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प्रदेश में 30 से ज्यादा संगठन एकजुट
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 4 नवंबर। छत्तीसगढ़ समेत देशभर के लाखों किसान कृषि कानूनों के खिलाफ कल 5 नवंबर को देशव्यापी चक्काजाम करेंगे। इस दौरान वे सभी बैनर-पोस्टर के साथ केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए राष्ट्रीय राजमार्गों पर धरना भी देंगे। छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा के साथ देश के अलग-अलग राज्यों से 5 सौ से अधिक किसान संगठन एकजुट होकर आंदोलन की तैयारी में जुटे हैं।
अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के आव्हान पर छत्तीसगढ़ में भी किसान आंदोलन की तैयारी जारी है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के घटक संगठनों के साथ ही दूसरे अन्य किसान संगठनों के इस आंदोलन में शामिल होने से कल 30 से ज्यादा संगठन सडक़ों पर होंगे। ये सभी संगठन मिलकर कल इस किसान आंदोलन के समर्थन में घड़ी चौक स्थित अंबेडकर प्रतिमा पर दोपहर 3 बजे एकजुट होकर प्रदर्शन करेंगे। इन संगठनों ने प्रदेश में 10 नवम्बर से सोसाइटियों के माध्यम से धान खरीदने और केंद्र के कृषि कानूनों को निष्प्रभावी करने के लिए एक सर्वसमावेशी कानून बनाने की भी मांग की है।
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के राज्य संयोजक आलोक शुक्ला और छत्तीसगढ़ किसान सभा के राज्य अध्यक्ष संजय पराते ने बताया कि 30 से अधिक किसान संगठनों के सडक़ों पर उतरने से राज्य के प्राय: सभी राष्ट्रीय और राज्य मार्गों में आवागमन प्रभावित होगा। इसके अलावा गांवों को शहरों से जोडऩे वाली सडक़ें भी बाधित होंगी। जगह-जगह इन कानूनों की प्रतियां और सरकार के पुतले भी जलाए जाएंगे।
उन्होंने कहा है कि इस देश की कृषि और खाद्यान्न बाजार को कार्पोरेटों के हवाले करने के लिए मोदी सरकार ने ये तीन कृषि विरोधी कानून बनाए हैं। इसका मकसद किसानों को समर्थन मूल्य प्रणाली से और गरीबों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से वंचित करना है। दूसरी तरफ देश के नागरिकों की खाद्यान्न सुरक्षा को नष्ट करते हुए अडानी-अंबानी जैसे कार्पोरेटों को अधिकतम मुनाफा कमाने का रास्ता खोलना है। लेकिन देश की खेती-किसानी नष्ट होने से खाद्यान्न आत्मनिर्भरता भी नष्ट हो जाएगी और भुखमरी की समस्या और गहरा जाएगी।
किसान नेताओं ने कहा है कि कॉर्पोरेट गुलामी की ओर धकेलने वाले इन कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ देश के किसान तब तक संघर्ष करेंगे, जब तक इन्हें बदला नहीं जाता। यह संघर्ष छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार की उन नीतियों के खिलाफ भी है, जिसने किसानों के हितों की रक्षा करने के वादे के बावजूद मंडी संशोधन अधिनियम में न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने का प्रावधान नहीं किया है और डीम्ड मंडियों के प्रावधान के जरिये केंद्र सरकार द्वारा मंडियों के निजीकरण के कॉर्पोरेटपरस्त फैसले का अनुमोदन कर दिया है। यही कारण है कि इस मौसम में मंडियों में भी किसान धान के समर्थन मूल्य से वंचित हो रहे हैं। इसके बावजूद सरकार सोसाइटियों के जरिये खरीदी करने के लिए तैयार नहीं है। भूपेश सरकार के इस कॉर्पोरेटपरस्त रुख के चलते प्रदेश के किसानों को एक हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान होने जा रहा है। उन्होंने आम किसानों से भी खेती-किसानी बचाने के लिए सडक़ पर उतरने का आव्हान किया है।
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