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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सरकारी दफ्तरों की नई करेंसी, बादाम चढ़ाना न भूलें....
सुनील कुमार ने लिखा है
21-Apr-2026 8:07 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : सरकारी दफ्तरों की नई करेंसी, बादाम चढ़ाना न भूलें....

छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल के बिलासपुर दफ्तर में एक नौजवान की फाइल सालभर से नहीं मिल रही थी। किसी दफ्तर में फाइल न मिलने की भारत में कुछ बड़ी जाहिर सी वजहें रहती हैं, जिन्हें मुंह से बोलकर जाहिर नहीं किया जाता, लेकिन पता सबको रहता है। लोगों को याद होगा कि ऑफिस-ऑफिस जैसे किसी नाम का एक टीवी सीरियल रहता था जिसमें मुसद्दीलाल नाम का एक किरदार था, जो कि सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते दिखता था, और दफ्तरों के लोग उसका मजा लेते रहते थे। वह भारत के आम सरकारी दफ्तरों पर टेलीविजन पर एक सबसे ताकतवर कटाक्ष था। वह सीरियल तो अपनी जिंदगी जीकर खत्म हो गया, लेकिन सरकारी दफ्तर अब तक जारी हैं, और इस देश की संवैधानिक व्यवस्था में कोई सुनामी भी सरकारी इंतजाम को बहाकर कम नहीं कर सकती।

अब बिलासपुर में इस नौजवान ने सालभर धक्के खाने के बाद आधा किलो बादाम खरीदा, और महिला अधिकारी की मेज पर जाकर उसे बिखेर दिया कि इसे खाने से शायद आपकी याददाश्त तेज हो जाए, और न मिल रही फाइल मिल जाए। दोनों तरफ से इस बादाम के वीडियो बन रहे थे, जिस महिला अधिकारी की मेज पर यह प्रतीकात्मक विरोध दर्ज किया गया, वह भी अपने फोन से इसकी रिकॉर्डिंग करते दिख रही थी। खैर, जब यह वीडियो चारों तरफ फैला, और सरकार की, हाउसिंग बोर्ड की खासी खिल्ली उड़ गई, तो इस महिला अधिकारी को भी हाउसिंग बोर्ड के मुख्यालय अटैच कर दिया गया है।

अब सवाल यह उठता है कि अलग-अलग सरकारी दफ्तरों में बरसों तक फाइलों को रोकने का जो आम सिलसिला चलता है, उसके लिए क्या हर सरकारी दफ्तर के बाहर पान-ठेलों पर बादाम के पैकेट भी बेचे जाएं? जिस तरह लोग शंकरजी के मंदिर में धतूरे का फूल लेकर जाते हैं, और नंदी के लिए बेलपत्री, क्या उसी तरह सरकारी दफ्तरों में साहब और बाबुओं की याददाश्त बढ़ाने के लिए बादाम चढ़ाए जाएं? हालांकि कोई भी अधिकारी, या कर्मचारी को चढ़ाए गए बादाम किसी मंदिर में चढ़ाए गए नारियल की तरह घूम-फिरकर उसी ठेले पर फिर आ जाएंगे, और अगले दिन कुछ नए लोग उन्हीं पैकेट को खरीदकर फिर सरकारी कुर्सियों पर चढ़ाएंगे? भारत में दीवाली के समय एक से दूसरे तक सफर करने वाली सोनपपड़ी के डिब्बे की तरह बादाम के पैकेट घूमना क्या ठीक रहेगा? क्या इससे हर सरकारी दफ्तर के बाहर दो-तीन रोजगार पैदा होंगे? क्या सरकारी चढ़ावे के लिए एक अलग किस्म का घटिया, और दीमक खाया हुआ बादाम चलन में आएगा? क्या बादाम के ऐसे इस्तेमाल के लिए चीन से बनकर नकली बादाम भी आने लगेंगे, ऐसे कई तरह के सवाल इस बादाम प्रणाली से उठ खड़े होंगे।

भारतीय सरकारी दफ्तरों में अभी तक एक दूसरी भाषा चलती थी कि किसी अर्जी के ऊपर कुछ वजन रखो, वरना वह कागज उड़ जाता है। हमने अपने बचपन से ही इसी भाषा को सुना है। अब यह बादाम वाली एक नई भाषा है, और यह पता नहीं कितने दिन चल पाएगी, कितने दिन में इस बादाम के देश को लेकर हंगामा होने लगेगा? कब यह कहा जाने लगेगा कि अफगान काबुलीवाला एक वक्त ऐसे बादाम लाकर हिंदुस्तान में बेचता था, और अफगानी बादाम को चढ़ाना ठीक नहीं होगा, अफगानी हाथों से उगाए हुए, तोड़े और तौले हुए बादाम यहां नहीं चलेंगे। हो सकता है कि ऐसी आपत्ति आने में अधिक देर न लगे, और खालिस इसी देश के, कुछ तबकों के उगाए हुए बादाम ही सरकारी दफ्तरों के बाहर बेचने की शर्तें लगाकर लोग डंडे-झंडे लेकर खड़े हो जाएंगे? लेकिन कुल मिलाकर एक बात यह समझ में आई कि सालभर में जो फाइल नहीं मिली थी, वह आधा किलो बादाम के बाद एक-दो दिनों में ही मिल गई। अब इसमें बादाम के साथ-साथ वीडियो बनाने, और उसे वायरल करने का योगदान कितना बड़ा था, यह अंदाज लगाना अभी मुश्किल है। फिर भी मोबाइल कैमरों से आज लोकतंत्र इतना तो आ गया है कि एक मुसद्दीलाल भी दो दिनों में किसी का ट्रांसफर करवा पाया, और उससे भी बड़ी बात कि अपनी गुमी हुई फाइल को ढुंढवाकर इंसाफ पाने की तरफ एक कदम बढ़ा पाया। अभी दो दिन पहले ही एक अदालत का एक किस्सा छपा था। एक बहुत ही गरीब और बुजुर्ग व्यक्ति के पक्ष में जब अदालत से फैसला हुआ, तो उसने जज को दुआ देते हुए कहा कि जाओ एक दिन थानेदार बन जाओगे। जज ने जब बताया कि वह तो थानेदार से बड़े ओहदे पर है, तो उस बुजुर्ग ने कहा कि थानेदार ने तो मुझे कहा था कि 5 हजार रुपए दो तो मैं दो दिन में मामला निपटा दूंगा। आपकी अदालत में 20 साल से मुकदमा लड़ते हुए वकील और बाबुओं पर 50 हजार रुपए खर्च कर चुका हूं, तब इंसाफ मिला है, मेरे लिए तो थानेदार ही बड़ा रहता, लेकिन मैंने बादाम खाए नहीं थे इसलिए अक्ल नहीं आई थी।

बादाम से दुनिया के चक्के के घूमने, काम के आगे बढऩे का सिलसिला बड़ी अच्छी तरह समझा जा सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि बादाम खाने से अक्ल तेज होती है। कुछ दूसरे बादाम विरोधियों का कहना है कि धोखा खाने से अक्ल तेज होती है, और कितना भी बादाम खाने से अक्ल पर उतनी धार नहीं आ पाती। यह सिलसिला इस देश में लोकतंत्र की विसंगतियों और त्रासदियों को बताता है। कैसा देश हो गया है कि सरकारों को टैक्स देने वाले लोग एक-एक सरकारी दफ्तर में भीख मांगने के अंदाज में अपनी फाइल आगे बढ़ाने के लिए हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। दूसरी तरफ सरकारी नौकरी पाने के लिए मेहनत-मशक्कत से इम्तिहान देने वाले, या कि रिश्वत देकर नौकरी पाने वाले लोग अगले ही दिन से कमाई शुरू कर देते हैं। दो दिन पहले ही राजस्थान की एक खबर आई थी कि वहां राज्यभर में सबसे अधिक नंबर्स पाने वाली, और डिप्टी कलेक्टर बनने वाली लडक़ी अपनी पहली ही पोस्टिंग में लाखों रुपए नगद रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार हो गई है। दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ की एक खबर आई थी कि स्कूल शिक्षा विभाग के दो अफसरों को एक शिक्षक से नगद रिश्वत लेते रंगेहाथों गिरफ्तार किया गया, जिसकी बीमारी की छुट्टी मंजूर करने के लिए उसी के विभाग के अधिकारी रिश्वत ले रहे थे। देश में किसी भी दूसरी भावना के मुकाबले, किसी भी दूसरे भाईचारे, या बहनचारे के मुकाबले रिश्वत का रिश्ता सबसे मजबूत है। जो लोग पूरी जिंदगी रिश्वत लेते हैं, वे रिटायर होने के अगले ही दिन अपने ही उसी दफ्तर में अपने ही कल तक के सहकर्मियों को अपनी फाइल आगे बढ़ाने के लिए रिश्वत देते खड़े रहते हैं। कुछ अज्ञानी यह मानते हैं कि खून का रिश्ता सबसे मजबूत रहता है, भारत की सरकारी और अदालती व्यवस्था में जो फंसे रहते हैं, उन्हें पता रहता है कि रिश्वत का रिश्ता देश में सबसे मजबूत रहता है। कई ऐसे अदालती किस्से हवा में तैरते रहते हैं कि किसी जज, या मजिस्ट्रेट के बाबू वादी-प्रतिवादी दोनों से मोलभाव करते रहते हैं कि उनमें से अधिक रिश्वत कौन दे सकेंगे, जिसके पक्ष में फैसला दिया जा सके। हमें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक जज की याद है जो जब-जब कोई फैसला लिखते थे, उस तारीख के ठीक पहले अदालत के ठीक सामने के स्टेट बैंक के अपने सैलेरी अकाउंट में उसका भुगतान जमा करवा देते थे। जितने फैसले, उतनी बार नगद रकम जमा। यह मामला पूरा दस्तावेजी मामला था, हालांकि ऐसे कई मामलों के पकड़ में आने के बाद भी अब हाईकोर्ट के बड़े-बड़े जज भी अपने बंगलों में बोरियों में भरकर नोट रखते हैं, बड़े-बड़े आईएएस अफसर इसी शहर की अदालत के बगल में, और हमारे इस दफ्तर से आधा किलोमीटर की ही दूरी पर जेल में बंद हैं, जिन्होंने अपनी तनख्वाह से कई-कई गुना अधिक जमीन-जायदाद खरीद ली थी। इन सबको भी समय रहते किसी ने बादाम नहीं खिलाया, वरना उन्हें देश के कानून की थोड़ी सी याद आ गई रहती।

यह कथा अनंत है। जब तक दुनिया के नक्शे पर भारत रहेगा, तब तक यहां भ्रष्टाचार बना रहेगा, रिश्वतखोरी एक ऐसी करेंसी रहेगी जिसे कोई भी नोटबंदी खत्म नहीं कर सकेगी। ऐसे में बादाम उम्मीद की एक किरण बनकर आया है। लोगों को सरकारी दफ्तर में अपनी फाइल का एक बरस पूरा होने पर बादाम चढ़ाना शुरू कर देना चाहिए, और जो रिवाज धार्मिक स्थानों पर हर हफ्ते, या हर महीने का रहता है, उसके मुताबिक अपनी फाइल की मासिक बरसी मनाने के लिए पत्तल पर बादाम लेकर बाबू, या साहब के पास जाना चाहिए, क्योंकि बरसी पर कुछ न कुछ तो खिलाया जाता है, अब शहरों में कौएं तो रह नहीं गए हैं।

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