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शुभेंदु अधिकारी बनेंगे पश्चिम बंगाल के सीएम या बीजेपी किसी और चेहरे पर खेलेगी दांव?
05-May-2026 6:46 PM
शुभेंदु अधिकारी बनेंगे पश्चिम बंगाल के सीएम या बीजेपी किसी और चेहरे पर खेलेगी दांव?

-संदीप राय

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि राज्य में बीजेपी मुख्यमंत्री के तौर पर किस चेहरे को तरजीह दे सकती है.

पार्टी को 207 सीटें मिली हैं, जो कि दो तिहाई बहुमत से अधिक है, जबकि टीएमसी 80 सीटों पर आ गई है.

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में आधिकारिक तौर पर मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित नहीं किया है.

कुछ राज्यों में भी बीजेपी ने मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया था, जैसे कि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में और वहां आश्चर्यजनक तरीक़े से एक नए चेहरे को सीएम बना दिया गया.

पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक रैली के दौरान कहा था कि 'नया मुख्यमंत्री बंगाल' से होगा. दरअसल तृणमूल कांग्रेस ने दावा किया था कि अगर बीजेपी जीतती है तो मुख्यमंत्री 'बाहरी' होगा.

हालांकि अभी तक बीजेपी की ओर से किसी नाम पर चर्चा सामने नहीं आई है. बिल्कुल नए चेहरे को सीएम बनाने के बीजेपी के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए अंत तक सस्पेंस बनने की संभावना है.

बावजूद कई नेताओं के नाम संभावित दावेदारों के तौर पर चर्चा में हैं. पश्चिम बंगाल की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकारों का कहना है कि सीएम के लिए राजनीतिक पकड़ और संगठन में प्रभाव को तरजीह मिल सकती है.

जिन नेताओं के नाम संभावित दावेदारों में लिए जा रहे हैं, आईए जानते हैं उनके बारे में.

शुभेंदु अधिकारी इस समय पश्चिम बंगाल की राजनीति में बीजेपी का सबसे प्रमुख चेहरा बने हुए हैं. वो राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं.

उनकी राजनीतिक अहमियत पूर्वी मेदिनीपुर जैसे ज़िलों में मज़बूत संगठनात्मक पकड़ और अहम सीटों पर समर्थन जुटाने की क्षमता से है.

वह कभी तृणमूल कांग्रेस में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के क़रीबी सहयोगी रहे थे और राज्य सरकार में प्रभावशाली मंत्री पदों पर भी रहे. हालांकि, 2021 विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने टीएमसी को छोड़ दिया और बीजेपी में शामिल हो गए थे.

शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के बीच टकराव राज्य की राजनीति में सबसे चर्चित घटनाक्रम रहा. दोनों नेता अक्सर एक-दूसरे पर तीख़े हमले करते रहे हैं.

ममता बनर्जी के नेतृत्व को सीधे चुनौती देने की यही वजह से ही शुभेंदु को बीजेपी का सबसे मज़बूत और व्यवहारिक मुख्यमंत्री चेहरा माना जाता है.

इस बार भवानीपुर विधानसभा सीट से उन्होंने निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 15 हज़ार से अधिक वोटों से हरा दिया.

लेकिन उनकी दावेदारी में अगर कोई दिक्कत आती है तो उसकी वजह होगा उनका अतीत.

कोलकाता में बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के सहयोगी पत्रकार पीएम तिवारी का कहना है, "शुभेंदु अधिकारी पहले टीएमसी में थे और अगर उन्हें सीएम बनाया जाता है तो बीजेपी के पुराने कार्यकर्ताओं में ये भाव जाएगा कि टीएमसी ही दूसरे रूप में फिर आ गई."

उन्होंने दूसरी वजह गिनाई, "शुभेंदु आरएसएस बैकग्राउंड से नहीं आते और उनके बनने से पश्चिम बंगाल की प्रदेश बीजेपी के दूसरे धड़े असहज महसूस कर सकते हैं."

हालांकि, कोलकाता में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुकांतो सरकार का कहना है कि 'शुभेंदु अधिकारी की दावेदारी सबसे अधिक मज़बूत है.'

पूर्व पत्रकार स्वपन दासगुप्ता के नाम की भी चर्चा है, हालांकि पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनका उतना बड़ा क़द नहीं है. वह 2016 में राज्यसभा के मनोनीत सदस्य बनाए गए थे.

साल 2021 में उन्हें फिर मनोनीत कर राज्यसभा का सदस्य बनाया गया था.

लेकिन इसके छह महीने के अंदर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में खड़े होने के लिए उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया था.

उस समय ये विवाद भी पैदा हुआ कि संसद सदस्य रहते उनकी उम्मीदवारी घोषित की गई.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के मुताबिक़, स्वपन दासगुप्ता ने कई अख़बारों में वरिष्ठ संपदाकीय पदों पर काम किया. साल 2003 से वो स्वतंत्र रूप से अख़बारों में बतौर राजनीतिक स्तंभाकार लेखन करते रहे. साल 2015 में उन्हें पद्मभूषण पुरस्कार से नवाज़ा गया था.

पीएम तिवारी कहते हैं कि केंद्र के साथ उनके समीकरण को देखते हुए उनके नाम की भी चर्चा है.

संसद की वेबसाइट के अनुसार, वह 2015 से 2021 तक नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी के कार्यकारी परिषद से सदस्य रहे.

इसके अलावा वो विदेशी मामलों की कमेटी, मानव संसाधन मंत्रालय के तहत आने वाले एनआईटीएसईआर समेत कई सेलेक्ट कमेटियों के सदस्य भी रहे.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुकांतो सरकार का कहना है कि स्वपन दासगुप्ता पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं और बीते तीन दशक से दिल्ली में रहते हुए भी वो खांटी बंगाली बने हुए हैं.

सुकांतो सरकार के अनुसार, "स्वपन दासगुप्ता की बांग्ला भाषा और संस्कृति के बारे में अच्छी पकड़ है."

मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर एक और अहम दावेदारी है दिलीप घोष की. वह बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष हैं.

उन्होंने पश्चिम बंगाल में पार्टी का आधार बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है. उनके कार्यकाल में बीजेपी ने संगठनात्मक ढांचे को काफ़ी मज़बूत किया और ख़ासतौर पर 2019 लोकसभा चुनाव में मज़बूत विपक्षी ताक़त के तौर पर उभरी.

अपने आक्रामक राजनीतिक अंदाज़ और ज़मीनी पकड़ के लिए पहचाने जाने वाले दिलीप घोष, अब प्रदेश अध्यक्ष न होने के बावजूद पार्टी में प्रभावशाली वरिष्ठ नेता के तौर पर जाने जाते हैं.

पीएम तिवारी कहते हैं कि दिलीप घोष की दावेदारी भी मज़बूत है. उनका बैकग्राउंड आरएसएस का है, "ओडिशा से सटे खड़गपुर जैसे इलाक़े में उन्होंने ओबीसी और अनुसूचित जाति में काफ़ी लंबे समय तक काम किया है और इसकी वजह से वो जीतते रहे हैं."

उनका कहना है कि इस मामले में अगर आरएसएस और बीजेपी से जुड़ा कोई चर्चित चेहरा है तो वो हैं दिलीप घोष.

हालांकि सुकांतो सरकार का कहना है, "दिलीप घोष की आरएसएस में अच्छी छवि है लेकिन ऐसा नहीं लगता कि आरएसएस दिलीप घोषण के दबाव डालेगा."

शमीक भट्टाचार्य इस समय पश्चिम बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष हैं और राज्य में बीजेपी के संगठनात्मक नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, इस नाते उनका नाम दावेदारों में गिना जा रहा है.

उनका ज़ोर मुख्य रूप से आंतरिक पुनर्गठन, बूथ स्तर के प्रबंधन और चुनावी रणनीति पर रहा है.

पिछले साल छपे बीबीसी के एक लेख के अनुसार, शमीक साल 1974 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े थे. उसके बाद उनको दक्षिण हावड़ा मंडल का बीजेपी युवा मोर्चा का महासचिव बनाया गया. वह लगातार 11 साल तक इस पद पर रहे.

उसके बाद लगातार तीन कार्यकाल तक प्रदेश बीजेपी के महासचिव भी रहे. पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति और प्रदेश बीजेपी की कोर कमिटी के सदस्य भी रहे.

शमीक ने बीजेपी के टिकट पर साल 2006 में पहली बार श्यामपुर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे.

वह लंबे अरसे से बीजेपी के समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं. जब 2025 में सुकांत मजूमदार की जगह प्रदेश बीजेपी के नए अध्यक्ष के नाम की घोषणा की गई तो चर्चित दावेदारों में शमीक भट्टाचार्य का नाम नहीं था.

लेकिन उनको प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो उनके सामने पार्टी के अंदर की गुटबाज़ी से पार पाना पहली चुनौती थी.

सिलीगुड़ी से बीजेपी विधायक शंकर घोष उत्तर बंगाल के अहम क्षेत्रीय नेताओं में गिने जाते हैं.

सुकांतो सरकार के मुताबिक़, "शंकर घोष सीपीएम के हार्डकोर कम्युनिस्ट रहे हैं. वो एक कॉलेज के टीचर हैं और युवा हैं. उत्तर बंगाल में उनका बहुत प्रभाव है."

"2021 में उन्होंने बीजेपी जॉइन किया और सिलीगुड़ी से अपनी सीट जीते थे. इस बार अच्छे अंतर से जीतने वाले बीजेपी के उम्मीदवारों में उनका भी नाम है. संभव है कि शंकर घोष को उप मुख्यमंत्री का पद दिया जाए."

चुनाव आयोग की वेबसाइट के अनुसार, शंकर घोष सिलीगुड़ी से 73,192 वोटों के अंतर से जीते हैं.

सुकांतो सरकार का कहना है कि वह बहुत अच्छे आर्गेनाइज़र हैं और इलाके में स्थानीय स्तर पर लोगों से उनका गहरा जुड़ाव है.

वो कहते हैं, "शंकर घोष की उत्तर बंगाल के साथ साथ बीजेपी के अंदर भी अच्छी पकड़ है. उत्तर बंगाल में 54 सीटें हैं और यहां दो-तिहाई से अधिक सीटें बीजेपी को गई हैं."

महिला चेहरे के रूप में बीजेपी में अग्निमित्रा पॉल का नाम आता है.

द टेलीग्राफ़ के मुताबिक़, वो जानी मानी फ़ैशन डिज़ाइनर रही हैं और 2019 में लोकसभा चुनावों से पहले उन्होंने राजनीति जॉइन किया.

आसनसोल दक्षिण से बीजेपी विधायक और राष्ट्रीय प्रवक्ता अग्निमित्रा पॉल, पार्टी की बंगाल इकाई में उभरती हुई नेता के तौर पर देखी जाती रही हैं.

अग्निमित्रा पॉल ने राष्ट्रीय मीडिया में अपनी मौजूदगी से पहचान बनाई है और उन्हें अक्सर राज्य में महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने की बीजेपी की कोशिश के हिस्से के तौर पर पेश किया जाता है.

हालांकि, कोलकाता में वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुकांतो सरकार का कहना है कि अग्निमित्रा पॉल को मुख्यमंत्री पद का बड़ा दावेदार नहीं माना जा रहा है, लेकिन उन्हें सरकार में अहम पद दिया जा सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित (bbc.com/hindi)


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