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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : शाह-भूपेश की दिलचस्प चुनौतियों का सच जनता को जानने का हक तो है!
सुनील कुमार ने लिखा है
31-Mar-2026 8:51 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : शाह-भूपेश की दिलचस्प चुनौतियों का सच जनता को जानने का हक तो है!

बस्तर में नक्सल हिंसा पूरी तरह खत्म हुई है, या तकरीबन खत्म हुई है, इस विवाद में हम पडऩा नहीं चाहते। जिस हद तक वह खत्म हुई है, वह केन्द्र और राज्य सरकार की घोषणाओं के मुताबिक ही है। अब अगर बहुत थोड़ी सी गिनती में नक्सली बचे हुए हैं, तो जाहिर है कि उनकी मारक क्षमता खत्म हो चुकी है, और वे शायद अपने आखिरी हथियारबंद दिन गुजार रहे हैं। कल संसद में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सल मोर्चे पर कामयाबी गिनाते हुए छत्तीसगढ़ में पांच बरस कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे भूपेश बघेल पर भी एक सीधा हमला किया है कि उनकी सरकार ने नक्सलियों को संरक्षण दिया, जिससे नक्सल उन्मूलन अभियान में देर हुई। उन्होंने चुनौती दी और कहा कि भूपेश बघेल को पूछो, सुबूत दूं क्या, और कहा कि अगर भूपेश हां बोलेंगे, तो फंस जाएंगे। यह संसद में कांग्रेस की किसी प्रदेश सरकार पर केन्द्रीय गृहमंत्री का अब तक का सबसे बड़ा हमला था, और भूपेश ने संसद के बाहर अमित शाह को सुबूत देने की चुनौती दी है, साथ ही यह कहा है कि उनके पांच बरस के कार्यकाल में केन्द्र सरकार के साथ नक्सल मोर्चे पर लगातार बैठकें हुईं, और किसी भी बैठक में केन्द्रीय गृहमंत्री या केन्द्र सरकार की तरफ से छत्तीसगढ़ की भूपेश-कांग्रेस सरकार के खिलाफ ऐसी कोई शिकायत नहीं की गई। अब अचानक यह बात कही जा रही है।

दरअसल बस्तर के नक्सल मोर्चे पर आज के घटनाक्रम इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनका श्रेय लेने के लिए कोशिश करने, या दावा करने का हक सत्तारूढ़ पार्टी का बनता ही है। दूसरी बात यह कि भाजपा सरकार की लगाई गई इतनी बड़ी तोहमत पर भूपेश बघेल की जवाबदेही भी बनती है, और उन्होंने अपनी जवाबदेही अमित शाह से एक सवाल करके पूरी की है। ये दोनों चुनौतियां इतनी दिलचस्प हो चुकी हैं कि जनता इंतजार करेगी कि अमित शाह कुछ अधिक जानकारी सामने रखें, सुबूत बताएं, और जनता अपनी सोच तय करे। इसके पहले भी एक ऐसी नौबत आई थी, लेकिन उस वक्त मुख्यमंत्री बनने के पहले के भूपेश बघेल ने यह दावा किया था कि उनके पास झीरम घाटी हमले की साजिश के सुबूत हैं, और उन्हें वे सही जांच एजेंसी को देंगे। कई तरह की जांच एजेंसियां झीरम की जांच करती रही, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से एनआईए की जांच चलते-चलते भी भूपेश सरकार की पुलिस को जांच करने की इजाजत दी गई थी, लेकिन मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी भूपेश बघेल ने झीरम साजिश के कोई सुबूत किसी एजेंसी को नहीं दिए जिन्हें कि वे अपनी जेब में लेकर चलने का दावा करते थे। हम तो जनता के जानने के हक के तहत पहले भी इस बात को बार-बार लिख चुके हैं कि न सिर्फ मुख्यमंत्री को, बल्कि देश के किसी आम नागरिक को भी किसी भी जुर्म या साजिश की जानकारी होने पर यह उनकी नागरिक जिम्मेदारी बनती है कि वे उसे जांच एजेंसी को दें। ऐसे में विपक्ष के नेता के रूप में भूपेश बरसों झीरम के सुबूत जेब में थपथपाते रहे, लेकिन दिए कभी नहीं। मुख्यमंत्री की संवैधानिक जिम्मेदारी की शपथ लेने के बाद भी उन्होंने कभी सुबूत जांच एजेंसी को देने की जिम्मेदारी पूरी नहीं की। अब संसद में अमित शाह ने भूपेश बघेल को जो चुनौती दी है, उस पर हम अपनी पुरानी सोच को दोहराते हुए यही कहेंगे कि भूपेश बघेल उनसे सुबूत न भी मांगें, तब भी देश का यह हक है कि अगर कांग्रेस सरकार ने पांच बरस नक्सलियों को संरक्षण दिया, तो इसके सुबूत जनता के सामने आने चाहिए। यह बात किसी भी पार्टी के किसी भी संगठन के साथ रिश्तों पर लागू होती है, अगर कोई कानून तोड़े जाते हैं। चाहे ऐसे संगठन हथियारबंद हों, या साम्प्रदायिकता से लैस हों, रिश्तों के सुबूत, और शपथ ली हुई सरकार द्वारा दिए गए संरक्षण तो उजागर होने ही चाहिए।

अब हम इन दोनों नेताओं की एक-दूसरे को दी गई चुनौतियों का मजा लेते हुए, इनके आगे बढऩे का इंतजार करेंगे, क्योंकि यह पारदर्शिता जनता के हक में है। ऐसी राजनीतिक बातें जनता के किसी सूचना पाने के अधिकार के तहत नहीं रहती हैं, ऐसी बातें नेताओं के सूचना देने की जिम्मेदारी के तहत आती हैं, जिसके लिए किसी कानून की जरूरत नहीं है, बस एक सार्वजनिक जीवन की नैतिकता जरूरी रहती है। लोकतंत्र में ऐसी गंभीर बातें खुलकर सामने आनी चाहिए। दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में इस किस्म के बहुत से मामलों में श्वेतपत्र जारी करने की भी परंपरा रही है जिसमें सरकार उसे हासिल तमाम किस्म के तथ्यों को एक दस्तावेज की तरह जनता के लिए जारी करती है। बस्तर के नक्सल मोर्चे को लेकर अगर अमित शाह के पास सचमुच ही कांग्रेस सरकार के दिए हुए संरक्षण के सुबूत हैं, तो उन्हें श्वेतपत्र के रूप में भी जारी किया जा सकता है।

अब हम आज की बची हुई चर्चा को बस्तर ले चलें, जहां का अधिकांश नक्सलग्रस्त हिस्सा अब नक्सलमुक्त हो चुका है, और बचे हुए नक्सली शायद बड़े थोड़े से हिस्से में काबिज हैं, छुपे हुए हैं, या कि दूसरे सरहदी राज्यों में चले गए हैं। जो भी हो, आज राज्य सरकार के पास नक्सलियों से छुड़ाया गया सैकड़ों वर्ग किलोमीटर का ऐसा आबादी वाला इलाका है जहां पर किसी भी जनकल्याणकारी सरकार की बहुत किस्म की चुनौतियां रहती हैं। लगातार दोनों तरफ की बंदूकों की बड़ी मौजूदगी, खूनी टकराव, धमकियों, और जमीनी सुरंगों के बीच ऐसे इलाके विकास से दूर रह गए थे। यहां पर प्रशासन पहले से इतना खराब था, कि उसी वजह से कई दशक पहले नक्सलियों को पांव जमाने का मौका मिला था। अब राज्य सरकार के सामने यह बड़ी चुनौती है कि मौजूदा ग्रामीणों को भूतपूर्व नक्सल समर्थक जैसे किसी संदेह में परेशान किए बिना इन गांवों में शासन-प्रशासन के प्रति विश्वास पैदा किया जाए। अभी भी ऐसी चर्चा है कि बस्तर के दसियों हजार लोग सलवा-जुड़ूम के दौर में, या बाद के हथियारबंद टकराव के बीच से अपने गांव छोडक़र पड़ोस के राज्यों में जा चुके हैं, वहीं पर बसे हुए हैं। अब छत्तीसगढ़ सरकार की यह जिम्मेदारी भी बनती है कि हथियार छोड़ चुके नक्सलियों के पुनर्वास की एक अलग योजना से परे, एक ऑपरेशन घरवापिसी ऐसा चलाना चाहिए जो कि बस्तर छोडक़र गए लोगों को वापिस लाने का हो। बस्तर के ये सबसे मासूम आदिवासी अपनी मर्जी से, अपनी पसंद से अपना गांव और प्रदेश छोडक़र नहीं गए थे। वे एक तरफ की बंदूकों, या दूसरे तरफ की बंदूकों के दबाव में बाहर गए थे, और आज वे भारतीय लोकतंत्र के भीतर पड़ोसी प्रदेश में शरणार्थी की तरह रह रहे हैं, क्योंकि वहां न उनकी जमीन है, न उनके कोई अधिकार हैं। राज्य सरकार को इनके लिए एक बड़ी मुहिम छेडऩी चाहिए, और जैसा कि कई जानकार तबके बताते हैं, अगर ऐसे दसियों हजार लोग बस्तर के बाहर हैं, तो अब उनको वापिस लाने का, मदद करके उन्हीं के गांव, उन्हीं की जमीन पर वापिस बसाने का एक बड़ा जिम्मा राज्य सरकार पर बनता है। नक्सल उन्मूलन की चुनौती पर कामयाब होने के बाद अब राज्य सरकार को खुद होकर ऑपरेशन घरवापिसी का यह बीड़ा उठाना चाहिए, यह भी छोटा अभियान नहीं होगा, लेकिन इतिहास इसे भी एक संवेदनशील कार्रवाई के रूप में दर्ज करेगा। राज्य और केन्द्र सरकार दोनों अब इस बारे में भी सोचें, क्योंकि बस्तर में अगर जनजीवन को सामान्य करना है, तो इन लोगों की वापिसी के बिना वह कैसे होगा?

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