विचार / लेख

उन्मादी मीडिया का रसद-पानी है युद्ध और धर्म
19-Mar-2026 6:51 PM
उन्मादी मीडिया का रसद-पानी है युद्ध और धर्म

-डॉ. संजय शुक्ला

दुनिया इन दिनों अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध की त्रासदी से जूझ रहा है तो वहीं दूसरी ओर तमाम इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनल्स से लेकर सोशल मीडिया पर इस जंग के बारे में अतिरंजित और झूठी खबरें परोसी जा रही है। आलम यह है कि एआई के जरिए पुराने युद्ध के वीडियो को मौजूदा जंग का वीडियो बताकर इसे सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है।अनेक न्यूज चैनल्स के महिला एंकर ' लेडी सिंघम ' के रूप में चीख-चीखकर युद्ध का आंखों देखा हाल इस तरह सुना रहे थे मानो वे खुद युद्ध के अग्रिम पंक्ति में हों। युद्ध की वजह से एलपीजी सिलेंडर के किल्लत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है फलस्वरूप लोगों के बीच सिलेंडर के लिए बदहवासी का आलम है।अनेक खबरिया चैनलों पर इस खाड़ी युद्ध पर भारत की भूमिका को लेकर ऐसे डिबेट प्रसारित किए जा रहे हैं जिससे देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो रहा है। पहले भी भारत की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर ऐसे कार्यक्रम प्रसारित किए गए हैं जिसमें पैनलिस्ट के तौर पर शामिल नेता और पत्रकार अपने-अपने एजेंडे को बढ़ाते देखे गए। गौरतलब है कि युद्ध, आपदा और अशांति के दौरान सबसे बड़ी जवाबदेही उस देश के मीडिया की होती है जो देशवासियों को विपदा से जुड़े निष्पक्ष, सच और सकारात्मक खबरें देती है लेकिन भारत के खबरिया चैनलों में इस जवाबदेही का लगातार अभाव परिलक्षित हो रहा है। बीते दौर में देश में कुछ ऐसी सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं हुई है है जिसके लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही जवाबदेह है। युद्ध, आपदा या धार्मिक हिंसा के दौरान टीवी चैनलों में ‘प्राइम टाइम’ के नाम पर ऐसे डिबेट प्रसारित किए जा रहे हैं जिससे दर्शकों के बीच बेचैनी, नफरत और गुस्सा भडक़ रहा है। दरअसल इसके पीछे नेशनल टीवी चैनलों की टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट ‘टीआरपी’ की भूख है। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि टीवी चैनलों के ‘टीआरपी’ की भूख की शांति का रसद-पानी  युद्ध, आपदा और धर्म ही है।

गौरतलब है कि वैश्विक व्यापार ,आर्थिक उदारीकरण और इंटरनेट क्रांति के बाद देश में मीडिया का व्यापक विस्तार हुआ है जिसके चलते लोगों के पास सूचना और समाचार के अनेक विकल्प मौजूद हैं।आज देश में रेडियो, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, इंटरनेट , डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया समाचार और मनोरंजन के माध्यम हैं। विचारणीय यह कि भले ही मीडिया जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है लेकिन अब इसकी दुश्वारियां भी सामने आने लगी है फलस्वरूप देश में सांप्रदायिक नफरत और लोगों में अविश्वास की भावना घर कर रही है। टेलीविजन न्यूज चैनल्स की बात करें तो सबसे पहले और सबसे तेज खबरें ब्रेक करने के होड़ में कई बाद फेक न्यूज भी लोगों के पास पहुंच रहा है। वर्तमान परिदृश्य में आम लोगों के निशाने पर मीडिया की निष्पक्षता और खबरों की सत्यता है जिसके चलते अब मीडिया को अनेक उपमाओं से नवाजा जा रहा है। यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भले ही अतीत में पाठकों और दर्शकों के पास समाचारों के साधन सीमित थे लेकिन तब लोगों का भरोसा परंपरागत मीडिया पर ही था। आर्थिक उदारीकरण और सूचना क्रांति के वर्तमान दौर में मीडिया की भीड़ के बावजूद लोगों का भरोसा इस भीड़ में गुम है। देश के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वातंत्र्योत्तर भारत में पत्रकारिता की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है लेकिन आज अहम सवाल यह कि इस स्तंभ का साख क्यों कमजोर हो रहा है? इसका उत्तर पत्रकारिता से जुड़े लोगों को ही ढूंढना होगा।

आज देश में सैकड़ों टीवी न्यूज चैनल हैं लेकिन राजनीतिक स्वार्थ और दबाव के चलते ये चैनल सत्ता और विपक्ष की गोद में बैठने लगे हैं फलस्वरूप लोगों का टीवी न्यूज चैनलों से मोहभंग होने लगा है। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सोशल मीडिया और खबरिया चैनलों के विस्तार के बावजूद लोगों का भरोसा आज भी अखबारों और पत्र -पत्रिकाओं के प्रति है। हालिया खाड़ी युद्ध की बात करें तो न्यूज चैनल्स और सोशल मीडिया में इस जंग के बारे में अनेक एआई जनरेटेड और एडिटेड वीडियो प्रसारित किए जा रहे हैं जिसकी सत्यता की पुष्टि नहीं है। सोशल मीडिया यूजर्स भी ऐसे विडियो और समाचारों की सत्यता जाने इसे आगे बढ़ा रहे हैं। बानगी यह कि अनेक सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स और डिजिटल मीडिया में ईरानी हमले में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मारे जाने की खबरें बड़ी तेजी से फैलने लगी। इंटरनेट के इन खबरों को अफवाह बताते हुए नेतन्याहू के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से एक विडियो सामने आया जिसमें वे एक कैफे में लोगों के साथ कॉफी पीते हुए दिखाई देते हैं। दूसरी खबर ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के अमेरिकी-इजरायली हमले में गंभीर रूप से जख्मी होने की आई है जो फेक साबित हुई। यूएई में 19 भारतीयों सहित 35 लोगों की गिरफ्तारी हुई है, इन पर सोशल मीडिया पर युद्ध से संबंधित भ्रामक और फर्जी वीडियो शेयर करने का आरोप है। अलबत्ता तीन सप्ताह से चल रहे इस युद्ध में जीत-हार किसी की नहीं हुई है लेकिन युद्धरत देश अफवाहों के जरिए ही इस जंग को जीतने की होड़ में है।

 खबरिया चैनलों पर युद्ध या सांप्रदायिक तनाव के दौरान बेचैनी फैलाने वाले खबरें और डिबेट प्रसारित करने का यह कोई पहला वाकया नहीं है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद चले भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान टेलीविजन न्यूज चैनल्स के स्टुडियो मानो जंग के मैदान में बदल गए थे। महज 90 घंटे चले इस युद्ध के दौरान न्यूज चैनल जंग को लेकर लगातार झूठी और अतिरंजित खबरें प्रसारित करते रहे। एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल के एंकर ने 8 म?ई की रात रजौरी सेक्टर में फिदायीन हमले की झूठी खबर ब्रेकिंग के तौर पर प्रसारित कर दिया। दूसरी ओर कुछ चैनल  पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ का सरेंडर और सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर के गिरफ्तारी का दावा करते रहे। कुछ टीवी चैनलों ने भारतीय सेना के कराची और इस्लामाबाद में घुसने का ब्रेकिंग न्यूज भी चला दिया। युद्ध के चार दिनों के दौरान चैनल्स के स्टुडियो में भारत-पाक के रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों की लगातार बहस चलती रही बल्कि इस दौरान युद्ध के सायरन भी बजते रहे।खबरिया चैनल अपने प्रसारण के दौरान सेना से जुड़ी संवेदनशील सूचनाओं और सैन्य क्षमताओं को सार्वजनिक करने से भी नहीं चूक रहे थे। न्यूज़ चैनलों में रूस-यूक्रेनन युद्ध के शुरूआत में ही इसे तृतीय विश्वयुद्ध का आगाज बता दिया गया।

अलबत्ता यह कोई पहली दफा नहीं है जब देश की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाया हो बल्कि इसके पहले अनेक प्राकृतिक आपदाओं,  महामारी या सांप्रदायिक दंगों के वक्त भी अनेक चैनल्स  घबराहट और नफरत फैलाने वाली खबरें प्रसारित करते रहे हैं। वैश्विक महामारी कोरोना के दौरान जब पूरा देश घरों में कैद था तथा और लोगों के मन में इस महामारी के प्रति हताशा और बेचैनी थी तब तमाम टीवी चैनल श्मशान में लाशों की कतार, अस्पतालों के बाहर सडक़ों पर दम तोड़ते मरीजों की तस्वीरें दिखाते रहे।देश में धार्मिक और सामाजिक सौहार्द कायम रखने में समाचार माध्यमों की महत्वपूर्ण भूमिका है लेकिन टेलीविजन न्यूज चैनल इस दिशा में बेपरवाह नजर आते हैं। यह कहना गैर मुनासिब नहीं होगा कि मुल्क में मजहबी उन्माद फ़ैलाने के लिए जितना जिम्मेदार राजनीतिक और धार्मिक संगठन हैं उतना ही जिम्मेदार इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया भी है।अधिकांश टीवी चैनल्स में सलेक्टिव धार्मिक मुद्दों पर दोनों मजहबों के बीच हिंसा भडक़ाने और वैमनस्य बढ़ाने वाले निरर्थक बहस का चलन बढ़ा है। टीवी एंकर ऐसे पार्टी प्रवक्ताओं, मजहबी नेताओं, साधु-साध्वियों और मौलवियों को बैठाकर आक्रामक बहस के लिए प्रेरित करते हैं जिन्हें हिंदू धर्म या इस्लाम की भलिभांति जानकारी ही नहीं है और बल्कि वे एक नियत एजेंडे पर बहस करते हैं।

गौरतलब है कि साल 2022 में एक टेलीविजन चैनल पर ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर डिबेट के दौरान भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा के पैगंबर मोहम्मद पर आपत्तिजनक टिप्पणी से भारत सहित दुनिया के 12 देशों में काफी तीखी प्रतिक्रिया देखी गई थी। इस बहस में एंकर की भूमिका गैर जिम्मेदाराना थी एंकर चाहती तो नुपुर शर्मा को आपत्तिजनक टिप्पणियां करने से रोक सकती थीं अथवा खुद टीवी चैनल भी इस  प्रसारण को रोक सकती थीं लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। टिप्पणी के संवेदनशीलता के मद्देनजर टीवी चैनल चाहता तो इस विवादित कार्यक्रम का प्रसारण रोक सकता था लेकिन टी?आरपी के चलते उसने इस दिशा में गंभीरता नहीं दिखाई।अलबत्ता आज भी अनेक टीवी चैनलों के प्राइम टाइम में ऐसे डिबेट लगातार प्रसारित हो रहे हैं जिससे देश की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समरसता प्रभावित हो रही है लेकिन  चैनल इस दिशा में लगातार बेपरवाह बने हुए हैं। भारत में टीवी चैनलों के कार्यक्रमों को सूचना और प्रसारण मंत्रालय और भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) द्वारा केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम 1995 के तहत नियंत्रित एवं विनियमित करने का प्रावधान है। वर्तमान परिदृश्य में टीवी चैनलों को नियंत्रित और अनुशासित करने के लिए कानून नहीं बल्कि स्वनियमन और स्वानुशासन की जरूरत है ताकि वे अपनी सार्थकता साबित करें आखिरकार देश और समाज के प्रति उनका भी नैतिक दायित्व है।


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