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दिन रात की डिलीवरी न ले ले ड्राइवरों की जान
08-Nov-2020 6:39 PM
दिन रात की डिलीवरी न ले ले ड्राइवरों की जान

-लौरा बिकर

सूरज निकलने में एक घंटा बाक़ी था, किम को काम करते-करते 21 घंटे हो चुके थे. वो 400 पैकेज डिलीवर कर चुके थे. 36 साल के डिलीवरी ड्राइवर किम सुबह पांच बजे से काम कर रहे थे. उन्होंने एक सहकर्मी को संदेश भेजा और डिलीवरी के अगले राउंड को ना करने की अनुमति मांगी.

उन्होंने संदेश में लिखा, "ये काम बहुत ज़्यादा है, मैं कर नहीं पा रहा हूं."

चार दिन बाद किम की मौत हो गई. यूनियन के अधिकारियों के मुताबिक़ वो उन चौदह लोगों में से एक हैं जिनकी जान अधिक काम करने की वजह से गई. इनमें से अधिकतर डिलीवरी ड्राइवर हैं.

इन सभी चौदह ड्राइवरों को मौत को सीधे तौर पर अधिक काम से नहीं जोड़ा जा सकता है लेकिन उनके परिजनों का कहना है कि उनकी मौत अधिक काम की वजह से अचानक दिल का दौरा पड़ने से हुई है. दक्षिण कोरिया में कोविड महामारी के दौरान डिलीवरी का काम बढ़ा है और ड्राइवर इसे पूरा करने में संघर्ष कर रहे हैं. जैसे-जैसे पैकेज का ढेर बढ़ता है, ड्राइवरों पर दबाव बढ़ता है.

जान गंवाने वाले ड्राइवरों में 27 साल के जांग डियोक जिन भी शामिल हैं. 18 महीने की नाइट शिफ़्ट करने के बाद उनका पंद्रह किलो वज़न घट गया था. वो ताइक्वांडो के शौकीन थे. डियोक दिन और रात भर की ड्यूटी करने के बाद सुबह छह बजे घर पहुंचे और सीधे नहाने चले गए. एक घंटे बाद उनके पिता को बाथटब में उनका शव मिला. उनका चेहरा लटका नीचे झुका हुआ था.

उनके पिता कहते हैं, "हम उस बच्चे को बहुत प्यार करते थे. जब वो कहता था कि काम बहुत ज़्यादा है तो हम उससे कहते थे कि काम छोड़ देने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन वो कहता था कि उसकी भविष्य को लेकर कुछ योजनाएं हैं. मैं अब उसे इतना ज़्यादा काम करने से रोकने में नाकाम रहने पर अपने आप को ही ज़िम्मेदार मानता हूं."

मिस्टर जांग इतने ग़ुस्से में थे कि दक्षिण कोरिया की संसद में ही चले गए. वो संसद सदस्यों के पैरों में गिर गए और कर्मचारी किन हालातों में काम कर रहे हैं इस पर ग़ौर करने की गुहार लगाते रहे.

उन्होंने कहा, "वो मेरा बेटा था जो मर गया. मैं पूरी दुनिया को इस बारे में बताउंगा. मैं इसकी जड़ में जाकर रहूंगा."

डियोक जिन और दूसरे ड्राइवरों के मामलों पर राष्ट्रपति मून जे इन का भी ध्यान गया. उन्होंने ड्राइवर जिन हालातों में काम करते हैं उन्हें बदलने का आह्वान किया. राष्ट्रपति ने कहा कि ड्राइवरों ने महामारी के दौरान सबसे मुश्किल वक़्त देखा है.

दक्षिण कोरिया में डिलीवरी ड्राइवरों पर दबाव बहुत ज़्यादा होता है क्योंकि यहां सामान की होम डिलीवरी दिनों के बजाए घंटों में की जाती है.

'हम जीना चाहते हैं'

अगस्त में दक्षिण कोरिया के श्रम मंत्रालय ने दख़ल दिया और कंपनियों से ये सुनिश्चित करने के लिए कहा कि ड्राइवरों को पर्याप्त आराम मिले. साथ ही वो निरंतर नाइट शिफ़्ट ना करें. देश की तीन बड़ी कंपनियों सीजे लॉजिस्टिक्स, कौपांग और हानजिन ट्रांस्पोर्टेशन ने कर्मचारियों की मौत के लिए सार्वजनिक माफ़ी तक मांगी.

सीजे लॉजिस्टिक्स ने कहा कि वो अधिक संख्या में ड्राइवरों को नौकरी पर रखेगी और ड्राइवरों को इंडस्ट्रियल एक्सीडेंट इंश्योरेंस देगी. कौपांग ने कहा कि वो भी अधिक कर्मचारियों को नौकरी पर रख रही है. कंपनी ने ये भी कहा कि ये क़दम पर्याप्त नहीं है. वहीं हानजिन ट्रांपोर्टेशन ने कहा कि वो कर्मचारियों पर काम का भार कम करेगी.

लेकिन अधिकतर कर्मचारी ऐसे ठेकों पर काम करते हैं जो बीच में छोटी कंपनियों ने लिए होते हैं. ऐसे में वो श्रम क़ानूनों के दायरे से बाहर रहते हैं. यूनियन नेताओं का कहना है कि कंपनियों ने जिस संख्या में कर्मचारी बढ़ाने का वादा किया था वो अभी पूरा नहीं हुआ है.

दुनियाभर के विकसित देशों में महामारी के दौरान होम डिलीवरी सामान्य बात हो गई है और ड्राइवरों को इसकी क़ीमत चुकानी पड़ रही है. कोरोना वायरस की वजह से लोग इंटरनेट पर शॉपिंग अधिक कर रहे हैं. दक्षिण कोरिया में हर साल होम डिलीवरी दस प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. लेकिन इस साल अब बीस प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो चुकी है. ऑनलाइन शॉपिंग करते वक़्त कोई इंसानी संपर्क नहीं होता लेकिन इंसान ही इस शॉपिंग को पूरा करते हैं.

बीते सप्ताह मैंने सियोल के बाह एक वेयरहाउस का दौरा किया ये किसी एयरक्राफ्ट हैंगर के बराबर था. यहां कई सौ कर्मचारी काम करते हैं. लोटे ग्लोबल लॉजिस्टिक्स के लिए काम करने वाले ये कर्मचारी बेहतर सुविधाओं और अधिक वेतन की मांग को लेकर हड़ताल पर थे. वो नारा लगा रहे थे, "हम जीना चाहते हैं."

48 साल के किम डुक योन ने अपने परिवार को ये नहीं बताया है कि वो हड़ताल पर हैं क्योंकि उनके घर में एक दिन की छुट्टी पर जाने की गुंजाइश नहीं है.

"पहले मुझे लगता था कि ये काम सिर्फ़ भारी है लेकिन इस साल जब अधिक संख्या में लोग ऑनलाइन शॉपिंग कर रहे हैं, हालात और ज़्यादा ख़राब हो गए हैं. अधिक काम करते हुए मुझे ये लग रहा था कि मैं काम करते हुए ही मर जाऊंगा."

डुक योन रोज़ाना सुबह साढ़े छह बजे काम पर आते हैं और चार पांच घंटे का समय उन्हें पैकेजों को व्यवस्थित करने में ही लग जाता है. इसके बाद वो डिलीवरी के लिए निकलते हैं. वो किसी जिगसॉ पहेली की तरह छोटे-बड़े पैकेटों को डिलीवरी ट्रक में रखते हैं. छोटे-बड़े डिब्बों को खाली जगह में रखते हैं. कोई भी पैकेज छूटना नहीं चाहिए.

ड्राइवरों का कहना है कि उन्हें एक पार्सल की डिलीवरी के लिए 800 कुरियन वोन यानी लगभग पचास रुपए मिलते हैं. आजकल वो रोज़ाना 350 पार्सल तक डिलीवर कर देते हैं. उन्हें पैकेज को गाड़ी में रखवाने वाले मज़दूरों को अपने पास से पैसे देने पड़ते हैं. साथ ही डिलीवरी देरी से होने पर हर्जाना भी देना होता है.

मेरे डीपो का दौरा करने के एक दिन बाद लोटे ग्लोबल ने कर्मचारियों के साथ समझौता करके विवाद का निपटारा कर लिया. कंपनी ने एक हज़ार अतिरिक्त कर्मचारी तैनात करने और हर्ज़ाने की व्यवस्था को ख़त्म करने का वायदा भी किया है.

43 साल के शिन बोक सुन तीन बच्चों की मां हैं. वो कहती हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब काम इतना कम होगा कि वो रात में अपने बच्चों से मिल सकेंगी.

वो कहती हैं, "हमारे ऊपर बहुत ज़्यादा दबाव है. ऐसे ग्राहक भी हैं जो ग्रोसरी ऑर्डर करते हैं और बार-बार फ़ोन करके शिकायत करते हैं कि उन्हें ऑर्डर किए गए सामान से जल्द ही खाना बनाना है. अगर डिलीवरी सही समय पर नहीं होती तो बहुत से ग्राहक फ़ोन करके कहते हैं कि उन्हें ये कपड़ा पहनकर आज ही बाहर जाना था, अब दोपहर में डिलीवर होने पर वो इसका क्या करेंगे?"

हालांकि डिलीवरी कर्मचारियों की मौत के दक्षिण कोरिया के लोगों पर असर होने के संकेत भी हैं. कुछ अपार्टमेंट के बाहर ये नोट लिखे मिल जाएंगे जिनमें कहा गया होता है, प्रिय डिलीवरी मैन, लेट होने में कोई बुरी बात नहीं है.

शिन बोक सुन कहते हैं कि जिस अपार्टमेंट में वह रहती हैं वहां अब लोग डिलीवरी करने वालों को पानी और चाय के लिए पूछने लगे हैं.

कोरोना वायरस महामारी अभी कुछ और समय तक हमारे साथ रहेगी. और हो सकता है कि हमारी ख़रीदारी करने की आदतें भी बदल गई हों. डिलीवरी करने वालों की ये छोटी-छोटी तारीफ़ें उनके लिए हालात बहुत ज़्यादा नहीं बदलेंगी लेकिन ये छोटी-छोटी बातें डिलीवरी करने वालों का हौसला ज़रूर बढ़ाती हैं. अभी उन्हें लंबी ड्यूटी ही करनी है.(https://www.bbc.com/hindi)


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