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इच्छा-मृत्यु की अनुमति सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला
13-Mar-2026 9:26 PM
इच्छा-मृत्यु की अनुमति सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

इच्छा मृत्यु : न्यायालय ने दी सम्मान से मृत्यु की अनुमति

-प्रमोद भार्गव

निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में 12 साल से कोमा में रहते हुए कृत्रिम जीवन रक्षा उपायों से जीवित 32 वर्ष के हरीश राणा को मौत की अनुमति दे दी।देश के इतिहास में इच्छा मृत्यु की यह पहली कानूनी इजाजत है। अब हरीश के जीवन रक्षक उपकरण हटा लिए जाएंगे और उसकी जीवन-लीला प्राकृतिक रूप से मौत को प्राप्त हो जाएगी।न्यायालय की न्यायमूर्ति जेबी पारडीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ ने परोक्ष इच्छा-मृत्यु की इजाजत मांगने वाली याचिका की स्वीकार करते हुए एम्स दिल्ली को निर्देश दिया है कि 'वह तय करे कि जीवन रक्षक उपकरण  और प्रणाली एक सुनियोजित ढंग से हटाई जाए,ताकि व्यक्ति की गरिमा बनी रहे तथा उसे कोई पीड़ा झेलनी न पड़े।वैसे भी उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है, यह स्थिति सिर्फ दुख दे रही है।'हरीश पंजाब विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग के छात्र रहने के दौरान 2013 में पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से गिर गए थे। तब से वे कोमा में हैं।उनके पिता अशोक राणा ने उक्त याचिका अदालत में दाखिल की थी।

2018 में कॉमन काज की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायमूर्तियों की पीठ ने परोक्ष इच्छा-मृत्यु (पैसिव इथुनीशिया)को मान्यता से जुड़ा फैसला दिया था। न्यायालय ने कहा था  कि जो लोग गंभीर रूप से बीमार हैं और लिविंग विल (इच्छा-पत्र) बना चुके हैं, उनको सम्मान के साथ मरने का अधिकार है। उन्हें कानूनी पेंच में नहीं फंसाना चाहिए और चिकित्सा विषेशज्ञ को भी ऐसे मामले संज्ञान में लेना चाहिए। अतएव न्यायालय का निष्कर्ष था कि अगर कोई व्यक्ति अपना उपचार बंद कराना चाहता है तो उसे अनुमति देने का भी नियम होना चाहिए। न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस निर्णय में मृत्यु के अधिकार को भी मौलिक अधिकार माना है। लिविंग विल के मायने जीवित होने का दस्तावेज या वसीयत है। इसके जरिए मरणासन्न व्यक्ति या उसके परिजन अपनी इच्छा के जरिए इच्छा-मृत्यु की मांग कर सकते हैं।चिकित्सा विशेषज्ञों की समिति की राय पर इच्छा मृत्यु की पहल की जा सकती है।इस निर्णय के परिप्रेक्ष्य में ही यह पहली अनुमति अदालत ने दी है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में दिए परिप्रेक्ष्य फैसले में इस तथ्य को मान्यता दी है कि असाध्य रोग से ग्रस्त रोगी इच्छा-पत्र (वसियत) लिख सकता है। न्यायालय का यह फैसला चिकित्सकों को लाइलाज मरीजों के जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति देता है। अदालत ने कहा है कि जीने की इच्छा नहीं रखने वाले व्यक्ति को निष्क्रिय या मूर्चि्छत अवस्था में शारीरिक पीड़ा सहने नहीं देना चाहिए। अग्रिम इच्छा-पत्र लिखने की यह अनुमति कुछ शर्तों के साथ दी गई है। इसमें उल्लेख है कि जब तक संसद से इस सिलसिले में कानून नहीं बन जाता तब तक फैसले में दिए दिशा-निर्देश प्रभावी रहेंगे। कौन किस तरह से इच्छा-पत्र लिख सकता है और किस आधार पर मेडिकल बोर्ड इच्छा-मृत्यु के लिए सहमति दे सकता है, इनके आधार बिंदू फैसले में दिए गए हैं। इस फैसले के बाद रोगी के रिश्तेदार और मित्रों को वसियत के निष्पादन का अधिकार मिल गया था। इस वसियत के लिखे जाने के बाद मेडिकल बोर्ड रोगी को प्राणवायु देने वाले उपकरणों को हटाने पर विचार कर सकता है।

इच्छामृत्यु की हमें पहली जानकारी भीष्म पितामह द्वारा अपनी इच्छा के अनुसार मौत का वरण करने की मिलती है। जैन धर्म में ऋषि-मुनी संथरा के जरिए स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करते हैं। जब कोई व्यक्ति गंभीर बीमारी या दुर्घटना के चलते ऐसी नीम-बेहोशी की हालत में आ जाए कि उसकी स्मृति का लोप होने के साथ खाने-पीने व दिनचर्याओं से निवृति की शक्ति का क्षरण हो जाए और वह अपने अस्तित्व का बोध भी न कर पाए तो ऐसे दुर्लभ कष्ट से मुक्ति के लिए मौत जरूरी लगने लगती है। ऐसी हालात में रोगी को जीवन रक्षक प्रणाली पर टिकाए रखना उसे यातना देने की तरह है। उसके इस कष्टदायी जीवन से परिजन और शुभचिंतक भी अप्रत्यक्ष रूप से यातना ही भोगते है। परिजनों को आर्थिक बोझ भी उठाना पड़ता है। हरीश के पिता अशोक की पुत्र की इस लाइलाज बीमारी से दिल्ली का घर बिक गया। पिता जीवन-यापन के लिए क्रिकेट मैदानों में सैंडविच बेचकर गुजारा करने को मजबूर थे।

 भारत में यह मुद्दा तब देशभर में विचार व बहस का विषय बना था, जब मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग की दया मृत्यु के लिए शीर्ष न्यायालय में गुहार लगाई गई थी। बलात्कार और हत्या की निर्मम दुष्टता के चलते कोमा में पहुंची अरुणा ने 42 साल तक जीवन रक्षक प्रणाली पर टिके रहने की यातना भोगी। अरुणा को सामान्य अवस्था में लाने की जब सभी चिकित्सा कोशिशें  व्यर्थ हो गई, तब अदालत में उन्हें इच्छा मृत्यु देने की याचिका लगाई गई थी। किंतु  अदालत ने इसे उचित नहीं ठहराया था। 2011 में सर्वोच्च न्यायालय में इस आशय की अर्जी भी लगाई थी की अरुणा का इलाज संभव नहीं है, लिहाजा उसे जीवन रक्षक प्रणाली से मुक्त करने की इजाजत दी जाए। जिससे उसे, अंतहीन कष्टों से छुटकारा मिले। लेकिन इच्छा-मृत्यु वैध है या अवैध इसके अंतिम निष्कर्ष पर अदालत नहीं पहुंच पाई थी। लिहाजा उसने निष्क्रिय अवस्था में पड़े व्यक्ति की जीवन रक्षा प्रणाली हटाकर उसे मौत का वरण करने की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता देने का सवाल उठाते हुए सभी राज्य व केंद्र शासित प्रांतों को नोटिस जारी करके सलाह मांगी। तब के प्रधान न्यायमूर्ती आरएस लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय खंडपीठ ने इच्छा-मृत्यु पर विचार आमंत्रित करने के पक्ष में तर्क दिया था कि यह मसला संविधान ही नहीं बल्कि नैतिकता, धर्म और चिकित्सा विज्ञान से भी जुड़ा है, इसिलए इसे विचारना जरूरी है। इसके उलट केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार कहती रही कि यह एक तरह की अत्महत्या है, जिसकी अनुमति भारत में नहीं दी जा सकती, क्योंकि इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दे दी गई तो इसका दुरुपयोग हो सकता है ?

इसके जवाब में संविधान पीठ का तर्क था कि इसका दुरुपयोग रोकने के लिए सुरक्षा के उपाय होने चाहिए। लिहाजा अदालत ने याचिकाकर्ता पिंकी से जानना चाहा था कि ‘जीवन का अंत करने के लिए सबसे कम पीड़ादायी तरीका कौन सा हो सकता है ? क्योंकि दुनिया भर में इस पर बहस हो रही है, किंतु इस परिप्रेक्ष्य में किसी अंतिम निष्कर्ष पर आम राय नहीं बन सकी है। गोया, अदालत ने कहा था कि ‘कानून का दुरुपयोग इच्छा मृत्यु को कानूनी दर्जा नहीं देने का आधार नहीं हो सकता है।’ विधि आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता के विचार का विरोध किया था। अरुणा से जूड़ी याचिका पर ही सुनवाई करते हुए तबके न्यायाधीश मार्कंण्डेय काटजू की अध्यक्षता वाली पीठ ने इच्छा-मृत्यु को गैरकानूनी करार देते हुए निरस्त कर दिया था। अदालत ने अपने फैसले में दलील दी थी कि असामान्य परिस्थतियों में निष्क्रिय व्यक्ति को  इच्छा-मृत्यु की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन जब तक संसद इस बारे में कोई कानून नहीं बनाती, तब तक निष्क्रियऔर सक्रिय दोनों प्रकार की इच्छा-मृत्यु को अवैधानिक ही माना जाएगा।

धर्म, संस्कृति, परंपरा, दर्शन और नैतिकता से जुड़ा यह मुद्दा निसंदेह जटिल था, इसलिए इस पर एक राय बनना कठिन थी। संविधान का अनुच्छेद-21 जीवन को गरिमापूर्ण जीने का अधिकार तो देता है, लेकिन उसमें गरिमापूर्ण मृत्यु के वरण का अधिकार शामिल नहीं है। इच्छा-मृत्यु के विवाद को अंतिम निराकरण तक पहुंचाना इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में जीवन रक्षा की ऐसी प्रणालियां विकसित हो चुकी हैं, जो जीवन और मृत्यु की कड़ी को अर्से तक उलझाए रखती हैं। चिकित्सा में निजीकरण ऐसे उपायों को और बढ़ावा दे रहा है। देश में यातायात से जुड़ी दुर्घटनाओं में ऐसे घयालों की संख्या लगातार बढ़ रही है,जो दशकों से कोमा में हैं। केवल जीवन रक्षा प्रणाली के जरिए एक हद तक उनमें प्राणवायु का संचार बना रहता है। मूर्चि्छत अवस्था वाले ऐसे रोगियों के उपचार से परिजन या तो कंगाल हो रहे हैं या फिर मरीजों को अस्पताल में ही छोड़ देने की बेरहमी दिखाने को विवश हो रहे हैं, क्योंकि उपचार की ऐसी दीर्घ अवधि में उन्हें आजीविका के संसाधनों को नियमित बनाए रखने में भी अनेक कठिनईयों का सामना करना पड़ता है। फिलहाल दुनिया में अब तक स्विट्जरलैंड एकमात्र ऐसा देश है, जहां कुछ शर्तें पूरी कर लेने के बाद इच्छा-मृत्यु की अनुमति दे दी जाती है। अब भारत भी इस कड़ी में का हिस्सा बन गया है।


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