विचार / लेख
-डॉ. परिवेश मिश्रा
सदियों से भारतीय सामाजिक व्यवस्था में दलितों को अलग थलग कर, अपमानित और प्रताडि़त कर, जिस अमानवीय स्थिति में पहुँचाया गया था, उसकी मजबूत जड़ों को हिलाने के जितने श्रेय का अधिकार अंग्रेजों ने अर्जित किया था उतना उन्हें दिया नहीं गया। समाज सुधार या दलितों का उद्धार उनका लक्ष्य कतई नहीं था यह अलग बात है। लेकिन जड़ों को ढीला करने की उपलब्धि उनके खाते में अवश्य जाती है। यह काम मुख्य रूप से ब्रिटिश फ़ौज और रेलवे के माध्यम से हुआ था।
राय बहादुर पंडित सर शीतला प्रसाद बाजपेयी के पिता अवध के एक ताल्लुकेदार थे। उनके पुत्र सर गिरिजाशंकर बाजपेयी आज़ादी मिलने के समय विदेशी मामलों में सबसे वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी थे। पंडित नेहरू ने विदेश मंत्री का जि़म्मा अपने पास रख कर गिरिजाशंकर बाजपेयी को विदेशी मामलों के लिए अपना मुख्य सलाहकार तथा विदेश मंत्रालय का सेक्रेटरी जनरल नियुक्त किया था। (आगे चलकर इनके तीन में से दो बेटे भारत के विदेश सचिव बने। तीसरे दून स्कूल के हेडमास्टर रहे)।
1915 में युवा गिरिजाशंकर जब आईसीएस के इंटरव्यू के लिए पहुंचे तब उनसे पूछा गया था कि क्या उन्होंने पंडित सीताराम पांडे की आत्मकथा पढ़ी है? बाजपेयी ने अपने जवाब से इंटरव्यू लेने वालों को हैरान कर दिया। उन्होंने कहा कि हाँ, अवधी में लिखी मूल पाण्डुलिपि को पढ़ा है जिसे सीताराम पांडे ने गिरिजाशंकर के दादा के हवाले छोड़ा था।
रायबरेली के समीप गांव तिलोई के पंडित सीताराम पांडे ( हालाँकि तब सरनेम लिखने का चलन नहीं था) ने 1812 से 1860 तक उस फौज में नौकरी की जिसे आम जनता उनकी वर्दी के रंग के कारण लाल पलटन और अंग्रेज़ बंगाल नेटिव आर्मी कहते थे। एक अंग्रेज़ अधिकारी के प्रोत्साहन पर सेवानिवृत्ति के बाद उनकी लिखी आत्मकथा का अंग्रेज़ी अनुवाद बाद में भारत आने वाले सभी अंग्रेज़ फ़ौजी अधिकारियों को अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाता था। इसकी मूल पांडुलिपि किसी के पास सुरक्षित रह गई यह जानकारी सभी को चौंकाने वाली थी।
1815 के आसपास सीताराम की टुकड़ी आगरा से बुंदेलखंड की ओर मार्च करते समय शायद चंबल घाटी के इलाक़े में थी जब पिंडारियों से हुई मुठभेड़ में इनके कंधे में गोली लगी और ये बुरी तरह घायल होकर लुढक़ते हुए पहाड़ी जैसे स्थान की तलहटी में पहुंच कर दो दिन बेहोश पड़े रहे। होश आने पर गायों के गले में बँधी घंटियों की आवाज़ कान में पड़ी। कुछ घंटों के बाद एक धूल धूसरित बच्ची ने इन्हें देखा। इशारे से बताया प्यास बहुत लगी है। उस बच्ची ने पास ही मवेशियों के लिए खोदे गए गड्ढे नुमा कुएँ से मटमैला पानी निकाल कर इन्हें दिया जो इन्होंने हथेलियों को जोड़ कर पी लिया। बाद में गांव वाले आये, उठाकर इन्हें अपने बीच ले गए। आश्रय देने वालों की जाति का अनुमान करना इस जनेऊ और चोटीधारी ब्राह्मण सैनिक के लिए मुश्किल नहीं था। यहां इन्होंने अगले दो दिन अपने सामान के साथ बची सूखी रोटियां खा कर बिताए।
घायल होने के कारण नौकरी का पहला अवकाश मिला। स्वास्थ्य लाभ के दौरान गांव को बच्चों को कि़स्से सुनाने के दौरान एक दिन यह कि़स्सा भी सुना बैठे जो आसपास मँडराते बड़ों के कानों में पड़ गया। सिपाही जी जाति से बहिष्कृत हो गए। वापस शामिल होने के लिए पूजा-हवन के बाद पूरे गांव को जो भोज कराना पड़ा उसमें तब तक की सारी कमाई खप गई थी।
सिलसिला चल निकला। हर छुट्टी पर कोई न कोई कारण तैयार मिलता और यह भोज होता। लेकिन सीताराम पांडे हर बार लौट कर फ़ौज में जाते रहे। हालाँकि पानी पीना पिलाना बड़ा मुद्दा बना रहा। 1857 में जब मातादीन भंगी को मंगल पांडे ने पानी पिलाने से इंकार किया तभी बात कारतूस और गोमांस से होते आगे बढ़ी थी। लेकिन फाँसी पर दोनों लटके। 1860 के बाद हुए फ़ौज के पुनर्गठन पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा। ब्राह्मण-क्षत्रिय बहुलता वाली इनकी जैसी इकाइयां भंग कर दी गईं। अस्तित्व में आई नयी रेजिमेंटों में जातियों का अनुपात बड़ा फ़ैक्टर था। आगे चलकर, 1941 में तो पूरी की पूरी महार रेजिमेंट ही खड़ी कर दी गई।
जब फ़ौज अफग़़ानिस्तान गयी तब तक रेल आ चुकी थी। सिपाहियों से ठुंसे रेल डिब्बों में शारीरिक स्पर्श की वर्जना भी जाती रही।
रेल के आने के साथ और भी बातें हुईं। श्रम के लिए गाँव से पलायन की परंपरा ने जड़ें पकडऩा शुरू की। पहाड़ों, नदियों, जंगलों, पथरीले मैदानों को काटना, बराबर करना, साथियों के साथ भारी रेल पांतों को कंधे पर ढो कर ले जाना जैसे काम मज़बूत और समर्पित वर्क-फ़ोर्स की मांग करते थे। ज़मींदारों और बड़े भू-स्वामियों का बेगार करते और गाँव में अपमानित होते भूमि-हीन वर्ग को पहली बार जीविकोपार्जन के लिए विकल्प मिला।
देश भर में रेल्वे में भारी संख्या में दलितों को नौकरियाँ मिलीं। आमतौर पर वे ‘गैंगमैन’ कहलाए। गाँवों से बैलगाडिय़ों में लद कर आने वाले अनाज की बोरियों को पीठ पर लादकर डिब्बों तक पहुँचाने वाले कुली, या छोटे स्टेशन से दूर, कई बार जंगल में, सिग्नल तक जा कर केरोसिन डाल कर बत्ती जलाने वाले, या सौ किलो से भारी ‘कपलिंग’ को हाथों से उठाकर इंजन से जोड़ते और अलग करते ‘पॉईँट्समैन’, वर्कशॉप के मज़दूर, जो भी नाम और काम हो, इन्हें पहले टेन्ट में और उसके बाद पहली बार रेलवे क्वार्टर में रहने का अवसर मिला जहाँ उसी स्थान में, और कभी-कभी तो उसी क्वार्टर में, शूद्र भी रहा करते थे। इन घरों के बीच एक कुआं होता था और पहली बार इन्हें उसी कुएँ से खींचकर पानी पीने का मौक़ा मिला जिससे दूसरे पीते थे। गाँव में अन्य जातियों और इनके बीच कपड़े पहनने की अलग-अलग शैलियाँ निर्धारित थीं। रांगेय राघव ने एक स्थान पर लिखा था, धोती की लंबाई (या ऊँचाई) और समाज में दर्जा, विपरीत दिशा में चलते हैं। धोती जितने नीचे तक, दर्जा उतना ऊँचा। और इसका उलट भी। फौज की तरह रेलवे की यूनिफॉर्म ने यह अंतर मिटा दिया। स्टेशन मास्टर लगभग हमेशा अंग्रेज़ रहे जिनके घर के काम के नाम पर पहली बार किसी ग़ैर-दलित के घर के अंदर प्रवेश का मौका मिला। गार्ड और ड्राइवर भी आसपास ही रहते थे जो अपनी ड्यूटी के दौरान रेलवे से मिली लकड़ी की काली बड़ी संदूक में कपड़े-लत्ते के अलावा दो-तीन दिन का राशन पानी ले कर चला करते थे। इन संदूकों को घर से लाने ले जाने का काम यही ‘बॉक्समैन’ करते थे। हालांकि, कुछ गार्ड और ड्राइवर उन जातियों के थे जिनकी महिलाएँ इन संदूकों को न केवल स्वयं घर की दहलीज तक पहुँचा देती थीं बल्कि पति को सख़्त हिदायत देतीं कि रेल में लोड होने के बाद गंगा जल वैसे ही छिडक़ लें जैसा संदूक की वापसी पर वे स्वयं करती थीं। लेकिन बहुतेरे एंग्लो-इंडियन थे जिनके घरों में इनके प्रवेश पर रोक नहीं थी। धीरे ही सही, बरसों की सड़ चुकी व्यवस्था में दरार आना शुरू हो गईं।
रेलवे की नौकरी ने पहली बार इन दलितों के बच्चों को स्कूल पहुँचने का मौका दिया। हैदराबाद में कैमिस्ट्री के प्रोफेसर रहे डॉ. वाय.बी. सत्यनारायण के गांव से निकाले गये दादा नरसैया रेलवे में एक छोटे से स्टेशन पहुंच कर गैंगमैन बन गये थे। पिता बलिया की पास के गांव के स्कूल जाने की जि़द तो दादा पूरी नहीं कर पाए किंतु मस्जिद के मौलाना ने अक्षर ज्ञान देकर पूरे कुनबे और बिरादरी में पहला साक्षर खड़ा कर दिया था। जैसा उन्होंने अपनी पुस्तक ‘माय फादर बलिया’ में लिखा, चूँकि रेल अंग्रेजों की थी, जब दादा के बाद रेलवे सेवा में आ चुके पिता बलिया अंग्रेज स्टेशन मास्टर की अनुशंसा के साथ बेटे सत्यनारायण को लेकर पास के गाँव के स्कूल पहुंचे तो किसी की हिम्मत नहीं हुई दाखिले के लिए इंकार करने की।
जेएनयू में प्रोफेसर रह चुके डॉ. तुलसीराम की ‘मुर्दहिया’ एक प्रसिद्ध दलित आत्मकथा है। जब वे प्राथमिक शाला में भर्ती हुए, देश आज़ाद हो चुका था। प्रवेश में कोई ना-नुकुर नहीं हुई। उनकी कक्षा में 43 बच्चे थे जो तीन क़तारों में ज़मीन पर बैठते थे। पहली क़तार जिसमें तुलसीराम भी थे, में 13 और बाक़ी दो में पंद्रह-पंद्रह। बाद में उन्होंने 13 का राज जाना। ये सारे तेरह दलित थे।
पत्नी डॉ. मेनका देवी के साथ अपने लेप्रसी प्रोजेक्ट्स के सिलसिले में गाँवों से लौटते अक्सर रात हो जाती थी। एक दिन बारिश के मौसम में देर शाम जोगनीपाली नाम के एक गाँव से गुजरते हुए वहाँ कुछ असामान्य हलचल देख पूछताछ की। पता चला एक दलित गर्भवती महिला का मामला था। कुछ दिन पूर्व बारिश में कच्चा घर ढह जाने के बाद से इस परित्यक्ता का स्थायी घर नहीं था। पिछले दो दिन से एक किसान ने एक-दो दिन की बात समझ कर अपने घर के सामने के हिस्से में बँधे मवेशियों के बीच रहने के लिए महिला को स्थान दिया था। ‘घर’ और बाहर के बीच का यह ‘बफर जोन’ भी था और घर की महिलाओं के समझौते की सीमा भी। किंतु उस शाम अचानक महिला बढ़ते दर्द से कराहने लगी थी। प्रसव का समय सामने है यह स्पष्ट हो गया था। घर की महिलाओं ने जि़द पकड़ ली। हर हाल में तत्काल इसे बाहर करो। जहाँ है यदि वहीं प्रसव हो गया तो घर हमेशा के लिए अपवित्र हो जाएगा। प्रसव से दौरान और उसके पश्चात होने वाली प्रक्रिया सँभालने का जि़म्मा गांव की जिस अन्य दलित महिला का था वह उस रात बाहर थी और उसका काम करने के लिए कोई भी महिला किसी भी हालत में तैयार नहीं थी।
हमारा पहुंचना संयोग था। पड़ोस के गांव के गौटिया (बड़े किसान) हमारा ‘अनुरोध’ अस्वीकार करने की स्थिति में नहीं थे। ट्रॉली के साथ वे अपना ट्रैक्टर लेकर आए। उसमें पैरा (पुआल/पराली) की मोटी परत के ऊपर दरी बिछाकर ऊबड़ खाबड़ रास्ते को पार कर महिला को पास के झिकीपाली गांव के मिशन तक पहुँचाने की व्यवस्था हो गई। ईसाई सिस्टरों को कोई परहेज या परेशानी नहीं थी। माँ और शिशु की जान बच गयी। शिशु अब जवान हो रहा है। मजदूरी करता है। यदि समाज से शिकायत है तो सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने से परहेज करता है।
एक साथी पास के गांव में प्रतिष्ठित लेखक और पत्रकार हैं। विधायक के करीबी भी माने जाते हैं। आपसी व्यवहार में लोग इन्हें ‘अपने में से ही एक’ बताने दिखाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। एक दिन गांव के एक वरिष्ठ की मृत्यु पर ये सांत्वना देने मृतक के घर पहुंचे, परिजनों से मिले, मृतक के मित्रवत बेटों से गले मिले, अर्थी सजने आदि तक वहीं साथ रहे, अंतिम यात्रा में राम नाम सत्य है का उद्घोष करते हुए शामिल हुए। श्मशान घाट के गेट पर पहुंचने पर मित्रवत पुत्रों ने हाथ जोडक़र सहानुभूति के लिए आभार व्यक्त किया। अनुभवी और समझदार पत्रकार जी को यह समझाने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ी कि उनकी सीमा आ चुकी थी। वे गेट से वापस आ गए, अंदर नहीं गए, कोई अप्रिय स्थिति निर्मित नहीं हुई। दोस्ती बनी रही। गांव में बहुसंख्य रिश्ते ऐसे ही बने मिलते हैं। जब तक कोई व्यक्ति या परिस्थिति कुरेदे नहीं, रिश्तों पर ऐसी ही दोस्ती के आवरण ने सारी खरोंचों को ढक रखा है।


