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पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर की याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने बरकरार रखा सीयू का फैसला
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 13 मई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने माना है कि यदि किसी कर्मचारी का कार्य प्रदर्शन प्रोबेशन अवधि के दौरान संतोषजनक नहीं पाया जाता, तो संस्थान बिना विभागीय जांच के भी उसकी सेवा समाप्त कर सकता है। इस सिद्धांत को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर की बर्खास्तगी को वैध ठहराया है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू की एकलपीठ में हुई। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि प्रोबेशन अवधि का उद्देश्य ही कर्मचारी की उपयुक्तता और कार्य क्षमता का मूल्यांकन करना होता है। यदि इस अवधि में कर्मचारी पद के अनुरूप उपयुक्त नहीं पाया जाता, तो उसकी सेवाएं समाप्त करना दंडात्मक कार्रवाई नहीं माना जाएगा।
मामले के अनुसार उत्तर प्रदेश के फैजाबाद निवासी डॉ. प्रदीप कुमार शुक्ला की नियुक्ति वर्ष 2012 में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर हुई थी। नियुक्ति दो वर्ष की प्रोबेशन अवधि के अधीन थी, जिसे बाद में एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया था।
इसी दौरान अगस्त 2013 में विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनका कार्य प्रदर्शन असंतोषजनक बताते हुए सेवा समाप्त कर दी थी। इसके खिलाफ डॉ. शुक्ला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर तर्क दिया कि उनकी सेवा समाप्ति कथित आरोपों और आचरण से जुड़ी थी, इसलिए विभागीय जांच कराना आवश्यक था। उन्होंने यह भी कहा कि प्रोबेशन अवधि समाप्त होने से पहले सेवा समाप्त करना नियमों के विपरीत है।
वहीं विश्वविद्यालय की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता की सेवाएं केवल कमजोर कार्य प्रदर्शन के कारण समाप्त की गई थीं। नियुक्ति पत्र की शर्तों के अनुसार प्रोबेशन अवधि के दौरान किसी भी समय असंतोषजनक प्रदर्शन पाए जाने पर सेवा समाप्त की जा सकती थी। विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के कार्य में सुधार के कोई संकेत नहीं मिले थे।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रोबेशन पर नियुक्त कर्मचारी की उपयुक्तता का आकलन करना संस्थान का अधिकार है। अदालत ने पाया कि सेवा समाप्ति आदेश में याचिकाकर्ता के चरित्र या आचरण पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गई थी, बल्कि केवल कार्य प्रदर्शन को आधार बनाया गया था।
अदालत ने कहा कि प्रोबेशन अवधि के दौरान किसी भी समय कर्मचारी के प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जा सकता है और आवश्यक होने पर उसकी सेवाएं समाप्त की जा सकती हैं। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय की कार्रवाई को सही माना।


