्यार्थी बैठ कर पढऩे आते थे और सप्ताह-दो सप्ताह के लिये पुस्तक अपने घर भी ले जा सकते थे।

एक समस्या यह भी है कि महाविद्यालय में नियमित विद्यार्थी अब अपनी उपस्थिति के प्रति सचेत नहीं है । महाविद्यालय जब आना ही नहीं है, न प्रयोगशाला में प्रयोग करना है और न ही पुस्तकालय में पुस्तकों के अध्ययन की सुविधा का लाभ उठाना चाहते है। इसके उलट यह भी बात सच है कि महाविद्यालय में पुस्तकालय में पुस्तकों का अभाव है, प्रयोगशालाओं में पाठ्यक्रम के अनुरूप उपकरण, रसायन आदि नहीं है, सक्षम प्राध्यापक कम हैं या नहीं है तो विद्यार्थी महाविद्यालय आकर करेंगे ही क्या?

दूसरी तरफ शहरों में जहां विद्यार्थी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं वहां पुस्तकालय कल्चर का विकास हो रहा है। निजी पुस्तकालय स्थापित हो रहे हैं जहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी जाकर बैठकर पढ़ते हैं, पुस्तक लाते हैं, वापस करते हैं। शासन द्वारा नालंदा जैसे पुस्तकालय भी प्रदेश में शुरू हुए हैं जो बहुत ही लोकप्रिय हो रहे हैं क्योंकि वहां नई-नई पुस्तकों का व पत्र-पत्रिकाएं आदि आसानी से उपलब्ध हैं, बैठ कर घंटों पढऩे की माकूल जगह है।

दरअसल महाविद्यालय में पुस्तकालय और वाचनालय युवाओं में पढऩे की प्रवृत्ति अर्थात ‘रीडिंग हैबिट’ विकसित करने के लिए एक प्रभावी व्यवस्था होती हैं। जिन विद्यार्थियों ने कभी अपने जीवन में पुस्तकालय का भरपूर इस्तेमाल किया है, वे अपने जीवन में ज्ञान और विचार से ज्यादा समृद्ध होते रहे हैं। लेकिन अब महाविद्यालयों में ऐसी व्यवस्था कमजोर हो है है। इंटरनेट के युग में तो अब पुस्तक और पुस्तकालय की प्रासंगिकता और भी कम होती चली जा रही है द्य हालाँकि यह सब जानते हैं कि पुस्तकें इंटरनेट पर परोसी गई जानकारियों की तुलना में ज्यादा प्रामाणिक, ज्ञान, बोध व समझ वर्धक होती हैं।


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