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बंगाल के जूट मिलों में बंदी ने बढ़ाई छत्तीसगढ़ के किसानों की मुसीबत
08-Dec-2020 3:34 PM
बंगाल के जूट मिलों में बंदी ने बढ़ाई छत्तीसगढ़ के किसानों की मुसीबत

आवेश तिवारी की विशेष रिपोर्ट-

छत्तीसगढ़ में सरगुजा के किसान सूरज ध्रुव की निगाह बार बार आसमान पर जा टिकती है! आसमान पर बादल छाये हैं नीचे खेतों में धान पड़ा है ।  देश भर में लॉकडाउन के दौरान जूट मिलों पर छाये संकट ने अब देश भर में धान के किसानों के लिए अभूतपूर्व संकट की स्थिति पैदा कर दी है । इसका सबसे ज्यादा असर छत्तीसगढ़ पर पड़ा है, जहाँ धान की खरीदी शुरू हुए एक सप्ताह से ज्यादा का समय बीत चुका है  लेकिन बारदाने यानि की बोरे की कमी की वजह से धानखरीदी पर भारी संकट बना हुआ है । गौरतलब है राज्य में हर वर्ष  आमतौर पर राज्य में 15 नवम्बर से धान की खरीदी शुरू हो जाती है । एक तो देरी दूसरी बारिश का डर किसानों के साथ साथ राज्य सरकार के लिए भी गहरी  चिंता का सबब बन गया है । अब मरता क्या न करता, भूपेश सरकार तमाम सोसायटीज में प्लास्टिक के बारदाने भिजवा रही है । राज्य के  हाल ही में सेवानिवृत हुए पूर्व मुख्य सचिव आर पी मंडल स्वीकारते हैं कि प्लास्टिक के बारदानों से नुकसान तो होगा मगर और कोई विकल्प नहीं है । संकट की इस घडी में  यह सवाल बार बार खड़ा हो रहा है कि कोरोना के विश्वव्यापी संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने पहले से ही जूट कंपनियों से अधिकाधिक उत्पादन क्यों नहीं लिया? एवं इस संकट की घड़ी में अपने हाथ क्यों खड़े कर दिए हैं ? 

केंद्र ने खड़े किये हाथ राज्य सरकार बेबस 
बारदाने की कमी को लेकर छत्तीसगढ़  सरकार द्वारा पिछले तीन माह से  केंद्र को इसको लेकर केंद्र को बार बार पत्र लिखा गया है  मगर नतीजा अब तक  सिफर रहा है । रायपुर सहकारी बैंक की अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर हैं कहती है कि पहले तो एक महीने पहले ही बारदाने मिल जाते थे लेकिन इस खरीदी सीजन में अब तक पूरे बारदाने नहीं मिले हैं। राज्य सरकार खुद मान रही है कि बारदाने की कमी की वजह से इस बार धान की खरीदी में थोडा विलम्ब हुआ है। आलम यह है कि सरकार ने पीडीएस और मध्यान्ह भोजन के बारदाने के इस्तेमाल के लिए भी इजाजत दे दी है । प्लास्टिक के बारदाने के इस्तेमाल को लेकर जानकारों का कहना है कि ऐसा हुआ तो खतरनाक होगा क्योंकि प्लास्टिक के बोरे में रखे गए धान नमी की वजह से मिलिंग के लिए मुसीबत बन सकते हैं ।  सरकार का कहना है कि भारत सरकार से राज्य सरकार ने साढ़े 3 लाख बारदाने की जरुरत बताई थी। जबकि केंद्र से राज्य सरकार को फिलहाल 1 लाख 43 हजार बारदाना दिए जाने का आश्वासन दिया ,जिसमे से अभी भी पूरे बारदाने नहीं मिल पाए हैं । 

बंगाल में जूट मिलों का हल बेहाल 
दरअसल छत्तीसगढ़ में बारदाने की कमी यह पूरी कहानी का सिरा कहीं न कहीं पश्चिम बंगाल से जुड़ता है भारत के जूट उद्योग में पश्चिम बंगाल का प्रथम स्थान है। देश के कुल 83 जूट कारखानों में से 64 यहीं स्थापित लेकिन कोरोना संकट की वजह से पिछले कई महीनों से बंद  यहाँ की ज्यादातर मिलों में कामकाज शुरू नहीं हो पाया है । इन मिलों में काम करने वाले छत्तीसगढ़ के मजदूर भी अभी वापस अपने कारखानों तक नहीं पहुंचे हैं वहीँ बिहार विधानसभा चुनाव और इसके पूर्व  लॉक डाउन से जुड़ी त्रासदी झेलने वाले  बिहार के  मजदूर अब भी वहां जाने से कतरा रहे हैं  यह असर केवल बंगाल तक नहीं है इसके अलावा अन्य राज्यों में भी जूट के कारखानों पर कोरोना का भयावह असर पड़ा है । नतीजा यह है कि देश भर में बारदाने का उत्पादन और सप्लाई दोनों  बुरी तरह से प्रभावित हुई है । जानकारी मिली है कि  बीते 14 अप्रैल को केंद्रीय टेक्सटाइल मंत्रालय ने बंगाल सरकार को कहा था कि वह 18 जूट मिलों में बारदानों का उत्पादन शुरू करें लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि सिर्फ 18 जूट मिलों के बजाय सभी जूट मिलों में 15 फीसदी मजदूरों के साथ 20 अप्रैल से उत्पादन शुरू करने की अनुमति दे दें न तो टेक्सटाइल मिनिस्ट्री ने इजाजत दी और न ही उत्पादन शुरू हो पाया । कुछ मिलों में उत्पादन शुरू भी हुआ है तो वो बहुत कम है। 

खरीदी केन्द्रों पर बारदानों का टोटा
राज्य में बारदाने की कमी की वजह से हाल किस कदर खराब है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बलरामपुर जिले के 39 समिति में 32 हजार 472 किसानो का 44 हजार 758 हेक्टेयर में लगे धान को बेचने के लिए लगभग 37 लाख बारदाने की जरूरत है लेकिन  वर्तमान में जिले में 20 लाख बारदाना की उपलब्धता है दुर्ग में 75 लाख क्विंटल धान की खरीदी का विभाग अनुमान लगा रहा है। इसके लिए एक करोड़ 80 लाख बारदाने की जरूरत पड़ेगी। लेकिन विभाग को महज 21 लाख नए बारदाने मिल पाए हैं । कमोवेश सभी जिलों में एक जैसे हाल हैं। 

शुरू हुई राजनीति 
बारदाने की कमी के बीच राजनैतिक दांवपेंच भी शुरू हो गए हैं नेता प्रतिपक्ष धरमलाल  कौशिक ने पिछले दिनों  सूरजपुर जिले के बसदई धान खरीदी केंद्र की फोटो ट्वीट की है। कौशिक करीब सप्ताहभर पहले वहां गए थे। कौशिक ने फोटो के साथ लिखा है कि धान खरीदी केंद्र में बदहाल बारदाना, खुद ही वहां की कहानी बयां कर रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि राज्य में विपक्षी पार्टी ने केंद्र को एक बार भी पत्र लिखकर ज्यादा से ज्यादा बारदानों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने को नहीं कहा है । धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में समूची राजनीति धान के ही इर्द गिर्द घुमती रहती है । कांग्रेस द्वारा 25 सौ रुपये समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की घोषणा ने उसे विधानसभा चुनाव में विजय दिलाई दी थी । अब जबकि सरकार अपने दो साले पूरे होने का जलसा मनाने जा रही है किसानों की मेहनत से उपजाए धान पर बारदाने की कमी और बारिश का असर न पड़े यह जिम्मेदारी एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। वो भी तब जब केंद्र के कृषि कानूनों का खुला विरोध करके मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि हम किसी भी कीमत पर किसानों के हितों की अनदेखी नहीं होने  देंगे।


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