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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सोशल मीडिया के नफरती लोगों को सीखने की जरूरत
सुनील कुमार ने लिखा है
13-Jun-2026 6:43 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय :  सोशल मीडिया के नफरती लोगों को सीखने की जरूरत

भारत में सोशल मीडिया अभी अमरीका-ईरान जंग के दौरान अमरीकी हमले में मारे गए तीन भारतीय नाविकों की दुखदायी खबरों से भरा हुआ है। लेकिन दुख की खबरों के बीच ही कुछ अरसा पहले का एक ट्वीट भी एक मौत की खबर के साथ चल रहा है। एक नाविक ऐसा है जिसके पिता ने अभी कुछ अरसा पहले ट्विटर पर पोस्ट किया था कि इजराइल-फिलीस्तीन समस्या को खत्म करने का एक ही तरीका है कि इजराइल फिलीस्तीन के सारे मुस्लिमों का जनसंहार कर डाले, तभी वहां शांति कायम हो सकेगी। आज उसी इजराइल के भडक़ाए हुए इस युद्ध के चलते भारतीय नाविकों वाले जहाज पर हमला हुआ, और इसी आदमी का जवान बेटा मारा गया। अब आज रोते हुए इस पिता के वीडियो के साथ लोग याद दिला रहे हैं, कुछ महीने या साल पहले के उस ट्वीट को पोस्ट कर रहे हैं कि फिलीस्तीन के सारे मुस्लिमों का जनसंहार सुझाने वाले आदमी को ऐसा पुत्रशोक झेलना पड़ रहा है। जिसका जवान बेटा इस तरह गुजरा हो, उसके साथ हमारी पूरी हमदर्दी है, लेकिन हमारी हमदर्दी फिलीस्तीन में इजराइली हमलों में मारे गए पौन लाख मुस्लिमों के साथ भी है, और उनके भी पहले एक फिलीस्तीनी संगठन हमास के हमले में मारे गए हजार से कुछ अधिक इजराइलियों के साथ भी है।

दुनिया के इतिहास में इजराइल के जिन यहूदियों ने हिटलर के हाथों सबसे बुरा नस्लीय जनसंहार झेला था, वे यहूदी आज उसी तरह का जनसंहार फिलीस्तीनियों के साथ कर रहे हैं। अपनी नस्ल के जख्म भी वे पौन सदी के भीतर ही भूल गए हैं, और हिटलर की तरह ही नस्लीय-हिंसा कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में, अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों में अच्छी तरह से स्थापित इस सत्य को अनदेखा करके भारत का एक हिन्दू आदमी अगर मुस्लिमों से अपनी नफरत के चलते फिलीस्तीन के सारे नागरिकों को कत्ल कर देने का फतवा अपने नाम के ट्विटर अकाऊंट से दे रहा है, भारत जैसे लोकतंत्र में बैठकर दे रहा है, तो उसे अब समझ पडऩा चाहिए कि उसके फतवों पर अमल करने के साथ-साथ इजराइल, और उसके पिट्ठू बने हुए अमरीका के हमलों में किस तरह आज उसका बेटा मारा गया। हिंसा को भडक़ाना आसान रहता है, वह हिंसा बढ़ते-बढ़ते कहां तक जाती है, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। हमें एक मशहूर शायर राहत इंदौरी का एक शेर याद पड़ता है- ‘लगेगी आग तो आएँगे कई घर जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।’

लोगों को हिंसा भडक़ाने के पहले इस शेर को याद रखना चाहिए क्योंकि जिस भीड़ को हिंसक बनाया जा रहा है, जिस सरकार को कत्ले-आम के लिए उकसाया जा रहा है, उनके बेकाबू होने पर क्या-क्या नहीं हो सकता? अभी-अभी एक समाचार-विचार वेबसाइट से जुड़े एक मामले में एक राजनीतिक टिप्पणीकार के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज किया है जिसमें अभिजीत अय्यर-मित्रा ने महिला पत्रकारों के खिलाफ इतनी गंदी जुबान में लिखा था, उन्हें वेश्या लिखा था, उन्हें यौनरोग होने की बातें लिखी थी, इस पर एफआईआर करने के एक मजिस्ट्रेट कोर्ट के ऑर्डर पर दिल्ली की एक जिला अदालत ने रोक लगा दी है। और कहा है कि आरोपी के शब्द शायरी या कविता के रूप में थे, इसमें किसी भी महिला पत्रकार का सीधा नाम नहीं लिया गया था। जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी मामले में इस आदमी को हुक्म देकर वैसी गंदी गालियों वाली ट्वीट हटाने के लिए कहा था। दिल्ली की जिला अदालत का यह ताजा आदेश प्राकृतिक न्याय की हमारी समझ के ठीक खिलाफ है, क्योंकि इस आदमी की लिखी गई गंदी बातें अब भी सोशल मीडिया पर तैर रही हैं, और वे अदालती रिकॉर्ड का हिस्सा भी बन चुकी हैं। हम मारे गए नाविक के पिता के ट्वीट के साथ इस अश्लील ट्वीट करने वाले दूसरे आदमी को जोडक़र इसलिए देख रहे हैं कि सोशल मीडिया पर लोगों की कही और लिखी गई बातों का रिकॉर्ड हमेशा के लिए बने रहता है, लोग अपनी पोस्ट मिटा भी दें, तो भी वे इंटरनेट के रिकॉर्ड में बनी रहती हैं। जिस अय्यर ने एक वेबसाइट की महिला पत्रकारों को रंडी लिखा, और उस वेबसाइट के दफ्तर को वेश्यालय लिखा, गंदी से गंदी गालियां लिखीं, उसे शायरी मानने वाले जिला जज के बारे में भी अब भारत के जिम्मेदार समाज के हजारों लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं, कई लोगों का कहना है कि इस जज के घर की दीवारों पर ऐसी शायरी लिखना चाहिए, और उसके परिवार के सामने ऐसी शायरी सुनाना चाहिए।

हम ऐसी किन्हीं भी बातों के खिलाफ हैं, लेकिन हिंसा की बात करने वाले, हिंसक और अश्लील बातें लिखने वाले, और ऐसी बातों को शायरी करार देने वाले लोगों से हिसाब चुकता करने के लिए कोई बड़ी अदालत नहीं लगती, अब लोग सोशल मीडिया पर ही ऐसे लोगों को ठिकाने लगा देते हैं। यह एक अलग बात है कि ऐसी बातें पोस्ट करने वाले लोग अपने आपको किसी तबके के बीच पहले बहादुर, और फिर गालियां पडऩे पर शहीद की तरह पेश कर सकते हैं, लेकिन देश के सारे लोग बेवकूफ नहीं है कि जायज और नाजायज का फर्क न कर सकें। लोग समझते भी हैं, और अब तो पिछले थोड़े से अरसे से लोग मुखर होकर हिंसक और नफरती बातों का विरोध भी कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि देश की बड़ी न्यायपालिका जब दिल्ली के अपने एक जिला जज की शायरी की समझ पर गौर करेगी, तो इस समझ को सुधारने के लिए भी कुछ करेगी। जो देश दुनिया में शायरी के लिए सबसे मशहूर इक्का-दुक्का देशों में से एक है, उसमें गंदी गालियों की अश्लील और हिंसक तुकबंदी को कोई जज शायरी कह सकता है, तो फिर ऐसे जज को अगले एक बरस अदालती कामकाज से अलग करके सिर्फ मुशायरों में बिठाना चाहिए।

इस मुद्दे पर आज लिखने का मकसद यही है कि हम लोगों को आगाह करना चाहते हैं कि सोशल मीडिया दुधारी तलवार है, जहां पर आपके लिखे हुए को आनन-फानन प्रतिक्रियाएं मिलती हैं, वहीं आपका लिखा हुआ बरसों तक, हमेशा के लिए बने भी रहता है। आज हिन्दुस्तान के कई सबसे बड़े नेताओं के दस-पन्द्रह बरस पहले के वीडियो बार-बार सिर उठाकर सामने आ जाते हैं कि रूपए के दाम, गैस-पेट्रोल के दाम, विदेशों में कालाधन, नोटबंदी, और दूसरे साम्प्रदायिक मुद्दों पर कब किसने कहां पर क्या कहा था। पुराने बयान, खबरें, और पुराने वीडियो इस तरह से सामने आकर किसी का भी वर्तमान और भविष्य दोनों बिगाड़ सकते हैं। इसलिए बड़े लोगों की बातें तो छोड़ दें, मामूली और तकरीबन अनजान लोगों की बातों को देखें। जिस आदमी के मुस्लिमों के जनसंहार के फतवे की बात से हमने आज लिखना शुरू किया, उसका पूरा ट्विटर पेज मुस्लिमों से नफरत से भरा हुआ है। और उस आदमी ने अपना बेटा आज इस जंग में खोया है जो कि मुस्लिमों के खिलाफ नफरती-हमलावर इजराइल और उसके झांसे में आए अमरीका की शुरू की हुई है। बीते बरसों में इस नफरती ने जो हजारों जहरीली ट्वीट की हैं, आज वे सब उसके बेटे के अंतिम संस्कार के आसपास चारों तरफ तैर रही हैं। इससे ज्यादा तकलीफ की क्या बात हो सकती है कि जब पूरे देश की हमदर्दी साथ होनी थी, पूरा देश उन जहरीली बातों को जोडक़र ही इस मौत को देख पा रहा है। इसलिए अपने जहर से आजादी पाने की कोशिश करनी चाहिए, हिंसक और नफरती फतवे नहीं देने चाहिए। लोगों को वह भी याद रखना चाहिए कि शाहरूख खान के साथ किसी हिन्दू अभिनेत्री ने केसरिया रंग की बिकिनी पहनी थी, तो उसे लोगों ने कई हफ्तों का राष्ट्रीय बवाल बना दिया था, और हिन्दू धर्म का अपमान लिखा था। देश के एक ऐसे ही नफरती फिल्मकार ने यह बात लिखी थी, और जवाब में बहुत सारे लोगों ने उस फिल्मकार की जवान बेटी की केसरिया बिकिनी में समंदर किनारे की तस्वीरें पोस्ट कर दी थीं। इसलिए ऑस्ट्रेलिया की जनजाति का एक परंपरागत हथियार बूमरैंग याद रखना चाहिए जिसे फेंकने पर वह लौटकर फेंकने वाले तक ही वापिस आता है। इसी बात को कुछ दूसरे शब्दों में लोग लिखते हैं- कर्मा रिटर्न्स। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


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