विचार / लेख

दुश्मन हों हमारे दुश्मन...
31-Jan-2026 10:22 PM
दुश्मन हों हमारे दुश्मन...

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

‘आज मैं आपको पश्चिम में फैले रेगिस्तान में बने प्राचीनतम पिरामिड को दिखाने ले जा रही हूँ जो सक्कारा में स्थित है।’ हमारी गाइड ने बताया।

सक्कारा नील नदी के पश्चिम में है जो मिस्र की राजधानी काहिरा से लगभग 20 किलोमीटर के दूरी पर है। यहां के पिरामिड का प्रवेश-द्वार चूना-पत्थर से बना हुआ, दस मीटर ऊंचा यह द्वार चिकना और अत्यंत आकर्षक है। अंदर हम घूम-घूम कर उसकी दीवारें देख रहे थे, मोबाइल से तस्वीरें ले रहे थे, तभी एक खूबसूरत लडक़ी हमारे सामने पड़ी। हम लोग एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए। उसने हमसे पूछा- ‘आप कहाँ से आए हैं ?’

‘अरे, आप हिन्दी जानती हैं ? हम लोग भारत से आए हैं।’ मैंने उत्तर दिया और पूछा- 'आप कहाँ से आई हैं ?’

‘हम आपके दुश्मन हैं, पाकिस्तान से हूँ।’ उसकी आवाज़ में थोड़ा तल्खी, थोड़ी मुस्कान और थोड़ी जिज्ञासा थी।

‘अरे, हम आपके दुश्मन कैसे हो गए ? दुश्मन हों हमारे दुश्मन।’ मैंने कहा। मेरी बात सुनकर वह खुश हो गई। उसने चेहरे में प्रसन्नता के अद्भुत भाव उभर गए। वह बोली- ‘सच में ?’

‘हां, सच में। हमारी-तुम्हारी क्या दुश्मनी ?’

‘आप सही कह रहे हैं, हम दोनों में कैसी दुश्मनी ?’

‘तुम्हारा नाम क्या है ?’

‘मेरा नाम इसरा है, मेरे पापा आगरा के हैं और मम्मी सहारनपुर की।’

‘ऐसा क्या ?’

‘हूँ।’ वह खुशी में झूम रही थी।

‘तुम्हारी शादी हो गई क्या ?’

‘अभी नहीं, कुछ दिन और जी लूँ।’

‘अरे, क्या शादी के बाद जि़ंदगी नहीं होती ?’

‘सुना है, जि़ंदगी होती है लेकिन जि़ंदादिली नहीं होती।’ वह बोली।

‘तुम्हारी फोटो ले लूँ ?’ मैंने पूछा।

‘श्योर।’ उसने मुस्कान फेंकी और मिस्र की यात्रा में पहली मिसरी के डली हमारे मुंह में घुल गई।

प्तयह चित्र पाकिस्तानी युवती इसरा का है जो हमें मिस्र में मिली।


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