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बोकारो स्टील प्लांट का प्रदूषण, कम वजन और समय से पहले जन्मे बच्चों का खतरा
24-Mar-2026 2:39 PM
बोकारो स्टील प्लांट का प्रदूषण, कम वजन और समय से पहले जन्मे बच्चों का खतरा

-सिमरिन सिरूर

भारत में सर्वाधिक कोयला खपत करने वाले उद्योगों में से एक इस्पात उद्योग को कार्बन मुक्त करना कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने पर केंद्रित है। इसका मकसद ग्रीनहाउस गैसों के दुष्प्रभाव को रोकना है। हालांकि, इस्पात बनाने की औद्योगिक प्रक्रियाओं से वायु प्रदूषण भी होता है, जिससे सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर निकलते हैं। ये सभी सेहत पर बुरा असर डालते हैं।

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के एक नए विश्लेषण में झारखंड के बोकारो स्टील प्लांट (BSL) से होने वाले वायु प्रदूषण से जुड़े खुलासों का अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि भले ही BSL मौजूदा नियामक सीमाओं का पालन करता है, फिर भी इससे होने वाले प्रदूषण से हर साल लगभग 273 बच्चों का जन्म कम वजन और 284 बच्चों का जन्म समय से पहले ही हो जाता है।

भारत में स्टील उत्पादन की क्षमता 2035 तक 26 करोड़ और 28 करोड़ मीट्रिक टन के बीच पहुंचने का अनुमान है। ऐसा ऑटोमोटिव, नवीन ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में बढ़ती मांग की वजह से होगा। फिलहाल भारत में इस उद्योग से 10 से 12 फीसदी कार्बन उत्सर्जन होता है। इसलिए, इस सेक्टर को कार्बन मुक्त करना शून्य-उत्सर्जन के लक्ष्य को पाने में सबसे अहम है। अतिरिक्त इस्पात क्षमता में ब्लास्ट फर्नेस और बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस के इस्तेमाल से कार्बन-सघन प्रक्रिया लंबे समय तक बनी रह सकती है।

CREA की रिपोर्ट का सुझाव है कि जब तक इस्पात बनाने में कोयले की जगह नए और व्यवहारिक इनोवेशन उपलब्ध नहीं हो जाते, तब तक बेहतर वायु निगरानी और फिल्ट्रेशन में निवेश करके वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। CREA की विश्लेषक और रिपोर्ट की मुख्य लेखिका अनुबा अग्रवाल ने कहा, ‘उद्योग द्वारा उत्सर्जन के आंकड़े या तो खुद या उनकी ओर से नियुक्त किसी तीसरे पक्ष द्वारा रिपोर्ट किए जाते हैं। अनुपालन के लिए बताए गए उत्सर्जन के आंकड़े हमेशा मानकों से नीचे दिखाए जाते हैं, चाहे वह BSL, भिलाई स्टील प्लांट, IISCO (इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी) प्लांट या दुर्गापुर स्टील प्लांट हो। आंकड़ों में विसंगतियां और फर्क इस्पात क्षेत्र के वायु प्रदूषण पर असल असर को समझने में बाधा डालती हैं।’

यह एक बड़े इस्पात संयंत्र की तस्वीर है। बीच में ऊंची चिमनी और उसके आसपास लोहे की बनी विशाल औद्योगिक संरचनाएं दिख रही हैं। पूरा दृश्य धुंधला और धुएं भरा लगता है, जिससे भारी उद्योग और प्रदूषण का एहसास होता है।

सिंटरिंग से सल्फर डाइऑक्साइड

BSL का चुनाव इसलिए किया गया, क्योंकि यह भारत के सबसे पुराने इस्पात संयंत्रों में शामिल है। इसे ‘स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड’(SAIL) चलाती है, जो स्टील बनाने वाली भारत की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी है। देश की कुल कच्चे इस्पात क्षमता में इसकी हिस्सेदारी 13% है। BSL अपनी क्षमता को सालाना 5.25 मिलियन टन से बढ़ाकर 7.5 मिलियन टन करने की तैयारी में है। इस अध्ययन में कहा गया है, ‘इस विस्तार से संयंत्र में ईंधन की खपत और उत्सर्जन में काफी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, इसलिए पर्यावरण से जुड़े इसके मौजूदा प्रदर्शन का आकलन करना समयानुकूल और नीतिगत दृष्टि से अहम है।’

उत्सर्जन से जुड़े आंकड़े संयंत्र की हर छह महीने पर आने वाली अनुपालन रिपोर्ट से लिया गया था। इसमें प्लांट के सिंटर संयंत्र, कोक ओवन, रिफ्रैक्टरी मटीरियल संयंत्र, ब्लास्ट फर्नेस और स्टील मेल्टिंग शॉप को शामिल किया गया था। कुल मिलाकर, संयंत्र से 34,700 टन पार्टिकुलेट मैटर (PM), 19,600 टन नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOX) और 47,700 टन सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) का उत्सर्जन हुआ।

सिंटर संयंत्र में लौह अयस्क और चूना पत्थर जैसे अन्य तत्वों के बारीक कणों को आपस में जोडऩे के लिए ताप का इस्तेमाल किया जाता है और इसे सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाली प्रक्रिया माना गया। इससे PM का 49%, SO2 का 40% और NOX उत्सर्जन का 52% हिस्सा निकलता था।

ये उत्सर्जन एकीकृत इस्पात और लौह संयंत्रों के लिए सरकार की ओर से तय सीमाओं के भीतर थे, जिन्हें 2012 में जारी किया गया था और समय-समय पर इसमें बदलाव किया गया है। ये मानदंड संयंत्र के हर घटक जैसे कि कोक ओवन, स्टील मेल्टिंग शॉप और ब्लास्ट फर्नेस के लिए सीमाएं तय करते हैं। जहां सिंटरिंग संयंत्रों के लिए PM2.5 की सीमा 150 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक तय है, वहीं सल्फर डाइऑक्साइड की कोई सीमा तय नहीं की गई है। एक बड़े औद्योगिक कमरे में धातु की चादरों को मशीन से काटा जा रहा है। बीच में लगी भारी मशीन के नीचे चमकीली चिंगारियां निकल रही हैं। कमरे के चारों तरफ धातु के ढांचे और ऊपर सफेद रोशनी की लंबी पट्टियां दिख रही हैं।

अग्रवाल ने कहा, ‘सल्फर डाइऑक्साइड PM2.5 से पहले निकलता है और सेकेंडरी पार्टिकुलेट मैटर भारत में कुल PM 2.5 के स्तर में 50% का योगदान देता है।’

उन्होंने आगे कहा, ‘वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, अमोनिया और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) जैसी पहले निकलने वाली गैसों से बनने वाला सेकेंडरी पार्टिकुलेट मैटर दिल्ली के वायु प्रदूषण की समस्या में लगभग 27% का योगदान देते हैं।’

CREA ने CALPUFF मॉडल का इस्तेमाल करके यह अनुमान लगाया कि इन संयंत्रों से निकलने वाले प्रदूषक पूरे इलाके में किस हद तक फैलते हैं। इस मॉडल को अमेरिका पर्यावरणीय सुरक्षा एजेंसी ने जांचा-परखा और अपनाया है। इस मॉडल के मुताबिक, प्लांट से निकलने वाला धुआं झारखंड के बड़े शहरों रांची और धनबाद तक पहुंचता है।

मोंगाबे-इंडिया ने बोकारो इस्पात संयंत्र के प्रमुख को पत्र लिखकर CREA की रिपोर्ट पर उनकी टिप्पणी मांगी थी, लेकिन प्रकाशन के समय तक उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।

बेहतर अनुपालन के लिए लगातार निगरानी

वायु प्रदूषण से होने वाले उत्सर्जन को कम करने का एक संभावित उपाय संयंत्र की चिमनियों में इस्तेमाल होने वाली तकनीक को बदलना है। फि़लहाल, BSL संयंत्र में सिंटर स्टैक्स के लिए बनी छह डक्ट्स में से चार में ‘मल्टी-साइक्लोन डस्ट कलेक्टर’ लगे हैं। यह पुरानी तकनीक है जो गैस के प्रवाह से बड़े कणों को इक_ा करने के लिए ‘अपकेंद्रीय बल’का इस्तेमाल करती है। ‘इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर्स’ (ESPs) गैस के प्रवाह में मौजूद कणों को बिजली से चार्ज करके उन्हें असरदार तरीके से हटा सकते हैं, लेकिन BSL की सिंटर डक्ट्स में सिर्फ दो में ही ये लगे हुए हैं।

EMTRC के सीनियर कंसल्टेंट जयंत मोइत्रा ने कहा, ‘साइक्लोन और मल्टीसाइक्लोन डस्ट कलेक्टर पुरानी तकनीक हैं और ESP का इस्तेमाल बहुत सामान्य है, जिनकी सप्लाई चेन भी अच्छी है। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की ओर से चलाए जा रहे इस्पात संयंत्र अधिकतर ESP तकनीक का इस्तेमाल करते हैं और निजी सेक्टर के इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट ESP और बैग फिल्टर टेक्नोलॉजी के मिले-जुले स्वरूप का उपयोग करते हैं।’ EMTRC पर्यावरण से जुड़ी कंसल्टेंसी है और मोइत्रा CREA की रिपोर्ट से जुड़े नहीं थे। ‘स्टील प्लांट में द्वितीयक स्त्रोत से निकलने वाले फ्यूजिटिव उत्सर्जन को पकडऩे के मुकाबले पॉइंट स्त्रोत उत्सर्जन को पकडऩा कहीं अधिक आसान है। भारत में ज्यादातर इंटीग्रेटेड इस्पात संयंत्र इस समय फ्यूजिटिव उत्सर्जन को बेहतर तरीके से नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं,’ उन्होंने आगे कहा। फ्यूजिटिव उत्सर्जन का मतलब औद्योगिक संयंत्रों की प्रक्रियाओं से निकलने वाले पार्टिकल, भाप और गैसों का अनचाहे रिसाव से है।

CREA की रिपोर्ट में बताया गया है कि संयंत्र की चिमनियों से निकलने वाले उत्सर्जन का स्तर लगातार तय नियामक सीमाओं से काफी नीचे बताया गया है। रिपोर्ट में दर्ज किए गए सभी आंकड़े मैन्युअल निगरानी से लिए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इस तरह का एक जैसा अनुपालन रिपोर्टिंग प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। उदाहरण के लिए, उपलब्ध सीमित रीडिंग्स में जो उतार-चढ़ाव दिखाई देते हैं, उसे देखते हुए यह संभव है कि या इसकी पूरी संभावना है कि अगर लगातार निगरानी के तहत प्रति घंटे के पूरे आंकड़े उपलब्ध हों, तो कुछ समय ऐसे भी सामने आएं जब मानकों का पालन न हो रहा हो।’

CREA ने कहा कि लगातार उत्सर्जन निगरानी तंत्र (CEMS) से आंकड़ों को ज्यादा पारदर्शी और आसानी से उपलब्ध बनाया जा सकता है। (मोंगाबे)


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