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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : किशोरावस्था में सोशल मीडिया के खतरों पर कुछ सरकारें चौकन्नी
सुनील कुमार ने लिखा है
16-Jun-2026 9:20 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : किशोरावस्था में सोशल मीडिया के खतरों पर कुछ सरकारें चौकन्नी

ब्रिटेन ने कल घोषणा की है कि 16 बरस से कम उम्र के बच्चों को टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक, एक्स, स्नैपचैट, यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों से दूर रखा जाएगा। सरकार का तर्क है कि बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य, उनके ऑनलाईन उत्पीडऩ, अश्लील सामग्री, और इन प्लेटफॉर्मों की लत लगा देने की तकनीकों से बचाव के लिए यह रोक जरूरी है। ब्रिटेन के पहले सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने 16 बरस से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया पर दाखिला न देने का कानून लागू किया, और बच्चों के उम्र की जांच करने की जिम्मेदारी इन कंपनियों पर डाली। उसने इसे न मानने वाली कंपनियों पर आसमान छूते हुए जुर्माने का कानून बनाया। नार्वे ने भी 16 साल के कम उम्र के बच्चों के लिए ऐसा ही कानून कंपनियों पर लागू करने की घोषणा की है। ऑस्ट्रिया 14 साल के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने की जिम्मेदारी इन कंपनियों पर ही डाल चुका है। मलेशिया, फ्रांस, स्पेन, डेनमार्क, पुर्तगाल, इटली जैसे बहुत से देश हैं जिन्होंने तरह-तरह की रोक-टोक लगाई है।

ब्रिटेन की इस ताजा घोषणा के साथ प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा है कि सभी किशोर-किशोरियों की खुशी और उनकी सुरक्षा के लिए यह किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वे खुद एक किशोर के पिता हैं, और वे जिम्मेदारी से यह कह सकते हैं कि ऐसी रोक लगाना बच्चों के भले के लिए जरूरी है। दुनिया के बहुत से देशों का यह अनुभव है कि ऐसे प्लेटफॉर्मों पर दुनिया भर में बिखरे हुए अपराधी भी दूर-दूर के देशों में बच्चों को फंसाते हैं, उनका यौन शोषण करते हैं, उन्हें अपनी नग्न तस्वीरें या नग्न वीडियो शेयर करने पर मजबूर करते हैं, और फिर ब्लैकमेलिंग का एक लंबा सिलसिला चलाते हैं। पश्चिमी देशों में ऐसी ब्लैकमेलिंग से डरे-सहमे हुए बच्चे दहशत में खुदकुशी तक कर रहे हैं, या मां-बाप की संपत्ति ब्लैकमेलरों के हवाले कर रहे हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री इस मौके पर यह भी कहा है कि उन्हें मालूम है कि सरकार के लिए अपना यह फैसला लागू करना आसान नहीं रहेगा क्योंकि दुनिया की कुछ सबसे बड़ी टेक कंपनियां ऐसे प्लेटफॉर्म चलाती हैं, जिनसे लड़ाई बहुत मुश्किल रहेगी।

हमने इस बारे में भारत के कानून पर एक नजर डाली, तो यहां कानूनी रूप से तो 18 बरस तक के नौजवानों को बच्चा माना जाता है, और उसके व्यक्तिगत डाटा की प्रोसेसिंग के लिए माता-पिता या पालकों की पुख्ता इजाजत जरूरी है। लेकिन आज हर किस्म के सोशल मीडिया पर भारत में बच्चे अपना खाता शुरू करते हुए अपनी उम्र 18 से अधिक बता देते हैं, और इस पर किसी तरह की जांच की जिम्मेदारी इन कंपनियों पर नहीं है। यह कुछ उसी किस्म का है कि भारत में 18 बरस से कम के बच्चों को तम्बाकू या शराब बेचने पर रोक है, लेकिन इस उम्र के बच्चे पानठेलों पर ही सिगरेट पीते खड़े दिखते हैं। यहां पर एक छोटा सा सवाल यह भी खड़ा होता है कि बच्चों की उम्र के सुबूत देने पर उनके मां-बाप की शिनाख्त उजागर होगी, और वह निजी कंपनियों तक चली जाएगी। लेकिन इसका आसान जवाब यह है कि आज भी हर मोबाइल कंपनी के पास, एयरलाईंस के पास, बैंक या क्रेडिट कार्ड कंपनियों के पास, यूपीआई जैसे एप्लीकेशन चलाने वाली कंपनियों के पास लोगों की शिनाख्त के दर्जनों कागज हैं, आज अगर उनमें उनके बालिग या नाबालिग बच्चों की उम्र के शिनाख्त का एक कागज और जुड़ जाएगा, तो उससे निजता क्या कुछ अधिक हद तक भंग हो जाएगी?

 

आज डिजिटल-युग में दुनिया के सारे देश कमोबेश एक किस्म की दिक्कतें झेलते हैं, एक किस्म के खतरे झेलते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्मों का असर देशों की सरहदों के आरपार बेरोकटोक आते-जाते रहता है, और अब दुनिया भर में हर उम्र के लोग एक-दूसरे तक पहुंच भी रखते हैं। ऐसे में अगर विकसित देशों को भी 14 और 16 बरस की उम्र तक रोक लगाने की जरूरत लग रही है, और भारत 18 बरस की उम्र तक बेफिक्र बैठा हुआ है, तो फिर उम्रसीमा की भारत की इस छूट के साथ भारत में बढ़ते हुए नाबालिग अपराधों को भी देखना चाहिए कि क्या ये सोशल मीडिया और ऑनलाईन से भी प्रभावित हैं? यह भी देखना चाहिए कि क्या इस माध्यम से कई बड़े और बालिग मुजरिम छोटे बच्चों का शोषण करते हैं? भारत में आज भी बच्चों की सेक्स फिल्मों को पोस्ट करने वालों की जानकारियां देश के भीतर से पकड़ में नहीं आतीं, पश्चिम के कुछ विकसित देशों में ऐसे अंतरराष्ट्रीय निगरानी संगठन हैं जो भारत की जानकारी भारत को देते हैं कि किस मोबाइल नंबर से, किस इंटरनेट कनेक्शन से, किस पल, कौन सी चाइल्ड सेक्स वीडियो पोस्ट की गई है। इसलिए भारत अपने बच्चों की साइबर हिफाजत के मामले में नौसिखिए किस्म का है, यहां पर बच्चों के बचाव के लिए कड़े कानूनों की जरूरत है। लेकिन ऐसा लगता है कि इन कानूनों से दुनिया की इन सबसे बड़ी टेक कंपनियों के कारोबार पर असर पड़ेगा, इसलिए भी सरकार कुछ नर्मदिली दिखा रही है।

दिक्कत यह भी है कि भारत में विधायकों और सांसदों की औसत उम्र खासी अधिक है। उन्होंने अपनी किशोरावस्था में सोशल मीडिया देखा नहीं था, इसलिए वे खतरों से नावाकिफ भी हैं। संसद और विधानसभा दलीय गुटबाजी का अड्डा होकर रह गए हैं, और ऐसे में जिंदगी के महीन पहलुओं पर संवेदनशीलता के साथ चर्चा के कोई मंच ही नहीं रह गए हैं। जिन विधानसभाओं, और जिस संसद को देश के सबसे महत्वपूर्ण कानून बनाने का जिम्मा मिला हुआ है, वे मंच संख्या के बाहुबल से अधिक कुछ नहीं देखते। ऐसे में देश के लोगों की जिंदगी के नाजुक पहलुओं की फिक्र किसी को नहीं है। और आज के डिजिटल उपकरण ऐसे हैं कि पिछली पीढ़ी के मां-बाप बच्चों पर अधिक नजर भी नहीं रख सकते। बच्चे मां-बाप के फोन या कम्प्यूटर के पासवर्ड पल भर में झपट लेते हैं, और अपने उपकरणों को मां-बाप की पहुंंच या जांच से परे रखना भी जानते हैं। भारत में सरकारों पर ऐसे सार्वजनिक दबाव की जरूरत है जो उसे अधिक संवेदनशील बना सके।

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