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दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गुरू इन्हें माफ करें, क्योंकि ये जानते हैं कि ये पंथ का कैसा बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं...
सुनील कुमार ने लिखा है
06-Feb-2026 4:07 PM
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : गुरू इन्हें माफ करें, क्योंकि ये जानते हैं कि ये पंथ का कैसा बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं...

भारत में राजनीतिक दलों, और नेताओं की भावनाएं बारूद के ढेर पर बसी हुई दिखती हैं। इस फेहरिस्त में हर नेता चाहे शामिल न हों, काफी नेता इसमें आते हैं। दूसरे की कही हुई बात, या न कही हुई बात को भी तोड़-मरोडक़र उसे किसी भी हद तक ले जाने से लोगों को परहेज नहीं रह गया है। संसद के अहाते में अभी दो दिन पहले जब राहुल गांधी निलंबित सांसदों के साथ प्रदर्शन कर रहे थे, तभी उनके पुराने साथी रहे, और बाद में कांग्रेस छोडक़र भाजपा में जाकर केन्द्रीय मंत्री बन गए रवनीत सिंह बिट्टू वहां से गुजरे, तो राहुल ने उन्हें देखकर कहा- नमस्ते भाई, मेरे गद्दार दोस्त, फिक्र मत करो, तुम वापस आ जाओगे। राहुल ने उनसे हाथ मिलाने की भी कोशिश की, लेकिन बिट्टू ने हाथ नहीं मिलाया। बीजेपी ने राहुल की इस टिप्पणी को सिक्खों का अपमान बताया है, और बिट्टू ने पलटवार करते हुए कहा कि राहुल हमेशा सिक्खों को निशाना बनाते रहे हैं, और वे सबसे बड़े गद्दार हैं, और सिक्खों के कातिल हैं। बिट्टू पहले कांग्रेस में थे, और 2024 में ही वे भाजपा में आए हैं। पहले वे लुधियाना से दो बार सांसद थे, फिर बीजेपी में जाने पर उन्हें चुनाव लड़वाया गया लेकिन वे कांग्रेस से हार गए। बाद में भाजपा ने उन्हें राजस्थान से राज्यसभा में भेजा, और मंत्री बनाया। 2021 में एक वक्त ऐसा था जब लोकसभा में कांग्रेस के तत्कालीन नेता बंगाल चुनाव में व्यस्त थे, तो कांग्रेस ने बिट्टू को ही कई महीने लोकसभा में अपना नेता बनाया था। बाद में वे भाजपा में चले गए।

रवनीत सिंह बिट्टू ने राहुल के बारे में बड़ी तल्ख बातें कही हैं कि वे सबसे बड़े गद्दार हैं, और सिक्खों के कातिल हैं। लेकिन 2009 से तो वे कांग्रेस के टिकट पर ही 2019 तक लड़ते और जीतते रहे, 2019 के बाद से राहुल गांधी ने सिक्खों के कुछ खिलाफ कुछ कहा या किया हो, ऐसा तो याद नहीं पड़ता। फिर अंग्रेजी में ट्रेटर शब्द दगाबाज, धोखेबाज, गद्दार के लिए इस्तेमाल होता है, और जाहिर है कि पार्टी छोडक़र जाने वाले नेता के लिए राहुल ने यह बात कही। लेकिन इस बात को सिक्खों से जोड़ देना एक अलग दर्जे की घटिया राजनीति है, क्योंकि राहुल का कुछ भी कहा हुआ, या किया हुआ सिक्खों के खिलाफ नहीं है। बात यहीं पर खत्म नहीं हुई, केन्द्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी इसे एक अलग ऊंचाई पर ले गए। उन्होंने एक लंबा पोस्ट किया- ‘यह पूरी तरह संभव है कि राहुल गांधी को बिट्टूजी से गहरी नाराजगी हो क्योंकि उन्होंने कांग्रेस के बजाय मोदी को चुना। लेकिन इससे कभी भी एक गौरवशाली सिक्ख के खिलाफ इस तरह की अपमानजनक टिप्पणी को जायज नहीं ठहराया जा सकता। किसी को गद्दार दोस्त कहना, इसका मतलब है कि उसने अपने देश के साथ विश्वासघात किया है, जबकि श्री गांधी के कई ऐसे दोस्त हो सकते हैं, जो गद्दार हैं, श्री बिट्टू उनमें से निश्चित रूप से नहीं हैं। एक प्रतिष्ठित सिक्ख को बिना किसी आधार के गद्दार कहना पूरे सिक्ख समुदाय का अपमान है। उन्हें यह जानना चाहिए था कि हमारे गुरू साहिबान, और साहिबजादों ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए क्या बलिदान दिए थे, इसके पहले कि वे इस तरह की अपमानजनक टिप्पणी करें। उन्हें यह भी पता होना चाहिए था कि सिक्ख धर्म हर सिक्ख को मातृभूमि से प्रेम सिखाता है, और सिक्ख कितनी वीरता से सशस्त्र बलों में बड़ी संख्या में सेवा करते हैं ताकि मातृभूमि सुरक्षित रहे। राहुल गांधी ने गुरू साहिबान के शिष्य को गद्दार कहा है, यह हर सिक्ख का अपमान है, यह सिक्खों के हर क्षेत्र में दिए गए योगदान का अपमान है, यह हमारे विश्वास और मातृभूमि के प्रति प्रेम का अपमान है। हम यह भी न भूलें कि 1984 में उसी मानसिकता से स्वर्ण मंदिर को अपवित्र किया गया था।’

हरदीप सिंह पुरी विदेश नीति के जानकार, और एक खासे पढ़े-लिखे नेता हैं। वे अंग्रेजी-हिन्दी ठीक से समझते हैं, और गद्दार शब्द का मतलब भी। हमने अलग-अलग डिक्शनरियों में गद्दार के समानार्थी शब्द देखे, तो जो शब्द हमें मिले, उनमें षडय़ंत्रकारी साजिश करने वाला, पीठ में छुरा भोंपने वाला, धोखेबाज, दलबदलू, विश्वासघाती, बेवफा जैसे कई शब्द हैं। इसके कुछ और अर्थों में बागी, विद्रोही, मक्कार, फरेबी, कपटी, धूर्त, चालबाज जैसे शब्द भी हैं। इसके दर्जनों समानार्थी शब्दों में से एक शब्द देशद्रोही भी है। लेकिन राहुल ने जिस अंदाज में और जिन शब्दों में अपने एक पुराने साथी, और बाद में बेवफा हो गए दलबदलू के लिए मेरे गद्दार (ट्रेटर) दोस्त कहा, और कहा कि एक दिन तुम वापिस आओगे, उससे यह बात जाहिर है कि उनके गद्दार कहने का मतलब कांग्रेस पार्टी से गद्दारी करने को याद दिलाना था। अब हैरानी इस बात की है कि इस बात को सिक्ख पंथ से जोडऩे का काम अकेले भाजपा नेताओं ने किया है, राहुल के शब्द और उनका संदर्भ कहीं भी किसी के सिक्ख होने को लेकर नहीं है। ऐसे में एक राजनीतिक हमला करने के लिए दो सिक्ख नेताओं ने जिस तरह अपने पंथ का इस्तेमाल किया है, वह हक्का-बक्का करने वाला है। अभी पिछले ही हफ्ते की तो राहुल की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तैर रही हैं कि उन्होंने किस तरह स्वर्ण मंदिर, या किसी और गुरुद्वारे में जाकर सेवा की है। सिक्खों के खिलाफ न उनका कोई बयान है, न ही उनका कोई काम है। ऐसे में राजनीतिक हमला करने के लिए धर्म का इस तरह का इस्तेमाल देश की राजनीति को कहां ले जाएगा?

 

पिछले कुछ सालों में भाजपा के कई प्रमुख नेताओं ने विपक्षी नेताओं को, या सामाजिक प्रदर्शनकारियों को न सिर्फ गद्दार कहा, बल्कि देशद्रोही कहा। जिस पंजाब से निकलकर किसान आंदोलन दिल्ली की सरहद पर डेरा डालकर महीनों तक रहा, जिस आंदोलन के चलते सैकड़ों किसान मारे गए, उन्हें किसी ने खालिस्तानी कहा, तो किसी ने देशद्रोही कहा। और तो और लोगों को याद होगा कि भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने किसान आंदोलन में रात-दिन रहकर रोटियां बनाने वाली एक बुजुर्ग सिक्ख महिला को लेकर कि ऐसी औरतें सौ-सौ रूपए लेकर आंदोलन में आती हैं। कंगना ने लिखा था कि ये दादी सौ रूपए में उपलब्ध है। इसके अलावा कंगना ने किसान आंदोलन के दबाव में मोदी सरकार द्वारा किसान कानून वापिस लेने पर सोशल मीडिया पर लिखा था-‘खालिस्तानी आतंकवादियों ने भले ही आज सरकार की बांह मरोड़ दी हो, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि एक महिला, अकेली महिला प्रधानमंत्री ने इनको कुचल दिया था, उन्होंने अपनी जान की कीमत पर इन्हें मच्छर की तरह मसल दिया था, लेकिन देश के टुकड़े नहीं होने दिए, उनके निधन के दशकों बाद भी ये आज भी उनके नाम पर कांपते हैं, इनको वैसा ही गुरू चाहिए।’

कंगना के इस बयान पर शिरोमणि अकालीदल, और दिल्ली सिक्ख गुरूद्वारा प्रबंधन कमेटी ने उन्हें जेल या मानसिक चिकित्सालय भेजने की मांग की थी, और कहा था कि उससे पद्मश्री तुरंत वापिस लिया जाना चाहिए, सिक्ख किसानों को खालिस्तानी बताकर उन्होंने पूरे समुदाय के खिलाफ अपमानजनक बातें कही हैं, और इस संदर्भ में इंदिरा सरकार की जिस कार्रवाई का जिक्र कंगना ने किया है, वह भी सिक्खों के जख्मों पर नमक रगडऩे जैसा है। हमें याद नहीं पड़ता कि हरदीप सिंह पुरी, या किसी और सिक्ख भाजपा नेता ने कंगना की कही हुई इन साफ-साफ सिक्ख-विरोधी बातों के खिलाफ कुछ किया हो, कुछ कहा हो। एक बूढ़ी सिक्ख आंदोलनकारी महिला को सौ रूपए में उपलब्ध बताने पर भी जिन लोगों को तकलीफ नहीं हुई, वे आज राहुल की बात को जाहिर तौर पर तोड़-मरोडक़र उसे धर्म से जोड़ रहे हैं, सिक्ख पंथ का सबसे बड़ा अपमान तो हमें यह लग रहा है कि राजनीति करने के लिए उसका पूरी तरह से झूठा इस्तेमाल ये लोग कर रहे हैं। हम यही कह सकते हैं कि गुरू इन्हें माफ करें, क्योंकि ये जानते हैं कि ये पंथ का कैसा बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं।

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