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हाईकोर्ट ने कहा- सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर नहीं ठहराया जा सकता दोषी
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 17 जून। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दहेज मृत्यु और प्रताड़ना से जुड़े एक मामले में निचली अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए एक ही परिवार के पांच सदस्यों को दोषमुक्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायमूर्ति राजानी दुबे की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि मृतका को उसकी मृत्यु से ठीक पहले दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था। अदालत ने यह भी माना कि रिकॉर्ड में मौजूद कुछ तथ्य दहेज उत्पीड़न के आरोपों से मेल नहीं खाते।
अभियोजन के अनुसार जशपुर जिले के सुभाष चंद्र यादव का विवाह 23 अप्रैल 2012 को रजनी यादव से हुआ था। विवाह के करीब 18 महीने बाद, 21 नवंबर 2013 को रजनी ने अपने ससुराल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद मृतका के परिजनों ने आरोप लगाया था कि ससुराल पक्ष मोटरसाइकिल की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित करता था।
पुलिस ने दहेज मृत्यु और दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज किया था। वर्ष 2014 में अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने आरोपों को सही मानते हुए पति और ससुर को सात-सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। अन्य परिजनों को भी दोषी ठहराया गया था।
आरोपियों की ओर से हाईकोर्ट में पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष दहेज प्रताड़ना के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि मृतका को उसकी मृत्यु से पहले दहेज के लिए परेशान किया गया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि मृतका के प्रसव का खर्च उसके ससुर ने उठाया था और उसके मायके पक्ष के बैंक खातों में धनराशि भी भेजी गई थी। अदालत ने कहा कि ऐसे तथ्य उस परिवार के आचरण से मेल नहीं खाते जो दहेज के लिए किसी महिला को प्रताड़ित कर रहा हो।
मामले के सभी तथ्यों और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पांचों अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया। अदालत ने उन्हें तत्काल प्रभाव से बरी करने का आदेश जारी किया।


