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महाराष्ट्रः मॉल खुल सकते हैं तो मंदिर क्यों नहीं, विपक्ष ने पूछा
04-Sep-2020 6:44 PM
महाराष्ट्रः मॉल खुल सकते हैं तो मंदिर क्यों नहीं, विपक्ष ने पूछा

PHOTO CREDIT-TWITTER/@CBAWANKULE


मुंबई, 4 सितम्बर। कोरोना वायरस संक्रमण फैलने के बाद लगाए गए लॉकडाउन में पिछले कुछ समय से धीरे-धीरे ढील दी जा रही है. 31 अगस्त को महाराष्ट्र में ई-पास रद्द करने जैसे फ़ैसले लेकर कुछ और रियायतें दी गईं. मगर अभी तक मंदिरों और अन्य उपासना स्थलों को खोलने को लेकर कोई फ़ैसला नहीं हुआ है.

बीजेपी, एमएनएस, एमआईएम, वंचित बहुजन अघाडी जैसे राजनीतिक दल पिछले कुछ दिनों से मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थानों को खोलने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. कुछ मंदिरों के प्रशासनों ने भी सरकार से इस संबंध में माँग की है.

महाराष्ट्र में अब शहरी इलाक़ों के अलावा ग्रामीण इलाक़ों से भी कोरोना के मामले सामने आने लगे हैं. रोज़ 10 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज किए जा रहे हैं. ऐसे में, सरकार बहुत आवश्यक सेवाओं के अलावा, बाक़ी को खोलने को प्राथमिकता नहीं दे रही. हालांकि, महाराष्ट्र के विपक्षी दल सड़कों पर उतरकर धार्मिक स्थानों को खोलने की माँग कर रहे हैं.

सवाल उठता है कि विपक्ष मंदिर, मस्जिद और अन्य धार्मिक स्थानों को खोलने की माँग को लेकर इतना आक्रामक क्यों है? क्या इसके पीछे कोई राजनीति है?

हम आगे इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे. मगर इससे पहले, आइए देखते हैं कि किन पार्टियों ने धार्मिक स्थलों को खोलने की माँग की.

बीजेपी का 'घंटानाद आंदोलन'

महाराष्ट्र की मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी ने पूरे राज्य में "घंटी बजाओ" अभियान चलाया और 'दरवाज़े खोलो उद्धव, दरवाज़े खोलो' जैसे नारे लगाए गए.

अहमदनगर में पूर्व मंत्री राधाकृष्ण विखे-पाटिल और उनके बेटे सुजय विखे ने शिरडी के साई मंदिर के बाहर प्रदर्शन किया जबकि पूर्व कृषि मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने नागपुर में घंटी बजाओ अभियान में हिस्सा लिया.

वंचित बहुजन अघाड़ी कार्यकर्ताओं ने पंढरपुर में विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर खोलने की माँग की. पार्टी प्रमुख प्रकाश आंबेडकर ने ख़ुद इस अभियान का नेतृत्व किया.

नाशिक के त्रयंबकेश्वर मंदिर के कुछ ट्रस्टियों ने कुछ दिन पहले एमएनएस चीफ़ राज ठाकरे से मुलाक़ात करके सरकार से मंदिर खुलवाने के लिए कहने की अपील की थी. राज ठाकरे ने इस मीटिंग का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए लिखा था, "अगर मॉल खोले जा सकते हैं तो मंदिर क्यों नहीं?"

औरंगाबाद में तो मंदिर खोलने की माँग को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ. औरंगाबाद के पूर्व और वर्तमान सांसद इस मामले को लेकर आपस में भिड़ गए.

पूर्व सांसद चंद्रकांत खैरे ने वर्तमान सांसद इम्तियाज़ जलील से पूछा, "मंदिर खुलवाने वाले तुम होते कौन हो?" जलील ने कहा कि हिंदू समुदाय के लोगों ने मिलकर उनसे मंदिर खोलने की माँग की थी.

सत्ताधारी महा अघाड़ी यानी महागठबंधन में शामिल दलों के अलावा बाक़ी सभी पार्टियां मंदिर आदि फिर से खोलने की माँग कर रही हैं.

आक्रामकता क्यों

राज्य में कोरोना संकट गहराता जा रहा है. फिर विपक्ष क्यों इस विषय पर आक्रामक होकर मंदिरों के पट खोलने की माँग कर रहा है?

इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार संजीव उन्हाले कहते हैं, "कोरोना ग्रामीण इलाक़ों में बहुत तेज़ी से फैल रहा है. औरंगाबाद भी इससे बचा नहीं है. और इन हालात में कुछ लोग मंदिर खोलने की माँग कर रहे हैं. ये राजनीति से प्रेरित है. औरंगाबाद में निगम चुनाव नज़दीक हैं, इसलिए इन चुनावों को देखते हुए प्रदर्शन किए जा रहे हैं. ये बचकाना व्यवहार है."

उन्हाले पूछते हैं, "प्रशासन ने कहा है कि औरंगाबाद में कम्यूनिटी स्प्रेड हो गया है. तो फिर आप इन हालात में मंदिरों को खोलने की माँग कैसे कर सकते हैं?"

"मंदिर आस्था का मामला है. क्या होगा जब किसी के हाथ पर सैनिटाइज़र छिड़का जाएगा. ये सैनिटाइज़र एल्कॉहल से बने होते हैं. कल कोई पूछने लग जाएगा कि आपने मेरे हाथ पर ये क्यों छिड़का. तब आप क्या करेंगे?"

वह कहते हैं कि बीजेपी आर्थिक दिक्क़तों के मामले को उठाने में नाकाम रही है, इसलिए भावनात्मक मुद्दों को उठा रही है.

बीबीसी मराठी ने वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर श्रीरंग गायकवाड से भी बात की जो महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में रुचि रखते हैं.

वह कहते हैं, "मंदिरों को फिर खोलना लोगों का मुद्दा नहीं है. अभी आषाढ़ी यात्रा का समय था मगर कोरोना संकट को देखते हुए लोगों ने ख़ुद तय किया कि इस साल यात्रा नहीं होगी. तो इस मामले में राजनीति लाने की कोई ज़रूरत नहीं थी. मगर दुर्भाग्य से इस पर राजनीति हो रही है."

"राजनीति में बेरोज़गारी, राज्यों को जीएसटी का मुआवज़ा न मिलना, पीएम-सीएम फ़ंड के मसले, आर्थिक सुस्ती... ये कई सारे मुद्दे हैं. कोरोना के समय में मंदिंरों को फिर से खोलना कैसे मुद्दा हो सकता है?"

गायकवाड कहते है, "अगर मंदिर खोले गए तो लंबी क़तारें लगेगीं. आपने मुंबई के दादर में फूलों की मार्केट की तस्वीरें देखी होंगी. लोग तीन फीट की दूरी बनाकर भी नहीं रख रहे. मंदिरों में ऐसा हुआ तो चिंता की बात होगी."

क्या कहते हैं मंदिर

शिरडी साई संस्थान अहमदनगर राज्य के मुख्य धार्मिक स्थलों में से एक है. संस्थान के अध्यक्ष और बीजेपी नेता सुरेश हवारे ने बीबीसी से इस बारे में बात की.

उन्होंने कहा, "शिरडी साई संस्थान दो अस्पताल चलाता है. एक सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल है और दूसरा कोरोना से जुड़े इलाज में लगा है. हमने मास्क और सैनिटाइज़ेशन का ख़याल रखा है. सरकार इस संबंध में दिशानिर्देश जारी कर सकती है. हम नियमों का पालन करेंगे. अगर नियमों का पालन न किया जाए तो प्रशासन कार्रवाई कर सकता है."

शिरडी साई संस्थान तो आर्थिक रूप से मज़बूत है, बाकी छोटे मंदिरों का क्या होगा? इस पर हवारे कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि किसी को कोई दिक्क़त होगी. अगर दिक्क़त होगी तो वो सरकार या नगर निगम से मदद मांग लेंगे. अगर मॉल और शराब की दुकानें खोली जा सकती हैं तो मंदिरों को क्यों बंद रखा जा रहा है?"

वह कहते हैं कि मंदिर लोगों को मानसिक रूप से स्वस्थ रखते हैं. हवारे कहते हैं कि सरकार को अगर चिंता है तो प्रयोग के तौर पर पहले कुछ मंदिरों को खोल सकती है.

'मंदिर बंद होने से भूखों मर रहे हैं लोग'

पश्चिमी महाराष्ट्र पवित्र स्थल कमेटी के तहत कोल्हापुर, सांगली और सिंधुदुर्ग के कुल 3042 मंदिर आते हैं. इस कमेटी के अध्यक्ष महेश जाधव ने बीबीसी मराठी को बताया, "मंदिर बंद होने से कई लोग भूखों मर रहे हैं. मंदिर आने से पहले वैसे भी भक्त ख़ुद को शुद्ध करते हैं. वे सफ़ाई का ध्यान रखते है. अगर बाकी चीज़ें खोली जा रही हैं तो भगवान को क्यों ताले में रखा जा रहा है? सरकार को सख़्त नियमों के साथ मंदिर खोलने चाहिए."

सरकार मंदिरों को खोल भी दे तो भी श्रद्धालुओं की सुरक्षा चिंता का विषय बनी रहेगी. मगर जाधव कहते हैं, "जब कोरोना संक्रमण शुरू हुआ था तो अंबाबाई मंदिर कुछ समय के लिए खुला था. तब मंदिर आने वालों को सैनिटाइज़र दिए गए थे."

वह कहते हैं, "सरकार अगर मंदिरों को खोलने का आदेश देती है तो उसे नियम बनाने चाहिए कि मास्क, सैनिटाइज़र और थर्मल स्क्रीनिंग की जाए, श्रद्धालु निश्चित दूरी से दर्शन करें और बाक़ियों से भी दूरी बनाकर रहें. इस संबंध में हमारी एक मीटिंग होगी और सरकार अगर इजाज़त देगी तो ढंग से योजना बनाई जाएगी."

स्वास्थ्य ज़रूरी है- पर्यटन मंत्री

भले ही मंदिर कमेटियों के पदाधिकारी उपासना स्थल खोलने की माँग कर रहे हैं मगर सरकार सावधान बनी हुई है. महाराष्ट्र की पर्यटन मंत्री अदिति टटकरे से बीबीसी ने बात की.

अदिति टटकरे कहती हैं, "कोरोना महामारी को देखते हुए सीएम, डिप्टी सीएम इस बारे में विचार करेंगे और दिशानिर्देश जारी करेंगे. हमें धार्मिक या पर्यटन स्थल खोलने से पहले सही से विचार करना होगा. अगर इन स्थानों को खोल दिया गया तो फिर बंद नहीं किया जा सकेगा. इसलिए, स्वास्थ्य सिस्टम का ख्याल रखना ज़रूरी है."

महाराष्ट्र सरकार यह भी देखेगी कि बाक़ी राज्य इस संबंध में क्या फ़ैसला लेते हैं.

बड़े मंदिरों वाले ज़िलों के हाल

महाराष्ट्र में कोरोना के मामले आठ लाख को पार कर गए हैं और 25 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. ये आंकड़े बताते हैं कि राज्य में कोरोना के कारण क्या हाल हैं.

अगर हम महाराष्ट्र में प्रमुख मंदिरों वाले इलाक़ों की बात करें तो यहां कोरोना के काफ़ी ज़्यादा मामले हैं. साई मंदिर (अहमदनगर), विट्ठल-रुक्मिणि मंदिर (सोलापुर), महालक्ष्मी मंदिर (कोल्हापुर), गजानन महाराज मंदिर (बुलढाना) को देखें तो यहां कोरोना अभी भी तबाही मचा रहा है.

• अहमदनगर - 21091 (मौतें - 298)

• सोलापुर- 20033 (मौतें - 778)

• कोल्हापुर - 22756 (मौतें - 662)

• बुलढाना - 3525 (मौतें - 74)

उधर, औरंगाबाद में एमआईएम सांसद इम्तियाज़ जलील मंदिर और मस्जिदों को खोलने की माँग पर अड़े हुए हैं जबकि वहां पर भी मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं.(BBCNEWS)


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