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प्रतीकात्मक तस्वीर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 5 नवंबर। यह एक ऐसा मामला है कि जिसमें केन्द्र सरकार के कोयला खदानों की नीलामी को लेकर बढ़-चढक़र दावों की पोल खोलकर रख दी है। बताया गया कि पांच साल पहले छत्तीसगढ़ के जिस खदान को जिंदल पॉवर ने नीलामी में हासिल किया था, उसी खदान को आबंटन निरस्त होने के बाद दोबारा नीलामी में जिंदल पॉवर चार गुना से कम कीमत पर हथियाने में सफल रही। इससे केंद्र सरकार को जो नुकसान होना है, वह तो है ही, स्वाभाविक तौर पर राज्य सरकार को भी रायल्टी में करोड़ों की नुकसान हो सकता है।
खदान और जंगल के मुद्दों पर लगातार काम करने वाले छत्तीसगढ़ के एक सामाजिक कार्यकर्ता आलोक शुक्ला कोयला खदान नीलामी की प्रक्रिया को दिखावा करार देते हैं। उन्होंने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि कोयला खदान नीलामी से राज्य सरकार को रायल्टी का नुकसान होगा। उनका कहना है कि नियम शर्तें ही कुछ इस तरह की बनाई गई हैं, जिससे कंपनियों को काफी फायदा है। कंपनियां आपस में तय कर कम कीमत में खदान हासिल कर रही हैं। केन्द्र सरकार ने प्रतिस्पर्धा के लिए न्यूनतम चार कंपनियों की शर्त को घटाकर दो कर दिया है। न्यूनतम दो बोलीदार आने पर भी नीलामी हो सकेगी। इसका कंपनियों ने काफी फायदा उठाया है, और पसंदीदा खदान कम दर पर पाने में सफल रही हैं।
ताजा मामला रायगढ़ जिले के गारे पेलमा 4/1 कोयला खदान का है। यह खदान पहले जिंदल पॉवर के पास ही थी। कोयला घोटाले के खुलासे के बाद केन्द्र सरकार ने खनन चल रही 205 खदानों को भी वापस ले लिया था, और नए सिरे से नीलामी के जरिए आबंटन का फैसला लिया गया। इससे केन्द्र और राज्य को राजस्व के रूप में अरबों के फायदे का दावा किया गया था। पहली बार वर्ष 2015 में नीलामी हुई, जिसमें छत्तीसगढ़ की चार खदानों की बोली लगाई गई, इन खदानों में रायगढ़ जिले की गारे पेलमा 4/1, गारे पेलमा 4/7, चोटिया और एक अन्य खदान थी।
बताया गया कि जिंदल पॉवर ने अपनी पुरानी खदान गारे पेलमा 4/1 को 1585 रूपए प्रतिटन की बोली लगाकर हासिल कर लिया था। तब राज्य सरकार को भारी भरकम रायल्टी मिलने की उम्मीद थी। मगर कंपनियों ने खदान हासिल करने के बाद माइनिंग शुरू नहीं की, और फिर केन्द्र सरकार ने तकनीकी कारण गिनाकर आबंटन निरस्त कर दिया। दोबारा खदानों के व्यावसायिक उत्पादन के लिए नीलामी शुरू हुई है। जिसमें हाल ही में गारे पेलमा 4/1 को जिंदल पॉवर ने महज 385 रूपए प्रति टन की दर से हासिल किया है। इसमें हर साल 6 लाख टन कोयला उत्पादन का अनुमान है, और 632 करोड़ रूपए राजस्व की प्राप्ति की उम्मीद जताई जा रही है। मगर चार गुना से अधिक कमदर पर खदान हासिल करने से स्वाभाविक रूप से राज्य सरकार को इतनी ही कम रायल्टी हासिल होगी। इसका सीधा नुकसान राज्य सरकार को होगा। हालांकि राज्य सरकार के एक अफसर ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि इस बार नीलामी के नियम बदले हैं, इसे राज्य सरकार को नुकसान नहीं होगा। जितनी रायल्टी की उम्मीद थी, उतनी ही मिल सकती है।
सूत्रों के मुताबिक गारे पेलमा 4/7 की भी नीलामी हुई है। इस खदान के लिए डीबी पॉवर की बोली सर्वाधिक रही है। बाकी खदानों के लिए भी पहले की तुलना में काफी कम बोली आई है। कुल मिलाकर हाल यह है कि सरकार को कोयला खदानों से भारी रायल्टी की उम्मीद धरी की धरी रह गई है।


