विचार / लेख

वंशवाद, और उसके विरोध का पाखंड!
09-Mar-2026 10:36 PM
वंशवाद, और उसके विरोध का पाखंड!

-संजीव चंदन

नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने जेडीयू ज्वाइन कर लिया है और जैसा कि दृश्यों में है 50 वर्षीय निशांत कुछ नेताओं की छाया में और पिता की निगरानी में राजनीति सीखेंगे।

भारत कई प्रकार के पाखंड का देश है, उसमें से एक पाखंड है- राजनीति में वंशवाद पर हंगामा। लोग अपनी सुविधा से करते हैं। अपने मामले में अपने बेटे ( बेटी दूसरी चॉइस होती है) को अपना सब सौंप देने वाले लोग इसपर सबसे अधिक हंगामा करते हैं।

जदयू में निशांत की मांग भारतीय समाज के वंशवादी चरित्र की ही मांग थी और लंबे समय तक इसे रोक रखने वाले नीतीश भी अंतत: सहमत हो गए। सवाल है कि निशांत के बिना क्या जदयू मनीष वर्मा या संजय झा, या श्रवण कुमार के साथ बची रह सकती थी? वैसे बची रहने की उम्मीद अभी कम ही हुई है।

सवाल है कि तेजस्वी यादव या लालू प्रसाद की किसी संतान के बिना राजद की विरासत साबुत बची रहेगी, रहती? हां, नीतीश कुमार के पास यह सुविधा नहीं है कि वे अपने कुछ पुत्रों/पुत्रियों में से योग्य का चुनाव करते-सारा फूल उन्हें महादेव पर ही देना था-क्षमता, योग्यता/ अयोग्यता तो राजनीति तय कर देगी, समय तय कर देगा।

सवाल है कि रामविलास पासवान की विरासत चिराग पासवान को ही नहीं सौंप दिया समाज ने- चाचा भी विलेन हुए और बहनोई भी, पितृसत्ता ऐसे ही काम करती है।

अखिलेश यादव के आगे चाचा शिवपाल यादव सरेंडर हुए, अन्यथा सपा की जान आधी से भी कम हो जाती। जान रहती भी या नहीं, पता नहीं।

बसपा को भी अंतत: वंशवाद के दायरे में ही आना पड़ा, हालांकि बहन जी को वहां चुनाव का विकल्प था। कांशीराम जी ने जब लोकतंत्र की महान घटना को अंजाम दिया था, तब तक वंशवाद का मुद्दा भारतीय राजनीति का मुद्दा था ही था।

सवाल है कि जदयू या राजद ही क्यों? राहुल गांधी के बिना कांग्रेस की कल्पना ही कितने लोग कर पा रहे हैं? जैसे निशांत वैसे राहुल। हां, वहां सोनिया को प्रियंका का च्वाइस है, कांग्रेस जनों को भी-लेकिन समाज में पितृसत्ता भी कोई चीज होती है, पाखंडियों के बीच जारी पितृसत्ता।

आज जो पटना में हुआ, वह एक अनिवार्य दृश्य था बिहार की राजनीति में। जदयू सत्ता के लिए अवसरवादियों का एक संगठन है। एक दौर में वह बदलाव का एजेंडा लेकर चला था, अलग-अलग कारणों से लालू प्रसाद की सत्ता का विकल्प पैदा करने की आकांक्षा वाले समूहों के लिए अम्ब्रेला संगठन! नीतीश जी सबके नेता थे, सबकी उम्मीद।

आज के दृश्य से यह जरूर कोशिश होगी कि संजय झा, ललन सिंह, विजय चौधरी पर उठ रही उंगलियां थोड़ी कम होंगी। लेकिन इसमें भी शह और मात का खेल है। मात किसे मिली वह आज भी स्पष्ट है और वक्त भी बताएगा। अचानक के राजनीतिक घटनाक्रम में बहुत सी कथाएं होती हैं, समाने आएंगी। मोहन भागवत की कथा जग जाहिर है।

इन सबके बीच राजनीति का नया अध्याय शुरू होगा बिहार में-बीजेपी का पंजा मजबूत होगा। वंशवाद के भीतर से नेता उभरेंगे आदि। लोहिया आदि द्वारा उभारा गया वंशवाद का मुद्दा सामयिक था, उसी समय खत्म हो गया था, जब उस मुद्दे पर नारा लगाते नेताओं का वंश बना।

फिलहाल तो निशांत कुमार को मंगलकामनाएं!


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