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अवैध खनन, अतिक्रमण और गाद ने निकाली बिहार की नदियों की जान
24-Feb-2026 12:57 PM
अवैध खनन, अतिक्रमण और गाद ने निकाली बिहार की नदियों की जान

बिहार में कुछ नदियां या तो बरसाती नदियां बनकर रह गई हैं या फिर धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर हैं. इसका असर पर्यावरण, भूगर्भीय जल और जलीय जीव-जंतु पर भी पड़ रहा है.
 डॉयचे वैले पर मनीष कुमार की रिपोर्ट –

जलवायु परिवर्तन, अतिक्रमण, सरकारी तंत्र की लापरवाही और बेहतर प्रबंधन की कमी से जल संपदा में धनी बिहार की कई नदियों का अस्तित्व खतरे में है. राज्य के जल संसाधन विभाग द्वारा कराई गई नदियों की गणना (जीआईएस सर्वे) में 600 नदियों का पता चला, किंतु इनमें 340 ही अभी ज्ञात हैं. अर्थात 260 नदियां सूख गईं या गाद के चलते भर गईं. कई नदियों की स्थिति ऐसी है कि उनके बहाव क्षेत्र में किसान खेती कर रहे हैं.

दरअसल, प्रदेश का कोई भी इलाका हो, वहां की कई ऐसी छोटी नदियां हैं, जिनमें पानी का प्रवाह केवल बारिश के दिनों में ही रहता है. कई नदियों का स्रोत भी संकट में है, वहां से पर्याप्त पानी नदियों में नहीं आ रहा. विडंबना है कि बाढ़ के दौरान नदियां इतनी लबालब हो जाती हैं कि वे तटबंध तोड़ बड़े इलाके को जलमग्न कर देती है, किंतु महज कुछ माह बाद वही नदियां इतनी सूख जाती है कि लोग उस पर खेती-बाड़ी शुरू कर देते हैं. फिर यही से अतिक्रमण का मार्ग भी प्रशस्त होता है. अत्यधिक गाद (सिल्ट) की वजह से पानी को होल्ड करने या उसे रोकने की क्षमता खत्म होती जा रही है. इस कारण ग्राउंड वाटर लेवल पूरी तरह रिचार्ज नहीं हो पाता है.

खेती के लिए पानी मिलने की चिंता

जलस्तर नीचे जाने से खासकर गर्मी में राज्य के कई हिस्सों में पेयजल की समस्या तो उत्पन्न तो हो ही रही, खेती-किसानी में भी बाधा हो रही. बड़ी संख्या में जल स्रोतों का अस्तित्व ही खत्म हो रहा है. नहरों में भी पानी अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पा रहा. अधिकतर तो सूखी ही रहती हैं. इससे सिंचाई में समस्या आ रही है. इन छोटी जीवनदायिनी नदियों के सूखने या सिकुड़ने का असर पूरे इकोसिस्टम पर पड़ रहा है. आसपास की हरियाली खत्म हो रही है, पेड़-पौधे सूख रहे हैं. वरिष्ठ इंजीनियर व प्रख्यात नदी विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं, ‘‘जब तक पानी का दुरुपयोग नहीं रुकेगा, तब तक नदी-तालाब व कुएं सूखते ही रहेंगे. एक ग्लास पानी के लिए एक बाल्टी पानी की बर्बादी को रोकना होगा, अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पानी की राशनिंग करनी पड़ेगी.''

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पहले कुएं-तालाब से पानी लिया जाता था. इससे ग्राउंड वाटर लेवल में उतनी कमी नहीं आती थी. फिर वाटर मोटर लगा कर पानी की टंकियों का इस्तेमाल आम हो गया, लेकिन इसके साथ ही पानी की बर्बादी भी बढ़ गई. दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं, ‘‘जितनी मात्रा में भूजल का हम दोहन करने लगे, उतनी मात्रा में जल संचयन का उपाय नहीं किया. सरकारी एजेंसियों को सक्रिय होना होगा, ताकि किसी हाल में पानी की बर्बादी नहीं हो. शहरी इलाकों में वाटर सप्लाई को रेगुलेट करने की व्यवस्था करनी होगी तथा ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ाने के उपायों पर सख्ती से अमल करना होगा.'' सब जानते हैं सरकार कहती है कुछ र करती है कुछ. आज से करीब 90 साल पहले नेपाल के बराह क्षेत्र (जहां कोसी जमीन पर उतरती है) में बांध बनाने की योजना बनी थी. यह बांध आज तक बन ही रहा है.

 

2050 तक जल संकट के मुहाने पर होगा बिहार

राज्य सरकार का भी मानना है कि 2050 तक बिहार जल संकट के मुहाने पर खड़ा होगा. बीते 50 वर्षों में बिहार के अधिकतर इलाकों में भूजल का स्तर औसतन तीन गुणा नीचे चला गया है. बीते दिनों बिहार विधान परिषद में जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी ने विभागीय बजट पर चर्चा के दौरान बताया कि विभाग द्वारा कराए गए जीआईएस सर्वे में राज्य में 600 से अधिक नदियों का पता चला है. किंतु, इनमें अभी 340 ही ज्ञात हैं. शेष 260 नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार योजना बना रही है. उन्होंने सदन को बताया कि जल प्रबंधन को लेकर सरकार सजग है.

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गाद के कारण मृत हो रही नदियों को लेकर भी नीति बनाई गई है. चौधरी ने बताया कि आईआईटी, पटना और जल संसाधन विभाग की ओर से कराए गए सर्वे से पता चला है कि जिस तरह से भूजल का दोहन किया जा रहा है, उसके कारण 2050 आते-आते राज्य जल संकट के मुहाने पर खड़ा हो जाएगा. नदी विशेषज्ञ अशोक घोष कहते हैं, ‘‘जब जलस्त्रोत ही नहीं रह जाएंगे या उनका स्वरूप बदलता जाएगा तो उसका सीधा असर ग्राउंड वाटर रिचार्ज और वाटर लेवल पर पड़ना तय है. नदियों के लिए सिल्ट मैनेजमेंट और जल स्रोतों जैसे तालाब, आहर-पईन का अतिक्रमण नासूर बनता जा रहा है.'' सरकार खुद कहती है कि राज्य के कुल 2,62,342 तालाबों में से 17,496 को अतिक्रमित कर लिया गया था. इनमें से पांच को छोड़ सभी को मुक्त कराया जा चुका है. स्थिति को समझा जा सकता है.

सिल्ट से बदल रहा नदियों का स्वभाव

नदियों का जल प्रवाह अविरल बनाए रखने में मानसून की बारिश का अहम योगदान रहता है. घोष कहते हैं, जलवायु चक्र में परिवर्तन के कारण या तो अतिवृष्टि ही हो जा रही या फिर वर्षा के लिए इंतजार ही करना पड़ता है. इसी से नदियां समृद्ध होती हैं. अब जब बारिश ही कम होगी तो इसकी मार छोटी नदियों पर पड़ना तय है. बड़ी नदियों में पानी के साथ सिल्ट भी जमा होता है. यह सिल्ट ही नदियों के स्वभाव को बदल देता है. इससे नदी की धारा भी प्रभावित हो रही है.

नदियों को बांध-बराज व अन्य निर्माण से बांधने की कवायद भी सिल्ट को एकत्रित होने में मदद करती है. पानी का छितराव बड़े एरिया में नहीं होने के कारण काफी हद तक गाद का भी फैलाव नहीं हो पाता है. आज लगभग सभी बड़ी नदियों में सिल्ट जमा है. कई नदियों में मानसून बीतते ही नदियों के बीच बड़े-बड़े मैदान बन जाते हैं. कोसी में गाद जमा होने के कारण सौरा और सहरसा में कोसी की सहायक नदी सुरसर और तिलावे विलुप्त होने की कगार पर है, वहीं जमुई जिले की सिरमनिया व दुहवा अपना अस्तित्व खो चुकी है. बांका जिले में कभी उन्मुक्त होकर बहने वाली ओढ़नी, चांदन और चीर भी अंतिम सांसें ले रहे हैं. राज्य के सभी हिस्सों में बहने वाली सहायक या बरसाती नदियां कमोबेश यह मार झेल रही हैं.

अवैध खनन और अतिक्रमण का भी असर

बड़ी नदियों में अवैध खनन का असर सीधे छोटी नदियों पर पड़ता है. इससे बड़ी नदियों की जलधाराएं विभाजित हो जा रही हैं. इस वजह से सहायक या छोटी नदियों तक पानी ही नहीं पहुंच पाता है. बड़ी नदियों में खनन की वजह से बने गड्ढों के कारण सहायक नदियों का पानी ठहरने की बजाय तेजी से उन गड्ढों में समाहित हो जाता है. जब सहायक नदियों में ही पानी नहीं ठहरेगा तो उसकी धाराएं या छोटी नदियों में पानी कहां से आएगा. अशोक घोष कहते हैं, ‘‘जब तक नदियों के प्राकृतिक रास्तों को खुला नहीं छोड़ा जाएगा, तब तक भूजल का रिचार्ज होना संभव नहीं हो सकेगा. बरसाती नदियां तो वर्षा के जल से ही उफनाती हैं, किंतु सहायक नदियों में जल संकट का होना आने वाली गंभीर समस्या की ओर इशारा करता है.''

अच्छी बात है नदियों से लगातार बालू व मिट्टी की अवैध कटाई के मुद्दे को सरकार ने गंभीरता से लिया है. इस पर कार्रवाई की जा रही है. गाद और अतिक्रमण की वजह से पूर्वी चंपारण जिले की कड़िया, बंगरी, तीयर, धनौती, पसाह, सरिसवा व सिकरहना जैसी नदियां अपना अस्तित्व खोने की कगार पर हैं. कई स्थानों पर अतिक्रमण के कारण इन नदियों की धारा भी प्रभावित हो गई है. रक्सौल निवासी किसान रामेंद्र पांडेय कहते हैं, ‘‘नदियों में जब जल प्रवाह कम रह जाता है या वे सूख जाती हैं या फिर धारा बदल लेती है तो जमीन ऊपर हो जाती है. इसी जमीन को भू-माफिया फर्जी कागजातों के सहारे बेच देते हैं. उदाहरण के लिए, यहां की सरिसवा नदी को देखिए. कैसे नदी की जमीन पर किनारे तक अतिक्रमण हो गया है?' बरबीघा के किसान मनोज सिंह कहते हैं, ‘‘बिहार में माफिया नदी-नाले को भी नहीं छोड़ रहे, जबकि यह सरकारी जमीन है. लखीसराय की किउल और हरोहर का हाल किसी से छिपा नहीं है. पता नहीं, ये माफिया राज्यभर में कितने जल स्त्रोतों को निगल गए.''

पत्रकार शांभवी सिंह कहती हैं, ‘‘हम नदियों को उनका अधिकार तो दे ही नहीं रहे, बल्कि दोहन करने के साथ-साथ उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश में समस्याएं खड़ी करते जा रहे. इसी वजह से इन जीवनदायिनी नदियों को अब खुद के जीवन की तलाश है.''


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