विचार / लेख

रायपुर : 22 जनवरी 1858
01-Feb-2026 1:05 PM
रायपुर : 22 जनवरी 1858

-अपूर्व गर्ग

छत्तीसगढ़ को अलग प्रदेश बने हुए पच्चीस बरस ज़रूर हो गए पर अब भी छत्तीसगढ़ के इतिहास पर बड़े पैमाने पर रिसर्च और ऐतिहासक तथ्यों की छानबीन होनी चाहिए .

यही नहीं जनता के बीच सही ऐतिहासक तथ्य जाएँ ऐसे भी बड़े प्रयास हों .

सोनाखान के ज़मींदार शहीद क्रांतिकारी वीर नारायण सिंह पर अब चर्चा होने लगी पर अभी लम्बा सफर तय करना है .

सबसे दुःखद है आज भी शहीदों ,क्रांतिकारियों को लेकर सूचनाएँ और अध्ययन अपर्याप्त है .

कभी कहीं पढ़ने को मिलता है शहीद वीर नारायण को तोप से उड़ा दिया गया था या जयस्तंभ चौक पर फाँसी दी गयी या फांसी के बाद तोप से उड़ा दिया गया . ये बात भी सामने आयी कि उनकी गलत तस्वीर का प्रकाशन हुआ था .

ये भी पढ़ने में आया कि उन्हें तत्कालीन जेल के बाहर फांसी दी गयी थी . तथ्य ये है कि 1857 के दौरान जेल तो घडी चौक के आस-पास थी , अब विचार करिये .

छत्तीसगढ़ के इतिहासकार रमेन्द्रनाथ मिश्र जी ने कहा है :

-रमेंद्रनाथ मिश्र कहते हैं कि शहीद वीर नारायण सिंह को लेकर अविभाजित मध्यप्रदेश में भी जानकारी उपलब्ध कराई गई है. बावजूद उसके डाक विभाग ने सुधार नहीं किया है. शहीद वीर नारायण सिंह को लेकर भारतीय अभिलेखागार में भी तमाम दस्तावेज उपलब्ध हैं. लेकिन इससे पहले के इतिहासकारों ने गलती की है. भारतीय डाक विभाग की ओर से जारी किए गए डाक टिकट में वीर नारायण सिंह की जगह किसी किसान की तस्वीर लगा दी गई है. जिसमें किसान को तोप में जंजीर से बांधकर दिखाया गया है. जबकि वीर नारायण सिंह को लेकर अंग्रेज सरकार की ओर से लिखे गए तमाम पत्र भी मौजूद हैं. इसमें साफ तौर पर उल्लेख है कि वीर नारायण सिंह को सेंट्रल जेल के बाहर क्रांतिकारियों की मौजूदगी में फांसी की सजा दी गई थी.[स्रोत -ETV प्रकाशित रिपोर्ट]

-रमेंद्रनाथ बताते हैं कि शहीद वीर नारायण सिंह को तोप से नहीं उड़ाया गया था. बल्कि उन्हें फांसी दी गई थी. पत्र क्रमांक 286 जो कि 10 दिसंबर 1857 को अंग्रेज अफसरों ने लिखा था, इसमें बताया गया है कि 10 दिसंबर 1857 को वीर नारायण सिंह जो सोनाखान का जमींदार था, उसे सभी अधिकारियों और सेना के सामने फांसी पर लटका दिया. [ स्रोत- ETV प्रकाशित रिपोर्ट ]

अब आता हूँ इसी से जुड़े दूसरे ज़रूरी मुद्दे पर . अंग्रेजों ने 10 दिसंबर 1857 को जब वीर नारायण सिंह को फांसी दी ,उस वक़्त बड़ी संख्या में दूसरे सैनिक भी मौजूद थे . वे डरे नहीं बल्कि उन्होंने इसका बदला लेने की ठानी .

विकिपीडिया के हवाले देखिये -

हनुमान सिंह भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी थे जिनको 'छत्तीसगढ का मंगल पाण्डे' कहा जाता है। 18 जनवरी 1858 को उन्होंने सार्जेंट मेजर सिडवेल की हत्या कर दी थी जो रायपुर के तृतीय रेजीमेंट का फौजी अफसर था।

रायपुर में उस समय फौजी छावनी थी जिसे 'तृतीय रेगुलर रेजिमेंट' का नाम दिया गया था। ठाकुर हनुमान सिंह इसी फौज में मैग्जीन लश्कर के पद पर नियुक्त थे। सन् 1857 में उनकी आयु 35 वर्ष की थी। विदेशी हुकूमत के प्रति घृणा और गुस्सा था। रायपुर में तृतीय रेजीमेंट का फौजी अफसर था सार्जेंट मेजर सिडवेल। दिनांक 18 जनवरी 1858 को रात्रि 7:30 बजे हनुमान सिंह अपने साथ दो सैनिकों को लेकर सिडवेल के बंगले में घुस गए और तलवार से सिडवेल पर घातक प्रहार किये। सिडवेल वहीं ढेर हो गया।

हनुमान सिंह के साथ तोपखाने के सिपाही और कुछ अन्य सिपाही भी आये। उन्हीं को लेकर वह आयुधशाला की ओर बढ़े और उसकी रक्षा में नियुक्त हवलदार से चाबी छीन ली। बंदूकों में कारतूस भरे। दुर्भाग्यवश फौज के सभी सिपाही उसके आवाहन पर आगे नहीं आये। इसी बीच सिडवेल की हत्या का समाचार पूरी छावनी में फैल चुका था। लेफ्टिनेंट रैवट और लेफ्टिनेंट सी.एच.एच. लूसी स्थिति पर काबू पाने के लिये प्रयत्न करने लगे। हनुमान सिंह और उसके साथियों को चारों ओर से घेर लिया गया।

हनुमान सिंह और उसके साथ छः घंटों तक अंग्रेजों से लोहा लेते रहे। किन्तु धीरे-धीरे उनके कारतूस समाप्त हो गये। अवसर पाकर हनुमान सिंह फरार होने में सफल हो गये। किन्तु उनके 17 साथियों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया।

इसके बाद हनुमान सिंह कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं लगे। 22 जनवरी 1858 को उनके साथी क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई, जिनके नाम हैं: शिवनारायण, पन्नालाल, मातादीन, ठाकुर सिंह, बली दुबे, लल्लासिंह, बुद्धू सिंह, परमानन्द, शोभाराम, गाजी खान, अब्दुल हयात, मल्लू, दुर्गा प्रसाद, नजर मोहम्मद, देवीदान, जय गोविन्द...

अब ज़रा सोचिये ,

वीरनारायण सिंह की फांसी ही नहीं उसके बाद इन बहादुर क्रांतिकारी सैनिकों की फांसी भी रायपुर में ही हुई .

क्या हमारा शहर कभी 22 जनवरी के महान बलिदान के दिन को याद रखता है ?

क्या प्रदेश की अब तक की सभी सरकारें 22 जनवरी को जिस दिन 17 वीरों को इसी शहर में फांसी पर लटकाया गया उसे वैसा महत्त्व देता है ?

हनुमान सिंह कौन थे ? आखिर कहाँ चले गए थे ? ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों की क्या छानबीन हुई ?

शहीद वीर नारायण सिंह के बाद जिन 17 वीरों को फाँसी दी गयी ,वे कौन लोग थे ?

हज़ारों -लाखों साल पहले की घटनाओं , कहानियां सुनने वाले अपने शहर के ऐसे महान क्रांतिकारी इतिहास से अपिरिचित क्यों हैं ?


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