विचार / लेख
-डॉ. परिवेश मिश्रा
ठीक एक साल पहले एक तीस वर्षीय महिला रेल इंजन ड्राइवर (नाम परिवर्तन से पद के महिमामंडन के इस युग में उन्हें लोको पायलट कहा जाता है) महारानी कुमारी की मृत्यु हो गयी थी। वे अपनी मालगाड़ी बीच की पटरी पर खड़ी कर मालदा स्टेशन के टॉयलेट में अपने नित्य कर्म से फ़ारिग होने के बाद पटरियाँ पार कर इंजन की ओर लौट रही थीं कि एक दूसरी ट्रेन उनके शरीर के चीथड़े करते हुए ऊपर से गुजऱ गई।
भारत में आने के एक सौ सत्तर साल बाद इंजन ड्राइवर को अब तक इंजन में टॉयलेट नहीं मिला है। सरकार के लिए इस तथ्य की स्वीकारोक्ति का मुद्दा हमेशा असुविधाजनक रहा है। इंजन में टॉयलेट न होने और इससे उत्पन्न परेशानियों वाली बातों पर हमेशा ढक्कन लगाने का प्रयास किया गया। रेल श्रमिक संगठनों की मांगों में यह मुद्दा सदा शामिल रहने के बावजूद कभी प्रचार नहीं पा सका।
जब तक इंजन भाप से चलाये जाते थे ड्राइवरों के लिए काम की स्थिति कहीं अधिक कष्टदायक थी। एक ओर भ_ी की आग दूसरी ओर दो पड़ावों के बीच टॉयलेट की ज़रूरत को टालने के लिये पानी कम पीने की ओढ़ी गई आदत।
1985 के आसपास भारतीय रेल से भाप वाले इंजनों की बिदाई हो गयी। डीज़ल और बिजली के इंजन आ गए। ये इंजन बाहर से देखने पर आधुनिक और ख़ूबसूरत दिखते हैं। किन्तु टॉयलेट अब भी नहीं मिला। पहले की अपेक्षा रेलगाडिय़ों अधिक तेज और अधिक दूरी तक चलती हैं। दो स्टेशनों के बीच के सफऱ की न केवल अवधि बढ़ी है, स्टेशनों में ठहराव का समय भी कम हुआ है। रेलगाड़ी के समय पर चलने का दबाव बढ़ा है। विशेषकर मालगाडिय़ों पर। ऐसे अनेक अवसर आ चुके हैं जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाने पर ड्राइवर ने गाड़ी को बीच राह, बीच पटरी रोका, ब्रेक लगाया, डेटोनेटर फि़ट किया, गार्ड को चेताया और फ़ारिग होने चले गये। डेटोनेटर बड़े पटाखे या बम की आवाज़ करने वाले बारूद जैसी चीज़ होती है जिसे चमड़े के पट्टे की मदद से पटरी पर बाँधा जाता है। आमतौर पर ट्रैक पर खड़ी ट्रेन की दोनों दिशाओं में कुछ दूरी पर। इस उम्मीद पर कि अचानक आने वाली किसी ट्रेन का पहिया जैसे ही इस पर पड़ेगा, उसके वजन से फटने वाला यह डेटोनेटर अपनी तेज आवाज़ से ड्राइवर को चेतावनी देगा।
ड्राइवरों के फ़ारिग होने की ऐसी तरकीबें ट्रेनों के विलंब का कारण और एक्सीडेंट का खतरा बनती रही हैं। ऐसे मामलों की जांच का प्रावधान है सो डिविजऩ स्तर पर विलम्ब के कारणों की जांच भी होती हैं। किंतु अब तक की ऐसी सभी जांच रिपोर्टों में देरी को ‘मानवीय कारणों से’ करार दिया जा कर मामलों को रफा-दफा किया गया है। एक जांच रिपोर्ट में लिखा गया-‘यह ठहराव किसी परिचालन लापरवाही के कारण नहीं था, बल्कि स्वच्छता सुविधाओं के अभाव में अत्यधिक लंबी ड्यूटी अवधि के दौरान उत्पन्न हुई अपरिहार्य मानवीय आवश्यकता के कारण हुआ।’
वंदे भारत युग से लगभग सौ साल पहले - सन 1928 के सितम्बर में - भारत में एक ट्रेन चली थी। फ्ऱंटियर मेल। बम्बई से दिल्ली, लाहौर और रावलपिंडी होते हुए पेशावर तक। लगभग अड़तालीस घंटों का सफर एक तरफ का होता था। 1930 में लंदन से प्रकाशित होने वाले ‘द टाइम्स’ ने फ्ऱंटियर मेल को ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे तेज़ रेलगाड़ी बताया था। यह भारत की पहली ट्रेन है जिसमें ‘एयर कंडीशंड’ डिब्बे लगाए गए थे। हालाँकि तकनीकी रूप से यह एयर कूलिंग ही थी। बफऱ् की सिल्लियां कोच में रखी जाती थीं।
नॉर्मा प्रोबर्ट उस महिला का नाम था जिनके पिता पर्सीवल मिडिलकोट उस शुरुआती दौर में फ्ऱंटियर मेल में इंजन ड्राइवर थे। नॉर्मा प्रोबर्ट इंग्लैण्ड में बस गई थीं और वहीं उनकी मृत्यु हुई। भारत में राजेन्द्र अकलेकर ने जब भारतीय रेल पर पुस्तक ‘हॉल्ट स्टेशन इंडिया’ लिखी तो नॉर्मा प्रोबर्ट का पत्राचार के द्वारा इंटरव्यू लिया और उनके बचपन के साथ साथ ट्रेन तथा ड्राइवर पिता के बारे में जानकारी ली।
फ्ऱंटियर मेल में अधिकांश पैसेंजर रास्ते में पडऩे वाले स्टेशनों के अलावा ख़ैबर दर्रे से/तक इंग्लैंड जाने और इंग्लैण्ड से आने वाले ब्रिटिश फ़ौज के सैनिक और अधिकारी होते थे। इनके अलावा आम नागरिक भी।
इंजन ड्राइवरों के साथ एक असिस्टेंट होता था जो स्टेशन पर गाड़ी के खड़े होने के दौरान प्लेटफार्म पर भाग-दौड़ कर आवश्यक सामान लाना, संदेश लाना/पहुँचाना जैसे कार्य करता था। सौ साल पहले की वह रेल समय पर अपने स्टेशन पर पहुँचने के मामले में घड़ी की सुई की तरह पाबंद थी। ड्राइवर के लिए इंजन में टॉयलेट तब भी नहीं थे। आवश्यकता पडऩे पर दो स्टेशनों के बीच ड्राइवर साथ के सवारी कोच के टॉयलेट का इस्तेमाल करते थे। और टॉयलेट की कमी कभी रेल के विलंब से चलने का कारण नहीं बन पाती थी।
नॉर्मा प्रोबर्ट ने अपनी एक यात्रा को याद कर बताया उन दिनों डिब्बे आपस में जुड़े हुए नहीं होते थे। पिता ड्राइवर थे इसलिए उन्हें अपने परिवार की सालाना यात्रा के लिए पात्रता के आधार पर छह बर्थ का जो एक डिब्बा मिला था उसमें एक हिस्सा सामान रखने के लिए था। ‘लेदर’ लगी हुई बर्थ में बैक-रेस्ट थे जिन्हें रात में नीचे गिरा कर सोने के लिए चौड़ा और नरम बिस्तर बनाया जा सकता था (सौ साल पहले भी वे कुछ नया नहीं कर पाए थे)। बफऱ् की सिल्लियाँ तो थी ही, बिजली से चलने वाले छह पंखे और इन छह सवारियों के लिए एक स्वतंत्र टॉयलेट।
भोजन के लिए पूरी वर्दी में सजा बेअरा एक नियत स्टेशन पर ट्रेन (कम्पार्टमेंट) में सवार होकर ऑर्डर लेता और अगले स्टेशन पर उतर कर स्टेशन मास्टर के वायरलेस का उपयोग कर संदेश आगे भेजता जहां पहुँचने पर एक दूसरा वर्दीधारी बेयरा, कभी-कभी अपने साथी बेयरा के साथ, क्रॉकरी और चांदी की कटलरी के साथ सभी सवारियों के ऑर्डर के अनुसार भोजन की अलग-अलग डिश लेकर सवार होता। भोजन के बाद वह बेयरा अगले स्टेशन पर उतर जाता।
ब्रिटिश भारत में रेलवे का विकास मुख्य रूप से कच्चे माल के परिवहन, सैनिक आवागमन और राजस्व और प्रशासनिक नियंत्रण के उद्देश्य से हुआ था। ये सारे अनुभव नॉर्मा प्रोबर्ट के हैं जो उन्होंने एक इंजन ड्राइवर के साथ, उनके परिवार के सदस्य के रूप में यात्रा करते समय हासिल किए थे। माना कि उस काल में भारतीय रेल में इंजन ड्राइवर का पद किसी लिखित नियम के बग़ैर भी अंग्रेजों और/या एंग्लो इंडियन्स के लिए आरक्षित मान लिया जाता था। और यह भी माना कि रेल अंग्रेजों की थी सो रेल अंग्रेज़ ड्राइवर की सुविधा का भरपूर ध्यान रखा गया। यह भी माना कि पीछे जुड़े सवारी डिब्बे के टॉयलेट का लाभ अब भी उपलब्ध है। किंतु यह बात सिफऱ् सवारी गाड़ी पर लागू होती है। मालगाड़ी पर नहीं।
अब तो रेल भारतीयों की है। अब भारतीय इंजन ड्राइवर की सुविधा का ध्यान क्यों नहीं रखा जाता है? श्रम-इतिहास के दृष्टिकोण से देखें तो खदान मज़दूरों, फैक्ट्री वर्कर्स, और समुद्री नाविक के अधिकार संघर्षों से, जहाँ कार्यस्थल पर शौचालय को अंतत: मूल अधिकार माना गया, भारतीय रेल में यह प्रश्न अनदेखा किया गया। समस्या तकनीकी नहीं बल्कि प्राथमिकता और दृष्टिकोण की है।
आज़ादी के बाद से तिहत्तर सालाना बजट, चौदह अंतरिम बजट, और चार विशेष या मिनी बजट संसद में पेश किए जा चुके हैं। हर बार नये आकर्षक नामों के साथ नई ट्रेनों की घोषणाओं के बीच रेल इंजन में टॉयलेट को अपनी बारी का इंतज़ार जारी है।


