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ईरान का अस्तित्व, और ट्रंप की नई बिसात : एक विस्तृत विश्लेषण
30-Mar-2026 8:59 PM
ईरान का अस्तित्व, और ट्रंप की नई बिसात : एक विस्तृत विश्लेषण

‘शांति’के मुखौटे में आत्मसमर्पण की मांग

डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के साथ ही पश्चिम एशिया की कूटनीति में ‘शांति’ शब्द का इस्तेमाल एक बार फिर तेजी से बढ़ा है। लेकिन वाशिंगटन के गलियारों से जो ‘शांति योजना’ छनकर आ रही है, वह असल में शांति का प्रस्ताव नहीं बल्कि ऐसी मांगों की एक फेहरिस्त है जो ईरान से बिना शर्त आत्मसमर्पण  के बराबर है। यह कोई बराबरी का समझौता नहीं है, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र को पूरी तरह घुटनों पर लाने की एक सोची-समझी रणनीति है।

इस योजना के तहत तेहरान से सिर्फ उसके परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को ही खत्म करने की मांग नहीं की गई है, बल्कि यह उससे उसके रक्षा तंत्र की रीढ़—बैलिस्टिक मिसाइलें और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के नेटवर्क-को भी पूरी तरह ध्वस्त करने को कहता है। एक ऐसे देश के लिए जिसकी वायुसेना दशकों पुरानी हो चुकी है और जो आधुनिक युद्ध के मोर्चे पर टिकने की स्थिति में नहीं है, उसके लिए बैलिस्टिक मिसाइलें ही पारंपरिक प्रतिरोध की आखिरी और सबसे मजबूत ढाल हैं।

रक्षात्मक ढाल और ‘अस्तित्व का संकट’

ईरान की सैन्य स्थिति का बारीकी से अध्ययन करें तो पता चलता है कि वह तकनीकी रूप से अपने पड़ोसियों और अमेरिकी सहयोगियों से बहुत पीछे है। 1970 के दशक के विमानों के सहारे कोई देश अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं कर सकता। ऐसे में ईरान ने पिछले दो दशकों में अपनी पूरी ऊर्जा और संसाधन मिसाइल तकनीक को विकसित करने में लगाए हैं।

जब वाशिंगटन का सबसे करीबी सहयोगी, तेल अवीव (इजऱाइल), सीधे ईरान के सर्वोच्च नेता को निशाना बनाता है, तो यह तेहरान के लिए सिर्फ एक हमला नहीं बल्कि उसके अस्तित्व को मिटाने की सीधी धमकी होती है। ऐसी स्थिति में, किसी भी देश से यह उम्मीद करना कि वह अपनी मिसाइलों के जखीरे को नष्ट कर देगा, कूटनीतिक मूर्खता है। अपनी मिसाइलों को छोडऩे का मतलब है-खुद को पूरी तरह निहत्था करके दुश्मन के रहम-ओ-करम पर छोड़ देना। ट्रंप की यह मांग असल में ईरान को एक ‘सुरक्षित जेल’ में तब्दील करने जैसी है, जहाँ उसके पास विरोध करने की कोई ताकत शेष न रहे।

ईरान की ‘फॉरवर्ड डिफेंस’ रणनीति

ट्रंप की प्रस्तावित शांति योजना की दूसरी सबसे बड़ी और विवादित मांग ईरान के क्षेत्रीय नेटवर्क, जिसे ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ कहा जाता है, को पूरी तरह भंग करने की है। रूज़बेह पारसी के अनुसार, ईरान के लिए ये केवल आतंकवादी या मिलिशिया गुट नहीं हैं, बल्कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा का अनिवार्य हिस्सा हैं। ईरान की सैन्य रणनीति हमेशा से ‘फॉरवर्ड डिफेंस’ की रही है-यानी अपनी सीमाओं से दूर दुश्मन को उलझाए रखना।

हमास, हिजबुल्लाह और हूतियों के साथ ईरान का गठबंधन उसे एक ऐसी ‘अदृश्य शक्ति’ देता है, जिसका मुकाबला पारंपरिक सेनाएं आसानी से नहीं कर सकतीं। ट्रंप चाहते हैं कि ईरान इन ताकतों से अपना नाता तोड़ ले, लेकिन तेहरान के लिए इसका मतलब होगा अपनी ‘रणनीतिक गहराई’ को खो देना। पारसी तर्क देते हैं कि किसी भी संप्रभु देश से यह उम्मीद करना कि वह अपने दशकों पुराने सुरक्षा नेटवर्क को बिना किसी ठोस सुरक्षा गारंटी के त्याग देगा, हकीकत से परे है। यह मांग ईरान को मध्य-पूर्व के नक्शे पर पूरी तरह अलग-थलग करने की एक साजिश है, जिसे तेहरान अपनी ‘आत्महत्या’ की तरह देखता है।

 

आर्थिक युद्ध का कोहराम

ट्रंप प्रशासन की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति का पहला चरण हम देख चुके हैं, जिसने ईरान की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया था। लेकिन पारसी का विश्लेषण बताता है कि इस नीति ने वाशिंगटन के मनमाफिक नतीजे नहीं दिए। इसके विपरीत, भारी आर्थिक पाबंदियों ने ईरान के भीतर ‘कट्टरपंथियों’ को और मज़बूत किया है। जब आम जनता दाने-दाने को तरसती है और मध्यवर्ग गरीबी की रेखा के नीचे धकेला जाता है, तो सुधारवादी ताकतों की आवाज़ दब जाती है।

आज ईरान एक ‘पॉलीक्राइसिस’ यानी कई संकटों के संगम पर खड़ा है। एक तरफ महंगाई और गिरती मुद्रा है, तो दूसरी तरफ घरेलू राजनीतिक असंतोष। लेकिन पारसी का मानना है कि ट्रंप की नई पाबंदियां ईरान को बातचीत की मेज पर लाने के बजाय उसे और अधिक जिद्दी बना सकती हैं। जब किसी देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तबाह करने की कोशिश की जाती है, तो वहां की सत्ता का एकमात्र उद्देश्य ‘शासन का अस्तित्व’ बन जाता है। ऐसी स्थिति में कूटनीति के लिए कोई जगह नहीं बचती, और देश ‘सेल्फ-डिफेंस’ मोड में आकर और अधिक खतरनाक हथियार विकसित करने की दिशा में बढ़ जाता है।

‘अस्तित्व की जंग’

लेख का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अमेरिका और इजऱाइल (तेल अवीव) के बढ़ते सैन्य तालमेल पर रोशनी डालता है। पारसी लिखते हैं कि इजऱाइल द्वारा ईरान के भीतर किए गए लक्षित हमले और सर्वोच्च नेतृत्व को दी गई चुनौतियां यह साफ़ करती हैं कि अब लड़ाई सिर्फ ‘परमाणु कार्यक्रम’ तक सीमित नहीं है। यह लड़ाई अब ईरान की व्यवस्था को ही जड़ से उखाडऩे की है।

ट्रंप की शांति योजना असल में इजराइल के सुरक्षा हितों का ही विस्तार है। वाशिंगटन चाहता है कि ईरान अपनी उन सभी ताकतों को छोड़ दे जो इजराइल के लिए खतरा बन सकती हैं। लेकिन विडंबना यह है कि ईरान के लिए वही ताकतें इजऱाइल के संभावित हमले से बचने का एकमात्र रास्ता हैं। पारसी का निष्कर्ष यह है कि कूटनीति तब सफल होती है जब दोनों पक्षों के पास खोने के लिए कुछ हो और पाने के लिए भी। लेकिन यहाँ ट्रंप की शर्तें ऐसी हैं कि ईरान के पास पाने के लिए केवल ‘अस्तित्व की अनिश्चितता’ है और खोने के लिए उसकी ‘संपूर्ण सुरक्षा’।

2026 का युद्ध और कूटनीति

मार्च 2026 के इन दिनों में जब हम यह लेख पढ़ रहे हैं, पश्चिम एशिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ से वापसी का रास्ता धुंधला है। रूजबेह पारसी का विश्लेषण इस बात की ओर इशारा करता है कि जून 2025 में इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों (12-दिवसीय युद्ध) ने पूरे समीकरण बदल दिए हैं। अब ट्रंप की 15-सूत्रीय योजना महज एक समझौता नहीं, बल्कि ईरान के लिए ‘मौत की सजा’ जैसी चेतावनी बन चुकी है।

पारसी लिखते हैं कि जब वॉशिंगटन ‘शांति’की बात करता है, तो उसका अर्थ ‘पराजित की शांति’ होता है। ईरान की अर्थव्यवस्था पहले ही ध्वस्त हो चुकी है; ईरानी रियाल अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर (1.42 मिलियन प्रति डॉलर) पर पहुँच गया है, जिससे देश के भीतर विद्रोह और प्रदर्शनों की आग भडक़ उठी है। ट्रंप का मानना है कि यह आर्थिक बदहाली ईरान को घुटने टेकने पर मजबूर कर देगी। लेकिन पारसी चेतावनी देते हैं कि एक घायल और कोने में धकेला गया राष्ट्र ‘रचनात्मक कूटनीति’ नहीं, बल्कि ‘विनाशकारी जवाबी कार्रवाई’ चुनता है। डिएगो गार्सिया पर हालिया मिसाइल हमले इसी हताशा और प्रतिरोध का प्रमाण हैं।

यूरोप की खामोशी और...

लेख का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर यूरोप की भूमिका पर है। पारसी के अनुसार, यूरोप अब केवल एक मूकदर्शक बनकर रह गया है। ट्रंप की ‘यूनिलेटरल’ (एकतरफा) नीतियां और ‘नाटो’ सहयोगियों को किनारे करने की प्रवृत्ति ने वैश्विक व्यवस्था को हिला दिया है। ईरान द्वारा ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को बंद करने की धमकी ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों में कोहराम मचा दिया है।

पारसी का तर्क है कि यदि ईरान को ऊर्जा निर्यात से पूरी तरह रोक दिया गया, तो वह पूरी दुनिया के लिए तेल की आपूर्ति ठप्प करने का जोखिम उठाएगा। ट्रंप की योजना में इस ‘एनर्जी शॉक’ का कोई ठोस समाधान नहीं है। यह कूटनीति की विफलता है कि दुनिया एक ऐसे युद्ध की ओर बढ़ रही है जिसका कोई स्पष्ट ‘एग्जिट रूट’  नहीं है। ट्रंप का यह सोचना कि वे बिना किसी बड़े जमीनी युद्ध के ईरान की व्यवस्था को बदल देंगे, एक खतरनाक भ्रम साबित हो सकता है।

क्या कोई विकल्प शेष है?

लेख के समापन पर रूजबेह पारसी एक गंभीर सवाल छोड़ते हैं। क्या वाशिंगटन वास्तव में शांति चाहता है या वह केवल अपनी शर्तों पर एक नया ‘मध्य-पूर्व’ गढऩा चाहता है? उनके अनुसार, शांति का रास्ता ‘अधिकतम दबाव’ से नहीं, बल्कि ‘अधिकतम कूटनीति’ से होकर गुजरता है। जब तक ईरान की सुरक्षा चिंताओं और उसकी संप्रभुता को मान्यता नहीं दी जाती, तब तक कोई भी कागजी समझौता ज़मीन पर शांति नहीं ला पाएगा।

ट्रंप की यह ‘शांति योजना’ इतिहास के उन दस्तावेज़ों में शामिल हो सकती है जो युद्ध रोकने के लिए नहीं, बल्कि उसे जायज़ ठहराने के लिए लिखे गए थे। यदि ईरान अपनी मिसाइलों और परमाणु क्षमताओं को पूरी तरह खत्म कर देता है, तो वह एक राष्ट्र के रूप में अपनी प्रासंगिकता खो देगा। और यदि वह संघर्ष का रास्ता चुनता है, तो पूरा क्षेत्र एक ऐसी आग में झुलसेगा जिसकी तपिश वाशिंगटन तक पहुँचेगी। पारसी का निष्कर्ष स्पष्ट है-‘असली जीत वह नहीं जिसमें दुश्मन को मिटा दिया जाए, बल्कि वह है जिसमें दुश्मन को साझीदार बनाया जाए।’ लेकिन आज के हालात में ‘साझीदारी’ एक दूर का सपना लगती है और ‘संघर्ष’ ही एकमात्र कड़वी हकीकत।

(रूजबेह पारसी के लेख का अनुवाद और विस्तार : एआई (gemini) के सहयोग से)


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