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राजेश अग्रवाल की विशेष रिपोर्ट- 4 महीने में 16 हाथियों की मौत, कुसूरवार कौन?
18-Oct-2020 9:38 PM
राजेश अग्रवाल की विशेष रिपोर्ट- 4 महीने में 16 हाथियों की मौत, कुसूरवार कौन?

    अधिकांश की मौत करंट लगने से   

बिलासपुर, 18 अक्टूबर (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)।
केरल में कुछ महीने पहले एक गर्भवती हथिनी को पटाखों से भरा अनानास खिलाने से मौत का मामला सामना आया, तब यह घटना देशभर की मीडिया में सुर्खियों पर था। वहां की सरकार को दबाव में आकर कई लोगों को गिरफ्तार करना पड़ा। छत्तीसगढ़ में जान-बूझकर या लापरवाही से आये दिन हाथी, हथिनी और शावकों की मौत हो रही है पर कोई सख्त रुख सरकार का दिखाई नहीं दे रहा है, जवाबदेही तय नहीं की जा रही है।  

बीते चार महीने में 16 हाथियों की मौत के मामले तो उजागर हो चुके हैं। चार महीने में सामने आये मामलों को देखना शुरू करें तो 9 और 10 जून को सूरजपुर के प्रतापपुर में एक गर्भवती हथिनी सहित दो मादा हाथियों की मौत हो गई थी। 11 जून को बलरामपुर के अतौरी में एक मादा हाथी की मौत हो गई। 15 जून को धमतरी के माडमसिल्ली के जंगल में कीचड़ में फंस जाने से हाथी के एक बच्चे की मौत हो गई।

16 जून धरमजयगढ़ में करंट लगने से हाथी की मौत हो गई। 18 जून को फिर करंट लगने से ही एक हाथी की मौत हो गई। 8 जुलाई को कोरबा में एक 8 साल के किशोर हाथी ने एक माह के इलाज के बाद दम तोड़ दिया। 24 जुलाई को जशपुर में करंट लगाकर हाथी की हत्या कर दी गई। 16 अगस्त को सूरजपुर में जहर खाने से एक हाथी की मौत हुई।

सितम्बर माह में भी मौतों का सिलसिला जारी रहा। धरमजयगढ़ में 23 सितम्बर को करंट लगने से हाथी की मौत हुई। 26 सितम्बर को महासमुंद के पिथौरा में एक हाथी का करंट लगाकर शिकार किया गया। 28 सितम्बर को गरियाबंद में बिजली तार की चपेट में आने से एक हाथी की मौत हो गई। 29 सितम्बर को धरमजयगढ़ में फिर एक हाथी की करंट से मौत हो गई। जशपुर में 15 अक्टूबर को और कटघोरा में 17 अक्टूबर को हाथी मृत पाये गये।

इन 16 मौतों में से 7 मौतों में कम से कम साफ हो चुका है कि मौतें करंट लगने से हुई। चार मौतें ऐसी हैं जिसके बारे में वजह नहीं मालूम या फिर उसे वन विभाग जो कहे मान लेना होगा।

सितम्बर माह के आखिरी सप्ताह में गरियाबंद और महासमुंद में जिन दो हाथियों की मौत 11 के व्ही बिजली लाइन की चपेट में आने की बात साफ हो गई। पिथौरा के मामले में सात लोगों को वन विभाग ने गिरफ्तार भी किया। इनका कहना था कि भालुओं के शिकार से उन्होंने तार खींच दिये थे। झूलते हुए तार की चपेट में 20 हाथियों के दल का एक हाथी चपेट में आ गया। आरोपियों से हुकिंग का सामान भी बरामद किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग और विद्युत विभाग से कई बार आगाह कर चुके थे कि इससे वन्य जीव व इंसानों को खतरा है।

जशपुर में भी ऐसी ही घटना पिछले जुलाई माह में हुई थी। तपकरा थाना इलाके के झिलिबेरना ग्राम में जानवरों से बाड़ी को बचाने के लिये एक ग्रामीण ने करंट प्रवाहित तार की बाड़ लगा रखी थी। हाथी उसकी उसकी चपेट में आ गया। मई माह में जशपुर जिले के नारायणपुर में भी करंट लगने से एक गर्भवती हथिनी की मौत हुई थी।

वन विभाग हाथियों की मौत और उसकी वजह के ठीक-ठीक कारणों को उजागर नहीं करता। अधिकतर मामलों में ग्रामीणों की सूचना पर ही वे सक्रियता दिखाते हैं। एक आंकड़ा कहता है कि 2001 से लेकर अब तक प्रदेश में 164 हाथियों की मौत हुई है, जिनमें से 47 करंट लगने के कारण हुई। धरमजयगढ़ इलाके में तो सैकड़ों की संख्या में अवैध कनेक्शन खेतों में लिये जाने की बात सामने आ चुकी है। ये तार खतरनाक ढंग से उच्च दाब वाली लाइनों से जमीन तक लाये गये हैं। कई जगहों पर ये तार खुले हुए हैं। इनमें फंसकर हाथी ही नहीं दूसरे जानवरों की मौत होती रहती है। वन विभाग इसकी सूचना बिजली विभाग को नहीं देता, बिजली विभाग के मैदानी कर्मचारी जानकारी होने के बावजूद लालच में आकर कार्रवाई नहीं करते।

हाईकोर्ट में हाथियों की अकाल मौत को लेकर रिटायर्ड आईएफएस अनूप भल्ला, एक्टिविस्ट नितिन सिंघवी और कुछ अन्य याचिकायें दायर की गई हैं। इसमें हाथियों के सुरक्षित ठिकाने की मांग तो है ही, करंट और शिकार से हो रही लगातार मौतों पर भी वन विभाग और विद्युत विभाग को निर्देश देने की मांग की गई है। 

याचिकाकर्ताओं ने सोलर फेंसिंग, रेडियो कॉलर, तारों को ऊंचा करने, हाथियों के मूवमेंट को बिजली विभाग और वन विभाग के अधिकारियों द्वारा आपस में साझा करने की मांग की है। इन याचिकाओं पर सुनवाई जारी है। पिछले साल हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बिजली विभाग ने इंसुलेटर और एरियल बंच केबल लगाने का बजट 1700 करोड़ बताया था।
 
विद्युत वितरण कम्पनी ने यह राशि वन विभाग से मांगी थी। केन्द्रीय वन पर्यावरण मंत्रालय ने यह राशि देने से मना कर दिया था। उन्होंने इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट व एनटीजी के निर्देशों का हवाला दिया था और अपने बजट से इसका खर्च उठाने कहा था। मार्च 2019 में सुनवाई के दौरान जशपुर जिले में होने वाली करंट से मौतों पर कोर्ट खासी चिंतित थी और निर्देश दिया था कि ऐसी व्यवस्था करें कि अब एक भी हाथी की मौत करंट से न हो। पर मौतें लगातार जारी हैं। 
प्रदेश के 15 जिले हाथी प्रभावित हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। राज्य बनने के बाद से लेकर अब तक 300 हाथियों की मौत भी हो चुकी है और करोड़ों का नुकसान हो चुका है। लेमरू एलिफेंट प्रोजेक्ट पर राज्य बनने के बाद से ही बात हो रही है पर अब तक उसकी प्रक्रिया ही पूरी नहीं हो पाई है। ऐसे में हाथियों की मौत की जवाबदेही कौन लेगा यह बड़ा सवाल है।


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