विचार / लेख
-विष्णु नागर
शाब्दिक अर्थ में लिखने की मेज की बात करें तो ऐसी कोई मेज मेरी कभी रही नहीं ।घर में संयोग से आज एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन मेजें इक_ा हो गई हैं। उसमें एक मेज पर मेरा छोटा बेटा अपने लिखने-पढऩे का काम करता है। एक पर टीवी जी ससम्मान विराजित हैं। एक पर प्रेस करने के कपड़े इक_ा होते रहते हैं और वहां एक इलेक्ट्रिक प्रेस भी रखी है मगर लिखने के लिए घर में कभी मैंने मेज का इस्तेमाल नहीं किया। हां पत्रकार था तो आफिस में कुर्सी-मेज पर काम करना पड़ता था। अनेक लेख भी मेज पर बैठकर लिखे हैं मगर रचनात्मक लेखन कभी कुर्सी- टेबल पर नहीं किया।करना आता ही नहीं। कभी पलंग पर पेट के बल लेटकर लिखता था, इधर- उधर कागज बिखरे रहते थे। आजकल उस पर पीठ टिका कर लिखता हूं। ड्राईंगरूम में रखे सोफे का भी इसके लिए इस्तेमाल करता हूं।मतलब यह कि टेबल-कुर्सी के अलावा कोई भी और साधन मेरे लिए उपयुक्त है। इसी तरह मैं महंगी कलम से भी नहीं लिख सकता। मन में न जाने क्या भूत बैठा है।दस या अधिक से अधिक बीस रुपए की कलम ही मेरे काम आती है। कुछ काम सीधे मोबाइल पर भी करता हूं, जैसे यह टिप्पणी लिखी है। हां इसके लिए थोड़े से नोट्स डायरी में लिये थे। इसके अलावा मुझे कोई खास किस्म का कागज नहीं चाहिए। कागज कोई भी हो। बिना लाइनों का हो या लाइनों का! नया हो या पुराना! पत्रकार और लेखक के नाते मेरे पास भेंट में मिली डायरियों का भंडार है, जो मेरे जीवित रहने तक आराम से चल जाएगा। आजकल कोशिश करता हूं कि कच्चा-पक्का कोई भी रचनात्मक या गैर रचनात्मक विचार आए या कोई तथ्य नोट करना हो तो उसमें उसे नोट कर लूं, ताकि ढूंढऩे में आसानी हो।लिख-लिखकर बहुत सी पुरानी डायरियों को समय-समय पर नष्ट भी करता जाता हूं,ताकि मेरे बाद मेरी सन्तानों को व्यर्थ का भार न ढोना पड़े!
न मैं लिखने के लिए कभी पहाड़ों पर गया और न किसी समुद्र किनारे, न किसी कमरे में बंद रहा। वैसे भी मैं उपन्यासकार नहीं हूं और एक लिखा भी था तो नौकरी के दौरान समय मिलने पर छह साल में कंप्यूटर पर लिखा था।मैं बहुत देर तक घर के अंदर देर तक चुप तो रह सकता हूं मगर घंटे दो घंटे या हद से हद तीन घंटे बाद एकांत से घबरा जाता हूं। आसपास कोई होना चाहिए।
दुनिया माने या न माने, मुझे अपने कवि होने का भ्रम है और सामान्यत: कवियों को लिखने के लिए किसी भी तरह के तामझाम की जरूरत नहीं पड़ती। यूं तो कहानियां भी लिखी हैं और उनके कुछ संग्रह भी हैं मगर उसके लिए भी किसी अतिरिक्त बाहरी वातावरण की जरूरत नहीं पड़ी।लिखा और भी विधाओं में है मगर सब इसी साधारण ढंग से! जीवन में योजनाबद्ध ढंग से कुल दो काम किए : एक, रघुवीर सहाय की जीवनी और दूसरा, सुदीप बनर्जी पर मोनोग्राफ। वे भी घर के वातावरण में ही लिखे! सामग्री जुटाने के लिए जरूर बाहर गया।मिला।
एक समय था,जब मुझे घर के अंदर लिखते समय एकांत की जरूरत पड़ती थी और उसमें कोई विध्न पड़ता था तो क्रोध आता था।अब नहीं आता। डायरी के अंदर पेन पड़ा रहता है, जहां भी हूं, जो भी सूझ रहा है, झट नोट कर लेता हूं। बाद में ऐसा बहुत सा लिखा व्यर्थ लगता है तो उससे पीछा भी छुड़ा लेता हूं। कुछ से पीछा छुड़ाना इतना आसान भी नहीं होता!
अक्सर अपने लिखे पर काफी काम करने की कोशिश करता हूं। डायरी में अक्सर अनेक ड्राफ्ट बनाता हूं। इसमें अनेक बार उस रचना की आरंभिक शक्ल काफी बदल जाती है। फिर उसे मोबाइल पर नोट करता हूं और उसके बाद भी छपने तक काम चलता रहता है। एक बार में मुझसे लिखना सध नहीं पाता। भाषा, विचार और कल्पना तीनों को बार -बार संवारना पड़ता है।दूसरा किसी रचनात्मक विचार का बस एक सिरा पकड़ में आता है। बाद में उस पर काम करते-करते और कुछ आगे सूझता है या नहीं भी सूझता! इस सबके बावजूद कोई रचना उत्कृष्ट ही बनेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं होती!
बाकी जीवन को देखना-समझने की कोशिश करना अनेक तरह से चलता रहता है, जिसके लिए किसी टेबल-कुर्सी की दरकार नहीं। सडक़ पर अनेक बार बिना किसी उद्देश्य के भटकना, अखबार और किताबें पढऩा, संगीत सुनना, बेहतरीन फिल्म बीच-बीच में देखना, लोगों से मिलना,उनकी बातें सुनना,भीड़-भाड़ में घुसना, ये सब लिखने में सहायक बनते हैं। पत्रकारिता-खासकर रिपोर्टिंग के अनुभव ने काफी दिया -
फिर भी जितना अभी तक किया है, इतना अच्छा नहीं है कि संतोष हो!जीवन कितना विराट और सघन है और मेरा प्रयत्न कितना तुच्छ! जब तीन-चौथाई जिंदगी बीत चुकी है और बाकी एक चौथाई बची है या नहीं, इसका पता नहीं, तब यह अहसास और गहरा होता जा रहा है। शारीरिक अक्षमताएं रचनात्मक क्षमताओं को भी प्रभावित करती हैं पर इसी सब के बीच जितना और जो हूं, वो हूं पर हार मानना नहीं चाहता!
(वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश ने ‘लिखने की मेज’ शीर्षक से एक पुस्तक संपादित की है, जिसमें 125 लेखकों की टिप्पणियां शामिल हैं। उसमें मेरी यह टिप्पणी भी है।)


