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हाईकोर्ट ने चार्जशीट निरस्त की
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 6 फरवरी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ किया है कि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक चला आपसी सहमति वाला संबंध, यदि बाद में बिगड़ जाए या समाप्त हो जाए, तो मात्र इसी आधार पर उसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने आपराधिक कार्यवाही को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ दाखिल चार्जशीट को रद्द कर दिया।
मामले में भिलाई निवासी महिला ने मार्च 2020 में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर वर्ष 2005 से उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी। इस पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया।
प्रकरण दर्ज होने के करीब दो माह बाद शिकायतकर्ता की जाति से संबंधित प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसके आधार पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अलग से मामला दर्ज किया गया। चार्जशीट पेश होने के बाद निचली अदालत ने आरोपी के विरुद्ध आरोप तय किए, जिसके खिलाफ उसने पुनरीक्षण याचिका दायर की।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच लगभग 15 वर्षों तक संबंध रहे। स्वयं शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया कि वह आरोपी के संपर्क में लगातार रही, कई बार उससे मिली और सहमति से शारीरिक संबंध बनाए। इस पूरे लंबे कालखंड में न तो उसने पुलिस से शिकायत की और न ही किसी अन्य माध्यम से कोई आपत्ति दर्ज कराई।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता सामाजिक और व्यक्तिगत बाधाओं, जैसे जातिगत अंतर और आरोपी की वैवाहिक स्थिति से भली-भांति परिचित थी, इसके बावजूद उसने लंबे समय तक संबंध बनाए रखा। इससे स्पष्ट है कि रिश्ता किसी प्रारंभिक धोखे पर आधारित नहीं था, बल्कि पूर्ण जानकारी और सहमति से चला।
एकलपीठ में सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा ने कहा कि लंबे समय तक चले सहमति-आधारित संबंध के बाद यदि विवाह का वादा पूरा नहीं होता, तो मात्र इससे बलात्कार का अपराध नहीं बनता। रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि शुरुआत से ही विवाह का वादा झूठा या कपटपूर्ण था।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि इस तरह की परिस्थितियों में आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग और अन्याय होगा। इस आधार पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दायर चार्जशीट को निरस्त कर दिया।


