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क्या हम अपनी भाषाई विरासत बचा पाएंगे?
26-Feb-2026 10:40 PM
क्या हम अपनी भाषाई विरासत बचा पाएंगे?

-सुशांत आचार्य

किसी राष्ट्र की पहचान उसकी सीमाओं से ही नहीं, उसकी भाषाओं से भी बनती है। भारत की भाषाई विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति रही है, लेकिन विडंबना यह है कि यही विरासत आज उपेक्षा और आधुनिकता के दबाव में धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता का प्रतीक है। किसी भी समाज की आत्मा उसकी भाषा में बसती है। स्थानीय बोलियाँ और भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि वे हमारी परंपराओं, लोकज्ञान, इतिहास और सांस्कृतिक स्मृतियों की जीवित धरोहर हैं। आज जब बाजारवाद और आधुनिकता का प्रभाव बढ़ रहा है, तब इन बोलियों के अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 19,500 मातृभाषाएँ और बोलियाँ दर्ज की गईं। भाषाई मानकों के आधार पर देश में लगभग 121 प्रमुख भाषाएँ हैं, जिनके दस हजार से अधिक बोलने वाले हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है। विभिन्न अध्ययनों और यूनेस्को जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के आकलन के अनुसार भारत में लगभग 400 से 450 भाषाएँ सक्रिय रूप से प्रचलित हैं। ये आंकड़े हमारे देश की भाषाई समृद्धि को दर्शाते हैं, लेकिन अनेक छोटी भाषाओं का तेजी से लुप्त होना चिंता का विषय है।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि पिछले बीस वर्षों में भारत में लगभग 20 से 30 छोटी भाषाएँ या बोलियाँ पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं। इसके अलावा लगभग 200 से अधिक भाषाएँ विभिन्न स्तरों पर विलुप्त होने के कगार पर हैं। कई भाषाएँ ऐसी हैं जिनके बोलने वाले केवल कुछ सौ या कुछ दर्जन लोग ही बचे हैं। जब किसी भाषा का अंतिम बोलने वाला व्यक्ति इस संसार से विदा होता है, तो उसके साथ उस भाषा की सांस्कृतिक विरासत भी विलुप्त हो जाती है।

स्थानीय बोलियाँ और भाषाओं का क्षेत्र भले ही सीमित होता है, पर उनका महत्व बहुआयामी है। वे किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखती हैं। लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें और पारंपरिक ज्ञान इन्हीं भाषाओं में सुरक्षित रहते हैं। कृषि, वनस्पति, जलवायु और घरेलू चिकित्सा से जुड़ा ज्ञान मातृभाषा के माध्यम से ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होता है। मातृभाषा में शिक्षा बच्चों के बौद्धिक विकास को भी सुदृढ़ करती है और उनकी सामाजिक समझ को बढ़ाती है।

भाषाओं के लुप्त होने के पीछे कई कारण हैं, जैसे तेजी से बढ़ता शहरीकरण, रोजगार की खोज में पलायन, शिक्षा और प्रशासन में बड़ी भाषाओं का वर्चस्व या उन्हें प्राथमिकता, तथा डिजिटल माध्यमों में स्थानीय भाषाओं की सीमित उपस्थिति। आज अनेक परिवारों में नई पीढ़ी से मातृभाषा में संवाद कम होता जा रहा है, जिससे भाषाई हस्तांतरण की कड़ी टूट रही है।

भारत में कई भाषाएँ और बोलियाँ आज अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। अंडमान द्वीप की बो और आका-बो जैसी भाषाएँ उनके आखिरी बोलने वाले व्यक्ति के निधन के साथ पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं, और उसके साथ एक पूरी सांस्कृतिक धरोहर भी विलुप्त हो गई। वहीं अनेक भाषाएँ अत्यंत लुप्तप्राय स्थिति में हैं। बिरहोर, जो झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में बोली जाती है, नई पीढ़ी में घटते प्रयोग के कारण संकट में है। छत्तीसगढ़ के सुदूर अंचलों में प्रचलित धुरवी, बघेली, मढिय़ा, दोरली, भतरी और हल्बी जैसी भाषाएँ भी हिंदी और शहरी प्रभाव के कारण कमजोर होती जा रही हैं। इसी प्रकार गोंडी भाषा, हालांकि यह एक बड़े क्षेत्र में बोली जाती है, पर इसकी कई उपबोलियाँ लुप्त होने के कगार पर हैं। इन भाषाओं को बचाना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक पहचान और ऐतिहासिक धरोहर को बचाए रखने का प्रयास है।

समाधान हमारे ही हाथ में है। क्योंकि भाषाएँ किसी सरकारी आदेश से जीवित नहीं रहतीं, वे घरों में, परिवारों में और रोजमर्रा के बोलचाल में जीवित रहती हैं। यदि हम खुद अपनी मातृभाषा बोलने में संकोच करेंगे, तो उसके लुप्त होने के लिए केवल व्यवस्था को दोष देना सही नहीं होगा। प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा को स्थान देना, लोक साहित्य का डिजिटल दस्तावेजीकरण करना, स्थानीय भाषाओं में संवाद और साहित्य को प्रोत्साहन देना तथा सरकारी स्तर पर संरक्षण योजनाएँ लागू करना आवश्यक है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है समाज और परिवार की भूमिका, यदि घरों में मातृभाषा का प्रयोग जारी रहेगा, तो उसका अस्तित्व भी बना रहेगा।

आधुनिकता को केवल संकट के रूप में नहीं, बल्कि अवसर के रूप में भी देखने की आवश्यकता है। आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया, पॉडकास्ट, यूट्यूब, लोकगीतों की रिकॉर्डिंग, डिजिटल शब्दकोश और स्थानीय भाषा के ऐप्स, ये सभी माध्यम भाषाई संरक्षण के साधन बन सकते हैं।

यदि हम अपनी बोलियों और भाषाओं को बचाने में असफल रहे, तो आने वाली पीढिय़ाँ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट जाएँगी। यह हमें तय करना होगा कि विकास की इस दौड़ में हम अपनी भाषाई धरोहर को पीछे न छोड़ें। भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में है, और इस विविधता का सबसे सुंदर रूप उसकी बोलियाँ और भाषाएँ हैं। जब कोई भाषा विलुप्त होती है, तो उसके साथ विलुप्त हो जाता है एक पूरा सांस्कृतिक इतिहास। अपनी भाषाई विरासत को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास ही कारगर हो सकता है।


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