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'सत्ता छीननी पड़ती है': 'कांग्रेस के संकटमोचक' डीके शिवकुमार कैसे पहुँचे सीएम की कुर्सी तक
28-May-2026 7:26 PM
'सत्ता छीननी पड़ती है': 'कांग्रेस के संकटमोचक' डीके शिवकुमार कैसे पहुँचे सीएम की कुर्सी तक

-इमरान क़ुरैशी

कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे डीके शिवकुमार अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अपने दृढ़ संकल्प से किसी को भी चौंका सकते हैं.

यह बात उनके मार्गदर्शक और दिवंगत मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा को भी एक रात समझ में आ गई थी.

शिवकुमार ने 1999 में शपथ लेने जा रही कांग्रेस सरकार के मंत्रियों की सूची में अपना नाम शामिल करवाने के लिए सो रहे एसएम कृष्णा को आधी रात को जगाया था.

इस क़िस्से को खुद शिवकुमार ने दिसंबर 2024 में कर्नाटक विधानसभा में कृष्णा को श्रद्धांजलि देते हुए सुनाया था, "मंत्रियों की सूची उन्होंने (कृष्णा) और मैंने मिलकर तैयार की थी और पार्टी हाईकमान को भेजी थी. लेकिन जब रात में सूची आई, तो उसमें मेरा नाम नहीं था."

विधानसभा में उन्होंने कहा था, "मैंने उसी रात अपने ज्योतिषी (राजगुरु बेल्लूर शंकरनारायण) द्वारकानाथ से सलाह ली. उन्होंने मुझे कहा कि जब तक मैं दरवाज़ा खुद नहीं खोलूंगा और मंत्री पद की मांग नहीं करूंगा, तब तक मुझे यह नहीं मिलेगा. उन्होंने मुझसे कहा था कि सत्ता छीननी पड़ती है. मैंने उनकी सलाह मानी."

अगली सुबह होने वाले शपथ ग्रहण समारोह के लिए मंत्रियों की सूची पहले ही राज्यपाल को भेजी जा चुकी थी.

शिवकुमार ने कहा, "मैंने कृष्णा से कहा कि मेरे बिना वह मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं ले सकते."

शिवकुमार ने विधानसभा को बताया कि उनके राजनीतिक उभार में उनके ज्योतिषी की बड़ी भूमिका रही है और उन्होंने चुनावों में उनकी जीत और हार की भी भविष्यवाणी की थी.

पार्टी के एक नेता ने हल्की मुस्कान के साथ बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "हमें नहीं पता कि इस बार उन्होंने किसका दरवाज़ा खटखटाया लेकिन यह मानना पड़ेगा कि वह अपने लक्ष्य हासिल करना जानते हैं."

'पहले निवेश करो, बाद में लाभ उठाओ' की नीति

यह कहने से पहले कि कृष्णा उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किए बिना मुख्यमंत्री नहीं बन सकते, शिवकुमार काफ़ी 'निवेश' कर चुके थे.

उन्होंने कृष्णा को राज्यसभा चुनाव जिताने में मदद की थी. जब कृष्णा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे, तब शिवकुमार उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाते थे.

सियासत में निवेश की सलाह देने के अलावा शिवकुमार अपने दोस्तों को ज़मीन में निवेश करने की सलाह भी देते रहते थे. उनका तर्क था कि ज़मीन 'आर्थिक स्थिरता' देती है.

यह बात उन्होंने उस समय कही थी, जब डॉ. मनमोहन सिंह के नए आर्थिक सुधारों के कारण बेंगलुरु और उसके आसपास ज़मीन की क़ीमतों में तेज़ उछाल आने वाला था.

उन्होंने सथानूर से कनकपुरा बनी सीट पर एचडी देवेगौड़ा जैसे नेता के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने के लिए अपनी ज़मीन बेच दी थी.

उन्होंने दूसरों को दी गई अपनी ही सलाह मानी और रियल एस्टेट, ग्रेनाइट और शिक्षा के कारोबार में अपने हित बढ़ाते हुए राज्य के सबसे अमीर नेताओं में जगह बना ली.

कर्नाटक के बाहर भी डीके शिवकुमार ने कांग्रेस को कई बार संकटों से बाहर निकाला है. इसलिए कुछ लोग उन्हें पार्टी का 'संकटमोचक' तक कहते रहे हैं.

वर्षों के दौरान उनकी संगठनात्मक क्षमता के कारण 2003 में उन्होंने महाराष्ट्र के 40 कांग्रेस विधायकों की मेज़बानी की, ताकि विलासराव देशमुख के नेतृत्व वाली डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार को बचाया जा सके.

उसी अनुभव ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल को 2017 में राज्यसभा के चर्चित चुनाव के दौरान गुजरात के 44 विधायकों को शिवकुमार की देखरेख में भेजने के लिए प्रेरित किया.

अहमद पटेल ने बेहद कांटे की टक्कर में यह चुनाव जीता और अमित शाह की उन्हें हराने की कोशिशों को नाकाम कर दिया.

लेकिन इसके बाद शिवकुमार के यहां प्रवर्तन निदेशालय ने छापे मारे गए और 2019 में उन्हें 50 दिनों के लिए दिल्ली की तिहाड़ जेल में रखा गया.

इसी दौरान सोनिया गांधी उनसे मिलने तिहाड़ जेल पहुंचीं और शिवकुमार ने उनसे कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाए जाने की इच्छा जताई.

उन्होंने वादा किया कि वह राज्य में पार्टी को सत्ता में वापस लाएंगे. उन्होंने 2023 में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के साथ मिलकर यह लक्ष्य हासिल भी किया.

सोनिया गांधी की भूमिका

शिवकुमार ने 2024 में बेंगलुरु में आयोजित एक सम्मान समारोह में कहा था, "सोनिया गांधी जी तिहाड़ जेल आई थीं और उन्होंने मुझसे केपीसीसी की ज़िम्मेदारी संभालने को कहा था. सिद्धारमैया और मैंने मिलकर पार्टी को मज़बूत किया और उसे फिर से सत्ता में लेकर आए, जबकि कुछ लोगों ने त्रिशंकु जनादेश की भविष्यवाणी की थी."

उसी कार्यक्रम में सिद्धारमैया ने कहा था, "आप शिवकुमार के बारे में कुछ भी कहें, लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि वह बहुत अच्छे ओर्गेनाइज़र हैं."

संगठनात्मक प्रयासों में किया गया वही 'निवेश' 26 मई को उनके काम आया. राहुल गांधी ने पहले सिद्धारमैया के साथ लंबी बैठक की और उन्हें पद छोड़ने के लिए मनाया.

इसके बाद उन्होंने शिवकुमार से संक्षिप्त मुलाकात की और फिर अपनी मां से सलाह लेने चले गए.

इसके तुरंत बाद वह एआईसीसी कार्यालय लौटे, जहां सिद्धारमैया, शिवकुमार और अन्य नेताओं के साथ एक और दौर की बैठक हुई.

वहीं अंततः यह तय हुआ कि शिवकुमार कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री होंगे.

विश्लेषक क्या कहते हैं?

राजनीतिक विश्लेषक और एनआईटीटीई एजुकेशन ट्रस्ट के निदेशक (अकादमिक) प्रोफ़ेसर संदीप शास्त्री ने शिवकुमार के उभार को "कई स्तरों पर पार्टी के प्रति निष्ठा का पुरस्कार" बताया है.

लेकिन उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से यह भी कहा, "एक तरह से कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के लिए ऐसी स्थिति आ गई थी कि वह बदलाव को और टाल नहीं सकता था. पार्टी हाईकमान राजस्थान, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश में कार्रवाई में देरी के नतीजे देख चुका था. मुझे नहीं लगता कि वह कर्नाटक में ऐसा जोखिम लेना चाहता था."

पार्टी के भीतर यह भी माना जाता है कि प्रदर्शन के लिहाज़ से सिद्धारमैया पार्टी के भीतर दो समानांतर शक्ति केंद्रों के बीच घिरे हुए थे. अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान सिद्धारमैया एक तरफ़ शिवकुमार और दूसरी तरफ़ एआईसीसी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के प्रभाव से जूझ रहे थे.

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में गवर्नेंस और पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर ए. नारायण ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "सबसे अच्छी बात यह हुई है कि केंद्रीय नेतृत्व ने फ़ैसला ले लिया है. शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह लोगों को साथ लेकर कैसे चलेंगे, ख़ासकर लिंगायत समुदाय से आने वाले लोगों को."

पार्टी के भीतर इस बात को लेकर भी मतभेद है कि क्या कुरुबा समुदाय, जिससे सिद्धारमैया आते हैं, उनके मुख्यमंत्री नहीं रहने के बाद भी कांग्रेस का समर्थन करता रहेगा.

प्रोफेसर नारायण ने कहा, "यह संभव है कि शिवकुमार उन अन्य ओबीसी समुदायों को एकजुट कर लें, जो ज़मीनी स्तर पर कुरुबा समुदाय के वर्चस्व का विरोध करते हैं. लेकिन यह एक मुश्किल काम है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (bbc.com/hindi)


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