विचार / लेख
-सुशांत आचार्य
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आबकारी नीति 2026-27 को 01.अप्रैल 2026 से लागू किया जाना है। नए आबकारी नीति के तहत प्लास्टिक बोतलों में शराब की बिक्री होनी शुरू हो जाएगी। यह निर्णय केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय विमर्श का विषय भी है। छत्तीसगढ़ सरकार का निर्णय एक तरफ राज्य के राजस्व को मजबूत करने की कोशिश है, तो वहीं दूसरी तरफ जनस्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की आजीविका जैसे प्रश्न भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। जिनको अनदेखा नहीं किया जा सकता।
सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि इस विषय पर चर्चा का उद्देश्य किसी भी रूप में शराब सेवन का समर्थन या उसे बढ़ावा देना नहीं है। मेरा मानना है कि शराब का सेवन स्वास्थ्य और समाज, दोनों के लिए हानिकारक है। यहां प्रस्तुत विचार केवल एक नीतिगत निर्णय के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण भर हैं।
सरकार का अपना तर्क है। कांच की बोतलों की तुलना में प्लास्टिक सस्ता, हल्का और परिवहन के लिए अधिक सुविधाजनक है। इससे न केवल पैकेजिंग लागत घटेगी, बल्कि दूर-दराज के इलाकों तक शराब की आपूर्ति भी आसान होगी। कांच की बोतलों के टूटने से होने वाले नुकसान में कमी आएगी और सभी तरह से बिक्री बढऩे की संभावना बनेगी। इन सभी का सीधा असर राज्य के राजस्व पर पड़ेगा, क्युकी शराब पहले से ही कई राज्यों के लिए आय का प्रमुख स्रोत है। इस दृष्टि से यह निर्णय व्यावहारिक और आर्थिक रूप से आकर्षक लग सकती है।
हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि देश के कुछ अन्य राज्यों ने स्वास्थ्य और पर्यावरण की चिंता को देखते हुए प्लास्टिक बोतलों में शराब बिक्री पर प्रतिबंध लगाया है। जैसे महाराष्ट्र में प्लास्टिक बोतलों में शराब बिक्री पर रोक लगाई गई थी, वहीँ मध्य प्रदेश में भी न्यायालय के निर्देशों के बाद इस पर सख्ती बरती गई। इन निर्णयों के पीछे प्रमुख कारण यही थे कि प्लास्टिक में शराब रखने से संभावित स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। चूँकि आबकारी नीति राज्य तय करते हैं इसलिए राज्यों के बीच आबकारी नीति में एकरूपता का अभाव है और नीतिगत दृष्टिकोण अलग अलग हैं।
लेकिन किसी भी नीति का मूल्यांकन केवल उसके तात्कालिक आर्थिक लाभों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके दीर्घकालिक प्रभावों को समझना भी उतना ही जरूरी है। प्लास्टिक बोतलों में शराब रखने से रासायनिक तत्वों के घुलने, जिसे ‘लीचिंग’ कहा जाता है, का खतरा बना रहता है। विशेष रूप से अधिक तापमान में यह प्रक्रिया तेज हो जाती है। वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे रसायन शरीर के हार्मोनल संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और लंबे समय में गंभीर बीमारियों, यहां तक कि कैंसर, का कारण बन सकते हैं। पानी के बोतलों को लेकर वैज्ञानिकों ने रिसर्च में यह पाया भी है। इसलिए कह सकते हैं की अल्पकालिक राजस्व लाभ दीर्घकालिक स्वास्थ्य संकट में बदल सकता है।
पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी यह नीति कई सवाल खड़े करती है। भारत पहले से ही प्लास्टिक कचरे की समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक बोतलों का उपयोग इस संकट को और बढ़ा सकता है। खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों में, जहां कचरे का प्रबंधन और रीसाइक्लिंग की व्यवस्था सीमित है, प्लास्टिक का अनियंत्रित फैलाव पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। नदियों, खेतों और सार्वजनिक स्थलों पर प्लास्टिक कचरे का जमाव न केवल पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करेगा, बल्कि मानव जीवन की गुणवत्ता को भी कम करेगा।
इस पूरे परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखा पहलू है, कांच की बोतलों की रीसाइक्लिंग से जुड़े हजारों श्रमिकों की आजीविका। कांच की खाली बोतलों को इक_ा करना, साफ करना और पुन: उपयोग योग्य बनाना एक स्थापित अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। यह काम बड़ी संख्या में काम पढ़े लिखे गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों को रोजगार देता है। अगर प्लास्टिक बोतलों का चलन बढ़ता है, तो कांच की बोतलों की मांग में गिरावट आएगी, जिसका सीधा असर इन मजदूरों की आय पर पड़ेगा।
नीतिगत दृष्टि से यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या राजस्व वृद्धि के लिए ऐसे विकल्पों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो स्वास्थ्य, पर्यावरण और रोजगार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं? क्या यह संभव नहीं कि सरकार कांच की बोतलों के पुन: उपयोग और रीसाइक्लिंग को अधिक संगठित और आधुनिक बनाकर भी समान आर्थिक लाभ प्राप्त करे? इसके साथ ही, प्लास्टिक के उपयोग पर सख्त नियम और प्रभावी कचरा प्रबंधन प्रणाली विकसित करना भी अनिवार्य है।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीति निर्माण का उद्देश्य केवल आर्थिक लाभ अर्जित करना नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करना होता है। यह समय है कि इस मुद्दे पर व्यापक जनसंवाद हो, विशेषज्ञों की राय ली जाए और सभी हितधारकों को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित और दूरदर्शी नीति तैयार की जाए। अन्यथा, प्लास्टिक में शराब बेचने का यह निर्णय कहीं अल्पकालिक लाभ के बदले दीर्घकालिक समस्याओं का कारण न बन जाए।


