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टीईटी पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा
रायपुर/नयी दिल्ली, 13 मई। छत्तीसगढ़ समेत देशभर के लाखों सरकारी शिक्षकों से जुड़े टीईटी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अहम सुनवाई हुई। अदालत ने साफ संकेत दिए कि अब बिना पात्रता परीक्षा पास किए शिक्षक बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस टिप्पणी के बाद 1998 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों की चिंता बढ़ गई है। हालांकि मामले में अंतिम फैसला अभी आना बाकी है, जिस पर देशभर के शिक्षकों और शिक्षा संगठनों की नजर टिकी हुई है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अब पात्रता परीक्षा पास किए बिना किसी भी शिक्षक की नियुक्ति की अनुमति नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद खासकर 1998 से 2009 के बीच नियुक्त हुए शिक्षकों की चिंता बढ़ गई है।
जानकारी के अनुसार, यह विवाद उन शिक्षकों से जुड़ा है जिनकी नियुक्ति टीईटी परीक्षा लागू होने से पहले हुई थी। कई राज्यों में ऐसे शिक्षकों को लेकर यह मांग उठती रही है कि उन्हें पात्रता परीक्षा से छूट दी जाए। इसी को लेकर विभिन्न शिक्षा संगठनों और राज्य सरकारों की ओर से पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई थीं।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि पात्रता परीक्षा में जितनी छूट दी जानी थी, वह पहले ही दी जा चुकी है। अदालत ने कहा कि भविष्य में किसी भी शिक्षक की नियुक्ति बिना टीईटी पास किए नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद यानी National Council for Teacher Education द्वारा निर्धारित नियमों का पालन सभी राज्यों और शिक्षकों को करना होगा।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर 2025 को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए उन शिक्षकों के लिए पात्रता परीक्षा अनिवार्य कर दी थी, जिनकी नियुक्ति बिना टीईटी के हुई थी। ये नियुक्तियां विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा जारी मेरिट लिस्ट के आधार पर की गई थीं। अकेले मध्य प्रदेश में ही ऐसे करीब डेढ़ लाख शिक्षकों की भर्ती होने की जानकारी सामने आई थी।
मध्य प्रदेश समेत देशभर के कई राज्यों के शिक्षा संगठनों ने अदालत में याचिका दायर कर शिक्षकों को परीक्षा से छूट देने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जिन शिक्षकों ने वर्षों तक सेवा दी है, उन्हें दोबारा पात्रता परीक्षा देने के लिए बाध्य करना उचित नहीं होगा। साथ ही यह भी कहा गया कि लंबे समय से कार्यरत शिक्षकों के अनुभव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि अदालत ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट कर दिया कि वर्ष 2017 में नियम लागू होने के बाद पांच साल की छूट पहले ही दी जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि यह छूट शिक्षकों को पात्रता परीक्षा पास करने के लिए पर्याप्त अवसर देने के उद्देश्य से दी गई थी। अब नियमों में और ढील देने की संभावना कम दिखाई दे रही है।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों तथा वरिष्ठ अधिवक्ताओं की ओर से कई कानूनी दलीलें पेश की गईं। याचिकाकर्ताओं ने शिक्षकों के भविष्य और नौकरी सुरक्षा का मुद्दा उठाया, जबकि दूसरी ओर अदालत ने शिक्षा की गुणवत्ता और नियमानुसार नियुक्ति प्रक्रिया को प्राथमिकता देने की बात कही।
बताया जा रहा है कि इस मामले में 70 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। बुधवार शाम तक भी अदालत में बहस जारी रही। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला सुरक्षित नहीं रखा है और मामले में आगे भी सुनवाई जारी रहेगी।
इस मामले का असर देशभर के लाखों शिक्षकों पर पड़ सकता है। खासकर वे शिक्षक, जिनकी नियुक्ति टीईटी लागू होने से पहले हुई थी, अब अदालत के अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे हैं। शिक्षा संगठनों का कहना है कि यदि राहत नहीं मिली तो बड़ी संख्या में शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं।


